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सनातन धर्म • Sanatan Dharma

सनातन धर्म • Sanatan Dharma

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📈 تحلیل کانال تلگرام सनातन धर्म • Sanatan Dharma

کانال सनातन धर्म • Sanatan Dharma (@sanatan) در بخش زبانی هندی بازیگری فعال است. در حال حاضر جامعه شامل 10 615 مشترک است و جایگاه 8 484 را در دسته دین و مذهبی و رتبه 36 170 را در منطقه الهند دارد.

📊 شاخص‌های مخاطب و پویایی

از زمان ایجاد در невідомо، پروژه رشد سریعی داشته و 10 615 مشترک جذب کرده است.

بر اساس آخرین داده‌ها در تاریخ 30 اوت, 2026، کانال فعالیت پایداری دارد. در ۳۰ روز گذشته تغییر اعضا برابر -80 و در ۲۴ ساعت گذشته برابر -9 بوده و همچنان دسترسی گسترده‌ای حفظ شده است.

  • وضعیت تأیید: تأیید نشده
  • نرخ تعامل (ER): میانگین تعامل مخاطب 0% است و در ۲۴ ساعت نخست پس از انتشار، محتوا معمولاً N/A% واکنش نسبت به کل مشترکان کسب می‌کند.
  • دسترسی پست‌ها: هر پست به طور میانگین 0 بازدید دریافت می‌کند. در اولین روز معمولاً 0 بازدید جمع‌آوری می‌شود.
  • واکنش‌ها و تعامل: مخاطبان به‌طور فعال حمایت می‌کنند؛ میانگین واکنش به هر پست 0 است.
  • علایق موضوعی: محتوا بر موضوعات کلیدی مانند जाना, धीमहि, विद्महे, प्रचोदयात्, भगवान تمرکز دارد.

📝 توضیح و سیاست محتوایی

نویسنده این فضا را محل بیان دیدگاه‌های شخصی توصیف می‌کند:
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به لطف به‌روزرسانی‌های پرتکرار (آخرین داده در تاریخ 31 اوت, 2026)، کانال همواره به‌روز و دارای دسترسی بالاست. تحلیل‌ها نشان می‌دهد مخاطبان به‌طور فعال با محتوا تعامل دارند و آن را به نقطه اثرگذاری مهم در دسته دین و مذهبی تبدیل کرده‌اند.

10 615
مشترکین
-924 ساعت
-217 روز
-8030 روز
جذب مشترکین
اوت '26
اوت '26
+32
در 0 کانال‌ها
ژوئیه '26
+29
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژوئن '26
+47
در 0 کانال‌ها
Get PRO
مه '26
+37
در 0 کانال‌ها
Get PRO
آوریل '26
+17
در 0 کانال‌ها
Get PRO
مارس '26
+16
در 0 کانال‌ها
Get PRO
فوریه '26
+32
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژانویه '26
+58
در 0 کانال‌ها
Get PRO
دسامبر '25
+60
در 1 کانال‌ها
Get PRO
نوامبر '25
+75
در 0 کانال‌ها
Get PRO
اکتبر '25
+45
در 1 کانال‌ها
Get PRO
سپتامبر '25
+72
در 0 کانال‌ها
Get PRO
اوت '25
+87
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژوئیه '25
+56
در 1 کانال‌ها
Get PRO
ژوئن '25
+64
در 1 کانال‌ها
Get PRO
مه '25
+77
در 0 کانال‌ها
Get PRO
آوریل '25
+58
در 1 کانال‌ها
Get PRO
مارس '25
+55
در 0 کانال‌ها
Get PRO
فوریه '25
+90
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژانویه '25
+133
در 1 کانال‌ها
Get PRO
دسامبر '24
+139
در 2 کانال‌ها
Get PRO
نوامبر '24
+126
در 0 کانال‌ها
Get PRO
اکتبر '24
+246
در 5 کانال‌ها
Get PRO
سپتامبر '24
+179
در 1 کانال‌ها
Get PRO
اوت '24
+191
در 4 کانال‌ها
Get PRO
ژوئیه '24
+254
در 1 کانال‌ها
Get PRO
ژوئن '24
+255
در 2 کانال‌ها
Get PRO
مه '24
+260
در 2 کانال‌ها
Get PRO
آوریل '24
+278
در 1 کانال‌ها
Get PRO
مارس '24
+411
در 0 کانال‌ها
Get PRO
فوریه '24
+397
در 2 کانال‌ها
Get PRO
ژانویه '24
+986
در 18 کانال‌ها
Get PRO
دسامبر '23
+635
در 1 کانال‌ها
Get PRO
نوامبر '23
+283
در 2 کانال‌ها
Get PRO
اکتبر '23
+449
در 1 کانال‌ها
Get PRO
سپتامبر '23
+539
در 0 کانال‌ها
Get PRO
اوت '23
+317
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژوئیه '23
+312
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژوئن '23
+480
در 0 کانال‌ها
Get PRO
مه '23
+416
در 0 کانال‌ها
Get PRO
آوریل '23
+261
در 0 کانال‌ها
Get PRO
مارس '23
+293
در 0 کانال‌ها
Get PRO
فوریه '23
+236
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژانویه '23
+328
در 0 کانال‌ها
Get PRO
دسامبر '22
+245
در 0 کانال‌ها
Get PRO
نوامبر '22
+253
در 0 کانال‌ها
Get PRO
اکتبر '22
+290
در 0 کانال‌ها
Get PRO
سپتامبر '22
+313
در 0 کانال‌ها
Get PRO
اوت '22
+250
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژوئیه '22
+238
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژوئن '22
+267
در 0 کانال‌ها
Get PRO
مه '22
+239
در 0 کانال‌ها
Get PRO
آوریل '22
+315
در 0 کانال‌ها
Get PRO
مارس '22
+658
در 0 کانال‌ها
Get PRO
فوریه '22
+357
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژانویه '22
+173
در 0 کانال‌ها
Get PRO
دسامبر '21
+130
در 0 کانال‌ها
Get PRO
نوامبر '21
+152
در 0 کانال‌ها
Get PRO
اکتبر '21
+178
در 0 کانال‌ها
Get PRO
سپتامبر '21
+241
در 0 کانال‌ها
Get PRO
اوت '21
+242
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژوئیه '21
+294
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژوئن '21
+1 167
در 0 کانال‌ها
Get PRO
مه '210
در 0 کانال‌ها
Get PRO
آوریل '210
در 0 کانال‌ها
Get PRO
مارس '21
+137
در 0 کانال‌ها
Get PRO
فوریه '21
+164
در 0 کانال‌ها
Get PRO
ژانویه '21
+922
در 0 کانال‌ها
تاریخ
رشد مشترکین
اشارات
کانال‌ها
31 اوت0
30 اوت0
29 اوت+6
28 اوت0
27 اوت+2
26 اوت+1
25 اوت0
24 اوت0
23 اوت+2
22 اوت+5
21 اوت0
20 اوت+1
19 اوت+4
18 اوت0
17 اوت0
16 اوت+3
15 اوت0
14 اوت0
13 اوت+1
12 اوت+1
11 اوت0
10 اوت0
09 اوت0
08 اوت0
07 اوت+1
06 اوت+1
05 اوت0
04 اوت+1
03 اوت+2
02 اوت0
01 اوت+1
پست‌های کانال
2
.
