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सेक्स से जुड़ी हुई प्रेम से जुड़ी हुई सभी जानकारी के लिए सन्देश भेजे जय कामदेव कामसूत्र यौन स्थानों का सच्चा गुरु ग्रंथ है। अपने यौन जीवन में विविधता लाने के तरीके खोज रहे हैं? तब आप सही जगह पर आए हैं .. !!
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उर्जा का रूपान्तरण ......
एक पूर्ण सम्भोग के दौरान,
शरीर एक दूसरे के विपरीत ध्रुवों के गहनता में
विलीन हो जाते हैं ।
इस बिन्दु में मानसपटल सोचना छोड़ देता है ।
बस दोनों ध्रुव के बीच एक घर्षण उर्जा शक्ति का
उत्पादन करती है ।
सम्भोग के समय जो घर्षण से
तरङ्गित उर्जा कामूकता को बढ़ाती है ।
वह उर्जा बन्द हो जाता है ।
पुरुष ऊर्जा लिंग से योनि में प्रवाहित होती है,
और महिला के दिल तक जाती है ।
स्त्रैण ऊर्जा स्तनों के माध्यम से प्रतिक्रिया करती है
और वहाँ से यह पुरुष के हृदय में प्रेषित होती है ।
उसके यौन केन्द्र में उतरती है ।
इस प्रकार युगल और प्रकृति उर्जा के बीच
पूर्ण एकता का निर्माण हो कर
एक जीवन्त प्रकाश उत्पन्न करने की शक्ति आ जाती है ।
इस बिन्दु मेंं सक्रिय और निष्क्रिय चरणों के साथ
उर्जा पुरुष से महिला तक जाती है
और इसके विपरीत,
जिसके दौरान पुरुष एक महिला में और
महिला एक पुरुष में बदल जाता है ।
तन्त्र में इस घटना को उर्जा का रुपान्तरण कहा जाता है ।
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💞 श्रृंगार शतक 💞
🌺भर्तृहरि 🌺
हिन्दी भावानुवाद
💘 अधखिले मालती के फूलों की माला गले में पड़ी हो, केसर मिला चंदन शरीर में लगा हो और ह्रदय हारिणी प्राणप्यारी छाती से चिपटी हो तो समझ लो स्वर्ग का शेष सुख यहीं मिल गया।
💘 जो पुरुष मैथुन के श्रम से थककर मतवाले हाथी के कुम्भों के समान विस्तीर्ण और केसर से भीगे हुए स्त्री के उरोजों पर अपनी छाती रखकर उसकी बाहों के मध्य पड़ा हुआ एक क्षण भी सोकर रात बिताता है, वह धन्य है।
💘समागम के समय स्त्री - पुरुष का एक हो जाना ही काम का फल है। यदि समागम में दोनों का चित्त एक न हो तो वह समागम नही, वह तो मृतकों का समागम है।
💘 या तो पाप ताप नाशिनी गंगा के किनारों पर ही रहना चाहिए या कि सुंदर हार पहने हुए तरुणी स्त्रियों के कुचों के बीच।
💘 हे चित्त, उस स्त्री के पुष्ट स्तनों, मनोहर जांघों और सुंदर मुख को देखकर वृथा क्यों व्याकुल होते हो। यदि तुम उसके कठोर स्तनों का आनंद लेना चाहते हो तो पुण्य करो। क्योंकि बिना पुण्य किए मनोरथ सिद्ध नही होते।
