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अफ्रीकी संघ
अफ्रीकी संघ एक महाद्वीपीय निकाय है जिसमें अफ्रीका महाद्वीप के 55 सदस्य देश शामिल हैं।
इसे वर्ष 1963 में स्थापित अफ्रीकी एकता संगठन (Organisation of African Unity) के स्थान पर आधिकारिक रूप से जुलाई 2002 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन में गठित किया गया।
अफ्रीकी संघ का सचिवालय आदिस अबाबा में स्थित है।
उद्देश्य
अफ्रीकी देशों और उनके लोगों के बीच अधिक एकता और एकजुटता हासिल करना।
अपने सदस्य देशों की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता की रक्षा करना।
अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित करना।
व्यापार, रक्षा और विदेशी संबंधों पर सामान्य नीतियों को विकसित करना और बढ़ावा देना, ताकि महाद्वीप की रक्षा और इसकी वार्ता की स्थिति को मज़बूत किया जा सके।
संबंधों को बेहतर करने में सहायक उपाय
विविधता पर ध्यान देना: प्रत्येक राष्ट्र की वैयक्तिकता का भिन्न तरीके से ध्यान रखकर , क्योंकि अफ्रीका एक एकल राजनीतिक इकाई नहीं है और यहाँ काफी विविधता है।
सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करके: सभ्यता संबंधी एवं ऐतिहासिक संबंधों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ने पर, क्योंकि संबंधों को और आगे ले जाने के लिये विश्वास और आत्मविश्वास ज़रूरी हैं।
आकांक्षापूर्ण अर्थव्यवस्थाओं के लिये समर्थन: आकांक्षापूर्ण अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाएँ जो भारत के समान स्तर पर आना चाहती हैं, उन्हें समर्थन प्रदान कर (एजेंडा 2063)।
एजेंडा 2063: अफ्रीका को भविष्य के वैश्विक पावर हाउस में रूपांतरित करने के लिये यह अफ्रीका का ब्लूप्रिंट और मास्टर प्लान है। यह महाद्वीप का रणनीतिक ढाँचा है जो समावेशी और संवहनीय विकास के लिये इसके लक्ष्यों को प्रदान करने हेतु लक्षित है और एकता, आत्मनिर्णय, स्वतंत्रता, उन्नति और सामूहिक समृद्धि के लिये पैन-अफ्रीकन अभियान की ठोस अभिव्यक्ति है।
संवृद्धि और विकास: आर्थिक संवृद्धि, आर्थिक एवं औद्योगिक साझेदारी पर ध्यान केन्द्रित कर, पहले से परिकल्पित परियोजनाओं पर साथ कार्य करने के लिये सहक्रिया खोजना और चालू योजनाओं पर उन्हें लागू करना।
सुरक्षा: विवाद का भाव पैदा किये बिना अपने स्वयं के सुरक्षा हितों को सावधानी से व्यवस्थित करना। ऐसा न करने पर यह एक नाजुक स्थिति बन सकती है तथा और अधिक असुरक्षा को जन्म दे सकती है। अतः उस प्रकार के संपर्कों पर कार्य करना, विश्वास को मजबूत करना और भावी फ़ायदों के लिये कार्य करना।
आगे की राह
भारत और अफ्रीका को एक मज़बूत आधार बनाने की आवश्यकता है जो पहले से ही विद्यमान है तथा सतत तरीके से और अधिक कूटनीतिक मिशन स्थापित करने और अधिक व्यापार मिशन, लगातार उच्चस्तरीय अनुबंध हेतु कार्य करना चाहिये, जिसमें शिखर स्तर पर संपर्क भी शामिल है। महत्त्वपूर्ण रूप से भारतीय अनुसंधान संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में अफ्रीका के अध्ययन के विकास के लिये सतत प्रयास किए जाने चाहिये।
सहयोग के समकालीन क्षेत्रों, जैसे- अर्थव्यवस्था, निवेश, अवसंरचना विकास और मानव संसाधन पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिये।
हमें अफ्रीकी लोगों के विकास में सहयोग करने की आवश्यकता है इसके लिये हमें डॉक्टरों, शिक्षकों और अन्य पेशेवरों को प्रशिक्षित करना ज़रूरी है। हमें पश्चिम अफ्रीकी देशों में अपनी उपस्थिति बनाए रखने की आवश्यकता होगी क्योंकि वे प्राकृतिक संसाधनों में विशेष रूप से तेल और कच्चे माल में समृद्ध हैं।
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सुरक्षाभारत और अफ्रीकी राष्ट्रों- दोनों द्वारा सुरक्षा आवश्यकताओं पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिये और प्रशिक्षण मामले में दोनों एक-दूसरे की सहायता कर सकते हैं।
आतंकवाद रोधी और समुद्री डकैती रोधी गठबंधन द्वारा समुद्री क्षेत्रों की सुरक्षा के लिये समुद्री सुरक्षा को प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है।
आतंकवादी संपर्क के कारण सुरक्षा संबंध लगातार महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं। अफ्रीका में दो बड़े आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं। पश्चिम अफ्रीकी क्षेत्र में बोको हरम तथा पूर्व अफ्रीकी क्षेत्र में अल-शबाब। ये दोनों बड़े बहुराष्ट्रीय आतंकी संगठन अल-कायदा से जुड़े हैं जो आगे पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ जाते हैं।
भारत और अफ्रीका के सामान्य हित के क्षेत्र, जैसे- सुरक्षा के क्षेत्र के रूप में हिंद महासागर और आर्थिक सहयोग के मुद्दों पर और ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।
कृषिइस क्षेत्र में सहयोग अत्यधिक संभावना है क्योंकि कई अफ्रीकी देशों में बड़ी मात्रा में अप्रयुक्त कृषि भूमि है। इसमें उद्यम करने पर खाद्य सुरक्षा मुद्दे को हल किया जा सकता है।
इस क्षेत्र की भारत के साथ पूरकता है क्योंकि हमारे पास कृषि उत्पादन में दक्ष जनसंख्या, एक बड़ा बाजार और प्रोसेसिंग क्षमता है।
अफ्रीका में भारतीयों के लिये कृषि कार्य को संभव बनाने के लिये भारत सरकार को एक विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) या इकाई बनानी चाहिये, क्योंकि इस प्रकार के विशाल उद्यम की व्यवस्था करना किसी एकल निकाय के लिये संभव नहीं है।
विशेष प्रयोजन वाहन
विशेष प्रयोजन वाहन को विशेष प्रयोजन इकाई भी कहा जाता है, यह वित्तीय जोखिमों को अलग रखने के लिये मूल कंपनी द्वारा निर्मित एक सहायक संस्था है। एक अलग कंपनी के रूप में इसकी कानूनी स्थिति इसके उत्तरदायित्वों को सुरक्षित करती है, चाहे मूल कंपनी दिवालिया ही क्यों न हो जाए।
सामान्य जुड़ावभूतकाल से संबद्धताएँ जैसे गांधी-मंडेला-एंक्रूमा जैसे नेताओं को आपस में संबद्ध करके।
उपनिवेश विरोधी, जातिवाद अपनी जड़ों को खोज रहा है और वह उसे पुनः प्राप्त करना चाहता है अतः हमें इस कारक का दोहन करना चाहिये जिसमें पारंपरिक और सांस्कृतिक जुड़ाव, जैसे- बंबइया फिल्में और शास्त्रीय नृत्य एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
भारत को अफ्रीका तक पहुँच बनाने और चीन की तरह संबद्ध होने की आवश्यकता है ताकि हमारी संस्कृतियों का मिश्रण हो सके और विकास के लिये और अधिक संभावनाएँ खोजी जा सकें।
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भारत-अफीका संबंध
