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𝗩𝗶𝗸𝗿𝗮𝗺 𝗦𝗶𝗹𝗮𝘆𝗰𝗵

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📈 Análisis del canal de Telegram 𝗩𝗶𝗸𝗿𝗮𝗺 𝗦𝗶𝗹𝗮𝘆𝗰𝗵

El canal 𝗩𝗶𝗸𝗿𝗮𝗺 𝗦𝗶𝗹𝗮𝘆𝗰𝗵 (@vikramsilaych) en el segmento lingüístico de Hindú es un actor destacado. Actualmente la comunidad reúne a 17 112 suscriptores, ocupando la posición 11 729 en la categoría Educación y el puesto 24 533 en la región India.

📊 Métricas de audiencia y dinámica

Desde su creación el невідомо, el proyecto ha mostrado un crecimiento acelerado, reuniendo a 17 112 suscriptores.

Según los últimos datos del 31 julio, 2026, el canal mantiene una actividad estable. En los últimos 30 días la variación de miembros fue de -320, y en las últimas 24 horas de -18, conservando un alto alcance.

  • Estado de verificación: No verificado
  • Tasa de interacción (ER): El promedio de interacción de la audiencia es 77.03%. Durante las primeras 24 horas tras publicar, el contenido suele obtener 29.46% de reacciones respecto al total de suscriptores.
  • Alcance de las publicaciones: Cada publicación recibe en promedio 13 184 visualizaciones. En el primer día suele acumular 5 042 visualizaciones.
  • Reacciones e interacción: La audiencia responde de forma activa: el promedio de reacciones por publicación es 12.
  • Intereses temáticos: El contenido se centra en temas clave como सेना, सिंह, परीक्षा, युद्ध, आयोग.

📝 Descripción y política de contenido

El autor describe el recurso como un espacio para expresar opiniones subjetivas:
All Rajasthan competition exam

Gracias a la alta frecuencia de actualizaciones (últimos datos recibidos el 01 agosto, 2026), el canal mantiene la vigencia y un amplio alcance. La analítica demuestra que la audiencia interactúa activamente con el contenido, lo que lo convierte en un punto de referencia dentro de la categoría Educación.

17 112
Suscriptores
-1824 horas
-927 días
-32030 días
Archivo de publicaciones
" हम पेरिस में आग लगा देंगे" फ्रांसीसी क्रांति के दौरान फ्रांस के शासक लुई सोलहवें और रानी आत्वांनेत ने फ्रांस की क्रांति के बाद भागने कि कोशिश की लेकिन 20 जून 1791 को फ्रांस कि सीमा पर रात्रि को वरेन गांव में किसान जब खेत की रखवाली कर रहा था तो उसने पकड़ लिया और दोनों को वापिस पेरिस लाया गया.... आत्वांनेत ने माहौल देखकर जुलाई 1791 को पडुआ नगर से यूरोपीयन देशों को फ्रांस के राजतंत्र को बचाने कि अपील कि तो आस्ट्रिया - प्रशा ने 27 अगस्त 1791 को पिलनित्ज की घोषणा के तहत फ्रांस के राजतंत्र की रक्षा कि अपील कि लेखक कोई प्रभाव न हुआ तो 25 जुलाई 1792 को आस्ट्रिया और प्रशा के संयुक्त सेनापति ब्रुन्सविक ने घोषणा की कि" अगर राजपरिवार को कुछ भी हुआ तो इसकी जिम्मेदार पेरिस की जनता होगी और हम पेरिस में आग लगा देंगे "... इससे फ्रांस कि जनता में एकता की भावना आई और उसने लाफायते के स्थान पर डुमोरियो को फ्रांस का सेनापति बनाया और 20 सितंबर 1792 को वाल्मी के युद्ध में फ्रांस ने प्रशा कि सेना को हरा दिया और इसी दिन से फ्रांस में गणतंत्र लागू हो गया...

