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चीन में वर्ष 1980 के दशक में जब पूंजीवादी आधुनिकीकरण की शुरुआत हुई तो तमाम तरह के सुधारों को संस्थागत रूप दिया गया। जिनमें जीवन भर के लिये रोज़गार के प्रावधान, केंद्रीयकृत वेतन-भत्ता निर्धारण व्यवस्था तथा प्रबंधकीय कर्मियों की नियुक्ति और प्रोन्नति की प्रणाली को समाप्त करना शामिल था। जिससे चीन में औद्योगिक गतिविधियों में तेज़ी आई। उत्पादन बढ़ने के साथ ही चीन को विदेशी निवेश प्राप्त हुआ और उदारीकृत श्रम सुधारों के द्वारा चीन शीघ्र ही विनिर्माण का केंद्र बनकर उभरा।
आगे की राह
वर्तमान स्थितियों को ध्यान में रखते हुए आर्थिक गतिविधियों को प्रारंभ करना आपूर्ति श्रृंखला को निर्बाध रूप से चलाए रखने के लिये आवश्यक है, इसलिये उदारीकृत श्रम सुधारों की आवश्यकता है।
श्रम सुधारों के ज़रिये ही विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया जा सकता है, जो इस समय रोज़गार सृजन के लिये अतिआवश्यक है।
सरकार को श्रम कानूनों में सुधार करते समय मजदूरों के हितों को भी ध्यान में रखना चाहिये ताकि उन पर इन सुधारों का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
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वैश्विक महामारी के प्रभाव से अर्थव्यवस्था को उबारने के लिये किये जा रहे श्रम सुधारों का मूल्यांकन
भारत में कई वर्षों से श्रम क्षेत्र में सुधारों की मांग की जाती रही है, ये मांग न सिर्फ उद्योगों की ओर से बल्कि समय-समय पर श्रमिक संगठनों की ओर से भी की जाती रही है। किंतु विभिन्न हितधारकों के हितों को एक साथ संबोधित करना संभव नहीं हो पाने के कारण श्रम सुधार उपेक्षित ही रहे हैं। भारत में व्यवसाय को सुगम बनाने तथा विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिये भी श्रम सुधारों को ज़रुरी माना जाता है। उदारवादी आर्थिक विशेषज्ञ भी श्रम सुधारों के पैरोकार रहे हैं। कई आर्थिक जानकारों का तो यहाँ तक मानना रहा है कि श्रम कानूनों के कठोर नियमों की वजह से ही न सिर्फ औद्योगिक उत्पादन पर विपरीत असर पड़ा है बल्कि विदेशी कंपनियाँ भी भारत में निवेश करने में संकोच कर रही हैं।
अर्थव्यवस्था में इन सुधारों के मांग के क्रम में ही कोरोना वायरस के प्रसार ने व्यापक प्रभाव डाला है। वर्तमान में आर्थिक गतिविधियाँ पूरी तरह से बंद हैं। इस समय जहाँ उद्योगों के समक्ष कार्य संचालन की समस्या है तो वहीं श्रमिकों के समक्ष रोज़गार का संकट है। ऐसी स्थिति में सरकार उद्योगों का कार्य संचालन प्रारंभ करना चाहती है परंतु तमाम उद्योगपति जटिल श्रम कानूनों के कारण उद्योगों को प्रारंभ करने में सशंकित हैं। ऐसे में कई राज्यों द्वारा किये जा रहे श्रम कानूनों में बदलाव अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से सकारात्मक कदम साबित हो सकते हैं।
इस आलेख में श्रम कानून, उनमें परिवर्तन की आवश्यकता, भारत में श्रम बाज़ार की समस्या तथा अन्य देशों के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा।
श्रम कानूनों से तात्पर्य
श्रम अधिनियम या श्रम कानून किसी राज्य द्वारा निर्मित उन कानूनों को कहते हैं जो श्रमिक (कार्मिकों), रोजगार प्रदाताओं, ट्रेड यूनियनों तथा सरकार के बीच संबंधों को परिभाषित करती हैं। श्रमिक, समाज के विशिष्ट समूह होते हैं। इस कारण श्रमिकों के लिये बनाए गये विधान, सामाजिक विधान की एक अलग श्रेणी में आते हैं।
पृष्ठभूमि
कोरोनो वायरस के प्रसार को रोकने के लिये जारी लॉकडाउन के बीच उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात सहित कई राज्यों ने अध्यादेशों या कार्यकारी आदेशों के माध्यम से श्रम कानूनों में परिवर्तन की नींव रखी है।
विदित है कि ‘श्रम’ भारत के संविधान के अंतर्गत समवर्ती सूची का एक विषय है। राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित कानूनों को लागू कर सकते हैं, लेकिन उन्हें केंद्र सरकार की मंज़ूरी की आवश्यकता होगी।
राज्य सरकारों द्वारा किये गए परिवर्तन
उत्तर प्रदेश सरकार ने अगले तीन वर्षों के लिये कुछ प्रमुख श्रम कानूनों को छोड़कर लगभग 35 श्रम कानूनों के प्रावधानों से व्यवसायों को छूट देने वाले अध्यादेश को मंज़ूरी दे दी है।
औद्योगिक विवादों, व्यावसायिक सुरक्षा, श्रमिकों के स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति, ट्रेड यूनियनों, अनुबंध श्रमिकों और प्रवासी मज़दूरों से संबंधित श्रम कानूनों के प्रावधान निर्धारित समय के लिये प्रचलन में नहीं रहेंगे।
हालाँकि, बंधुआ मज़दूरी, बच्चों व महिलाओं के नियोजन संबधित श्रम अधिनियम और वेतन संदाय अधिनियम से संबंधित कानूनों में कोई छूट नहीं दी जाएगी।
उत्तर प्रदेश सरकार ने उद्योगों को शुरू करने के लिये ली जाने वाली अनापत्ति प्रमाणपत्र (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) ऑटोमोड पर करने की तैयारी की है। इसके तहत अब व्यापारियों को उद्योग शुरू करने के लिये विभागों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
उत्तर प्रदेश सरकार ने 90 लाख रोज़गार सृज़न के लिये ‘एक जिला एक उत्पाद’ योजना को बढ़ावा देने का प्रस्ताव रखा है।
मध्यम, सूक्ष्म तथा लघु उद्योगों को स्थापित करने के लिये राज्य सरकार द्वारा ऋण देने की भी व्यवस्था की जा रही है।
श्रम कानूनों में मौज़ूदा परिवर्तन पुराने कारोबार तथा राज्य में स्थापित किये जा रहे नए कारखानों पर लागू होगा।
इसी प्रकार मध्य प्रदेश सरकार ने भी अगले 1000 दिनों के लिये कई श्रम कानूनों को निलंबित कर दिया है। इनमें कुछ महत्त्वपूर्ण संशोधन इस प्रकार हैं:नियोक्ता कर्मचारियों की सहमति से कारखानों में काम की अवधि 8 से 12 घंटे तक बढ़ा सकते हैं। सप्ताह में ओवरटाइम की अवधि अधिकतम 72 घंटे तक सुनिश्चित की जाएगी।