1
3
शंका - एक बालक पैदा होने पर गर्भ से रोता हुआ क्यों बाहर आता है? उसे तो जन्म लेने की प्रसन्नता होनी चाहिए? समाधान - चिकित्सा विज्ञान के अनुसार रोने से फेफड़े खुलते है और वह सुप्त अवस्था से जागृत अवस्था में प्रवेश कर जाता है। गर्भ नाल के छेदन के पश्चात वह स्वतन्त्र जीवन जीने के लायक हो जाता है। जबकि दार्शनिक व्याख्या के अनुसार वह रोता इसलिए है क्योंकि उसे फिर से एक बार जन्म लेना पड़ा। 9 मास तक माता के गर्भ में उलटी लटकी आत्मा, मूत्र, रक्त आदि में सनी हुई, घोर अन्धकार से ग्रसित होती हैं। वह हर समय ईश्वर से प्रार्थना करती है कि उसे उसे दुःख से मुक्ति दिलाये। पर जब उसका जन्म होता है तो उसे यह ज्ञान होता है कि उसकी मुक्ति नहीं हुई। उसने तो फिर से जन्म ले लिया। उसे फिर से आवागमन के चक्कर में आना पड़ा। ऐसा इसलिए क्योंकि उसके कर्म ऐसे नहीं थे जिससे उसकी मुक्ति हो। ऐसा इसलिए क्योंकि वह मोक्ष मार्ग का पथिक तो बना पर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचा। अब उसे फिर से शैशव, जवानी, बुढ़ापा देखना पड़ेगा। उसे सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, व्याधि, मोह, क्रोध, स्वजनों का बिछड़ना आदि देखने पड़ेंगे। उसे फिर पिछले अच्छे-बुरे कर्मों का फल भोगना पड़ेगा। उसे फिर से सांसारिक जीव बनकर मुक्ति की प्रतीक्षा चिरकाल तक करनी पड़ेगी। यह स्मृति होते ही उसका इस जगत में जन्म लेते ही रोना शुरू हो जाता हैं। यह बोध होते ही उसे अपने पूर्व कर्मों में रह गई क्षीणता का स्मरण हो जाता है। यह बोध होते ही उसे आत्मग्लानि का अनुभव होने लगता है। इसलिए उसका नया जीवन रोने से आरम्भ होता है। जो यह कहते है कि मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ जायेगा। वह सांसारिक पदार्थों के उपलक्ष में तो सही हो सकता है पर दार्शनिक विचार से देखे तो मनुष्य अपने साथ पूर्व जन्मों में किये गए कर्मों के फल लेकर आता है और इस जन्म में अनेकों को भोगता भी हैं। और इस जन्म में किये गए कर्मों में से अनेकों के फल भोगने के लिए अगले जन्म में भी साथ ले जाता हैं। इसलिए मनुष्य कभी खाली हाथ तो नहीं आता। इसलिए हे मनुष्यों! पवित्र आत्मा के जन्म के रोने से सीख लो। यह जन्म तो हो गया। पर अभी और कितने जन्मों तक माता के गर्भ का अन्धकार देखोगे? कितने जन्मों तक यह आवागमन के चक्र् में फंसे रहोगे? कितने जन्मों तक मोक्ष के चरम सुख का आनंद भोगने ने से दूर रहोगे। सत्कर्म करते हुए योग मार्ग का पथिक बने और दुःखों छूटकर मोक्ष के अधिकारी बने। 🪷 @Sanatan
3 470
4
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5
विरह — प्रेम का सबसे ऊँचा स्वरूप मनुष्य प्रेम में मिलने को लक्ष्य समझता है। उसके लिए मिलन ही पूर्णता है, और जुदाई — असफलता। पर अस्तित्व की भाषा में इसका अर्थ बिल्कुल उल्टा है। मिलन प्रेम की शुरुआत है, विरह प्रेम की परिपक्वता। जब तुम किसी के साथ होते हो, तो प्रेम का सहारा उस व्यक्ति की उपस्थिति होती है। तुम्हारा हृदय धड़कता है — पर तुम आश्वस्त भी रहते हो, क्योंकि प्रिय तुम्हारे पास है। पर विरह… विरह वह अग्नि है जिसमें प्रेम परीक्षा नहीं देता — स्वयं को सिद्ध करता है। किसी के पास रहकर प्रेम करना सहज है। दूरी में प्रेम बनाए रखना — कठिन। और फिर भी जो प्रेम दूरी में नहीं टूटता, जो अनुपस्थिति में और गहरा हो जाता है, जो मौन में और मुखर हो जाता है, जो दुःख में भी सुंदर बना रहता है — वही प्रेम अपनी चरम ऊँचाई पर पहुँच चुका होता है। विरह तुम्हें सिखाता है कि प्रेम व्यक्ति पर आधारित नहीं, प्रेम अनुभूति पर आधारित है। यदि किसी के जाने से प्रेम मर जाए — तो वह प्रेम नहीं, निर्भरता थी। यदि किसी के दूर हो जाने से प्रेम और बढ़ जाए — तो वही प्रेम है। इसलिए विरह प्रेम का अंत नहीं है। विरह प्रेम का पवित्रीकरण है। विरह में दो शरीरों का मिलन नहीं होता, विरह में दो आत्माएँ मिलती हैं। बिना स्पर्श, बिना शब्द, बिना उपस्थिति — फिर भी एक अदृश्य पुल बना रहता है जो टूटता नहीं, चाहे संसार जितना भी समझा दे कि नाता समाप्त हो चुका है। विरह में दर्द है — पर यह वही दर्द है जो अंधकार में पड़े बीज को अंकुर बनने के लिए सहना पड़ता है। मिलन तुम्हें खुश करता है — पर विरह तुम्हें जागृत करता है। जो प्रेम विरह से गुजर चुका हो वह तुच्छ नहीं रह जाता — वह पूजा बन जाता है। उसमें माँग नहीं, आशीर्वाद होता है। उसमें अधिकार नहीं, स्वतंत्रता होती है। उसमें चिपकाव नहीं, समर्पण होता है। मिलन में तुम कह सकते हो, “तुम मेरे हो।” पर विरह में एक नई भाषा जन्म लेती है — “तुम जहाँ भी हो… मेरे ही हो।” और एक दिन, जुदाई की रातें अपने चरम पर पहुँचकर एक शांत सुबह में बदल जाती हैं। उस सुबह प्रेम किसी व्यक्ति से बड़ा हो जाता है। प्रेम बस प्रेम बन जाता है — बिना किसी पते के, बिना किसी नाम के, पर पहले से कहीं अधिक जीवित। वही क्षण है जब तुम्हें समझ आता है — विरह प्रेम की मृत्यु नहीं, प्रेम का पुनर्जन्म है। 🪷 @Sanatan
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6