अली रजा हैदर अली का जल सेनापति था इसने मलद्वीप नाम के करीब बारह हजार छोटे बड़े टापू को जीतकर मैसूर राज्य में मिला लिया था किंतु उसके द्वारा तैयार किए गए सभी जलपोंतो को एडवर्ड ह्यूज ने मंगलौर पर आक्रमण कर नष्ट कर दिया अपने सीमित संसाधनों को स्वीकार करते हुए हैदर अली ने कहा था कि" मैं अंग्रेजों की स्थल साधनों को तो समाप्त कर सकता हूं परंतु में समुद्र को नहीं सुखा सकता" इसी प्रकार 21 अक्टूबर 1805 को ट्राफल्गर के युद्ध में नेपोलियन इंग्लैंड से पराजित हुइ और कहा" मैं समुद्र को तो नहीं सुखा सकता, अन्यथा मैं ब्रिटेन को नेस्तनाबूद कर दूं " आगे चलकर नेपोलियन ने आस्टरलिज के युद्ध में 2 दिसंबर 1805 को रूस और आस्ट्रिया कि संयुक्त सेना को पराजित किया और 26 दिसंबर 1805 को आस्ट्रिया के साथ प्रेसबर्ग की सन्धि की ...इस संधि के बाद नेपोलियन ने 16 जर्मन राज्यो को मिलाकर राइन संघ का निर्माण किया तभी लिप्सन महोदय ने कहा है" यह मजाकों में से एक मजाक है कि आधुनिक जर्मनी का निर्माता नेपोलियन है "... (हालांकि आगे चलकर इसी जर्मनी ने फ्रांस को हर बार रौंंदा चाहे वो 1870 का सेडान का युद्ध हो या प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध)... आस्टरलिज युद्ध के बाद इंग्लैंड का प्रधानमंत्री पिट ने कहा" यूरोप का मानचित्र लपेट कर रख दो, अब जब तक ये गुंडा जीवित रहेगा इसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी... और यह कहते ही पिट heart attack से इस दुनिया से अलविदा हो गया...

ये किसी साथी का साक्षात्कार हैं 👆👆😝

मेरा आज इंटरव्यू हुआ यू आर साहू जी का बोर्ड था लगभग पच्चीस मिनट तक चला १)दसवी बारहवी BA MA के बारे में पूछा कब और कहाँ २)नेट के बाद पीएचडी क्यो नहीं की ३)अब क्या कर रहे हो ४)कौनसा टॉपिक तैयार करके आए हो (मैंने भारत छोड़ो आंदोलन पढ़ाया शुरुआत में बोर्ड पर लिखा फिर लिखने से मना किया और समझाने को बोला फिर उसी से सवाल पूछे फिर बैठने को बोला) ५) भक्ति आंदोलन और उसके प्रभाव ६) आहत सिक्कों के बारे में पूछा ७)टक्का और जीतल सिक्को के बारे में ८)प्राचीन भारत के इतिहास के स्रोत ९)आधुनिक भारत इतिहास के स्रोत १०)तराइन का दूसरा युद्ध और उसके बाद भारत के इतिहास में क्या बदलाव ११)लोक देवता या स्थानीय देवता और मुख्य देवता में क्या फर्क है उनके मंदिरों और पूजा पद्धती में फ़र्क़ १२) what is history किसने लिखी १३) कॉलिंगवुड का इतिहास दर्शन के बारे में बताओ १४) ऐसा कौनसा राजा था जिसने तीन महादीपों पर शासन किया लास्ट में पूछा था आपने पिछली केंडिडेंट से इंटरव्यू के सवाल पूछे थे क्या मैंने कहा कि बोर्ड किसका है यह पूछा था लगभग ठीक ही गया लास्ट में चंदबरदाई का दोहा पूछा फिर हिंट दिया फिर पूरा दोहा बताया तब ख़ुश हो गए शाबासी देकर विदा किया

