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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव श्री विक्रम सहाय ने सुझाव दिया कि टीवी, रेडियो और प्रिंट मीडिया द्वारा साझा की जा रही विभिन्न राज्यों की सूचनाओं के अलावा प्रत्येक राज्य की अच्छी पद्धतियों और सफलता की कहानियों को भी साझेदार राज्यों के साथ साझा किया जा सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि सभी विभाग अपने डिजिटल संसाधनों को एकत्र कर सकते हैं और डीडी न्यूज अपने साप्ताहिक ईबीएसबी कार्यक्रम का उपयोग गंतव्य आधारित कार्यक्रमों को होस्ट करने में कर सकता है। जेएस (आईसीसी) सुश्री नीता प्रसाद ने सुझाव दिया कि प्रत्येक मंत्रालय व्यापक कवरेज पाने के लिए अपने भावी मासिक कार्यक्रम अग्रिम रूप से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के साथ साझा करे।
रेल मंत्रालय में कार्यकारी निदेशक, श्रीमती वंदना भटनागर ने विभिन्न ईबीएसबी कार्यक्रमों में भाग लेने वाले तथा लोगो डिस्प्ले, रेलवे की सम्पत्ति पर वीडियो डिस्प्ले आदि करने वाले छात्रों को दी जाने वाली रियायतों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ट्रेनों की नियमित आवाजाही शुरु होने पर इन गतिविधियों को नए सिरे से अंजाम दिया जाएगा।
गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, संसदीय कार्य मंत्रालय और खेल विभाग के अधिकारियों ने लॉकडाउन से पहले की गई गतिविधियों तथा शुरु की जाने के लिए प्रस्तावित गतिविधियों के बारे में जानकारी दी।
बैठक के अंत में सचिव, एच ई ने कार्रवाई करने योग्य निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं की संक्षेप में जानकारी दी :
प्रत्येक प्रतिभागी मंत्रालय/विभाग द्वारा ईबीएसबी के अंतर्गत गतिविधियां संचालित करने के लिए डिजिटल माध्यमों का रुख करना।
व्यापक प्रसार के लिए एक भारत श्रेष्ठ भारत विषयों पर वेबिनार आयोजित करना।
एक भारत श्रेष्ठ भारत डिजिटल संसाधनों के लिए साझा संग्रह तैयार करना, जिनका उपयोग प्रत्येक मंत्रालय द्वारा किया जा सकेगा। इस संग्रह को साझा पोर्टल पर होस्ट किया जा सकता है।
संशोधित संचार योजना तैयार करने की जरूरत है और ईबीएसबी पर दूरदर्शन का 30 मिनट का साप्ताहिक कार्यक्रम सभी मंत्रालयों से प्राप्त जानकारी के साथ गंतव्य आधारित होना चाहिए।
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कोविड-19 की मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनजर नवोन्मेषी तरीकों का उपयोग कर आगे बढ़ाया जाएगा एक भारत श्रेष्ठ भारत कार्यक्रम
कोविड-19 की मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनजर नवोन्मेषी तरीकों का उपयोग कर सरकार के एक भारत श्रेष्ठ भारत कार्यक्रम को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया है।
यह निर्णय एक भारत श्रेष्ठ भारत कार्यक्रम (ईबीएसबी कार्यक्रम) के अंतर्गत साझेदार मंत्रालयों के सचिवों की हाल ही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई एक बैठक में लिया गया। इस बैठक की अध्यक्षता मानव संसाधन विकास मंत्रालय में उच्च शिक्षा सचिव श्री अमित खरे ने की। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ईबीएसबी कार्यक्रम के लिए नोडल मंत्रालय है। इस बैठक में पर्यटन सचिव श्री योगेंद्र त्रिपाठी; संस्कृति सचिव श्री आनंद कुमार; युवा मामलों के विभाग में सचिव श्रीमती ऊषा शर्मा; एसई एंड एल सचिव श्रीमती अनीता करवाल ; माइगोव के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री अभिषेक सिंह और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, रेल मंत्रालय, गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, संसदीय कार्य मंत्रालय तथा खेल विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया।
