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🌸आधार के बाद अब अपार🌼 🌕APAAR CARD 🔰👉 ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री (अपार) 🔰👉 वन नेशन, वन आईडी 🔰👉 12 अंक
🌸आधार के बाद अब अपार🌼 🌕APAAR CARD 🔰👉 ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री (अपार) 🔰👉 वन नेशन, वन आईडी 🔰👉 12 अंकों का कार्ड 🔰👉 देश के सभी विद्यार्थियों के लिए आधार कार्ड की तर्ज पर एक समान कार्ड बनेगा। 🔰👉  इस कार्ड पर स्टूडेंट की सारी शैक्षिक डिटेल दी जाएगी।

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Naveen_Hindi_Vyakaran_Rachana_Class_9_10_11_12_PDF_231023_093628.pdf1.05 MB

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#Rajsthan_Geography प्रश्न.1 जैविक कृषि कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्य क्या है ? उत्तर 👉 1. मृदा की जैविक गुणवत्ता को बनाए रखना । 2. वर्तमान कृषि में उर्वरक व कीटनाशी रसायनों के अधिक प्रयोग से हाने वाले दुष्परिणाम से बचना । 3. प्राकृतिक संसाधनों का कुशलतम उपयोग । 4. फसल उत्पादन को बढ़ाना एवं उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार लाना ! पर्यावरण प्रदुषण रोकना प्रश्न.2 आर्गेनिक फार्मिंग ? उत्तर 👉 वह कृषि जिसमें रासायनिक खादों एवं कीटनाशक दवाइँयों का प्रयोग नहीं किया जाता ये केवल जैविक एवं प्राकृतिक खादों पर आधारित होती है। इसमें प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम और लागत अधिक आती है