31 दिसंबर 1600 ईस्वी को महारानी एलिजाबेथ द्वारा 15 वर्षों के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी को शाही अधिकार प्रदान किया ( ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 24 सितंबर 1599 ईस्वी को लार्ड मेयर की अध्यक्षता में 217 साझेदारो ने मिलकर की थी) ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रथम गवर्नर टॉमस स्मिथ था जहांगीर के समय 1608 में हैक्टर नामक जहाज कैप्टन हॉकिन्स सूरत पहुंचा। हॉकिंग भारत में सरकारी हैसियत से आने वाला प्रथम अंग्रेज था उसके पास जहांगीर के नाम ब्रिटिश सम्राट जेम्स प्रथम का पत्र था 1609 में जहांगीर और हॉकिंग की मुलाकात हुई लेकिन व्यापारिक अनुमति नहीं मिली...1611 में हेनरी मिडलटन को जब पुर्तगालियों ने सूरत पहुंचने से रोक दिया किंतु दिसंबर 1612 के अंत में कप्तान थॉमस बैस्ट ने सूरत के समीप सुवाली में पुर्तगाली जहाजी बेड़े को पराजित कर दिया...इस युद्ध के बाद पुर्तगालियों की जगह अंग्रेजों को प्रभाव बढ़ता गया और इसके परिणामस्वरूप सर टामस रो को 10 जनवरी 1615 को मैग्जीन दुर्ग (अजमेर) में व्यापारिक अनुमति मिल गई यहां इस तथ्य को उल्लेखित करना प्रासंगिक होगा कि अंग्रेजो ने पहली व्यापारिक कोठी की स्थापना सूरत में जहांगीर की बगैर अनुमति के बगैर 1608 में की थी हालांकि वह कुछ समय बाद बंद कर दी गई... अंग्रेजों ने 1611 में मुसलीपट्टनम में व्यापारिक कोठी की स्थापना की हालांकि यह क्षेत्र मुगलों के नियंत्रण से बाहर था इसके पश्चात टॉमस एल्डवर्थ के नियंत्रण में सूरत में अंग्रेज व्यापारिक कोठी की स्थापना 1613 में हुई जो वैधानिक थी...

रोचक तथ्य अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था लेकिन अशोक के तमाम अभिलेखो, समकालीन साहित्यिक स्रोतों कहीं पर भी इस बौद्ध संगीति को किए जाने का उल्लेख नहीं मिलता है श्रीलंका के ग्रंथ दीप वंश और महावंश में इनका उल्लेख मिलता है बुद्धघोष की सामंतपासादिका में इसका उल्लेख मिलता है जो अशोक के शासनकाल के बहुत समय बाद लिखी गई थी ...