प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए श्री अमित खरे ने कार्यक्रम के अब तक के कार्यान्वयन के बारे में जानकारी देते हुए कोविड-19 की मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनजर नवोन्मेषी तरीकों का उपयोग कर इसको आगे बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया। एसईएल विभाग में सचिव श्रीमती अनीता करवाल ने भी ठोस परिणाम दर्शाने की जरूरत पर बल दिया।
बैठक के दौरान ईबीएसबी कार्यक्रम की दिशा में अब तक हुई प्रगति के बारे में प्रस्तुति पेश की गई।
बैठक में अपने विचार प्रकट करते हुए पर्यटन मंत्रायल में सचिव श्री योगेंद्र त्रिपाठी ने सूचित किया कि पर्यटन मंत्रालय के अंतर्गत संस्थाएं पर्यटन से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर वेबिनार आयोजित कर रही हैं। मंत्रालय ‘’देखो अपना देश’’ श्रृंखला के अंतर्गत वेबिनार आयोजित कर रहा है जिसे माइगोव पोर्टल पर होस्ट किया जा रहा है। इन वेबिनार्स में हजारों लोग उपस्थित हो रहे हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ऐसे वेबिनार विभिन्न राज्यों के पर्यटन हितधारकों जैसे टूअर ऑपरेटर्स आदि के लिए आयोजित किए जा सकते हैं। सचिव, उच्च शिक्षा ने सुझाव दिया कि ‘’देखो अपना देश’’ और अन्य वेबिनार्स की रिकॉर्डिंग्स शैक्षणिक चैनलों पर और ऑनलाइन कक्षाओं में ब्रेक के दौरान प्रसारित की जानी चाहिए।
संस्कृति मंत्रालय में सचिव, श्री आनंद कुमार ने कहा कि वे भी वेबिनार्स का आयोजन कर रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि विभिन्न मंत्रालयों के सभी वेबिनार्स को एक भारत श्रेष्ठ भारत के साझा मंच के तहत लाया जाना चाहिए। उन्होंने ड्रामा लेखन, पेंटिंग्स, स्मारकों के वर्चुअल टूअर्स आदि जैसे विभिन्न विषयों पर ई-कार्यक्रम तैयार करने का सुझाव दिया।
उन्होंने बताया कि संस्कृति मंत्रालय ने ई-हैरिटेजपीडिया और ई-आर्टिस्ट पीडिया विकसित करने की पेशकश की है। उन्होंने सुझाव दिया कि विख्यात कलाकार अपनी कला सिखाने के लिए वर्चुअल कार्यक्रम मॉड्यूल्स भी कर सकते हैं। एसईएल विभाग में सचिव ने इस विचार का स्वागत किया और कहा कि वर्ली और मधुबनी पेंटिंग्स जैसी मौलिक कलाओं से संबंधित कक्षाओं में स्कूल बहुत दिलचस्पी लेंगे।
युवा मामलों के विभाग में सचिव श्रीमती ऊषा शर्मा ने ईबीएसबी कार्यक्रमों के संचालन के लिए डिजिटल मीडियम के उपयोग की सराहना की । उन्होंने कहा कि इन कार्यक्रमों की पहुंच व्यापक रूप में बढ़ाई जा सकती है। उन्होंने विभिन्न विभागों द्वारा तैयार डिजिटल सामग्री को साझा करने का भी सुझाव दिया। सचिव, एचई ने सुझाव दिया कि सभी मंत्रालयों की जानकारी को एकल मंच पर संग्रह किया जाना चाहिए। एसईएल विभाग में सचिव ने सुझाव दिया कि उन्हें डिजिटल प्लेटॅफॉर्म पर होस्ट किया जा सकता है।
माइगोव डॉट इन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री अभिषेक सिंह ने कहा कि वे विभिन्न भाषाओं में 100 वाक्य सीखने के लिए एक मोबाइल एप विकसित कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि माइगोव विभिन्न विभागों के वेबिनार होस्ट कर सकता है और उनके कार्यक्रमों के बारे में सूचना का भी प्रसार कर सकता है।
