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I.A.S.(हिंदी माध्यम)

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साईबेरिया चर्चा में क्यों? हाल ही में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक ऊर्जा संयंत्र भंडारण केन्द्र से लगभग 20 हजार टन डीजल ईंधन बहने की घटना के बाद साईबेरिया में आपातकाल की घोषणा कर दी है। यह घटना मॉस्को से 2,900 किलोमीटर दूर नॉरिल्स्क शहर के बाहरी इलाके में स्थित ऊर्जा संयंत्र में हुई। यह क्षेत्र निकेल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।जिस पावर प्लांट से ईंधन का रिसाव हुआ है वह नॉरलिस्क निकेल की एक इकाई है। यह निकेल और पैलैडियम धातु का उत्पादन करने वाली दुनिया की शीर्ष कंपनियों में शामिल है। रूस के प्रधानमंत्री पुतिन ने नॉरलिस्क निकेल (नॉरनिकेल) की सहायक कंपनी एनटीईके की भी आलोचना करते हुए दुर्घटना की जांच का आदेश दिए है और संयंत्र में एक प्रबंधक को हिरासत में लिया गया है।ईंधन को आंबरनया (Ambarnaya) नदी में मिलने से रोकने के लिये अवरोधक लगाए गए हैं। यह नदी आगे जाकर एक झील(Lake Pyasino)से मिलती है जो आगे चलकर एक नदी से मिल जाती है। आगे यह नदी कारा सागर (Kara Sea) की ओर जाती है जोकि पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील आर्कटिक महासागर का हिस्सा है। इससे घटना से मछलियों और अन्य संसाधनों समेत कुल मिलाकर एक करोड़ 30 लाख डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है। साईबेरिया के बारे में रूस का अधिकांश हिस्सा साइबेरिया के क्षेत्र में ही आता हैं। साइबेरिया की विषम परिस्थितियों के कारण के कारण यह पृथ्वी पर मौजूद सबसे खतरनाक जगहों में से भी एक हैं जिसके कारण यहां का जनसंख्या घनत्व काफी कम है। साइबेरिया में कुछ स्थलों का तापमान -65 डिग्री सेंटीग्रेड से कम तक पहुंच जाता है जबकि गर्मियों में तापमान 35 डिग्री सेंटीग्रेड तक हो जाता है। चरम जलवायु परिस्थितियों के बावजूद साइबेरिया खनिज संसाधनों के दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहां पर खनिजों के विशाल भंडार है, जिसके बीचप्राकृतिक गैस, कोयला, मैंगनीज, पोटाश, यूरेनियम, लौह अयस्क, कोबाल्ट, हीरा,सोना, निकल, तेल इत्यादि प्रमुख हैं।साइबेरियाई क्षेत्र में कई नदियां प्रवाहित होती हैं जिनमें अमूर, इरतिश,येनिसे, लीना और अंगारा प्रमुख है। इसके साथ ही इस क्षेत्र मेंविश्व विख्यात बैकाल झील इसी क्षेत्र में अवस्थित है। साइबेरिया में पाई जाने वाली अधिकांशतःटैगा वनस्पतियां पाई जाती हैं इसके अलावा ऊंचे स्थानों पर टुंडा वनस्पतियां भी पाई जाती हैं। इस क्षेत्र के 70% से ज्यादा लोग शहरों में निवास करते हैं।

ट्यूलिप कार्यक्रम(TULIP Programme) चर्चा में क्यों? मानव संसाधन विकास मंत्री, आवास और शहरी कार्य राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) ने शहरी अध्‍ययन प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए संयुक्त रूप से एक ऑनलाइन पोर्टल ट्यूलिप की शुरूआत की है। क्या है ट्यूलिप? द अर्बन लर्निंग इंटर्नशिप प्रोग्राम (ट्यूलिप) एक ऐसा कार्यक्रम जो देश भर के सभी शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) और स्मार्ट शहरों में नए स्नातकों को प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करेगा।ट्यूलिप शहरी नियोजन, परिवहन इंजीनियरिंग, पर्यावरण, नगरपालिका वित्त आदि जैसे विविध क्षेत्रों में एक संभावित प्रतिभा पूल बनाने में मदद करेगा जिससे शहरी चुनौतियों के समाधान को कम करने में आसानी होगी। एमओएचयूए अपने शहरों में इंटर्नशिप को बढ़ावा देने में मदद करने के लिए राज्य सरकारों तक पहुंचेंगे। ट्यूलिप के अंतर्गत यूएलबी और स्मार्ट शहरों की भागीदारी को सक्षम करने के लिए राज्य सरकारों के साथ साझेदारी में क्षमता निर्माण की पहल करेगा। वर्ष 2025 तक एमएचआरडी और एआईसीटीई के 1 करोड़ सफल इंटर्नशिप का लक्ष्य रखा गया है। ट्यूलिप कार्यक्रम के लाभ ट्यूलिप भारत के स्नातकों के बाज़ार मूल्‍य को बढ़ाने में मदद करेगा और शहरी नियोजन, परिवहन इंजीनियरिंग, पर्यावरण, नगरपालिका वित्त आदि जैसे विविध क्षेत्रों में एक संभावित प्रतिभा पूल बनाने में मदद करेगा। इससे न केवल संभावित शहर प्रबंधकों बल्कि प्रतिभाशाली निजी /गैर-सरकारी क्षेत्र के पेशेवरों के सृजन में तेजी आएगी। ट्यूलिप से यूएलबीऔर स्मार्ट शहरों को अत्यधिक लाभ होगा। यह भारत की शहरी चुनौतियों के समाधान के लिए सह-निर्माण में युवाओं को जोड़ने के साथ नए विचारों और ऊर्जा के प्रसार को बढ़ावा देगा। सामुदायिक भागीदारी और सरकार-शिक्षा-उद्योग-नागरिक समाज के संबंधों को बढ़ावा देने के लिए सरकार के प्रयासों को आगे बढ़ाएगा। ट्यूलिप जैसे कार्यक्रम से भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का फायदा लेने में मदद मिलेगी

काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR) और अटल इनोवेशन मिशन ने आपसी हित के क्षेत्रों में नवाचार और उद्यमिता की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए साथ मिलकर कार्य करने का निर्णय लिया है। मुख्य बिंदु सीएसआईआर इनक्यूबेटर अटल इनोवेटिव मिशन के तहत इस नई परियोजना में विश्व स्तर के स्टार्ट अप का समर्थन करने के लिए काम करेंगे। वे नवाचार के नए मॉडल लाने और CSIR नवाचार पार्क स्थापित करने के लिए मिलकर काम करेंगे। लाभ सीएसआईआर अपने मजबूत ज्ञान आधार से योगदान देगा और परियोजना को सफल बनाने के लिए विश्व स्तर के शोधकर्ताओं को प्रदान करेगा। दूसरी ओर अटल इनोवेटिव मिशन देश में अभिनव पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा देगा। योजना क्या है? CSIR ARISE के सहयोग से अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहित करेगा। अटल इनोवेटिव मिशन की ARISE पहल वर्तमान में MSME (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों) में अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए काम कर रही है। जिज्ञासा और अटल टिंकरिंग प्रयोगशालाओं के बीच घनिष्ठ सहयोग के माध्यम से, पूरे भारत के स्कूलों में समस्या निवारण माइंड सेट बनाए जायेंगे। ‘जिज्ञासा’ एक छात्र वैज्ञानिक कनेक्ट प्रोग्राम है जहाँ पूरे देश में 3 लाख से अधिक छात्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी के संपर्क में हैं।

मातृत्व की आयु, ‘एमएमआर’ को कम करने की अनिवार्यताओं और पोषण स्तर बेहतर करने से संबंधित मुद्दों पर गौर करने के लिए कार्यदल का गठन सुश्री जया जेटली की अध्यक्षता वाला कार्यदल 31 जुलाई, 2020 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्‍तुत करेगा कार्यदल अपनी सिफारिशों के समर्थन में उपयुक्त कानून और/अथवा मौजूदा कानूनों में संशोधन सुझाएगा कार्यदल इसके साथ ही इन सिफारिशों को लागू करने के लिए समयसीमा के साथ एक विस्तृत शुभारंभ योजना भी तैयार करेगा भारत सरकार ने 04 जून, 2020 को जारी एक राजपत्र अधिसूचना में मातृत्व की आयु, ‘एमएमआर’ को कम करने की अनिवार्यताओं और पोषण स्तर बेहतर करने से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ कुछ अन्‍य संबंधित विषयों पर भी गौर करने के लिए एक कार्यदल का गठन किया है। केंद्रीय वित्त मंत्री ने संसद में वित्‍त वर्ष 2020-21 के अपने बजट भाषण के दौरान कहा, ‘‘वर्ष 1978 में तत्कालीन शारदा अधिनियम, 1929 में संशोधन करके लड़कियों के विवाह की आयु को पंद्रह वर्ष से बढ़ाकर अठारह वर्ष कर दिया गया। जैसे-जैसे भारत प्रगति पथ पर निरंतर आगे बढ़ता रहा, लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्‍त करने और करियर बनाने के अवसर भी मिलने लगे। ‘एमएमआर’ को कम करने के साथ-साथ पोषण स्तर बेहतर करना भी नितांत आवश्‍यक है। इन सभी बातों को ध्‍यान में रखकर ही लड़कियों के मातृत्व की उम्र से जुड़े समस्‍त मुद्दे पर गौर करने की जरूरत है। मैं एक कार्यदल का गठन करने का प्रस्ताव करती हूं, जो छह माह में अपनी सिफारिशें पेश करेगा ..’’ (संदर्भ: वित्त वर्ष 2020-21 के लिए बजट भाषण का पैरा 67)। कार्यदल की संरचना निम्नानुसार है: सुश्री जया जेटली (नई दिल्ली) – अध्यक्ष डॉ. विनोद पॉल, सदस्य (स्वास्थ्य), नीति आयोग - सदस्य (पदेन) सचिव, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय - सदस्य (पदेन) सचिव, महिला और बाल विकास मंत्रालय - सदस्य (पदेन) सचिव, उच्च शिक्षा विभाग - सदस्य (पदेन) सचिव, स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग- सदस्य (पदेन) सचिव, विधायी विभाग - सदस्य (पदेन) सुश्री नजमा अख्तर (नई दिल्ली) – सदस्य सुश्री वसुधा कामथ (महाराष्ट्र) – सदस्य डॉ. दीप्ति शाह (गुजरात) – सदस्य कार्यदल के विचारार्थ विषय निम्‍नलिखित हैं: विवाह और मातृत्व की आयु के इन सभी के साथ सह-संबंध पर गौर करना (ए) मां का स्वास्थ्य, चिकित्सीय सेहत एवं पोषण की स्थिति और गर्भावस्था, जन्म एवं उसके बाद नवजात शिशु/ शिशु/ बच्चा (बी) प्रमुख मापदंड जैसे कि शिशु मृत्यु दर (आईएमआर), मातृ मृत्यु दर (एमएमआर), कुल प्रजनन दर (टीएफआर), जन्म के समय लिंग अनुपात (एसआरबी), बाल लिंग अनुपात (सीएसआर), इत्‍यादि और (सी) इस संदर्भ में स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित कोई अन्य प्रासंगिक बिंदु। लड़कियों के बीच उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के उपाय सुझाना। कार्यदल की सिफारिशों के समर्थन में उपयुक्त विधायी उपाय और/अथवा मौजूदा कानूनों में संशोधन सुझाना। कार्यदल की सिफारिशों को लागू करने के लिए समयसीमा के साथ एक विस्तृत शुभारंभ योजना तैयार करना। कार्यदल आवश्‍यकता पड़ने पर अन्य विशेषज्ञों को अपनी बैठकों में आमंत्रित कर सकता है। कार्यदल को नीति आयोग द्वारा सचिवालयी या दफ्तरी सहायता प्रदान की जाएगी और कार्यदल 31 जुलाई, 2020 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।

हिमालय में जलवायु परिवर्तन के हो सकते हैं दूरगामी परिणाम उत्तरी और दक्षिणीध्रुवों के बाद सबसे अधिक बर्फ का इलाका होने के कारण हिमालय को तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है। हिमालय में जैव विविधता की भरमार है और यहाँ पर 10 हजारसे अधिक पादप प्रजातियां पायी जाती हैं। इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। भारत की जलवायु में हिमालय के योगदान पर चर्चा करते हुए यह बात हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर एस.पी. सिंह ने कही है। वह विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई), लखनऊ द्वारा आयोजित एक वेबिनार में बोल रहे थे। प्रोफेसर सिंह बताया कि गंगा के विस्तृत मैदानी इलाके में मानवीय गतिविधियों से उपजा प्रदूषण हिमालयी पर्यावरण को काफी नुकसान पहुँचा रहा है। उन्होंने कहा कि हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की दर अलग-अलग देखी गयी है। पश्चिम हिमालय में पूर्वी हिमालय की तुलना में ग्लेशियरों पर अधिक प्रभाव देखने को मिल रहा है। हिमालय के 50 से भी अधिक ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। इसका सीधा असर हिमालयी वनस्पतियों के वितरण, ऋतु जैविकी (Seasonal Biology) एवं कर्यिकी (Taxation) पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। उन्होंने बताया कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों के वनों के साथ-साथ निचले हिमालयी क्षेत्रों में फसली पौधों पर भी प्रभाव पड़ने लगे हैं। उदाहरण के तौर पर सेब की फसल के कम होते उत्पादन के कारण किसानों की न सिर्फ आय कम हो रही है, बल्कि किसान दूसरी फसलों की खेती ओर मुड़ रहे हैं। एनबीआरआई के निदेशक प्रोफेसर एस.