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ICE मॉडल:सूचना, शिक्षा और संचार (Information, Education and Communication-ICE) ऐसा उपाय है जो एक निर्धारित समयावधि में किसी विशिष्ट समस्या के बारे में लक्षित समूह के व्यवहार को बदलने या सुदृढ़ करने का प्रयास करता है।
अमेरिका में पिछले 30 वर्षों में LGBTQ+ समुदाय के प्रति दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन हुआ है। यह नाटकीय बदलाव किसी कानून के कारण नहीं हुआ, बल्कि बहस और विचार-विमर्श के कारण समाज में विकसित हुई परानुभूति (Empathy) का परिणाम है।
सामाजिक विपणनसामाजिक विपणन से तात्पर्य बाज़ार में अपनी ज़रुरत की वस्तुओं के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं को अनावश्यक रूप से स्पर्श न करने से है। उदाहरण- कई बार लोग अनावश्यक रूप से वस्तुओं को स्पर्श करते हैं या कपड़ों को पहन कर देखते हैं जबकि उन्हें उस वस्तु की खरीदारी नहीं करनी होती है।
अर्थव्यवस्था के सुदृढीकरण हेतु वाणिज्यिक गतिविधियों को प्रारंभ करना आवश्यक हो गया है। ऐसे में समय के साथ ही लोगों का अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये बाज़ार का रुख करना होगा।
लोगों को बाज़ार में अपनी ज़रुरत की वस्तुओं कि खरीदारी करते समय सामाजिक विपणन के नियम का अनुपालन अपने व्यवहार में शामिल करना चाहिये।
गैर-सरकारी संगठनइस महामारी से उपज़ी परिस्थितियों से निकलने के लिये स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्यरत गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका निर्णायक हो सकती है, क्योंकि समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सरकार की पहुँच इन संगठनों के माध्यम से सुनिश्चित की जा सकती है।
इन गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से सरकार समाज के प्रत्येक वर्ग में स्वास्थ्य मानकों के प्रति जागरूकता पैदा कर सकती है।
हेल्थ बिलीफ मॉडलसामाजिक मनोचिकित्सक इरविन रोसेनस्टॉक (Irwin Rosenstock) ने हेल्थ बिलीफ मॉडल (Health Belief Model) के माध्यम से बताया कि व्यक्ति अपने व्यवहार में परिवर्तन कर कई बीमारियों से स्वयं को बचा सकता है।
इस मॉडल में व्यक्ति की भावनाओं को प्रभावी क्रिया के रूप में प्रयोग करने पर बल दिया जाता है। जैसे- किसी बुरी आदत को छोड़ने के लिये माँ के द्वारा किया गया भावनात्मक निवेदन बच्चे के व्यवहार में परिवर्तन लाता है।
प्रधानमंत्री द्वारा जब ‘जनता कर्फ्यू’ की अपील की गई तब लोगों के व्यवहार में परिवर्तन देखने को मिला क्योंकि यह एक भावनात्मक निवेदन था, जिसने प्रभावी रूप से कार्य किया।
व्यवहार में परिवर्तन लाने के सफल प्रयास
सार्वजनिक व्यवहार को प्रभावित करने के मामले में कानूनों के सफल होने की अधिक संभावना है। जैसे धूम्रपान को नियंत्रित करने के लिये स्वास्थ्य चेतावनी सहित कई उपायों का उपयोग किया जाता हैं।
लेकिन एक कारक जिसने धूम्रपान में निरंतर गिरावट लाने में योगदान किया है, वह है सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध।
मनुष्य किसी व्यवहार की अपेक्षित लागत के आधार पर भी एक निषिद्ध गतिविधि में संलग्न होने के बारे में निर्णय लेते हैं।
यदि सज़ा की गंभीरता और संभावना किसी गतिविधि से प्राप्त होने वाले लाभ या आनंद से अधिक है, तो व्यक्ति उस व्यवहार से बचना चाहेगा।
उदाहरणस्वरुप, संशोधित मोटर वाहन अधिनियम, 2019 ने जुर्माने को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा कर लोगों को यातायात नियमों का पालन करने के लिये बाध्य किया है।
निष्कर्ष
चूँकि इस वैश्विक महामारी के प्रसार का कारण मानव गतिविधि और व्यवहार है। अतः मानव गतिविधि और व्यवहार से संचालित समस्या के समाधान के लिये सरकार और न्यायालयों से परे दृष्टिकोण की आवश्यकता है। अच्छे और प्रभावी नियमों की भी अपनी भूमिका होती है, लेकिन सांस्कृतिक और व्यावहारिक बदलाव सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। इस प्रकार के प्रयासों के माध्यम से देश की ज़रूरतों के अनुसार लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने के लिये प्रोत्साहित किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं भी अपने व्यवहार में परिवर्तन लाते हुए स्वास्थ्य मानकों का बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिये। इस संदर्भ में महात्मा गांधी की यह उक्ति ध्यान में रखी जानी चाहिये कि ‘जो परिवर्तन आप दूसरों में देखना चाहते हैं, वह परिवर्तन आप स्वयं में लाइये।’
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कोरोना वायरस : व्यवहार परिवर्तन की आवश्यकता
कोरोना वायरस के प्रकोप से विश्व व्यवस्था व्यापक परिवर्तन के दौर से गुज़र रही है। इन परिवर्तनों की व्यापकता सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक क्षेत्रों के साथ ही मानव के व्यवहार में भी देखने को मिल रही है। मानव के व्यवहार में परिवर्तन का यह स्वरूप स्वैच्छिक भी होगा और विधिक भी। यहाँ मानव व्यवहार में परिवर्तन के विधिक स्वरुप से तात्पर्य कानून बनाकर उसे अपने व्यवहार में कुछ सकारात्मक परिवर्तन लाने होंगे। इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है कि सार्वजनिक स्थानों पर थूकना एक दंडनीय अपराध बना दिया गया है, ताकि लोग कानून का पालन करें और अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएँ। ऐसा नहीं है कि व्यवहार परिवर्तन की यह अवधारणा भारत में नई है, इससे पूर्व देश की स्वतंत्रता के बाद सरकारी योजनाओं में जनता की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिये उनके व्यवहार में परिवर्तन का प्रयास किया गया था।