वैश्विक महामारी COVID-19 का प्रसार विश्व के लगभग सभी देशों में हो चुका है। अफ्रीका महाद्वीप भी इस महामारी से अछूता नहीं रहा है, लेकिन इसका प्रभाव विशेष रूप से अफ्रीका में विनाशकारी हो सकता है क्योंकि अफ्रीका महाद्वीप में आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य की स्थिति बेहद कमज़ोर है। अफ्रीकी देशों ने न केवल मास्क, वेंटिलेटर बल्कि साबुन और पानी जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की कमी के बावज़ूद कोरोना वायरस के प्रारंभिक प्रसार पर अंकुश लगाने के लिये तेजी से कदम उठाए हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य की बेहद कमजोर स्थिति के कारण अफ्रीका वाह्य सहायता पर निर्भर है। अफ्रीका को इस वैश्विक महामारी में कार्य कर रहे अग्रिम पंक्ति के सार्वजनिक स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिये चिकित्सा सुरक्षा उपकरण और समर्थन की आवश्यकता है। एशिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ अफ्रीका में लंबे समय से कार्यरत हैं, भारत और चीन ने चिकित्सा सहायता के माध्यम से अफ्रीका में अपनी पहुँच बढ़ाई है। भारत और अफ्रीका के बीच अनुक्रियाओं का एक दीर्घ और समृद्ध इतिहास रहा है जिसमें दक्षिण-दक्षिण सहयोग पर आधारित सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक विनिमय उल्लेखनीय हैं। हाल के वर्षों में इन सबंधों को आगे बढ़ाने और मजबूत करने के लिये कई कदम उठाए गए हैं।
भारत-अफीका संबंध
भारत का अफ्रीकी क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना कोई नई बात नहीं है। पिछले 3-4 दशकों से भारत ने इस महाद्वीप के साथ सक्रिय रूप से कार्य किया है। हालाँकि, पिछले दशक से इसमें और तेज़ी आई है और साथ ही कुछ वर्षों में इस संबंध में कई गुना वृद्धि देखी गई है।
दिल्ली में तीसरे भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन की ताजपोशी के दौरान भारत ने पहली बार अफ्रीका को एक गुट के रूप में नहीं देखा था बल्कि अफ्रीकी गुट वाले व्यक्तिगत देशों के रूप में देखा था।
रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से अफ्रीका हमारे लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है।
भारत जापान के साथ एशिया-अफ्रीका गलियारे जैसे त्रिपक्षीय साझेदारी पर ध्यान केंद्रित कर रहा है और मुखर होकर बॉटम-अप साझेदारी दृष्टिकोण को अपना रहा है।
पिछले दशकों में भारत द्वारा अफ्रीका के साथ संवाद कायम किया गया है न कि एकतरफा एकालाप। इस प्रकार भारत ने अफ्रीकी लोगों में आत्मविश्वास उत्पन्न किया है।
अफ्रीकी देशों के साथ भारत की भागीदारी हमेशा द्विपक्षीय रही है। उदाहरण के तौर पर भारत-दक्षिण अफ्रीका द्विपक्षीय संबंध को देखा जा सकता है। जिन विभिन्न व्यापारिक गुटों के साथ साझेदारी के लिये प्रयास किया जाना चाहिये उनमें से COMESA, ECOWAS, ECCAS, अफ्रीका के मुक्त व्यापार क्षेत्र प्रमुख हैं।
भारत-अफ्रीका के मध्य सहयोग के क्षेत्र
आर्थिक एवं व्यापारिक संबंधभारत व अफ्रीकी संबंधों के प्रारंभिक दशकों में दोनों के मध्य व्यापार लगभग नगण्य था लेकिन वर्तमान में यह 65 बिलियन डॉलर का स्तर पार कर चुका है। भारत और अफ्रीकी संघ के देश मिलकर विश्व जनसंख्या का लगभग एक तिहाई हैं, अतः एक-दूसरे का ध्यान रखते हुए सहयोग करना और आगे बढ़ना लाभकारी है।
भारत का व्यवसाय और उद्यम इसकी स्थिति बदलते रहे हैं और वर्तमान में अफ्रीका में बड़ी संख्या में भारतीय कंपनियाँ मौजूद हैं। अतः वर्ष 1990 के दशक के आर्थिक सुधारों के बाद राष्ट्र निर्माण का भाव परिवर्तित हो चुका है और भारतीय उद्यम काफी प्रभावशाली और बहुराष्ट्रीय हो गए हैं।
अफ्रीका के बारे में एक विविधतापूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाए क्योंकि वहाँ अन्य के अलावा अंग्रेजीभाषी, फ्रेंचभाषी और पुर्तगालीभाषी (अफ्रीकी देशों का भाषाई वर्गीकरण) हैं। अंग्रेजीभाषी अफ्रीकियों के साथ व्यापार एवं व्यवसाय के हमारे पारंपरिक रिश्ते रहे हैं, लेकिन बाकी अन्य दो के साथ हमारे रिश्ते शुरू होने की प्रक्रिया में हैं और उन पर और बल दिये जाने की आवश्यकता है।
भारत को यूरेनियम, सोना, प्लूटोनियम, कॉपर आदि जैसे कच्चे माल की आवश्यकता है जिसे अफ्रीका से मंगाया जा सकता है और इसके बदले भारत उन्हें तैयार उत्पाद दे सकता है। हमारे कई हित विषम हैं जहाँ भारत कुछ बेहतर स्थिति में है जिसे हम और आगे ले जा सकते हैं।
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आगे की राह
आँकड़ों के अनुसार, भारत में दो मिलियन से भी अधिक सामाजिक उद्यम हैं। इसलिये सामाजिक उद्यमों हेतु सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) का निर्माण करते समय काफी सावधानीपूर्वक योजना के निर्माण की आवश्यकता है।
इस संबंध में विश्व के अन्य देशों द्वारा प्रयोग किये जा रहे मॉडल का भी अध्ययन किया जा सकता है और उसे भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तित किया जा सकता है।
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Securities and Exchange Board of India-(SEBI) द्वारा गठित कार्यकारी समूह ने गैर-लाभकारी संगठनों (Non-Profit Organisations) को बॉण्ड जारी करके सीधे सोशल स्टॉक एक्सचेंज (Social Stock Exchanges-SSE) पर सीधे सूचीबद्ध होने की अनुमति देने की सिफारिश की है।
प्रमुख बिंदु
उल्लेखनीय है कि वित्तीय वर्ष 2019-20 के बजट भाषण के दौरान वित्त मंत्री ने सामाजिक उद्यम और स्वैच्छिक संगठनों (Voluntary Organisations) को सूचीबद्ध करने के लिये SEBI के विनियामक दायरे के तहत एक सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) गठित करने की दिशा में कदम उठाने का प्रस्ताव दिया था।
वित्त मंत्री के निर्देशानुसार, SEBI सितंबर, 2019 में इशरात हुसैन की अध्यक्षता में सोशल स्टॉक एक्सचेंज (Social Stock Exchanges-SSE) पर एक कार्यकारी समूह का गठन किया था, जिसमें सामाजिक कल्याण (Social Welfare) की दिशा में सक्रिय हितधारक तथा वित्त मंत्रालय, स्टॉक एक्सचेंज और गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे।
इस कार्यकारी समूह ने देश में सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) के निर्माण के लिये निम्नलिखित सिफारिशें की हैं-गैर-लाभकारी संगठन सीधे बॉण्ड जारी करने के माध्यम से SSE पर सूचीबद्ध हो सकते हैं।
वैकल्पिक निवेश कोष (Alternative Investment Funds) के तहत कुछ मौजूदा तंत्रों जैसे कि सामाजिक उद्यम निधि (Social Venture Funds-SVFs) समेत विभिन्न फंडिंग तंत्रों की सिफारिश की गई है।
उन संगठनों के लिये एक नया न्यूनतम रिपोर्टिंग मानक प्रस्तावित किया गया है जो SSE के तहत धन एकत्रित करेंगे।
इसके अतिरिक्त कार्यकारी समूह ने सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) पर भागीदारी को प्रोत्साहन देने के लिये कुछ कर प्रोत्साहन देने की भी सिफारिश की है।
कार्यकारी समूह ने प्रतिभूति लेन-देन कर (Securities Transaction Tax-STT) और पूंजीगत लाभ कर (Capital Gains Tax-CGT) को समाप्त करने की सिफारिश की है।