के. बारिक ने इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस की थीम “सेलिब्रेट बायोडायवर्सिटी” के बारे में चर्चा करते हुएकहा कि संस्थान पर्यावरण सुधार एवं भारत की जैव-विविधिता संरक्षण में सदैव तत्पर है। प्रोफेसर एस.पी. सिंह नेबताया कि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के चलते धरती के तापमान में बढ़ोतरी मनुष्यों, पशु-पक्षियों एवं पौधों सभी को प्रभावित कर रही है। अतः हमें इसके साथ जीने की कला सीखने के साथ इसके साथ अनुकूलन स्थापित करने के उपाय भी खोजने होंगे।

कोल इंडिया की सहायक कंपनी वेस्टर्न कोलफील्ड्स ने 3 नई कोयला खदानें खोलीं कर्मचारियों और हितधारकों के साथ डिजिटल रूप से जुड़ने के लिए लॉन्च किया गया है ‘संवाद’ एप खनन कार्यों की निगरानी करेगी ‘डब्ल्यूसीएल आई’ कोल इंडिया की सहायक कंपनी वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (डब्ल्यूसीएल) ने आज महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में 3 नई कोयला खदानें खोली हैं, जिनकी संयुक्‍त वार्षिक उत्पादन क्षमता 2.9 मिलियन टन (एमटी) है। कंपनी इन परियोजनाओं पर कुल 849 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) करेगी और 647 लोगों के लिए प्रत्यक्ष रोजगार सृजित करेगी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे, केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी और केंद्रीय कोयला व खान मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए इन खदानों का उद्घाटन किया। केंद्रीय कोयला व खान मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी ने इस अवसर पर कहा, ‘डब्ल्यूसीएल को वित्त वर्ष 2023-24 तक 75 एमटी कोयले का उत्पादन करना है। इन खदानों के खुलने से कंपनी के इस मुकाम तक पहुंचने के प्रयासों में निश्चित रूप से मदद मिलेगी। इतना ही नहीं, इससे कोल इंडिया को वित्त वर्ष 2023-24 तक 1 अरब टन (बीटी) कोयले के उत्पादन लक्ष्य को हासिल करने में भी मदद मिलेगी।’ डब्ल्यूसीएल द्वारा खोली गई तीन खदानें ये हैं- महाराष्ट्र के नागपुर क्षेत्र में अदसा खदान, जो एक भूमिगत खुली खदान है, ख) कन्हान क्षेत्र में शारदा भूमिगत खदान और ग) मध्य प्रदेश के पेंच क्षेत्र में धनकसा भूमिगत खदान। अदसा खदान की वार्षिक कोयला उत्पादन क्षमता 1.5 एमटी है, जबकि शारदा और धनकसा खदानों की वार्षिक कोयला उत्पादन क्षमता क्रमशः 0.4 एमटी और 1 एमटी है। इस अवसर पर कंपनी ने अपने खनन कार्यों की निगरानी करने के लिए ‘डब्ल्यूसीएल आई’ के नाम से एक निगरानी प्रणाली शुरू की और इसके साथ ही अपने कर्मचारियों एवं हितधारकों से जुड़ने के लिए ‘संवाद’ के नाम से एक एप लॉन्‍च किया। ‘डब्ल्यूसीएल आई’ इस कंपनी की उन 15 प्रमुख खदानों के परिचालन की चौबीसों घंटे निगरानी करेगी जिनकी हिस्‍सेदारी कंपनी के कुल कोयला उत्पादन में 70% है। इतना ही नहीं, यह कोयले के स्टॉक के साथ-साथ साइडिंग पर कोयले की उपलब्धता और रेलवे साइडिंग (बगल की रेल लाइन) पर रेक के प्‍लेसमेंट एवं ढुलाई पर करीबी नजर रखने तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने में भी मदद करेगी। ‘संवाद’ दरअसल कर्मचारियों और हितधारकों के लिए एक मोबाइल एवं डेस्कटॉप एप है, जो सुझाव/प्रतिक्रिया/अनुभव साझा करने के लिए एक आभासी या वर्चुअल प्‍लेटफॉर्म प्रदान करेगा। त्‍वरित प्रतिक्रि‍या टीमें 7 दिनों की निर्धारित अवधि में प्रश्नों और फीडबैक का जवाब देंगी। श्री जोशी ने घोषणा की कि कोल इंडिया की विभिन्न सहायक कंपनियों ने मध्य प्रदेश सरकार को राज्य में कोविड-19 महामारी के खिलाफ अपनी लड़ाई को मजबूती प्रदान करने के लिए 20 करोड़ रुपये दिए हैं। कोल इंडिया महाराष्ट्र सरकार को भी कोविड-19 के खिलाफ अपनी लड़ाई को मजबूती प्रदान करने के लिए एक-दो दिन में 20 करोड़ रुपये देगी। डब्ल्यूसीएल ने चालू वित्त वर्ष के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ‘मिशन 100 डेज’ के नाम से एक रोडमैप लॉन्च किया है। यह मिशन कंपनी के मध्यमकालिक और दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्‍त करने में भी उसकी मदद करेगा। चालू वित्त वर्ष के लिए कंपनी का कोयला उत्पादन और उठाव लक्ष्य 62 एमटी है। श्री जोशी ने कहा, ‘इन 3 खदानों को खोलना वित्त वर्ष 2023-24 तक 20 नई परियोजनाएं शुरू करने की डब्ल्यूसीएल की भविष्य की योजना का एक हिस्सा है, जिनमें से 14 परियोजनाएं महाराष्ट्र में और 6 परियोजनाएं मध्य प्रदेश में शुरू की जाएंगी। कंपनी इन परियोजनाओं पर कुल 12753 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय करेगी और 14000 से भी अधिक प्रत्यक्ष रोजगारों का सृजन करेगी। कंपनी पिछले 6 वर्षों में 5300 करोड़ रुपये से भी अधिक के पूंजीगत व्यय के साथ 20 नई और विस्तार परियोजनाएं शुरू कर चुकी है तथा भूमि गंवाने वालों को 5250 प्रत्यक्ष रोजगार दे चुकी है। डब्ल्यूसीएल ने वित्त वर्ष 2019-20 में 57.64 एमटी कोयले का उत्पादन किया था, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 8% से भी अधिक की वृद्धि को दर्शाता है।

