श्रीमद आद्य शंकराचार्य परम्परा के दिव्य संदेश 🚩
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*श्रीरामायण-तत्त्व-रहस्य भाग ९*
(अंतिम भाग)
गोवर्धनपीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य स्वामीजी श्री १०८ श्रीभारती कृष्णतीर्थजी महाराज
गतांक से -
*यस्तु रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति ।*
*निन्दितः स भवेल्लोके स्वात्माप्येनं विगर्हति॥*
अर्थात् जो ( भक्ति और प्रेमके भावसे ) रामको नहीं देखता तथा जिसको ( दया के साथ ) राम नहीं देखते वह तो दुनिया में और अपने हृदय में भी घृणित ही होगा।
इस उपाख्यान में यद्यपि 'डूबने' शब्दपर किये हुए शब्द-श्लेप के चमत्कारसे लाभ उठाया गया है, तो भी तात्पर्यं तो सिद्धान्त रूपसे ही निकलता है कि जो मनुष्य भगवान्को अपने हृदयसे फेंककर भगवान् के हाथमें ( या वश में अर्थात् सेवा में ) नहीं रहता, वह तो भगवान् के हाथसे छूट जानेपर, भगवान् के हाथसे छोड़े हुए पत्थरकी भाँति ( संसाररूपी या अज्ञानरूपी ) महासमुद्र में एकदम डूब ही जायगा, वह कभी बच नहीं सकता।
अतएव हमलोगोंको चाहिये कि हम अपने हृदयरूपी सिंहासनको बिल्कुल खाली तथा शुद्ध करके, उसपर भगवानको बिठा दें, फिर भगवान् जो केवल भक्तवत्सल ही नहीं हैं, बल्कि स्वयं अपनेको भक्त-भक्त और भक्तपराधीन बतलाते हैं, वह तो अपनी ही -
'अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
'न मे भक्तः प्रणश्यति
" तेषां योगक्षेमं वहाम्यहम्" इत्यादि
- प्रतिज्ञाओंको अवश्य पालेंगे और स्वयमेव ही हमारे पापों तथा तज्जन्य दुःखोंको दूर करके, हमारे योगक्षेमके भारको अपने कन्धोंपर वैसे ही उठा लेंगे जैसे उन्होंने प्रह्लाद, द्रौपदी, मीराबाई आदि अपने भक्तोंके भारको बारम्बार उठाया था।
हम सभी दुःखोंसे मुक्त होकर शान्ति और आनन्दमें रहना चाहते हैं परन्तु शान्तिरूपिणी सीताजी आत्मारामरूपी रामको छोड़कर दूसरे किसी के साथ कभी नहीं रह सकती और-'अशान्तस्य कुतः सुखम् ।
बिना शान्तिके आनन्द भी नहीं रह सकता, इसलिये हम संस्कृत और हिन्दीके एक अतिसरल शब्द श्लपसे लाभ उठाते हुए, इस लेखका उपसंहार करते हैं कि यदि तुम आराम चाहते हो, तो मनसे, वाणी से और अपने कामसे खूब जोरसे कहो 'आ राम !' अभी तो 'जा राम' 'जा राम' कहते रहते हो, अर्थात् अपने हृदयके भीतर रामके लिये स्थान नहीं देते हो तो राम कैसे आ सकता है ? अर्थात् 'आराम' कैसे हो सकता है ?
एतएव अगर चाहते हो आराम, तो मनसे चाहो 'आ राम', वाणी से कहो 'आ राम' कामसे भी कहो 'आराम' और फिर पाते रहो 'आराम'- जय भगवान् श्रीरामचन्द्रजी की।
तीर्त्वा मोहमहार्णवं स्थिर निजानन्देप्सया रावणं
हत्वा काममुखासुरव्रजवृताकारलंकाधिपम् ।
भूयः प्राप्य विचाररूपहनुमत्पूर्वेक्षितां प्रेयसी
सीतां शान्तिनिजाकृतिं विजयते ह्यात्माभिरामो हरिः॥
-
जय श्री राम
इतिश्रीरामार्पणमस्तु।
साभार : कल्याण
संकलन : पं. हीरेनभाई त्रिवेदी,क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
अपने ही हाथसे एक पत्थर समुद्र में फेंका और जय वह डूबने लगा तो भगवान्ने फिर पूछा कि 'हे नल ! मेरे नामके प्रभावसे जो कार्य तुमसे हो सकता है और हो रहा है, वह मेरे हाथसे क्यों नहीं होता ?" तब नलने शब्दश्लेपसे बड़ा ही चमत्कारी उत्तर दिया, कि 'हे भगवन् ! आप तो त्रिलोकीके नाथ हैं, पत्थरकी तो बात ही कौन-सी है।
साक्षात् देवेन्द्र भी अगर आपके हाथसे फेंक दिया जायगा तो वह तो अवश्य डूबेगा ही, जिसको आपने हाथसे फेंक दिया, वह कैसे बच सकता है ?'
-
क्रमशः
साभार : कल्याण
संकलन : पं. हीरेनभाई त्रिवेदी,क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
*श्रीरामायण-तत्त्व-रहस्य भाग ८*
गोवर्धनपीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य स्वामीजी श्री १०८ श्रीभारती कृष्णतीर्थजी महाराज
गतांक से -
परन्तु यह अवस्था केवल विचार दशा की बात है, इसलिये हनुमानजी अन्तरिक्ष में ही कूद पड़ते हैं, पके पुलसे नहीं जाते, परन्तु जब सीताजीका पता लगने पर उसकी प्राप्तिके लिये जाना होता है, तब तो साधनरूपी पक्की सेतुसे ही जाना होता है। अर्थात् पहले मनोरूपी अन्तरिक्षसे ही विचाररूपी हनुमानजी चलते हैं परन्तु जब शान्तिरूपी सीताजीका पता लग जाता है और उसकी प्राप्तिके लिये आत्मारामरूपी रामजीका जाना होता है तब साधनरूपी पक्की सेतु बाँधकर उससे ही जाते हैं, क्योंकि उक्त लक्षणवाले विचाररूपी हनुमानजीसे शान्ति सीताजीका लगानेसे ही, आत्मारामरूपी रामजीका कार्य पूरा नहीं हो जाता, अर्थात् केवल इस सिद्धान्तके ज्ञान (Theorical knowledge ) से ही, कि, 'शान्तरूपी सीताजीका आभास भी अशोकवन में रहा करता है' काम पूरा नहीं हो जाता।आत्मारामरूपी रामजीको स्वयं धाकर, पक्की साधनरूपी सेतुसे अज्ञानरूपी समुद्र पारकर काम-क्रोधादि परिवार समेत अहंकाररूपी रावण का वध करके, शान्तिरूपी सीताको प्राप्त करना पड़ता है।
श्रीरामायण की कथा में इसी प्रकारसे अन्यान्य सब पदार्थों के भी आध्यात्मिक तस्वरूपी अर्थ होते हैं ( जैसे श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, श्रीमन्महाभारत आदिमें धृतराष्ट्र, सञ्जय, द्रोण, भीष्म, कृप, पाण्डु, कुन्ती, माद्री, कर्ण, युधिष्टिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रुपद, द्रौपदी, घृष्टद्युम्न, शिखण्डी, श्रीकृष्ण, देवकी, वसुदेव, सुभद्रा, अभिमन्यु, अश्वत्थामा, जयद्रथ, मथुरा, गोकुल, वृन्दावन, द्वारका, विराट्, हरिद्वार, हृषिकेश, शङ्ख, चक्र आदि सब पदार्थों के सुन्दर-सुन्दर आध्यात्मिक तत्वरूपी अर्थं होते हैं ) । परन्तु विस्तार भयसे उन सबका उल्लेख नहीं किया जाता। यहाँ जो बातें ऊपर बतायी हैं, ये तो केवल स्थालीपुलाकन्यायसे दिग्दर्शनमात्रके लिये हैं।
इसप्रकार सिद्ध हो गया कि आचार, व्यवहार, शूरता, प्रजापालन, कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड, ज्ञानकाण्ड, आध्यात्मिक तत्वादि सभी दृष्टियोंसे श्रीरामचन्द्रजीकी कथा हमलोगोंके लिये स्मरण-नामोच्चारणादिजन्य अनन्त पुण्य देनेके अतिरिक्त, अवश्य ही शिक्षणीय और बड़े-बड़े गहन से गहन लौकिक, व्यावहारिक और पारमार्थिक तथा आध्यात्मिक तत्वोंसे भरी हुई है।
अब प्रश्न यह है कि ऐसे श्रीरामायण और श्रीरामचन्द्रजीके साथ हमलोगोंका क्या सम्बन्ध होना चाहिये ।
श्रीमद्रामायण के साथ हमारा श्रद्धा भक्ति और नम्रता से शिक्षा लेनेवालोंका ही सम्बन्ध होना चाहिये और भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के साथ तो यही सम्बन्ध होना चाहिये कि हम अपने हृदयको बिल्कुल खाली और शुद्ध करके, भगवान् को हृदय-सिंहासनपर बिठाकर श्रद्धा, भक्ति, प्रेम और आत्मसमर्पणके भावसे उनकी सेवा करनेवाले बन जायें।
इस सम्बन्ध में भगवती श्रीराधाजीका एक महान् उपाख्यान सर्वदा स्मरणीय है। यद्यपि श्रीराधाजी भगवानकी खूब प्रेमसे सेवा करती थीं तथापि अपने अहंकार में एक दिन भगवान् की मुरलीसे पूछती हैं कि 'हे मुरली, तुमने जन्मान्तरोंमें ऐसा क्या बड़ा पुण्य किया था जिससे इस जन्म में अचेतन वंशी रूप में आकर श्रद्धा, भक्ति, प्रेम यादि न करती हुई भी, नित्य भगवान् के अधरामृत पीनेका सौभाग्य प्राप्त करती हौ ।' सुरली जवाब देती है कि 'राधाजी ! मुझे तो पता ही नहीं कि जन्मान्तरमें मैं क्या थी, और क्या करती थी। हाँ इसी जन्मकी एक खास बात मेरे ध्यान में है वह यह कि मेरे अन्दर तो कुछ है ही नहीं, भगवान् मुझको अपने मुखमें लगाकर अपनी मरजीके अनुसार जो स्वर या राग- रागिणी देते हैं वही मेरा स्वर, राग और मेरी रागिणी है, मेरी कोई भी स्वतन्त्र इच्छा या खयाल नहीं है ।
सम्भव है कि भगवान् इसी कारण से मुझपर प्रसन्न हों।' मुरलीके इन मार्मिक वचनोंसे श्रीराधाजी समझ जाती हैं और मुरलीकी भाँति अपने हृदयको बिल्कुल खाली तथा शुद्ध बनाकर उसके भीतर सिंहासनपर भगवान्को विराजित कर देती हैं। उसीका यह परिणाम है कि आजतक भी दुनियाँ में भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजीके नाम के साथ श्रीराधाजीका नाम इतने स्थायीरूपसे जुड़ा हुआ है जितना किसी भी अन्य (गोपी या रानी) का नहीं जुड़ा।