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कोविड-19 से निपटने के लिए समाधान ढूंढने में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का उपयोग
कम्प्यूटेशनल दवा की खोज के लिए 'हैकथॉन' शुरू किया जा रहा है: प्रोफेसर के विजय राघवन
आज यहां पर एक मीडिया ब्रीफिंग में, नीति आयोग के सदस्य, डॉ. विनोद पॉल और भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार, प्रोफेसर के विजय राघवन ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी द्वारा कोविड-19 से संबंधित टीकों, औषधि खोज, नैदानिकी और परीक्षण क्षेत्रों में जारी गतिविधियों पर संक्षिप्त जानकारी दी।
टीकों के संबंध में यह बताया गया कि, यह प्रक्रिया आमतौर पर धीमी और अनिश्चितताओं से भरी होती है। लेकिन, कोविड-19 के खिलाफ सफलता प्राप्ति के लिए बड़ी संख्या में समानांतर प्रयास करने की भी आवश्यकता है। ऐसा वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर किया जा रहा है। भारतीय शैक्षणिक समुदाय और स्टार्ट-अप वैक्सीन उम्मीदवारी के लिए बहुत ही मजबूत भारतीय वैक्सीन उद्योग में काम कर रहे हैं। तीन प्रकार के प्रयास किए जा रहे हैं। पहला प्रयास स्वदेशी हैं। दूसरा प्रयास वैश्विक स्तर पर सहयोगात्मक हैं, जिसमें भारतीय संगठन अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं और तीसरा प्रयास वैश्विक प्रयास है जिसमें भारतीय भागीदारी है। इतने बड़े पोर्टफोलियो के साथ, विनिर्माण और भंडारण के लिए जोखिम कम करने के प्रयासों के बाद, सफलता का बेहतर आश्वासन मिलता है।
दवा की खोज पर हमारे वैज्ञानिक प्रयासों में तीन दृष्टिकोण अपनाए जा रहे हैं। पहला, मौजूदा दवाओं का पुनः प्रस्तुतिकरण, यह देखने के लिए कि यह वायरस के खिलाफ कितना प्रभावी है और रोग के परिणामों को कम करने में कितना सक्षम है। दूसरा, पादप-औषधीय और औषधीय पौधों से निकले अर्क का परीक्षण किया जा रहा है। अंत में, विभिन्न दृष्टिकोणों का उपयोग करते हुए, कम्प्यूटेशनल दवा की खोज के लिए 'हैकथॉन' सहित नई दवा की खोज की जा रही है।
अनुसंधान प्रयासों के एक सम्मिश्रण के नतीजे, नए परीक्षण और परीक्षण किट में सामने आए हैं। इनमें वायरस का पता लगाने और एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए नए परीक्षण भी शामिल हैं। बाद वाले का उपयोग सीरोलॉजिकल अध्ययनों के लिए किया जा रहा है।
इन विकासों में प्रगति हमारे वैज्ञानिकों, संस्थानों और विज्ञान एजेंसियों के सहयोगात्मक प्रयासों से ही संभव हो सकी है। गुणवत्ता के साथ गति को मिलाकर, नियामक प्रणाली को भी बारीकी से जोड़ा गया है।
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एडीबी और भारत सरकार ने महाराष्ट्र में राज्य की सड़कों के सुधार के लिए 177 मिलियन डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए
एशियाई विकास बैंक (एडीबी) और भारत सरकार ने महाराष्ट्र में 450 किलोमीटर (किमी.) लम्बे राजमार्गों और राज्य की प्रमुख जिला सड़कों में सुधार करने के लिए आज 177 मिलियन डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए।
समझौते पर महाराष्ट्र राज्य सड़क सुधार परियोजना के हस्ताक्षरकर्ताओं में भारत सरकार की ओर से वित्त मंत्रालयमें आर्थिक मामलों के विभाग में अपर सचिव (निधि बैंक और एडीबी) श्री समीर कुमार खरेऔर एडीबी के लिए उसके कंट्री डायरेक्टर श्री केनिची योकोयामा ने हस्ताक्षर किए।