आरसीएफ ने चालू वित्त वर्ष के दौरान अपने औद्योगिक उत्पादों की बिक्री में 100 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार किया कोविड-19की वर्तमान स्थिति के बावजूद राष्‍ट्रीय केमिकल्‍स एण्‍ड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड- आरसीएफअपने कार्यों को संचालित करने में सफल रहा है और इसने चालू वित्त वर्ष 2020-21 के पहले दो महीनों में अपने औद्योगिक उत्पादों की बिक्री में 100 करोड़रुपये का आंकड़ा पार कर लिया है। आरसीएफ उर्वरक विभाग, भारत सरकार के तहत सार्वजनिक क्षेत्र का उद्यम है। प्रमुख उत्पाद हैं: अमोनिया–प्रशीतक (रेफ्रिजरेंट) के रूप में; स्टील, रॉकेट ईंधन, फार्मास्यूटिकल्स के नाइट्राइडिंग के लिए। अमोनियम नाइट्रेट- कोयला खनन आदि के लिए विस्फोटक में। अमोनियम बाय-कार्बोनेट- बेकरी उत्पादों, टेनरियों (चर्म उद्योग) के लिए। मिथाइल एमाइन- कीटनाशकों, रंग, फार्मास्यूटिकल्स में। सांद्र नाइट्रिक एसिड: विस्फोटक, फार्मास्यूटिकल्स में। तनु न्यूट्रिक एसिड: ज्‍वैलरी, प्रणोदक (प्रोपेलेंट) में। आर्गन - आर्क वेल्डिंग। फॉर्मिक एसिड - रबर, चमड़े में। डाई -मिथाइल फॉर्मामाइड - फाइबर, स्पैन्डेक्स, पॉलीमाइड्स के लिए विलायक के रूप में। डाई-मिथाइल एसिटामाइड - पॉलिएस्टर फिल्म, एक्रिलिक फाइबर के लिए विलायक के रूप में। सोडियम नाइट्रेट: प्रणोदक(प्रोपेलेंट), विस्फोटक में। आरसीएफ का 2019-20 की चौथी तिमाही का टैक्स के बाद लाभ 2018-19 की चौथी तिमाही की तुलना में 190% से अधिक बढ़ गया है। राष्‍ट्रीय केमिकल्‍स एण्‍ड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (आरसीएफ) का मार्च तिमाही में टैक्स के बाद लाभ पिछले वर्ष के 48.47 करोड़ रुपयेकी तुलना में बढ़कर 142.28करोड़ रुपयेहो गया है। इस प्रकार मार्च तिमाही के लाभ में 193.54% की वृद्धि दर्ज की गयी है। वित्त वर्ष 2018-19 की तुलना में 2019-20 के दौरान आरसीएफ के लाभ (टैक्स के बाद)में 49% की वृद्धि दर्ज की गयी है। 31 मार्च, 2020 को समाप्त हुए वित्त वर्ष के लिए टैक्स के बाद लाभपिछले वर्ष के 139.17 करोड़ रुपये से बढ़कर208.15 करोड़ रुपये हो गया है। परिचालन से वार्षिक राजस्व में 9% (वर्ष-दर-वर्ष) की वृद्धि दर्ज की गयी है और यह बढ़कर 9698 करोड़रुपये हो गया है, जो कि स्थापना के बाद से अब तक का सबसे अधिक है। असाधारण वस्तुओं (इक्सेप्शनल आइटम्स) से पहले वार्षिक ईबीआईडीटीए में 36% (वर्ष-दर-वर्ष) की वृद्धि हुई है और यह बढ़कर 711.96 करोड़रुपये हो गया है। कंपनी द्वारा विभिन्न चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, पिछले वर्ष की तुलना में चालू वर्ष के लिए कंपनी का वित्तीय प्रदर्शन बेहतर रहा है। उर्वरक उद्योग को कुछ राहत मिली है, क्योंकि सरकार ने कुछ संयंत्रों को 150 रुपये प्रति टन के विंटेज भत्ते (30 वर्ष पुराना + गैस में परिवर्तित) को मंजूरी दी और संशोधित एनपीएस III के अनुसारअतिरिक्त निश्चित लागत के रूप में प्रति टन यूरिया के लिए 350रुपये का अनुमोदन किया, जिसका लम्बे समय से इन्तजार किया जा रहा था।आरसीएफ ने वित्त वर्ष 2019-20 के चौथी तिमाही में इसका हिसाब रखा है। बोर्ड ने 28.40% लाभांश की सिफारिश की है, यह कंपनी के इतिहास में सबसे अधिकलाभांश की घोषणा है। आरसीएफ के सीएमडी एस.सी. मुदगेरीकर ने कहा है कि वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान निर्मित और व्यापार किये जाने वाले उर्वरकों की कुल बिक्री में पिछले वर्ष की तुलना में 7% की वृद्धि हुई है। पिछले वर्ष की तुलना में कंपनी के कॉम्प्लेक्स फ़र्टिलाइज़र-सुफला की बिक्री में 15% से अधिक की वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान आरसीएफने दो नए उत्पाद लॉन्च किए- आर्गेनिक ग्रोथस्टीमुलेंट और पानी में घुलनशील सिलिकॉन उर्वरक। वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान आरसीएफ ने 15 मिलियन लीटर प्रति दिन क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को शुरू किया। आरसीएफ को सरकारी खाते पर यूरिया के आयात के लिए एक स्टेट ट्रेडिंग एंटरप्राइज के रूप में भी मान्यता प्राप्त हुई और कंपनी ने 16 लाख मीट्रिक टन यूरिया का आयात किया। कृषि क्षेत्र को वित्त वर्ष 2020-21 में अच्छे मानसून के पूर्वानुमान से मदद मिलने की उम्मीद है। मौजूदा कोविड-19 महामारी में, कंपनी आने वाली चुनौतियों का सामना करने और आने वाले अवसरों का लाभ उठाने के लिए तैयार है।

*हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इसका मकसद लोगों को पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति जागरूक और सचेत करना है। इस दिवस को मनाने का फैसला वर्ष 1972 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन में (स्टॉकहोम कन्वेंशन के दौरान) लिया गया था। इसके बाद 5 जून, 1974 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया, जिसकी थीम 'ऑनली वन अर्थ' (Only One Earth) थी।* *विश्व पर्यावरण दिवस,2020 की थीम'बायोडायवर्सिटी’ (Biodiversity) है। इस थीम के ज़रिये इस बार संदेश दिया जा रहा है कि जैव विविधता संरक्षण एवं प्राकृतिक संतुलन होना मानव जीवन के अस्तित्व के लिये बेहद आवश्यक है।*

Current Affairs Quiz 6 Jun 2020 दैनिक सामान्य ज्ञान क्विज https://www.simplifiedshiksha.com/current-affairs-quiz-6-jun/