चितौड़गढ़ स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं चित्तौड़गढ़- चित्तौड़गढ़ को राजस्थान का गौरव, शक्ति एवं भक्ति की नगरी के नाम से जाना जाता है चित्तौड़गढ़ दुर्ग -वीरता, त्याग, बलिदान, स्वतंत्रता और स्वाभिमान का प्रतीक चित्तौड़गढ़ का किला स्थापत्य की दृष्टि से अद्वितीय है. दिल्ली से मालवा और गुजरात जाने वाले मार्ग पर अवस्थित होने के कारण मध्यकाल में चित्तौड़गढ़ के किले का सामरिक महत्व रहा है. यही वजह है कि चित्तौड़गढ़ के किले पर अधिकार करने के लिए जितने युद्ध लड़े गए हैं उतने युद्ध संभवत: किसी अन्य के लिए नही लड़े गए हैं. चित्तौड़गढ़ के किले का निर्माण चित्रांगद मौर्य ने करवाया था । 734 ईस्वी में मानमोरी नमक शासक से इस दुर्ग को बप्पा रावल ने विजित कर गुहिल वंश के अधीन कर लिया। चित्तौड़गढ़ दुर्ग में 1303 ईस्वी में ,1534 ईस्वी में तथा 1568 ईस्वी में तीन जौहर सम्पन्न हुए थे विजय स्तंभ - मेवाड़ के महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित विजय स्तंभ चित्तौड़ के किले में अवस्थित है. लोक मान्यता है कि महाराणा कुंभा ने विजय स्तंभ का निर्माण मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में 1440 ईस्वी में करवाया था, जिसकी प्रतिष्ठा 1448 ई. मे हुई थी. विजय स्तंभ नौ खंडों से युक्त है, जिसकी ऊंचाई लगभग 122 फीट है. इसके नौ खंड नव निधियों के प्रतीक है विजय स्तंभ की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें अनेक हिंदू देवी देवताओं की कलात्मक प्रतिमाएं उत्कीर्ण है, जिसके कारण इसे पौराणिक हिंदू मूर्ति कला का अनमोल खजाना कहा जाता है विजय स्तंभ पर भारत सरकार द्वारा 15 अगस्त 1949 ईस्वी को 1 रूपये का डाक टिकट जारी किया गया था बेंगू किसान आंदोलन - बेंगू किसान आंदोलन 1921-25 ईस्वी तक चलाया गया था इस आंदोलन का नेतृत्व रामनारायण चौधरी ने किया था 13 जुलाई 1923 ईस्वी में मि. ट्रेचं के आदेश की गई गोलीबारी से रूपाजी और कृपाजी नामक दो किसान गोविंदपुरा गांव में शहीद हो गए थे।1925 ईस्वी में बेंगू के ठाकुर अनुप सिंह तथा राजस्थान सेवा संघ के मध्य समझौता हो गया जिसको मेवाड़ महाराणा फतहसिंह ने बोल्शेविक समझौते की संज्ञा दी । बाड़ौली मंदिर -बाड़ौली मन्दिर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के रावतभाटा कस्बे के पास स्थित बाड़ौली गाँव में स्थित एक प्रसिद्ध मन्दिर है। बाडोली के शिव मंदिरों का समूह चित्तौड़ जिले में रावतभाटा से 2 किलोमीटर दूर ब्राह्मणी और चंबल नदी के संगम पर स्थित है। 10वीं शताब्दी में निर्मित बाडोली मंदिर गुर्जर प्रतिहार वास्तुकला शैली में निर्मित मंदिर सूचनाओं हैं जिसमें उत्कृष्ट रूप से नक्काशीदार का काम किया गया है शिव/घाटेश्वर मंदिर (निर्माण हुन शासक मिहिरकुल) नागर एवं पंचायतन शैली में मिश्रित रूप है। इसको सर्वप्रथम कर्नल जेम्स टॉड ने 1821 ईस्वी में खोजा था ! भूपाल सागर - द मेवाड़ शुगर मिल्स की स्थापना 1932 में हुई थी यह निजी क्षेत्र में स्थापित राजस्थान का एकमात्र चीनी का कारखाना है कपासन - नारियल की खोल की चूड़ियों के लिए प्रसिद्ध हैं हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड का दूसरा जिंक स्मेल्टर प्लांट कपासन में स्थित है आकोला - यह रंगाई छपाई हेतु प्रसिद्ध है यहां की डाबू प्रिंट प्रसिद्ध है मण्डपिया - यहां सांवलिया जी का मंदिर है भैंसरोड़गढ़ - भैसरोडगढ़ दुर्ग चंबल और बामणी नदियों के संगम पर चित्तौड़गढ़ जिले में है इस दुर्ग को राजस्थान का वेल्लोर भी कहा जाता है कर्नल जेम्स टॉड ने इस दुर्ग के बारे में कहा था "यदि उन्हें राजस्थान में किसी जागीर की पेशकश की जाए तो वह इस किले को चुनेंगे " मातृकूण्डिया- चित्तौड़गढ़ जिले के इस स्थल को राजस्थान का हरिद्वार कहा जाता है मोतीलाल तेजावत ने एकी आंदोलन की शुरुआत यहीं से की थी जैन कीर्ति स्तंभ- जीजाशाह बघेरवाल द्वारा इसका निर्माण करवाया गया था यह प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है जैन कीर्ति स्तंभ सात मंजिला इमारत है बस्सी - यह काष्ठ कला के लिए प्रसिद्ध है चंदेरिया - यहां सुपर जिंक स्मेलटर का कारखाना है संत रैदास की छतरी- चित्तौड़गढ़ दुर्ग में मीरा मंदिर के पास मीराबाई के गुरु संत रैदास की छतरी स्थित है संत रैदास की छतरी- चित्तौड़गढ़ दुर्ग में मीरा मंदिर के पास मीराबाई के गुरु संत रैदास की छतरी स्थित है