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💕💕 मैथुन - कर्म का पवित्र विधान 💕💕
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
🌺 पति अपनी कामना के अनुसार पत्नी को अभिमंत्रित करके जैसी संतान की इच्छा हो, उसके अनुसार खीर आदि भोजन करने के पश्चात उसके साथ शयन करे। यह क्रम समझना चाहिए।
💘 शयन काल में ' अमोऽहमस्मि' इत्यादि मंत्र से पत्नी का आलिंगन करें। इस मंत्र का भाव इस प्रकार है - देवि! मैं प्राण हूँ, तुम वाक हो। मैं साम हूँ, तुम ऋत हो। मैं आकाश हूँ, तुम पृथ्वी हो। अतः आओ हम दोनों दम्पति एक दूसरे का आलिंगन करें। एक साथ रेतस धारण करें। जिससे हमें पुरुषत्व विशिष्ट पुत्र का लाभ हो।
🌺 तत्पश्चात पत्नी के दोनों जांघों को फैलाएं। उस समय यह मंत्र पढ़ना चाहिए - विजिहीथां द्यावापृथिवी इति। हे उरू स्वरूप आकाश और पृथ्वी! तुम दोनों विलग होओ।
💘 इसके बाद पत्नी की योनि में अपना लिंग स्थापित करके उसके मुँह से मुँह मिलाकर अनुलोम क्रम से पत्नी के सम्पूर्ण शरीर का (केशादि पादान्त) तीन बार स्पर्श चुंबन करें। इस मार्जन काल में 'विष्णुर्योतिकलकपयतु' इत्यादि मंत्र का पाठ करें। जिसका भाव इस प्रकार है - प्रिय! सर्व व्यापी भगवान विष्णु तेरी जननेंद्रिय को पुत्र की उत्पत्ति में समर्थ बनावें। भगवान सूर्य तेरे अंगो को विभाग पूर्वक पुष्ट एवं दर्शनीय बनावें। विराट पुरुष भगवान प्रजापति मुझमें अभिन्न रुप में स्थित हों, तुझमे वीर्य का. आधान करें। भगवान घाता मुझमें अभिन्न भाव से स्थित हो तेरे गर्भ का धारण एवं पोषण करें। देवि! जिसकी भूरि भूरि स्तुति की जाती है, वह सिनी वाली (जिसमें चंद्रमा की एक कला शेष रहती है, वह अमावस्या) तुम हो, तुम यह गर्भ धारण करो। देव अश्विनी कुमार (सूर्य और चंद्रमा) अपने किरण रुपी कमलों की माला धारण करके मुझमें अभिन्न रुप में स्थित हो, तुझमें गर्भ का आदान करें। 💕💕
🌹🌹बृहदारण्यकोपनिषद ❤️❤️ 6/4/20- 2 1 🌺
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"स्तनों के आकर्षण का वैज्ञानिक अर्थ और उससे मुक्त होने का बेजोड़ प्रयोग।"
एक मित्र ने मुझे सवाल पूछा है कि यह जो यहां कीर्तन होता है, यह बहुत खतरनाक चीज है। और यह तो ऐसा मालूम पड़ता है कि कीर्तन करने वाले साधु, संन्यासी, संन्यासिनिया कामवासना निकाल रहे हैं अपनी! और उन्हीं मित्र ने आगे पूछा है कि यह भी मुझे पूछना है कि जब मैं लोगों को कीर्तन करते देखता हूं? तो अगर स्त्रियां कीर्तन कर रही हैं, तो मेरा ध्यान उनके स्तन पर ही जाता है!
