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🔵 आज 29 सितंबर को पूज्य गुरुजी के स्मृति दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। उनके द्वारा भारत लौटाई गई विपश्यना की अनमोल विद्या का अभ्यास करना ही उनके प्रति हमारी सबसे सच्ची श्रद्धांजलि है।
| 2 | विपश्यना साधना द्वारा भोक्ताभाव से ही नहीं, कर्ताभाव से भी मुक्ति पानी चाहिए। केवल साक्षीभाव से देखना है। याने जो हो रहा है उसे तटस्थभाव से जानना है। केवल जानने में और कुछ करने में बहुत बड़ा अंतर है। केवल जानने में बोझ नहीं लग सकता। कुछ करने में बोझ भले लगे।
नैसर्गिक भाव से जो घटना घट रही है, उसके प्रति द्रष्टाभाव, ज्ञाताभाव रखना कर्त्तापन नहीं है। अभ्यास की परिपक्वता में एक समय ऐसा भी आयगा ही जबकि 'अहं' की सूक्ष्म भ्रांति भी नष्ट होगी। अनात्मभाव पूरी तरह पुष्ट होगा तो द्रष्टापन भी विलीन हो जायगा। 'केवल दर्शन' और 'केवल ज्ञान' ही रह जायगा जिससे कैवल्य प्राप्त होगा, मुक्त अवस्था प्राप्त होगी।
- अलवर के एक साधक के गुरुजी से प्रश्नोत्तर
विपश्यनाः लोकमत (भाग-२)
विपश्यना विशोधन विन्यास ।।
भवतु सब्ब मगंलं !!
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🌷 चार महत्वपूर्ण साधनापयोगी प्रश्नोत्तर 🌷
🍂विषय: 1.वासना, 2.गर्मी, 3.झटके (Jurks), 4.ध्यान 🍂
🙏केवल पुराने विपश्यी साधकों के लिये🙏
प्रश्न-1:- विपश्यना ध्यान से ऐसा लगता है कि मन चिंताओं, संकल्प-विकल्पों से मुक्त रहता है जिससे अत्यधिक मात्रा में शक्ति एकत्र होती है जो वासना का कारण बनती है। विपश्यना से जहां (अन्य) दुर्गुणों का नाश होता है वहां कहीं मन वासना से चंचल तो नहीं होता? उसे नियमित करने हेतु स्वाध्याय का सहारा लेना पड़ता है।
स. ना. गोयन्का :- विपश्यना साधना द्वारा मन में वासना नहीं बढ़ सकती। विपश्यना विधिवत की जाय तो मन के भीतर संग्रहीत सभी विकारों का क्षय हो जाता है। वासना के विकारों का भी क्षय होता ही है। जिस समय चित्त शांत होने लगता है, चिंताओं और संकल्प-विकल्पों से मुक्त होने लगता है तब बिना ही प्रयत्न किये हुए नैसर्गिक तौर पर अर्धचेतन और अचेतन मन का ऑपरेशन होना शुरू हो जाता है।
अंतर्मन की गहराइयों में जो भी सुषुप्त विकार हैं वे उदीर्ण होने लगते हैं और चेतन चित्त पर प्रकट होने लगते हैं। यदि अंतर्मन में वासना के विकार दबे हुए हैं तो उनका उभार आना स्वाभाविक ही है और कल्याणकारी भी है। उस समय इन उभरे हुए विकारों को साक्षीभाव से देखना शुरू कर दें। स्वाध्याय और चिंतन-मनन का अपना महत्त्व है। उनके द्वारा बुद्धि के स्तर पर और चेतन चित्त के स्तर पर कुछ लाभ अवश्य होता है। पर जैसे विपश्यना में होता है, वैसे विकारों का उपशमन नहीं होता, उनकी निर्जरा नहीं होती, वह जड़ से नहीं उखड़ते। बल्कि फिर अंतर्मन की गहराइयों में दबा दिये जाते हैं।
इसलिए विपश्यना करते हुए चित्त शांत होने पर जब कभी गहरा ऑपरेशन हो जाय और अंतर्मन की तलस्पर्शी गहराइयों से कोई विकार उभरकर बाहर आये तो एक ओर इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि मेरे ही किसी पूर्व-संचित विकार की गंदगी उभरकर बाहर आयी है और दूसरी ओर शरीर पर होनेवाली तत्कालीन संवेदनाओं को साक्षीभाव से देखना शुरू कर देना चाहिए।