साथ ही परोपकारी दानकर्त्ताओं (Philanthropic Donors) को 100 प्रतिशत कर छूट देने की भी सिफारिश की गई है।
कार्यकारी समूह के अनुसार, लाभ कमाने वाले सामाजिक संगठन भी सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) पर सूचीबद्ध हो सकेंगे, किंतु उन्हें कुछ अधिक रिपोर्टिंग मानकों का पालन करना होगा।
सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) की अवधारणा
सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो निवेशकों को सामाजिक उद्यमों में शेयर खरीदने की अनुमति देता है।
केंद्रीय बजट-2019 में भारत में अपनी तरह के पहले सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया था।
इस संबंध में घोषणा करते हुए वित्तीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि ‘यह समय पूंजी बाज़ार को आम जनता के और अधिक करीब ले जाने और समावेशी विकास तथा वित्तीय समावेशन से संबंधित विभिन्न सामाजिक कल्याण उद्देश्यों को पूरा करने का समय है।
अपने गठन के बाद सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) एक सामान्य मंच के रूप में कार्य करेगा जहाँ सामाजिक उद्यम आम जनता और निवेशकों से धन जुटा सकते हैं।
यह देश के प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज जैसे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) आदि की तर्ज पर ही कार्य करेगा, हालाँकि सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) का उद्देश्य लाभ कमाना न होकर सामाजिक कल्याण करना होगा।
सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) की आवश्यकता
संयुक्त राष्ट्र जैसे विभिन्न वैश्विक निकायों द्वारा निर्धारित मानव विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिये आगामी वर्षों में भारत को बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी और यह केवल सरकारी व्यय अथवा निवेश के माध्यम से नहीं किया जा सकता है।
सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले निजी उद्यमों को भी अपनी गतिविधियों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
वर्तमान में, भारत में सामाजिक उद्यम बहुत सक्रिय हैं, हालाँकि उन्हें धन जुटाने में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसमें सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है आम निवेशकों में विश्वास की कमी।
इस विषय पर प्रस्तुत एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में एक संपन्न सामाजिक उद्यम पारिस्थितिकी तंत्र है, हालाँकि देश में कई संगठनों को अपनी ज़रूरत की पूंजी प्राप्त करने के लिये संघर्ष का सामना करना पड़ता है।
सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) एक ऐसा मंच प्रदान करने का प्रयास करेगा जहाँ निवेशक स्टॉक एक्सचेंज द्वारा अधिकृत सामाजिक उद्यमों में निवेश कर सकेंगे, जिससे निवेशकों में विश्वास पैदा होगा।ऐसे सामाजिक उद्यमों को अपनी गतिविधियों और निवेशों का विवरण पारदर्शी तरीके से आम जनता के साथ साझा करना होगा।
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प्रधानमंत्री कार्यालय (Prime Minister's Office-PMO) ने पीएम-केयर्स फंड (PM-CARES Fund) के संबंध में RTI अधिनियम के तहत दायर आवेदन में मांगी गई सूचना को देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत पीएम-केयर्स फंड एक 'सार्वजनिक प्राधिकरण' (Public Authority) नहीं है।
प्रमुख बिंदु
हाल ही में केंद्र सरकार ने COVID-19 महामारी द्वारा उत्पन्न किसी भी प्रकार की आपातकालीन या संकटपूर्ण स्थिति से निपटने हेतु ‘आपात स्थितियों में प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और राहत कोष (Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations Fund)’ अर्थात् ‘पीएम-केयर्स फंड’ (PM-CARES Fund) की स्थापना की थी।
इस फंड की घोषणा के बाद याचिकाकर्त्ता ने अपने RTI आवेदन में ‘पीएम-केयर्स फंड’ की ट्रस्ट डीड और इसके निर्माण तथा संचालन से संबंधित सभी सरकारी आदेशों, अधिसूचनाओं और परिपत्रों की प्रतियाँ मांगी थीं।ट्रस्ट डीड (Trust Deed) के तहत ट्रस्ट का व्यवस्थापक ट्रस्ट की संपत्ति को ट्रस्ट के संरक्षकों अर्थात ट्रस्टियों (Trustees) को हस्तांतरित करता है और ट्रस्टियों को ट्रस्ट डीड में निर्दिष्ट नियमों और शर्तों के अनुसार कार्य कार्य करना अनिवार्य बनाता है।
ट्रस्ट डीड में मुख्यतः निम्नलिखित तथ्य शामिल होते हैं- (1) ट्रस्ट के गठन का उद्देश्य (2) फंड कहाँ से लिया जा सकता है और कहाँ से नहीं (3) ट्रस्टी की शक्तियाँ।
इस संबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा दिये गए जवाब के अनुसार, ‘RTI अधिनियम, 2005 की धारा 2(h) के दायरे में ‘पीएम-केयर्स फंड’ एक ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ नहीं है। हालाँकि इस फंड से जुड़ी प्रासंगिक जानकारियाँ संबंधित वेबसाइट से प्राप्त की जा सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी कई अवसरों पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने ‘पीएम-केयर्स फंड’ के संबंध में आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया था।
RTI अधिनियम, 2005 की धारा 2(h)
ज्ञातव्य है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2(h) के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण से तात्पर्य ऐसी संस्थाओं से है:जो संविधान या इसके अधीन बनाई गए किसी अन्य विधान द्वारा निर्मित हो;
राज्य विधानमंडल द्वारा या इसके अधीन बनाई गई किसी अन्य विधि द्वारा निर्मित हो;
केंद्र या राज्य सरकार द्वारा जारी किसी अधिसूचना या आदेश द्वारा निर्मित हो;
पूर्णत: या अल्पत: सरकारी सहायता प्राप्त हो।
RTI आवेदक का पक्ष
आवेदक के अनुसार, यदि देश में पहले से ही प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (Prime Minister’s National Relief Fund) है तो फिर एक अन्य फंड का गठन क्यों किया गया।
आवेदक के मुताबिक इस फंड में ऐसे विभिन्न तथ्य हैं जो इसे एक ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ बनाते हैं, उदाहरण के लिये पीएम-केयर्स फंड एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट (Public Charitable Trust) है और प्रधानमंत्री इसके पदेन अध्यक्ष हैं।साथ ही रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री इसमें पदेन ट्रस्टीयों के रूप में शामिल हैं, जो कि स्पष्ट तौर पर इसके सार्वजनिक प्राधिकरण होने का संकेत देता है।
इस प्रकार ट्रस्ट की संरचना यह दर्शाने के लिये पर्याप्त है कि सरकार का ट्रस्ट पर अत्यधिक नियंत्रण है, जिससे यह एक सार्वजनिक प्राधिकरण बन जाता है।
विदित हो कि इस फंड के संबंध में जारी आवश्यक दिशा-निर्देशों में भी यह काफी अस्पष्ट है कि पीएम-केयर्स फंड सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत आता है अथवा नहीं?