ऋण समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद, श्री खरे ने कहा कि परियोजना राज्य में ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी केन्द्रों के बीच सम्पर्क में सुधार करेगी, जिससे ग्रामीण लोगों को बेहतर बाज़ार, रोजगार के अवसर और सेवाएं मिल सकेंगी। बेहतर गतिशीलता से राज्य के प्रमुख शहरी केन्द्रों के बाहर से लेकर दूसरे स्तर के शहरों और कस्बों तक विकास होगा और आजीविका के अवसर बढ़ेंगे, जिससे आय में असमानता कम होगी।
श्री योकोयामा ने कहा कि परियोजना सड़क सुरक्षा परीक्षण ढांचा विकसित करके सड़क सुरक्षा उपायों को भी मजबूत करेगी जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर की सर्वोत्तम कार्य प्रणाली को अपनाने के बाद बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों जैसे कमजोर समूहों की रक्षा की जा सकेगी।विस्तृत जानकारी देते हुए, श्री योकोयामा ने कहा कि परियोजना की एक अन्य विशेषता सड़क रखरखाव प्रणाली में सुधार करना है। इसके लिए संपत्ति की गुणवत्ता और सेवा स्तरों को बनाए रखने के उद्देश्य से ठेकेदारों के लिए प्रदर्शन-आधारित 5-वर्षकी रखरखाव बंदिश को प्रोत्साहित किया जाएगा।
कुल मिलाकर यह परियोजना महाराष्ट्र के सात जिलों में 2 प्रमुख जिला सड़कों और 11 राज्य राजमार्गों की 450 किलोमीटर संयुक्त लंबाई वालीसड़कों में सुधार करेगी, और राष्ट्रीय राजमार्गों, अंतरराज्यीय सड़कों, बंदरगाह, हवाई अड्डों, रेल केन्द्रों, जिला मुख्यालयों, औद्योगिक क्षेत्रों, उद्यम समूहों और कृषि क्षेत्रों के लिए सम्पर्क में सुधार करेगी।
यह परियोजना महाराष्ट्र लोक निर्माण विभाग परियोजना के कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने पर अपना ध्यान केन्द्रित करेगी ताकि वे सड़क डिजाइन, सड़कों के रखरखाव की योजना और सड़क सुरक्षा करते समय जलवायु परिवर्तन के अनुकूल और आपदा को सहने की विशेषता के साथ अपनी क्षमता का निर्माण कर सकें।
एडीबी एक समृद्ध, समावेशी, लचीले और स्थायी एशिया और प्रशांत क्षेत्र को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है, जबकि अत्यधिक गरीबी को मिटाने के अपने प्रयासों को बनाए रखता है। 1966 में स्थापित, इसके68 सदस्य हैं जिनमें से 49 क्षेत्र से हैं।
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केन्द्रीय प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंव प्रौद्योगिकी संस्थान (सिपेट)का नाम बदलकर केन्द्रीय पेट्रोरसायन इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकीसंस्थान किया गया
सिपेट अब पेट्रोरसायन क्षेत्र के विकास पर पूरी तरह सेध्यान केन्द्रित कर सकेगा : गौड़ा
भारत सरकार के रसायन और उर्वरक मंत्रालय के अधीन केन्द्रीय प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंव प्रौद्योगिकी संस्थान (सिपेट) का नाम बदलकर केन्द्रीय पेट्रोरसायन इंजीनियरिंग और प्रोद्योगिकी संस्थान कर दिया गया है।
परिवर्तित नाम तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1975 (तमिलनाडु अधिनियम 27, 1975) के तहत पंजीकृत किया गया है। केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने कहा है कि अब सिपेट शिक्षण , कौशल विकास, प्रौद्योगिकी समर्थन और अनुसंधान पर ध्यान केन्द्रित करते हुए पूरी तरह से खुद को पेट्रो रसायन क्षेत्र के विकास के लिए समर्पित करने की स्थिति में होगा।
सिपेटका प्राथमिक उद्देश्य शिक्षा और अनुसंधान के माध्यम से प्लास्टिक उद्योग के विकास में योगदान करना रहा है। कई वर्षों की विकास प्रक्रिया से गुजरते हुए यह संस्थान प्लास्टिक के अभिनव प्रयोंगों पर आधारित ऐसे समाधान विकसित करने के लिए उद्योगों के साथ जुड़ रहा है जो संसाधनों के इस्तेमाल के मामले में युक्तिसंगत होने के साथ ही आसानी से बिकने वाले भी हैं।