कारखानों का पंजीकरण 30 दिनों के बजाय अब एक दिन में किया जाएगा। इसके साथ ही लाइसेंस का नवीनीकारण अब प्रतिवर्ष करने के स्थान पर 10 वर्षों बाद किया जाएगा। उपर्युक्त प्रावधान का अनुपालन नहीं करने वाले अधिकारियों पर जुर्माने का भी प्रावधान है।
औद्योगिक इकाइयों को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधिकांश प्रावधानों से छूट दी जाएगी। जैसे- संगठन अपनी सुविधानुसार श्रमिकों को सेवा में रखने में सक्षम होंगे तथा श्रम विभाग या श्रम न्यायालय, उद्योगों द्वारा की गई कार्रवाई में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
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चैंपियंस’ पोर्टल
एक बड़ी पहल के रूप में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (Ministry of Micro, Small and Medium Enterprises) ने ‘चैंपियंस’ पोर्टल शुरु किया है। यह प्रौद्योगिकी आधारित एक प्रबंधन सूचना प्रणाली है जिसका उद्देश्य MSME क्षेत्र को राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर सक्षम बनाने,आवश्यक गुणवत्ता प्राप्त करने और प्रशासनिक बाधाओं को दूर करने में मदद करना है। इस पोर्टल के माध्यम से MSME क्षेत्र से संबंधित समस्त जानकारियाँ एक स्थान पर उपलब्ध कराई गई हैं। यह एक नियंत्रण कक्ष-सह-प्रबंधन सूचना प्रणाली (Control Room-cum-Management Information System) है जिसे टेलीफोन, इंटरनेट और वीडियो कॉन्फ्रेंस जैसी सूचना व संचार तकनीकों (ICT) के अलावा, आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और मशीन लर्निंग द्वारा सक्षम बनाया गया है। इसे भारत सरकार की मुख्य केंद्रीयकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली और MSME मंत्रालय की अन्य वेब प्रणालियों के साथ सीधे जोडा गया है। इस पूरी प्रणाली को बिना किसी लागत के NIC की मदद से स्वदेशी तकनीक से विकसित किया गया है। इस नियंत्रण प्रणाली के हिस्से के रूप में अब तक, 66 राज्यों में स्थानीय स्तर के नियंत्रण कक्ष बनाए जा चुके हैं। उल्लेखनीय है कि इस नियंत्रण प्रणाली के हिस्से के रूप में अब तक 66 राज्यों में स्थानीय स्तर के नियंत्रण कक्ष बनाए जा चुके हैं
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भरोसा’ हेल्पलाइन
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ने एक आभासी मंच के माध्यम से ओडिशा केंद्रीय विश्वविद्यालय (Central University of Odisha-COU) के ‘भरोसा’ नामक एक हेल्पलाइन नंबर (08046801010) का शुभारंभ किया है, जिसका उद्देश्य COVID-19 महामारी के कठिन समय के दौरान छात्र समुदाय की परेशानियों को दूर करना है। इस हेल्पलाइन का उद्देश्य ओडिशा के सभी विश्वविद्यालयों के छात्रों को लॉकडाउन महामारी के दौरान मानसिक और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करना है। उल्लेखनीय है कि मौजूदा दौर में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति चिंता करना काफी आवश्यक है और ओडिशा केंद्रीय विश्वविद्यालय (COU) द्वारा शुरू की गई यह हेल्पलाइन इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। मानव संसाधन विकास मंत्री ने देश भर के केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों तथा अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों से भी ‘भरोसा’ पहल का अनुकरण करने का आग्रह किया। ओडिशा केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आई. रामब्रह्मम के अनुसार, ‘भरोसा’ हेल्पलाइन ओडिशा के किसी भी विश्वविद्यालय के छात्रों की चिंताओं का निदान कर सकती है और परियोजना के प्रायोगिक चरण में 400 कॉलें आई थीं। इस अवसर पर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री ने छात्रों के सुरक्षित भविष्य के लिये मानव संसाधन विकास मंत्रालय के प्रयासों को रेखांकित करते हुए नए शैक्षणिक कैलेंडर और शिक्षा की आभासी प्रणाली के संबंध में उठाए गए कदमों पर बल दिया।
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गुजरात में राज्य-संचालित कृषि उपज बाज़ार समितियों (Agricultural Produce Market Committees-APMCs) के ‘एकाधिकार’ को समाप्त करते हुए राज्य सरकार ने गुजरात कृषि उपज बाज़ार (संशोधन) अध्यादेश, 2020 को मंज़ूरी दे दी है।
प्रमुख बिंदु
ध्यातव्य है कि इस अध्यादेश के माध्यम से निजी संस्थाओं को अपनी बाज़ार समितियाँ स्थापित करने की अनुमति प्राप्त होगी, जो किसानों को उनकी उपज के लिये सर्वोत्तम संभव पारिश्रमिक पेश कर सकेंगी।
गुजरात सरकार का यह अध्यादेश बाज़ार समितियों के अधिकार क्षेत्र को उनकी भौतिक सीमाओं तक सीमित करता है।
अब तक एक विशेष तालुका के किसानों को अपनी उपज को अपने संबंधित APMCs को ही बेचना पड़ता था। यहाँ तक कि व्यापारी भी अपने स्वयं के तालुकों तक ही सीमित थे। APMCs द्वारा अपने क्षेत्राधिकार और उससे बाहर होने वाले सभी लेन-देन पर उपकर लगाया जाता था
गत वित्तीय वर्ष में गुजरात के 24 APMCs ने मिलकर 35,000 करोड़ रुपए का लेनदेन किया और लेनदेन पर उपकर (0.5 प्रतिशत लेनदेन) के रूप में 350 करोड़ रुपए कमाए थे।
विश्लेषण के अनुसार, उपकर के माध्यम से अर्जित किया गया अधिकांश लाभ ऐसे लेन-देनों से प्राप्त हुआ था, जो APMCs की भौतिक सीमा से बाहर किये गए थे।
नए नियमों के अनुसार, अब APMCs केवल उन लेन-देनों पर उपकर लगा सकती हैं जो उनकी सीमाओं के भीतर होते हैं।
नियमों के अनुसार, किसी भी निजी संस्था के स्वामित्त्व वाले कोल्ड स्टोरेज या गोदाम को निजी बाज़ार में परिवर्तित किया जा सकता है, जो कि मौजूदा APMCs के साथ प्रतिस्पर्द्धा कर सकते हैं और किसानों को सर्वोत्तम मूल्य प्रदान कर सकते हैं।
