fa
Feedback

فریب کلاهبرداران را نخورید! تل‌متریو این کانال‌ها را شناسایی و برچسب‌گذاری می‌کند 👉 برای مشاهده برچسب، اشتراک تهیه کنید

I.A.S.(हिंदी माध्यम)

I.A.S.(हिंदी माध्यम)

رفتن به کانال در Telegram

🚩 Channel was restricted by Telegram

نمایش بیشتر
الهند187 457دسته بندی مشخص نشده است
2 554
مشترکین
اطلاعاتی وجود ندارد24 ساعت
اطلاعاتی وجود ندارد7 روز
اطلاعاتی وجود ندارد30 روز
آرشیو پست ها
Current Affairs Quiz 19 May 2020 दैनिक सामान्य ज्ञान क्विज https://www.simplifiedshiksha.com/current-affairs-quiz-19-may/
Current Affairs Quiz 19 May 2020 दैनिक सामान्य ज्ञान क्विज https://www.simplifiedshiksha.com/current-affairs-quiz-19-may/

The Hindu Delhi 19.05.2020.pdf11.39 MB

बिज़नेस_स्टैंडर्ड_दिल्ली_19_5.pdf2.26 MB

हिन्दुस्तान दिल्ली 19--5.pdf9.85 MB

नवभारत_टाइम्स_दिल्ली_19_5.pdf7.55 MB

Indian Express Jaipur 19--5.pdf4.40 MB

Indian Express Delhi 19--5.pdf5.79 MB

पायोनिर दिल्ली 19--5.pdf1.55 MB

हरिभूमि दिल्ली 19--5.pdf2.47 MB

राष्ट्रीय जागरण 19--5.pdf9.25 MB

जनसत्ता दिल्ली 19--5.pdf1.45 MB

sticker.webp0.46 KB

" सामयिकी :- कोरोना वायरस सक्रमंण पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल वैद्य चतुर्वेदी। से आकाशवाणी सवांददाता सिद्बार्थ सिंह की बातचीत"