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यह तो हुआ भगवान् के लिये अपने हृदयको खाली और शुद्ध बनाकर सिंहासन बनानेका फल । अब और एक दृष्टान्तसे ( जिसमें शब्दश्लेपसे चमत्कार है ) पता लगाया जा सकता है कि भगवान् के लिये ऐसा (श्रद्धा, प्रेम, दासता और भक्ति, रखने पर क्या फल मिलता है ? जब नलके हाथसे फेंके हुए पत्थर आदिसे समुद्र पर सेतुके बन सकनेकी आशा होने लगती है और भगवान्को यह खबर मिलती है, तब भगवान् स्वयं जाकर उस अद्भुत दृश्यको देख नलसे पूछते हैं कि 'हे नल ! तुमको यह महिमा कहाँसे मिली ?' वह कहता है कि 'भगवन्, आपहीके नामोच्चारण के प्रतापसे यह काम हो रहा है तब भगवान्ने
*श्रीरामायण-तत्त्व-रहस्य भाग ७*
गोवर्धनपीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य स्वामीजी श्री १०८ श्रीभारती कृष्णतीर्थजी महाराज
गतांक से -
इसके सिवा श्रीमद्रामायण में यह भी बतलाया जाता है कि जिस सीताजीको रावण ले गया था वह तो छाया सीता ही थी । असली सीताजी तो श्रीरामजीकी अग्निमें छिप गयी थी। इसका आध्यात्मिक तातपर्य यह है कि जिस शान्तिको अहंकाररूपी रावण ले जाकर नश्वर आनन्दरूपी लंका में रखकर देखता है, वह तो शान्तिकी छाया या आभासमात्र है। असली शान्ति तो आत्मारामरूपी श्रीराम की ज्ञानरूपी अग्निमें ही छिपी रहती है। अहंकाररूपी रावणको वह जरासी भी नहीं मिल सकती। उठाकर ले गयी हुई उस छाया-सीताको भी जब लंका (अर्थात् नश्वर आनन्दवृत्ति) में विचाररूपी हनुमानजी देखते हैं तो वह छाया-सीता (अर्थात् शांतिकी छाया या आभास) भी बाहरकी वस्तुओंमें न होकर लंका में भी (अर्थात् नश्वर आनन्द में भी) अशोकवनमें अर्थात् भीतरके मूलस्वरूपरूपी सच्चिदानन्दके वन या भण्डारमें ही दिखायी पड़ती है।
भगवती श्रुति भी कहती है-
तस्यैव मात्रामुपजीवन्ति ।
इसप्रकार विचाररूपी हनुमानजीने शान्त्याभासरूपी छाया-सीता के रहने के स्थानका पता लगाकर आत्मा रामरूपी श्रीरामको बतलाया । अतएव हनुमानजीका यह प्रसिद्ध स्तोत्र आध्यात्मिक दृष्टिसे भी ठीक है कि-
अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।
कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लंकाभयङ्करम् ॥
अञ्जना = बुद्धि (अनक्ति, अज्यते चेति कर्तरि कर्मणि च युद्) । बुद्धिका पुत्र तथा बुद्धिको आनन्द देनेवाला तो विचार ही होता है। जो काम अविचारसे किये जाते हैं, उनसे बुद्धिको उस समय कितना भी आनन्द हो, परन्तु पीछे तो भयङ्कर पश्चात्तापका दुःख ही भोगना पड़ता है।
वीरं = अर्थात् (वि + ईर) प्रेरक विचारसे ही यथार्थ हितके लिये प्रेरणा होती है। विचार ही वास्तव में वीर होता है। अविचारसे यद्यपि तात्कालिक विकाररूपी वीरता होती है पर अन्ततक रहनेवाली यथार्थ वीरता नहीं होती। जानकी अर्थात् (जायते इति जनः, जनश्चासौ कश्च अर्थात् आनन्दध जनकः) जन्य आनन्दसे उत्पन्न होनेवाली बुद्धि वृत्ति जन्य आनन्दसे उत्पन्न हुई वृत्तिमें जो दुःख होता रहता है, उसका भी विचारसे ही नाश हो सकता है ।
कपीश अर्थात्- (कं आनन्दं पिबन्तीति कपयः, अर्थात् दश इन्द्रियाणि मनश्च, तेषां ईश:) इन्द्रियोंको तथा मनको अपने वश में रखनेवाला। यदि इनको वशमें न रक्खा जाय, तो विचार हो ही नहीं सकता, फिर तो विकारोंका ही राज्य हो जाता है। अथवा (कपिः आनन्दपायी तत्त्वतः परमेश्वरः स एवं ईशो नियन्ता यस्य सः) केवल परमात्माका शासन माननेवाला विचार चाहिये, और किसी पदार्थ के दबाव में छा जाय तो भी यथार्थ विचार नहीं हुआ।
अक्ष शब्दका एक अर्थ तो इन्द्रिय है। अतः अहंता शब्दका अर्थ कपीश शब्दके पहले बताये हुए अर्थमें ही आ गया है। ‘अक्ष' शब्द का दूसरा अर्थ (द्यूत-क्रीड़ामें साधनरूपी अक्षोंसे लक्षणा करके ) होता है संशयात्मक । अतः अज्ञहन्ता याने संशय ( और उसके साथ उपलक्षण विधया विकल्प और विपरीत भावना ) का नाशक विचार तबतक पक्का नहीं हो सकता, जबतक संशयादिका मूलसे ही निर्मूल न हो जाय, बल्कि श्रीमद्भगवद्गीता में तो श्रीभगवान्ने यहाँ तक कहा है कि-
'संशयात्मा विनश्यति'
इसीलिये विचाररूपी हनुमानजीको सबसे पहले अहंकाररूपी रावणके पुत्र संशय ( विकल्प और विपरीत भावना ) रूपी अक्षकुमारको मार डालना पड़ता है।
लङ्का यानी नश्वर आनन्दवाली चित्तवृत्ति । इसका तो विचारसे अवश्य ही नाश हो जाता है और शाश्वत ( स्वरूप भूत) सच्चिदानन्दवाली बुद्धिवृत्ति में पहुँचनेका यही साधन है। एतएव विचाररूपी हनुमान्जी नश्वर आनन्दवाली चित्तवृत्तिके भयङ्कर शत्रु होते हैं ।
अब स्पष्ट हो गया कि उपर्युक्त लक्षणवाले विचारसे (जिसका नाम हनुमानजी है) ही शान्तिका (जिसका नाम सीताजी है) पता लगाया जा सकता है। अन्य किसी साधन, उपाय या युक्तिसे नहीं। और उस विचार के लिये भी, जिससे शान्तिका पता लगाना हो, सर्वप्रथम रागद्वेषादि मनोमालिन्यसे रहित होना अर्थात् अज्ञानरूपी समुद्रसे पार होना पड़ता है, क्योंकि रागद्वेषादिके साथ किये हुए विचारसे शान्तिका पता नहीं लग सकता। इसलिये हनुमानजी को सबसे पहले समुद्र पार होना पड़ता है।
-
क्रमशः
साभार : कल्याण
संकलन : पं. हीरेनभाई त्रिवेदी,क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
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*पूज्यपाद श्रीउड़िया बाबा के उपदेश*
प्रश्न – 'असंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा । ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्' इस गीताके वचनमें जो असंग शस्त्र माना गया है वह क्या है और उसके पीछे जिस मार्गकी खोज करनेको कहा है वह क्या है ?
उत्तर –सदसद्विवेकवती बुद्धिसे आत्मा और अनात्माका विचार करना असंग शस्त्र है । जब अनात्मासे आत्माकी पूर्ण असंगताका अनुभव होने लगे तो उसे ही असंग शस्त्रद्वारा छेदन करना कहा जाता है। उसके पीछे साधकको यह प्रश्न होता है कि ईश्वर कहाँ है और कैसा है ? उसपर विचार करना ही 'उस मार्गकी' खोज करना है। उस समय गुरु महावाक्यका उपदेश करते हैं जिससे साधकको उस पदकी प्राप्ति होती है जहाँसे वह फिर इस संसारचक्रमें नहीं लौटता ।
प्रश्न – पूर्ण ज्ञाननिष्ठा कब समझनी चाहिये ?
उत्तर – जब सम्पूर्ण प्रपञ्च गन्धर्वनगरवत् अथवा आकाशकुसुमवत् मालूम होने लगे और कोई भी चमकीला विषय अपनी ओर आकर्षित न कर सके ।
प्रश्न – निस्सन्देह ज्ञान (श्रवण-मननजन्य ज्ञान) हो जानेपर असंगताके अभ्यासकी आवश्यकता क्यों है ?
उत्तर – परमार्थतत्त्वका ज्ञान हो जानेपर भी दीर्घकालीन अभ्यासके कारण चित्तमें बैठी हुई विषयोंकी प्रीति दूर नहीं होती — विषयोंका आकर्षण बना ही रहता है। उसे दूर करनेके लिये असंगताके अभ्यासकी आवश्यकता है, क्योंकि बिना अभ्यासके आत्मानन्दकी दृढ़ता नहीं होती और बिना आत्मानन्दकी दृढ़ताके विषयोंमें सुखबुद्धि बनी रहती है। अतः विषयोंसे उपराम होनेके लिये और आत्मानन्दकी प्राप्तिके लिये अभ्यास अवश्य करना चाहिये । अभ्याससे यह बात दृढ़ हो जायगी कि मैं चराचरका द्रष्टा हूँ और सम्पूर्ण दृश्य मरुभूमिका जल है ।
दृढ़ ज्ञान हो जानेपर जो भाव जागृतिमें रहता है वही स्वप्नमें भी रहता है। जो मनुष्य मांस नहीं खाता, वह स्वप्नमें भी मांस-भक्षण नहीं करता । सच्चा ब्रह्मचारी स्वप्नमें भी स्त्री - सेवन नहीं करता । परन्तु ऊपरसे ही ज्ञानकी बातें बनानेवालोंपर जब थोड़ी-सी भी आपत्ति आती है तो वे सब ज्ञान भूल जाते हैं। सच्चा ज्ञानी तभी समझना चाहिये जब सिरपर दुःखोंका पहाड़ टूट पड़नेपर भी निष्ठासे विचलित न हो ।
प्रश्न-
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
(गीता ३ । १७)
इस श्लोकमें आत्मरति, आत्मतृप्त और आत्मामें सन्तुष्ट इन तीन विशेषणोंका प्रयोग हुआ है। इनमें क्या अन्तर है ?