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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने विद्युत मंत्रालय और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के कामकाज की समीक्षा की
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित समीक्षा बैठक में बिजली क्षेत्र से जुड़ी नीतिगत पहलों पर चर्चा की गई
प्रधानमंत्री ने कहा, ‘डिस्कॉम समय-समय पर अपने प्रदर्शन मापदंडों को प्रकाशित करें, ताकि लोगों को यह पता चल सके कि उनकी डिस्कॉम का प्रदर्शन समकक्ष कंपनियों की तुलना में कैसा है’
प्रविष्टि तिथि: 28 MAY 2020 7:35AM by PIB Delhi
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कल शाम विद्युत मंत्रालय और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के कामकाज की समीक्षा की। इस बैठक में बिजली क्षेत्र की प्रमुख समस्याओं के निवारण हेतु की गई विभिन्न नीतिगत पहलों पर चर्चा की गई जिनमें संशोधित टैरिफ नीति और बिजली (संशोधन) विधेयक 2020 भी शामिल हैं।
प्रधानमंत्री ने बिजली क्षेत्र की परिचालन क्षमता में वृद्धि और वित्तीय निरंतरता या स्थायित्व में बेहतरी सुनिश्चित करते हुए उपभोक्ता संतुष्टि बढ़ाने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने यह बात रेखांकित की कि विद्युत सेक्टर, विशेष रूप से बिजली वितरण क्षेत्र में जो समस्याएं हैं वे सभी क्षेत्रों और राज्यों में एक जैसी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि मंत्रालय को सभी राज्यों के लिए ठीक एक जैसा ही समाधान या सॉल्यूशन की तलाश करने के बजाय प्रत्येक राज्य को अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाने हेतु प्रोत्साहित करने के लिए राज्य-विशिष्ट समाधानों को प्रस्तुत करना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने विद्युत मंत्रालय को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी कि विद्युत वितरण कंपनियां (डिस्कॉम) समय-समय पर अपने प्रदर्शन मापदंडों को प्रकाशित करें, ताकि लोगों को यह पता चल सके कि उनकी डिस्कॉम का प्रदर्शन समकक्ष कंपनियों की तुलना में कैसा है। उन्होंने इस बात पर भी विशेष जोर दिया कि बिजली क्षेत्र में उपकरणों का उपयोग ‘मेक इन इंडिया’ के अनुरूप होना चाहिए।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने सोलर वाटर पंपों से लेकर विकेन्द्रीकृत सौर शीत भंडारणों तक की कृषि क्षेत्र की पूरी आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने रूफटॉप सोलर के लिए भी अभिनव मॉडल पर विशेष बल दिया और इसके साथ ही यह इच्छा जताई कि प्रत्येक राज्य में कम-से-कम एक शहर (या तो राजधानी शहर या कोई प्रसिद्ध पर्यटन स्थल) ऐसा हो, जो रूफटॉप सौर ऊर्जा के उत्पादन के माध्यम से पूरी तरह से सौर शहर हो। बैठक के दौरान भारत में इंगोट, वेफर, सेल और मॉड्यूल के निर्माण का अनुकूल परिवेश विकसित करने पर भी विशेष जोर दिया गया, जो विभिन्न तरह के अन्य लाभ प्रदान करने के अलावा रोजगार सृजन में भी मददगार साबित होगा।
प्रधानमंत्री ने ‘कार्बन मुक्त लद्दाख’ की योजना में तेजी लाने की इच्छा जताई और इसके साथ ही सौर एवं पवन ऊर्जा का उपयोग करके तटीय इलाकों में पेयजल आपूर्ति पर विशेष बल दिया।
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चमगादड़ों से कोरोना जैसे कई खतरनाक वायरस है मौजूद: शोध