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सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (Centre for Science and Environment-CSE) द्वारा जारी एक नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 में भारत में मौसम संबंधी आपदाओं के कारण 50 लाख लोग विस्थपित हुए हैं, जो कि विश्व में सबसे ज़्यादा है। प्रमुख बिंदु: उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में दुनिया भर में प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाले कुल आंतरिक विस्थापनों (Internal Displacements) में भारत का पाँचवा स्थान रहा। इन प्राकृतिक आपदाओं में बाढ़, चक्रवात, सूखा, इत्यादि शामिल हैं। वर्ष 2019 में 19 प्रमुख चरम मौसमी की घटनाओं के कारण 1357 लोगों की मृत्यु हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून के कारण आई बाढ़ से 26 लाख लोग विस्थापित हुए थे, जबकि सिर्फ चक्रवात Fani के कारण 18 लाख लोगों का विस्थापन हुआ था। गौरतलब है कि 19 राज्यों में सूखे की स्थिति से उत्पन्न समस्याओं के कारण 63 हज़ार लोग विस्थापित हुए हैं। रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि कई लोग रोज़गार की तलाश में भी विस्थापित हुए हैं। वर्तमान में लगभग 45 करोड़ लोगों के विस्थापन में से अधिकांश अपने ही राज्य में विस्थापित हुए हैं। वर्ष 2011 में 1.7 करोड़ से अधिक नए लोग रोज़गार की तलाश में ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में विस्थापित हुए हैं। रिपोर्ट के अन्य प्रमुख बिंदु: रिपोर्ट में वन, जल, अपशिष्ट, वायु, भूमि, वन्य जीवन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर भी कुछ जानकारियाँ साझा की गई हैं। वर्ष 2014-18 के बीच बाघों की संख्या में 747 की वृद्धि दर्ज की गई। हालाँकि बाघों के संरक्षण के लिये आवंटित कुल क्षेत्र में 179 वर्ग किलोमीटर की कमी दर्ज की गई है। 38% ज़िलों के वन आच्छादन में भी कमी आई है, जबकि 21 में से 5 नदियाँ खत्म होने की कगार पर हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (Centre for Science and Environment-CSE) यह एक गैर-लाभकारी संस्थान है जो भारत में पर्यावरण, विकास के मुद्दों पर थिंक टैंक के रूप में कार्य कर रहा है। इसकी स्थापना वर्ष 1980 में की गई थी इस संस्थान ने वायु और जल प्रदूषण, अपशिष्ट जल प्रबंधन, औद्योगिक प्रदूषण, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा संबंधी पर्यावरणीय मुद्दों पर जागरूकता एवं शिक्षा का प्रसार करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। पर्यावरण शिक्षा और संरक्षण की दिशा में इसके योगदान के कारण वर्ष 2018 में इसे शांति, निशस्त्रीकरण और विकास के लिये इंदिरा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट: गौरतलब है कि United Nations Children's Fund- (UNICEF) द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 में भारत में प्राकृतिक आपदाओं, संघर्ष और हिंसा के कारण 5 मिलियन से अधिक लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए हैं। वर्ष 2019 में भारत में आंतरिक रूप से सर्वाधिक विस्थापन हुआ है। भारत के बाद क्रमश: फिलीपींस, बांग्लादेश और चीन का स्थान है। भारत, फिलीपींस, बांग्लादेश, और चीन प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित होने वाले शीर्ष देश हैं, इन देशों में वैश्विक आपदा-प्रेरित विस्थापन का लगभग 69% योगदान है। भारत में वर्ष 2019 में कुल 5,037,000 लोगों का आंतरिक विस्थापन हुआ जिनमें से 5,018,000 लोगों का विस्थापन प्राकृतिक आपदाओं के कारण हुआ है।

इन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु सरकारी एजेंसियों को जवाबदेह बनाए जाने के साथ ही भारत के प्रत्येक नागरिकों की भी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वे वन्यजीवों को किसी तरह का नुकसान न पहुँचाए। देश में वन्यजीवों के संरक्षण हेतु लागू नियम के बारे में लोगों को जागरूक करने की भी अवश्यकता है।

वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर-इंडिया (World Wide Fund for Nature-India) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, COVID-19 के प्रसार को रोकने हेतु देशभर में लगाए गए लॉकडाउन के दौरान वन्यजीवों के शिकार में वृद्धि हुई है। प्रमुख बिंदु: गौरतलब है कि वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर-इंडिया के ‘ट्रैफिक’ (TRAFFIC) प्रभाग द्वारा यह अध्ययन किया गया है। ‘ट्रैफिक’ एक वन्यजीव तस्करी निगरानी नेटवर्क है जो वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर इंडिया के कार्यक्रम प्रभाग के रूप में कार्य करता है। रिपोर्ट के अनुसार, लॉकडाउन अवधि के दौरान वन्यजीवों के अवैध शिकार में दोगुने से भी अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, वन्यजीवों का अवैध शिकार भोजन और स्थानीय बाज़ारों में बिक्री हेतु किया गया है। लॉकडाउन के दौरान (23 मार्च-3 मई) वन्यजीवों के शिकार की संख्या बढ़कर 88 हो गई है, जबकि लॉकडाउन से पूर्व (10 फरवरी-22 मार्च) यह संख्या 35 थी। लॉकडाउन के दौरान कुल 9 तेंदुओं का शिकार किया गया है, जबकि लॉकडाउन से पहले यह संख्या 4 थी। रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा लगातार प्रयासों के बावजूद लॉकडाउन अवधि के दौरान वन्यजीव अत्यधिक खतरे में है। लॉकडाउन से पहले अंग्युलेट (Ungulate) के शिकार की संख्या 8 (35 में से) थी, जो लॉकडाउन के बाद बढ़कर 39 (88 में से) हो गई है। दूसरे शब्दों में कहे तो लॉकडाउन से पूर्व इन वन्यजीवों का 22% था, जबकि लॉकडाउन