उत्तर – आत्मानन्दमें डूब जाना आत्मरति है। आत्मरति हो जानेपर भी विषयोंमें प्रेम हो सकता है; जैसे ध्रुव-प्रह्लादादिने भगवत्प्राप्तिके पीछे भी।राज्यभोग किया। इसलिये आत्मतृप्त विशेषणका प्रयोग किया गया है अर्थात् जिस समय आत्माके सिवा और किसी वस्तुकी इच्छा न रहे तभी समझना चाहिये कि साधकको कुछ कर्तव्य नहीं है। आत्मतृप्त ही आत्मामें सन्तुष्ट कहा जाता है ।
प्रश्न – आत्मक्रीडा और आत्ममिथुन क्या है ?
उत्तर – आत्मा- सम्बन्धी कथनोपकथनका नाम आत्मक्रीडा है तथा आत्मचिन्तनको आत्ममिथुन कहते हैं ।
प्रश्न – जगत्से असंगताका अनुभव हो जानेपर
यदि जगत्की सत्ता बनी भी रहे तो क्या हानि है ?
उत्तर – असंगताका निश्चय हो जानेपर भी यदि जगत्की सत्यता बनी रही तो उसमें आसक्ति हो जाना बहुत सम्भव है, क्योंकि बिना असत्यताके निश्चयके जगत्में रमणीय बुद्धि दूर नहीं होती। इसलिये उसकी असत्यताका बोध भी परमावश्यक है।
जय भगवान 💐
संकलन : पं. हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
*श्रीरामायण-तत्त्व-रहस्य भाग ६*
गोवर्धनपीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य स्वामीजी श्री १०८ श्रीभारती कृष्णतीर्थजी महाराज
गतांक से -
अब कर्म, उपासना और ज्ञानकाण्डकी सम्मिलित दृष्टिसे अर्थात् अत्यन्त उपयोगी आध्यात्मिक दृष्टिसे भी विचार करना चाहिये कि श्रीरामायणका बताया हुआ आध्यात्मिक तत्व कौन-सा है ? परम लक्ष्य क्या है ? और उसके साधन क्या क्या हैं? इस विषयपर भगवान् जगद्गुरु श्रीआदिशंकराचार्य महाराजजीने अपने 'आत्मबोध' नामक छोटे परन्तु अति सुन्दर वेदान्त-ग्रन्थमें इस एक ही लोकसे दिग्दर्शनमात्र करा दिया है। यथा-
तीर्त्वा मोहार्णवं हत्वा राग-द्वेषादि-राक्षसान्।
योगी शान्ति-समायुक्तः आत्मारामो विराजते॥
श्रीमद्भगवद्गीता -
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥
इन लक्षणों के अनुसार जो आत्माराम बना हो, वही आत्मरामरूपी श्रीराम अज्ञानरूपी समुद्रसे पार होकर कामक्रोधादिरूपी राक्षसोंका वध कर, शान्तिरूपी सीताजीके साथ विराजता है। इसके तात्पर्यका निम्नलिखित विवरण है-
सीतोपनिषद् में बतलाया गया है कि श्रीरामचन्द्रजीको धर्मपत्नीरूपी श्रीसीताजी सच्चिदानन्दकन्द परमात्मस्वरूपी भगवानकी चिद्रूपिणी महाशक्ति हैं। वह महाशक्ति आनन्दस्वरूपी भगवानके साथ रहनेवाली शान्तिस्वरूपिणी महासम्पत्ति होती है। इस शान्तिस्वरूपिणी सीताजीको यदि कामक्रोधादिरूपी राक्षसोंका अधिपतिरूपी अहंकार स्वरूपी रावण अपनाना चाहे और उठाकर ले भी जाय, तो भी शान्तिस्वरूपिणी श्रीसीताजीका तो आत्मारामरूपी श्रीरामजीके ही साथ रहना सम्भव है, अन्य किसीके साथ कदापि नहीं । अतः काम-क्रोधादि राक्षसोंके राजा अहंकाररूपी रावणके साथ मिलकर उसकी होकर रहना शान्तिरूपिणी सीताजीके लिये सर्वथा अशक्य और असम्भव है। इसीलिये शान्तिरूपिणी सीताजी रावणका घोर तिरस्कार ही किया करती हैं क्योंकि वह तो- 'रावणो लोकरावण: ' है, अर्थात् सारी दुनियाको लगातार दुःख. पर दुःख देता हुआ, उसे रुलाते ही रखनेवाला अहंकाररूपी
राक्षसेश्वर है जिसके साथ शान्ति कदापि ठहर नहीं सकती ।
अतएव श्रीमद्भागवत दशमस्कन्धके रासपञ्चाध्यायी में ऐसा एक प्रसंग आता है कि अपनेको भूलकर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी के साथ नाचती, खेलती और गाती हुई आनन्दमें निमग्न हुई श्रीकृष्ण के दिव्य दर्शन करनेवाली गोपियोंके मनमें जब अहंकार था गया, तब भगवान् एकदम अन्तर्धान हो गये। क्योंकि अहंकार और परमात्म-दर्शन एक साथ कभी नहीं हो सकते, परन्तु जब भगवान् के गुम हो जाने पर गोपियाँ बढ़े दुःखमें पड़कर उनकी खोजमें लगती हैं और १- तन्मनस्कास्तदात्मिका: उन्हींके सतत ध्यानसे पुनः अपनेको सर्वथा भूलकर तद्रूप बन जाती हैं, तब -
तासामाबिरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः ।
-भगवान् हँसते-हँसते फिर प्रत्यक्ष हो जाते हैं, क्योंकि अहंकार के छूट जानेपर परमात्माका दर्शन निर्विघ्नतासे हो सकता है ! इसीलिये श्रीमद्भागवतके दशमस्कन्धमें यह बात भी हुई कि परमात्म-रूपी भगवान् अवतीर्ण होनेके बाद अहंकार रूपी कंससे कभी मिलते ही नहीं और जब मिलते हैं तब उसे मार डालने के लिये ही मिलते हैं। अतएव शान्तिरूपिणी सीताजी अहंकाररूपी रावणले मिल ही नहीं सकती !
अब यह देखना है कि शान्तिरूपिणी सीताजी आत्मारामरूपी श्रीराम के साथ किसप्रकारसे मिलती हैं ? पहले तो श्रीहनुमानजीके द्वारा सीताजीका पता लगाया जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह हनुमान् कौन-से तत्व हैं ? हनुमानजी जिज्ञासा या विचाररूपी आध्यात्मिक तत्व हैं, विचार के द्वारा आत्मारामको यह पता लग सकता है। कि शान्ति कहाँ रहती है ? हनुमानजी (विचार) से ही पता लगता है कि सीताजी (शान्ति) को लंका में ( अर्थात् लीयते यस्मिन्कर्मणि तद्यथा भवति तथा लं, कः आनन्दः, आ वृत्तिः, अर्थात् नश्वर आनन्दकी वृत्तिमें) रावणने (अहंकारने) रख छोड़ा है। वहाँ (लंकामें) रक्खे जाने पर भी सीताजी ( शान्ति) किसी विपरीत स्थान में नहीं रक्खी जाती, वह केवल 'अशोक' वनमें (अर्थात् दुःखलेशरहित और सन्तत धाराप्रवाहरूपी स्वरूपभूत आनन्दमें ही) स्थित रहती है,
इसका कारण यह है कि जन्य अर्थात् विकाररूपी ('यज्जन्यं तदनित्यम्', इस न्यायसे) नश्वर आनन्दमें यथार्थं शान्ति कभी नहीं रह सकती, क्योंकि उसका तो वास्तविक स्थान अशोक (आनन्द) का वन ही है।
-
क्रमशः
साभार : कल्याण
संकलन : पं. हीरेनभाई त्रिवेदी,क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
*श्रीरामायण-तत्त्व-रहस्य भाग ५*
गोवर्धनपीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य स्वामीजी श्री १०८ श्रीभारती कृष्णतीर्थजी महाराज
गतांक से -
प्रजापालनके विषय में तो ये जगप्रसिद्ध बात है कि श्रीरामचन्द्रजीने प्रजाके मनमें शंकाकी सम्भावनासे भी उसे दुःख न होने देनेके ख्यालसे, उस भगवती श्रीसीतादेवीके वियोगकी परम असह्य दुःखवेदनाको सहा,.जो अपने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी और जिसके लिये अरण्य तथा लङ्का में भगवान्ने भयंकर कष्ट उठाये थे।
श्रीरामचन्द्रजीका शासन इतना धर्मपूर्ण था कि उनके राज्य में प्रजाको दुर्भिक्ष, अकालमृत्यु आदि आज कलकी दृष्टिसे तो अतिसाधारण दुःख भी कभी नहीं हो सकते थे ।
जब इस नियमके एकमात्र अपवादस्वरूप एक ब्राह्मण बालककी मृत्यु हुई और उसका पिता भगवान् के राजभवनके द्वारपर पहुँचकर खरी-खोटी सुनाने लगा कि राजाके अधर्मसे ही हमारे बालककी अकालमृत्यु हुई है इत्यादि, तब श्रीरामचन्द्रजीने उसको राजनिन्दा करनेवाला राजद्रोही 'समझकर न तो दण्ड दिया और न उसका कोई खण्डन या प्रतिवाद ही किया बल्कि अत्यन्त नम्रता के साथ यह स्वीकार किया कि 'यद्यपि हमने स्वयं ऐसा कोई पाप नहीं किया है, तो भी यदि हमने अपने राज्य में ऐसा कुछ कुकर्म होने दिया हो जिससे इस ब्राह्मणके बालककी यह अकालमृत्यु हुई है, तो यह अनर्थं भी हमारे ही दोषसे हुआ है, क्योंकि राजाकी हैसियतसे हमारा ही यह कर्तव्य है कि हम स्वयं सदाचारी रहते हुए राज्य में भी पापाचरण न होने दें। अतएव हम प्रत्येक दिशा में घूमकर पता लगायेंगे कि राज्य में कहाँ क्या पाप हुआ है जिसके कारण हमारे राज्य में एक बार भी अपवादरूपसे भी एक अकाल मृत्युका प्रसंग आया।'
तदनन्तर भगवान ने उस पापका पता लगाकर उसे दूर भी कर दिया, इस विषयपर विशेष विस्तारकी आवश्यकता नहीं, क्योंकि श्रीरामचन्द्रजीके समय के बाद त्रेता और द्वापर इन दोनों युगोंकी समाप्ति होकर तीसरे युगमें पाँच हजार एकतीस वर्षके बीत जानेपर भी, अब भी, जब-जब तथा जहाँ जहाँ आदर्श राज्यशासन तथा प्रजाके सुखका जिक्र करनेकी आवश्यकता होती है, तब-तब और तहाँ-तहाँ सारे भारतवर्ष में यही प्रथा है कि लम्बे-लम्बे वर्णन न करके, आदर्श यादि छोटे शब्दोंसे भी काम न लेकर, केवल 'रामराज्य' शब्दसे ही वक्ता अपने पूरे तात्पर्यको स्पष्ट कर देते हैं और श्रोता भी उसका अर्थ समझ लेते हैं।