प्रेम कोई संबंध नहीं, यह तो एक आंतरिक सुवास है। यह तब जन्म लेता है जब भीतर की चुप्पी फूल बनकर खिल उठती है। सच्चे प्रेम में न
प्रेम कोई संबंध नहीं, यह तो एक आंतरिक सुवास है। यह तब जन्म लेता है जब भीतर की चुप्पी फूल बनकर खिल उठती है। सच्चे प्रेम में न माँग होती है, न अपेक्षा—वहाँ केवल देना होता है। प्रेम वह ऊर्जा है जो तुम्हें भीतर से हल्का कर देती है, जैसे किसी ने आत्मा पर से बोझ हटा दिया हो। जब मन शांत और हृदय खुला होता है, प्रेम अपने आप बहता है। प्रेम किसी दूसरे के लिए नहीं, पहले अपने भीतर की पूर्णता के लिए होता है—और तभी वह सचमुच दूसरों तक पहुँचता है। प्रेम का अर्थ है—खुद को इतना संपूर्ण कर लेना कि तुम्हारी उपस्थिति ही एक आशीष बन जाए। 🪷 @Sanatan
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7
किसी भी क्षेत्र में सफलता के सात गुण प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में सफलता पाना चाहता है, वह चाहे नौकरी करने वाला हो या व्यापारिक क्षेत्र में कार्य करने वाला हो, वह चाहे डाक्टर हो, इन्जीनियर हो या कोई अन्य व्यवसाय में संलग्न हो, प्रत्येक व्यक्ति की यह आकांक्षा होती है कि वह अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त करे, पूर्णता प्राप्त करें और ऊंचाई पर पहुंचे। इसके लिए वे भरसक प्रयत्न भी करते है, पर यह आवश्यक नहीं कि उन्हें सफलता ही मिले, प्रयत्न करने के बावजूद भी व्यापार नहीं बढ़ पाता या नौकरी में प्रमोशन नहीं हो पाता, या आर्थिक उत्सति में सफलता नहीं मिल पाती, इसके लिए समाज विज्ञानियों ने सफलता के सात गुण बताये है, जिनको अपनाने पर निश्चय ही, आप अपने क्षेत्र में सफलता पा सकते हैं। १- हमेशा सुसज्जित रहिये, आपका व्यक्तित्व ही आपकी पूंजी है, दूसरों के सामने आपका व्यक्तित्व ही यापको सफलता प्रदान करेगा, अतः जब घर से बाहर निकले तब शीशे में अपने आप को देख ले कि क्या आप सभी दृष्टियों से सुसज्जित है। २- हमेशा अपने से उच्च स्तर के व्यक्तियों से वे सम्पर्क स्थापित कीजिये, जो सामान्य की अपेक्षा एक उच्च स्तर का व्यक्ति ज्यादा सहायक हो सकता है, और आपको आगे बढ़ाने में अनुकूलता प्रदान कर सकता है। ३ कंजूस मत बनिये, जहां पर जितना व्यय करना पड़े जरूर करिये इस बात का ध्यान रखिये कि मित्रता निभाने में त्यागवृत्ति आवश्यक होती है। ४- सर्वथा क्रोध रहित रहिये, सामने वाला कितना ही उत्तेजित हो आप अपने आप पर पूरा नियन्त्रण रखिये, आपकी यह अक्रोधता ही आपको सफलता प्रदान करेगी। ५- व्यसनों से सर्वथा दूर रहिये और किसी भी प्रकार के व्यसन के गुलाम मत बनिये, इससे आपका व्यक्तित्व निखरेगा । ६- नित्य एक नवीन मित्र बनाइये, आप अनुभव करेने कुछ ही दिनों में आपके पास मित्रों की एक काफी बड़ी संख्या हो गई है। ७- किसी भी क्षेत्र में पूर्ण सफलता पाने के लिए "सिद्धि साधना" सम्पन्न करिये, "सिद्धि साधना यन्त्र" या "गुरु यंत्र" के सामने नित्य एक माला मन्त्र जाप निम्न मन्त्र का करिये- मन्त्र ॐ मणिभद्रे हूं। आप स्वयं अनुभव करेगे कि आप प्रत्येक क्षेत्र में सफलता की ओर अग्रसर है। @Sanatan
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✨🙏 सभी को छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏✨ सूर्य भगवान और माता छठी मइया की कृपा आप पर सदा बनी रहे। @Hindu
✨🙏 सभी को छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏✨ सूर्य भगवान और माता छठी मइया की कृपा आप पर सदा बनी रहे। @Hindu
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सांप से डर लगता है या सपने आते हैं। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अगर आपको सर्प से डर लगता है या सांप के सपने आते हैं तो चांदी के दो सर्प बनवाएं साथ में एक स्वास्तिक भी बनवाएं। अगर चांदी का नहीं बनवा सकते तो जस्ते का बनवा लीजिए। अब थाल में रखकर इन दोनों सांपों की पूजा कीजिए और एक दूसरे थाल में स्वास्तिक को रखकर उसकी अलग पूजा कीजिए। नागों को कच्चा दूध जरा-जरा सा दीजिए और स्वास्तिक पर एक बेलपत्र अर्पित करें. फिर दोनों थाल को सामने रखकर 'ऊं नागेंद्रहाराय नम:' का जाप करें। इसके बाद नागों को ले जाकर शिवलिंग पर अर्पित करें और स्वास्तिक को गले में धारण करें। ऐसा करने के बाद आपके सांपों का डर दूर हो जाएगा और सपने में सांप आना बंद हो जाएंगे। नागपंचमी के दिन वर्जित कार्य 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1👉 नागपंचमी के दिन ना तो भूमि खोदनी चाहिए और ना ही साग काटना चाहिए । 2👉 उपवास करने वाला मनुष्य सांयकाल को भूमि की खुदाई कभी न करे । 3👉 नागपंचमी के दिन धरती पर हल न चलाएं । 4👉 इस दिन सुई धागे से किसी तरह की सिलाई आदि भी वर्जित है । 5👉 नागपंचमी के दिन न तो आग पर तवा रखा जाता है, और न ही लोहे की कड़ाही आदि में भोजन पकाया जाता है, अर्थात नागपंचमी पर एक दिन पहले पका हुआ भोजन ही ग्रहण करने का विधान है 6👉 किसान लोग अपनी नई फसल का तब तक प्रयोग नहीं करते जब तक वह नए अनाज से बाबे को रोट न चढ़ाएं । 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️
