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बिहार दरोगा 15 Nov 2025.pdf7.96 MB

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🔥सपनों की उड़ान🔥 एक छोटे से गाँव में बबलू नाम का एक लड़का रहता था। गाँव में पढ़ाई-लिखाई की सुविधाएँ बहुत कम थीं, लेकिन बबलू की आँखों में बड़े सपने थे। उसके पिता एक किसान थे और परिवार की आर्थिक स्थिति कमज़ोर थी। बबलू का सबसे बड़ा सपना सरकारी नौकरी पाना था, ताकि वह अपने परिवार का सहारा बन सके और गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकल सके। गाँव के स्कूल में 12वीं तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, आगे की तैयारी के लिए उसे शहर जाना पड़ा। शहर का ख़र्च उठाना परिवार के लिए मुश्किल था, इसलिए बबलू ने दिन में एक छोटी-मोटी नौकरी करने का फ़ैसला किया और रात में पढ़ाई करने लगा। उसकी राह में कई मुश्किलें आईं। कई बार वह थक हार जाता, कई बार उसे लगता कि शायद उसका सपना कभी पूरा नहीं होगा। वह अपने दोस्तों को देखता, जो कॉलेज की ज़िंदगी का मज़ा ले रहे थे, पार्टियाँ कर रहे थे। लेकिन बबलू का ध्यान सिर्फ़ अपने लक्ष्य पर था। एक दिन, तैयारी करते हुए उसने हिलसा में एक कोचिंग संस्थान का बैनर देखा, 'मैक्स रिजल्ट ज़ोन' (Max Result Zone)। और बैनर से नम्बर 8987241661 लेकर बात किया और फिर उसने वहाँ जाकर जानकारी ली। वहाँ के शिक्षक, निलेशानन्द सर ने उसकी स्थिति को समझा। सर ने उसे न सिर्फ़ सही मार्गदर्शन दिया, बल्कि हमेशा प्रेरित भी किया। सर अक्सर कहते, "बबलू, सफ़लता सिर्फ़ उन्हें मिलती है जो हार नहीं मानते। सरकारी नौकरी पाना मुश्किल है, नामुमकिन नहीं।"✌️ बबलू ने उन शब्दों को अपने दिल में बिठा लिया। वह पहले से ज़्यादा मेहनत करने लगा। उसने सोशल मीडिया और मनोरंजन से दूरी बना ली। उसकी दुनिया सिर्फ़ नौकरी, पढ़ाई और निलेशानन्द सर के मोटिवेशन तक सिमट गई थी। कई बार वह परीक्षाओं में असफल भी हुआ। पहली दो-तीन परीक्षाओं में उसका चयन नहीं हुआ, जिससे वह निराश हो गया था। लेकिन निलेशानन्द सर की बातें उसे फिर से खड़ा होने का हौसला देतीं। आख़िरकार, उसकी मेहनत रंग लाई। एक प्रतिष्ठित सरकारी विभाग में उसका चयन हो गया। जब उसे नियुक्ति पत्र मिला, तो उसकी आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। वह सबसे पहले निलेशानन्द सर के पास गया और उनका आशीर्वाद लिया। बबलू की कहानी यह सिखाती है कि 🔥🔥 चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी ख़राब क्यों न हों, अगर इरादे मज़बूत हों, सही मार्गदर्शन मिले और कड़ी मेहनत की जाए, तो कोई भी सपना हासिल किया जा सकता है।✌️✌️ ❣️ निलेशानन्द सर की शुभकामनाएं हमेशा विद्यार्थियों के साथ हैं, और यह कहानी एक प्रेरणा है कि आप भी जल्द से जल्द अपने सरकारी नौकरी के सपने को साकार कर सकते हैं।❣️

बिहार दरोगा 13 Nov 2025.pdf8.68 MB

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बिहार दरोगा 12 Nov 2025.pdf8.43 MB

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बिहार दरोगा 10 Nov 2025.pdf7.26 MB