प्रश्न.स्थापत्य कला राजस्थानी इतिहास की धरोहर है।" स्पष्ट कीजिए। उत्तर : राजस्थान में विभिन्न स्थलों पर स्थित किले, मंदिर, राजप्रासाद, बावड़ियाँ एवं अन्य भवन आदि राजस्थान वास्तुकला का एक समन्वयात्मक व सुन्दर चित्रण प्रस्तुत करते हैं। राजस्थानी स्थापत्य में मुख्यतः दुर्ग स्थापत्य मंदिर स्थापत्य हवेली यावड़ियाँ आदि शामिल है। नगर विन्यास:- कोस्य युगीन स्थल कालीबंगा दो भागों में विभाजित था दुर्ग (प्रशासनिक भवन) निचला नगर (जनसामान्य के घर) दोनो भाग अलग-अलग परकोटे से घिरे हुए थे। दुर्गस्थापत्य :- राजपूत संस्कृति के अभ्युदय के कारण वीरता व रक्षा के प्रतीक किलों का निर्माण हुआ। जयपुर में पर्वतीय दलान पर स्थित आ किले में महलों को ही दुर्ग का रूप प्रदान किया गया। आमेर दुर्ग में स्थित शिलादेवी, जगतशिरोमणि और अम्बिकेश्वर महादेव के मंदिरों का ऐतिहासिक काल से महत्व रहा है। राजसमंद जिले में स्थित कुंभलगढ़ दुर्ग को प्राचीर अनुपम झालावाड़ स्थित गागरोन का किला दुर्गम पण, चौतरफा विश खाई तथा मजबूत दीवारों के कारण यह दुर्ग अपने आप में अनूठा और अद्भुत है। क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा चित्तौड़ का किला है। चित्तौ के भीतर राणा कुंभा द्वारा निर्मित कीर्तिस्तम्भ अपने शिल्प और स्थापत्य की दृष्टि से अनूठा है। किले के भीतर निर्मित रानी पद्मिनी का महल, नवलखा भंडार, जैन कीर्ति स्तम्भ, कुंभश्याम मंदिर, समिद्धेश्वर मंदिर, मीरा मंदिर, कालिका माता मंदिर, शृंगार चंवरी आदि दर्शनीय है। जयपुर स्थित जयरा दुर्ग अपने विशाल पानी के टांकों के लिए जाना जाता है। जयगढ़ कई गुप्त सुरंगों के कारण रहस्यमयी किला कहलाता है। बीकानेर स्थित जूनागढ़ किले के महल और उनकी बनावट मुगल स्थापत्य कला पर आधारित है। जूनागढ़ किले में स्थित गंगानिवास, फुलमहल, गजमंदिर, अनूपमहल, कर्णमहल, लाल निवास इत्यादि प्रमुख है जैसलमेर का किला चूने का प्रयोग किये बिना बड़े बड़े पीले पत्थरों से निर्मित है लाल बलुआ पत्थर से निर्मित मेहरानगढ़ (जोधपुर) वास्तुकला की दृष्टि से बेजोड़ है इस किले के स्थापत्यों में मोती महल, फतह महल, तख्तविलास, अजीत विलास आदि का वैभव प्रशंसनीय है। सवाईमाधोपुर स्थित रणथंभौर दुर्ग अपनी सुदृढ़ किलेबन्दी के कारण प्रसिद्ध हैं। अन्य दुगों में तारागढ़ (अजमेर), तारागढ़ (बूंदी), नाहरगढ़ (जयपुर), लोहागढ़ (भरतपुर), बाला किला (अलवर), सिवाणा दुर्ग (बाड़मेर) आदि का स्थापत्य दर्शनीय है। मंदिर स्थापत्य भक्ति शक्ति व आध्यात्म की प्रभावना के कारण राजस्थान में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ रणकपुर जैन मंदिर एकलिंग जी मंदिर, नीलकण्ठ (कुंभलगढ़) मंदिर आदि का स्थापत्य दुर्गस्थापत्य के समकक्ष है। गुर्जर प्रतिहार शैली में निर्मित मंदिर जैसे कालिका मंदिर (चित्तौड़), आभानेरी मंदिर (दौसा), नकटीमाता मंदिर (जयपुर) आदि अलंकृत खम्भे, अलंकृत मंच आदि के लिए प्रसिद्ध है। आबू के चंद्रावती मंदिर तथा उण्डेश्वर मंदिर (बिजौलिया) क्रमशः सोलकी तथा भूमिज शैली में निर्मित है। कामशास्त्र की मूर्तियों के कारण किराडू के मंदिरों को "राजस्थान का खजुराहों कहा जाता है। राजस्थान में अनेक जैन मंदिर, जो अपनी विशिष्ट तल विन्यास, संयोजन और स्वरूप के लिए विख्यात है, जैसे रणकपुर, औसियों व जैसलमेर - के जैन मंदिर, सेवाड़ी मंदिर (पाली), चांदखेड़ी (झालावाड़), श्री महावीर जी (करौली) आदि । हवेली व बावड़ियाँ: राजस्थान की हवेलियाँ अपने छों बरामदों और शरीखों पर बारीक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है जिनमें जैसलमेर में नथमल की हवेली व सालिम सिंह की हवेली बीकानेर में बच्छावतों को हवेली, शेखावाटी की सोने चाँदी की हवेली व पंसारी की हवेली आदि शामिल है। राजस्थान में चांदवावी (दौसा), त्रिमुखी बावड़ी (उदयपुर), नौलखा बावड़ी ( दूंगरपुर), रानी जी की बावड़ी (बूंदी), घोसुण्डी बावड़ी (चित्तौड़) आदि अपने बेहतरीन स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है। राजस्थान में समय और सम्पन्नता के साथ उत्कृष्टता, विशालता एवं सूक्ष्मता का समावेश हुआ अतः इसी कारण स्थापत्य का वैविध्य राजस्थान को वास्तुकला की विशेषता है।

