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Rsd concept for IAS/PCS group

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हमने शासन, नियमन और निगरानी की संस्थाओं को कमजोर कर दिया है और यही कारण है कि हम आज इस स्थिति में हैं। अब पर्यावरणीय चुनौती हर उस चीज पर मंडरा रही है जिसे हम महत्त्व देते हैं। कृषि को उत्पादक बनाना होगा लेकिन साथ ही टिकाऊ भी और किसानों के हाथों में पैसा पहुंचाना होगा। गरीबों की अर्थव्यवस्था बनानी होगी ताकि वे पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षक बन सकें। जल सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी चाहे सूखा हो या जलवायु संबंधी तनाव। हमें ऐसे विकास मार्ग भी खोजने होंगे जो प्रदूषण के बिना विकास को नए सिरे से तय कर सकें और दुनिया को जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद कर सकें। अच्छी खबर यह है कि आज हम पहले के किसी भी विश्व पर्यावरण दिवस की तुलना में अधिक जानते हैं कि हमें क्या अलग करने की आवश्यकता है। यही कारण है कि इस साल एक नई शुरुआत होनी चाहिए। पर्यावरणवाद की नई प्रथा की शुरुआत, जो समावेशी और सुलभ विकास की राजनीति में निहित हो और तभी यह टिकाऊ होगा। (लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

नए किस्म के पर्यावरणवाद की आवश्यकता, क्यों टिकाऊ विकास की शुरुआत समावेशिता से होनी चाहिए? (सुनीता नारायण) (साभार बिजनस स्टैन्डर्ड) हर वर्ष 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम कहां खड़े हैं और हमें किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। इस वर्ष जब मैं यह आलेख लिख रही हूं मेरा शहर दिल्ली जल रहा है। यह एक जीवित अग्निकुंड बन चुका है। हम सभी जानते हैं कि बढ़ते तापमान का कारण जलवायु परिवर्तन है। यह अब निर्विवाद है। लेकिन हमारे शहरों के निर्माण के तौर तरीके भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। उदाहरण के लिए कंक्रीट का बढ़ता उपयोग, सड़कों पर वाहनों से निकलने वाली गर्मी और कमरों में एयर कंडीशनर से निकलने वाली गर्मी भी तापमान बढ़ाने की वजह है। हम बिना इन्सुलेशन, वेंटिलेशन या तेज धूप से बचाने वाले शेडिंग के निर्माण कर रहे हैं। इन सबके साथ-साथ पेड़ों और जलस्रोतों द्वारा मिलने वाली प्राकृतिक ठंडक का अभाव भी गर्मी को बहुत भीषण बना देता है। प्राकृतिक ठंडक के खत्म होने में निर्माण गतिविधियों में तेजी भी एक वजह है। अब समय आ गया है कि हम पर्यावरण बनाम विकास की निरर्थक बहस को किनारे रखें। हमें पता है कि मनुष्यों ने ही जलवायु परिवर्तन को आज की इस महाविपत्ति में बदला है और हमने यह सब विकास के नाम पर किया है। ऊर्जा के लिए जीवाश्म ईंधन के उपयोग से होने वाला उत्सर्जन जो आर्थिक वृद्धि, आजीविका और कल्याण के लिए आवश्यक है, तापमान में इजाफा कर रहा है और मौसम प्रणालियों को अनियंत्रित कर रहा है। यही विकास का मॉडल आज सवालों के घेरे में है। इसने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहां हमारे पास पीने के लिए स्वच्छ पानी नहीं है और सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा नहीं है। इसलिए चुनौती यह है कि हम विकास के तरीके को बदलें न कि बहस को एक निरर्थक विकास विरोधी के स्वरूप में सीमित कर दें। जब यह स्पष्ट हो जाए तब हम अगले मुद्दे पर जा सकते हैं कि देश किस तरह स्थानीय प्रदूषण समस्याओं को दूर करने के बावजूद वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों में योगदान करते रहते हैं। जलवायु परिवर्तन इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। जैसे कि भारी मात्रा में उत्पन्न होने वाला कचरा और पर्यावरण के अनुकूल बदलाव के लिए नए खनिजों की बढ़ती मांग। इसलिए पर्यावरण प्रबंधन अनसुलझा ही रहता है भले ही आकाश नीला हो और पानी साफ नजर आए। यह हमें बताता है कि हर देश को पर्यावरणवाद के लिए एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है और पुराने तरीके अब कारगर नहीं हैं और उनके लिए बहुत देर हो चुकी है। दशकों के काम ने हमें कुछ अहम सबक सिखाए हैं। पहला, टिकाऊ विकास तब तक संभव नहीं है जब तक विकास समावेशी और सुलभ न हो। भारत की बात करें तो हम जानते हैं कि जब तक हम सभी को आवागमन की सुविधा नहीं देंगे तब तक हमारे पास स्वच्छ हवा नहीं होगी, जब तक सभी के लिए स्वच्छता नहीं होगी तब तक हमारी नदियां प्रदूषणमुक्त नहीं होंगी और ऐसी ही कुछ अन्य चीजें। हमें यह भी पता है कि केवल तकनीकी दृष्टिकोण समस्या का समाधान नहीं करेंगे। पर्यावरण तभी सुधरेगा जब विकास सभी के लिए काम करेगा। जिसमें गरीब भी शामिल हों। दूसरा, हम जानते हैं कि पर्यावरण प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा है। हम उन्हें कैसे निकालते हैं और उनसे अर्थव्यवस्था कैसे बनाते हैं। यह पुराने कोयला-गैस अर्थतंत्र पर भी उतना ही लागू होता है जितना कि नए हरित अर्थतंत्र पर जिसमें सौर पैनल और बैटरियां शामिल हैं और जिसके लिए महत्त्वपूर्ण खनिजों का उत्खनन आवश्यक है। यह नए आर्टिफिशल इंटेलिजेंस अर्थतंत्र पर भी लागू होता है जिसे पानी और ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पिछले दशकों में हमने इन प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग किया है। हमने कुछ हद तक सीखा है कि मत्स्य पालन, खनन या वन प्रबंधन को अधिक टिकाऊ कैसे बनाया जाए लेकिन प्रगति सीमित रही है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हम अभी तक पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि इन संसाधनों के मालिक समुदायों के साथ लाभ कैसे साझा किया जाए। हम बस उनके संसाधन ले लेते हैं और उन्हें और गरीब बना देते हैं। आने वाले दशक में इस शक्ति असंतुलन को ठीक करना होगा ताकि स्थायित्व हासिल की जा सके। तीसरा, पर्यावरणवाद का संबंध संस्थाओं से भी है जो अल्पकालिक और दीर्घकालिक उद्देश्यों के बीच और उद्योग या कृषि की जरूरतों तथा समुदायों के अधिकारों के बीच इस संतुलन को ला सकती हैं। यह निर्णय लेने की प्रक्रिया के बारे में है जो उपलब्ध सर्वोत्तम विज्ञान से प्रेरित हो। यह जवाबदेह और पारदर्शी संरचनाओं के बारे में है जो हमें विकास की लागत समझने की अनुमति दें। लेकिन यहीं पर हम वास्तव में गलत रास्ते पर चले गए हैं।