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष
(Prime Minister’s National Relief Fund)
पाकिस्तान से विस्थापित लोगों की मदद करने के लिये जनवरी, 1948 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की अपील पर जनता के अंशदान से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष की स्थापना की गई थी।
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष की धनराशि का इस्तेमाल अब प्रमुखतया बाढ़, चक्रवात और भूकंप आदि जैसी प्राकृतिक आपदाओं में मारे गए लोगों के परिजनों तथा बड़ी दुर्घटनाओं एवं दंगों के पीड़ितों को तत्काल राहत पहुँचाने के लिये किया जाता है।
प्रधान मंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में किये गये अंशदान को Income Tax Act, 1961 के तहत कर योग्य आय से पूरी तरह छूट हेतु अधिसूचित किया जाता है।
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लोकसभा के नियम 266 एवं 267
Rule 266 and 267 of the Lok Sabha
राज्य सभा सचिवालय ने वीडियोकाॅन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पैनल की बैठक में शामिल होने के लिये गृह मामलों की स्थायी समिति के सदस्यों को अनुमति देने से इंकार कर दिया।
प्रमुख बिंदु:
समिति में वीडियोकाॅन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठकों की अनुमति नहीं दिये जाने का मुख्य कारण बताया गया कि इससे गोपनीयता के सिद्धांत का उल्लंघन होता है और इस तरह के आयोजनों में अकेले बैठे सदस्य की कोई गारंटी नहीं होती है।
लोकसभा के नियम:
नियम 267:
इस नियम में कहा गया है कि समिति की बैठकें संसद भवन में ही होंगी। हालाँकि अध्यक्ष के पास उन बैठकों का स्थान बदलने की शक्तियाँ हैं।
नियम 266:
इस नियम में बताया गया है कि सभी समिति की बैठकें निजी तौर पर आयोजित की जानी चाहिये, जो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठकों का एक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराती हैं ।
यह अनिवार्य है कि समिति की बैठकों में सरकार द्वारा साझा की गई जानकारी की गोपनीयता की रक्षा हो। इसलिये यह तर्क दिया गया है कि जब समिति के सदस्य विभिन्न संस्थानों में कार्य करते हों तब आभासी बैठकों में गोपनीयता की रक्षा करना मुश्किल हो सकता है।
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मेरा जीवन मेरा योग
My Life My Yoga
31 मई, 2020 को प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के प्रति ‘मन की बात’ संबोधन के दौरान ‘मेरा जीवन मेरा योग’ (My Life My Yoga) (इसे ‘जीवन योग’ भी कहा गया है) वीडियो ब्लॉगिंग प्रतियोगिता की घोषणा की।
सहयोगी संस्थान:
यह आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) और Indian Council for Cultural Relations-(ICCR) का संयुक्त प्रयास है।
उद्देश्य:
इस वीडियो ब्लॉगिंग प्रतियोगिता का उद्देश्य योग के बारे में लोगों में जागरूकता उत्पन्न करना और आगामी अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस-2020 के अवलोकन में सक्रिय भागीदार बनने के लिये प्रेरित करना है।
प्रमुख बिंदु:
यह प्रतियोगिता व्यक्ति के जीवन में योग के परिवर्तनकारी प्रभाव पर केंद्रित है और 21 जून, 2020 को आगामी छठे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (International Day of Yoga- IDY) के अवलोकन से संबंधित गतिविधियों के रूप में शुरू की गई है।
इस प्रतियोगिता में विश्व भर से कोई भी व्यक्ति भाग ले सकता है। इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये प्रतिभागियों को तीन योगाभ्यासों जैसे- आसन, क्रिया, बंध, प्राणायाम और मुद्रा पर एक 3 मिनट का वीडियो अपलोड करना होगा और उसमें प्रतिभागियों को यह संदेश भी शामिल करना होगा कि इन योगाभ्यासों ने उनके जीवन को कैसे प्रभावित किया है।
यह प्रतियोगिता फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के माध्यम से जन भागीदारी का समर्थन करेगी।
इस प्रतियोगिता में प्रथम तीन विजेताओं को पुरस्कार के रूप में क्रमशः 1 लाख रुपए, 50 हजार रुपए, 25 हजार रुपए प्रदान करने की भी घोषणा की गई है।
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फाइल शेयरिंग वेबसाइट ‘वीट्रांसफर’
सरकार ने इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (आईएसपी) को सुरक्षा कारणों से कंप्यूटर फाइल शेयरिंग वेबसाइट वीट्रांसफर पर रोक लगाने के लिये कहा है। यह आदेश दिल्ली पुलिस के अनुरोध पर दिया गया है। दूरसंचार विभाग ने 18 मई को जारी आदेश में इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को नीदरलैंड की वेबसाइट वीट्रांसफर पर दो डाउनलोड लिंक को और पूरी वेबसाइट ‘वीट्रांस्फर डॉट कामॅ’ को ब्लॉक करने को कहा है।
पृष्ठभूमि
दिल्ली पुलिस ने सूचना प्रसारण मंत्रालय से दो लिंक को और पूरी वेबसाइट को तत्काल ब्लॉक करने का अनुरोध किया था। इसी के आधार पर यह आदेश दिया गया है।’’ मंत्रालय ने दूरसंचार विभाग को कहा है कि वह इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को बेवसाइट ब्लॉक करने का निर्देश दे। विभिन्न इंटरनेट सेवाप्रदाताओं को ई-मेल के जरिये भेजे आदेश में दूरसंचार विभाग ने कहा है कि इसके अनुपालन की जानकारी तत्काल दी जाये, अन्यथा लाइसेंस की शर्तों के तहत कार्रवाई की जायेगी।
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इनसाइडर ट्रेडिंग (भेदिया कारोबार)
चर्चा में क्यों?
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने बैंक ऑफ राजस्थान के पूर्व प्रवर्तकों समेत पांच इकाइयों पर कथित भेदिया कारोबार मामले में तीन करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। बैंक ऑफ राजस्थान अब अस्तित्व में नहीं है। इसका 2010 में आईसीआईसीआई बैंक में विलय हो चुका है। सेबी ने बैंक के रोहित प्रेम कुमार गुप्ता, नवीन कुमार तायल, ज्योतिका संजय तायल, आणविक टेक्सटाइल एंड रीयलप्रो प्राइवेट लिमिटेड और कुलविंदर कुमार नैय्यर पर जुर्माना लगाने का आदेश दिया। इन सभी को मिलाकर यह तीन करोड़ रुपये की राशि जमा करनी है। विलय से पहले बैंक ऑफ राजस्थान में तायल प्रमुख शेयरधारक थे।
क्या होता है इनसाइडर ट्रेडिंग?
सेबी नियमन निवेशकों के हितों की रक्षा के लिये भेदिया कारोबार पर रोक लगाता है। इसमें भेदिया कारोबार वैसे मामले को कहा जाता हैं जहां कीमत से जुड़ी अप्रत्याशित संवेदनशील जानकारी अपने पास रखते हुए शेयरों में कारोबार किया जाता है।आसान शब्दों में जब कंपनी के मैनेजमेंट से जुड़ा कोई आदमी उसकी अंदरूनी जानकारी होने के आधार पर शेयर खरीद या बेचकर गलत ढंग से मुनाफा कमाता है तो इसे इनसाइडर ट्रेडिंग या भेदिया कारोबार कहा जाता है।
क्या है भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी)?
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की स्थापना भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के प्रावधानों के अनुसार 12 अप्रैल, 1992 को हुई थी । सेबी का मुख्यालय मुंबई में बांद्रा कुर्ला परिसर के व्यावसायिक जिले में हैं और क्रमश: नई दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और अहमदाबाद में उत्तरी, पूर्वी, दक्षिणी व पश्चिमी क्षेत्रीय कार्यालय हैं।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की उद्देशिका में सेबी के मूल कार्य प्रतिभूतियों (सिक्यूरिटीज़) में निवेश करने वाले निवेशकों के हितों का संरक्षण करना, प्रतिभूति बाजार (सिक्यूरिटीज़ मार्केट) के विकास का उन्नयन करना तथा उसे विनियमित करना और उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक विषयों का प्रावधान करना है।
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राष्ट्रीय एआई पोर्टल और 'रिस्पॉन्सिबल एआई फॉर यूथ' कार्यक्रम
चर्चा में क्यों?