आचार-व्यवहार, युद्धवीरता, धार्मिक शासन आदिके पश्चात् जब उपासना और ज्ञानकाण्डकी दृष्टि से देखते हैं, तो श्रीरामचन्द्रजीकी महिमा केवल पुराणोंसे ही सिद्ध नहीं है, (जिनपर आजकलके सुधारक अश्रद्धा के साथ कटाक्ष किया करते हैं ) सीतोपनिषद्, रामरहस्योपनिषद् रामतापिन्युपनिषद्, मुक्तिकोपनिषद् आदि वेदान्तकी खास- खास मूल श्रुतियोंसे भी प्रसिद्ध है।
उपासनाकाण्डकी दृष्टि से भी श्रीरामचन्द्रजीका माहात्म्य पुराणोंसे तथा उपर्युक्त उपनिपदोंसे यहाँ तक स्पष्ट है कि भगवान् श्रीशंकर भी स्वयं सर्वदा राम-नाम रहते हुए श्रीपार्वतीजीसे कहते हैं-
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥
- और मुक्तिपुरी श्रीकाशीक्षेत्र में श्रीविश्वनाथरूपसे अधिष्ठाता होकर, वहाँ मरनेवालोंके दक्षिण कर्ण में अपने श्रीमुखसे ही रामतारक-मन्त्रोपदेश देकर उनको मुक्ति देते हैं इत्यादि । ये सभी बातें इतनी प्रख्यात हैं कि इनका केवल उल्लेख ही पर्याप्त है, वर्णनकी आवश्यकता नहीं।
-
क्रमशः
साभार : कल्याण
संकलन : पं. हीरेनभाई त्रिवेदी,क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
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*श्रीरामायण-तत्त्व-रहस्य भाग ४*
गोवर्धनपीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य स्वामीजी श्री १०८ श्रीभारती कृष्णतीर्थजी महाराज
गतांक से -
इसी प्रकारसे नर होकर नारायण बननेके लिये, अर्थात् रोना छोड़कर गाते रहने के लिये, नारायणको ही अपने शरीरादि रूपी रथका सारथि बनाकर, श्रद्धा, भक्ति और प्रेम के बलसे निर्भय तथा निश्चिन्त होकर, उसीके हाथमें अपने रथकी लगाम सौंपकर, उसीकी आज्ञानुसार अपने वर्णाश्रमादि अधिकारसिद्ध कर्तव्यों को निःस्पृहता और केवल कर्तव्य बुद्धि से पूरा करके, भक्तियुक्त कर्मयोगसे अन्तःकरणको शुद्धि के द्वारा ज्ञान और मोक्ष प्राप्त करनेमें विजयी होना होगा।
श्रीमद्भागवत में श्रीभगवान् श्रीकृष्णचन्द्रादि रूपसे इसी तत्वको अपने इतिहास तथा जीवनचरित्रसे दिखाया है कि नारायण का यही लक्षण है जो ऊपर बताया गया है।
श्रीमद्रामायण में श्री भगवान् ने श्रीरामचन्द्र रूप से पधारकर प्रत्येक व्यवहार में अपनी आदर्शभूत जीवन प्रणाली से मनुष्यजातिको यह दिखलाया है कि मनुष्यमात्रको किसप्रकार संसारके अनेक प्रकारके दुःखोंका सामना करते हुए धर्मका पालन करना है। कर्म, भक्ति और ज्ञान इन तीनों काण्डोंकी दृष्टिले भी भगवान् श्रीरामचन्द्रका इतिहास हमलोगोंके लिये अत्यन्त श्रावश्यक और उपयुक्त शिक्षा देता है।
अनेक प्रकारके सम्बन्धियों के साथ व्यवहार में यथोचित सदाचरण की दृष्टि से देखें तो भगवान् श्रीरामचन्द्रने अपने गुरुजन, माता, विमाता, पिता, भ्रातृगण, सहायक, सेवक, सर्वसाधारण प्रजा यादि सभी सम्बन्धियोंके साथ यहाँ तक कि शत्रुओं के साथ भी ऐसा सुन्दर आदर्श व्यवहार किया है जो बात-बातमें हम लोगोंके लिये अत्युत्तम रीतिसे शिक्षाप्रद है और जिसके विशेष विस्तारपूर्वक वर्णनकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि श्रीरामचन्द्र सम्बन्धी ये सभी बातें जगतप्रसिद्ध हैं।
परन्तु इस प्रसंग में इस बात के लिये विशेष रूपसे ध्यान देना होगा कि भगवान् की दया तथा प्रेमके पात्र बनने के लिये प्रेम तथा भक्ति के अतिरिक्त और अन्य किसी भी प्रयोजक लक्षणकी आवश्यकता नहीं है। इस विषयमें श्रीरामचन्द्रजीके माता, पिता, गुरु आदि खास सम्बन्धियोंके अतिरिक्त, अनागरिक अरण्यवासी गुह, पशुरूप में आये हुए महावीरादि वानरगण और राक्षस जात्यन्तर्गत विभीषण आदिका स्मरण कराना पर्याप्त है। विस्तृत वर्णनकी कोई आवश्यकता नहीं ।
कर्मकाण्डके अन्तर्गत क्षत्रिय धर्मकी खास दृष्टि से देखा जाय तो उसमें अपने सुख-दुःखादिकी परवा न करते हुए, केवल धर्म-बुद्धिसे तथा विना ही द्वेष शत्रुनिबर्हण करना और प्रजापालन करना ही मुख्य है। भगवान् श्रीरामचन्द्रजी इन दोनों अंशों में भी अनुपम ही थे।
शत्रुनिबर्हण में भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अपनी बाल्यावस्था में किये हुए ताडकासंहारसे लेकर अन्त में रावणादिके संहारतक द्वेषरहित हो केवल धर्मबुद्धि और सत्यप्रतिज्ञा के साथ अद्वितीय शूरता और पराक्रमसे युद्ध करनेवाले ही थे।इस बातका पता इसीसे लगता है कि जब श्रीलक्ष्मणजी इन्द्रजितको किसी प्रकार किसी भी अस्त्र-शस्त्र दिसे परास्त न कर सके तब उन्होंने ऐन्द्रास्त्र हाथमें लेकर कहा कि-
धर्मात्मा सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यदि ।
समरे चाप्रतिद्वन्द्वः शरैनं जहि रावणिम् ||
'यदि दशरथनन्दन श्रीराम धर्मात्मा, सत्यसन्ध और रण में प्रतिद्वन्द्वी न रखनेवाले हों तो यह बाण इन्द्रजितका वध करे। इसप्रकार श्रीरामचन्द्रजी की धर्मात्मता, सत्यप्रतिज्ञता और अद्वितीय युद्धवीरता पर मन्त्ररूपी शपथ करके छोड़े हुए एक ही बाणसे उसी शपथके बलसे उन्होंने इन्द्रजितको मार डाला था। भगवान् पूर्णांवतार श्रीकृष्णचन्द्रजीने भी श्रीभगवद्गीता के दशमाध्याय में अपनी विभूतियोंके वर्णन के प्रसंग में 'रामः शस्त्रभृतामहम्' कहकर स्पष्ट किया है कि शस्त्रधारियों अर्थात् युद्धवीरोंमें श्रीरामचन्द्रजी सर्वोत्तम थे।
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क्रमशः
साभार : कल्याण
संकलन : पं. हीरेनभाई त्रिवेदी,क्षेत्रज्ञ
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*श्रीरामायण-तत्त्व-रहस्य भाग ३*
गोवर्धनपीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य स्वामीजी श्री १०८ श्रीभारती कृष्णतीर्थजी महाराज
गतांक से -
इसी परमावश्यक कार्यमें हम लोगोंको सहायता देने के लिये, सर्वज्ञ महर्षियोंने अपनी विशाल तपस्या के बलसे अनुभव किये हुए बड़े-बड़े तत्त्वोंको हमारे सामने, अधिकार-भेद के अनुसार, अनेक तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके शस्त्र प्रन्थोंके रूप में रखकर, महान् उपकार तथा अनुग्रह किया है। इन ग्रन्थों में श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, श्रीमद्रामायण आदि अनेक ग्रन्थरत्न जगद्विख्यात हैं जो अत्युत्तम ज्ञानी से लेकर अति पामर और अधमाधम मनुष्य तक सब प्रकार के अधिकारियोंके अपनी-अपनी योग्यता और अधिकार के अनुसार, कर्म, भक्ति और ज्ञान इन तीनों मार्गोंपर कुछ-न-कुछ प्रकाश डालकर इहलोक तथा परलोकमें परम कल्याणकी प्राप्तिमें अत्यन्त सहायता देने वाले हैं।
उपर्युक्त उद्देश्यकी पूर्ति के लिये ही श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान्ने उपदेश दिया है। गीता के प्रथमाध्याय में अर्जुनरूपी नरके विषादयुक्त रुदनसे तथा उस अध्यायके 'अर्जुन-विषाद-योग' नामसे यह स्पष्ट है कि सहस्रों प्रकारके झंझटोंमें पड़े हुए आगे पीछेकी परस्पर विरुद्ध बातोंका समन्वय न कर सकने के कारण दुखी होकर रोते रहना ही नरका लक्षण है। भगवान् श्रीकृष्णरूपी नारायण के समस्त उपदेशसे तथा 'श्रीमद्भगवद्गीता' शब्दसे भी यह स्पष्ट है कि सुख-दुःख, लाभालाभ तथा जय-पराजयकी चिन्ता छोड़कर निष्काम भावसे अपने कर्तव्यको केवल कर्त्तव्य बुद्धिसे ही करते हुए, नाचते- खेलते-गाते रहना, अर्थात् सभी अवस्था और क्रियाओंमें सच्ची शान्ति और आनन्दमें निमग्न रहना ही नारायणका लक्षण है, अतएव यदि किसी मनुष्यको सब दुःखों तथा बन्धनोंसे मुक्त होकर अपने लक्ष्यरूपी नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सच्चिदानन्दघनस्वरूपी परमात्मरूप परमार्थं स्वरूप में पहुँचना हो, अर्थात् यदि किसी नरको नारायण बनना हो, तो उसे भी, अर्जुनरूपी नरकी तरह श्रीकृष्णरूपी नारायण को ही अपने रथका सारथि बनाकर उससे यह कहना चाहिये कि ---