इस अध्यादेश के तहत व्यापारियों को एक ‘एकीकृत एकल व्यापार लाइसेंस’ (Unified Single Trading Licence) भी प्रदान करने की व्यवस्था की गई है, जिसके माध्यम से वे राज्य में कहीं भी व्यापारिक गतिविधियों में भाग ले सकते हैं।
महत्त्व
उल्लेखनीय है कि कई किसान निकायों ने राज्य के इस निर्णय का स्वागत किया है, क्योंकि इससे किसानों को उनकी उपज की गुणवत्ता के आधार पर उचित मूल्य प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
अध्यादेश के माध्यम से जो आमूलचूल परिवर्तन किये गए हैं, वे न केवल APMCs को अधिक प्रतिस्पर्द्धी बनाएंगे, बल्कि राज्य संचालित APMCs के एकाधिकार को समाप्त करके एक बड़ा परिवर्तन लाएंगे।
अब किसानों को केवल एक विशेष APMCs को अपना माल बेचने के लिये बाध्य नहीं होना पड़ेगा, जिससे किसानों को अपनी उपज का सही मूल्य प्राप्त हो सकेगा।
यह अध्यादेश राज्य में APMCs के एकाधिकार को समाप्त कर देगा जो एक संघ बनाकर यह तय करते थे कि किसानों को उपज की क्या कीमतें प्रदान की जाए।
कृषि उपज बाज़ार समिति
(Agricultural Produce Market Committees-APMCs)
कृषि उपज बाज़ार समिति (Agricultural Produce Market Committees-APMCs) एक राज्य सरकार द्वारा गठित एक वैधानिक बाज़ार समिति होती है, जिसे कुछ अधिसूचित कृषि, बागवानी अथवा पशुधन उत्पादों में व्यापार के संबंध में गठित किया जाता है।
उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान के तहत कृषि विपणन राज्य सूची का विषय है। इसीलिये कृषि बाज़ार अधिकांशतः राज्य APMC अधिनियमों के तहत स्थापित और विनियमित किये जाते हैं। इसीलिये कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने-अपने कानून अधिनियमित किये हुए हैं।
APMCs के प्रमुख कार्य
मूल्य निर्धारण प्रणाली और बाज़ार क्षेत्र में होने वाले लेन-देन में पारदर्शिता सुनिश्चित करना;
यह सुनिश्चित करना कि किसानों को उनकी उपज का भुगतान उसी दिन प्राप्त हो;
कृषि प्रसंस्करण को बढ़ावा देना;
बिक्री के लिये बाज़ार क्षेत्र में लाए गए कृषि उपज और उनकी दरों पर से संबंधित आँकड़ों को सार्वजनिक करना;
कृषि बाजारों के प्रबंधन में सार्वजनिक निजी भागीदारी को बढ़ावा देना।
आगे की राह
उल्लेखनीय है कि छोटे APMCs को अनुचित प्रतिस्पर्द्धा से बचाना इस संबंध में एक बड़ा मुद्दा, जिससे इस अध्यादेश में संबोधित नहीं किया गया है, हालाँकि सरकार आगामी दिनों में एक ऐसा नियम लाने की योजना बना रही है जो मौजूदा APMCs के पाँच किलोमीटर के दायरे में एक निजी बाज़ार की स्थापना की अनुमति नहीं देगा।
राज्य सरकार का यह निर्णय एक परिवर्तनकारी कदम है, हालाँकि इससे राज्य के APMCs के राजस्व पर काफी प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि APMCs अपने राजस्व का एक विशिष्ट हिस्सा उनकी भौतिक सीमा से बाहर होने वाले लेनदेनों पर उपकर लगाकर प्राप्त करती हैं।
आवश्यक है कि इस निर्णय को पूर्ण रूप से लागू करने से पूर्व राज्य संचालित APMCs को विश्वास में लिया जाए और उनके विभिन्न मुद्दों को हल किया जाए।
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नवगठित जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में 4G इंटरनेट सेवाओं की बहाली की अपील को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि क्षेत्र विशिष्ट की ‘विशेष परिस्थितियों’ के मद्देनज़र आवश्यक है कि ‘राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं’ और ‘मानवाधिकारों’ के मध्य यथोचित संतुलन स्थापित किया जाए।
प्रमुख बिंदु
सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि ‘विदेशी ताकतें सीमाओं पर घुसपैठ करने और राष्ट्र की अखंडता को अस्थिर करने की पूरी कोशिश कर रही हैं, जिसके कारण मानवाधिकारों और राष्ट्रीय सुरक्षा के मध्य संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।’
इसी के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को इस संबंध में सभी मुद्दों की जाँच करने के लिये एक ‘विशेष समिति’ का गठन करने का भी आदेश दिया है।
पृष्ठभूमि
उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर के कई संस्थानों ने प्रदेश में 4G इंटरनेट के अभाव में प्रभावी ढंग से कार्य करने में आ रही समस्याओं के मद्देनज़र न्यायालय में याचिका दायर की थी।
एक याचिकाकर्त्ता ‘फाउंडेशन ऑफ मीडिया प्रोफेशनल्स’ के अनुसार, डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और मीडियाकर्मियों के लिये 4G इंटरनेट स्पीड के अभाव में सही ढंग से कार्य करना अपेक्षाकृत काफी मुश्किल हो रहा है।
याचिकाकर्त्ता के अनुसार, जब इस संबंध में याचिका दायर की गई थी, तो प्रदेश में कोरोनावायरस (COVID-19) संक्रमण के मात्र 33 मामले थे, किंतु अब COVID-19 संक्रमण के मामले 700 से भी पार जा चुके हैं।
‘फाउंडेशन ऑफ मीडिया प्रोफेशनल्स’ के अनुसार, COVID-19 से संबंधित नवीनतम अपडेट प्राप्त करने और रोगियों को ऑनलाइन परामर्श देने में उच्च स्पीड इंटरनेट की आवश्यकता होती है, किंतु 4G इंटरनेट के अभाव में ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है।
एक अन्य याचिकाकर्त्ता के रूप में ‘J&K प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन’ ने कहा कि प्रदेश में 4G इंटरनेट पर प्रतिबंध के कारण बच्चों की ऑनलाइन शिक्षा काफी हद तक प्रभावित हो रही है।
याचिकाकर्त्ताओं ने कहा कि इस प्रकार के प्रतिबंधों से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुराधा भसीन बनाम भारत सरकार मामले में दिये गए तर्कशीलता और आनुपातिकता के सिद्धांतों का उल्लंघन हो रहा है।