अब कीर्तन करते समय जिसका ध्यान स्तन पर जा रहा हो, वह यह कह रहा है कि उसे लगता है कि सब संन्यासी अपनी कामवासना निकाल रहे हैं! उसे यह खयाल नहीं आता कि उसे जो दिखाई पड रहा है, वह उसके संबंध में खबर है, किसी और के सबंध में खबर नहीं है। और वह खुद ही नीचे लिख रहा है कि मुझे उनके स्तन पर ध्यान जाता है।
निश्चित ही, इस व्यक्ति को मां के स्तन से दूध पीने का पूरा मौका नहीं मिला होगा। इसको स्तन में अभी भी अटकाव रह गया है। इसको एक काम करना चाहिए। बच्चों के लिए जो दूध पीने की बोतल आती है, वह खरीद लेनी चाहिए। उसमें दूध भरकर रात उसको चूसना चाहिए, दस—पंद्रह मिनट सोने के पहले। तीन महीने के भीतर इसको स्तन दिखाई पड़ने बंद हो जाएंगे।
स्तन दिखाई पड़ने का मतलब ही यह है कि बच्चे का जो रस था स्तन में, वह कायम रह गया है। स्तन पूरा नहीं पीया जा सका। इसलिए आदिवासियों में जाएं, जहां बच्चे पूरी तरह अपनी मां का स्तन पीते हैं, वहा किसी की उत्सुकता स्तन में नहीं है। अगर आप आदिवासी स्त्री को, हाथ रखकर भी उसके स्तन पर, पूछें कि यह क्या है? तो वह कहेगी कि दूध पिलाने का थन है। आप अपने इस समाज की स्त्री के स्तन की तरफ आंख भी उठाएं, वह भी बेचैन, आप भी बेचैन। आप भी आंख बचाते हैं, तब भी बेचैन, वह भी स्तन को छिपा रही है और बेचैन है। और छिपाकर भी प्रकट करने की पूरी कोशिश कर रही है, उसमें भी बेचैन है।
और सबकी नजर वहीं लगी हुई है। चाहे फिल्म देखने जाएं, चाहे उपन्यास पढ़ें, चाहे कविता करें, चाहे कहानी लिखें, स्तन बिलकुल जरूरी हैं! अगर कभी कोई दूसरे ग्रह की सभ्यता के लोग इस जमीन पर आए, तो वे हमें कहेंगे कि ये लोग स्तनों से बीमार समाज है। क्योंकि मूर्ति बनाओ तो, चित्र बनाओ तो, स्तन पहली चीज है; स्त्री गौण है।
मगर यह बच्चे का दृष्टिकोण है। असल में बच्चा जब पहली दफा मां से संबंधित होता है—और वह उसका पहला संबंध है, उसके पहले उसका कोई संबंध किसी से नहीं है, वह उसका पहला समाज में पदार्पण है, वह उसका पहला अनुभव है दूसरे का—तो वह पूरी मां से संबंधित नहीं होता; सिर्फ उसके स्तन से संबंधित होता है। पहला अनुभव स्तन का है। और पहले वह स्तन को ही पहचानता है; मां पीछे आती है। स्तन प्रमुख है, मां गौण है। और अगर आपको बाद की उम्र में भी स्तन प्रमुख है, स्त्री गौण लगती है, तो आप बचकाने हैं और आपकी बुद्धि परिपक्व नहीं हो पाई। आपको फिर से स्तन नकली खरीदकर बाजार से, पीना शुरू कर देना चाहिए। उससे राहत मिलेगी।
गुरु बोलता था, शिष्य सुनता था। लेकिन शिष्य के सुनने में भी गुरु देखता था, उसका रस कहां है! उसकी आंख कहा चमकने लगती है और कहा फीकी हो जाती है! कहा उसकी आंख की पुतली खुल जाती है और फैल जाती है, और कहा सिकुड़ जाती है! कहां उसकी रीढ़ सीधी हो जाती है, और कहां वह शिथिल होकर बैठ जाता है! वह देख रहा है। बाहर और भीतर उसकी चेतना में क्या हो रहा है, वह देख रहा है। और इस माध्यम से वह भी चुन रहा है कि इस शिष्य के लिए क्या जरूरी होगा, क्या उपयोगी होगा।
इसलिए कृष्ण ने सारे मार्गों की बात कही है। उन सारे मार्गों पर अर्जुन को चलना नहीं है। अर्जुन को चलना तो होगा एक ही मार्ग पर। लेकिन इन सारो को चलने के पहले जान लेना जरूरी है।
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#स्त्री_का_व्यक्तित्व
स्त्री के स्तनों से जुड़ा होता है
स्त्री का सारा व्यक्तित्व...