हाल ही में श्री रविशंकर प्रसाद ने भारत के राष्ट्रीय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पोर्टल और 'रिस्पॉन्सिबल एआई फॉर यूथ' कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
क्या होता है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-AI?
साधारण शब्दों में AI का मतलब है इंसान की सोचने, समझने एवं भावनाओं को मशीनों के अंदर डाल देना। दूसरे शब्दों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक है जिसके तहत मशीनों को इंसानों की तरह सोचने, निर्णय लेने, समस्या समाधान और सीखने की क्षमता का विकास करना है।
क्या है राष्ट्रीय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पोर्टल?
इस पोर्टल को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय (MeitY) और आईटी उद्योग द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है। MeitYका राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस डिवीजन और आईटी उद्योग का नैसकॉम संयुक्त रूप से मिलकर इस पोर्टल को चलाएगा। यह पोर्टल भारत में एआई से संबंधित विकास के लिए एक स्टॉप डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में काम करेगा। भारत में एआई से संबंधित लेखों, स्टार्ट-अप, एआई में निवेश फंडों, संसाधनों, कंपनियों और शैक्षिक संस्थानों जैसे संसाधनों को साझा करेगा। इसके द्वारा पोर्टल पर दस्तावेजों, केस स्टडी, अनुसंधान रिपोर्ट आदि को भी साझा किया जाएगा। इसमें एआई से संबंधित शिक्षा और नई नौकरी की भूमिकाओं के बारे में एक संभाग भी होगा।
क्या है 'रिस्पॉन्सिबल एआई फॉर यूथ'?
इस कार्यक्रम का उद्देश्य, देश के युवा छात्रों को एक मंच प्रदान करना और उन्हें नए युग के तकनीकी मांइड-सेट, प्रासंगिक एआई कौशल-सेट और आवश्यक एआई टूल-सेट तक पहुंच प्रदान करने के साथ-साथ सशक्त बनाना है जिससे उन्हें भविष्य के लिए डिजिटल रूप से तैयार किया जा सके। इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस डिवीजन,MeitYद्वारा इंटेल इंडिया के सहयोग से, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग (डीओएसईएंडएल), मानव संसाधन विकास मंत्रालय के समर्थन से शुरू किया गया है। डीओएसईएंडएल राज्य शिक्षा विभागों को पात्रता मानदंडों के अनुसार शिक्षकों को मनोनीत करने में मदद करेगा।
'रिस्पॉन्सिबल एआई फॉर यूथ', युवाओं को एआई के लिए तैयार होने और उनके कौशल-गैप को कम करने में मदद करके युवाओं को सशक्त बनाएगा, जबकि युवाओं को सार्थक रूप से प्रभावी सामाजिक समाधान बनने के लिए सक्षम बनाएगा। यह कार्यक्रम सरकारी स्कूलों के छात्रों को पूरे देश तक पहुंच बनाने और उन्हें समावेशी रूप से कुशल कार्यबल का हिस्सा बनने का अवसर प्रदान करने के लिए बनाया गया है।
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एंटीबॉडी (प्रतिरक्षी) का परीक्षण: उच्च गुणवत्ता के रोग-प्रतिकारक (न्यूट्रलाइज़िंग) एंटीबॉडी वे होते हैं, जिनमें वायरस को जकड़कर रखने और कोशिकाओं में संक्रमण रोकने की क्षमता होती है। इस प्रकार के रोग-प्रतिकारक (न्यूट्रलाइज़िंग) एंटीबॉडी अन्य स्तनधारियों में भी उत्पन्न किए जा सकते हैं। इस प्रकार एंटीबॉडी का विवरण स्पष्ट करते समय वायरस के साथ उनको इन्क्यूबेट करके संक्रमण रोकने एवं संक्रामक वायरस निष्क्रिय करने की उनकी क्षमता का अध्ययन किया जाता है। प्रभावी एंटीबॉडी सफलतापूर्वक संक्रमण रोक सकते हैं। ऐसे प्रभावी एंटीबॉडी की पहचान के लिए वायरस संवर्धन महत्वपूर्ण हो सकता है।
दवाओं की स्क्रीनिंग: एंटी-वायरल दवा के परीक्षण का प्रथम चरण विषाणु की प्रतिकृति तथा उसकी वृद्धि को सीमित करने की संभावित दवा की क्षमता पर आधारित होता है। यहाँ संभावित दवा की उपस्थिति या अनुपस्थिति में कोशिकाओं को SARS-CoV-2 से संक्रमित किया जाता है। इसके बाद, वायरल प्रतिकृति पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। उत्कृष्ट दवा का प्रभाव कल्चर में मौजूद वायरस की वायरल प्रतिकृति पर पड़ता है। हालाँकि, एक अच्छी दवा की पहचान करने का एक त्वरित तरीका उनको फिर से उपयोग करना है, जिनका प्रयोग पहले से ही अन्य स्थितियों में मनुष्यों पर किया जा रहा है। कोरोना वायरस के मामले में भी ऐसी संभावित दवाओं का क्लिनिकल परीक्षण किया जा रहा है, जिसमें विष-विज्ञान अध्ययन भी शामिल है। इस तरह, नयी परिस्थितियों में पुरानी दवाओं का उपयोग ड्रग रिपर्पजिंग कहलाता है। अगर ये दवाएं SARS-CoV-2 के खिलाफ प्रभावी पायी जाती हैं, तो जल्दी ही इनका परीक्षण मनुष्यों में कोविड-19 के इलाज के लिए किया जा सकता है।
कीटाणुनाशकों का परीक्षण: कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने लिए मौजूदा समय में सतह साफ करने के लिए कीटाणुनाशकों की बहुत आवश्यकता पड़ रही है। ऐसे कीटाणुनाशक व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किट और कपड़े सहित विभिन्न सतहों पर मौजूद SARS-CoV-2 को मारकर संक्रमण से बचाने में मदद कर सकते हैं। वायरस कल्चर, विषाणु-अध्ययन का एक महत्वपूर्ण घटक माना जाता है, जो कीटाणुनाशकों की प्रभावोत्पादकता का परीक्षण कर सकता है। यहाँ कीटाणुनाशक के प्रमुख अवयवों की क्षमता का परीक्षण किया जाता है, जो विषाणुओं को मार सके।
उपकरणों का परीक्षण: यह तो हम जानते हैं कि पराबैंगनी (यूवी) किरणें वायरस कणों को मारने और संक्रमण रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। पैकेजिंग सामग्री सहित विभिन्न सामग्रियों से SARS-CoV-2 को खत्म करने के लिए घरेलू और औद्योगिक क्षेत्रों में यूवी किरणों से लैस उपकरणों की बहुत माँग है। वायरस कल्चर का यूवी विकिरणों से संपर्क कराकर SARS-CoV-2 को नष्ट करने की इसकी क्षमता का आकलन करके इन उपकरणों की जाँच की जा सकती है। इस तरह, एक बार फिर इस प्रकार के परीक्षणों के लिए SARS-CoV-2 कल्चर एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक हो सकता है।
कुल मिलाकर देखें तो नोवेल कोरोना वायरस के कल्चर की कहानी भी उस मशहूर कहावत से मिलती-जुलती है, जिसमें कहा गया है कि ‘ज़हर ही को ज़हर मारता है।’ यही कारण है कि कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए वैज्ञानिक उसी घातक वायरस को हथियार बनाना चाहते हैं, जो दुनियाभर में लाखों लोगों की मौत का गुनहगार बन चुका है। इसीलिए, कोविड-19 से लड़ने के लिए कोरोना वायरस का कल्चर विषाणु-वैज्ञानिकों (वायरलोजिस्ट) की सूची में सबसे ऊपर है।
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वैज्ञानिक क्यों कर रहे हैं घातक कोरोना वायरस का कल्चर!