अनुराधा भसीन बनाम भारत सरकार
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने बीते वर्ष अगस्त माह में अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया था और इसी के साथ राज्य का विभाजन दो केंद्रशासित क्षेत्रों- जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के रूप में कर दिया गया था।
इसके पश्चात् जम्मू-कश्मीर में तकरीबन 5 महीनों तक इंटरनेट ब्लैक आउट देखा गया अर्थात् इस अवधि में जम्मू-कश्मीर के नागरिकों की इंटरनेट तक पहुँच नहीं थी।
अनुच्छेद 370 की समाप्ति के तकरीबन 5 महीने बाद अनुराधा भसीन बनाम भारत सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के आधार पर मोबाइल उपयोगकर्त्ताओं के लिये 2G इंटरनेट को आंशिक रूप से बहाल कर दिया गया।
इस मामले की सुनवाई में न्यायालय ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में इंटरनेट के अनिश्चितकालीन निलंबन ‘की अनुमति नहीं है और इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाते समय अनुच्छेद 19(2) के तहत आनुपातिकता के सिद्धांतों का पालन किया जाना आवश्यक है।
विशेष समिति का गठन
जस्टिस एन. वी. रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बी. आर. गवई की न्यायपीठ ने केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में एक विशेष समिति के गठन का आदेश दिया, जो कि जम्मू-कश्मीर में 2G मोबाइल इंटरनेट के प्रतिबंध के विस्तार की जाँच करेगी।
उल्लेखनीय है कि इस समिति में संचार विभाग के सचिव और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव भी शामिल होंगे।
न्यायालय ने समिति से कहा कि वह याचिकाकर्त्ताओं और उत्तरदाताओं द्वारा प्रस्तुत किये गए विभिन्न तर्कों और उपलब्ध कराई गई विभिन्न सामग्रियों की जाँच करे।
इसके अतिरिक्त समिति को याचिकाकर्त्ताओं द्वारा सुझाए गए वैकल्पिक उपायों की समीक्षा करने का कार्य भी सौंपा गया है।
उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्त्ताओं ने सुझाव दिया था कि उन क्षेत्रों में, जहाँ आवश्यक है, इंटरनेट पर प्रतिबंधों को सीमित कर दिया जाए और कुछ क्षेत्रों में परीक्षण के आधार पर उच्च स्पीड इंटरनेट (जैसे 3G और 4G) की अनुमति दी जाए।
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29वाँ राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस
29th National Technology Day
भारत ने 11 मई, 2020 को अपना 29वाँ राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस (National Technology Day) मनाया।
इस दिवस को पहली बार 11 मई, 1999 को मनाया गया था।
उद्देश्य:
इसका उद्देश्य भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपलब्धियों का स्मरण करना है।
प्रमुख बिंदु:
इस दिवस को शुरु कराने में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अहम भूमिका थी।
प्रत्येक वर्ष इस दिन को ‘टेक्नोलॉजी डवलपमेंट बोर्ड ऑफ इंडिया’ (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत एक सांविधिक निकाय) भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में योगदान के लिये व्यक्तियों को राष्ट्रीय पुरस्कार देकर सम्मानित करने के रूप में मनाता है।
इस वर्ष का मुख्य फोकस ‘विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के माध्यम से अर्थव्यवस्था को रिबूट करना’ है।
महत्त्व:
यह वह दिन है जब भारत ने 11 मई, 1998 को पोखरण में परमाणु बमों का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था।
भारत ने पोखरण-2 जिसे ‘ऑपरेशन शक्ति’ (Operation Shakti) भी कहा जाता है, नामक ऑपरेशन में ‘शक्ति-1 परमाणु मिसाइल’ का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था।
यह मई 1974 में पोखरण-I के ‘ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा’ के बाद दूसरा परीक्षण था।
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गोपाल कृष्ण गोखले की 154वीं जयंती
154th Birth Anniversary of Gopal Krishna Gokhale
09 मई, 2020 को देशभर में स्वतंत्रता सेनानी गोपाल कृष्ण गोखले (Gopal Krishna Gokhale) की 154वीं जयंती मनाई गई।
प्रमुख बिंदु:
गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक भारतीय उदारवादी राजनीतिक नेता एवं समाज सुधारक थे।
गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई, 1866 को महाराष्ट्र (तब बंबई प्रेसीडेंसी का हिस्सा) के रत्नागिरी ज़िले में हुआ था।
गोखले ने वर्ष 1884 में मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज से स्नातक किया। अंग्रेजी शिक्षा ने उन्हें पश्चिमी राजनीतिक विचारों से अवगत कराया परिणामतः वे ‘जॉन स्टुअर्ट मिल’ और एडमंड बर्क जैसे सिद्धांतकारों के महान प्रशंसक बन गए।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका:
गोखले वर्ष 1889 में भारतीय राष्ट्रीय काॅन्ग्रेस के सदस्य बने और एक प्रमुख समाज सुधारक महादेव गोविंद रानाडे के प्रभाव में आए।
वर्ष 1905 में भारतीय राष्ट्रीय काॅन्ग्रेस के बनारस अधिवेशन के लिये गोखले को अध्यक्ष पद के लिये चुना गया था यह वह समय था जब लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में ‘नरमपंथियों’ और ‘अतिवादियों’ के समूह के बीच मतभेद पैदा हो गए। और वर्ष 1907 में काॅन्ग्रेस सूरत अधिवेशन में दोनों गुट अलग हो गए।
वर्ष 1899-1902 के दौरान वह बॉम्बे विधान परिषद के सदस्य थे और वर्ष 1902-1915 तक ‘इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल’ में कार्य किया।
गोखले ने वर्ष 1909 के ‘मार्ले-मिंटो सुधार’ को तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