Previous year ka class Aaj nahin hoga

Aaj previous class nhi hoga

बिहार (पटना उच्च न्यायालय) की वर्तमान महिला मुख्य न्यायाधीश हैं Justice Meenakshi Madan Rai, जिन्होंने जून 2026 में पदभार ग्रहण किया। इनसे पहले पटना उच्च न्यायालय की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश Justice Rekha Manharlal Doshit थीं। उन्होंने 21 जून 2010 को पटना उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी और वे इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला थीं।

बिहार (पटना उच्च न्यायालय) की वर्तमान महिला मुख्य न्यायाधीश हैं Justice Meenakshi Madan Rai, जिन्होंने जून 2026 में पदभार ग्रहण किया। SCC Online +1 इनसे पहले पटना उच्च न्यायालय की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश Justice Rekha Manharlal Doshit थीं। उन्होंने 21 जून 2010 को पटना उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी और वे इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला थीं।

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अब भी इसके दायरे से बाहर रह जाते हैं। भारत के शहरों को अब बड़े पैमाने पर, सार्वजनिक व्यवस्था वाली किराये की आवास प्रणाली पर ध्यान देना चाहिए। मुंबई, दिल्ली या बेंगलूरु जैसे शहरों में जिन परिवारों की मासिक आय 15,000 रुपये से कम है, उनके लिए घर खरीदना वर्तमान में संभव नहीं है। जमीन की कीमतें, ब्याज दर और ऋण की अवधि इसे गणितीय रूप से असंभव बना देती हैं। ऐसे परिवारों के लिए समाधान यह है कि सार्वजनिक जमीन पर निजी डेवलपर के माध्यम से 50-60 साल के पट्टे पर किराये के मकान बनाए जाएं जहां किराया नियंत्रित हो और लंबी अवधि के कर्ज को किराये की आमदनी से सुरक्षा मिले। नीति आयोग के अनुसार, भारत की शहरी आबादी जो वर्ष 2021 में 50 करोड़ थी उसके वर्ष 2050 तक 85 करोड़ तक बढ़ने का अनुमान है। यानी शहरों में 35 करोड़ लोग और आएंगे और यह लगभग मौजूदा अमेरिका की आबादी जितना होगा। किसी संरचनात्मक आवास समाधान के अभाव में ये लोग झुग्गियां बसाएंगे, शहरों के बुनियादी ढांचे पर दबाव डालेंगे और छोटे-छोटे कमरे में भरकर रहेंगे। चीन इस संदर्भ में सबसे बड़ा उदाहरण पेश करता है। चीन ने जमीन सुधार, सरकार समर्थित डेवलपर बाजार और आक्रामक रूप से रियल एस्टेट पर दिए जाने वाले ऋण के विस्तार के माध्यम से अपनी तेज आर्थिक वृद्धि के दौर में आवास की संख्या को बड़े पैमाने पर बढ़ाया है। भारत जैसा देश जिस गति के हिसाब से ही शहरीकरण कर रहा है, जिसका निर्माण क्षेत्र से मिलने वाला आर्थिक रिटर्न बहुत अधिक है और आवास की कमी लगभग पूरी तरह कार्यरत आबादी में केंद्रित है, उसके पास एक बड़ी आर्थिक वृद्धि की दास्तां लिखने की पूरी सामग्री है। संस्थागत पहलू भी धीरे-धीरे सुव्यवस्थित हो रहे हैं, जमीन सुधार पर चर्चा चल रही है और किराये के आवास ढांचे पर विचार-विमर्श हो रहा है। अब जरूरत है प्रश्न के दृष्टिकोण को बदलने की, मसलन हम गरीबों के लिए आवास पर कितना खर्च कर सकते हैं, इस तरह के सवालों के बजाय यह सवाल अहम है कि इस पर निवेश न करने से हम कितनी वृद्धि खो रहे हैं। यही वह जगह है जहां असली अवसर शुरू होता है। ________ (लेखक इंस्टीट्यूट फॉर कंपेटेटिवनेस के अध्यक्ष हैं। लेख में मीनाक्षी अजित का भी सहयोग है)