वैसे तो जो भी विकार जागेगा उसका संबंध सारे शरीर पर सहजभाव से होनेवाली संवेदनाओं से हो जायगा, परंतु यदि वासना का विकार जागा है तो अच्छा हो कि उस समय कुछ देर तक अपनी जांघों पर होनेवाली संवेदनाओं को तटस्थभाव से देखते रहें। और थोड़ी-थोड़ी देर के बाद मन को पगथलियों की ओर ले जायं। समता बनी रहे। इस प्रकार वासना के विकार की परतें उतरती चली जायेंगी और समय पाकर इस विकार से पूर्णतया मुक्ति मिल जायगी।
प्रश्न- 2:- विपश्यना से शायद गर्मी उत्पन्न होती है। उस गर्मी से मलद्वार से रक्त जाने लगता है। अधिक बार ध्यान करने से ऐसा महसूस होता है। हो सकता है इसमें विपश्यना का दोष न होकर अधिक बैठने से या अन्य शारीरिक कारणों से भी ऐसा होता है।
उत्तर:- विपश्यना करते हुए शरीर में किसी भी प्रकार की संवेदना उत्पन्न हो सकती है। विपश्यना की गहराइयों में जाने पर अधिकतर जो भी संवेदनाएं उत्पन्न होती हैं, उनका हमारे पूर्व-संचित विकारों से गहरा संबंध होता है। ईर्ष्या, द्वेष जैसे पूर्व-संचित विकारों की उदीरणा से गर्मी की संवेदना उत्पन्न होती है, यह स्वाभाविक है।
परंतु इससे किसी की हानि नहीं हो सकती। उसे समताभरे चित्त से देखते रहे । विकारों के साथ-साथ इस गर्मी का उपशमन होगा ही। मलद्वार से रक्त निकलता हो तो मन में समताभाव रखते हुए इस शारीरिक रोग की चिकित्सा किसी योग्य चिकित्सक से करानी चाहिए।
प्रश्न-3:- विपश्यना में थोड़ी-थोड़ी देर बाद झटके-से लगने लगे हैं। झटके लगते वक्त ऐसा लगता है कि जैसे एकदम सोते से जागा होऊ। परंतु सोया भी तो नहीं था। यह तभी होता है जब मानसिक विचार अधिक मात्रा में शांत होने लगते हैं।
उत्तर:- विपश्यना के अभ्यास द्वारा जैसे-जैसे चेतन चित्त के विकारों का क्षय होने लगता है वैसे-वैसे विचार कम होने लगते हैं और मन अपनी ही गहराइयों में पैठने लगता है। यही अंतर्मन की गहराइयों का ऑपरेशन है जिसकी वजह से कोई दबा हुआ विकार छेड़ दिया जाता है और उसकी उदीरणा होती है जो कभी झटके के रूप में भी प्रकट होती है। उससे घबराना नहीं चाहिए बल्कि उसके प्रति अनित्यबोध कायम रखते हुए उसे समता से देखना चाहिए।
प्रश्न-4:- विपश्यना ध्यान में भी संवेदनाओं देखने का कार्य करना पड़ता है। जहां कुछ करना पड़े ध्यान की वह स्थिति नहीं होती। ध्यान तो व्यक्ति का सहज स्वभाव है। विचारहीन होना ही तो ध्यान है। फिर करना तो बोझा-सा लगता है।
उत्तर:- विपश्यी साधक शनैःशनैः अभ्यास द्वारा भोक्ताभाव की पुरानी आदत से मुक्त होता है और इसी प्रकार कर्त्ताभाव से भी। वह यह तथ्य अपनी अनुभूतियों से जानने लगता है कि शरीर की सीमाओं के भीतर जो भी घटना घट रही है, उस पर उसका कोई अधिकार नहीं है। अतः उसके प्रति कर्ताभाव रखना अपने अहंभाव का पोषण करना है जो कि विपश्यना के विरुद्ध है। | 832 |
| 4 | किरण बेदी - विपश्यना के बारे में बातचीत (हिंदी) @ Ladakh | 793 |
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🌹गुरूजी--
सदगृहस्थ की चार अभिलाषाएं--
1- वह चाहता है कि विपन्न न रहे। विपन्नता, गरीबी गृहस्थ के लिये अभिशाप है।भुखमरी में धर्म का पालन तो दूर उसका चिंतन भी कठिन हो जाता है।
समझदार गृहस्थ होता है तो यह भी समझता है कि धन सम्पदा उसके अपने श्रम से अर्जित हो, धर्मपूर्वक अर्जित हो। बिना परिश्रम के जो धन आता है वह उपयोगी नही होता, संतोषकरक नही होता।उसका अपव्यय ही होता है।