व्यवहार परिवर्तन का यह प्रयास अनवरत रूप से जारी रहा और वर्तमान में इस अवधारणा के सकारात्मक परिणाम हमें स्वच्छ भारत अभियान, बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ अभियान तथा गिव इट अप अभियान में देखा जा रहा है। वर्ष 2019 में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण में व्यावहारिक अर्थशास्त्र का उल्लेख किया गया था। विदित है कि व्यावहारिक अर्थशास्त्र पर वर्ष 2017 में अर्थशास्त्री रिचर्ड थेलर को नोबेल पुरस्कार मिला था, इसके बाद से व्यावहारिक अर्थशास्त्र की अवधारणा पर अधिक चर्चा होने लगी है। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण में इस अवधारणा का उपयोग सामाजिक बदलाव व मानवीय व्यवहार परिवर्तन के लिये करने पर बल दिया गया है।
इस आलेख में व्यवहार परिवर्तन की अवधारणा ‘व्यावहारिक अर्थशास्त्र’, उसके परिणाम, उसके अनुप्रयोग के क्षेत्र के साथ व्यवहार परिवर्तन की वैकल्पिक रणनीतियों भी पर विश्लेषण किया जाएगा।
व्यावहारिक अर्थशास्त्र से तात्पर्य
ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं के सर्वोत्तम लाभ को ध्यान में रखकर लेता है। अर्थशास्त्र के ‘तार्किक विकल्प सिद्धांत’ का भी यही मानना है कि एक तार्किक व्यक्ति लाभ, उपयोगिता तथा लागत को ध्यान में रखकर अपने निर्णय लेता है। व्यावहारिक अर्थशास्त्र की अवधारणा उपर्युक्त विचारों से भिन्न है, इस अवधारणा का मानना है कि लोगों के निर्णय अन्य बातों पर भी निर्भर करते हैं।
व्यावहारिक अर्थशास्त्र के अनुसार, मानव का व्यवहार प्रमुख रूप से समाज एवं उसके बनाए नियमों से प्रमुख रूप से प्रभावित होता है। भारत में सामाजिक एवं धार्मिक नियम लोगों के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं तथा लोगों के व्यवहार को परिवर्तित करते हैं, इस तथ्य को ध्यान में रखकर ज़रूरी बदलाव लाने में व्यावहारिक अर्थशास्त्र महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
व्यवहार परिवर्तन की आवश्यकता
जैसा की हम जानते हैं कि इस वैश्विक महामारी से बचाव का एक बेहतर विकल्प शारीरिक दूरी है। भारत की घनी आबादी को देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि वायरस के प्रकोप से बचने के लिये अपने व्यवहार में परिवर्तन करते हुए स्वास्थ्य मानकों का अनुपालन करना ज़रूरी है।
इस वायरस के प्रसार को रोकने के लिये अब हमें अभिवादन की पारंपरिक प्रक्रिया ‘नमस्ते’ का अनुपालन किसी भी शारीरिक स्पर्श के बिना करना होगा।
प्रत्येक व्यक्ति को फेस मास्क का प्रयोग अनिवार्य रूप से करना होगा क्योंकि ड्रॉपलेट्स के माध्यम से वायरस का प्रसार एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में तेज़ी से हो सकता है।
सभी लोगों को समय-समय पर हाथों को सैनेटाईज़ करने या साबुन से धुलने के नियम को अपने व्यवहार में शामिल करना होगा क्योंकि हाथ वायरस के शरीर में प्रवेश का प्रमुख कैरियर बन सकते हैं।
व्यवहार परिवर्तन हेतु वैकल्पिक रणनीतियाँ
नज़ सिद्धांत:यह व्यवहारात्मक विज्ञान की संकल्पना है जिसमें बिना दबाव के तथा सकारात्मक दिशा-निर्देशों और परोक्ष सुझावों द्वारा लोगों को वांछनीय और लाभकारी व्यवहार अपनाने हेतु प्रेरित किया जाता है।
इस सिद्धांत के द्वारा ही लोगों के भीतर खुले में शौच के प्रति नकारात्मक भाव पैदा कर सामुदायिक शौचालयों का उपयोग करने के प्रति प्रेरित किया गया। इस कार्य में दरवाज़ा बंद जैसे अभियान कारगर सिद्ध हुए।
इस सिद्धांत का प्रयोग करते हुए ही समाज बेटियों की महत्ता को समझते हुए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (BBBP) से बेटी आपकी धन लक्ष्मी और विजय लक्ष्मी (BADLAV) की दिशा में अग्रसर हुआ। लोगों के इस व्यवहार परिवर्तन में सेल्फी विद डॉटर जैसे सामाजिक पहलों का बड़ा योगदान रहा।
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भारतीय सेना द्वारा सामान्य नागरिकों को तीन साल के लिये सेना में शामिल करने के संबंधित एक प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। इस विचाराधीन प्रस्ताव को ‘टूर ऑफ ड्यूटी’(Tour of Duty) से संबोधित किया गया है।
प्रमुख बिंदु:
यदि इस प्रस्ताव को मंज़ूरी मिल जाती है तो यह अपनी तरह का पहला प्रस्ताव होगा जो देश के आम नागरिकों को भी सेना में शामिल होने का अवसर प्रदान करेगा।
इस प्रस्ताव के अनुसार, नागरिकों द्वारा सेना में शामिल होना पूर्णत: स्वैच्छिक होगा। इसके अलावा चयन मानदंडों में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं की जाएगी।
प्रस्ताव के पारित होने से ऐसी उम्मीद की जा रही है कि इसके परिणामस्वरूप सेना के वेतन और पेंशन खर्च में भारी कमी होगी तथा इस प्राप्त धनराशि का उपयोग सेना के आधुनिकीकरण के लिये किया जा सकेगा।
सेना के वेतन और पेंशन बिल में पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है, जो बजट आवंटन का 60% है।
पिछले पाँच वर्षों में, रक्षा बजट में 68% वृद्धि, रक्षा वेतन में 75% की वृद्धि तथा रक्षा पेंशन में 146% की वृद्धि हुई है।
‘टूर ऑफ ड्यूटी का उद्देश्य युवाओं को एक 'इंटर्नशिप /अस्थायी अनुभव' (Internship/Temporary Experience) प्रदान करना है। इसके लिये ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ की रैंक या फिर किसी अन्य अधिकारी रैंक के लिये किसी आकर्षक विच्छेद पैकेज ( Attractive Severance Packages), पुनर्वास पाठ्यक्रम (Resettlement Courses), पेशेवर नकदी प्रशिक्षण अवकाश (Professional Encashment Training Leave), पूर्व सैनिकों की स्थिति (Ex-Servicemen Status) तथा पूर्व-सैनिकों की अंशदायी स्वास्थ्य योजना (Ex-Servicemen Contributory Health Scheme-ECHS) इत्यादि की आवश्यकता नहीं होगी।
‘शार्ट सर्विस कमीशन’ तथा ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ में तुलना:
शार्ट सर्विस कमीशन (Short Service Commission- SSC) के द्वारा सेना में आने पर न्यूनतम 10 वर्ष की अवधि के लिये सेवा प्रदान करनी होती है जबकि टूर ऑफ ड्यूटी में यह अवधि 3 वर्ष के लिये होगी।
विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि, ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ के एक अधिकारी के लिये तीन साल की अवधि के लिये प्री-कमीशन प्रशिक्षण, वेतन, भत्ते, ग्रेच्युटी, प्रस्तावित विच्छेद पैकेज, छुट्टी का भुगतान और अन्य लागतों की संचयी अनुमानित लागत लगभग 5.12 करोड़ रुपए है जबकि शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के अधिकारी पर संचयी अनुमानित लागत 83 6.83 करोड़ रुपए है।
शॉर्ट सर्विस कमीशन में समग्र लागत ओर अधिक हो जाती है क्योंकि, शॉर्ट सर्विस कमीशन के 50-60% अधिकारी स्थायी आयोग का चयन करते हैं तथा 54 वर्षों तक सेवा में रहते हैं जो बाद में पेंशन का भी लाभ प्राप्त करते हैं।
‘टूर ऑफ ड्यूटी’ के द्वारा चयनित लोगों के लिये इसी तरह की लागत 80-85 लाख रुपए आकलित की गई है।
प्रस्ताव के लाभ:
यह योजना उन लोगों को एक सुनहरा अवसर प्रदान करेगी जो सेना में पूर्ण कैरियर नहीं चाहते लेकिन वर्दी की इच्छा रखते हैं।
‘टूर ऑफ ड्यूटी’ में चयनित उम्मीदवार को अपने उन साथियों की तुलना में अधिक वेतन प्राप्त होगा जिन्होंने कॉर्पोरेट क्षेत्र में अपना कैरियर शुरू किया था।
तीन वर्ष की सेवा की समाप्ति के के बाद कॉर्पोरेट क्षेत्र में वापसी करने पर उन्हें तुलनात्मक रूप से अधिक वेतन दिया जाएगा।
सेना को उम्मीद है कि ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ के द्वारा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान सहित सर्वश्रेष्ठ कॉलेजों के युवाओं को सेना में आकर्षित किया जा सकेगा।
प्रस्ताव में इस योजना को प्रोत्साहित करने के लिये कई कदम उठाए गए हैं जैसे- तीन वर्ष तक कर-मुक्त आय और अधिकारियों को तीन वर्ष के कार्यकाल पूर्ण होने पर लगभग एकमुश्त 5-6 लाख रुपए प्रदान किये जाएंगे और साथ ही अन्य रैंक के लिये 2-3 लाख रुपए प्रदान किये जायेंगे।
प्रस्ताव में कहा गया है कि इसके माध्यम से राष्ट्र और कॉरपोरेट्स जगत दोनों को प्रशिक्षित, अनुशासित, आत्मविश्वासी, मेहनती और प्रतिबद्ध पुरुषों और महिलाओं से लाभान्वित होने की संभावना है।
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‘आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन’ (Amendment in Essential Commodities Act):
सरकार द्वारा 'आवश्यक वस्तु अधिनियम'-1955 में संशोधन किया जाएगा। अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दलहन, प्याज, आलू सहित कृषि खाद्य पदार्थों को नियंत्रण से मुक्त किया जाएगा। केवल असाधारण परिस्थितियों जैसे- राष्ट्रीय आपदा, कीमतों में अत्यधिक वृद्धि, अकाल आदि की स्थिति में भंडारण की सीमा पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। इसके अलावा भंडारण सीमा संबंधी नियम ‘मूल्य श्रृंखला इकाइयों’ के भागीदारों पर लागू नहीं होगा।
कृषि विपणन सुधार (Agricultural Marketing Reform):
किसान को लाभकारी मूल्य पर अपनी उपज को बेचने के लिये पर्याप्त विकल्प उपलब्ध कराने; निर्बाध अंतरराज्यीय व्यापार; कृषि उत्पादों की ई-ट्रेडिंग के लिये एक रूपरेखा बनाने की दिशा में केंद्रीय विपणन कानून का निर्माण किया जाएगा।
कृषि उपज मूल्य निर्धारण और गुणवत्ता का आश्वासन (Agricultural Yield Pricing and Quality Assurance):
सरकार किसानों को उचित और पारदर्शी तरीके से कृषि समूहों, बड़े खुदरा विक्रेताओं, निर्यातकों आदि के साथ जुड़ने में सक्षम बनाने के लिये एक सुविधाजनक कानूनी संरचना का निर्माण करेगी।
निष्कर्ष:
COVID-19 महामारी के तहत घोषित आर्थिक पैकेज में कृषि संबंधी उन सुधारों को शामिल किया गया है जिनकी मांग लगातार की जा रही थी। सुधारों के बाद किसान अपना उत्पाद न केवल किसानों को अपितु किसी को और किसी भी स्थान पर बेच सकता है।
आर्थिक पैकेज न केवल कृषि अवसंरचना में सुधार करने में मदद करेगा अपितु व्यापारी तथा कृषि प्रसंस्करण इकाइयों को देश के भीतर कृषि-उपज की किसी भी मात्रा को स्वतंत्र रूप से खरीद, स्टॉक और स्थानांतरित करने में सक्षम बनाएगा।
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वित्त मंत्री ने COVID-19 महामारी आर्थिक पैकेज के रूप में कृषि, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण के लिये कृषि अवसंरचना को मज़बूत करने तथा कृषि शासन संबंधी सुधारों के लिये अहम उपायों की घोषणा की है।
प्रमुख बिंदु:
प्रधानमंत्री द्वारा 12 मई, 2020 को भारत की जीडीपी के 10% के बराबर, 20 लाख करोड़ रुपये के विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की गई थी। इसी दिशा में वित्त मंत्री द्वारा कृषि क्षेत्र में सुधारों संबंधी आर्थिक पैकेज की घोषणा की गई।
कृषि संबंधी आर्थिक पैकेज में मुख्यत: 11 उपायों की घोषणा की गई है, जिसमें से 8 उपाय कृषि बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं को बेहतर बनाने से संबंधित है जबकि 3 उपाय प्रशासनिक एवं शासन संबंधी सुधारों से संबंधित हैं।
फार्म-गेट अवसंरचना (Farm-Gate Infrastructure):
किसानों के लिये कृषि द्वार (फार्म-गेट) अवसंरचना के विकास के लिये 1 लाख करोड़ रुपये का ‘कृषि आधारभूत अवसंरचना कोष’ के निर्माण की घोषणा की गई।
फार्म-गेट और एकत्रीकरण बिंदुओं (प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों, कृषि उद्यमियों, स्टार्ट-अप आदि) पर मौजूद ‘कृषि आधारभूत अवसंचना परियोजनाओं’ के वित्तपोषण के लिये 1,00,000 करोड़ रुपए की राशि उपलब्ध कराई जाएगी।
सूक्ष्म खाद्य उपक्रमों (Micro Food Enterprises- MFE) का औपचारिक क्षेत्र में प्रवेश:
MFE को औपचारिक क्षेत्र में प्रवेश की दिशा में 10,000 करोड़ रुपए की सहायता राशि के साथ 'वैश्विक पहुँच वाली वोकल फॉर लोकल’ (Vocal for Local with Global Outreach) योजना शुरू की जाएगी। इससे ऐसे उद्यमियों को फायदा होगा जिनको खाद्य मानकों को हासिल करने, ब्रांड खड़ा करने और विपणन के लिये तकनीकी उन्नयन की ज़रूरत है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana- PMMSY):