एक उदार राष्ट्रवादी के रूप में वे महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु थे। महात्मा गांधी ने गोपाल कृष्ण गोखले पर गुजराती भाषा में एक पुस्तक 'धर्मात्मा गोखले' लिखी।
शिक्षा एवं समाज सुधारक के रूप में:
उन्होंने भारतीय शिक्षा के विस्तार के लिये वर्ष 1905 में ‘सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी’ की स्थापना की।
वह महादेव गोविंद रानाडे द्वारा शुरू की गई ‘सार्वजनिक सभा पत्रिका’ से भी जुड़े थे।
वर्ष 1908 में गोखले ने ‘रानाडे इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक्स’ की स्थापना की।
उन्होंने अंग्रेजी साप्ताहिक समाचार पत्र ‘द हितवाद’ शुरू किया।
गोखले की विचारधारा सामाजिक सशक्तीकरण, शिक्षा के विस्तार, भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के लिये प्रतिक्रियावादी या क्रांतिकारी तरीकों के इस्तेमाल को खारिज़ करने पर आधारित थी।
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स्वदेशी आईजीजी एलिसा टेस्ट किट: 'कोविड कवच एलिसा'
पुणे स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर)-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) ने कोविड-19 के एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए स्वदेशी आईजीजी एलिसा टेस्ट 'कोविड कवच एलिसा' को विकसित करते हुए इसे मान्यता दे दी है।
कोविड-19 के लिए भारत में अधिकांश नैदानिक सामग्री का आयात अन्य देशों से किया जाता है। इसलिए, भारतीय वैज्ञानिक कोविड-19 के रोग कारक सार्स-सीओवी-2 के लिए स्वदेशी निदान विकसित करने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं।
पुणे स्थित आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त और वायरोलॉजी अनुसंधान में विशेषज्ञताप्राप्त देश की शीर्ष प्रयोगशाला है। एनआईवी की सक्षम वैज्ञानिक टीम ने भारत में इस रोग की पुष्टि वाले रोगियों में से सार्स-सीओवी-2 वायरस को प्रयोगशाला में सफलतापूर्वक पृथक कर दिया है। इससे सार्स-सीओवी-2 के लिए स्वदेशी निदान का मार्ग प्रशस्त हुआ है। जबकि सार्स-सीओवी-2 के निदान के रियल टाईम आरटी-पीसीआर एक प्रमुख परीक्षण है और जनसंख्या में संक्रमण के अनुपात को समझने के मामले में निगरानी हेतु मजबूत एंटीबॉडी परीक्षण इस दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम हैं।
आईसीएमआर ने एलिसा परीक्षण किट के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए ज़ाइडस कैडिला के साथ भागीदारी की है। पुणे स्थित आईसीएमआर-एनआईवी में विकास के बाद, बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए इस प्रौद्योगिकी को ज़ाइडस कैडिला को स्थानांतरित कर दिया गया है, जो एक नवाचार संचालित वैश्विक स्वास्थ्य सेवा कंपनी है। ज़ाइडस ने एलिसा परीक्षण किटों के अनुमोदन और वाणिज्यिक उत्पादन में तेजी लाने के लिए निरंतर चुनौतिय पूर्ण भमिका निभाई है ताकि इन्हें जल्द से जल्द उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जा सके। इस परीक्षण को "कोविड कवच एलिसा" का नाम दिया गया है। यह रिकॉर्ड समय में "मेक इन इंडिया" का एक आदर्श उदाहरण है।
अफ्रीकी स्वाइन फ्लू (African Swine flu-ASF)
एक तरफ कोरोना संकट से देश जूझ रहा है वहीं उत्तर-पूर्वी राज्य असम में एक नई मुसीबत सामने आई है। यहां अफ्रीकी स्वाइन फ्लू (African Swine flu-ASF) का संक्रमण तेजी से फैल रहा है जिसके चलते पिछले कुछ दिनों में 13 हजार से अधिक सूअरों की मौत हो गई है। इससे पशुपालन में लगे सैकड़ों लोगों की आजीविका प्रभावित हुई है। वहीं आबादी वाले इलाके में सूअर प्रवेश न कर पाएं इसके लिए नहर खोदी गई है।
क्या है अफ्रीकी स्वाइन फ्लू?
वर्ल्ड ऑर्गनाइजेशन फॉर एनिमल हेल्थ के अनुसार अफ्रीकन स्वाइन फ्लू एक गंभीर वायरल बीमारी है जो घरेलू और जंगली सुअरों दोनों को प्रभावित करती है। यह जीवित या मृत सुअर या फिर सुअर के मांस से फैल सकती है। हालांकि यह बीमारी जानवरों से इंसानों में नहीं फैलती है।
पृष्ठभूमि
प्रदेश में पहली बार अफ्रीकन स्वाइन फ्लू का ऐसा मामला सामने आया है। यह एक घातक बीमारी है जो फिलहाल घरेलू सुअरों में ही देखी गई है और इस फ्लू से संक्रमित सुअरों की मृत्यु दर सौ प्रतिशत बताई जा रही है। पहले जांच के लिए नमूने भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान में भेज रहे थे लेकिन अब यह जांच हमारे पशु चिकित्सा महाविद्यालय की लैब में ही की जा रही है। पशु को बीमारी से बचाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के गुवाहाटी स्थितराष्ट्रीय सूअर अनुसंधान केंद्र (NPRC) के साथ मिलकर काम कर रहे है।
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शियान H-20 सुपरसोनिक स्टील्थ बमवर्षक विमान
अमेरिका, भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य देशों के साथ चल रहे तनाव के बीच चीन इस साल अपना सुपरसोनिक रफ्तार से उड़ने वाला अत्याधुनिक बमवर्षक विमान शियान H-20 तैयार कर लेगा। स्टील्थ टेक्नॉलजी की वजह से यह विमान रेडार की पकड़ में नहीं आता है। इस विमान के चीनी एयरफोर्स में शामिल होते ही चीन की मारक क्षमता दोगुना हो जाएगी। चीन के इस बमवर्षक विमान की मदद से 5300 मील (8500 कि.मी. ) तक मार कर सकेगा। चीनी विमान के दायरे में पूरा भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के कुछ इलाके आ जाएंगे।
शियान H-20 के शामिल होते ही चीन अमेरिका और रूस के उस क्लब में शामिल हो जाएगा जो परमाणु बम से लैस मिसाइल हवा, जमीन और समुद्र से दागने में सक्षम हैं। इसके साथ ही चीन का न्यूक्लियर ट्रायड पूरा हो जाएगा। इस साल नवंबर महीने में होने जा रहे झुहाई एयरशो में इस बमवर्षक विमान को पेश करने जा रहा है।
शियान H-20 की क्या है विशेषता?