जब तक स्त्री माँ नही बन जाती तब तक
उसकी ऊर्जा पूर्णतः स्तनों तक नहीं पहुँचती l
शरीर शास्त्री ये प्रश्न उठाते रहते हैं कि
पुरुष के शरीर में स्तन क्यों होते हैं जब कि
उनकी कोई आवश्यकता नहीं दिखाई देती है l
क्योंकि पुरुष को बच्चे को तो पिलाना नहीं है l
फिर उनकी क्या आवश्यकता है ?
वे ऋणात्मक ध्रुव हैं l
इसलिए तो पुरुष के मन में
स्त्री के स्तनों की ओर इतना आकर्षण है l
वे धनात्मक ध्रुव हैं l
इतने काव्य, साहित्य, चित्र, मूर्तियाँ
सब कुछ स्त्री के स्तनों से जुड़े हैं l
ऐसा लगता है जैसे
पुरुष को स्त्री के पूरे शरीर की अपेक्षा
उसके स्तनों में अधिक रस है l
और यह कोई नयी बात नहीं है l
गुफाओं में मिले प्राचीनतम चित्र भी स्तनों के ही हैं l
स्तन उनमें महत्वपूर्ण है l
बाकी का सारा शरीर ऐसा मालूम पड़ता है कि
जैसे स्तनों के चारों और बनाया गया हो l
स्तन आधारभूत है l
क्योंकि स्तन उनके धनात्मक ध्रुव हैं l
और जहाँ तक योनि का प्रश्न है
वह करीब-करीब सम्वेदन रहित है l
स्तन उसके सबसे सम्वेदशील अँग है l
और स्त्री देह की सारी सृजन क्षमता
स्तनों के आस-पास है l
यही कारण है कि हम हिन्दू कहते हैं कि
जब तक स्त्री माँ नहीं बन जाती,
वह तृप्त नहीं होती l
पुरुष के लिए यह बात सत्य नहीं है l
कोई नहीं कहेगा कि
पुरुष जब तक पिता न बन जाये तृप्त नहीं होगा l
पिता होना तो मात्र एक संयोग है l
कोई पिता हो भी सकता है,
नहीं भी हो सकता है l
यह कोई बहुत आधारभूत सवाल नहीं है l
एक पुरुष बिना पिता बने रह सकता है l
और उसका कुछ न खोये l
लेकिन बिना माँ बने स्त्री कुछ खो देती है l
क्योंकि उसकी पूरी सृजनात्मकता,
उसकी पूरी प्रक्रिया तभी जागती है,
जब वह माँ बन जाती है l
जब उसके स्तन
उसके अस्तित्व के केन्द्र बन जाते हैं,
तब वह पूर्ण होती है l
और वह स्तनों तक नहीं पहुँच सकती
यदि उसे पुकारने वाला कोई बच्चा न हो l
तो पुरुष स्त्रियों से विवाह करते हैं
ताकि उन्हें पत्नियाँ मिल सके,
और स्त्रियाँ पुरूषों से विवाह करती हैं
ताकि वे माँ बन सकें l
इसलिए नहीं कि उन्हें पति मिल सके l
उनका पूरा का पूरा मौलिक रुझान ही
एक बच्चा पाने में है
जो उनके स्त्रीत्व को पुकारें l
तो वास्तव में सभी पति भयभीत रहते हैं,
क्योंकि जैसे ही बच्चा पैदा होता है
वे स्त्री के आकर्षण की परिधि पर आ जाते हैं l
बच्चा केन्द्र हो जाता है l
इसलिए पिता हमेशा ईर्ष्या करते हैं,
क्योंकि बच्चा बीच में आ जाता है l
और स्त्री अब बच्चे के पिता की उपेक्षा
बच्चे में अधिक उत्सुक हो जाती है l
पुरुष गौण हो जाता है l
जीने के लिए उपयोगी, परन्तु अनावश्यक l
अब मूलभूत आवश्यकता पूर्ण हो गयी l
पश्चिम में बच्चों को
सीधे स्तन से दूध न पिलाने का फैशन हो गया है l
यह बहुत खतरनाक है l
क्योंकि इसका अर्थ यह हुआ कि
स्त्री कभी अपनी सृजनात्मकता के केन्द्र पर