‘यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥ '
'मैं आपका शिष्य हूँ, आपके शरण हूँ, मेरे लिये जो कुछ निश्चित श्रेय हो वही बतलाइये.' तदनन्तर नारायण से न केवल अपने लिये बल्कि भगवच्छरणागत भक्तमात्र के लिये यह अद्वितीय अभय दान प्राप्त करना योग्य है, कि 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहंत्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
'कौन्तेय ! प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ।
‘अनन्याचिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥'
'समस्त कर्मोके आश्रयको त्याग केवल एक सच्चिदानन्दघन वासुदेवकी शरण हो जा। 'मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक न कर।' 'हे कौन्तेय ! यह निश्चयकर कि मेरे भक्तका नाश नहीं होता।' 'जो अनन्य भक्त मुझे चिन्तन करते हुए ; मेरी उपासना करते हैं उन नित्य मुझमें लगे हुए पुरुषोंका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।'
इसप्रकार उसीके उपदेशामृतका श्रवण करके अन्त में उसके-
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय।
- इस प्रश्नको सुनकर दृढ़ निश्चय के साथ उसको यह जवाब देते हुए कि
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥
'हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया, मुझे स्मृति प्राप्त हो गयी, मैं सन्देहरहित होकर स्थित हैं, अब आपकी ही आज्ञाका पालन करूँगा।' श्रद्धा-भक्ति-प्रेमके बलसे निर्भय तथा निश्चिन्त होकर, उसीके हाथ में अपने रथकी लगाम छोड़कर, उसीकी आज्ञानुसार अपने वर्णाश्रमादि अधिकारसिद्ध कर्तव्य कर्मको पूरा करके, इस नियमके अनुसार कि-
-
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥
भक्तिसमेत कर्मयोगसे अन्तःकरणकी शुद्धि के द्वारा संशय, विकल्प, विपरीतभावनारूपी दोषत्रयरहित और अखण्ड विज्ञानको पाकर मोक्षकी प्राप्ति करने में विजय
प्राप्त की जा सकती है, क्योंकि-
-
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
- जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण रूपी नारायणको अपने सारथिरूपसे धागे करके धनुर्धारी पार्थरूपी नर पीछे रहकर युद्ध करता हो, वहाँ लक्ष्मी, जय, विभूति और नीति अवश्य ही रहेंगी। यही गीतोक्त उपदेशका सारांश है।
-
क्रमशः
साभार : कल्याण
संकलन : पं. हीरेनभाई त्रिवेदी,क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
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*श्रीरामायण-तत्त्व-रहस्य भाग २*
गोवर्धनपीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य स्वामीजी श्री १०८ श्रीभारती कृष्णतीर्थजी महाराज
गतांक से -
अतः इस विषयपर गहरा विचार करनेपर यही निष्कर्ष निकलेगा कि मनुष्य में दो बातें विशेष हैं। जिनमें एक है उसकी सुख-दुःख सम्बन्धी दृष्टि, जिससे वह पशु-पक्षी श्रादिकी अपेक्षा अधिकतर दूरदृष्टि से सब विचार करता है, केवल तात्कालिक दृष्टिसे ही नहीं ! कठोपनिषद् में भगवती श्रुतिने जो 'श्रेय-प्रेय' का विभाग किया है और गीता में भगवान् श्रीकृष्णने –
'यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्'
'यत्तदग्रेऽमृतोपमम्' 'परिणामे विषमिव'
-सुखका विभाग किया है, इसीसे मनुष्यजाति श्रेष्ठ है। अतएव यह भी कहना होगा कि जो मनुष्य जितने अंशमें दूरदृष्टि से विचार करनेवाला है, उतने ही अंशमें उसका मनुष्यत्व सफल हो रहा है और जो मनुष्य जितने अंश में दूरदृष्टिको छोड़कर तात्कालिक दृष्टिमें फँसकर काम करता है, वह उतने ही अंश में अपने मनुष्यत्वको व्यर्थ कर, इस समय पशुकी श्रेणी में योग्यतासे प्रविष्ट होकर, अगले जन्ममें शरीरसे भी प्रविष्ट होनेकी तैयारी कर रहा है। कारण, कर्मका यही नियम है कि मनुष्य इस जन्ममें अपनी चित्तवृत्ति, गुण, कर्म आदिसे जिस योनि के लक्षणों में प्रविष्ट होता है, उसका अगला जन्म अवश्य उसी योनिमें होता है।एतएव सुख-दुःखका निश्चय दूरदृष्टि से हो, केवल तात्कालिक दृष्टिसे नहीं। यह मनुष्य योनिमें विशेषताका पहला अंश है।
मनुष्य योनिमें दूसरा विशेषताका अंश यह है कि उसको एक ऐसा अपूर्व साधन प्राप्त है जो अन्य किसी भी योनिमें नहीं मिलता। और सब योनियों में (जिनमें देव-योनियोंकी भी गणना है) जो शरीररूप साधन मिलता है, वह-
शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते'
-इन भगवद्-वचनोंके अनुसार क्षेत्र तो अवश्य है, परन्तु है केवल भोगक्षेत्र, जिसमें पिछले जन्मोंमें किये हुए पुण्य-पापके फलरूपी सुख-दुःख भोगे जा सकते हैं। इसके सिवा अन्य कोई काम न तो होता है और न हो ही सकता है। परन्तु मनुष्योंके शरीर भोगक्षेत्र होनेके साथ ही कर्मक्षेत्र भी हैं, जिनसे मनुष्य अपने भावी कल्याण के लिये आवश्यक कर्म, भक्ति और ज्ञानमार्गोंके द्वारा लाभ उठाकर स्वयं ही अपने भविष्यके विधाता बन सकते हैं।इसीलिये श्रीमद्भागवतके पञ्चम स्कन्ध में मनुष्य जातिको देवयोनिसे भी बढ़कर श्रेष्ठ तथा धन्य बतलाया है। इस विवेचनसे यह स्पष्ट हो गया कि मनुष्य शरीर कर्मक्षेत्र भी है।
यह तो सबपर विदित ही है कि मृत्यु कब आनेवाली है इस बातका कोई निश्चय नहीं, क्योंकि वह Notice ( पूर्वसूचना ) देनेके लिये किसी नियमसे आबद्ध नहीं है।फिर यह भी पता नहीं चलता कि हमें अगले जन्म में कर्मक्षेत्ररूपी मनुष्य शरीर मिलनेवाला है या केवल भोगक्षेत्ररूपी पशु शरीर साथ ही यह भी अविदित है कि पशु-शरीरके बाद फिर कर्मक्षेत्ररूपी मनुष्य शरीर कब मिलेगा। इस दशामें यह स्वयमेव ही स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य योनिमें आये हुए हमलोगोंको अपना मनुष्य जन्म सफल करते हुए अपने परम लक्ष्य में पहुँचने के लिये, अभीसे एकाग्रता के साथ लक्ष्य की ओर अनन्य भावसे दृष्टि लगाकर, साधनों में संलग्न हो, जहाँतक हो सके, इसी जन्ममें अपने यथार्थ उद्देश्यको पूरा कर लेना चाहिये, नहीं तो कोई नहीं कह सकता कि इस कामके लिये हमें फिर कब अवसर मिलेगा। अतएव हम लोगोंको अत्यन्त जागरुकता तथा अप्रमत्तता के साथ विचारपूर्वक, यह पता लगाकर कि 'हमारा लक्ष्य क्या है और उसकी प्राप्ति के लिये कौन-कौन से साधन हैं, उन साधनोंमें प्रवृत्त हो, अपने लक्ष्य तक पहुँच जाना चाहिये ।
लक्ष्य और साधन, ये दोनों ही भगवती उपनिषद् रुपिणी श्रुतिके इस मन्त्र से स्पष्ट हैं-
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥
अर्थात्, आत्म (जीवात्म) रूपी वाणको प्रणवरूपी धनुषपर चढ़ाकर, ब्रह्म ( परमात्म) रूपी लक्ष्य में पहुँचाना है। अप्रमत्त होकर वेधन करना चाहिये, जिससे कि जैसे वाण लक्ष्यसे तनिक भी इधर-उधर न जाकर, लक्ष्यके भीतर प्रविष्ट हो उसके साथ एक हो जाता है, वैसे ही जीवात्म रूपी वाण परमात्मरूपी लक्ष्यसे तनिक भी इधर-उधर न रहकर, उसीमें घुसकर, उसके साथ एक हो जाय।
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क्रमशः
साभार : कल्याण
संकलन : पं. हीरेनभाई त्रिवेदी,क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
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*श्रीरामायण-तत्त्व-रहस्य भाग १*
गोवर्धनपीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य स्वामीजी श्री १०८ श्रीभारती कृष्णतीर्थजी महाराज
*सभी सनातन धर्मावलंबियों को श्रीरामनवमी की हार्दिक बधाइयां।*💐
शंकाकुठारायितवीक्षणाभ्यां शंकारकत्व प्रदपूजनाभ्याम्।
लंकाविपारा तिरतिप्रदाभ्यां नमोनमः श्री गुरुपादुकाभ्याम्॥
पवनजर विसुत पद्मप्र भवज मुखविनुतांघ्रिम्।
त्रिभुवनजनत ति पालं दिन मणिकुलमणिमीडे॥