चीन का शियान H-20 बमवर्षक विमान अमेरिका के बी-2 या बी-21 की नकल है।
यह विमान परमाणु और परंपरागत मिसाइलों से लैस है।
इस विमान पर हाइपरसोनिक मिसाइलें भी लगी हुई हैं।
इस विमान से 5300 मील के दायरे में कहीं भी परमाणु बम गिराया जा सकता है।
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श्रम कानूनों पर छूट से ट्रेड यूनियन द्वारा अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ में जाने की तैयारी
लॉकडाउन के बाद अहिस्सा-अहिस्ता देश को पटरी पर लाने की कवायद चल रही है। लॉकडाउन के बाद कंपनियों को नुकसान पहुंचा है। इसको देखते हुए यूपी सरकार और मध्य प्रदेश सरकार ने कंपनियों को श्रम कानूनों पर छूट दे दी है। गुजरात समेत कई और राज्य भी ऐसा करने पर विचार कर रहे हैं।
केंद्रीय स्तर की दस ट्रेड यूनियनों फैसला किया है कि वो अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ के सामने गुहार लगाएंगी। केंद्रीय स्तर की दस ट्रेड यूनियनों कहा कि वे कुछ राज्यों में प्रमुख श्रम कानूनों को निलंबित करने के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ (आईएलओ) से संपर्क करने पर विचार कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार ने कंपनियों को कई प्रमुख श्रम कानूनों से छूट दे दी है। खबरों के अनुसार, गुजरात समेत कई अन्य राज्य भी ऐसा करने पर विचार कर रहे हैं।
पृष्ठभूमि
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल ने पिछले सप्ताह कारखानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और उद्योगों को तीन श्रम कानूनों तथा एक अन्य कानून के एक प्रावधान को छोड़कर शेष सभी के दायरे से छूट देने के लिये ' उत्तर प्रदेश चुनिंदा श्रम कानूनों से छूटअध्यादेश, 2020’ को मंजूरी दी। ये छूट तीन साल के लिये दिये गये हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने भी कुछ श्रम कानूनों को निलंबित कर दिया है। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने सोमवार को जारी एक संयुक्त बयान में राज्य सरकारों के इन कदमों के विरोध में देशव्यापी आंदोलन का आह्वान करने की भी धमकी दी।
क्यों कर रही है ट्रेड यूनियन विरोध
ट्रेड यूनियनों ने संयुक्त बयान में कहा, 'केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का मानना हैकि ये कदम साथ जुड़ने की स्वतंत्रता के अधिकार (आईएलओ कन्वेंशन 87), सामूहिक सौदेबाजी के अधिकार (आईएलओ कन्वेंशन 98) और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत आठ घंटे के कार्य दिवस के मानदंड का उल्लंघन हैं।’ 'केंद्रीय ट्रेड यूनियन श्रम मानकों के घोर उल्लंघन के लिये सरकार की आईएलओ के पास शिकायत दर्ज करने पर गंभीरता से विचार करने के साथ ही कामगारों से इन कदमों का विरोध करने का आह्वान करते हैं। जल्दी ही राष्ट्रव्यापी विरोध का आह्वान किया जायेगा।’’
क्या है अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)?
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की वर्ष 1919 में वर्साय की संधि द्वारा राष्ट्र संघ की एक संबद्ध एजेंसी के स्थापना की गयी। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) काम की दुनिया के लिए संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी है। यह अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानक तय करती है, काम की जगह पर अधिकारों को प्रोत्साहित करती है और रोजगार के उत्कृष्ट अवसरों के लिए प्रोत्साहित करती है, काम से जुड़े मुद्दों पर संवाद को पुष्ट करना तथा सामाजिक संरक्षण बढ़ाना। आईएलओ का अनूठा त्रिपक्षीय ढांचा है जिसमें सरकारें, नियोक्ता और श्रमिक प्रतिनिधि एकजुट होते हैं।
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दुनिया को सालों तक झेलना होगा कोरोना का प्रकोप: WHO
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की मुख्य वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन कोरोना वायरस के संक्रमण पर मजबूत नियंत्रण बनाए रखने के लिए भारत की तारीफ की है। स्वामीनाथन ने आशंका जताई कि कोरोना वायरस का प्रकोप कई महीनों और संभवतः सालों तक रह सकता है। साथ ही, उम्मीद जताई कि भारत कोविड-19 के लिए वैक्सीन बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।
'सालों तक झेलना पड़ सकता है कोरोना का प्रकोप'
स्वामीनाथन ने आशंका जताई कि कोरोना वायरस के प्रकोप से शायद सालों तक छुटकारा नहीं मिलेगा। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया को 'आने वाले कई महीनों और संभवत: सालों तक' संक्रमण के प्रसार के लिए तैयार रहना होगा। उन्होंने कहा कि सिर्फ दवा विकसित कर लेना और उसका परीक्षण ही काफी नहीं है, बल्कि उसका निर्माण, उसे प्राप्त करना और बड़ी आबादी तक उसे सुलभ कराने के लिये स्वास्थ्य तंत्र का होना भी महत्वपूर्ण है।
ICMR की महानिदेशक रह चुकी हैं सौम्या
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, सोमवार तक कोविड-19 के 39,76,043 मामले थे जबकि इसकी वजह से अब तक 2,77,708 लोगों की जान जा चुकी है। भारत में भी कोविड-19 से 2200 से ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं जबकि 67 हजार से ज्यादा लोग संक्रमित हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद की महानिदेशक रह चुकीं स्वामीनाथन ने कहा कि अत्यधिक आबादी, शहरी इलाकों में अत्यधिक भीड़ और कुछ ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य देखभाल की खराब पहुंच के तौर पर कई चुनौतियां हैं।
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फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन
कश्मीर में हिजबुल मुजाहिद्दीन के मुखिया ने और आंतकी रियाज नायकू के मारे जाने की सफलता के बाद पाकिस्तान में मौजूद इन आतंकी संगठनों के हाथ पांव फूलने लगे हैं। इसका एक सबूत हिजबुल चीफ सैयद सलाहुद्दीन का वो भाषण है जो उसने हाल ही में रावलपिंडी में नायकू को लेकर की गई शोक सभा में दिया था। इसमें उसने उत्तर कश्मीर के रजवार जंगल में सेना के जवानों पर किए हमले की जिम्मेदारी ली थी। दरअसल, पाकिस्तान को लगने लगा है कि भारत कश्मीर में आतंकियों की कमर तोड़ने के साथ पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं और वहां पर मौजूद आतंकी कैंपों को भी खत्म करने के लिए कोई ऑपरेशन को अंजाम दे सकता है।
पृष्ठभूमि
जहां तक उत्तरी कश्मीर में सेना पर हुए हमले की बात है तो आपको यहां पर ये भी बता दें कि काफी समय के बाद कश्मीर में किसी कर्नल रैंक के अंधिकारी की मौत इस तरह के हमलों में हुई है।
उरी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था। पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद भी भारत ने पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक कर कई आतंकी ठिकानों को नष्ट किया था। क्या होता है
क्या है फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन?