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10
नागदेवता की आरती करें और प्रसाद बांट दें। इस प्रकार पूजा करने से नागदेवता प्रसन्न होते हैं और हर मनोकामना पूरी करते हैं। नागपंचमी 〰️〰️〰️〰️ महाभारत आदि ग्रंथों में नागों की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है। इनमें शेषनाग, वासुकि, तक्षक आदि प्रमुख हैं। नागपंचमी के अवसर पर हम आपको ग्रंथों में वर्णित प्रमुख नागों के बारे में बता रहे हैं। तक्षक नाग 〰️〰️〰️〰️ धर्म ग्रंथों के अनुसार, तक्षक पातालवासी आठ नागों में से एक है। तक्षक के संदर्भ में महाभारत में वर्णन मिलता है। उसके अनुसार, श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी। तक्षक से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ में अनेक सर्प आ-आकर गिरने लगे। यह देखकर तक्षक देवराज इंद्र की शरण में गया। जैसे ही ऋत्विजों (यज्ञ करने वाले ब्राह्मण) ने तक्षक का नाम लेकर यज्ञ में आहुति डाली, तक्षक देवलोक से यज्ञ कुंड में गिरने लगा। तभी आस्तिक ऋषि ने अपने मंत्रों से उन्हें आकाश में ही स्थिर कर दिया। उसी समय आस्तिक मुनि के कहने पर जनमेजय ने सर्प यज्ञ रोक दिया और तक्षक के प्राण बच गए। कर्कोटक नाग 〰️〰️〰️〰️〰️ कर्कोटक शिव के एक गण हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सर्पों की मां कद्रू ने जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब भयभीत होकर कंबल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए। ब्रह्माजी के कहने पर कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित लिंग की स्तुति की। शिव ने प्रसन्न होकर कहा- जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा। इसके बाद कर्कोटक नाग उसी शिवलिंग में प्रवेश कर गया। तब से उस लिंग को कर्कोटेश्वर कहते हैं। मान्यता है कि जो लोग पंचमी, चतुर्दशी और रविवार के दिन कर्कोटेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं उन्हें सर्प पीड़ा नहीं होती। कालिया नाग 〰️〰️〰️〰️〰️ श्रीमद्भागवत के अनुसार, कालिया नाग यमुना नदी में अपनी पत्नियों के साथ निवास करता था। उसके जहर से यमुना नदी का पानी भी जहरीला हो गया था। श्रीकृष्ण ने जब यह देखा तो वे लीलावश यमुना नदी में कूद गए। यहां कालिया नाग व भगवान श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंत में श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को पराजित कर दिया। तब कालिया नाग की पत्नियों ने श्रीकृष्ण से कालिया नाग को छोडऩे के लिए प्रार्थना की। तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि तुम सब यमुना नदी को छोड़कर कहीं और निवास करो। श्रीकृष्ण के कहने पर कालिया नाग परिवार सहित यमुना नदी छोड़कर कहीं और चला गया। इनके अलावा कंबल, शंखपाल, पद्म व महापद्म आदि नाग भी धर्म ग्रंथों में पूज्यनीय बताए गए हैं। नागपंचमी पर नागों की पूजा कर आध्यात्मिक शक्ति और धन मिलता है। लेकिन पूजा के दौरान कुछ बातों का ख्याल रखना बेहद जरूरी है। अगर कुंडली में राहु-केतु की स्थिति ठीक ना हो तो इस दिन विशेष पूजा का लाभ पाया जा सकता है। जिनकी कुंडली में विषकन्या या अश्वगंधा योग हो, ऐसे लोगों को भी इस दिन पूजा-उपासना करनी चाहिए. जिनको सांप के सपने आते हों या सर्प से डर लगता हो तो ऐसे लोगों को इस दिन नागों की पूजा विशेष रूप से करना चाहिए। भूलकर भी ये ना करें 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1. जो लोग भी नागों की कृपा पाना चाहते हैं उन्हें नागपंचमी के दिन ना तो थे भूमि खोदनी चाहिए और ना ही साग काटना चाहिए.। 2. उपवास करने वाला मनुष्य सांयकाल को भूमि की खुदाई कभी न करे। 3. नागपंचमी के दिन धरती पर हल न चलाएं। 4. देश के कई भागों में तो इस दिन सुई धागे से किसी तरह की सिलाई आदि भी नहीं की जाती। 5. न ही आग पर तवा और लोहे की कड़ाही आदि में भोजन पकाया जाता है। 6. किसान लोग अपनी नई फसल का तब तक प्रयोग नहीं करते जब तक वह नए अनाज से बाबे को रोट न चढ़ाएं। राहु-केतु से परेशान हों तो क्या करें 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ एक बड़ी सी रस्सी में सात गांठें लगाकर प्रतिकात्मक रूप से उसे सर्प बना लें इसे एक आसन पर स्थापित करें। अब इस पर कच्चा दूध, बताशा और फूल अर्पित करें। साथ ही गुग्गल की धूप भी जलाएं. इसके पहले राहु के मंत्र 'ऊं रां राहवे नम:' का जाप करना है और फिर केतु के मंत्र 'ऊं कें केतवे नम:' का जाप करें। जितनी बार राहु का मंत्र जपेंगे उतनी ही बार केतु का मंत्र भी जपना है। मंत्र का जाप करने के बाद भगवान शिव का स्मरण करते हुए एक-एक करके रस्सी की गांठ खोलते जाएं. फिर रस्सी को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें. राहु और केतु से संबंधित जीवन में कोई समस्या है तो वह समस्या दूर हो जाएगी।