‘समुद्री और अंतर्देशीय मत्स्यन और जलकृषि’ (Marine, Inland fisheries and Aquaculture) के एकीकृत, सतत और समावेशी विकास के लिये ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ शुरू की जाएगी। योजना के लिये 20,000 हजार करोड़ रुपए योगदान की घोषणा की गई।
राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (National Animal Disease Control Program):
‘खुरपका मुंहपका रोग’ (Foot and Mouth Disease- FMD) और ब्रुसेलोसिस के लिये ‘राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम’ 13,343 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय के साथ शुरू किया गया। इस कार्यक्रम को आगे और अधिक आर्थिक सहायता राशि प्रदान की जाएगी।
पशुपालन बुनियादी ढाँचा विकास कोष
(Animal Husbandry Infrastructure Development Fund):
डेयरी प्रसंस्करण, मूल्यवर्द्धन एवं पशुचारा आधारित आधारभूत अवसंरचना क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ाने के उद्देश्य से 15,000 करोड़ रुपए का ‘पशुपालन बुनियादी ढाँचा विकास कोष’ स्थापित किया जाएगा। विशिष्ट उत्पादों के निर्यात हेतु संयंत्र स्थापित करने वाली इकाइयों को इस कोष के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाएगा।
औषधीय या हर्बल खेती को प्रोत्साहन (Promotion of Herbal Cultivation):
अगले दो वर्षों में 4,000 करोड़ रुपए के परिव्यय से हर्बल खेती के तहत 10,00,000 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया जाएगा। औषधीय पौधों के लिये क्षेत्रीय मंडियों का नेटवर्क स्थापित किया जाएगा।
‘राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड’ (National Medicinal Plants Board) गंगा के किनारे 800 हेक्टेयर क्षेत्र में ‘औषधि गलियारा’ विकसित कर औषधीय पौधे लगाएगा।
मधुमक्खी पालन संबंधी पहल (Beekeeping Initiatives):
500 करोड़ रुपए की सहायता राशि के माध्यम से मधुमक्खी पालन क्षेत्र में अनेक योजनाओं को प्रारंभ किया जाएगा।
‘टॉप’ टू ‘टोटल’ (TOP to TOTAL):
‘खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय’ (Ministry of Food Processing Industries-MOFPI) द्वारा संचालित 'ऑपरेशन ग्रीन्स'; जो वर्तमान में टमाटर, प्याज और आलू (Tomatoes, Onions and Potatoes-TOP) को कवर करता है, को सभी फलों एवं सब्जियों तक विस्तृत किया जाएगा।
योजना के माध्यम से फसलों के परिवहन तथा भंडारण पर 50% सब्सिडी प्रदान की जाएगी। योजना को अगले 6 महीनों के लिये प्रायोगिक रूप में शुरू किया जाएगा तथा बाद में इसे आगे बढ़ाया एवं विस्तारित किया जाएगा।
कृषि क्षेत्र में शासन एवं प्रशासन संबंधी सुधार:
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अमेरिका ने चीन से तिब्बती बौद्ध धर्म के 11वें ‘पंचेन लामा' (Panchen Lama) को छोड़ने का आग्रह किया है, जिन्हें चीनी अधिकारियों द्वारा वर्ष 1995 में मात्र 6 वर्ष की उम्र में कैद कर लिया गया था।
प्रमुख बिंदु
ध्यातव्य है कि वर्ष 1995 में दलाई लामा (Dalai Lama) द्वारा एक युवा तिब्बती लड़के गेदुन चोकेई न्यीमा (Gedhun Choekyi Nyima) को 11वें पंचेन लामा के रूप में चुना गया था।
इस घोषणा के कुछ दिनों पश्चात् ही 11वें ‘पंचेन लामा' समेत उनका पूरा परिवार रहस्यमय ढंग से गायब हो गया और इसके पश्चात् उन्हें कभी नहीं देखा गया।
पृष्ठभूमि
जैसा कि उल्लेख किया गया है कि वर्ष 1995 में एक युवा तिब्बती लड़के को पंचेन लामा के रूप में चुना गया और इसके कुछ समय बाद वे रहस्यमय ढंग से गायब हो गए।
दलाई लामा द्वारा नियुक्त पंचेन लामा के गायब होने के कुछ समय पश्चात् चीनी अधिकारियों द्वारा एक अन्य छह वर्षीय लड़के को आधिकारिक रूप से पंचेन लामा के रूप में नामित कर दिया गया।
तिब्बती लोगों, दलाई लामा, संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न मानवाधिकार संगठनों द्वारा चीन सरकार के इस कदम की कड़ी निंदा की गई और दलाई लामा द्वारा नामित छह वर्षीय पंचेन लामा को वर्ष 1995 के बाद कभी नहीं देखा गया।
तिब्बती लोगों का मत है कि यदि 11वें पंचेन लामा अभी जीवित हैं तो वह विश्व के सबसे कम उम्र के राजनीतिक कैदी हैं।
चीनी अधिकारियों द्वारा 11वें पंचेन लामा की नियुक्ति की निंदा करते हुए 14वें दलाई लामा ने इस कदम को अनुचित करार दिया था।
पंचेन लामा
उल्लेखनीय है कि पंचेन लामा तिब्बत में सबसे महत्त्वपूर्ण धार्मिक नेताओं में से एक है और इनका स्थान तिब्बती बौद्ध धर्म में दलाई लामा के पश्चात् आता है।
‘पंचेन’ शीर्षक का अर्थ महान विद्वान होता है, और इस शब्द का विकास संस्कृत के शब्द ‘पंडित’ (Pandita) और तिब्बती शब्द चेन-पो (Chen-Po) जिसका अर्थ है ‘महान’ से हुआ है।
पंचेन लामा (Panchen Lama) वंशावली की शुरुआत वर्ष 1385 में हुई थी, जब सबसे पहले तिब्बती ‘पंचेन लामा’ ने जन्म लिया था, और तिब्बती बौद्ध पुनर्जन्म (अवतार) में विश्वास रखते हैं इसीलिये तिब्बती मान्यताओं के अनुसार, पंचेन लामा का निर्बाध पुनर्जन्म हो रहा है।
परंपरागत रूप से ताशी लूनपो मठ (Tashi Lhunpo Monastery) के मठाधीशों को उनकी विद्वता के कारण पंचेन के रूप में जाना जाता था।
17वीं शताब्दी में 5वें दलाई लामा ने अपने शिक्षक और ताशी लूनपो मठ के तत्कालीन मठाधीश लोबसांग चोकेई ग्यालत्सेन (Lobsang Choekyi Gyaltsen) को पंचेन लामा के रूप में चुना और यह घोषणा की कि वे बार-बार एक बच्चे के रूप में पुनर्जन्म लेंगे तथा यह अटूट वंशावली इसी प्रकार चलती रहेगी।
बौद्ध मान्यताओं में दलाई लामा की ही तरह ‘पंचेन लामा’ को भी बुद्ध का ही एक अवतार माना जाता है। पंचेन लामा को अमिताभ, यानी बुद्ध के असीम प्रकाश वाले दैवीय स्वरूप का अवतार माना जाता है। वहीं दलाई लामा उनके अवालोकीतेश्वरा स्वरूप का अवतार माना जाते है।