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2-दूसरी अभिलाषा है वह समाज में, गुरुजनो में यश प्राप्त करे। उसके द्वारा शरीर या वाणी से छोटा या बड़ा, कोई भी ऐसा काम न हो जाय जो उसके अपयश का कारण बने।
🌷
3- तीसरी अभिलाषा है कि वह चिरकाल तक स्वस्थ जीवन जिए।सदगृहस्थ बखूबी समझता है कि मनुष्य जीवन बड़ा अनमोल है। इसी जीवन में अंतर्मुखी होकर सत्यदर्शन करते करते परम सत्य का साक्षत्कार किया जा सकता है।
🌸
4-चौथी अभिलाषा होती है की शरीर छूटने पर उसकी दुर्गति न हो, वह स्वर्गगामी हो।वह बखूबी समझता है कि मरने के बाद यदि अधोगति प्राप्त हुई तो उसका बाहर निकलना अत्यंत कठिन हो जाएगा।उधर्वलोकगामि होगा तो जो धर्म साधना यहाँ सीखी है उसका अभ्यास कायम रख सकेगा।धर्म पथ पर अग्रसर होता चला जाएगा।परम विमुक्त अवस्था के समीप होता जाएगा।
�गुरूजी--
दान देते हुए जब हम स्वहित के लिये किसी फल की कामना करते हैं तो वह रागरंजित चित्त भवचक्र बनाने वाला होता है।
दान के फलस्वरूप लौकिक सुख-वैभव की कामना करें, मान-सम्मान की कामना करें, लाभ-सत्कार की कामना करें, स्वर्ग-अपवर्ग की कामना करें, तो इन कामनाओ से अभिभूत हुआ चित्त बंधनयुक्त ही होता है, बंधनमुक्त नही।
इस दान का फल बांधनेवाले ही होता है, खोलनेवाला नही।
🍁अतः रागरंजित चित्त से दान देना बुरा है।परंतु उससे भी बुरा है द्वेष-दूषित चित्त से दान देना। वह तो हमारे लिये और भी अनर्थ का कारण बन जाता है।उदाहरण के लिये-
1-एक भिखारी बार बार दरवाज़े पर पुकार रहा है और मै झल्ला कर पैसा देता हूँ तो उस समय मेरा चित्त क्रोध और घृणा से भरा होता है।
2-कोई चंदा मांगने आया और मेरा मन रूपये देते हुए आक्रोश से भरा है।अप्रिय चंदेवालो से शीघ्र छुटकारा पाने के लिये व्याकुल है।
3-मेरे किसी प्रतिद्वंदी ने किसी क्षेत्र में इतना दान दिया है जिससे उसकी कीर्ति बढ़ी है।इससे मेरे मन में ईर्ष्या उतपन्न हुई। उसे नीचा दिखाने के लिये अहंकार से चूर होकर उससे अधिक दान देता हूँ।
4-मेरे अन्य भाईयो ने किसी काम में दान दिया है। मुझे उसमे दान देने की जरा भी इच्छा नही है। परंतु नही दूंगा तो प्रतिषठा को धक्का लगेगा। लोक निंदा होगी। इस भय से दान देता हूँ।
🌷इस प्रकार झुंझलाहट, घृणा, भय, संकोच, ईर्ष्या, अभिमान आदि दौर्मनस्य पूर्ण चेतना से दिया डाँन केवल हितकारी ही नही होता, बल्कि अमंगल अहित का भी कारण बनता है।
🌻धर्म-चेतना से किये गए सभी कर्म मंगलकारी हैं, अधर्म चेतना से किये गए सभी कर्म अमंगलकारी हैं।
धर्मचेतना से दिये गए दान से चित्त त्याग भाव से भरा होता है। परहित परसुख के मोदभाव से भरा होता है।त्रिकालिक प्रसन्नता से भरा होता है।
🌺दान देने के पूर्व मन में ऐसे ही मोदकारी भाव जागते रहते हैं कि मै दान दूंगा! मेरे दान से कितनो का भला होगा! दान देते हुए भी मन इन मुदित भावो से ओतप्रोत रहता है कि मै दान दे रहा हूँ! गृहस्थ धर्म का पालन कर रहा हूँ! मेरे इस दान से ग्रहिता का यह हितसुख होगा! अन्य अनेको का भी यह हितसुख होगा।
दान देने के पश्चात भी मेरा मन बार बार इन शुभ भावो से उर्मिल होता रहता है।
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| 6 | धम्म दान महत्व WhatsApp group
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| 7 | 🎥 A Teenager Shares Their Vipassana Meditation Experience....