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नागपंचमी के दिन वातावरण में स्थिरता आती है । सात्त्विकता ग्रहण करने के लिए यह योग्य और अधिक उपयुक्त काल है। इस दिन शेषनाग और विष्णु की इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए। ‘आपकी कृपा से इस दिन शिवलोक से प्रक्षेपित होनेवाली तरंगें मेरे द्वारा अधिकाधिक ग्रहण होने दीजिए। मेरी आध्यात्मिक प्रगति में आनेवाली सर्व बाधाएं नष्ट होने दीजिए, मेरे पंचप्राणों में देवताओं की शक्ति समाए तथा उसका उपयोग ईश्वरप्राप्ति और राष्ट्ररक्षा के लिए होने दीजिए । मेरे पंचप्राणों की शुद्धि होने दीजिए । ऐसी मान्यता है कि जो भी इस दिन श्रद्धा व भक्ति से नागदेवता का पूजन करता है उसे व उसके परिवार को कभी भी सर्प भय नहीं होता। इस बार यह पर्व 09 अगस्त शुक्रवार को है। इस दिन नागदेवता की पूजा किस प्रकार करें, इसकी विधि एवं मुहूर्त इस प्रकार है। नागपंचमी पूजा का शुभ मुहूर्त 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 15 जुलाई 〰️〰️〰️〰️ पञ्चमी तिथि प्रारम्भ 👉 जुलाई 28 को रात्री 11:23 बजे पञ्चमी तिथि समाप्त 👉 जुलाई 29 को रात्रि 12:45 बजे तक नाग पञ्चमी पूजा मुहूर्त 👉 29 जुलाई प्रातः 05:34 से 08:17 तक रहेगा। पूजन विधि 〰️〰️〰️〰️ नागपंचमी पर सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद सबसे पहले भगवान शंकर का ध्यान करें नागों की पूजा शिव के अंश के रूप में और शिव के आभूषण के रूप में ही की जाती है। क्योंकि नागों का कोई अपना अस्तित्व नहीं है। अगर वो शिव के गले में नहीं होते तो उनका क्या होता। इसलिए पहले भगवान शिव का पूजन करेंगे। शिव का अभिषेक करें, उन्हें बेलपत्र और जल चढ़ाएं। इसके बाद शिवजी के गले में विराजमान नागों की पूजा करे। नागों को हल्दी, रोली, चावल और फूल अर्पित करें। इसके बाद चने, खील बताशे और जरा सा कच्चा दूध प्रतिकात्मक रूप से अर्पित करेंगे। घर के मुख्य द्वार पर गोबर, गेरू या मिट्टी से सर्प की आकृति बनाएं और इसकी पूजा करें। घर के मुख्य द्वार पर सर्प की आकृति बनाने से जहां आर्थिक लाभ होता है, वहीं घर पर आने वाली विपत्तियां भी टल जाती हैं। इसके बाद 'ऊं कुरु कुल्ले फट् स्वाहा' का जाप करते हुए घर में जल छिड़कें। अगर आप नागपंचमी के दिन आप सामान्य रूप से भी इस मंत्र का उच्चारण करते हैं तो आपको नागों का तो आर्शीवाद मिलेगा ही साथ ही आपको भगवान शंकर का भी आशीष मिलेगा बिना शिव जी की पूजा के कभी भी नागों की पूजा ना करें। क्योंकि शिव की पूजा करके नागों की पूजा करेंगे तो वो कभी अनियंत्रित नहीं होंगे नागों की स्वतंत्र पूजा ना करें, उनकी पूजा शिव जी के आभूषण के रूप में ही करें। नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा (सोने, चांदी या तांबे से निर्मित) के सामने यह मंत्र बोलें। अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्। शंखपाल धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।। एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्। सायंकाले पठेन्नित्यं प्रात:काले विशेषत:।। तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।। इसके बाद पूजा व उपवास का संकल्प लें। नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा को दूध से स्नान करवाएं। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर गंध, फूल, धूप, दीप से पूजा करें व सफेद मिठाई का भोग लगाएं। यह प्रार्थना करें। सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले।। ये च हेलिमरीचिस्था येन्तरे दिवि संस्थिता। ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:। ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।। प्रार्थना के बाद नाग गायत्री मंत्र का जाप करें- ऊँ नागकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात्। इसके बाद सर्प सूक्त का पाठ करें ब्रह्मलोकुषु ये सर्पा: शेषनाग पुरोगमा:। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।। इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासुकि प्रमुखादय:। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।। कद्रवेयाश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।। इंद्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखादय:। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।। सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखादय:। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।। पृथिव्यांचैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।। सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।। ग्रामे वा यदिवारण्ये ये सर्पा प्रचरन्ति च। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।। समुद्रतीरे ये सर्पा ये सर्पा जलवासिन:। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।। रसातलेषु या सर्पा: अनन्तादि महाबला:। नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