आज ही के दिन 5 मई 1821 को नेपोलियन इस दुनिया से अलविदा हुआ था नेपोलियन बोनापार्ट का जन्म 15 अगस्त 1769 को कोर्सिका के अजासियो नामक ग्राम में हुआ था इन्होंने डायरेक्टरी की प्रेमिका जोसेफाइन बोआरने के माध्यम से डायरेक्टरी तक अपनी पहुंच बढाई ... फिर 2 दिसंबर 1804 को नेत्रदोमे चर्च में अपना राज्याभिषेक करने में सफल रहा...21 अक्टूबर 1805 में ट्राफल्गर के युद्ध में इंग्लैंड की नौसेना से पराजित हुआ लेकिन 21 दिसंबर 1805 को नेपोलियन ने आस्ट्रिया तथा रूस की सेना को पराजित किया और आस्ट्रिया के साथ प्रेसबर्ग की संधि की... जो नेपोलियन फ्रीडलैण्ड युद्ध के समय समस्त यूरोप का मालिक बन गया था और टिलसिट की संधि जो नेपोलियन ने 1807 में रूस के साथ की थी उस समय इन्होंने जार अलैक्जेंडर से कहा कि युरोप क्या है... तुम और मैं ही तो यूरोप है...लेकिन बढ़ते अंहवाद तथा भाई भतीजावाद ने उसे अंधा कर दिया और इसी क्रम में इन्होंने स्पेन में अपने भाई जोसेफ बोनापार्ट को शासक बनाया जो उसके लिए फोड़ा साबित हुआ इसके बाद 1812 में पहले मास्को अभियान में 6 लाख सैनिको में से 5,20,000 सैनिक खोए... लिपजिग के युद्ध जिसे राष्ट्रो का युद्ध भी कहा जाता है उसमें पराजित हुआ और फाउंटेन ब्ल्यू संधि के तहत एल्बा भेज दिया जाता है लेकिन 20 मार्च को पेरिस की और नेपोलियन वापस रूख करता है और सौ दिन का शासन करता है लेकिन 18 जून 1815 ईस्वी बेल्जियम में लड़ा गया वाटरलू के युद्ध में अपने पतन की पटकथा लिख दी वाटरलू युद्ध फ़्राँसीसी सेना, जिसका नेतृत्व नेपोलियन ने किया और अंग्रेज़ सेना, जिसका नेतृत्व ड्यूक ऑफ़ वेलिग्टन ने किया, के मध्य हुआ था। युद्ध के परिणामस्वरूप ड्यूक ऑफ़ वेलिग्टन की जीत हुई और नेपोलियन की बुरी तरह पराजय। नेपोलियन बोनापार्ट को बंदी बनाकर सेंट हैलीना द्वीप पर भेज दिया गया, जहाँ 1821 में उसकी मृत्यु हो गयी...

