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हर रात कमरे में अकेले बैठकर हिसाब लगाता रहता हूँ, उस सब का जो मैं होना चाहता हूं, उस सब का जो मैं बन गया हूँ।
बाक़ी सब ठीक है, लेकिन व्यक्तिगत रूप से आपको न जानने वाली कोई स्त्री भी आप पर विश्वास कर सके, तो आप सही मायने में पुरुष होने की परिभाषा में फिट होते हैं।
और वो भी तब जबकि हर स्त्री ये जानती है कि अधिकांशतः पुरुष आज के समय में विश्वास के क़ाबिल नहीं हैं।
चूड़ी, पायल, बिंदिया, काजल, गजरा सब पड़े रहने दो, खींच के बाँधों जुल्फ़ों को और एक लट गाल पे रहने दो।