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नागपंचमी मंगलवार 29 जुलाई विशेष 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ उत्तर भारत मे प्रतिवर्ष श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी मनाई जाती है, भारत के कुछ भागो खासकर मरुस्थलीय क्षेत्र मे इसे श्रावण मास की कृष्ण पक्ष की पंचमी को भी मनाया जाता है। हिन्दू धर्म में नागों को बहुत ऊंचा दर्जा दिया जाता है, नाग देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश से एकरूप हुए देवता हैं। नागदेवता ही पृथ्वी का मेरूदंड, अर्थात रीढ की हड्डी हैं । शास्त्रानुसार शेषनाग नाग मतांतर से वासुकी नाग ने ही पृथ्वी को अपने मस्तक पर धारण किया हुआ है, अर्थात पृथ्वी नाग के फन पर ही टिकी हुई है। क्षीरसागर मे भगवान विष्णु की "शैय्या तथा सिर" पर छत्र समान, शेषनाग ही है । भगवान विष्णु ने जब-२ भी धरती पर अवतार रूप मे अवतरण अथवा जन्म लिया तो उनके साथ-२ शेषनाग भी अन्य रूपो मे भगवान के साथ धरती पर अवतरित होते रहे, त्रेता युग मे छोटे भाई लक्ष्मण तथा द्वापर युग मे बड़े भाई बलराम के रूप में शेषनाग ने भगवान की लीला मे उनका साथ निभाया। ऐसा माना जाता है कि श्रीविष्णु भगवान के तमोगुण से शेषनाग की उत्पत्ति हुई । सागरमंथन मे सागर को मथने के लिए कूर्मावतार के ऊपर मथानी (मधानी) की रस्सी बनकर वासुकी नाग ने ही देवताओं और दैत्यों की सहायता की थी। इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के अध्याय 10, श्लोक 29 में अपनी विभूति का कथन किया है कि- नागों में श्रेष्ठ ‘अनंत’ मैं ही हूं’। भगवान शंकर ने नाग को अपने कंठ मे धारण करके इन्हे उच्च स्थान दिया। इस प्रकार भगवान शंकर की देह पर नौ नाग माने जाते हैं, इसलिए नागपंचमी के दिन नाग का पूजन करना अर्थात नौ नागों के संघ का एक प्रतीक का पूजन करना है, इस प्रकार यह सगुण रूप में शिव की पूजा करने के समान है, इसलिए इस दिन वातावरण में आई हुई शिवतरंगें आकर्षित होती हैं तथा यह तंरगे समस्त जीवो के लिए वर्ष भर लाभकारी सिद्ध होती हैं। नागपंचमी पर नागपूजा का महत्त्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1👉 भारतीय धर्म शास्त्रो के अनुसार जन्मजेय जोकि अर्जुन के पौत्र और परीक्षित के पुत्र थे। उन्होंने सर्पों से बदला लेने व नाग वंश के विनाश हेतु एक नाग यज्ञ किया क्योंकि उनके पिता राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नामक सर्प के काटने से हुई थी। नागों की रक्षा हेतु इस यज्ञ को ऋषि जरत्कारु के पुत्र आस्तिक मुनि ने रोका था। जिस दिन इस यज्ञ को रोका गया उस दिन श्रावण मास की शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि थी और तक्षक नाग व उसका शेष बचा वंश विनाश से बच गया। मान्यता है कि यहीं से नाग पंचमी पर्व मनाने की परंपरा प्रचलित हुई। 2👉 ‘शेषनाग अपने फन पर पृथ्वी को धारण करते हैं । वे पाताल में रहते हैं। उनके सहस्र फन हैं । प्रत्येक फन पर एक हीरा है। उनकी उत्पत्ति श्रीविष्णु के तमोगुण से हुई। श्रीविष्णु प्रत्येक कल्प के अंत में महासागर में शेषनाग के आसन पर शयन करते हैं। त्रेता युग में श्रीविष्णु ने राम-अवतार धारण किया। तब शेषनाग ने लक्ष्मण का अवतार लिया। द्वापर एवं कलियुग के संधिकाल में श्रीविष्णु ने श्रीकृष्ण का अवतार लिया। उस समय शेषनाग बलराम बने। 3👉 महाभारत काल मे श्रीकृष्ण ने यमुना के कुंड में कालिया नाग का मर्दन किया। उस दिन श्रावण मा।स शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि थी, इसलिए भी नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। 4👉 पुराणो के अनुसार "सत्येश्वरी" नामक एक देवी मां थी। सत्येश्वर नामक उसका एक भाई था। सत्येश्वर की मृत्यु नागपंचमी से एक दिन पूर्व हो गई थी। सत्येश्वरी को उसका भाई नाग के रूप में दिखाई दिया। तब उसने उस नागरूप को अपना भाई माना। उस समय नागदेवता ने वचन दिया कि, जो भी स्त्री मेरी पूजा भाई के रूप में करेगी, मैं भाई समान उसकी रक्षा करूंगा। तब से महिलाएं नाग पंचमी के दिन नाग की पूजा कर नागपंचमी मनाती है। पूर्वजो एवं नागों का परस्पर संबंध 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार र्भुवलोक एवं पितृलोक में फंसे हुए पूर्वज अधिकांश रूप से काले नागों के रूप में अपने वंशजों को दर्शन कराते हैं । 1👉 सात्त्विक पूर्वज पीले रंग के नागों के रूप में दर्शन एवं आशीर्वाद देते हैं । घर, संपत्ति एवं परिजनों के प्रति बहुत ही आसक्ति वाले पूर्वजों को पृथ्वी पर नागयोनी में जन्म मिलता है । 2👉 मनुष्य जन्म में दूसरों को कष्ट पहुंचाकर वाममार्ग अर्थात गलत ढंग से संपत्ति अर्जित करने वाले पूर्वजों को उनके अगले जन्म में पाताल में काले नागों के रूप में जन्म मिलता है । 3👉 देवता के कार्य में सहभागी तथा सज्जन प्रवृत्ति के लोग पितृलोक में निवास करने के पश्‍चात शिवलोक के पास स्थित दैवीय नागलोक में पीले नागों के रूप में वास करते हैं । हिन्दू धर्म मे नागदेवता की पूजा के लिए प्रतिवर्ष श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी के दिन नागो की विशेष पूजा की जाती है ।