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🌹गुरूजी, संवेदनाएं तो महसुस हो रही हैं पर साथ साथ विचार भी चलते हैं?
उत्तर--उनको रोकने का प्रयास मत करो।सिर्फ सांस और संवेदना की जानकारी बनाये रखो।
मन में विचार आते हैं तो आने दो। जब तक तुम्हे सांस या संवेदना की जानकारी है तब तक मन में आने वाले सभी विचार तुम्हारा कुछ नही बिगाड़ सकते।
यदि तुम भूल जाते हो तो हर विचार तुम्हे बहा कर ले जाएगा, संवर्धित (intensify) होता जाएगा और अन्ततः(finally) अंतर्मन में बैठ जाएगा।
यदि तुम सांस या संवेदना के साथ हो तो सब विचार स्वतः ही समाप्त हो जाएंगे।
🌷अतः विचारो का दमन मत करो। उन्हें आने दो, पर सांस या संवेदना की जानकारी बनाये रखो।
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🌷टेन्शन ( तनाव )🌷
टेन्शन इस लिए होता है कि विचार अच्छे नहीं लगते ।
देखो, विचार आ रहे है , अभी भी विचार आ रहे है, अभी भी विचार आ रहे हैं -तो टेन्शन पैदा कर लिया ।
तो विचारों से देष पैदा कर लिया । देष -वेष कुछ नहीं करना । यह सच्चाई है, इस क्षण की यहीं सच्चाई है कि विचार आ रहे हैं । आ भाई ! और संवेदना भी हो रही है, हम महत्व संवेदनाओं को दिये जा रहे हैं ।
विचार चल रहा है तो हमारा क्या बिगाड रहा है -टेन्शन निकल जायेगा । दूर करना चाहोगे तो टेन्शन होगा । दूर करने की कोशिश मत करो, अपने आप दूर हो जाएगा ।
http://www.vridhamma.org/
https://www.dhamma.org/en/courses/search
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🌷प्रश्न- मैं पिछले कुछ समय से केवल आनापान कर रहा हूँ । जब तक आनापान में पूरी एकाग्रता न जा जाय तब तक विपश्यना करना बेकार है । कया यह सही है ?
उत्तर- पूरी एकाग्रता नहीं आई लेकिन फिर भी संवेदना मिलने लगी तो संवेदना के साथ एकाग्रता आ जायगी । सांस को भी जानेंगे, संवेदना को भी जानेंगे और यूं जानते-जानते एकाग्रता अपने आप आने लगेगी। मन एकदम एकाग्र हो जाय, उसके बाद विपश्यना करोगे तो बहुत समय लगेगा। इसलिए विपश्यना को छोडो मत संवेदना नहीं मिल रही हो तब आनापान करना ही चाहिए। तब विपश्यना नहीं कर पाओगे ।
🌷प्रश्न- आनापान करते समय हमें यह कैसे पता चले कि हमारी समाधि मजबूत हो गई है और अब विपश्यना शुरू कर देनी चाहिए ?