नहीं पहुँच सकेगी l
जब एक पुरुष किसी स्त्री से प्रेम करता है
तो वह उसके स्तनों को प्रेम कर सकता है l
लेकिन उन्हें माँ नहीं कह सकता l
केवल एक छोटा बच्चा ही उन्हें माँ कह सकता है l
या फिर प्रेम इतना गहन हो कि
पति भी बच्चे की तरह हो जाये,
तो यह सम्भव हो सकता है l
तब स्त्री पूरी तरह भूल जाती है कि
वह केवल एक सँगिनी है,
वह अपनी प्रेमी की माँ बन जाती है l
तब बच्चे की आवश्यकता नहीं रह जाती,
तब वह माँ बन सकती है l
और स्तनों के निकट उसके अस्तित्व का केन्द्र
सक्रिय हो सकता है l
स्त्रैण अस्तित्व की पूरी सृजनात्मकता
मातृत्व पर ही आधारित है l
इसीलिए तो स्त्रियाँ अन्य किसी तरह के सृजन में
इतनी उत्सुक नहीं होतीं l
पुरुष सर्जक हैं l
स्त्रियाँ सर्जक नहीं हैं l
न उनके चित्र गये बनाये हैं l
न महान काव्य रचे गये हैं l
न कोई बड़ा ग्रन्थ लिखा गया है l
न कोई बड़े धर्म बनाये हैं l
वास्तव में उसने कुछ नहीं किया है l
लेकिन पुरुष सृजन किये चला जाता है l
वह पागल है l
वह आविष्कार कर रहा है,
सृजन कर रहा है l
भवन निर्माण कर रहा है l
तन्त्र कहता है,
ऐसा इसलिए है
क्योंकि पुरुष नैसर्गिक रूप से सर्जक नहीं है l
इसलिए वह अतृप्त और तनाव में रहता है l
वह माँ बनना चाहता है l
वह सर्जक बनना चाहता है l
तो वह काव्य का सृजन करता है l
वह कई चीजों का सृजन करता है l
एक तरह से सृजन उसकी माँ हो जाये l
लेकिन स्त्री तनाव रहित होती है l
यदि वह माँ बन सके तो तृप्त हो जाती है l
फिर किसी और चीज में उत्सुक नहीं रहती l
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पुरुषों के लिए डोर खींचने का आनंद ही कुछ और ही है फिर वह पतंग की हो या अंग की वहां छोड़कर ढील दी जाती है और यहां खींचकर।
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कुछ पुरुष अनोखे होते हैं...!
वो जिस किसी पे भी दिल हारते है, अपना सब कुछ हार देते है,
वो सिर्फ प्रेम नहीं करते, कोई पूजा हो जैसे ऐसे पूजते हैं...!!
कुछ पुरुष अनोखे होते है..
वो माँग नहीं भरते लेकिन, ज़िन्दगी का खालीपन भर देते है.. वो समाज के सामने नहीं आते,लेकिन तुम्हे समाज से लड़ने की ताकत दे देते हैं..!!
कुछ पुरुष अनोखे होते है..
वो कोई मंगलसूत्र नहीं डालते गले में,वो डालते हैं तो ऐसा सूत्र डालते है की, जैसे मानो नया जन्म हुआ हो तुम्हारा...!!
कुछ पुरुष अनोखे होते हैं..
वो कसमे झूठी नहीं खाते हैं, वो हज़ार तरह की बाते करते हैं, मग़र उन बातों को जितना हो सकता है वो उतना सच करने में लग जाते है..!!
कुछ पुरुष अनोखे होते हैं...
कुछ पुरुष वाकई में अनोखे ही होते हैं,
आज की इस बदलती हुई दुनिया मे भी तुमको सच्चे प्रेम का महत्व समझाते हैं, प्रेम पूजा भी हो सकता, प्रेम पवित्र भी हो सकता है, वो ये सब दिखलाते है...!!