ध्यातव्य है कि सदियों से दलाई लामा और पंचेन लामा के मध्य एक महत्त्वपूर्ण संबंध रहा है। दलाई लामा, पंचेन लामा के एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में कार्य करते हैं और पंचेन लामा नए दलाई लामा की खोज में अनिवार्य भूमिका अदा करते हैं।
लामा
लामा, बौद्ध धर्म का एक शीर्षक है जिसका अर्थ ‘श्रेष्ठ’ से है, इसे आधिकारिक तौर पर केवल कुछ चुनिंदा तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं को दिया जाता है, जो आध्यात्मिकता के उच्चतम स्तर को प्राप्त करते हैं। अधिकांश लामाओं को विभिन्न अवतारों का पुनर्जन्म माना जाता है और पदानुक्रम में उनके स्थान इन पुनर्जन्म की पहचानों द्वारा निर्धारित किये जाते हैं।
पंचेन लामा और चीन की चिंता
चीन की चिंता की एक मुख्य वजह नए दलाई लामा के चुनाव को लेकर भी है। दरअसल, वर्तमान दलाई लामा (जो 14वें दलाई लामा हैं) की बढ़ती उम्र को देखते हुए उनके उत्तराधिकारी के चयन की बात की जा रही है, हालाँकि दलाई लामा द्वारा अभी तक अपने उत्तराधिकारी के बारे में कोई भी औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
बौद्ध मान्यताओं के अनुसार, पंचेन लामा नए दलाई लामा की खोज में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
दरअसल, इस संबंध में चीन की चिंता इस बात को लेकर है कि शायद दलाई लामा अपना उत्तराधिकारी भारत से और संभवतः अरुणाचल प्रदेश से ही चुनें, फलस्वरूप तिब्बती स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्त्व एक नए व्यक्ति के हाथ आ जाएगा। चीन को खतरा है कि इससे आंदोलन को नया नेतृत्व मिल जाएगा जो भविष्य में उसके समक्ष मुश्किलें पैदा करेगा।
इसीलिये चीन ने पहले ही आधिकारिक तौर पर पंचेन लामा की घोषणा कर दी है और ऐसी आशा है कि वह 15वें दलाई लामा की घोषणा भी इसी प्रकार करेगा।
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दिबांग बहुउद्देशीय परियोजना
Dibang Multipurpose Project
हाल ही में वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee) ने एक बार फिर अरुणाचल प्रदेश में दिबांग परियोजना पर अपना निर्णय टाल दिया है।
गौरतलब है कि इस परियोजना में 6 वर्ष से अधिक की देरी हो चुकी है क्योंकि इस परियोजना के निर्माण की वजह से समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्र में 1,165 हेक्टेयर जंगल हटाने की आवश्यकता पड़ेगी।
प्रमुख बिंदु:
इसे भंडारण-आधारित जल विद्युत परियोजना के रूप में परिकल्पित किया गया है। जिसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ को संतुलित करना है।
यह भारत में निर्मित होने वाली सबसे बड़ी जल विद्युत परियोजना है। इस बांध की ऊँचाई 278 मीटर है और एक बार पूरा होने जाने के बाद यह भारत का सबसे ऊँचा बांध होगा।
यह परियोजना अरुणाचल प्रदेश के लोअर दिबांग घाटी ज़िले में दिबांग नदी पर स्थित है।
इस परियोजना की आधारशिला 31 जनवरी, 2008 को पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह द्वारा रखी गई थी।
वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee):
वन सलाहकार समिति (FAC) एक शीर्ष निकाय है, जो औद्योगिक गतिविधियों के लिये वनों में पेड़ों की कटाई की अनुमति पर निर्णय लेता है।
वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee-FAC) केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change-MOEF&CC) के अंतर्गत काम करती है जिसमें केंद्र के वानिकी विभाग के स्वतंत्र विशेषज्ञ और अधिकारी शामिल होते हैं।
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इंजेक्टेबल सिल्क फाइब्रोइन-आधारित हाइड्रोजेल
Injectable Silk-Fibroin Based Hydrogel
हाल ही में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science and Technology) के तहत एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान ‘जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च’ (JNCASR) के वैज्ञानिकों ने मधुमेह रोगियों में इंसुलिन वितरण के लिये ‘इंजेक्टेबल सिल्क फाइब्रोइन-आधारित हाइड्रोजेल’ (Injectable Silk-Fibroin Based Hydrogel) विकसित किया है।
प्रमुख बिंदु:
‘फाइब्रोइन-आधारित हाइड्रोजेल’ को बायोकंपैटिबल एडिटिव्स (Biocompatible Additives) का उपयोग करके विकसित किया गया है। यह विकसित हाइड्रोजेल मधुमेह रोगियों में इंसुलिन के वितरण को आसान करेगा। इस जेल को पहली बार चूहों में परीक्षण के तौर पर प्रयोग किया गया था जो सफल रहा था। और इसके विवरण को ‘एसीएस एप्लाइड बायो मटेरियल’ (ACS Applied Bio Material) पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
JNCASR के वैज्ञानिकों ने बताया है कि मधुमेह वाले चूहों में उनकी त्वचा के नीचे आईएसएफएच (Injectable SF hydrogel- iSFH) युक्त इंसुलिन के इंजेक्शन ने त्वचा के नीचे सक्रिय डिपो/भंडार का गठन किया जिसमें से इंसुलिन धीरे-धीरे बाहर निकलता है और 4 दिनों की लंबी अवधि के लिये ‘शारीरिक ग्लूकोज़ होमियोस्टेसिस’ (Physiological Glucose Homeostasis) को बहाल रखता है। जिससे रक्त में इंसुलिन की उच्च सांद्रता बढ़ने से रक्त शर्करा के अचानक कम होने का कोई जोखिम नहीं होता है।
फाइब्रोइन:
फाइब्रोइन एक अघुलनशील प्रोटीन है। कच्चे रेशम में दो प्रोटीन होते हैं जिन्हें सेरिसिन (Sericin) एवं फाइब्रोइन (Fibroin) कहा जाता है। रेशेदार कृमि द्वारा फाइब्रोइन का उत्पादन किया जाता है। इसमें तीन श्रंखलायें और हल्के एवं भारी ग्लाइकोप्रोटीन होते हैं।
हाइड्रोजेल:
एक हाइड्रोजेल बहुलक श्रृंखलाओं का एक नेटवर्क है। ये पॉलीविनाइल अल्कोहल, एक्रिलेट बहुलक (Acrylate Polymers) और सोडियम पॉलीक्रिलेट (Sodium Polyacrylate) एवं सह्बहुलकों (Copolymers) से बने होते हैं।
उल्लेखनीय है कि भारत में मधुमेह से 70 मिलियन से अधिक लोग प्रभावित हैं जो विश्व में दूसरे स्थान पर हैं। मधुमेह शरीर में बीटा कोशिकाओं के नुकसान या इंसुलिन प्रतिरोध के कारण इंसुलिन के अपर्याप्त उत्पादन के परिणामस्वरूप होता है जो ग्लूकोज होमियोस्टेसिस में असंतुलन पैदा करता है और रक्त शर्करा के स्तर में अचानक वृद्धि का कारण बनता है।