उत्तर- जैसे ही मन का कोलाहल कम पड़ जाय और जैसे ही यहाँ (ऊपर वाले होंठे के ऊपर, नाशिका के नीचे) संवेदना मिलनी शुरु हो जाय... । अगर यहीं संवेदना नहीं मिली तो अभी रुको । और यहीं संवेदना मिलने लगी तो फिर सारे शरीर की विपश्यना शुरु कर सकतें हो, चिन्ता की बात नहीं है।
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सरल बनो
कुटिलता कठोरता है, सरलता मृदुता है। कुटिलता अभिमानता है, सरलता निरभिमानता है। कुटिलता ग्रंथि-बंधन है, सरलता ग्रंथि-विमोचन है।
ग्रंथि-बंधन सचमुच बड़ा दुःखदायी है। सच्चा सुख तो ग्रंथि-विमोचन में ही है, विमुक्ति में ही है। जब-जब सरलता खो कर कुटिलता अपनाते हैं, तब-तब अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। भीतर ही भीतर तनाव खिंचाव शुरू हो जाता है। अनजाने में अपने लिए गांठें बांधने लगते हैं। अंतर्मन गांठ-गठीला हो उठता है। उसके साथ-साथ सारा शरीर भी भीतर- ही-भीतर तनाव-खिंचाव से गांठ-गठीला हो उठता है।
मूंज की रस्सी की तरह बल खा-खाकर अकड़ जाता है। अकड़ जाता है तो हम बेचैन ही रहते हैं, अशांत ही रहते हैं, व्याकुल ही रहते हैं। हमारी यह आंतरिक व्याकुलता चिड़चिड़ाहट के रूप में, झुंझलाहट के रूप में बाहर प्रकट होती रहती है और इस प्रकार हम अपनी बेचैनी औरों पर भी बरसाते रहते हैं।
सरलता ही मन की विशुद्धि है। कुटिलता मलीनता है। मलीनता अनर्थकारिणी है। विशुद्धता स्वार्थ-साधिनी है। कुटिलता सर्वहित-नाशिनी है। सरलता सर्वहित-कारिणी है। अतः न केवल अपने हित-सुख साधन के लिए बल्कि सब के हित-सुख साधन के लिए सरलता अपनाएं, कुटिलता त्यागें ।
जागरूकता का अभ्यास करते हुए मन का संवर करेंगे तो दुःख-संवर्धन करने वाली इस अज्ञानजन्य प्रमत्त अवस्था से शनैः शनैः छुटकारा पाते जायेंगे। सभी क्लेशों के, आस्रवों के, कषायों के, कर्म-कलुषता के बंधनों से मुक्त होते जायेंगे। दुःखों से छुटकारा पाते जायेंगे।
दुःख-बंधन और दुःख-निरोध का यह नैसर्गिक नियम सब पर लागू होता है। चाहे कोई अपने आप को बौद्ध कहे या जैन या अन्य कुछ। इस नामकरण के भेद से कुछ अंतर नहीं पड़ता। मन जब सहज-सरल रहता है तो मृदु-मधुर रहता है, सौम्य-स्वच्छ रहता है, शीतल-शांत रहता है। शरीर भी हल्का-फुल्का रहता है। पुलक-रोमांच से भरा रहता है। परिणामतः हम प्रीति-प्रमोद से, सुख-सौहार्द से भर उठते हैं।
हमारी यह आंतरिक प्रीति, यह आंतरिक शांति, मैत्री और करुणा के रूप में बाहर प्रकट होती है और इस प्रकार हम अपनी सुख-शांति औरों को भी बांटते हैं। अपने आस-पास के सारे वायुमंडल को प्रसन्नता से भरे रखते हैं।
अतः साधको! आओ, प्रकृति के इस अटूट नियम को समझते हुए विपश्यना द्वारा मन का संवर करें। सचमुच बड़ा मंगलदायी है मन का संवर। मन का संवर करके उसे सरल बनाएं। आत्महित के लिए, परहित के लिए, सर्वहित के लिए।
आओ, कुटिलता त्यागें! आओ, सरलता अपनाएं!