जनवरी 2017 में डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद अफगान नीति के संदर्भ में प्रमुख फोकस अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी पर रहा, जिसे मार्च 2020 में अमेरिकी-तालिबान समझौते में मूर्त रूप दिया गया। इस समझौते का सफल क्रियान्वयन अफगानिस्तान में राजनैतिक गतिरोध की समाप्ति पर टिका है। शक्ति-साझाकरण समझौते के प्रमुख बिंदु इस समझौते के तहत अशरफ गनी राष्ट्रपति बने रहेंगे जबकि अब्दुल्ला अब्दुल्ला सुलह के लिये गठित राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (High Council of National Reconciliation) के प्रमुख होंगे। अब्दुल्ला के पास आंतरिक, आर्थिक, न्याय, श्रम और सोशल अफेयर्स के मंत्रालय रहेंगे। अब्दुल्ला अब्दुल्ला, अफगानिस्तान में अशरफ गनी प्रशासन को सरकार चलाने में अपना पूर्ण समर्थन प्रदान करेंगे। अमेरिका और तालिबान की शांति वार्ता को तय मुकाम तक पहुँचाने के लिये अफगानिस्तान में सियासी गतिरोध दूर करने के लिये यह समझौता बेहद ज़रूरी था। अमेरिका के लिये क्यों जरूरी है यह समझौता? अमेरिका में वर्ष 2020 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में सुरक्षा बलों की वापसी एक बड़ा मुद्दा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछले चुनाव प्रचार में दो दशकों से अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी सेना की वापसी को बड़े मुद्दे के रूप में प्रचारित किया था। पहली बार राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप अमेरिकी सैनिकों की वापसी का वादा अभी तक पूरा नहीं कर पाए थे। अब अमेरिका-तालिबान समझौते के बाद अमेरिकी सैनिकों की वापसी के मुद्दे से ट्रंप को राष्ट्रपति पद के चुनाव में फायदा हो सकता है। लेकिन, अफगानिस्तान में राजनैतिक गतिरोध के कारण अमेरिका-तालिबान समझौता मूर्त रूप नहीं ले पा रहा था। अफगानिस्तान में शक्ति-साझाकरण समझौते से राजनीतिक गतिरोध समाप्त हो गया है, जिससे अब अमेरिका-तालिबान समझौते के अपने मुकाम तक पहुँचने की पूरी संभावना है। भारत की अफगान नीति में बदलाव क्यों? भारत हमेशा से तालिबान शासन का विरोध करता रहा है, भारत का सदैव यह दृष्टिकोण रहा है कि वह तालिबान से संबंधित किसी प्रत्यक्ष वार्ता में संलग्न नहीं होगा। हालाँकि वर्ष 2018 में भारत ने मास्को में तालिबान के साथ आयोजित वार्ता में शामिल होने के लिये गैर-आधिकारिक स्तर पर अपने दो सेवानिवृत्त राजनयिकों को भेजा था। मार्च 2020 में अमेरिकी-तालिबान समझौते का भारत ने न केवल पूर्ण समर्थन किया बल्कि इस समझौते में भारत के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे, जो तालिबान के प्रति भारत के बदले रूख को दर्शाता है। कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत का तालिबान के साथ खुला संपर्क होना चाहिये क्योंकि तालिबान भी अब अफगानिस्तान की राजनीतिक प्रक्रिया का एक अंग बन गया है। भारत को तालिबान से प्रत्यक्ष रूप से वार्ता कर आतंकवाद जैसे विषयों को उसके समक्ष उठाना चाहिये। अफगानिस्तान से अमेरिकी सुरक्षा बलों की वापसी के बाद उत्पन्न हुए शून्य को भरने के लिये भारत को तालिबान की आवश्यकता पड़ेगी, इसलिये भारत को संबंध सुधार की दिशा में पहल करना चाहिये। अमेरिका-तालिबान समझौते में पाकिस्तान एक प्रमुख भागीदार है। अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद पाकिस्तान, तालिबान का प्रयोग भारत के विरुद्ध कर सकता है। ऐसे में भारत को व्यक्तिगत तौर पर तालिबान से संबंध स्थापित करना चाहिये। भारत को वैश्विक महामारी COVID-19 के दौर में सुधारात्मक कूटनीतिक कार्रवाई करने की आवश्यकता है। भारत को तालिबान और देश के सभी राजनीतिक समूहों के साथ खुलकर बात करना शुरू करना चाहिये। भारत के लिये अफगानिस्तान का महत्त्व अफगानिस्तान एशिया के चौराहे पर स्थित होने के कारण रणनीतिक महत्त्व रखता है क्योंकि यह दक्षिण एशिया को मध्य एशिया और मध्य एशिया को पश्चिम एशिया से जोड़ता है। भारत का संपर्क ईरान, अज़रबैजान, तुर्कमेनिस्तान तथा उज़्बेकिस्तान के साथ अफगानिस्तान के माध्यम से होता है। इसलिये अफगानिस्तान भारत के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अफगानिस्तान भू-रणनीतिक दृष्टि से भी भारत के लिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और मध्य एशिया के बीच स्थित है जो व्यापार की सुविधा भी प्रदान करता है। यह देश रणनीतिक रूप से तेल और गैस से समृद्ध मध्य-पूर्व और मध्य एशिया में स्थित है जो इसे एक महत्त्वपूर्ण भू-स्थानिक स्थिति प्रदान करता है। अफगानिस्तान पाइपलाइन मार्गों के लिये महत्त्वपूर्ण स्थान बन जाता है। साथ ही अफगानिस्तान कीमती धातुओं और खनिजों जैसे प्राकृतिक संसाधनों से भी समृद्ध है। आगे की राह अमेरिका और तालिबान के मध्य शांति वार्ता के परिणामस्वरूप अमेरिकी सेना की वापसी से अफगानिस्तान पर एक बार फिर से तालिबान का वर्चस्व स्थापित हो सकता है, ऐसे में भारत को लगातार तालिबान के साथ वार्ता करनी चाहिये ताकि पाकिस्तान अपने लाभ के लिये तालिबान का प्रयोग भारत के खिलाफ न कर सके।