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सचेत
SACHET
15 मई, 2020 को भारत के रक्षा मंत्री ने देश में ही बनाए गए तटरक्षक बल के एक गश्ती जहाज़ ‘सचेत’ (SACHET) और दो इंटरसेप्टर नौकाओं (C-450 एवं C-451) को राष्ट्र को समर्पित किया।
प्रमुख बिंदु:
सचेत का डिज़ाइन एवं निर्माण ‘गोवा शिपयार्ड लिमिटेड’ द्वारा किया गया है, इसे अत्याधुनिक नौवहन एवं संचार उपकरणों से सुसज्जित किया गया है।
भारतीय तटरक्षक जहाज़ ‘सचेत’ पाँच ‘अपतटीय गश्ती जहाज़ों’ (Offshore Patrol Vessels) की श्रृंखला में पहला पोत है।
105 मीटर लंबे पोत ‘सचेत’ का वजन लगभग 2,350 टन है और यह 9,100 किलोवाट के दो डीज़ल इंजनों द्वारा संचालित होता है जिन्हें 6,000 नॉटिकल मील की सहनशक्ति के साथ 26 समुद्री मील (नॉट) की अधिकतम गति से चलने योग्य बनाया गया है।
यह पोत तीव्र तलाशी एवं बचाव अभियानों के लिये दोहरे इंजन वाले एक हेलिकॉप्टर, उच्च गति वाली चार नौकाओं आदि को ले जाने में सक्षम है। यह समुद्र में तेल फैलने के कारण होने वाले प्रदूषण से निपटने के लिये ‘सीमित प्रदूषण रोधी उपकरण’ ले जाने में भी सक्षम है।
इंटरसेप्टर नौकाएँ (C-450 एवं C-451):
इंटरसेप्टर नौकाओं (C-450 एवं C-451) को हजीरा स्थित ‘लार्सन एंड टुब्रो शिपयार्ड’ द्वारा देश में ही डिज़ाइन एवं निर्मित किया गया हैं और ये नवीनतम नौवहन तथा संचार उपकरणों से सुसज्जित हैं।
30 मीटर लंबी ये नौकाएँ 45 समुद्री मील (नॉट) से भी तेज़ गति से चलने में सक्षम हैं। इन्हें उच्च गति अवरोधन तट के निकट गश्ती एवं कम तीव्रता के समुद्री अभियानों के लिये तैयार किया गया है।
इंटरसेप्टर नौकाओं की त्वरित जवाबी कार्रवाई क्षमता किसी भी उभरती समुद्री परिस्थिति से निपटने और उसे विफल करने की दृष्टि से इसे एक आदर्श प्लेटफॉर्म बनाती है।
महत्त्व:
तटरक्षक बल के बेड़े में शामिल होने पर इन पोतों को राष्ट्र के समुद्री हितों की रक्षा के लिये विशेष रूप से ‘विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र’ (Exclusive Economic Zone) की निगरानी, तटीय सुरक्षा आदि के लिये उपयोग में लाया जाएगा।
ये पोत भारतीय प्रधानमंत्री के विज़न ‘सागर’ (क्षेत्र में सभी के लिये सुरक्षा एवं विकास) को आगे बढ़ाते हुए सुरक्षित, संरक्षित एवं स्वच्छ समुद्र के साथ देश के लिये आर्थिक अवसर प्रदान करेंगे।
गौरतलब है कि भारतीय तटरक्षक बल विश्व का चौथा सबसे बड़ा तटरक्षक बल है। यह न केवल हमारे समुद्र तट एवं तटीय समुदाय की रक्षा करता है बल्कि आर्थिक गतिविधियों एवं ‘विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र’ (EEZ) में समुद्री पर्यावरण की भी रक्षा करता है।
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वैज्ञानिकों ने कोविड-19 का मुकाबला करने के लिए मोबाइल इनडोर डिस्इंफेक्शन स्प्रेयर विकसित किया
ये स्प्रेयर मैपिंग फीचरों तथा एक्सटेंडेबल आम्र्स से भी सुसजिज्त हैं जिससे कि छुपे हुए क्षेत्रों तक पहुंच सकें और व्यापक रूप से सफाई कर सकें
इस प्रौद्योगिकी की प्रासंगिकता वर्तमान कोविड-19 संकट के बाद भी बनी रहेगी
सीएसआईआर-सेंट्रल मैकेनिकल इंजीनियरिंग इंस्टीच्यूट (सीएमईआरआई), डुंगरपुर के वैज्ञानिकों ने कोविड-19 का मुकाबला करने के लिए दो मोबाइल इनडोर डिस्इंफेक्शन स्प्रेयर इकाइयों का विकास किया है। इन इकाइयों का उपयोग विशेष रूप से अस्पतालों में प्रभावी तरीके से पैथाजेनिक माइक्रो-आर्गेनिज्म की सफाई एवं डिस्इंफेक्ट करने के लिए किया जा सकता है।
बैट्री पावर्ड डिस्इंफेक्ट स्प्रेयर (बीपीडीएस) एवं न्यूमैटिकली आपरेटेड मोबाइल इनडोर डिस्इंफेक्शन (पीओएमआईडी) नामक इन दोनों इकाइयों का उपयोग टेबल, डोरनाब, लाइट स्विच, काउंटरटाप्स, हैंडल, डेस्क, फोन, कीबोर्ड, शौचालयों, फौकेट्स, सिंक एवं कार्डबोर्ड जैसे अक्सर छूए जाने वाले सतहों की सफाई एवं डिस्इंफेक्ट करने के लिए किया जा सकता है। बीच बीच में इन डिस्इंफेटिंग इकाइयों का उपयोग लोगों को कोरोना वायरस के संक्रमण का जोखिम कम कर सकता है जो असावधानी से इन सतहों के संपर्क में आ जाते हैं।
बीपीडीएस एवं पीओएमआईडी दोनों में ही स्प्रेयर सिस्टम की डिजाइन दो-चरण स्प्रेइंग इकाइयों एवं निचले तथा ऊपरी टियर्स में फिक्स्ड एवं फ्लेक्जिबल नोजल सेट की संख्याओं द्वारा इनडोर क्षेत्रों की सफाई करने तथा डिस्इंफेक्ट करने के लिए पृथक स्टोरेज टैंक के साथ बनाई गई है। भारी उपयोग एवं अधिक क्षेत्र को कवर करने के लिए डिस्इंफेक्टैंट स्प्रेयर का एक औद्योगिक वैरिएंट भी होता है।
पीओएमआईडी मोबाइल इनडोर डिस्इंफेक्टैंट इकाई चार पहियों पर स्थित स्टील फ्रेम से बना होती है। यह प्रणाली कम्प्रेशर, पाइपिंग एवं फिटिंग्स तथा स्प्रे नोजल्स से निर्मित्त होती है। हाथ से पकड़े जा सकने वाले फ्लेक्जिबल स्प्र्रे आर्म का उपयोग इच्छित किसी भी दिशा में किया जा सकता है।
पीओएमआईडी इकाई की 10 लीटरों की प्रत्येक क्षमता वाले दो स्टोरेज टैंक होते हैं। बीपीडीएस इकाई दो नोजल स्प्रे सिस्टम तथा एक विस्तारित आर्म स्प्रे सिस्टम इकाई के साथ एक कौर्डलेस मशीन होती है। इसकी स्टोरेज क्षमता 20 लीटर की होती है और एक सिंगल चार्ज में 4 घंटों का एक बैट्री बैक-अप टाइम होता है। सिस्टम का सकल वजन (खाली टैंक) 25 किग्रा. का होता है।
सीएसआईआर- सीएमईआरआई के निदेशक प्रो. हरीश हिरानी ने कहा, ‘ बाजार में व्याप्त अधिकांश डिस्इंफेक्टैंट स्पे्रयर लिक्विड के लिए एक सिंगल चैंबर स्टोरेज का उपयोग करते हुए या तो सफाई या डिस्इंफेक्ट करने पर आधारित और पंप स्थित होता है। पंप स्प्रेयर द्वारा उत्पादित ड्रापलेट आकार में बड़े होते हैं और सतह का प्रभावी कवरेज कम होता है। बहरहाल, सीएसआईआर- सीएमईआरआई ने डिस्इंफेक्टैंट एवं सफाई के लिए दोहरे-चैंबर स्टोरेज से निर्मित्त इनडोर स्प्रेयर सिस्टम का विकास किया है और इसका बेहतर नोजल डिजाइन, नोजल के लिए बेहतर प्रबंध तथा कम ड्रापलेट आकार होता है। इस प्रकार छिड़का गया डिस्इंफेक्टैंट लिक्विड की विनिर्दिष्ट मात्रा के लिए अधिक सतह क्षेत्र को कवर करता है। ‘