कुटिलता में महाअमंगल समाया हुआ है। सरलता में महामंगल समाया हुआ है।
🙏🌷🙏
पुस्तक: विपश्यना पत्रिका संग्रह (भाग-9)
प्रकाशक : विपश्यना विशोधन विन्यास ॥
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*🌷"विपश्यना साधना विधि के दो पक्ष"🌷*
*(Awareness and Equanimity)*
अभ्यास में दो प्रमुख काम हैं।
शरीर और मन में वस्तुतः जो हो रहा है उसे जान रहे हैं, यह पहला काम हुआ।
दूसरा इससे बड़ा काम है समता का।
पहला सजगता यानि चित्त की ऐसी एकाग्रता की वह गहराई तक सच्चाई को जान ले, व् दूसरा समता, यानि यह जानकर जरा भी विचलित न हो !
🍁हर अवस्था में से मन गुजर रहा है। अलग अलग अनुभूतिओं में से मन गुजर रहा है और उन अवस्थाओं को, उन अनुभूतिओं को दृष्टा भाव से देख रहा है। ज्ञाताभाव से जान रहा है।
🌻उन परिस्थितियों को, उन अनुभूतिओं को न तो अच्छा मानकर खुशिओं से नाचने लगता है, न बुरा मानकर व्याकुल होने लगता है। अपना संतुलन कायम रखता है।समता बनाये रखता है। यह समझते हुए की जो अनुभूति हो रही है वह स्थाई नही है, स्थिर नही है, शाश्वत नही है।जो सुबह हो रहा था वह शाम को नही है।
🌺इतना ही नही सूक्ष्म स्तर पर देखता है कि प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। तन मन में कहीं कुछ ऐसा नही है जो स्थिर है, अचल है। जरा सा प्रकम्पन भी है तो इस बात का द्योतक है की उसमे कोई परिवर्तन हो रहा है। कहीं स्थायित्व नही है। सारा ऐंद्रिय जगत अनित्य है, नश्वर है, भंगुर है।
कभी कभी साधक को एक भ्रान्ति हो जाती है की जो संवेदना मिलती है उसका मूल्याङ्कन करने लगता है व उसी को प्रगति का मापदंड मान लेता है.
एक प्रकार की संवेदना मिलती है तो मान बैठता है की साधना बहुत ऊंची है. अन्य प्रकार की संवेदना मिलती है तो मान बैठता है कि साधना बहुत नीची है. गलत मापदंड हो गया.
🌷 साधना का सही मापदंड तो यह है की जो संवेदना प्रकट हो रही है उसे जान रहे है और जानकर कितनी समता में है.
प्रगति का मापदंड यह है की आप समता का विकास कर रहें हैं की नहीं।
समता को छोड़कर कोई विकल्प (choice) नहीं है। क्योंकि आप न तो संवेदनाओ को बदल सकते हैं, और न ही उनका निर्माण कर सकते हैं।जो कुछ भी होता है, अपने आप होता है।
यह सुखद या दुखद, ऐसा या वैसा हो सकता है, परंतु यदि आप अपनी समता बनाये रखते हैं, तो निश्चित रूप से मार्ग पर प्रगति कर रहें हैं। आप प्रतिक्रिया की अपनी पुरानी आदत को दुर्बल बना रहें हैं।
http://www.vridhamma.org/
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मनुष्य भूमि (Manussaloka) — त्रिपिटक के अनुसार
🌺 मनुष्य भूमि क्या है?