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वंदे मातरम् @150 वर्ष इस वर्ष 7 नवंबर 2025 को राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' की रचना के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं। यह एक गीत नहीं है, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा है, जिसने न केवल आजादी की लड़ाई में नई जान फूंकी बल्कि भारतीय भाषाओं के साहित्य को मजबूती देते हुए नए आयाम प्रदान किए। इस गीत की रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1874 को अक्षय नवमी के शुभअवसर पर की थी। यह अमर गीत न केवल भारतीय स्वाधीनता संग्राम का मुख्य उद्घोष बना बल्कि आज देश का राष्ट्रगीत भी है। इस मौके पर पीएम मोदी एक स्मरणोत्सव का उद्घाटन करेंगे और एक स्मारक डाक टिकट और सिक्का भी जारी करेंगे। अमर गीत वंदे मातरम को लिखकर महान साहित्य रचनाकार और स्वतंत्रता सेनानी बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय उर्फ बंकिम चंद्र चटर्जी सदैव के लिए अमर हो गए। वंदे मातरम सिर्फ एक गीत या नारा ही नहीं, बल्कि आजादी की एक संपूर्ण संघर्ष गाथा है, जो 1874 से लगातार आज भी करोड़ों युवा दिलों में धड़क रही है। निस्संदेह स्कूल में पढ़ने के दौरान वंदे मातरम तो सबने सुना होगा, लेकिन वंदे मातरम के पीछे की कहानी और इसके रचियता बंकिम चंद्र के जीवन के उस संघर्ष को बहुत ही कम लोग जानते होंगे। तो आइए जानते हैं कौन थे बंकिम चंद्र और कैसे मिला हमें वंदे मातरम... 27 साल की उम्र में पहला उपन्यास लिखा:- बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 26 जून, 1838 ईस्वी को पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के कांठलपाड़ा गांव में हुआ था। प्रसिद्ध लेखक बंकिम चंद्र बंगला भाषा के शीर्षस्थ व ऐतिहासिक उपन्यासकार रहे हैं। हम उन्हें भारत का एलेक्जेंडर ड्यूमा मान सकते हैं। बंकिम ने अपना पहला बांग्ला उपन्यास दुर्गेश नंदिनी 1865 में लिखा था, तब वे महज 27 साल के थे। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। बंकिम चंद्रg को बंगला साहित्य को जनमानस तक पहुंचाने वाला पहला साहित्यकार भी माना जाता है। करीब 56 वर्ष की आयु में 08 अप्रैल, 1894 को 19वीं सदी के इस क्रांतिकारी उपन्यासकार ने दुनिया को सदैव के लिए अलविदा कह दिया था। हुगली कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज से पढ़े:- बंकिम चंद्र ने 1857 में बीए पास की थी। तब वे पहले भारतीय बने थे, जिन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से बीए की उपाधि प्राप्त की थी। 1869 में कानून की डिग्री प्राप्त की। कानून की पढ़ाई खत्म होने के तुरंत बाद उन्हें डिप्टी मजिस्ट्रेट पद पर नियुक्ति मिल गई। कुछ साल तक तत्कालीन बंगाल सरकार में सचिव पद पर भी काम किया। बंकिम ने रायबहादुर और सीआईई जैसी उपाधियां भी अर्जित कीं। उन्होंने सरकारी नौकरी से 1891 में सेवानिवृत्त ले ली थी। बंकिम चंद्र ने बंगला और हिंदी दोनों भाषाओं में अपनी लेखनी से एक अलग पहचान कायम की। 1874 में उनका लिखा गीत वंदे मातरम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान में क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत और मुख्य उद्घोष बन गया था। वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र ने 1875 में देशभक्ति का भाव जगाने वाले गीत वंदे मातरम की रचना की थी। इस रचना के पीछे एक रोचक कहानी है। जानकारी के अनुसार, अंग्रेजी हुक्मरानों ने इंग्लैंड की महारानी के सम्मान वाले गीत-गॉड सेव द क्वीन को हर कार्यक्रम में गाना अनिवार्य कर दिया था। इससे बंकिम चंद्र समेत कई देशवासी आहत हुए थे। इससे जवाब में उन्होंने 1874 में वंदे मातरम शीर्षक से एक गीत की रचना की। इस गीत के मुख्य भाव में भारत भूमि को माता कहकर संबोधित किया गया था। यह गीत बाद में उनके 1882 में आए उपन्यास आनंदमठ में भी शामिल किया गया था। ऐतिहासिक और सामाजिक तानेबाने से बुने हुए इस उपन्यास ने देश में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने में बहुत योगदान दिया। जब पहली बार गाया गया वंदे मातरम 1896 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एक अधिवेशन हुआ था। उस अधिवेशन में पहली बार वंदे मातरम गीत गाया गया था। थोड़े ही समय में राष्ट्र प्रेम का द्योतक यह गीत अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारतीय क्रांतिकारियों का पसंदीदा गीत और मुख्य उद्घोष बन गया। देशभर में क्रांतिकारी बच्चे, युवा, व्यस्क और प्रौढ़ ही नहीं यहां तक कि भारतीय महिलाओं की जुबां पर भी आजादी की लड़ाई का एक ही नारा गूंज उठता था और वह है वंदे मातरम। टैगोर ने दी वंदे मातरम की धुन यह किवंदती ही है कि बंकिम चंद्र के रचित वंदे मातरम गीत को उनके जीवनकाल में ज्यादा ख्याति नहीं मिल पाई। लेकिन, इसमें कोई शक नहीं कि आजाद भारत के करोड़ों युवा दिलों में यह गीत आज भी उसी अमर राष्ट्र भाव के साथ धड़कता है। बताया जाता है कि इस गीत की धुन ठाकुर रवींद्रनाथ टैगोर ने बनाई थी। आजाद भारत में 24 जनवरी, 1950 को भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिए जाने की घोषणा की थी।

बिहार दरोगा 07 Nov 2025.pdf7.55 MB

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बिहार दरोगा 05 Nov 2025.pdf7.83 MB