आपको बता दें कि फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन उसे कहा जाता है, जहां पर किसी भी ऑपरेशन को अंजाम देने वाले की पहचान को पूरी तरह से छिपाया जाता है। इतना ही नहीं, इस तरह के ऑपरेशन को अंजाम देने वाला यदि पकड़ा जाता है तो उसमें अपनी भूमिका से पूरी तरह से मुंह फेर लिया जाता है। इस तरह के ऑपरेशन को अंजाम देने वालों को इस बात की पूरी जानकारी होती है कि यदि वे पकड़े गए तो सरकार उन्हें किसी तरह से भी स्वीकार नहीं करेगी। इस तरह के ऑपरेशन को कवर्ट ऑपरेशन भी कहा जाता है।
फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन के उदाहरण
अमेरिका में इस तरह के ऑपरेशन को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट 1947 के तहत लाया गया है। 1984 में तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने इस तरह के ऑपरेशन को स्पेशल एक्टिविटी कहते हुए एक आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। अमेरिका में सीआईए इस तरह के ऑपरेशंस को राष्ट्रपति के आदेश पर अंजाम देती है। वहीं, अंडरकवर ऑपरेशन को लॉ इंफोर्समेंट एजेंसियां अंजाम देती हैं।
कवर्ट और क्लेंडस्टाइन ऑपरेशन में बेहद छोटा-सा अंतर है। clandestine क्लेंडस्टाइन कर अर्थ जहां छिपाना या Hidden होता है वहीं covert का अर्थ deniable या मुकरना होता है। इस तरह के ऑपरेशन के इतिहास में कई उदाहरण भी हैं। इनमें से एक Black operations भी है। 2007 में एनबीसी न्यूज और फिर डेली टेलीग्राफ के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने सीआईए को ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए ब्लैक ऑपरेशन चलाने का आदेश दिया था। इसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना था।
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बेंगलुरु सिटी कॉरपोरेशन ने लोगों के श्वसन स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए हाल ही में “प्राणवायु कार्यक्रम” शुरू किया।
मुख्य बिंदु
इस पहल का उद्देश्य लोगों के ऑक्सीजन स्तर को बढ़ाने में मदद करना है। इससे उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी रखने में मदद मिलेगी।
महत्व
गंभीर तीव्र श्वसन बीमारी (SARI) के कारण देश में कई मौतें हुई हैं। विशेष रूप से, COVID-19 के कारण हाइपोक्सिया (ऊतकों में ऑक्सीजन की कमी) होता है।
COVID-19 और सांस लेने में तकलीफ
COVID-19 रासायनिक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से सांस लेने में कठिनाई को उत्तेजित करता है। जब कोई व्यक्ति COVID-19 से संक्रमित होता है, तो वायरस लाल रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन के साथ खुद को जोड़ देता है। यह श्वसन प्रक्रिया में व्यवधान का मुख्य कारण है।
सामान्य श्वसन के दौरान, हीमोग्लोबिन फेफड़ों में हवा के कक्षों से पूरे शरीर में कोशिकाओं तक ऑक्सीजन के वाहक के रूप में कार्य करता है। बदले में वे इन कोशिकाओं से कार्बन डाइऑक्साइड एकत्र करते हैं और इसे फेफड़ों तक ले जाते हैं। COVID-19 हीमोग्लोबिन के कामकाज को अवरुद्ध करता है जो सांस लेने में कठिनाई का कारण बनता है।
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11 मई, 2020 को लगभग 117 मंडियों को ई-एनएएम (राष्ट्रीय कृषि बाजार) के साथ एकीकृत किया गया। इससे देश में मंडियों की संख्या 962 हो गई है।
मुख्य बिंदु
केंद्रीय कृषि मंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मंडियों का शुभारंभ किया। इन ऑनलाइन मंडियों का उपयोग अब नारियल और बांस के व्यापार के लिए भी किया जा रहा है। 9 मई, 2020 तक लगभग 3.43 करोड़ मीट्रिक टन बांस और 37.93 मीट्रिक टन नारियल का कारोबार किया गया है। वर्तमान में, इस मंच के माध्यम से 150 वस्तुओं का कारोबार किया जा रहा है। इसमें तेल के बीज, सब्जियां, फल, फाइबर और खाद्यान्न शामिल हैं। eNAM प्लेटफ़ॉर्म के तहत 1,005 से अधिक किसान उत्पादक संगठन पंजीकृत किए गए हैं।
किसान उत्पादक संगठन
कृषि मंत्रालय ने अप्रैल, 2020 में लॉजिस्टिक्स मॉड्यूल, एफपीओ ट्रेड मॉड्यूल और ईएनडब्ल्यूआर आधारित वेयरहाउस मॉड्यूल लॉन्च किया था। इसने इस प्लेटफार्म के साथ 15 राज्यों के एफपीओ को एकीकृत करने में मदद की।
पृष्ठभूमि
हाल ही में, लगभग 200 मंडियां ई-एनएएम प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत थीं।
e-NAM
E-NAM का प्रबंधन छोटे किसानों के कृषि व्यवसाय कंसोर्टियम (SFAC) द्वारा किया जाता है। यह सभी एपीएमसी (कृषि उपज विपणन समिति) संबंधित गतिविधियों के लिए एकल सेवा प्रदान करता है। वर्तमान में व्यापार के लिए ई-एनएएम के तहत 450 से अधिक एपीएमसी सूचीबद्ध हैं। यह एक ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से संचालित होता है जो राज्य की मंडियों से जुड़ा हुआ है।
e-NAM के कार्य
E-NAM वस्तुओं और व्यापार की जानकारी प्रदान करता है। यह मंच कैशलेस लेनदेन प्रदान करता है। यह मृदा परीक्षण तक पहुंच प्रदान करता है और किसानों को छंटाई और पैकिंग के लिए प्रारंभिक सुविधाएं प्रदान करता है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन, नर्सिंग नाउ कैंपेन और इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ नर्स्स ने स्टेट ऑफ वर्ल्ड नर्सिंग की रिपोर्ट जारी की। संयुक्त राष्ट्र ने 2020 के रूप में नर्स और मिडवाइफ के वर्ष (Year of Nurse and Midwife) के रूप में चिन्हित किया है।
मुख्य बिंदु
विश्व के विभिन्न हिस्सों में प्रति 10,000 लोगों पर 36.9 नर्स हैं। अमेरिका में नर्सों की संख्या अफ्रीका की तुलना में 10 गुना अधिक है। अमेरिका में प्रति 10,000 लोगों पर 83.4 नर्स हैं और अफ्रीका में प्रति 10,000 लोगों पर 8.7 नर्स हैं।