मनुष्य भूमि अस्तित्व की 31 भूमियों (31 भव/लोक) में से एक है और इसे निब्बान की सर्वोत्तम साधना-भूमि माना गया है। यहाँ सुख और दुःख दोनों का संतुलन होने के कारण धम्म को समझना, अभ्यास करना और निर्वाण प्राप्त करना संभव होता है।
🌺31 अस्तित्व भूमियों में स्थान
31 लोकों की व्यवस्था में मनुष्य भूमि कामावचर लोक के अंतर्गत आती है।
कामावचर की 11 भूमियाँ:
4 अपाय (निरय, तिरछान, पेता, असुर)
1 मनुष्य भूमि
6 काम देवभूमियाँ
मनुष्य भूमि अपाय और देवलोक के बीच संतुलन की भूमि है।
🌺मनुष्य भूमि की विशेषताएँ
1. सुख–दुःख का संतुलन—न अत्यधिक सुख (जैसा देव लोक में) और न ही अत्यधिक दुःख (जैसा निरय में)।
2. बुद्धों का अवतरण यहीं होता है—सभी सम्यक सम्बुद्ध मनुष्य भूमि में ही जन्म लेते हैं।
3. बुद्ध द्वारा बताया गया धम्म (दुःख मुक्ति का मार्ग )श्रवण और निब्बान के लिए अभ्यास संभव
यहीं से
सोतापन्न
सकदागामी
अनागामी
अरहन्त
बना जा सकता है।
4. कर्म करने की स्वतंत्रता
कुशल और अकुशल—दोनों प्रकार के कर्म यहाँ प्रबल रूप से किए जाते हैं।
🌺 निब्बान का द्वार
मनुष्य भूमि में:
चार आर्यसत्य समझे जा सकते हैं
आर्य अष्टांगिक मार्ग का अभ्यास संभव
सोता-पन्न, सकदागामी, अनागामी, अरहन्त बनना संभव
देवलोक में सुख अधिक होने से प्रमाद अभ्यास कठिन
, और अपाय में दुःख अधिक होने से अभ्यास असंभव — इसलिए मध्य मार्ग केवल मनुष्य भूमि में।
अधिकतर प्राणी अज्ञानवश नीचे की योनियों में गिर जाते हैं
और ऊँचे लोकों में सुख में लीन होकर धम्म से दूर हो जाते हैं।
इसलिए मनुष्य जीवन सर्वश्रेष्ठ
🌺5. मनुष्य जन्म कैसे मिलता है?
शीलयुक्त जीवन
कुशल कर्म
इन कर्मों के विपाक से मनुष्य भूमि में पटीसंधि चित्त उत्पन्न होता है।
पटीसंधि चित्त—
उपेक्खा सहगत संतिरन चित्त असंखारिक कामावचर अहेतुका कुशल विपाक चित्त
दस पुण्य कर्म करने का दुर्लभ अवसर मनुष्य भूमि में ही मिलता है l
🪷 निष्कर्ष
मनुष्य भूमि ही वह महान पुण्य अवसर है जहाँ प्राणी अज्ञान से ज्ञान की ओर, संसार दुःख चक्र से निर्वाण की ओर अग्रसर हो सकता है।
सबका मंगल हो l
सभी पुण्य लाभी हो l
सभी धम्मलाभी हो l
सभी को अरिय मग्ग और अरिय फल प्राप्त हो l
भिक्खुनी अभिञ्ञा
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🌷 गुरुजी के साथ प्रश्नोत्तर 🌷
प्रश्न 1:
साधना के दौरान विचार तो मन में आते ही हैं—कभी चिंताओं के, कभी अपने कर्तव्यों के संबंध में, कभी जीवन के किसी अन्य भाग पर अथवा किसी ज्वलंत समस्या पर। इनकी अवहेलना कर दें या इन पर गहनता से चिंतन-मनन करें? मेरी समझ में तो इनमें अधिक रस लेना अथवा दमन करना दोनों ही भूल होगी। इस पर प्रकाश डालने की कृपा करें।
उत्तर:
साधना करते समय जो भी विचार आए, उसे गौण मानकर उपेक्षा करें। उस समय साधना—अर्थात संवेदनाओं के प्रति समताभाव रखने—को ही प्रमुखता दें। यदि कोई विचारणीय प्रश्न हो, तो उस पर साधना के पश्चात चिंतन कर सकते हैं।
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प्रश्न 2:
शरीर के किसी अंग में संवेदनाओं का निरीक्षण करते समय शरीर के भीतर भी कुछ होता हुआ प्रतीत होता है। क्या इनकी अवहेलना करें, अथवा उस समय की प्रतीक्षा करें जब वहाँ की संवेदनाएँ और प्रत्यक्ष हो जाएँ?
