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DR NARAYAN DUTT SHRIMALI

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *साधु का काम दंड देना नहीं है । साधु प्रार्थना करता है, दंड नहीं देता।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १००* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! जब मनुष्य भगवान् से कहता है कि "हे नाथ ! मैं आपका हूं, आप मेरे हो" तो इसे सुनकर भगवान् बड़े प्रसन्न होते हैं । यह भीतर की मार्मिक बात है । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १००* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! संसार पर किसी का भी हक नहीं लगता, पर परमात्मा पर सबका हक लगता है । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९९* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *मनुष्य शरीर से नीचा नहीं गिरना है - इसका नाम धर्म है । धर्म के साथ संबंध कल्याण का होना चाहिए, सुख का नहीं ।* *सुख के लिए धर्म का पालन नहीं किया जाता । धर्म का पालन मनुष्यता है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९८* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! तत्वज्ञान होने के बाद महापुरुष अपनी आयु दूसरे को दे सकता है । दूसरे को संपत्ति देने का अधिकार बालिग को होता है । नाबालिग को नहीं । जब तक तत्व ज्ञान न हो तब तक सब नाबालिग हैं । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९६* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *प्रेम की प्राप्ति में युक्ति काम नहीं करती, लगन काम करती है* । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९६* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! जिस वस्तु की सत्ता है, उसे लेते नहीं और जिस वस्तु की सत्ता नहीं है, उसे लेना चाहते हैं - यह समस्या है । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *भगवान् श्वास से भी सस्ते हैं ! श्वास भी लेने पड़ते हैं, पर भगवान् लेने नहीं पड़ते ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित  स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *भगवान् के साथ किसी भी तरह जोड़ा गया संबंध सदा कल्याण करने वाला ही होता है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९५* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! भगवान् से प्रार्थना करने पर भी संकल्प - विकल्प न मिटे तो इसमें हमारे विश्वास की कमी है । वास्तव में मिटे या न मिटे, हमें क्या मतलब ? भगवान् को कहकर निश्चिंत हो जाओ । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *क्रिया, चिंतन और स्थिरता से अलग होकर चुप हो जाओ, तब अनुभव हो जायेगा, नहीं तो बातें सीख जाओगे । मुझे तो सबसे बढ़िया बात यह लगती है कि "हे नाथ ! हे मेरे नाथ !" कहते रहो ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९४* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! भोगी की कभी पूर्ति नहीं होती और त्यागी को कभी कमी नहीं होती । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ९३* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!! ' भगवत् कृपा ही जिनकी प्राप्ति का कारण है, वे मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व (मुक्ति की इच्छा) और महापुरुषों का संग - ये तीनों ही दुर्लभ हैं ।' *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८९* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

*🍁 श्रद्धेय स्वामी शरणानन्दजी महाराज* ज्ञानपूर्वक अनुभव करें कि *सृष्‍टि में मेरा कुछ नहीं है!* सृष्‍टि से सम्बन्ध तोड़ने की प्रेरणा और परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने की प्रेरणा स्वधर्म देता है! *स्वधर्म का मतलब है, स्व का धर्म!* श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि सर्वधर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा!

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! परिस्थिति का सदुपयोग करें, उसे बदलने की चेष्टा न करें । परिस्थिति को बदल तो नहीं सकते, पर सदुपयोग कर सकते हैं । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ८७* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