प्रो. हरीश हिरानी ने कहा, ‘ पार्टिकल का आकार और डिस्इंफेक्टैंट के पार्टिकल्स की संख्या छिड़के गए डिस्इंफेक्टैंट की प्रभावशीलता के निर्धारण के दो महत्वपूर्ण मानदंड हैं। सीएसआईआर- सीएमईआरआई ने निरंतर कोविड-19 के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए दक्ष एवं प्रभावी प्रौद्योगिकियों को विकास पर फोकस करता रहा है। उपकरणों के विकास का अगला चरण डिस्इंफेक्टैंट एवं क्लीनिंग स्प्रे के लिए 360 डिग्री कवरेज को शामिल करना एवं स्कूलों तथा घरों में उपयोग के लिए इसे सटीक तथा स्वायत्तशासी बनाना है। ‘
ये स्प्रेयर मैपिंग फीचरों तथा एक्सटेंडेबल आम्र्स से भी सुसजिज्त हैं जिससे कि छुपे हुए क्षेत्र तक पहुंच सकें और व्यापक रूप से सफाई कर सकें। इस प्रौद्योगिकी की प्रासंगिकता वर्तमान कोविड-19 संकट के बाद भी बनी रहेगी क्यांकि वायरस लगातार विद्यमान रहते हैं और ऐसे इंफ्लुएंजा की उल्लेखनीय मामलों की संख्या हर वर्ष पूरे विश्व में विस्तारित हो रही है। इसलिए प्रो. हिरानी ने देश के एमएसएमई से आग्रह किया है कि वे आगे आएं और स्वच्छता और स्वास्थ्य देखभाल उपकरणों के भविष्य के अनुकूलन को ध्यान में रखते हुए इस प्रौद्योगिकी में निवेश करें। बीपीडीएस के लिए प्रौद्योगिकी को उसी दिन वाणिज्यिीकरण के लिए पावर टेक माइनिंग प्रा. लिमिटेड को हस्तांतरित कर दिया गया है।
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एआरसीआई के वैज्ञानिकों ने स्वाभाविक तरीके से सड़नशील उन्नत धातु इम्प्लांट बनाया
टीम का मानना है कि नई विकसित मिश्र धातुएं स्वाभाविक रूप से सड़नशील स्टेन्ट और ऑर्थोपेडिक इम्प्लांट्स अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त हैं
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत स्वायत्त संस्थानों चूर्णिक धातु कर्म एवं नई सामग्री यानी पाउडर मेटलर्जी एंड न्यू मेटीरियल्स के लिए अंतरराष्ट्रीय उन्नत शोध केंद्र(एआरसीआई) और श्री चित्रा टिरुनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेस, तिरुअनंतपुरम के वैज्ञानिकों ने संयुक रूप से मानव शरीर में इस्तेमाल होने योग्य स्वाभाविक रूप से सड़नशील धातु का इम्प्लांट बनाने के लिए लौह- मैंगनीज से युक्त उन्नत मिश्र धातु बनाया है।
स्वाभाविक रूप से सड़नशील सामग्री (लौह, मैंगनीज जिंक और पॉलीमर) उपचारात्मक प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं और फिर मानव शरीर में कोई इम्प्लांट अवशेष छोड़े बिना शरीर की संरचना को बरकरार रखते हुए धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। ये सामग्री अभी इस्तेमाल हो रहे धातुओं के इम्प्लांट का बेहतर विकल्प हैं जो स्थायी रूप से मानव शरीर में पड़े रहते हैं और धीरे-धीरे विषाक्तता, स्थायी सूजन एवं फ्रोमबाउसिस जैसे साइड इफेक्ट्स का कारण बन जाते हैं।
एआरसीआई की टीम ने स्वाभाविक रूप से सड़नशील लौह मैंगनीज युक्त मिश्र धातु और स्टेन्ट बनाने में दोनों पारंपरिक मेल्टिंग और पाउडर मेटलर्जी तकनीक का इस्तेमाल किया है। स्टेन्ट का आकार इस प्रकार है: व्यास 2 एमएम, लंबाई 12 एमएम, वॉल की मोटाई 172 म्यूएम।
लौह और मैंगनीज युक्त मिश्र धातु लौह- मैंगनीज (भार के संदर्भ में मैंगनीज धातु 29 प्रतिशतसे अधिक) एक भरोसेमंद स्वभाविक रूप से सड़नशील धातु का इम्प्लांट है जो एमआरआई के अनुकूल एकल ऑस्टेनाइटी फेस (लोहे का गैर चुंबकीय प्रारूप) दर्शाता है।
एआरसीआई में बनाए गए लौह- मैंगनीज मिश्र धातु ने प्रभावी यांत्रिकी गुणों के साथ 99 प्रतिशतघनत्व दर्शाया और 20 टेस्ला के चुंबकीय क्षेत्र में भी गैर चुंबकीय सामग्री की तरह व्यवहार किया। इसके ये गुण अभी इस्तेमाल हो रहे स्थाई टाइटेनियम (टीआई) और स्टेनलिस स्टील धातु के इम्प्लांट से तुलना करने योग्य हैं। इस मिश्र धातु ने कृत्रिम काया द्रव्य में सालाना 0.14 से लेकर 0.026 एमएम के दायरे में विघटन दर भी प्रदर्शित किया। इसका मतलब है कि लौह मैंगनीज मिश्र धातु 3 से 6 महीने के लिए यांत्रिकी समग्रता दिखाता है और 12 से 24 महीने में शरीर से पूरी तरह गायब हो जाता है।
विघटन प्रक्रिया के दौरान स्थानिक क्षारियन और कैल्शियम एवं फॉस्फेट की परिपूर्णता की वजह से इम्प्लांट पर कैल्शियम फॉस्फेट जम जाता है, इससे कोशिकाएं उत्तक बनाने के लिए सतह से चिपक जाती हैं।
एआरसीआई की टीम इसमें कुछ अतिरिक्त धातु मिलाकर एवं सर्फेस इंजीनियरिंग के जरिए इसके विनाशन दर पर नियंत्रण हासिल करने के लिए अभी और कोशिश कर रही है। टीम इसके उन्नत निर्माण प्रक्रिया को भी लागू करने की कोशिश में है।
इन प्रभावशाली नतीजों के आधार पर एआरसीआई की टीम इस बात को लेकर आश्वस्त है कि यह नई लौह-मैंगनीज युक्त मिश्र धातु स्वाभाविक रूप से सड़नशील स्टेन्ट और ऑर्थोपेडिक इम्प्लांट अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त है। श्री चित्र टिरुनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में टीम द्वारा इस पर अभी और अध्ययन करने की योजना बनाई जा रही है।
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कैबिनेट सचिव ने बंगाल की खाड़ी में आने वाले चक्रवाती तूफान की तैयारी की समीक्षा के लिए एनसीएमसी बैठक की अध्यक्षता की
कैबिनेट सचिव श्री राजीव गौबा की अध्यक्षता में राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति (एनसीएमसी) की आज एक बैठक बंगाल की खाड़ी में आने वाले चक्रवाती तूफान की तैयारी की समीक्षा के लिए आयोजित की गई।
आईएमडी ने सूचित किया कि बंगाल की खाड़ी में जो दबाव बना है, उसके एक चक्रवाती तूफान में बदल जाने और 20 मई, 2020 तक ओडिशा और पश्चिम बंगाल के तटों से गुजरने का अनुमान है। बेहद तेज गति की हवाओं और ज्वारीय लहरों के साथ भारी से बहुत भारी वर्षा होने का अनुमान है।