साथी तख्तसिंह जी को पुछे गए प्रश्न

पड़ोसी जिले चूरू को स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं चूरू - उत्तरी पूर्वी राजस्थान में 'गेटवे आफ थार' के नाम से प्रसिद्ध चूरू जिला की स्थापना 1620 ई के लगभग चुहडा़ नामक जाट ने की थी बीकानेर के शासक सूरत सिंह ने जब ठाकुर शिव सिंह के समय चूरू पर आक्रमण किया था तब आजादी एवं अस्मिता की रक्षा के लिए गोला बारूद खत्म होने पर चूरू के किले से चांदी के गोले दागे थे धर्म स्तूप - चुरू जिले के मध्य में स्थित धर्मस्तूप पर 26 जनवरी 1930 को चन्दनमल बहड़ ने यहां पर भारतीय स्वतंत्रता का झंडा फहराया था गोगा जी महाराज का मंदिर -गोगाजी के जन्म स्थान दत्तखेड़ा (ददरेवा) पर भी उनके घोड़े का अस्तबल है और सैकड़ों सालों बाद भी उनकी घोड़े की रकाब वहीं मौजूद है. यहां गुरु गोरक्षनाथ का आश्रम भी है और गोगाजी की घोड़े पर सवार मूर्ति भी है. गोगाजी को जाहरवीर गोगाजी, गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिर वीर, जाहर पीर, और गोगा पीर के नाम से भी जाना जाता है. उनका जन्म लगभग 900 ईस्वी में रानी बच्छल और राजा ज़ेवर के घर हुआ था। गोगाजी का मेला, राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले के गोगामेड़ी गांव में भाद्रपद कृष्ण नवमी को आयोजित किया जाता है। ताल छापर अभ्यारण- यह अभयारण्य चुरू जिले में काले हिरणों के लिए प्रसिद्ध है यह अभयारण्य काले हिरणों के साथ-साथ कुरजा पक्षी के लिए भी प्रसिद्ध है यहां क्षारिय भूमि में पैदा होने वाली लाना झाड़ी पाई जाती है द्रोणपुर - ऐसा माना जाता है कि इस स्थान का निर्माण पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य ने करवाया था वर्तमान में यह गोपालपुरा के नाम से जाना जाता है संवत्सर कोटसर - यह क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा आखेट निषिद्ध क्षेत्र है सालासर बालाजी मंदिर- यहां हनुमान जी की दाढ़ी मूछ युक्त मूर्ति स्थापित है यह प्रतिवर्ष चित्र पूर्णिमा तथा आश्विन पूर्णिमा को विशाल मेला लगता है राज्य का प्रथम महिला सहकारी मिनी बैंक सालासर में ही स्थित है साहवा गुरूद्वारा - यहां राज्य में सिक्खों का सबसे बड़ा मेला कार्तिक पूर्णिमा को लगता है मालजी का कमरा - 1920 में सेठ मालचंद के द्वारा फ्रांस की स्थापत्य शैली में इसका निर्माण करवाया था यह चूरू में प्रसिद्ध पर्यटक स्थल भी है दूधवा खारा किसान आंदोलन - चूरू में 1945 ईस्वी में ठाकुर सूरजमल के द्वारा अत्यधिक कर लगाया गया जिसके कारण हनुमान सिंह तथा मघाराम वैध के नेतृत्व में यहां पर किसान आंदोलन हुआ था सर्वहितकारिणी सभा- इसकी स्थापना 1907 में चूरू में कन्हैया लाल ढूंढ, स्वामी गोपाल दास तथा पंडित श्री राम ने की थी स्वामी गोपाल दास ने चूरू में कबीर पाठशाला नामक संस्था का गठन भी किया था

स्कूल व्याख्याता इतिहास भर्ती परीक्षा में वर्ष 2013 से 2025 तक महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन टॉपिक से पूछे गए सभी प्रश्न https://youtu.be/Xu-TZ298tGA?si=JLnFuJxor6STL6B

