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मनुस्मृति, अध्याय 5, श्लोक 5 में कहा गया है:
लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डुं कवकानि च।
अभक्ष्याणि द्विजातीनाममेध्यप्रभवानि च॥ ५.५॥
सरल अर्थ: लहसुन, गृञ्जन, पलाण्डु (प्याज) और कवक (मशरूम) को द्विजातियों के लिए अभक्ष्य बताया गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 17 में
श्रीकृष्ण भोजन के तीन गुणों के अनुसार भेद बताते हैं।
गीता 17.8 — सात्त्विक भोजन
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहारा: सात्त्विकप्रियाः॥
अर्थ: जो आहार आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता बढ़ाने वाला हो, वह सात्त्विक लोगों को प्रिय होता है।
गीता 17.9 — राजसिक भोजन
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥
अर्थ: अत्यधिक तीखा, खट्टा, नमकीन, गरम और जलन उत्पन्न करने वाला भोजन राजसिक लोगों को प्रिय बताया गया है।
लहसुन-प्याज का त्याग क्यों किया जाता है?
धार्मिक परंपराओं के आधार पर मुख्य कारण ये हैं:
सात्त्विकता: मन को शांत और साधना के अनुकूल रखने की परंपरागत धारणा।
पूजा और भोग की मर्यादा: कुछ मंदिरों, वैष्णव परंपराओं और व्रतों में सात्त्विक भोजन का नियम।
धर्मशास्त्रीय विधान: मनुस्मृति 5.5 में इन पदार्थों का स्पष्ट निषेध, विशेष संदर्भ में।