बैठक के दौरान, संबंधित राज्य सरकारों ने चक्रवाती तूफान से उत्पन्न किसी भी उभरती स्थिति से निपटने की उनकी तैयारियों की पुष्टि की। इसके अतिरिक्त, राज्य सरकारों ने मछुआरों को समुद्रर में न जाने की पर्याप्त चेतावनी दे दी है। तूफान आश्रय स्थलों को तैयार कर लिया गया है और जिन क्षेत्रों से लोगों की निकासी की जानी है, उनकी पहचान कर ली गई है।
एनडीआरएफ, सशस्त्र बलों और भारतीय तटरक्षक को सावधान कर दिया गया है और वे राज्य सरकार के प्राधिकारियों के साथ समन्वय कर रहे है। उन्होंने खुद को समुचित रूप से मुस्तैद कर रखा है। गृह मंत्रालय भी राज्य सरकारों और संबंधित केंद्रीय एजेन्सियों के साथ सतत संपर्क में है।
कैबनेट सचिव ने वर्तमान स्थिति और बचाव और राहत कार्यों की तैयारियों का जायजा लिया और निर्देश दिया कि जैसी भी आवश्यकता हो, तत्काल सहायता उपलब्ध कराई जाए।
गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय तथा आईएमडी, एनडीएमए एवं एनडीआरएफ के वरिष्ठ अधिकारियों ने बैठक में भाग लिया। राज्य सरकारों के मुख्य सचिवों एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बैठक में भाग लिया।
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भारत की कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (CERT) ने “EventBot” नामक एक नए मैलवेयर के खिलाफ चेतावनी जारी की है। CERT के अनुसार यह मैलवेयर एंड्राइड फोन उपयोगकर्ताओं से व्यक्तिगत वित्तीय जानकारी चुराता है।
मुख्य बिंदु
इवेंट बॉट मैलवेयर एक ट्रोजन है। यह गुप्त रूप से कंप्यूटर या फोन ऑपरेटिंग सिस्टम पर हमला करता है। वर्तमान में, यह मैलवेयर 200 से अधिक विभिन्न वित्तीय एप्लीकेशन को प्रभावित करने में सक्षम है।
वर्तमान परिदृश्य
सीईआरटी के अनुसार इस मैलवेयर ने वर्तमान में पेपाल, यूनीक्रिडिट, एचएसबीसी, कॉइनबेस, ट्रांसफर वायर आदि जैसे वित्तीय एप्लीकेशन पर हमला किया है।
CERT
CERT इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत संचालित होता है। यह भारत की नोडल एजेंसी है जो हैकिंग, साइबर सुरक्षा खतरों, फ़िशिंग के विरुद्ध कार्य करती है। अंतर्राष्ट्रीय उपायों के अलावा, CERT भारत के भीतर कई पहल लागू कर रहा है। इसमें मुख्य रूप से “साइबर स्वच्छ केंद्र” शामिल है।
साइबर स्वच्छता केंद्र
साइबर स्वच्छ केंद्र का लक्ष्य देश के भीतर बॉटनेट संक्रमण का पता लगाकर सुरक्षित साइबर स्पेस बनाना है। यह CERT द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 70 B में प्रावधान के अनुसार संचालित है।
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राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने हाल ही में घोषणा की कि वे अपने वेतन का 30% COVID-19 के खिलाफ लड़ाई में भारत सरकार की सहायता के लिए दान करेंगे। राष्ट्रपति भवन पैसे बचाने और इस लड़ाई में मदद करने के लिए राष्ट्रपति के निर्देश का पालन करेगा। यह COVID-19 के खिलाफ लड़ने के लिए खर्च को कम करने और पैसे बचाने के लिए एक उदाहरण स्थापित करने के लिए किया जा रहा है।
मुख्य बिंदु
वेतन कटौती के अलावा, राष्ट्रपति के घरेलू दौरे और कार्यक्रमों में भी कटौती की जाएगी। यह खर्च को कम करने में मदद करेगा। इसके अलावा, राष्ट्रपति विभिन्न समारोह में अपनी अतिथि सूचियों को कम करेंगे, भोजन मेनू को कम करेंगे और फूलों और सजावटी वस्तुओं का उपयोग कम से कम करेंगे। राष्ट्रपति भवन की मरम्मत और रखरखाव कार्यों को कम से कम किया जाएगा।
राष्ट्रपति का वेतन
केंद्रीय बजट 2018 ने देश के राष्ट्रपति और उपाध्यक्ष के वेतन में वृद्धि की। वर्तमान में, भारत के राष्ट्रपति का वेतन प्रति माह 5 लाख है। बढ़ाने से पहले, यह प्रति माह 1.5 लाख रुपये था। साथ ही, उपाध्यक्ष का वेतन 1.10 लाख रुपये से बढ़ाकर 4 लाख रुपये कर दिया गया। राज्य के राज्यपालों का वेतन भी बढ़ाकर 3.5 लाख रुपये कर दिया गया।
अनुच्छेद 59
इस अनुच्छेद के अनुसार भारत के राष्ट्रपति के वेतन और भत्ते को उनके कार्यकाल के दौरान कम नहीं किया जाएगा। लेकिन इस मामले में, राष्ट्रपति इसे अपनी मर्जी से दान के रूप में पेश कर रहे हैं और वेतन में कटौती नहीं की जा रही है।
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केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा ने “गोलकार्यक्रम” की शुरुआत की। GOAL का पूर्ण स्वरुप ‘Going Online As Leaders’ है। यह कार्यक्रम फेसबुक के साथ साझेदारी में शुरू किया गया है।
मुख्य बिंदु
आदिवासी युवाओं को डिजिटल मोड में मेंटरशिप प्रदान करने के लिए यह कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है। यह आदिवासी युवाओं की छिपी प्रतिभाओं को बाहर लाने के लिए उत्प्रेरक का काम करेगा। साथ ही, यह उनके व्यक्तिगत विकास में मदद करेगा।
लाभ
यह कार्यक्रम 5,000 से अधिक आदिवासी युवाओं को सशक्त बनाने में मदद करेगा। इस कार्यक्रम को दीर्घकालिक मिशन के साथ तैयार किया गया है। यह आदिवासी युवाओं और महिलाओं की क्षमता को विकसित करने में मदद करेगा। साथ ही, यह उन्हें खाद्य प्रसंस्करण, बागवानी, मधुमक्खी पालन, औषधीय जड़ी बूटियों आदि में मेंटरशिप के माध्यम से ज्ञान और कौशल प्राप्त करने में मदद करता है।
पोर्टल
मंत्रालय ने इच्छुक उम्मीदवारों से आवेदन आमंत्रित करने के लिए goal.tribal.gov.in नामक एक पोर्टल भी खोला है। मेंटर और प्रशिक्षुओं को इस पोर्टल पर पंजीकरण करना होगा, यह पोर्टल मई और जुलाई, 2020 के बीच खुला रहेगा।
कार्यक्रम
यह कार्यक्रम कृषि, हस्तशिल्प और वस्त्र, कला और संस्कृति, पोषण आदि जैसे क्षेत्रों पर जीवन कौशल, डिजिटल साक्षरता, नेतृत्व और उद्यमिता पर केंद्रित होगा।
अन्य प्रयास
इस कार्यक्रम के साथ भारत सरकार स्टार्ट अप इंडिया, मुद्रा योजना, कौशल विकास योजना, जन धन योजना के विलय की योजना बना रही है। इससे लाभार्थियों को बढ़ाने में मदद मिलेगी।