प्रश्न.राजस्थान की रियासतों द्वारा अंग्रेजों के साथ की गई संधियों के उन प्रभावों का उल्लेख कीजिए, जिन्होंने 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि बनाई। उत्तर : राजस्थान के शासकों ने मराठा आतंक से सुरक्षा तथा अपने सामन्तों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए हो अंग्रेजों के साथ 1818 ई. की संधि की थीं। संधि सम्पन्न होने के बाद राजपूत शासकों ने अंग्रेजों को सहायता से सामंतों की शक्ति कुचलने का प्रयास किया। कालांतर में अंग्रेजों ने ऐसे अनेक कदम उठाए, जिनसे सामंतों की स्थिति कमजोर हुई। सामंत व्यापारियों से राहदारी और दाना-पानी आदि शुल्क वसूल करके, उसके बदले व्यापारियों को सुरक्षा प्रदान करते थे। उनके इन विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया। अंग्रेजों ने पॉलिटिकल एजेन्टों के माध्यम से राज्यों के प्रशासन एवं आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करना प्रारंभ किया जिससे शासकों के सम्मान एवं राजनीतिक स्थिति में कमी आई। अंग्रेजों ने राज्य के उत्तराधिकार नीतिगत, शासकीय आदि सभी मामलों में हस्तक्षेप प्रारंभ कर दिया था। रियासतों की आर्थिक दुर्दशा :- कंपनी द्वारा रियासतों से अपनी सेवाओं के एवज में खिराज वसूला जाता था, परंतु समय पर खिराज भुगतान न होने की स्थिति में खिराज पर अतिरिक्त चक्रवर्ती ब्याज भी वसूला जाता था। • कंपनी द्वारा स्थापित विभिन्न सैनिक छावनियों का खर्चा रियासतों द्वारा दिया जाता था। जोधपुर लीजियन (मुख्यालय एरिनपुर स्थापना 1835 ई.) मेवाड़ भील कोर (खैरवाड़ा, 1841 ई.), मेरवाड़ा बटालियन (1822 ई.), शेखावाटी बिग्रेड (झुंझुनुं 1834 ई.) आदि सैन्य इकाइयों, जो की अंग्रेजी सरकार के अधीन थी, का खर्चा रियासतों के द्वारा वहन किया जाता था। इन सैन्य इकाइयों के रख-रखाव के लिए सामंतों एवं सामान्य प्रजा से अत्यधिक राजस्व वसूला गया, जिनसे राज्यों की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गया। • शासकों द्वारा इन सैन्य व्ययों की अदायगी के विलम्ब एवं इनकार के संबंध में कंपनी द्वारा उस राज्य के किसी सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र पर अधिकार कर लिया जाता था, जैसे- अंग्रेजों द्वारा सांभर झील पर अधिकार 1818 ई. की संधि के बाद, अंग्रेजों द्वारा राजस्थान के राजयों के प्रशासन में अवांछनीय हस्तक्षेप, आर्थिक संसाधनों पर अधिपत्य, अंग्रेजों द्वारा वसूल की जाने वाली वार्षिक खिराज की राशि सामंतों के विशेषाधिकारों पर कुठाराघात और राजस्थान के सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप ने सर्वत्र असंतोष को जन्म दिया।

प्रश्न. - प्रजामंडल आंदोलन ने जन साधारण में राजनीतिक चेतना व जाग्रति के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन की।" विवेचना कीजिए? उत्तर : राजस्थान में 1931 ई. में प्रजामंडलों की स्थापना के साथ ही उत्तरदायी शासन की माँग प्रारंभ हो गई प्रजामण्डलों ने अपने विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं जैस सवक, वैभव आदि के माध्यम से आमजन को मौलिक अधिकारों के प्रति सचेत और जागृत किया। आगीवाण, राजस्थान वीकली आदि स्थानीय भाषा समाचार पत्रों एवं प्रजामंडल कार्यकत्ताओं ने गाँव गाँव घूमकर राजनीतिक चेतना जागृत की। • प्रजामंडल द्वारा प्रकाशित विभिन्न समाचार पत्र पत्रिकाओं जैसे संग्राम, विजय, वैभव आदि ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बल दिया। • विभिन्न प्रजामंडल नेताओं जैसे रामनारायण चौधरी, माणिक्यलाल वर्मा आदि ने किसानों को उनके अधिकारों के प्रति उन्हें जागरूक किया उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़कर उसे और विस्तृत बना दिया। • प्रजामण्डल के नेताओं ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों में भाग लेकर राष्ट्रीय आंदोलन के राजनीतिक मूल्यों का रियासतों में प्रसार किया। • प्रजामण्डल नेताओं ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया तथा कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं जैसे जवाहर लाल नेहरू, राजगोपालाचारी, विजयलक्ष्मी पंडित आदि ने प्रजामंडल अधिवेशन में भाग लिया जिससे राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिला। • राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलने से रियासतो जनता ने शासकों पर दबाव बनाया जिससे रियासतों का भारत में विलय संभव हो सका। • प्रजामंडल के प्रयासों से चेतना प्राप्त आमजन ने शासन में भागीदारी की मांग की अत: रियासतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना हुई जैसे शाहपुरा रियासत में गोकुललाल असावा के नेतृत्व में। • अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई जनता ने संवैधानिक शासन की मांग को फलतः रियासतों में संविधान का निर्माण हुआ जैसे- के. एम. मुंशी ने मेवाड़ का संविधान तैयार किया। इस प्रकार प्रजामंडल आंदोलन के प्रभाव से उत्पन्न राजनीति चेतना औन जन जागृति ने संवैधानिक उत्तरदायी शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया जिससे राजतंत्र की जगह लोकतंत्र स्थापित हुआ।