आखिल संसारके केवल समस्त मनुष्योंके ही नहीं, सभी जीवोंके मनमें स्वाभाविक यही एक इच्छा सवंदा हुआ करती है कि हमें किसी भी समय, किसी भी स्थान में, किसी भी अवस्था में किसी भी कारण से, किसी प्रकारका भी तनिक-सा भी दुःख न हो। सब समय, सभी स्थानोंमें और सभी अवस्थाओं में केवल सब प्रकारसे सुख ही हो। इसी स्वाभाविक इच्छासे प्रेरित होकर समस्त जीव अपनी-अपनी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक, दैशिक, सामयिक आदि योग्यता तथा अनुकूलता के अनुसार अनेक प्रकार के प्रयत्नों में प्रवृत्त रहते हैं।
सुखकी इच्छा के साथ ही दुःख दूर करने की इच्छा अर्थात् केवल शुद्ध सुखकी चाह होना स्वाभाविक ही है। कारण,मनुष्यादि सभी जीवोंके मतका तो यही स्वभाव है कि थोड़ेसे भी दुःखके प्राप्त होनेपर वह अपने अनुभव में आये हुए और आते रहनेवाले अनेकानेक और बड़े-बड़े सुखोंका लेशमात्र भी अनुभव न कर, उसी एक छोटे दुःखका अनुभव करता है और दुखी होकर एकमात्र उसी दुःख निवृत्ति की चिन्ता में पड़ जाता है।
मनका यह अनुभव और वृत्ति युक्तियुक्त भी है। कारण, दुःख इतनी बुरी वस्तु है कि जैसे एक लोटेमें भरकर रक्खे हुए दूध या जलमें एक दो बूँद विष डाल देने पर वह सबका सब दूध या जल विष ही बन जाता है, उसमें बहुत से दूध या जलका जरा-सा भी प्रभाव नहीं रहता, वैसे ही अनेक तथा अनेक प्रकारके बड़े-बड़े सुखोंमें जब थोड़ा-सा भी दुःख मिल जाता है तो वे सारे सुख दुःखमय ही बन जाते हैं, फिर उन बड़े बड़े सुखोंका तनिक-सा भी प्रभाव नहीं रह जाता । इसीलिये यह अनुभवकी बात हुआ करती है कि जबतक वह दुःख दूर नहीं होता तबतक मनमें शान्ति नहीं रह सकती और भगवद्गीता में आनन्दकन्द परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के श्रीमुख से निकले हुए ‘अशान्तस्य कुतः सुखम्’ इस वाक्यानुसार जहाँ अशान्ति है, वहाँ सुख कभी नहीं हो सकता।
इस विषयपर विचार करना चाहिये कि हमलोग मनुष्ययोनिमें आकर अपनी मनुष्य जातिको पशु, पक्षी आदि सबसे श्रेष्ठक्यों मानते हैं? जब सभी जीव मनुष्य, पशु, पक्षी, कृमि और कीट-समानरूपसे ही दुःख दूर करना और सुख प्राप्त करना चाहते रहते हैं, अर्थात् जब सबका ध्येय तथा लक्ष्य एक ही प्रतीत होता है, तब उन सब जातियोंकी अपेक्षा मनुष्य जाति किस अंशमें श्रेष्ठ है, जिसके आधारपर मनुष्य अपनेको सर्वश्रेष्ठ माना करता है। यह केवल अज्ञानी मनुष्योंका ही अभिमानजनित कथन नहीं है कि मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ है, जगद्गुरु श्रीश्रादि शंकराचार्य भगवान्ने भी अपने विवेकचूडामणि ग्रन्थ में मङ्गल श्लोकके पश्चात् प्रथम श्लोकमें ही ‘जन्तूनां नरजन्म दुर्लभं' इत्यादिसे सर्वप्रथम यही विषय बतलाया है और श्रीमद्भागवत के पञ्चम स्कंध में तो मनुष्ययोनिको देवयोनिकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ बतलाया गया है। पर हमलोगोंको इतनेसे ही सन्तुष्ट न होकर कि हमारी मनुष्यजाति सर्वश्रेष्ठ है, यह विचार भी करना चाहिये कि वह क्यों श्रेष्ठ है और हमें उस श्रेष्ठताको किसप्रकारसे सफल करना होगा ?
इस विचारमें उतरनेपर यह तो स्पष्ट है कि शारीरिक बल आदि बाह्य अंशोंमें मनुष्य अपनी श्रेष्ठताका दावा नहीं कर सकता, क्योंकि इन अंशों में तो उससे श्रेष्ठ बहुत-सी योनियाँ पशु पक्षी आदि में भी पायी जाती हैं। कदाचित् मनुष्य यह समझें कि हम सुख दुःखके सम्बन्धर्मे, अन्य जीवोंके सदृश विचार करते हुए भी बन्धनकी निवृत्ति या मोक्ष चाहने में विशेषता रखते हैं ( जैसे आजकल बहुतसे लोग यह दावा करते हैं कि परराज्यकी निवृत्ति या स्वराज्यका खयाल करना पाश्चात्योंकी विशेषता है इत्यादि ) तो यह भी बड़ी भूल ही है, क्योंकि मुमुक्षा तो जन्तुमात्रकी स्वाभाविक इच्छा है। मनुष्य जब एक छोटेसे चूहेको पकड़ना चाहता है तब वह भी उसके हाथसे बचकर भागने लगता है, यह मुमुक्षाका ही तो उदाहरण है जो केवल पाश्चात्योंका नहीं, केवल मनुष्योंका भी नहीं, प्रत्युत जीवमात्रका स्वाभाविक जन्मसिद्ध लक्षण है।
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क्रमशः
साभार : कल्याण
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श्रीवैदिकब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
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*श्रीरामायण-तत्त्व-रहस्य भाग १*
गोवर्धनपीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य स्वामीजी श्री १०८ श्रीभारती कृष्णतीर्थजी महाराज
*सभी सनातन धर्मावलंबियों को श्रीरामनवमी की हार्दिक बधाइयां।*💐
शंकाकुठारायितवीक्षणाभ्यां शंकारकत्व प्रदपूजनाभ्याम्।
लंकाविपारा तिरतिप्रदाभ्यां नमोनमः श्री गुरुपादुकाभ्याम्॥
पवनजर विसुत पद्मप्र भवज मुखविनुतांघ्रिम्।
त्रिभुवनजनत ति पालं दिन मणिकुलमणिमीडे॥
आखिल संसारके केवल समस्त मनुष्योंके ही नहीं, सभी जीवोंके मनमें स्वाभाविक यही एक इच्छा सवंदा हुआ करती है कि हमें किसी भी समय, किसी भी स्थान में, किसी भी अवस्था में किसी भी कारण से, किसी प्रकारका भी तनिक-सा भी दुःख न हो। सब समय, सभी स्थानोंमें और सभी अवस्थाओं में केवल सब प्रकारसे सुख ही हो। इसी स्वाभाविक इच्छासे प्रेरित होकर समस्त जीव अपनी-अपनी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक, दैशिक, सामयिक आदि योग्यता तथा अनुकूलता के अनुसार अनेक प्रकार के प्रयत्नों में प्रवृत्त रहते हैं।
सुखकी इच्छा के साथ ही दुःख दूर करने की इच्छा अर्थात् केवल शुद्ध सुखकी चाह होना स्वाभाविक ही है। कारण,मनुष्यादि सभी जीवोंके मतका तो यही स्वभाव है कि थोड़ेसे भी दुःखके प्राप्त होनेपर वह अपने अनुभव में आये हुए और आते रहनेवाले अनेकानेक और बड़े-बड़े सुखोंका लेशमात्र भी अनुभव न कर, उसी एक छोटे दुःखका अनुभव करता है और दुखी होकर एकमात्र उसी दुःख निवृत्ति की चिन्ता में पड़ जाता है।
मनका यह अनुभव और वृत्ति युक्तियुक्त भी है। कारण, दुःख इतनी बुरी वस्तु है कि जैसे एक लोटेमें भरकर रक्खे हुए दूध या जलमें एक दो बूँद विष डाल देने पर वह सबका सब दूध या जल विष ही बन जाता है, उसमें बहुत से दूध या जलका जरा-सा भी प्रभाव नहीं रहता, वैसे ही अनेक तथा अनेक प्रकारके बड़े-बड़े सुखोंमें जब थोड़ा-सा भी दुःख मिल जाता है तो वे सारे सुख दुःखमय ही बन जाते हैं, फिर उन बड़े बड़े सुखोंका तनिक-सा भी प्रभाव नहीं रह जाता । इसीलिये यह अनुभवकी बात हुआ करती है कि जबतक वह दुःख दूर नहीं होता तबतक मनमें शान्ति नहीं रह सकती और भगवद्गीता में आनन्दकन्द परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के श्रीमुख से निकले हुए ‘अशान्तस्य कुतः सुखम्’ इस वाक्यानुसार जहाँ अशान्ति है, वहाँ सुख कभी नहीं हो सकता।
इस विषयपर विचार करना चाहिये कि हमलोग मनुष्ययोनिमें आकर अपनी मनुष्य जातिको पशु, पक्षी आदि सबसे श्रेष्ठक्यों मानते हैं? जब सभी जीव मनुष्य, पशु, पक्षी, कृमि और कीट-समानरूपसे ही दुःख दूर करना और सुख प्राप्त करना चाहते रहते हैं, अर्थात् जब सबका ध्येय तथा लक्ष्य एक ही प्रतीत होता है, तब उन सब जातियोंकी अपेक्षा मनुष्य जाति किस अंशमें श्रेष्ठ है, जिसके आधारपर मनुष्य अपनेको सर्वश्रेष्ठ माना करता है। यह केवल अज्ञानी मनुष्योंका ही अभिमानजनित कथन नहीं है कि मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ है, जगद्गुरु श्रीश्रादि शंकराचार्य भगवान्ने भी अपने विवेकचूडामणि ग्रन्थ में मङ्गल श्लोकके पश्चात् प्रथम श्लोकमें ही ‘जन्तूनां नरजन्म दुर्लभं' इत्यादिसे सर्वप्रथम यही विषय बतलाया है और श्रीमद्भागवत के पञ्चम स्कंध में तो मनुष्ययोनिको देवयोनिकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ बतलाया गया है। पर हमलोगोंको इतनेसे ही सन्तुष्ट न होकर कि हमारी मनुष्यजाति सर्वश्रेष्ठ है, यह विचार भी करना चाहिये कि वह क्यों श्रेष्ठ है और हमें उस श्रेष्ठताको किसप्रकारसे सफल करना होगा ?