के बाद यह आँकड़ा 44% तक पहुँच गया। लॉकडाउन की अवधि के दौरान विभिन्न कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा कुल 222 लोगों को अवैध शिकार के मामलों में गिरफ्तार किया गया, जबकि लॉकडाउन के पहले 85 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। लॉकडाउन अवधि के दौरान कछुओं की अवैध तस्करी के मामले कम आए है साथ ही इससे संबंधित कोई गिरफ्तारी भी नहीं हुई है। राजस्थान में विलुप्त होने के कगार पर खड़े चिंकारा जैसे वन्यजीवों के अवैध शिकार की सूचना मिली है। चिंकारा जैसे अन्य वन्यजीव ‘वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972’ के तहत संरक्षित हैं। छोटे वन्यजीवों का शिकार: छोटे वन्यजीवों जैसे खरगोश, साही, पंगोलीन, बंदर, छोटी जंगली बिल्लियाँ, इत्यादि के भी अवैध शिकार में वृद्धि दर्ज की गई है। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में छोटे वन्यजीवों की उच्च मांग रहती है लेकिन वर्तमान समय (लॉकडाउन के दौरान) में स्थानीय बाज़ारों में इनके मांस की आपूर्ति की गई है। लॉकडाउन से पूर्व इनके शिकार का प्रतिशत 17% था, जबकि लॉकडाउन के बाद यह आँकड़ा 25% तक पहुँच गया। रिपोर्ट के अनुसार, अगर इसी तरह छोटे वन्यजीवों का शिकार किया जाता रहा तो बाघ, शेर और तेंदुए जैसे वन्यजीवों को एक गंभीर समस्या का सामना करना पड़ सकता है जो हमारे पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन को बनाए रखने के लिये उचित नहीं है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 [The wildlife (Protection) Act,1972]: वर्ष 1972 में स्टॉकहोम कांफ्रेंस के उद्देश्यों की पूर्ति के लिये सरकार ने देश के वन्यजीवों की प्रभावी ढंग से रक्षा हेतु तस्करी, अवैध शिकार व वन्यजीव और वनोत्पादों के अवैध व्यापार को नियंत्रित करने के उद्देश्य से वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 को अधिनियमित किया। जनवरी 2003 में इस अधिनियम को संशोधित किया गया और इसका नाम भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 2002 रखा गया इसके अंतर्गत दंड तथा ज़ुर्माने के प्रावधान को कठोर कर दिया गया। यह अधिनियम जंगली जानवरों, पक्षियों और पौधों को और अधिक सुरक्षा प्रदान करता है। यह अधिनियम भारत में लागू है। इस कानून में राज्य वन्यजीव सलाहकार बोर्ड, जंगली पशुओं और पक्षियों के शिकार पर नियंत्रण, वन्यजीवों से समृद्ध अभ्याराणों एवं राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना, जंगली पशुओं के व्यापार पर नियंत्रण, पशु उत्पादों पर कानून व कानून के उलंघन पर कानूनी सज़ा का प्रावधान है। वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर-इंडिया (World Wide Fund for Nature-India) वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर-इंडिया की स्थापना 27 नवंबर, 1969 को एक चैरीटेबल ट्रस्ट के रूप में की गई थी। इसका उद्देश्य पृथ्वी के प्राकृतिक पर्यावरण में ह्रास को रोकते हुए प्रकृति के साथ मानव जीवन को सौहार्दपूर्ण बनाना है। वर्ष 1987 में वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर- इंडिया की संरचना को नया रूप दिया गया। वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर-इंडिया एक रचनात्मक व विज्ञान आधारित संगठन है। वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर-इंडिया के उद्देश्य इस प्रकार हैं- विश्व की जैव विविधता का संरक्षण करना। यह सुनिश्चित करना कि गैर-परंपरागत प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग ही संपोषणीय है। प्रदूषण में कमी एवं अनावश्यक उपभोग में कमी को बढ़ावा देना। आगे की राह: वन्यजीवों के संरक्षण हेतु देश में निर्मित सख्त कानूनों के बावजूद इनके शिकार को रोक पाना अभी भी संभव नहीं हुआ है।

केंद्र सरकार ने देश में अपनी तरह का पहला ‘द अर्बन लर्निंग इंटर्नशिप प्रोग्राम-ट्यूलिप’ (The Urban Learning Internship Program-TULIP) लॉन्च किया है। कार्यक्रम संबंधी प्रमुख बिंदु अपनी तरह के इस पहले कार्यक्रम में स्‍नातक स्‍तर की शिक्षा पूरी कर चुके छात्रों को देश भर के शहरी स्थानीय निकायों (Urban Local Bodies-ULBs) एवं स्‍मार्ट सिटी जैसी परियोजनाओं में इंटर्नशिप (Internship) करने का अवसर मिलेगा। इंटर्नशिप की अवधि आठ सप्ताह से एक वर्ष तक की हो सकती है, हालाँकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस दौरान छात्रों को किसी प्रकार का भुगतान किया जाएगा अथवा नहीं। कार्यक्रम की शुरुआत के साथ ही इससे संबंधित पोर्टल भी लॉन्च किया गया है। ट्यूलिप कार्यक्रम 4400 शहरी स्‍थानीय निकायों और स्‍मार्ट शहरों के माध्‍यम से भारत में इंटर्नशिप का बड़ा अवसर प्रदान करेगा। इस कार्यक्रम का कोई भी विशिष्ट बजट निर्धारित नहीं किया गया है, किंतु शहरी स्थानीय निकाय और स्मार्ट सिटी चाहें तो वेतन अथवा भत्तों का भुगतान करने के लिये केंद्र द्वारा आवंटित प्रशासनिक खर्चों का उपयोग कर सकते हैं। इस संबंध में वे अपनी स्वयं की चयन प्रक्रिया भी निर्धारित कर सकते हैं। यह योजना आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) तथा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (All India Council for Technical Education-AICTE) के मध्य 5 वर्ष का संयुक्त उपक्रम है। इस संबंध में जारी किये गए दिशा-निर्देशों के अनुसार, आवेदक भारतीय नागरिक होना चाहिये जिसने बीते 18 महीनों के भीतर कॉलेज का अंतिम वर्ष पूरा किया हो। कार्यक्रम के लाभ अनुमान के अनुसार, पहले