नाथ पब्लिकेशन स्कूल व्याख्याता करेंट अफेयर्स PART 02 DEMO pdf

उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त में फ़ख़्र ए अफ़ग़ान खान अब्दुल गफ्फार खां द्वारा, सविनय अवज्ञा आंदोलन के समर्थन में लाल कुर्ती आंदोलन ( ख़ुदाई खिदमतगार) चलाया जा रहा था इस आंदोलन के नायक के रूप में उभरे गढ़वाल रेजिमेंट के हवलदार चन्द्र सिंह भंडारी( गढ़वाली), इन्होंने पेशावर के किसाख़्वानी बाजार में , ख़ुदाई खिदमतगारों( ख़ुदा के सेवक) पर गोली चलाने से इंकार कर दिया था दरअसल अंग्रेज हिन्दू मुस्लिम के मध्य कटुता उतपन्न करने के उद्देश्य से, मुस्लिम क्रांतिकारियों पर, हिंदुओं से गोली चलवाते थे, और हिंदुओं पर मुसलमानों से गोली चलवाते थे.. चन्द्र सिंह गढ़वाल इस साज़िश को भांप गए थे और अंग्रेज कप्तान रिकेल के आदेश "गढ़वाली तीन राउंड फायर" के बावजूद भी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने जोर से कहा "गढ़वाली सीज फायर" यह शब्द सुनते ही सभी गढ़वाली सैनिकों ने अपनी राइफलें जमीन पर रख दीं। अंग्रेज अफसर ने जब चंद्र सिंह से इस बारे में पूछा तो गढ़वाली ने उनसे कहा कि यह सारे लोग निहत्थे हैं। निहत्थों पर हम गोली कैसे चलाएं। इस घटना ने न सिर्फ देश में सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश पूरे देश में दिया था, बल्कि गढ़वाली सैनिकों का पूरे देश में एक अलग ही सम्मान बढ़ गया था। यह आज्ञा न मानने के कारण इन पर मुक़दमा हुआ, इनकी तरफ से पैरवी मुकुन्दीलाल द्वारा की गई। चन्द्रवीर सिंह की सम्पूर्ण सम्पति ज़ब्त कर ली, वर्दी छीन ली गयी और आजीवन कारावास की सज़ा दे दी गयी। बाद में सज़ा कम करके, 1941 में रिहा कर दिया, मग़र पख्तून प्रान्त में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया, तो ये गांधीजी के पास चले गए भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भाग लिया, फिर कारावास में डाल दिया गया,1945 में रिहा कर दिए गए फिर चुनाव भी लड़े और अंततः 1979 में बीमारी से देहांत हो गया...

1938 में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेसी सदस्यों को अखिल भारतीय किसान सभा की सभा में शामिल होने पर रोक लगा दी तथा गांधी जी ने कहा कि इस समय हमें किसानों से ज्यादा जमींदारों की आवश्यकता है...

प्राचीन समय में महिलाओं की स्थिति प्रारंभ में महात्मा बुद्ध महिलाओं को बौद्ध संघ में शामिल नहीं करना चाहते थे लेकिन जैसा की चुल्लवग जातक में उल्लेख मिलता है उसके अनुसार सुद्धोधन की मृत्यु के पश्चात प्रजापति गौतमी जब अकेली रह गई तब इन्होंने वैशाली में बोद्ध संघ में महिलाओं को अनुमति प्रदान कर दी ... लेकिन साथी ही यह नियम बनाया की भिक्षुणी को सदा भिक्षु की अपेक्षा हीन माना जाएगा चाहे वह कितनी भी पुरानी क्यों ना हो ... इसी प्रकार जैन धर्म में जैन भिक्षुणी को अपने से कनिष्क जैन भिक्षु के आने पर खड़ा होकर स्वागत करना पड़ता था ( जैसा कि पिछले असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा में यह प्रश्न पूछा भी गया था ) इसी प्रकार शाक्य कुल तो कन्या की शादी अपने दूसरे कुल में भी नहीं करते थे जैसे प्रसेनजीत ने कपिलवस्तु के शाक्यो की कन्या से शादी करने की कोशिश की लेकिन शाक्यो ने वासखजतिया नामक दासी के साथ उनकी शादी करवा दी... इसी प्रकार महावीर की पुत्री प्रियदर्शना का विवाह भी महावीर की बहन के पुत्र जमाली के साथ हुआ था जो महावीर स्वामी का प्रथम शिष्य था तथा जैन धर्म का प्रथम संघ विच्छेदक भी था...

सत्य , सत्ता की नहीं वरन! समय की पुत्री है : फ्रांसिस बैकन ब्रिटिश राजपरिवार का करीबी और लॉर्ड चांसलर बेकन ने जीवन के अंतिम पड़ाव में पतन के दिन देखे....उस पर घूसखोरी और पद के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया....उसने आरोप स्वीकार करते हुए यह दलील दी कि उपहारों ने उसके निर्णयों को कभी प्रभावित नहीं किया....बेकन अपने पद से हटा दिया गया जीवन के शेष दिन उसने संन्यास में बिताए...