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🍁 अवतार और देवत्व : एक शास्त्रीय विवेचन 🍁 पञ्चदेव — रुद्र, मरुत, वसु, वासव आदि — के विविध अवतार यदि पृथ्वी पर हुए हों, तो मात्र अवतार-स्वरूप होना ही उन्हें पूज्य देवता सिद्ध कर देगा — ऐसा सामान्य जन मान लेते हैं, किंतु यह शास्त्रसम्मत नहीं। ◆ लोग कहते हैं – “गङ्गाजल यदि लौटे में रखा हो, तब भी वह गङ्गाजल ही कहलाता है।” इसी प्रकार “विष्णु या शिव के अवतार भी तो देवता ही होंगे।” ● यह भ्रान्ति है। देवत्व कोई साधारण बात नहीं है जिसे हर अवतार को सौंप दिया जाए। शास्त्रों में अवतारों के भी भेद स्पष्ट हैं — पूर्णावतार, अंशावतार, आवेशावतार, लीलावतार आदि। ● श्रीराम व श्रीकृष्ण पूर्णावतार हैं — समस्त कलाओं से युक्त, शाश्वत, पूज्य। ● किन्तु पृथु, ऋषभदेव, कपिल, नर-नारायण, सनकादि, दुर्वासा, पिप्लाद आदि — ये सभी अंशावतार अथवा ऋष्यवतार हैं — इनकी मूर्तिपूजा का विधान नहीं है। ▪︎ महत्त्व का तथ्य यह है कि — वह अवतार ही पूज्य है जिसका शास्त्रसम्मत पूजन-विधान, आगम-विधि, मन्त्र-विनियोग, मूर्तिस्थापन एवं प्रतिष्ठा का स्पष्ट विधान उपलब्ध हो। ● कालभैरव पूज्य हैं — तांत्रिक, यांत्रिक, लिंगात्मक विधियों सहित। परंतु अर्जुन का परीक्षण करने आए किरात, या चाण्डालरूप धारी शिव — उनकी पूजा नहीं होती। ▪︎ अश्वत्थामा, गृहपति, वीरभद्र आदि आवेशावतार माने जाते हैं, किन्तु सभी की प्रतिष्ठा नहीं होती। यदि भविष्य में किरात, चाण्डाल, वैश्य आदि जातियों से प्रेरित होकर कोई “शिवावतार” मानकर मंदिर निर्माण करने लगे — तो क्या वह धर्मसंगत होगा? ◆ यदि वे मूर्तिपूजनीय नहीं हैं, तो शास्त्र का उल्लंघन कर उनके नाम पर मूर्तियाँ स्थापित करना, उत्सव करना — क्या यह श्रद्धा है या उन्मत्त विकृति? यह शिवभक्ति नहीं, अपितु शिवावतारों के नाम पर कुतर्कयुक्त विघटन है। ▪︎ यदि आपको किसी अमुक अवतार से गहन अनुराग हो, तो प्रत्यक्ष शिवलिंग की आराधना कीजिए, रुद्राभिषेक कीजिए, सहस्रपार्थिव लिंगों का पूजन कर प्रवाह कीजिए — वही शास्त्रसम्मत मार्ग है। आज की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि— ● भगवत्पाद आदि शंकराचार्य जिन बातों को कभी स्वप्न में भी स्वीकार न करते, वे कार्य आज उन्हीं के प्रतिष्ठित मठों से प्रचारित हो रहे हैं। ◆ संघी-समाजी विचारधारा कहती है — “राम-कृष्ण आदि केवल महापुरुष हैं, कोई देवता नहीं!” ऐसा विचार दैवद्रोह है। इसे “महापुरुष” बनाकर दीनदयाल, पटेल आदि की श्रेणी में ला देना शास्त्र का उपहास है। ▪︎ मूर्तिभंजक उन्मादतंत्र के नेताओं को “दीर्घायु” का आशीर्वाद देना — क्या यह धर्म की रक्षा है? या गौवध, देवविरोध व परम्पराभंजन के लिए अप्रत्यक्ष समर्थन? "न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्" ● चिदानन्द देह को पञ्चभौतिक शरीर मान लेना घोर मूर्खता है। भगवान जिस दिव्य चिद्देह को धारण करते हैं, वह साधारण मरणशील देह नहीं। उन्हें “मृत” कहना देवनिन्दा है। ◆ यह अत्यन्त दुर्भाग्य है कि शास्त्रप्रणीत मर्यादा को छोड़कर केवल जातिगत भावना, राजनीतिक प्रवाह, और सांप्रदायिक संकीर्णता के कारण हम उन कार्यों को भी धर्म मानने लगे हैं जिनका शास्त्र में लेशमात्र भी समर्थन नहीं। 🌹 @Sanatan
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जानियें, क्या करें - गुरु पूर्णिमा के दिन ======================= आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरू पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिवस भी है। व्यास जी ने ही चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन ये करें - * प्रातः घर की सफाई, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करके तैयार हो जाएं। * घर के किसी पवित्र स्थान पर पटिए पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ बनाना चाहिए। * फिर हमें 'गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये' मंत्र से पूजा का संकल्प लेना चाहिए। * तत्पश्चात दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ना चाहिए। * फिर व्यासजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम मंत्र से पूजा करना चाहिए। * अब अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा करके उन्हें यथा योग्य दक्षिणा देना चाहिए। गुरु पूर्णिमा पर यह भी है विशेष - * गुरु पूर्णिमा पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए। * यह पर्व श्रद्धा से मनाना चाहिए, अंधविश्वास के आधार पर नहीं। * इस दिन वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर गुरु को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। * गुरु का आशीर्वाद सभी-छोटे-बड़े तथा हर विद्यार्थी के लिए कल्याणकारी तथा ज्ञानवर्द्धक होता है। * इस दिन केवल गुरु (शिक्षक) ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है। @Sanatan