नोवेल कोरोना वायरस (SARS-CoV-2) से दुनिया भर में अब तक 56 लाख से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और 3.62 लाख से अधिक लोगों को इस वायरस से उपजी बीमारी कोविड-19 के प्रकोप से अपनी जान गंवानी पड़ी है। भारत की बात करें तो यहाँ नोवेल कोरोना वायरस के संक्रमण का आँकड़ा 1.58 लाख को पार कर चुका है और 4500 से अधिक लोगों की मौत कोविड-19 से हो चुकी है। इसके बावजूद, इस जिद्दी वायरस के कारण होने वाले संक्रमण और मौतों का सिलसिला अभी बना हुआ है। इतने बड़े पैमाने पर कोविड-19 के प्रकोप के बावजूद आखिर क्या कारण है कि वैज्ञानिक नोवेल कोरोना वायरस का लैब में कल्चर (संवर्धन) करके उसकी संख्या बढ़ाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं?
हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला आणविक जीवविज्ञान केन्द्र (सीसीएमबी), जो वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की एक प्रमुख घटक प्रयोगशाला है, के वैज्ञानिकों द्वारा मरीजों के नमूने से कोविड-19 के लिए जिम्मेदार कोरोना वायरस (SARS-CoV-2) के स्थिर संवर्धन (कल्चर) की खबर के बाद बहुत से लोगों के मन में यही सवाल गूंज रहा होगा। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस वायरस को कल्चर करने के आखिर क्या संभावित फायदे हो सकते हैं? इन सवालों के जवाब क्रमवार जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि वायरस कल्चर क्या होता है और स्थिर संवर्धन (Stable Culture) क्यों महत्वपूर्ण है। वास्तव में, वायरल कल्चर एक प्रयोगशाला तकनीक है, जिसमें वायरस के नमूनों को अलग-अलग सेल लाइनों में परखा जाता है। वायरल कल्चर के लिए जीवित कोशिकाओं की आवश्यकता पड़ती है। वैज्ञानिक जब वायरस कल्चर करते हैं, तो यह स्थिर होना चाहिए, जिसका अर्थ है कि वायरस संवर्धन निरंतर होते रहना चाहिए। इसीलिए, इसे स्थिर संवर्धन कहा गया है।
नोवेल कोरोना वायरस एसीई-2 नामक रिसेप्टर प्रोटीन के साथ मिलकर मानव के श्वसन मार्ग में एपीथीलियल कोशिकाओं को संक्रमित करता है। श्वसन मार्ग में एपीथीलियल कोशिकाएं प्रचुरता से एसीई-2 रिसेप्टर प्रोटीन को व्यक्त करती हैं, जिससे इस वायरस से संक्रमित मरीजों में श्वसन रोगों का खतरा बढ़ जाता है। नोवेल कोरोना वायरस को संवर्धित कर रहे वैज्ञानिकों को कभी न खत्म होने वाली सेल लाइनों की जरूरत पड़ती है। इसीलिए, वैज्ञानिक विरो सेल का प्रयोग करते हैं- जो अफ्रीकी बंदर के गुर्दे की एपीथीलियल कोशिका लाइनों से प्राप्त होते हैं, और जो एसीई-2 प्रोटीन को व्यक्त करते हैं। इसके साथ ही, ये कोशिका विभाजन भी करते हैं, जिससे वे लंबे समय तक वृद्धि कर सकते हैं। सीसीएमबी के वैज्ञानिकों के अनुसार कोरोना वायरस संवर्धन के कुछ संभावित उपयोग इस प्रकार हो सकते हैं:-
टीके का विकास: टीका किसी रोगजनक सूक्ष्मजीव से उत्पन्न विशिष्ट एजेंट होता है, जो परपोषी (Host) जीव में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढ़ाने में मदद करता है। टीके का उपयोग संबंधित रोगाणुओं से संक्रमण से सुरक्षा के लिए किया जा सकता है। आमतौर पर, रोगजनक सूक्ष्मजीवों के लिए विशिष्ट प्रोटीन टीके के रूप में यह उपयुक्त माना जाता है। एंटीजेनिक गुणों वाले ऐसे प्रोटीन परपोषी जीवों में एंटीबॉडी प्रतिक्रिया बढ़ाते हैं। एंटीजन की प्रकृति के आधार पर एंटीबॉडी प्रतिक्रिया दीर्घकालिक या अल्पकालिक हो सकती है। ऐतिहासिक रूप से, अटेन्यूएटेड या मारे गए वायरस को कई मामलों में टीके के रूप में उपयोग किया जाता है। पोलियो का टीका इसका सबसे अच्छा उदाहरण कहा जा सकता है। हालाँकि, निष्क्रिय वायरस से संक्रमण नहीं होता, बल्कि उनके संरचनात्मक प्रोटीन कोशिकाओं में एंटीबॉडी उत्पादन में मदद करते हैं। टीके के रूप में निष्क्रिय नोवेल कोरोना वायरस की क्षमता की जाँच वर्तमान में विभिन्न समूहों द्वारा की जा रही है।
एंटीबॉडी या एंटी-डॉट्स: निष्क्रिय वायरस मनुष्यों के अतिरिक्त अन्य स्तनधारी परपोषियों (Hosts) में एंटीबॉडी प्रतिक्रिया को बढ़ा सकते हैं। वर्तमान में इस तरह के विभिन्न परपोषियों की एंटीबॉडी प्रतिक्रिया क्षमता का परीक्षण किया जा रहा है। वे चूहे जैसे छोटे कुतरने वाले जीवों (कृन्तकों) से लेकर घोड़े और ऊँट जैसे बड़े स्तनधारियों तक हो सकते हैं। इन गैर-मानव परपोषियों में उत्पन्न ऐसे एंटीबॉडी को मनुष्यों में इन्जेक्ट करने के लिए शुद्ध और संसाधित किया जा सकता है। इस तरह के एंटीबॉडी मनुष्यों में इंजेक्ट होने पर एंटी-वायरल प्रतिक्रिया को बढ़ा सकते हैं और साथ ही उनमें संक्रमण को सीमित करने की क्षमता भी होती है। ये एंटीबॉडी टीके नहीं हैं, लेकिन वायरस के खिलाफ एंटी-डॉट्स कहे जा सकते हैं।
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केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी ने अमृतसर के लिए ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे की मांग को स्वीकार किया
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग तथा एमएसएमई मंत्री श्री नितिन गडकरी ने आज दिल्ली-अमृतसर एक्सप्रेसवे के हिस्से के रूप में सुल्तानपुर लोधी, गोइंदवाल साहिब, खादूर साहिब के बरास्ते नाकोदर से अमृतसर शहर के लिए एक नये ग्रीनफील्ड सम्पर्क-मार्ग को विकसित करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि अमृतसर से गुरुदासपुर तक की सड़क भी पूरी तरह विकसित होगी तथा इसे पूरी तरह सिग्नल मुक्त बनाया जाएगा। इसकी वजह से, सड़क मार्ग के यात्रियों के पास नाकोदर से गुरुदासपुर से आगे यात्रा करने का विकल्प होगा अर्थात वे अमृतसर के रास्ते भी जा सकते हैं और करतारपुर के रास्ते भी। मंत्री ने कहा कि यह ग्रीनफील्ड मार्ग न केवल अमृतसर शहर के लिए बल्कि सुल्तानपुर लोधी, गोइंदवाल साहिब, खादूर साहिब तथा हाल ही में विकसित डेरा बाबा नानक/करतारपुर साहब अंतरराष्ट्रीय गलियारा के लिए भी सबसे छोटा और वैकल्पिक एक्सप्रेस सम्पर्क-मार्ग उपलब्ध कराएगा।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग तथा एमएसएमई मंत्री श्री नितिन गडकरी ने आज अमृतसर शहर के लिए एक नये ग्रीनफील्ड सम्पर्क-मार्ग को विकसित करने की घोषणा की