वर्ष में इस कार्यक्रम के तहत 25000 छात्रों को इंटर्नशिप का अवसर मिलेगा, इससे न केवल अधिक-से-अधिक युवाओं को शहरी स्‍थानीय निकायों की विस्‍तृत कार्यप्रणाली का प्रत्यक्ष अनुभव मिलेगा, बल्कि इसके ज़रिये देश में एक ऐसा मानव संसाधन पूल भी तैयार होगा जिसे उद्योग अपनी आवश्‍यकताओं के अनुरूप कार्य के लिये अनुबंधित कर सकेंगे। इंटर्नशिप कार्यक्रम के माध्यम से छात्रों को व्यावहारिक परिस्थितियों में कार्य करने का अनुभव मिलेगा, जिससे वे बाज़ार की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का आसानी से सामना कर सकेंगे। इस प्रकार छात्रों के लिये उपलब्ध विकल्पों की संख्या में भी वृद्धि होगी। इसके ज़रिये राष्ट्र-निर्माण में युवाओं की क्षमता का यथासंभव प्रयोग हो सकेगा। यह कार्यक्रम भारत की शहरी चुनौतियों के समाधान के लिये सह-निर्माण की प्रक्रिया में युवाओं को जोड़ने के साथ ही नए विचारों और ऊर्जा के प्रसार को बढ़ावा देगा। आगे की राह ट्यूलिप कार्यक्रम ‘न्यू इंडिया’ की नींव रखने में मददगार होगा क्‍योंकि यह छात्रों को व्यावहारिक अनुभव देने के साथ ही शहरी स्थानीय निकायों और स्मार्ट शहरों के कामकाज में नए विचारों और नवीन सोच को भी बढ़ावा देगा। यह कार्यक्रम युवाओं को नई सोच और अभिनव तौर तरीकों से स्‍थानीय शहरी निकायों के काम काज में सुधार लाने का अवसर प्रदान करेगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने ‘बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन’ (Bengal Eastern Frontier Regulation- BEFR), 1873 में संशोधन करने वाले राष्ट्रपति के आदेश; जो असम के ज़िलों को ‘इनर लाइन परमिट’ (Inner Line Permit) से बाहर रखता है, पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। प्रमुख बिंदु: याचिकाकर्ता ने BEFR का हवाला देते हुए कहा है कि असम के अधिकांश ज़िले मूलत: ILP प्रणाली के भाग थे, अत: राज्य में CAA को लागू नहीं किया जाना चाहिये। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर मामले पर दो सप्ताह में प्रतिक्रिया मांगी है। इनर लाइन परमिट (Inner Line Permit): भारत में यह अवधारणा औपनिवेशिक शासकों द्वारा अपनाई गई थी जिसका उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत में जनजातीय आबादी वाले पहाड़ी क्षेत्रों को मैदानी भागों से अलग करना था। इस अवधारणा की उत्पति 'बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन एक्ट (BEFR), 1873 से हुई है। ILP वाले पहाड़ी क्षेत्रों में प्रवेश करने तथा निवास करने के लिये अन्य क्षेत्रों के भारतीय नागरिकों को इनर लाइन परमिट (ILP) की आवश्यकता होती है। इस अवधारणा के तहत अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मिज़ोरम को संरक्षण प्रदान किया गया था जिसमें हाल ही में मणिपुर को जोड़ा गया है। BEFR बाहरी नागरिकों (ब्रिटिश विषयों) के न केवल ILP क्षेत्रों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाता है अपितु यह उनके वहाँ ज़मीन खरीदने पर भी प्रतिबंध लगाता है। ILP प्रणाली के माध्यम से अंग्रेजों द्वारा आदिवासी समुदायों से साथ की जाने वाले व्यावसाय हितों को भी संरक्षित किया गया था। स्वतंत्रता के बाद 'इनर लाइन परमिट' प्रणाली में भारत सरकार द्वारा संशोधन किया गया था 'ब्रिटिश विषयों' पद को 'भारत के नागरिक' से प्रतिस्थापित कर दिया गया। वर्तमान में ILP प्रणाली का मुख्य उद्देश्य, ILP के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में अन्य भारतीय नागरिकों को बसने से रोकना है ताकि स्थानीय आदिवासी समुदायों की रक्षा की जा सके। ILP तथा नागरिकता संशोधन अधिनियम: नागरिकता संशोधन अधिनियम (Citizenship Amendment Act- CAA) में 'इनर लाइन प्रणाली' सहित कुछ अन्य श्रेणियों में छूट प्रदान की गई है। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), संविधान की 6वीं अनुसूची में शामिल असम, मेघालय, मिज़ोरम और त्रिपुरा के जनजातीय क्षेत्रों तथा इनर लाइन परमिट (ILP) प्रणाली के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों पर लागू नहीं होगा। CAA अधिनियम के पूर्वोत्तर भारत में विरोध के बाद राष्ट्रपति द्वारा कानून में (संशोधन) आदेश, 2019 जारी किया गया जो BEFR, 1873 में संशोधन का प्रावधान करता है। राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से ILP को मणिपुर तथा नगालैंड के कुछ हिस्सों में विस्तारित किया गया था। याचिका में की गई मांग: मूल BEFR में असम के कामरूप, दारंग, नोगोंग (अब नागांव), सिबसागर, लखीमपुर और कछार ज़िले शामिल थे। याचिका में कहा गया है राष्ट्रपति के आदेश के बाद ILP को लागू करने की असम सरकार की शक्ति समाप्त हो गई है। अगर ‘इनर लाइन परमिट’ को असम राज्य में विस्तारित किया जाता है तो नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (Citizenship Amendment Act- CAA) राज्य में प्रभावी नहीं होगा। जिससे असम के लोगों के हितों का बेहतर तरीके से संरक्षण किया जा सकेगा। असम पर प्रभाव: यदि असम में यदि ILP को लागू किया जाता है तो असम के अवैध आप्रवासियों को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के तहत नागरिकता नहीं मिलेगी। अवैध आप्रवासियों को असम में प्रवेश करने से प्रतिबंधित किया जा सकेगा। आगे की राह: असम राज्य कई वर्षों से अवैध प्रवास का सामना कर रहा है। केंद्र तथा राज्य सरकार के राजनीतिक स्वार्थों के कारण अभी तक असम में अभी अवैध प्रवास की समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। अत: केंद्र सरकार को चाहिये कि वह असम के संबंध में केंद्र सरकर की ILP नीति को स्पष्ट करे ताकि राज्य के हितों का बेहतर तरीके से समाधान किया जा सके।