कुछ पुरुष वाकई अनोखे होते हैं…!!
❣️
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ठंडा का समय मतलब संभोग का समय ।
निश्चित ही चिपक कर सोने से अंग का मिलन होता है जिससे गर्मी उत्पन्न होकर हमारे जिस्म को संभोग के लिए तैयार कर देता है।
अब समस्या है कुछ लोगो को की ठंडा में पूरा कपड़ा खोलना मुश्किल सिर्फ पेटीकोट उठाया पेंट का जीप खोला और घपाघाप शुरू,ऐसा मत करना इससे संभोग की रुचि कम हो जाएगी पूरी निःवस्त्र होकर संभोग करो जब भी संभोग करो।
अब स्त्री और पुरुष ध्यान दो ठंडा के समय में सफाई पर भी ध्यान दो योनि की और लिंग की कांख,गर्दन,जांघ ,नाभी,पीठ सभी जगह ताकि चूसने चाटने में दिक्कत नही हो क्योंकि सफाई नही करेगी तो योनि और लिंग से बदबू आयेगा जिससे सेक्स का आनंद खत्म और रोग भी हो सकता है।
ठंड संभोग का मौसम है पर आलस का भी इसलिए आलस मत करना । सफाई सही से करो फिर घपाघाप करो।
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प्रेम में पड़ी स्त्री को _अपने प्रेमी के साथ
जागना अच्छा लगता है _ ना कि सोना
♥️♥️♥️
◾प्रेम में पड़ा पुरुष
स्त्री के साथ जब जब सोने से ज्यादा
जागने को सोचता है।
तब तब स्त्री ने
अपने सोने के लिए अलग प्रबंध कर लिया है।😯
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💞 श्रृंगार शतक 💞
🌺भर्तृहरि 🌺
हिन्दी भावानुवाद
💘 अधखिले मालती के फूलों की माला गले में पड़ी हो, केसर मिला चंदन शरीर में लगा हो और ह्रदय हारिणी प्राणप्यारी छाती से चिपटी हो तो समझ लो स्वर्ग का शेष सुख यहीं मिल गया।
💘 जो पुरुष मैथुन के श्रम से थककर मतवाले हाथी के कुम्भों के समान विस्तीर्ण और केसर से भीगे हुए स्त्री के उरोजों पर अपनी छाती रखकर उसकी बाहों के मध्य पड़ा हुआ एक क्षण भी सोकर रात बिताता है, वह धन्य है।
💘समागम के समय स्त्री - पुरुष का एक हो जाना ही काम का फल है। यदि समागम में दोनों का चित्त एक न हो तो वह समागम नही, वह तो मृतकों का समागम है।
💘 या तो पाप ताप नाशिनी गंगा के किनारों पर ही रहना चाहिए या कि सुंदर हार पहने हुए तरुणी स्त्रियों के कुचों के बीच।
💘 हे चित्त, उस स्त्री के पुष्ट स्तनों, मनोहर जांघों और सुंदर मुख को देखकर वृथा क्यों व्याकुल होते हो। यदि तुम उसके कठोर स्तनों का आनंद लेना चाहते हो तो पुण्य करो। क्योंकि बिना पुण्य किए मनोरथ सिद्ध नही होते।
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अधेड़ उम्र में भी प्यार होता है क्या?
उम्र के ईस पड़ाव में भी दिल खोता है क्या?
दिल क्या यौवन सा धड़कता है
किसी का इंतज़ार होता है क्या?
रातों में कोई याद आता है क्या?
कोई अचानक दिल धड़काता है क्या?
छुप छुप के कभी मुस्कुराहटें आती हैं
रह रह के दिल घबराता है क्या?
जो सोलहवें सावन में न कर पाए
घर समाज के डर से
कभी मिलने को न निकले
अपने घर से
वो अब करने को मन चाहता है क्या?