श्री गडकरी ने जानकारी दी कि इस एक्सप्रेसवे के साथ अमृतसर से दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की यात्रा की दूरी वर्तमान आठ घंटों से घटकर लगभग चार घंटे की हो जाएगी। उन्होंने कहा कि यह पंजाब के लोगों की एक चिर प्रतीक्षित मांग को पूरी करेगा। एक्सप्रेसवे के पहले चरण में लगभग 25,000 करोड़ रुपये का निवेश शामिल होगा।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने भारतमाला परियोजना के तहत दिल्ली अमृतसर कटरा एक्सप्रेसवे का विकास आरंभ किया है। एक्सप्रेसवे को जनवरी 2019 में अंतिम रूप दिया गया और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आरंभ हो गई। हाल ही में अमृतसर के लिए एक्सप्रेसवे का मुद्दा खाद्य प्रसंस्करण मंत्री श्रीमती हरसिमरत कौर बादल और नागरिक उड्डयन, आवासन तथा शहरी मामले राज्य मंत्री श्री हरदीप सिंह पुरी द्वारा केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी के समक्ष उठाया गया है। यह मुद्दा सांसद (राज्यसभा) श्री श्वेत मलिक, सांसद (लोकसभा) श्री गुरजीत सिंह औजला, पंजाब सरकार, सिख संगठनों एवं अन्य जन प्रतिनिधियों द्वारा भी उठाया गया।
आज नई दिल्ली में श्री नितिन गडकरी की अध्यक्षता में अमृतसर के लिए नये मार्ग के विकास पर बैठक
उल्लेखनीय है कि आरंभ में जम्मू एवं कश्मीर की सरकार ने दिल्ली-कटरा एक्सप्रेसवे का प्रस्ताव रखा था। बहरहाल, केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री गडकरी ने परिकल्पना की कि शहर के धार्मिक महत्व को देखते हुए, जहां प्रति वर्ष चार मिलियन से अधिक पर्यटक यात्रा करते हैं, प्रस्तावित एक्सप्रेसवे को अमृतसर से गुजरना चाहिए और इस प्रकार भारतमाला के तहत दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे की संकल्पना अस्तित्व में आई।
अमृतसर तक सम्पर्क मार्ग के मुद्दे पर चर्चा करने एवं इसके समाधान के लिए श्री नितिन गडकरी की अध्यक्षता में एक वीडियो कॉन्फ्रेंस बैठक का आयोजन किया गया जिसमें पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह, केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री श्रीमती हरसिमरत कौर बादल, केंद्रीय आवासन तथा शहरी मामले राज्य मंत्री श्री हरदीप सिंह पुरी, डोनर राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह, राज्य मंत्री ( सड़क परिवहन एवं राजमार्ग) जनरल वी के सिंह, सांसद (राज्य सभा) श्री श्वेत मलिक, सांसद (लोकसभा) श्री गुरजीत सिंह औजला, पंजाब सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री श्री अनिल जोशी, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग के सचिव, एनएचएआई के अध्यक्ष एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी बैठक में उपस्थित थे।
अमृतसर शहर के लिए एक नये ग्रीनफील्ड सम्पर्क-मार्ग के विकास के लिए आज नई दिल्ली में आयोजित बैठक का एक वीडियो दृश्य
यह दोहराया जाता है कि अमृतसर शहर हमेशा से ही दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे का एक अभिन्न हिस्सा रहा है। आरंभ में दो चरणों में ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड मार्ग के एक मिश्रण के रूप में एक्सप्रेसवे का प्रस्ताव था।
श्री गडकरी ने पंजाब सरकार से आग्रह भी किया है कि वह पंजाब राज्य में प्रस्तावित एक्सप्रेसवे के लिए भूमि अधिग्रहण में तेजी लाने के लिए एनएचएआई को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराए।
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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2024 तक देश के हर ग्रामीण परिवार को कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन प्रदान करने के उद्देश्य से 15 अगस्त, 2019 को ‘जल जीवन मिशन’ की घोषणा की थी। राज्यों के साथ साझेदारी में कार्यान्वित किए जा रहे इस मिशन का लक्ष्य हर ग्रामीण परिवार को नियमित और दीर्घकालिक आधार पर 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन (एलपीसीडी) के सेवा स्तर (सर्विस लेवल) पर पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना है, ताकि ग्रामीणों के जीवन स्तर को बेहतर किया जा सके।
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उगते सूरज की भूमि’ अरुणाचल प्रदेश ने मार्च 2023 तक सभी ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन प्रदान करने की योजना बनाई है
अरुणाचल प्रदेश द्वारा अपने यहां 100% घरेलू नल कनेक्शनों के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बनाई गई वार्षिक कार्य योजना को राष्ट्रीय जल जीवन मिशन, जल शक्ति मंत्रालय ने मंजूरी दे दी। इस राज्य ने मार्च, 2023 तक सभी परिवारों को 100% नल कनेक्शन प्रदान करने का प्रस्ताव रखा। भारत सरकार ने वर्ष 2020-21 में जल जीवन मिशन (जेजेएम) के तहत इस राज्य के लिए 255 करोड़ रुपये मंजूर किए। राज्यों को कार्य-प्रदर्शन अनुदान के रूप में अतिरिक्त धनराशि दी जाती है जो स्पष्ट नजर आने वाले नतीजों यानी घरेलू नल कनेक्शनों और उसके अनुरूप वित्तीय प्रगति की दृष्टि से उनकी उपलब्धि पर आधारित होती है। राज्य वर्ष 2020-21 में कुल 2.18 लाख ग्रामीण परिवारों में से 77,000 को नल कनेक्शन देने की योजना बना रहा है। योजना बनाते समय आकांक्षी जिले, गुणवत्ता से प्रभावित बस्तियों, सांसद आदर्श ग्रामीण योजना के गांवों के परिवारों को प्राथमिकता के आधार पर कवर करने पर विशेष जोर दिया जाता है।
अरुणाचल प्रदेश में पानी की उपलब्धता कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन योजना के कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियां दुर्गम पहाड़ी इलाका, बिखरी हुई बस्तियां और कठोर जलवायु परिस्थितियां हैं। हालांकि, राज्य सरकार ने सभी गांवों/बस्तियों को कवर करने के लिए एक सुव्यवस्थित योजना बनाई है, ताकि हर ग्रामीण परिवार के यहां पेयजल पहुंच सके। ‘जल जीवन मिशन’ दरअसल राज्य को अपने नागरिकों के घरों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है, ताकि महिलाओं और लड़कियों का इससे जुड़ा बोझ कम हो सके।
राज्य ‘नीचे लटके फलों’ अर्थात उन गांवों/बस्तियों को लक्षित कर रहा है, जहां पाइप के जरिए जलापूर्ति योजनाएं पहले से ही मौजूद हैं, ताकि शेष परिवारों को कम से कम समय में आसानी से नल कनेक्शन उपलब्ध कराए जा सकें। राज्य की योजना समाज के कमजोर वर्गों के सभी शेष परिवारों को प्राथमिकता के आधार पर तुरंत नल कनेक्शन प्रदान करने की है। कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार का प्रयास यह है कि लोग जल कनेक्शन वाले सार्वजनिक स्थानों/पेयजल स्रोतों पर भीड़ न लगाएं। राज्य को घरेलू नल कनेक्शन प्रदान करने के लिए गांवों में जलापूर्ति से जुड़े कार्य तत्काल शुरू करने की सलाह दी गई थी, जिससे सामाजिक दूरी बनाए रखने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, स्थानीय लोगों को रोजगार प्राप्त करने में मदद मिलेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास को भी नई गति मिलेगी।