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पूजा पाठ में आचमन का महत्त्व 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ पूजा, यज्ञ आदि आरंभ करने से पूर्व शुद्धि के लिए मंत्र पढ़ते हुए जल पीना ही आचमन कहलाता है। इससे मन और हृदय की शुद्धि होती है। यह जल आचमन का जल कहलाता है। इस जल को तीन बार ग्रहण किया जाता है। माना जाता है कि ऐसे आचमन करने से पूजा का दोगुना फल मिलता है। जल लेकर तीन बार निम्न मंत्र का उच्चारण करते हैं:- हुए जल ग्रहण करें- ॐ केशवाय नम: ॐ नाराणाय नम: ॐ माधवाय नम: ॐ ह्रषीकेशाय नम:, बोलकर ब्रह्मतीर्थ (अंगुष्ठ का मूल भाग) से दो बार होंठ पोंछते हुए हस्त प्रक्षालन करें (हाथ धो लें)। उपरोक्त विधि ना कर सकने की स्थिति में केवल दाहिने कान के स्पर्श मात्र से ही आचमन की विधि की पूर्ण मानी जाती है। आचमन करते समय हथेली में 5 तीर्थ बताए गए हैं- 1. देवतीर्थ, 2. पितृतीर्थ, 3. ब्रह्मातीर्थ, 4. प्रजापत्यतीर्थ और 5. सौम्यतीर्थ। कहा जाता है कि अंगूठे के मूल में ब्रह्मातीर्थ, कनिष्ठा के मूल प्रजापत्यतीर्थ, अंगुलियों के अग्रभाग में देवतीर्थ, तर्जनी और अंगूठे के बीच पितृतीर्थ और हाथ के मध्य भाग में सौम्यतीर्थ होता है, जो देवकर्म में प्रशस्त माना गया है। आचमन हमेशा ब्रह्मातीर्थ से करना चाहिए। आचमन करने से पहले अंगुलियां मिलाकर एकाग्रचित्त यानी एकसाथ करके पवित्र जल से बिना शब्द किए 3 बार आचमन करने से महान फल मिलता है। आचमन हमेशा 3 बार करना चाहिए। आचमन के बारे में स्मृति ग्रंथ में लिखा है कि प्रथमं यत् पिबति तेन ऋग्वेद प्रीणाति। यद् द्वितीयं तेन यजुर्वेद प्रीणाति। यत् तृतीयं तेन सामवेद प्रीणाति। पहले आचमन से ऋग्वेद और द्वितीय से यजुर्वेद और तृतीय से सामवेद की तृप्ति होती है। आचमन करके जलयुक्त दाहिने अंगूठे से मुंह का स्पर्श करने से अथर्ववेद की तृप्ति होती है। आचमन करने के बाद मस्तक को अभिषेक करने से भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं। दोनों आंखों के स्पर्श से सूर्य, नासिका के स्पर्श से वायु और कानों के स्पर्श से सभी ग्रंथियां तृप्त होती हैं। माना जाता है कि ऐसे आचमन करने से पूजा का दोगुना फल मिलता है। 🙏😊🌹 @Sanatan
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🌼 म्लेच्छों से अन्न भक्षण का प्रायश्चित्त 🌼 👉 म्लेच्छों (यथा मुस्लिम ईसाई आदि) के पर्व में अनेक लोग शुभकामनाएँ देते हुए दिखाई देते हैं | संभव है कि वे इन विधर्मियों के साथ इन दिनों में सहभोज भी करते होंगे | ये कृत्य शास्त्रविरुद्ध होने के कारण किसी भी हिंदू के लिए निन्दनीय है | हमारा यह शरीर अन्न के द्वारा ही बनता है, इसलिए बहुत विचारपूर्वक अन्न की शुद्धि का निर्णय करना चाहिए | विधर्मियों के अन्न भक्षण से भोक्ता उसके अनेक जन्मों के संचित पाप का भागी होता है | "इस समय सर्वत्र अधर्म बढ रहा है व लोग अपने स्वधर्म से च्युत हो रहे हैं, इसलिए अपने स्वबान्धवों के घर भोजन भी स्वधर्मनिष्ठ हिंदुओं के लिए पतित करने वाला ही है |" जो म्लेच्छ द्वारा पकाया हुआ,छुया हुआ अथवा उसके द्वारा दिया गया अन्न भक्षण करता है तो उसे प्रायश्चित्त हेतु पूर्ण कृच्छ्र व्रत करना चाहिए | व्रत के पश्चात् द्विज अपना यज्ञोपवीत संस्कार पुनः करवाने पर ही शुद्ध होता है | म्लैच्छैर्गतानां चौरैर्वा कान्तारे वा प्रवासिनाम् | भक्षयाभक्ष्यविशुद्ध्यर्थं तेषां वक्ष्यामि निष्कृतिम् || पुनः प्राप्य स्वदेशं च वर्णानामनुपूर्वशः | कृच्छ्रस्यान्ते ब्राह्मणस्तु पुनः संस्कारमर्हति || पादोनान्ते क्षत्रियश्च अर्धान्ते वैश्य एव च | पादं कृत्वा यथा शूद्रो दानं दत्वा विशुध्यति || ----- अग्निपुराण अध्याय- 170 ( नोट - श्लोक में ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य शुद्र की उपमा किसी परिवार विशेष में जन्म लेने विषयक नही, कर्म विषयक है) 🕉️ @Sanatan
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राधा: “कान्हा, क्या मनुष्य सच में प्रेम से बच सकता है? क्या यह संभव है कि हम स्वयं को बांधने, टूटने और पीड़ा से रोक लें?” कृष्ण (धीरे मुस्कुराते हुए): “राधे, प्रेम कोई रोग नहीं जिसे बचाव से टाला जा सके। प्रेम तो वह अग्नि है जिसमें आत्मा स्वयं को अर्पण करती है बचना चाहोगी तो केवल जलोगी, और समर्पण करोगी तो शुद्ध हो जाओगी।” राधा: “तो क्या प्रेम में पड़ना ही अंत है मनुष्य का?” कृष्ण: “नहीं राधे, प्रेम में पड़ना अंत नहीं वह तो शुरुआत है उस यात्रा की जहाँ ‘ *मैं* ’ विलीन हो जाता है और ‘ *तू* ’ शेष रह जाती है।” राधा: “परन्तु प्रेम में तो बंधन है, पीड़ा है, अश्रु हैं। फिर भी लोग प्रेम क्यों करते हैं, कान्हा?” कृष्ण (गंभीर होकर): “क्योंकि राधे, मनुष्य का स्वभाव है प्रेम से बचना पर आत्मा का स्वभाव है प्रेम में जलकर मुक्त होना। प्रेम कोई सुख नहीं जो पाकर तृप्त हुआ जाए प्रेम तो वह अग्नि है जिसमें हर बंधन स्वाहा होता है।” राधा (धीरे से): “और जो प्रेम में खो जाए, वह क्या पाता है?” कृष्ण (आँखें मूंदकर): “वह स्वयं को खोकर भी, ईश्वर को पा लेता है। राधे, प्रेम में जो समर्पण है वही मोक्ष है। और प्रेम वह शुद्ध नदी है जो बहते-बहते आत्मा तक पहुँचती है… तुम तक पहुँचती है।” राधा मौन हो गईं… कृष्ण की आँखों में झाँककर जैसे स्वयं को देख लिया हो। वहाँ प्रेम नहीं था — वहाँ ईश्वर था। 🪷 @Sanatan
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