प्रश्न. - प्रजामंडल आंदोलन ने जन साधारण में राजनीतिक चेतना व जाग्रति के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन की।" विवेचना कीजिए? उत्तर : राजस्थान में 1931 ई. में प्रजामंडलों की स्थापना के साथ ही उत्तरदायी शासन की माँग प्रारंभ हो गई प्रजामण्डलों ने अपने विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं जैस सवक, वैभव आदि के माध्यम से आमजन को मौलिक अधिकारों के प्रति सचेत और जागृत किया। आगीवाण, राजस्थान वीकली आदि स्थानीय भाषा समाचार पत्रों एवं प्रजामंडल कार्यकत्ताओं ने गाँव गाँव घूमकर राजनीतिक चेतना जागृत की। • प्रजामंडल द्वारा प्रकाशित विभिन्न समाचार पत्र पत्रिकाओं जैसे संग्राम, विजय, वैभव आदि ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बल दिया। • विभिन्न प्रजामंडल नेताओं जैसे रामनारायण चौधरी, माणिक्यलाल वर्मा आदि ने किसानों को उनके अधिकारों के प्रति उन्हें जागरूक किया उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़कर उसे और विस्तृत बना दिया। • प्रजामण्डल के नेताओं ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों में भाग लेकर राष्ट्रीय आंदोलन के राजनीतिक मूल्यों का रियासतों में प्रसार किया। • प्रजामण्डल नेताओं ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया तथा कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं जैसे जवाहर लाल नेहरू, राजगोपालाचारी, विजयलक्ष्मी पंडित आदि ने प्रजामंडल अधिवेशन में भाग लिया जिससे राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिला। • राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलने से रियासतो जनता ने शासकों पर दबाव बनाया जिससे रियासतों का भारत में विलय संभव हो सका। • प्रजामंडल के प्रयासों से चेतना प्राप्त आमजन ने शासन में भागीदारी की मांग की अत: रियासतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना हुई जैसे शाहपुरा रियासत में गोकुललाल असावा के नेतृत्व में। • अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई जनता ने संवैधानिक शासन की मांग को फलतः रियासतों में संविधान का निर्माण हुआ जैसे- के. एम. मुंशी ने मेवाड़ का संविधान तैयार किया। इस प्रकार प्रजामंडल आंदोलन के प्रभाव से उत्पन्न राजनीति चेतना औन जन जागृति ने संवैधानिक उत्तरदायी शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया जिससे राजतंत्र की जगह लोकतंत्र स्थापित हुआ।

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महाराणा प्रताप के व्यक्तित्व की विशेषताएं :- 1 निहत्थे पर वार नहीं करना- उन्होंने कभी भी निहत्थे पर वार नहीं करने का प्रण ले रखा था । वे सदैव दो तलवार रखते थे- एक तलवार दुश्मन को देने के लिए भी रखते थे । 2. मेवाड का राजचिह्न सामाजिक समरसता प्रतीक है । एक तरफ क्षत्रिय व एक तरफ भील योद्धा , सर्व समाज समभाव का सूचक है । महाराणा प्रताप सभी के प्रिय थे , सब लोग उनके लिए प्राण • देने के लिए तैयार रहते थे । 3. स्वतंत्रता प्रेमी- महाराणा प्रताप स्वाधीनता प्रेमी थे अनेक कष्टों के बाद भी किसी भी कीमत पर अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए । 4. धर्म रक्षक व राजचिह्न सम्मान - धर्म रक्षक व राजचिह्न की सदैव रक्षा की । उनकी मान्यता थी , जो दृढ़ राखे धर्म को तिहि राखे करतार । 5. शील - स्त्री सम्मान - नारी सम्मान के लिए भारतीय परम्परा का उदाहरण प्रस्तुत किया । कुंवर अमरसिंह ने 1580 ई . में जब अचानक शेरपुर के मुगल शिविर पर आक्रमण कर सूबेदार • अब्दुर्रहीम खानखाना के परिवार को बंदी बना लिया गया , तब प्रताप ने खानखाना की स्त्रियों एवं बच्चों को ससम्मान एवं सुरक्षित वापस लौटाने के आदेश भिजवाये । 6. प्रेरणा पुरूष- महाराणा प्रताप बाद में शिवाजी , छत्रसाल से लेकर अंग्रेजों के विरूद्ध स्वाधीनता संग्राम में स्वातंत्र्य योद्धाओं के प्रेरता बने । 7. उनकी विलक्षण सहयोगी प्रतिभा के कारण ही भामाशाह ने अपनी समस्त सम्पदा महाराणा के चरणों में समर्पित कर दी ।

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