सारी वर्जनाएं तोड़ देने का मन
होता है क्या?
जो चाहा और नहीं मिला
उसे हासिल कर लेने का वचन होता है क्या?
हाँ ,प्यार शायद ऐसा ही है
वो जाती ,धर्म ,उम्र नहीं देखता है
वो देखता है
बस कोई अपना
फिर कोई लक्ष्मण रेखा नहीं देखता है ..
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स्त्रियों से धर्म के नाम पर जो अत्यधिक उपवास कराया जाता है, उसके पीछे रहस्य इतना ही है कि उनकी काम-भावना दब जाय और पतियों के बाहर होने या अक्षम होने पर उनका चित्त डांवाडोल न हो ।
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संभोग क्या है.......
भ्रुमध्य पर प्रवाह रच अवरुध हो रही ऊर्जा ही मानव चित है । यही जड और आत्मा का सयोग निर्मित करता है । संभोग ऊर्जा जड पर केन्द्रित हो इसे तोडकर मष्तिक में प्रबाह करती है । क्योकि अवरुधता के पार ग्रहण आयाम होता है । यह फीर घर्षण कर उस उर्जा को अपनी और खिचती है ।
दोनो भौह के मध्य आत्मा और अवरोध का सयोग चित बनाता है । यह सांस और ऊर्जा को खीचता है । इससे सांस उथली और ऊर्जा अवरूद्ध होती है । संभोग से ऊर्जा भूमध्य में छेद कर मष्तिक मे घुस जाती है । संभोग उपरान्त भी यह अवरोध की दिशा में प्रवाह होती रहती है । और उर्जा अवरुध हो तनाव और पीडा देती है । फिर भी यह ऊर्जा सहजता से प्रवेश नही कर पाती । इसके लिए काम क्रिया की जरुरत होती है ।
संभोग में मनुष्यको चित को और स्वरुप को संभाल लेना पडता है । दोनों नावों पर सवार होने से मुश्किल हो सकती है । मनुष्य इसलिये मुश्किल में पड़ा जाता है । क्यों की वह सदैव दोनों नाव में सवार रहता है । चित भर जाता है तो दुविधा पैदा करता है । दो विपरित दिशाओं में चलने वाला हमेशा टूट जाता है । खंड-खंड हो, बिखर जाता है । और जब मनुष्य खंड-खंड हो जाता है, बिखर जाता है तो मनुष्य में समग्रता रहता ही नही है । जब मनुष्य अस्तित्व मे रहेगा ही नही तो स्वरुप कैसे रचेगा ? उससे सम्पर्क कैसे करेगा और आत्मा कैसे स्वरुप में रहेगा ? चित मे तो माया का भीड़ भरा होता है । जगत भी आभासी अस्तित्वहीन मूल अस्तित्व के विरुद्ध और विपरित खडा होता है ।
तंत्र सेक्स ऊर्जा प्रवाह के इस घर्षण से हटकर ऊर्जाओं को संभोग द्वारा ही प्रवाह करती है । वह उर्जा रीठ की हड्डी से मष्तिक मे सीधी प्रवाह करता है ।
अनुभूति क्षमता में आत्मा वही रहती है । जहां सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा मिलती है । जब यह ऊर्जा मष्तिक के ऊच्च या पीछे के क्षेत्र में संभोग से मिलती है, तो यह तंत्र संभोग बन जाता है । क्योंकि यह उर्जा अब मष्तिक मे छेद करके विकृत हो, प्रविष्ठ नही होती है और मष्तिक की कोशिकाओ पर बादल की तरह छा कर मृत कर छिन्न भिन्न कर देती है । वह ग्रहण कि भाती लग जाती है । संभोग काल हो या समान्य काल आत्मा जहा स्थिति रखती है । ऊर्जा और सांसे वही प्रवाह होती है ।