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labor Force Survey- PLFS) के अनुसार, वर्ष 2018-19 में भारत की बेरोज़गारी दर में कमी आई है, जहाँ एक ओर वर्ष 2017-18 में यह 6.1 प्रतिशत थी, वहीं वर्ष 2018-19 में यह घटकर 5.8 प्रतिशत हो गई। रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (Ministry of Statistics and Programme ImplementationMoSPI) द्वारा जारी PLFS 2018-19 के अनुसार, इस अवधि के दौरान श्रम बल भागीदारी दर (Labour Force Participation Rate) में 37.5 प्रतिशत के साथ मामूली सुधार हुआ है, जो कि 2017-18 में 36.9 प्रतिशत था। विदित हो कि श्रम बल को उन लोगों के रूप में परिभाषित किया जाता है जो या तो कार्य कर रहे हैं या काम की तलाश कर रहे हैं अथवा काम के लिये उपलब्ध हैं। इस प्रकार श्रम बल भागीदारी दर देश की कुल आबादी में श्रम बल का प्रतिशत है। वहीं बेरोज़गारी दर का अभिप्राय श्रम बल के भीतर कार्य न पाने वाले लोगों के प्रतिशत से होता है। ग्रामीण क्षेत्र में पुरुषों में बेरोज़गारी दर 5.6 प्रतिशत थी एवं महिलाओं में 3.5 प्रतिशत, जबकि नगरीय क्षेत्र में यह दर पुरुषों में 7.1 प्रतिशत एवं महिलाओं के बीच 9.9 प्रतिशत थी। रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र में एक कामगार ने औसतन करीब 45 घंटे कार्य किया, जबकि नगरीय क्षेत्रों में एक सप्ताह में एक विशिष्ट अवधि के दौरान एक कामगार ने औसतन 50 घंटे कार्य किया। बीते वर्ष आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) की रिपोर्ट से पता चला था कि देश में बेरोज़गारी दर बीते 45 वर्षों के सबसे उच्चे स्तर पर पहुँच गई थी। वर्ष 2018-19 के दौरान लगभग 51.7 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत स्वनियोजन (Self Employment) था। वहीं 25.1 ग्रामीण परिवारों की आय का मुख्य स्रोत आकस्मिक मज़दूरी (Casual Wages) थी और लगभग 13.1 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की आय का मुख्य स्रोत नियमित मज़दूरी थी। वर्ष 2018-19 के दौरान करीब 31.8 प्रतिशत नगरीय परिवारों की आय का मुख्य स्रोत स्वनियोजन था। वहीं 11.0 प्रतिशत नगरीय परिवारों की आय का मुख्य स्रोत आकस्मिक मज़दूरी (Casual Wages) थी और 42.8 प्रतिशत नगरीय परिवारों की आय का मुख्य स्रोत नियमित मज़दूरी थी। भारत में 68.4 प्रतिशत कामगार गैर-कृषि क्षेत्र में अनौपचारिक रूप से कार्य कर रहे थे। प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के बीच बेरोज़गारी दर में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 15-29 आयु वर्ग के युवाओं और शिक्षित व्यक्तियों में बेरोज़गारी की दर क्रमशः 17.3 प्रतिशत और 11 प्रतिशत रही। बेरोज़गारी के कारण शहरी युवा सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। आँकड़ों के अनुसार 2018-19 के दौरान नगरीय पुरुषों में बरोज़गारी दर 18.7 प्रतिशत एवं नगरीय महिलाओं में 25.7 प्रतिशत थी। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labor Force Survey- PLFS) यह रिपोर्ट राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (National Sample Survey Organisation- NSSO) द्वारा जारी की जाती है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labor Force Survey-PLFS) को मुख्य रूप से देश में रोज़गार तथा बेरोज़गारी की स्थिति को मापने के उद्देश्यों से डिज़ाइन किया गया है। रोज़गार और बेरोज़गारी संबंधी प्रमुख संकेतक श्रम बल भागीदारी दर (LFPR): श्रम बल भागीदारी दर देश की कुल आबादी में श्रम बल का प्रतिशत है। श्रम बल को का अर्थ उन लोगों से है जो या तो कार्य कर रहे हैं या काम की तलाश कर रहे हैं अथवा काम के लिये उपलब्ध हैं। कामगार जनसंख्या अनुपात (WPR): WPR को कुल जनसंख्या में नियोजित व्यक्तियों के प्रतिशत के रूप में परिभाषित किया जाता है। बेरोज़गारी दर (UR): बेरोज़गारी दर की गणना श्रम बल से बेरोज़गारों की संख्या को विभाजित करके की जाती है।

500 Meter Aperture Spherical Telescope (FAST) रेडियो टेलिस्कोप्स दुनिया के सबसे बड़े सिंगल-अपर्चर टेलिस्कोप से चीन दूसरी दुनिया में एलियन ग्रहों को खोजने की तैयारी कर रहा है। यह टेलिस्कोप जनवरी से काम कर रहा है। पेइचिंग नॉर्मल यूनिवर्सिटी के ऐस्ट्रोनॉमर झांग तोंगजी इस प्रॉजेक्ट के चीफ साइंटिस्ट हैं। उन्होंने बताया है कि ऐसे कई सिग्नल मिले हैं जिनका संकेत दूसरी दुनिया में जीवन की ओर हो सकता है और टीम इसकी जांच करने के लिए एक्साइटेड है। FAST रेडियो टेलिस्कोप्स के बारे में 16,000 फुट के इस टेलिस्कोप को 1994 में प्रस्तावित किया गया था और आखिरकार 2007 में मंजूरी मिल सकी। इसमें 36 फुट के 4,500 तिकोने पैनल हैं जो एक डिश का आकार लेते हैं। साथ ही 33 टन का Retina है जो 460-525 फीट की हाइट पर टंगा है। इसके आसपास के तीन मील के रेडियस को पूरी तरह खाली कराया गया है ताकि कोई रेडियो इंटरफेरेंस न हो। एलियन लाइफ खोजने के साथ ही टेलिस्कोप पल्सर, ब्लैक होल, गैस क्लाउड और गैलेक्सी जैसे दूसरे कॉस्मोलॉजिकल आयामों को स्टडी करेगा।500 मीटर का Aperture Spherical Telescope (FAST) पहले के रेडियो टेलिस्कोप्स से दोगुने एरिया को कवर कर सकेगा और इसकी रीडिंग 3-5 गुना ज्यादा सटीक होगी।

I.A.S.(हिंदी माध्यम) - آمار و تحلیل کانال تلگرام @hindi_medium_zone