उत्तर:
संवेदनाओं का निरीक्षण करते समय शरीर की गहराई में कोई अनुभूति हो तो थोड़ी देर के लिए रुककर उसकी स्पष्ट जानकारी कर सकते हैं, और फिर अपने निश्चित क्रम में लग सकते हैं। बहुत देर तक रुके रह जाने से चित्त में अस्थिरता आने का खतरा रहता है। अतः इस ओर सजग रहें।
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प्रश्न 3:
विपश्यना में शरीर की संवेदनाओं को देखना ही मुख्य है। पर मान लें कि मुझे किसी समस्या का समाधान करना है। क्या मैं सामान्य विपश्यना करने के पश्चात उसी आसन पर बैठे-बैठे समस्या पर गहराई से चिंतन कर सकता हूँ? ऐसा करते समय शरीर के किसी अंग—साधारणतः सिर—में संवेदनाएँ बनी रहती हैं। तो क्या इन संवेदनाओं को ध्यानपूर्वक देखते हुए समस्या से जुड़े विचारों को आने देना चाहिए?
उत्तर:
साधना के पश्चात किसी समस्या पर चिंतन करने में कोई दोष नहीं है। उस समय संवेदनाएँ होंगी, परंतु उनकी उपेक्षा कर मूल समस्या के चिंतन-मनन को ही प्राथमिकता दें।
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प्रश्न 4:
ध्यान में किसी अंग-विशेष पर संवेदनाओं का निरीक्षण करते-करते यदि किसी नजदीकी अथवा दूरस्थ अंग में भी संवेदना उठे, तो ऐसे में क्या करना चाहिए?
उत्तर:
साधना के समय किसी अंग-विशेष का निरीक्षण करते हुए अन्य अंगों में हो रही संवेदनाओं की उपेक्षा करें, और जब उनकी बारी आए तभी उन्हें महत्व दें। अन्यथा क्रमबद्ध निरीक्षण संभव नहीं हो पाएगा।
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प्रश्न 5:
कभी जीवन के किसी प्रश्न पर खुली आँखों से विचार-विमर्श करते समय या किसी गंभीर समस्या पर किसी की बातें सुनते समय सिर में इतनी तीव्र संवेदनाएँ प्रकट होती हैं कि कभी-कभी समस्या के स्थान पर उन्हीं पर मन खिंच जाता है। उस समय क्या करना चाहिए?
उत्तर:
दैनिक जीवन की जिम्मेदारियों का कार्य करते समय यदि संवेदनाएँ महसूस होने लगें, तो उनकी उपेक्षा करें और पूरा ध्यान कार्य पूर्ण करने में लगाएँ। इससे कठिनाई दूर होगी और कार्य में सफलता मिलेगी। मन यदि दोनों ओर रहेगा, तो सफलता में बाधा आएगी।
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प्रश्न 6:
मुझे शरीर के किसी छोटे भाग पर मन एकाग्र करना अधिक आसान लगता है—जैसे पूरे कान की बजाय कान के किसी एक हिस्से पर। क्या ऐसा करना ठीक है?
उत्तर:
सामान्यतः छोटे भाग पर मन टिकाना कठिन होता है; मन ऊबने लगता है। परंतु यदि आप टिकाए रख सकते हैं, तो यह अच्छी बात है—अवश्य टिकाएँ।
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संदर्भ / Reference
वर्ष 10, मुंबई
बुद्धवर्ष 2524 | आषाढ़ (अधिक) पूर्णिमा (शक)
दिनांक: 28-6-1980 | अंक 13
पुस्तक: विपश्यना पत्रिका संग्रह (भाग–3)
विपश्यना विशोधन विन्यास
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फरीदाबाद में बहुत से विपश्यना साधक हैं लेकिन अभी तक फरीदाबाद में एक दिवसीय शिविर का आयोजन नहीं होता है यह ग्रुप इसलिए बनाया गया है कि जितने भी फरीदाबाद के पुराने साधन हैं वह इस ग्रुप में जुड़ जाए और फिर सभी मिलकर विपश्यना आचार्य जी से बात करके एक दिवसीय शिविर शुरू करवाने की दिशा में प्रयास किया जा सके।
कृपया सभी फरीदाबाद के पुराने साधक इस ग्रुप से जुड़े
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