शहरी विकास का अधूरा आधार: भारत में आवास संकट अब सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक वृद्धि की बड़ी बाधा (अमित कपूर) (साभार बिजनस स्टैन्डर्ड) अधिकांश विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में शहर वह जगह होती हैं जहां उत्पादकता से जुड़े काम होते हैं, मजदूरी-पगार ज्यादा होती है और आर्थिक वृद्धि तेजी से होती है। भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है और इसके शहरी केंद्र इस वृद्धि को बड़े पैमाने पर समायोजित करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन एक ऐसा क्षेत्र है जहां शहरी नीतियां, इस अवसर के पैमाने के अनुसार नहीं ढल पाई हैं: वह है आवासीय क्षेत्र। समस्या यह नहीं है कि इसे नजरअंदाज किया गया बल्कि अक्सर इसे गलत तरीके से समझा गया और कभी-कभी तो इसे गलत श्रेणी में रखा गया है। सस्ते शहरी आवास को अक्सर कल्याणकारी नीति या सब्सिडी और परोपकार जैसे काम के बीच एक सामाजिक पुनर्वितरण व्यवस्था के रूप में देखा गया। यह दृष्टिकोण पूरी तरह से यह समझने में चूक करता है कि आवासीय क्षेत्र वास्तव में अर्थव्यवस्था में क्या भूमिका निभाता है। जैसे सड़कें या बिजली की आपूर्ति, शहर की उत्पादकता बढ़ाने के लिए आधार बनती हैं, वैसे ही आवास भी उस आधार का हिस्सा है जो एक उत्पादक शहर को सक्षम बनाता है। भारत में इसका अभाव केवल एक सामाजिक समस्या नहीं है बल्कि यह व्यापक आर्थिक अवसर से जुड़ी समस्या भी है और फिलहाल इस अवसर को भुनाने की कोशिश काफी हद तक नहीं हुई है। दिसंबर 2025 में नीति आयोग की एक समिति ने, संयुक्त राष्ट्र के घरेलू संकट प्रारूप का उपयोग करते हुए, महानगरों, शहरी और कस्बाई क्षेत्रों में 5 से 7 करोड़ आवास की कमी का अनुमान लगाया। वहीं, सीआईआई-नाइट फ्रैंक की एक अनुमान वाली रिपोर्ट में इस समस्या को और गंभीर बताया गया। सबसे रूढ़िवादी अनुमान के अनुसार, वर्ष 2030 तक शहरों में करीब 3.12 करोड़ आवास की कमी होगी। सरकार की ‘सबके लिए आवास’ कार्यक्रम की योजना के तहत वर्ष 2029 तक 1 करोड़ शहरी आवास जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है जो कुछ हिस्से की जरूरतों को पूरा करेगा लेकिन अधिकांश अंतर वास्तव में संरचनात्मक सुधारों की मांग करता है। आर्थिक तर्क भी स्पष्ट और केवल भारत तक सीमित नहीं है। किसी भी अर्थव्यवस्था में आवास सबसे अधिक नेटवर्क वाले क्षेत्रों में से एक है। इसके तार सीमेंट, स्टील, लॉजिस्टिक्स, पेंट और वित्तीय सेवाओं तक फैले हैं। वर्ष 1995 से 2009 के बीच 45 देशों में किए गए आईएलओ के एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन में पाया गया कि निर्माण क्षेत्र में आर्थिक उत्पादन का गुणक हमेशा पूरे अर्थव्यवस्था के औसत से अधिक रहा, चाहे किसी भी आय वर्ग का देश हो। मध्य आय वाले देशों में हर 10 लाख डॉलर निवेश पर लगभग 3.6 गुना आर्थिक उत्पादन हुआ। भारत के अपने आंकड़े भी इस क्षेत्र की ताकत को दिखाते हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में निर्माण क्षेत्र ने 8.6 फीसदी वास्तविक जीवीए वृद्धि दर्ज की जो प्रमुख क्षेत्रों में सबसे अधिक थी। सवाल यह नहीं है कि निर्माण से वृद्धि होती है या नहीं बल्कि सवाल यह है कि क्या भारत यह निवेश उस हिस्से में कर रहा है जहां जरूरत और गुणक सबसे अधिक हैं। इसके अलावा, निर्माण क्षेत्र रोजगार के प्रति अधिक संवेदनशीलता दिखाता है और यह निवेश के प्रति भी काफी प्रतिक्रियाशील है। फिर भी, अधिकांश नौकरियां कम वेतन वाली और अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ी हैं। वर्ष 2022 तक, अधिकांश (70 फीसदी) अकुशल निर्माण श्रमिकों को निर्धारित न्यूनतम दैनिक वेतन भी नहीं मिला। यह क्षेत्र 5 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है, लेकिन सुरक्षा और पर्याप्त मजदूरी के बिना वे पूरी तरह से खर्च नहीं कर पाते और इस प्रकार आवास क्षेत्र में निवेश का वास्तविक गुणक प्रभाव भी सीमित रह जाता है। निम्न-मध्य आय वाले देशों में जब मजदूरी बहुत कम होती है तब यह प्रेरित प्रभाव दब जाता है। यदि मजदूरी को सही किया जाए और कार्यबल को औपचारिक बनाया जाए तब आवास निवेश का गुणक प्रभाव और भी व्यापक हो जाएगा। भारत इस संकट के प्रति उदासीन नहीं रहा है। वर्ष 2024-25 में प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना के लिए बजट में 36 फीसदी की बढ़ोतरी कर उसे 30,171 करोड़ रुपये किया गया जो देश का अब तक का सबसे महत्त्वाकांक्षी आवास कार्यक्रम है। लेकिन यह योजना घर खरीदने पर केंद्रित है, जिसके लिए जमीन, ऋण योग्यता और स्थिर आय की जरूरत होती है और ये तीन चीजें शहरी क्षेत्र के गरीबों के पास नहीं होती है। इस योजना में लाभार्थी के लिए निर्माण वाले घटक का फायदा केवल उन लोगों तक पहुंचता है जिनके पास पहले से जमीन है, जबकि ऋण आधारित सब्सिडी उन परिवारों के पक्ष में है जो एक औपचारिक आय पाते हैं। नतीजा यह होता है कि योजना उन लोगों तक पहुंचती है जो वास्तव में इसके दायरे से पूरी तरह बाहर नहीं हैं जबकि भूमिहीन प्रवासी, अनौपचारिक श्रमिक और फुटपाथ पर रहने वाले दैनिक मजदूर

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Aaj (18-05-2026) math ka class nahi Ho payega kyunki sir ka angutha cut gaya hai is Karan se vah aane mein Aaj saksham nahin Hai kal se aap log ka class continue hoga