स्वरूप आयाम में कदम ना रखने की असल कठनाई है । एक बार कदम रख लिया तो फिर घटना शुरु हो जाती है तो फिर रुकती ही नही है । एक बार बीज अंकुरन घट जाए तो फिर बापिस लौटते वक्त वह चित फिर नही मिलेगा । वह चित फीर मिट चुका होता है ।
चित बीज है । स्वरुप उसका अंकुरण है ।
सब से बडी कठनाई बीज के अंकुरण की ही है । एक बार अंकुरित हो गया तो वह आसमान वृक्ष बनने के लिए खुल जाता है । अब विराट आकाश उपलब्ध हो गया है । बढने के लिऐ अब सीमा ही नही रही है । अब चित की सीमा और जगत सब खो गया है । पहले जो चित का जगत था । उसके आधार पर सोच विचार गुणा भाग नियम पर चलता था । अब वह जगत मिट गया है । अब स्वरुप के नियम शुरु हो गये है । अब चित का ढाचा नष्ट हो गया है । ऊर्जा जब उठाव करती है तो अंहकार को भी बहा ले जाती है ।
अस्तित्व मे आना कोई साधारण घटना नहीं है । जो घट ही जायेगी । एक प्रवाह है जो प्रतिपल घटता रहता है । पर अस्तित्व प्रति क्षण घट रहा होता है । वह मनुष्य के भीतर बढ़ रहा होता है ।
मनुष्य अपने भीतर अस्तित्व के उच्चतम शिखर स्वंम शिव को छिपाये रखा होता है । उसे इसका आभाष ही नही होता है । मनुष्य अस्तित्व के उच्चतम रुप का गर्भ की तरह है । क्योंकि केवल मनुष्य के जीवन का सवाल नहीं है । उसके भीतर सारा अस्तित्व दांव में लगा है । सारा अस्तित्व मनुष्य के भीतर खिलने को आतुर है। आत्मा परमात्मा से मिलने के पास है । वही अणु शक्ति से भी विराट ऊर्जा उठगी और ग्रहण हो समिष्ठि और जगत का नवसृजन करेगी ।
तंत्र का क्षेत्र स्वरुप के उच्चतम अवस्था में पहुचकर समाप्त हो जाता है । इस से योग के लिए आधार शरीर स्थापित हो जाता है और योग की प्रक्रिया शुरु हो जाती है । उसका विस्तार का अलग ही विज्ञान है ।
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सुंदर होना ही सबकुछ नहीं होता है।
मायने रखता है तुम्हारा कामुक होना भी।
अगर आप कामुक नहीं है तो बिस्तर पर एक शव की तरह पड़े रहने में कोई आनंद नहीं।
जब तक आपके अंदर की कामुकता नहीं जागेगी। तब तक आप और आपका साथी उस पल का कोई आनंद नहीं उठा पाओगे। इसलिए कामुक बने और आनंद ले उस पल का।
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आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक!
कौन जीता है तेरे जुल्फ के सर होने तक!!
हमने माना कि तगाफुल नहीं करोगे, लेकिन!!!
खाक हो जाएंगे हम, तुमको खबर होने तक!!!!
गिन रहा हूँ मौत की घड़ियाँ,
गम के दिन बिता रहा हूँ मैं!
आखिर इक दिन आओगे ऐ दोस्त,
आज आओ बुला रहा हूँ मैं!!
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💕विवाहित स्त्री से प्रेम होना गलत या सही पता नही,
पर याद रखिए न टूटे उसके विश्वास की डोर,💕
💕न बिखरे उसके घर के मोती,
समझिए उसकी भावनाओं को💕
💕और ध्यान रखें उसकी उदासियो का,
उसका प्रेम देह के लिए नही,💕
💕वो चाहती है कुछ वक्त अपने लिए,
कुछ शब्द अपने लिए,💕
💕कुछ मीठी तरंग अपने लिए,
कुछ अनछुए पल अपने लिए,💕
💕जो न कह पाई किसी से हो कोई उसे सुनने वाला,
कोई दर्द बाटने वाला..💕
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