ग्रामीण समुदाय की सक्रिय भागीदारी के साथ ग्राम कार्य योजना (वीएपी) के प्रभावकारी कार्यान्वयन के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया गया है। स्थानीय समुदाय दीर्घकालिक स्थायित्व सुनिश्चित करने के लिए गांवों में जल आपूर्ति प्रणालियों की योजना बनाने, कार्यान्वयन, प्रबंधन, संचालन और रखरखाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। स्थानीय समुदायों को नियमित देख-रेख और संचालन एवं रखरखाव के लिए गांवों में जल आपूर्ति प्रणालियों की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कौशल बढ़ाने वाले कार्यों की योजना बनाई जाती है ताकि बेरोजगार युवाओं को प्लंबिंग, चिनाई, फिटिंग, बिजली इत्यादि का प्रशिक्षण दिया जा सके। इससे प्रशिक्षित मानव संसाधनों का एक समूह ग्रामीण स्तर पर उपलब्ध हो सकता है और उन्हें स्थानीय स्तर पर काम में लगाया जा सकता है। मनरेगा एवं एसबीएम(जी) जैसे विभिन्न कार्यक्रमों में समुचित समन्वय, पीआरआई को 15वें वित्त आयोग से अनुदान, जिला खनिज विकास कोष और कैम्पा के साथ-साथ ग्राम स्तर पर स्थानीय क्षेत्र विकास कोष, इत्यादि के जरिए पेयजल आपूर्ति प्रणालियों के दीर्घकालिक स्थायित्व के लिए मौजूदा पेयजल स्रोतों को मजबूत करने की योजना बनाई जाती है, ताकि सभी उपलब्ध कोषों का विवेकपूर्ण उपयोग किया जा सके। राज्य को वर्ष 2020-21 के दौरान पीआरआई को 15वें वित्त आयोग से अनुदान के तहत 231 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इस राशि का 50% जल और स्वच्छता पर खर्च करना अनिवार्य है।
‘जल जीवन मिशन’ के तहत जिला और राज्य स्तरों पर जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाओं को प्राथमिकता दी जाती है। जल की गुणवत्ता पर करीबी नजर रखने के कार्य में समुदाय को शामिल किया जा रहा है। समुदाय को सशक्त बनाने और उसकी सेवाएं लेने की व्यवस्था की गई है। इसके लिए कार्य योजना तैयार की जाती है, ताकि समय पर किटों की खरीद, समुदाय को किटों की आपूर्ति, हर गांव में कम से कम पांच महिलाओं की पहचान करने, फील्ड टेस्ट किटों के उपयोग के लिए महिलाओं को प्रशिक्षित करने जैसी विभिन्न नियोजित गतिविधियों को शामिल किया जा सके।
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क इन इंडिया तथा विनिर्माण और उत्पादन गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए रसायन और पेट्रोरसायन की सार्वजनिक खरीद को अनिवार्य बनाया गया : श्री मनसुख मांडविया
रसायन और पेट्रोरसायन विभाग ने 2020-21, 2021-23 और 2023-25 के लिए रसायनों और पेट्रोरसायन सामग्री की सार्वजनिक खरीद में स्थानीय उत्पादों का न्यूनतम स्तर क्रमशः 60, 70 और 80 प्रतिशत निर्धारित किया
उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) ने आय और रोजगार बढ़ाने के इरादे से मेक इन इंडिया को प्रोत्साहित करने और भारत में वस्तुओं के विनिर्माण और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक खरीद (मेक इन इंडिया को प्राथमिकता) 2017 के आदेश को 29 मई 2019 में संशोधित किया है।
रसायन और पेट्रोरसायन विभाग ने घरेलू रसायन और पेट्रोरसायन उद्योग की मौजूदा क्षमता और स्थानीय प्रतिस्पर्धा की सीमाओं के आकलन के आधार पर स्थानीय सामग्री का न्यूतनम स्तर और उनकी गणना के तरीके तय करते हुए सार्वजनिक खरीद वाले पेट्रोरसायनों की पहचान की है। इस क्रम में 55 विभिन्न प्रकार के रसायनों, पेट्रोरसायनों , कीटनाशकों और डाइस्टफ की पहचान की गई है। इन रसायनों और पेट्रोरसायनों के लिए न्यूनतम स्थानीय सामग्री की अनिवार्यता वर्ष 2020-2021 के लिए 60 प्रतिशत, 2021-2023 के लिए 70 प्रतिशत और 2023 -2025 के लिए 80 प्रतिशत निर्धारित की गई है। विभाग द्वारा चिन्हित किए गए 55 प्रकार के रसायनों और पेट्रोरसायनों में से 27 के लिए स्थानीय आपूर्तिकर्ता पांच लाख रूपए से अधिक और 50 लाख रूपए से कम के अनुमानित मूल्य की बोली लगाने के पात्र होंगे। शेष 28 रसायन और पेट्रोरसायनों के संबंध में, खरीद करने वाली संस्थाएं बोली लगाए जाने की व्यवस्था होने के बावजूद स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं से ही इनकी खरीद करेंगी क्योंकि ऐसी सामग्रियों के लिए स्थानीय स्तर पर पर्याप्त उत्पादन क्षमता और प्रतिस्पर्धा मौजूद है।
यह कदम प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए आत्मनिर्भर भारत अभियान को सशक्त बनाएगा और “मेक इन इंडिया” के तहत घरेलू उत्पादन को भी बढ़ावा देगा।
केन्द्रीय रसायन और उर्वरक तथा जहाजरानी राज्य मंत्री श्री मनसुख मांडविया ने इस फैसले की सराहना करते हुए कहा , "रसायनों और पेट्रोरसायनों की सार्वजनिक खरीद को अनिवार्य बनाये जाने से वस्तुओं के विनिमार्ण और उत्पादन तथा सेवाओं से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और ये मिलकर मेक इन इंडिया को प्रोत्साहित करेंगे।‘’
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भारत के थिंक टैंक नीति आयोग ने देश में कृषि और प्राकृतिक कृषि पर सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं ने भाग लिया।
मुख्य बिंदु
नीति आयोग ने इस सम्मेलन में भारत की वर्तमान योजनाओं को प्रस्तुत किया। नीति के अनुसार, प्राकृतिक खेती जो मुख्य रूप से गाय के गोबर, बायोमास इत्यादि पर निर्भर है, देश में खेती की स्वदेशी प्रणाली है। भारत ने अगले पांच वर्षों में जैविक खेती के 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है। इसमें से 12 लाख हेक्टेयर को भारतीय प्राकृत कृषि पद्धति कार्यक्रम के तहत लाया जायेगा।
चर्चा के बिंदु
इस सम्मेलन में निम्नलिखित कार्यक्रमों पर प्रकाश डाला गया :
परम्परागत कृषि योजना 2015 में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई थी। इस योजना के तहत, पिछले 4 वर्षों में लगभग 8 लाख किसानों और 7 लाख हेक्टेयर भूमि को जैविक खेती के तहत लाया गया था।
अकेले आंध्र प्रदेश ने इस योजना को लागू करके 2 लाख हेक्टेयर भूमि को जैविक खेती के तहत लाया है।
जिन अन्य राज्यों ने योजना बनाई है उनमें केरल, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक शामिल हैं।