चीन के वुहान से निकले कोरोना वायरस (corona virus) ने पूरी दुनिया में कोहराम मचा रखा है। यह महामारी अब तक करीब 56 लाख लोगों को अपनी चपेट में ले चुकी है जिनमें से करीब साढ़े तीन लाख लोगों की मौत हो चुकी है। लेकिन चीन में चमगादड़ों पर शोध के लिए मशहूर एक महिला वायरोलॉजिस्ट का कहना है कि कोरोना वायरस तो महज झांकी है, असली तस्वीर अभी बाकी है। उनका कहना है कि चमगादड़ों में कोरोना जैसे कई खतरनाक वायरस मौजूद हैं।
चीन की ‘बैट वूमैन’ ने नाम से मशहूर वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी की डिप्टी डायरेक्टर शी झेंगली ने कहा कि चमगादड़ जैसे जंगली जानवरों में कोरोना जैसे कई ज्यादा खतरनाक वायरस मौजूद हैं और अगर समय रहते उनका पता नहीं लगाया गया तो आने वाले दिनों में दुनिया को इस तरह की और महामारी का सामना करना पड़ सकता है। वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी वही लैब है जहां से कोरोना के फैलने की बात कही जा रही है।
झेंगली ने 2004 में वायरसों पर शोध शुरू किया था जब सार्स ने कहर ढाया था। तब से वह सभी तरह के चमगादड़ों का अध्ययन किया है। 2013 में उन्हें उस समय सफलता मिली जब उन्हें पता चला कि चमगादड़ का मल 96.2 फीसदी सार्स सीओवी-2 की तरह होता है। 2015 में उन्होंने अपने शोध में पाया था कि सार्स जैसे वायरस चमगादड़ से इंसान में आ सकता है।
क्या है चीन की ‘बैट वूमैन’ की सलाह?
झेंगली ने कहा कि वायरसों के बारे में हो रहे शोध के बारे में सरकारों और वैज्ञानिकों को पारदर्शी रुख अपनाने की जरूरत है। अगर हमें मानवता को अगली महामारी से बचाना है तो हमें जंगली जानवरों में पाए जाने वाले अंजान वायरसों पर शोध करना चाहिए और उनके बारे में अग्रिम चेतावनी देनी चाहिए। अगर हम उनके बारे में नहीं जानेंगे तो इससे भी बड़ी महामारी फैल सकती है। उन्होंने कहा कि कोरोना से निपटने के लिए पूरी दुनिया को मिलकर काम करने की जरूरत है।
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मध्यप्रदेश में 22,000 करोड़ रुपए की बहु-उद्देशीय परियोजनाओं के लिए समझौता ज्ञापन
ऊर्जा मंत्रालय के तहत केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम और भारत की अग्रणी एनबीएफसी ऊर्जा वित्त निगम (पीएफसी) ने आज यहां मध्य प्रदेश राज्य में 22,000 करोड़ रुपए की 225 मेगावाट क्षमता वाली पनबिजली परियोजनाओं और बहु-उद्देशीय परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिए मध्य प्रदेश सरकार की संपूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी नर्मदा बेसिन प्रोजेक्ट कंपनी लिमिटेड (एनबीपीसीएल) के साथ एक समझौता किया ।
समझौते से जुड़ें प्रमुख बिंदु
मध्य प्रदेश में 225 मेगावाट क्षमता की पनबिजली परियोजनाओं और 12 प्रमुख बहु-उद्देशीय परियोजनाओं के ऊर्जा घटकों की स्थापना के लिए एनबीपीसीएल धन मुहैया कराएगी।
इस समझौता ज्ञापन से पीएफसी को एनबीपीसीएल के साथ सक्रिय रूप से भागीदारी करने और 12 बड़ी बहु-उद्देशीय परियोजनाओं को लागू करने के राज्य सरकार के उद्यम के एक हिस्से के रूप में बहुद्देशीय परियोजनाओं के ऊर्जा घटकों के साथ ही 225 मेगावाट की क्षमता वाले पनबिजली संयंत्रों को धन मुहैया कराने में मदद मिलेगी।
इस समझौते के तहत बसानिया बहुद्देशीय परियोजना डिंडोरी, चिंकी बोरस बहुउद्देशीय परियोजना नरसिंहपुर रायसेन होशंगाबाद, सक्कर पेंच लिंक नरसिंहपुर छिंदवाड़ा, दुधी परियोजना छिंदवाड़ा होशंगाबाद इत्यादि जैसी कुछ बड़ी बहुउद्देशीय परियोजनाओं के लिए धन उपलब्ध कराया जाएगा।
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इंटरनेशनल क्रिमिनल पुलिस ऑर्गेनाइजेशन (इंटरपोल)
चर्चा में क्यों?