इस विचारमें उतरनेपर यह तो स्पष्ट है कि शारीरिक बल आदि बाह्य अंशोंमें मनुष्य अपनी श्रेष्ठताका दावा नहीं कर सकता, क्योंकि इन अंशों में तो उससे श्रेष्ठ बहुत-सी योनियाँ पशु पक्षी आदि में भी पायी जाती हैं। कदाचित् मनुष्य यह समझें कि हम सुख दुःखके सम्बन्धर्मे, अन्य जीवोंके सदृश विचार करते हुए भी बन्धनकी निवृत्ति या मोक्ष चाहने में विशेषता रखते हैं ( जैसे आजकल बहुतसे लोग यह दावा करते हैं कि परराज्यकी निवृत्ति या स्वराज्यका खयाल करना पाश्चात्योंकी विशेषता है इत्यादि ) तो यह भी बड़ी भूल ही है, क्योंकि मुमुक्षा तो जन्तुमात्रकी स्वाभाविक इच्छा है। मनुष्य जब एक छोटेसे चूहेको पकड़ना चाहता है तब वह भी उसके हाथसे बचकर भागने लगता है, यह मुमुक्षाका ही तो उदाहरण है जो केवल पाश्चात्योंका नहीं, केवल मनुष्योंका भी नहीं, प्रत्युत जीवमात्रका स्वाभाविक जन्मसिद्ध लक्षण है।
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क्रमशः
साभार : कल्याण
संकलन : पं. हीरेनभाई त्रिवेदी,क्षेत्रज्ञ
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*अनंतश्रीविभूषित ब्रह्मलीन द्विपीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामिश्री स्वरुपानंद सरस्वती जी महास्वामीजी का दीपावली पर्व पर दिव्य संदेश।*
"दीपज्योतिः परंब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥"
दीपक की रोशनी संसार के तम को दूर करे और आपके जीवन मे प्रकाश लाए। आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। माता लक्ष्मी आपकी सभी मनोकामना पूर्ण करें।
श्रीवैदिक ब्राह्मणः 🚩 परिवार की और से तमाम सनातन धर्मावलंबियों को दिवाली पर्व और नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं💐
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - १०७*
_जो अपना लक्ष्य भूल गया_
_वह पथ भ्रष्ट हो ही जायगा_
अनन्तान्दमय, सर्वशक्तिमान, ज्ञानस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति ही मनुष्य जीवन का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य है। अपने इस उत्तमोत्तम लक्ष्य का जिसे सदा स्मरण रहता है और जो इस लक्ष्य की प्राप्ति करने के लिये वेद-शास्त्र के बताये हुए मार्ग का अनुसरण करता है अर्थात् जो अपने शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि की हलचल शास्त्रानुसार रखते हुये अपना जीवन धर्मानुकूल व्यतीत करता है, वही वास्तव में पुरुषार्थ-शील एवं भाग्यशाली है। ऐसे सत्पुरुषार्थवान् पुरुष की सत्र मनोकामनायें पूरी होते हुये उसे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है, इसमें सन्देह नहीं ।
जो अपने जीवन का चरम लक्ष्य बनाया जाय उसके लिये उसी विषय के किसी अच्छे विशेषज्ञ को श्रद्धापूर्वक अपना मार्ग प्रदर्शक बनाना चाहिये, जिससे कि उस विषय में उसके अनुभवों का तुम्हें लाभ हो सके। दूसरी बात यह है कि तुम्हारे जीवन की प्रवृत्ति ऐसी रहनी चाहिये कि जो तुम्हारे लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग में बाधक न होकर साधक हो ।
हर समय सतर्क रहो कि कहीं ऐसा न हो कि अपने लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग से इधर-उधर भटक जाओ। मत भूलो कि व्यवहार ही परमार्थ का मार्ग है। व्यवहार यदि अपने अधिकारानुसार शास्त्रोक्त है, तो वहो तुम्हें लक्ष्य प्राप्ति में आगे बढ़ायेगा । यदि मन विषयों के वशीभूत होकर व्यवहार में यथेच्छा-चरण में आया और शास्त्र-मर्यादाओं का उल्लंघन हुआ, तो व्यवहार ही लक्ष्य पथ से तुम्हें हटाकर पारमार्थिक लक्ष्य के विपरीत अनर्थ सम्पादन की ओर आगे बढ़ायेगा ।
इसलिये सदा अपने परम लक्ष्य का स्मरण करते रहकर उसकी प्राप्ति के लिये अनुभवी गुरु का पथ-प्रदर्शन और सतर्क होकर गुरुपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करना आवश्यक है।
*उपदेश १०८*
जो भगवान की और झुका
उसे किसी वस्तु की कमी नहीं
सत्संङ्ग करने से उचितानुचित, पाप-पुन्य, अधर्म और कर्तव्य का बोध होता है, विवेक उत्पन्न होता है । इसलिये सत्संग करने वाला अधर्मं से बचता है और धर्म में प्रवृत्त होता है। पाप से बचकर वह पुन्य कर्म करता है । सिद्धांत कि 'धर्मेण पापमपनुदति' धर्म करने से पाप नष्ट होता है। इस प्रकार सत्संग से पाप का नाश होता है ।
सत्संग में बैठने से, भगवत्सम्बन्धी वार्ता श्रवण करने से, स्वाभाविक ही आन्तरिक दुख-उद्योग आदि मनुष्य के हृदय को दहने वाला ताप शान्त होता है। सत्संग करने वाले के अन्तकरण में स्वाभाविक ही शान्ति रहती है ।
सत्संग के द्वारा मनुष्य सर्वशक्तिमान सर्व समर्थ भगवान् की ओर झुकता है । जो भगवान् की ओर झुका है उसके लिये कभी भी किसी वस्तु की कमी नहीं रह जाती, उसकी सारी दीनता - दरिद्रता नष्ट हो जाती है। इस प्रकार सन्त-समागम से पाप, ताप और दैन्य सभी का निवारण होता है ।
_शुभमस्तु नित्यम्_
इति श्रीमद्ब्रह्मानंद सरस्वती महाभागस्य १०८ उपदेशः।
जयश्रीहरि💐
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हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - १०६*
_विचार पूर्वक प्रवृत्ति बनाने से ही_
_मन सुमार्ग की ओर जाता है_
अखंड ब्रह्मांड नायक आनन्द कंद सच्चिदानन्द भगवान् - वेद वेद्य हैं । वेद-मार्ग द्वारा ही उनको जाना जा सकता है। वेद अपौरुषेय है, दिव्य दृष्टि के दाता हैं। भगवान् के दिव्य स्वरूप को देखने के लिये दिव्य दृष्टि ही अपेक्षित है। चर्मचक्षुओं से भगवान के उस स्वरूप के दर्शन नहीं हो सकते हैं। भगवान ने गीता में अर्जुन को उपदेश देते हुये कहा है:-
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेने व स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥
वह दिव्य दृष्टि प्राप्त करने की चेष्टा करना ही पुरुषार्थ में मनुष्य जन्म की सफलता है ।
भौतिक पदार्थ ही चर्मचक्षुओं से देखे जा सकते हैं । फिर भी भिन्न-भिन्न पदार्थों के लिये भी भिन्न-भिन्न दृष्टि होती है। सभी भौतिक पदार्थ एक दृष्टि से नहीं देखे जा सकते । उदाहरण के लिये सोचि - माता-पिता, भाई-बहिन, स्त्री इत्यादि सभी भौतिक शरीरधारी हैं। क्या इन सब को एक दृष्टि से देखा जाता है ? माता को और दृष्टि से देखते हैं, बहिन को और तथा स्त्री को और ही दृष्टि से देखा जाता है । पुनः भिन्न-भिन्न दर्शक के अधिकारानुसार एक ही वस्तु भिन्न दृष्टि से देखी जाती है ।
इसी भांति उपासना भी अधिकार-भेद से पृथक-पृथक है, वेद का मूल प्रणव है । परन्तु सब को प्रणव के उच्चारण का अधिकार नहीं है। प्रणव तो शुद्ध ब्रह्म है। केवल एक सन्यासी जो सभी भौतिक पदार्थों के रागों को त्यागकर ही सम्यकन्यासी होता है, उसके साथ कोई राग-द्वेष सांसारिक बंधन नहीं रह जाता । वह तो केवल नितांत एक ही रह जाता है । अतः उसे ही शुद्ध प्रणव के उच्चारण का अधिकार है। गृहस्थ जिसका राग घर-गृहस्थो, स्त्री-पुतादि में बना हुआ है, उसे प्रणव के जपने का अधिकार नहीं। क्योंकि प्रणव के जपने का फल भी तो वही होना चाहिये जो वह है यानी माया रहित विशुद्ध ब्रह्म केवल एक सच्चिदानन्द स्वरूप | गृहस्थ के लिये प्रणव का जप सुफलप्रद नहीं होता, नाश अमंगल-कारक होता है ।
अतः गृहस्थों के लिये यही विधान है कि वे केवल प्रा॒णव का उच्चारण (जप) न करके किसी न किसी मंत्र के साथ जोड़कर उच्चारण करें। प्रणव को मंत्र के आदि में जोड़ कर मंत्र का जप करें – ऐसा न करना अनधिकार चेष्टा है। अनधिकार चेष्टा का प्रभाव हृदय पर भी नहीं पड़ता, सब परिश्रम विफल हो जाता है । प्रायः लोग यही कहते हैं कि मन की चंचलता नहीं मिटती, मन स्थिर नहीं होता। पर मन की चंचलता तो विधिविधान द्वारा नित्य नैमित्तिक कर्मों द्वारा ही दूर हो सकती है । उसे तो करते नहीं, एकदम ध्यानस्थ हो जाने की कल्पना करते हैं, सो कैसे सफल हो ।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध में ही तो मन जाता है। मन तो इनके पीछे दौड़ते-दौड़ते मलिन हो रहा है, शुद्धता की ओर जा कैसे सकता है। मन को वृत्ति तो श्वान-वृत्ति बन रही है । सुख की चाह में इधर-उधर भटकता हुआ कभी रूप के पीछे, कभी गंध के पीछे, कभी स्पर्श के पीछे, कभी शब्द के पीछे, श्वानवत् मन दौड़ा करता है, परन्तु स्थिर नहीं हो पाता। वह तो निरंतर विषयाराम बना हुआ है, आत्माराम कैसे बने । विषयों से हट कर यदि आत्मा की ओर झुकाव हो जावे तो आत्माराम बने, विषयाराम न बने। जिसका मन भगवत् दर्शन की ओर लग गया है, वह सिनेमा देखने नहीं दौड़ेगा। जो भगवान के रूप का प्रेमी बन गया है, वह किसी सांसारिक रूप की ओर आँख नहीं उठायेगा । जो भगवत्- चरण के स्पर्श का अक्षय सुख अनुभव करने लगता है, वह भौतिक स्पर्श की इच्छा नहीं करता ।
इसी प्रकार रूप-रस-गंध-स्पर्श शब्द के पीछे श्वानवत दौड़ने वाले मंन को भगवान् के किसी विग्रह के रूप की ओर लगाओ । उनकी सेवा से स्पर्श-सुख अनुभव करने का स्वभाव डालो । भगवान् के प्रति सुगंधित द्रव्य अर्पण कर प्रसाद रूप से उन्हें ग्रहण करना सीखो।
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हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - १०५*
_सतर्क रह कर जीवन का सदुपयोग करो_
संसार में तीन चीजें हैं – तन, मन और धन । यही संसार कहा जाता है। तन-मन-धन का उपयोग बन जाय तो कभी अशांति न आवे । इनका उपयोग नहीं बनता, इसी से अशान्ति भोगवी पड़ती है। इसका उपयोग सिखाने के लिये कोई स्कूल कालेज नहीं है। धन की तीन प्रकार की गति- होती है — जो न दान देते हैं और न उसका अपने लिये हो उपयोग करते हैं, उनका धन तृतीय गति को अर्थात् नाश को प्राप्त होता है। तुलसीदास ने भी लिखा है
“सो धन धन्य, प्रथम गति जाकी ।”
अर्थात्, वह धन धन्य है, सार्थक है, जिसकी प्रथम गति हो, जो दान में व्यय किया जाय । तुलसीदास ने तो केवल धन के ही लिये कहा है, पर हम कहते हैं कि-
“सो तन धन्य प्रथम गति जाकी ।"
“सो मन वन्य प्रथम गति जाकी ।"
अर्थात्, वह तन और मन भी धन्य है, जिसकी प्रथम
गति हो ।
तन की प्रथम गति है कि शरीर भगवान् की अर्चना पूजा में लगा रहे — आंख भगवान् के रूप को देखे; कान का यश सुने, वाणी भगवान का यश गान करे । अर्थात्, प्रत्येक इन्द्रिय भगवत्संबंध को अपना विषय बना कर भगवान् रस पान करती रहे । प्राण भगवान् की आराधना में लगा रहे—यही तन को प्रथम गति है। मन की प्रथम गति है-- भगवान् में ही मन लगा रहे । धन की प्रथम गति कही गई है — सत्पात में दान, परन्तु दान के पहले उचितानुचित विचार पूर्वक ही उसका अर्जन होना चाहिये। ऐसा नहीं होना चाहिए कि जैसा मिला, वैसा ही अर्जन कर लिया। अनर्थ और पाप के द्वारा जो धन कमाया जायगा वह धन तो यहीं पड़ा रह जायगा, परन्तु पाप का फल अपने साथ जायगा, पाप पोछा नहीं छोड़ेगा। इसलिये धन-संग्रह में पाप न होने दो। पाप धन के साथ यहीं छूट जाय, ऐसा नहीं होगा। इससे धन-संग्रह में बहुत विचार करना चाहिये ।
एक महात्मा ने ऐसी सिद्धि प्राप्त कर ली थी कि जो कोई उनके पास आता था, उसके अच्छे-बुरे कर्मों को वह कह देते थे । एक समय हमारा उनका समागम हो गया। कहीं से घूमते हुये हम उसी तरफ से निकल पड़े । हमने उनसे कहा कि जगत् पाप करता है और उसका चिंतन आप करते हो, यह तो बड़ा घाटा है । जिस मन को परमात्मा में लगा रहना है, वह मन जगत के किये हुये अनाचार-पापाचार का चिन्तन करे – यही मन का दुरुपयोग है। साधु होकर फिर मन का इतना दुरुपयोग !!