भारत
इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 1.56 मिलियन नर्स हैं। हालांकि, इन नर्सों में, पेशेवर नर्स 67% हैं। हर साल लगभग 322,827 नर्सें ग्रेजुएट हो रही हैं। भारत में चिकित्सा कर्मचारियों में 47% नर्से शामिल हैं। मेडिकल स्टाफ में डॉक्टरों की संख्या 23.3%, दंत चिकित्सकों की संख्या 5.5% और फार्मासिस्टों की संख्या 24.1% है।
आवश्यकता
स्वास्थ्य संकट के दौरान नर्सों की भूमिका सर्वोपरि है। उनकी भूमिका आवश्यक है क्योंकि वे रोगियों के लिए गुणवत्ता देखभाल सुनिश्चित करती हैं, उसके संक्रमण को नियंत्रित करती हैं और इसके प्रसार को रोकती हैं। चिकित्सा क्षेत्र में नर्स के महत्व को रेखांकित करने के लिए 12 मई को अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस मनाया जाता है।
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11 मई, 2020 को भारत सरकार ने 14 राज्यों को 6,195 करोड़ रुपये जारी किए।
मुख्य बिंदु
राज्यों को आवंटित यह अनुदान राज्यों के लिए आय के अतिरिक्त स्रोत के रूप में कार्य करेगा। 15वें वित्त आयोग द्वारा अनुदान की सिफारिश की गई थी । इस अनुदान के तहत केंद्र सरकार ने केरल को 1,276 करोड़ रुपये, हिमाचल प्रदेश को 952 करोड़ रुपये, पंजाब को 638 करोड़ रुपये, असम को 631 करोड़ रुपये, आंध्र प्रदेश को 491 करोड़ रुपये, पश्चिम बंगाल को 417 करोड़ रुपये और उत्तराखंड को 423 करोड़ रुपये आवंटित किए गये।
महत्व
इस अनुदान से राज्यों को COVID-19 को रोकने के लिए निवारक और शमन उपाय करने में मदद मिलेगी। इस धन का उपयोग नमूना संग्रह, संगरोध सुविधा, स्क्रीनिंग और अतिरिक्त परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना के लिए किया जाएगा। इस फण्ड का उपयोग सरकारी अस्पतालों में पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट), थर्मल स्कैनर, एयर प्यूरीफायर, वेंटिलेटर, उपभोग्य सामग्रियों की खरीद के लिए किया जाएगा।
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12 मई, 2020 को सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योग मंत्रालय ने चैंपियंस पोर्टल लॉन्च किया। यह पोर्टल एक प्रौद्योगिकी संचालित नियंत्रण कक्ष-प्रबंधन सूचना प्रणाली के रूप में कार्य करता है।
मुख्य बिंदु
इस पोर्टल का उद्देश्य सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगों की सहायता के लिए आधुनिक आईसीटी उपकरण बनाना है। चैंपियंस का अर्थ है Creation and Harmonious Application of Modern Processes। इसका उद्देश्य उत्पादन और राष्ट्रीय शक्ति को बढ़ाना है।
महत्व
यह पोर्टल छोटी इकाइयों को बड़ा बनने में मदद करेगा। यह कार्य उनकी शिकायतों को सुलझाने, समर्थन करने, प्रोत्साहित करने, मदद करने के द्वारा किया जाता है।
प्रौद्योगिकी
यह पोर्टल एक नियंत्रण कक्ष के रूप में कार्य करेगा जो उद्योगों को जानकारी प्रदान करेगा। इसमें वीडियो कॉन्फ्रेंस, इंटरनेट और टेलीफोन शामिल हैं। ये सिस्टम डाटा एनालिटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के साथ सक्षम हैं। इस प्रणाली को पूरी तरह से भारत सरकार के सीपीजीआरएएमएस के साथ एकीकृत किया जायेगा
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वंदे भारत मिशन के अंतर्गत 7 मई 2020 से अब तक 6037 भारतीय 31 विमानों से विदेश से लौटे
प्रविष्टि तिथि: 12 MAY 2020 2:15PM by PIB Delhi
वंदे भारत मिशन के अंतर्गत 7 मई 2020 से अब तक 5 दिन में 6037 भारतीय एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस की भारत आने वाली 31 उड़ानों से स्वदेश लौटे।
भारत सरकार ने वंदे भारत मिशन की शुरुआत 7 मई 2020 को की जो नागरिकों को भारत वापस लाने की सबसे बड़ी पहलों में से एक है। इस मिशन के अंतर्गत, नागर विमानन मंत्रालय भारतीयों को उनकी मातृभूमि में वापस लाने के लिए विदेश मंत्रालय और राज्य सरकारों के साथ तालमेल कर रहा है।
एयर इंडिया अपनी सहायक एयर इंडिया एक्सप्रेस के साथ 12 देशों यानी अमेरिका, ब्रिटेन, बांग्लादेश, सिंगापुर, सऊदी अरब, कुवैत, फिलीपींस, संयुक्त अरब अमीरात और मलेशिया के लिए कुल 64 उड़ानों (एयर इंडिया की 42 और एआई एक्सप्रेस की 24) का संचालन कर रही है ताकि पहले चरण में 14,800 भारतीयों को वापस लाया जा सके।
लोगों को सुरक्षित निकालने वाले इस विशाल हवाई मिशन के दौरान प्रत्येक कार्य को करते समय सरकार और डीजीसीए द्वारा निर्धारित सुरक्षा और स्वच्छता प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन किया जाता है। नागर विमानन मंत्रालय, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) और एयर इंडिया ने इन संवेदनशील चिकित्सा निकासी मिशनों में यात्रियों, चालक दल के सदस्यों और ग्राउंड हैंडलिंग स्टाफ की सुरक्षा को प्राथमिकता देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
सरकार के दिशानिर्देशों के अनुसार व्यापक और सावधानीपूर्वक सुरक्षा व्यवस्था की जाती है।
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इस अवसर पर स्वास्थ्य और परिवार कल्याण सचिव सुश्री प्रीति सूदन, विशेष सचिव, श्री अरुण सिंघल, संयुक्त सचिव श्री निपुण विनायक, भारतीय नर्सिंग परिषद, नई दिल्ली के अध्यक्ष श्री टी. दिलीप कुमार, अखिल भारतीय सरकारी नर्स फेडरेशन, की महासचिव श्रीमती जी. के. खुराना, प्रशिक्षित नर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, उत्तर क्षेत्र की उपाध्यक्ष श्रीमती एनी कुमार के अलावा कई नर्सिंग संगठनों की सदस्य तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।