तन-मन का और भी एक प्रकार से दुरुपयोग किया जाता है कि लोग जाति-पांति के समर्थन में ही लगे रहते हैं। मनुष्य का शरीर मिला है; किसी जाति में उत्पन्न हो गये – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र – किसी भी वर्ण में जन्म हो गया तो भगवान् के स्मरण का सब को अधिकार है और भगवान् के निकट पहुँचने का भी सब को अधिकार है । बीच में, क्लास में अन्तर रहे, यह अन्तर कोई ऐसा विषय नहीं है जो बहुत अधिक विचार की चीज हो। जहां जन्म हो गया, तो हो गया । अब तो ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि फिर जन्म न हो; ऐसा नहीं कि जहाँ जिस जाति में जन्म हो, उसी के समर्थन में अपना जीवन का समय खो दिया। यह तो धर्मशाला है । यहां आकर अपना मुख्य काम बनाना चाहिये, न कि धर्मशाले का ही समर्थन करते रहो । मनुष्य जीवन में जो मन भगवान में लगाने की चीज है, उससे अनाचार-पापाचार करना उचित नहीं।
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - १०४*
_जितना हो सके शुभ कार्यों का सम्पादन करो_
_आत्म-सुख की प्राप्ति इन्द्रिय संयम से होगी,विषयोपभोग से नहीं_
इन्द्रियों के द्वारा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध का हो अनुभव होता है। क्योंकि इन्द्रियाँ वहिर्मुखी होने के कारण केवल बाहर के ही विषयों का ज्ञान प्राप्त कर सकती हैं, अन्दर का ज्ञान इन्द्रियों से नहीं हो सकता। आत्मा अपने निकट से निकट है, नित्य प्राप्य है, कभी भी उसका अभाव नहीं होता फिर भी हम उसे देख नहीं पाते, जान नहीं पाते। जो सब को देखने वाला है उसको किससे देखा जाय ? आँखें सब को देखती हैं; परन्तु स्वयं अपने को नहीं देख पातीं, उन्हें देखने के लिये दर्पण चाहिये । आत्मा को देखने का दर्पण अन्तःकरे है — अतः माने 'भीतरी' कारण माने 'ज्ञान' का साधन । आन्तरिक ज्ञान का साधन होने के कारण इसे अन्तकरण कहते हैं ।दर्पण यदि स्वच्छ होता है, तभी उसमें प्रतिबिम्ब पड़ता है।मलिन दर्पण में कभी भी प्रतिबिम्ब दिखाई नहीं देता । इसी प्रकार निर्मल अन्तःकरण में ही आत्मा का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है; मलिन अन्तःकरण वाले उसे नहीं देख सकते । इसलिये अन्तःकरण को स्वच्छ बनाने की आवश्यकता है।
जाति, कुल, रूप, यौवन, धन, मान इत्यादि का अभिमान करना अज्ञान है । जब तक इनके अभिमान का त्याग नहीं किया जाता, तब तक आत्मा का ज्ञान कैसे हो सकता है । अज्ञान के नाश होने पर ही आत्मा का ज्ञान होता है । अज्ञानी अपने को परमात्मा से अलग मानता है और स्थूल शरीर को ही वह अपना स्वरूप समझता है । नाश होने वाले जगत् के पदार्थों में उसकी विशेष आसक्ति रहती है। इसी लिए किसी न किसी निमित्त को लेकर वह दुःखी होता रहता है ।
शास्त्र और गुरु लोग जगत् को मिथ्या बताते हैं । मिथ्या वह है जो दिखे तो, परन्तु जिसकी सत्ता स्थिर न हो — जैसे मन्दान्धकार में पड़ी हुई रज्जु को देखकर किसी को उसमें सर्प का भ्रम हो जाय, पर वास्तविक सत्ता सर्प की नहीं है; परन्तु भ्रमकाल में तो उसकी प्रतीति सत्य ही है। जब तक ठीक-ठीक रज्जु का ज्ञान नहीं होता, तब तक सर्प भ्रम की निवृत्ति नहीं हो सकती। अब इस भ्रम को दूर करने के लिए कोई लाखों रुपये व्यय करके अश्वमेध यज्ञ आदिनकरे तो इससे भी वह भ्रम दूर नहीं होगा । भ्रम मिटाने का उपाय यह है कि दीपक लेकर उसके प्रकाश में रज्जु कों ठीक- ठीक देख लिया जाय । रज्जु का निश्चय बोध हो जाने पर ही वह व्यक्ति किसी के प्रयत्न करने पर भी रज्जु को सर्प नहीं, मान सकता । इसी प्रकार जिसे जगत् के अधिष्ठान रूप पर आत्मा का बोध हो चुका हैं, वह कभी भी जगत् को सत्य नहीं मान सकता । अज्ञानी ही उसे सत्य मानते है । जगत् के मिथ्यात्व का बोध हो अज्ञान-निद्रा से जागने पर होता है । जागृत अवस्था लाने के लिए बन में जाने की आवश्यकता नहीं है। बन में रहने मात्र से किसी को ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता। न जाने कितने कोल -भिल्ल बनेचर वहां रहते हैं, पर महामूर्ख हैं । एकान्तवास तब लाभदायक हो सकता है। जब अज्ञान को मिटाने के साधन प्राप्त हों । अज्ञान को दूर करने के साधन सद्गुरु और शास्त्रों से प्राप्त होते हैं । परन्तु जो शास्त्रों पर ही श्रद्धा नहीं करता, महात्माओं के बचनों का विश्वास नहीं करता, उसके अज्ञान की निवृत्ति कैसे हो सकती है ? इसीलिए लिए विश्वास सम्पादन करने की आवश्यकता है।
“असंशयवतां मुक्तिः संशयाविष्ट चेतसाम् ।
न मुक्तिर्जन्म जन्मान्ते तस्माद् विश्वासमाप्नुयात ।"
सारांश में, मुक्ति का अर्थ है – संसार में लौट कर न आना । दूसरा अर्थ यह है कि दुखों का स्पर्श न हो । जिसे स्त्री, पुत्र, धन, मान, प्रतिष्ठा आदि की वासना नहीं है, उसे अवश्य आत्मा का अनुभव हो सकता है। आत्मा को तत्वतः जानने वाला ही शोक-सागर से पार होता है ।
अन्तःकरण वासनाओं से मलिन रहता है; इसलिए वासनाओं को नष्ट करने की आवश्यकता है। भोग के द्वारा कोई वासनाओं को तृप्त नहीं करना चाहे तो यह 'न भूतो न भविष्यति' – न हुआ है न और न हो सकता है। तृप्ति विचार से होती है, चाहे आज करो, चाहे दस वर्ष बाद । इन्द्रियाँ जब शान्त होंगी तब विचार के द्वारा हों। भोग से भोग की वासना और दृढ़ होती है। कहीं खुजलाने से आज तक किसी की खुजली अच्छी हुई हो तो हम यह भी आशा करें कि विषयभोग से इन्द्रियाँ शान्त होंगी।
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सब जानते हैं कि साथ में कुछ नहीं जाता, अपना शरीर भी चिता तक ही जाता है। पर वेद-शास्त्रों पर विश्वास करो तो साथ जाने वाली भी एक वस्तु है । परलोक-मार्ग में जीव के साथ उसके किये हुए शुभाऽशुभ कर्म जाते हैं। शुभ कर्म करने वाला उत्तम लोकों को प्राप्त होता है और अशुभ कर्म करने वाला नरक को। इसलिये जितना हो सके, शुभ कर्मों का सम्पादन करो ।