इंटरपोल ने भारतीय एजेंसियों के आग्रह पर भगोड़ा हीरा कारोबारी नीरव मोदी के भाई निहाल मोदी के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस को फिर से सार्वजनिक किया है। निहाल ने इंटरपोल द्वारा इसे जारी किए जाने के खिलाफ पिछले वर्ष अपील की थी लेकिन हाल में उसकी अपील नामंजूर हो गई, जिसके बाद इसे सार्वजनिक किया गया।
पृष्ठभूमि
बेल्जियम का नागरिक निहाल दीपक मोदी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा वांछित है। उसके बड़े भाई नीरव मोदी द्वारा पंजाब नेशनल बैंक के साथ कथित तौर की गई धोखाधड़ी के मामले में वह वांछित है। कथित अपराध की कड़ी को खत्म करने के लिए उस पर दुबई में साक्ष्यों को नष्ट करने के आरोप हैं।
भारतीय एजेंसियों के आग्रह पर इंटरपोल ने निहाल के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस (आरसीएन) जारी किया किया था और उसके बारे में ज्यादा सूचना जुटाने के लिए सार्वजनिक किया था। आरसीएन के माध्यम से पूरी दुनिया में कानून प्रवर्तन एजेंसियों से आग्रह किया जाता है कि प्रत्यर्पण होने तक किसी व्यक्ति को अस्थायी रूप से गिरफ्तार किया जाए, वह आत्मसमर्पण करे या इसी तरह की उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।
कमीशन फॉर कंट्रोल ऑफ इंटरपोल फाइल्स (सीसीएफ)
निहाल ने इसे कमीशन फॉर कंट्रोल ऑफ इंटरपोल फाइल्स (सीसीएफ) के समक्ष चुनौती दी थी। यह एक स्वतंत्र निकाय है जो सुनिश्चित करता है कि इंटरपोल के माध्यम से सभी निजी आंकड़े संगठन के नियमों के मुताबिक हों। पिछले वर्ष निहाल मोदी द्वारा आरसीएन को चुनौती देने का आग्रह प्राप्त होने के बाद इंटरपोल ने इसे आम लोगों की नजरों से दूर कर दिया था, लेकिन सदस्य देशों की कानून लागू करने वाली एजेंसियां इसे देख सकती थीं। सीसीएफ ने हाल में निहाल मोदी की याचिका खारिज कर दी और आरसीएन को फिर से सार्वजनिक कर दिया गया।
क्या है इंटरपोल?
इंटरनेशनल क्रिमिनल पुलिस ऑर्गेनाइजेशन यानी कि इंटरपोल एक संस्था है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुलिस के बीच समन्वय का काम करती है। इंटरपोल उन देशों के बीच समन्वय का काम करता है जो इस संस्था के सदस्य हैं। इंटरपोल की स्थापना का विचार सबसे पहले 1914 में मोनाको में आयोजित पहली अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक पुलिस कांग्रेस में रखा गया और उसके बाद इंटरपोल की स्थापना आधिकारिक रूप से 1923 में की गयी और इसका नाम ‘अंतर्राष्ट्रीय अपराध पुलिस आयोग’ रखा गया। बाद में साल 1956 में इसका नाम ‘इंटरपोल’ रखा गया। इंटरपोल मुख्य रूप से इन तीन प्रकार के अपराधों (काउंटर-टेरेरिज्म,साइबर अपराध,संगठित अपराध) के लिए अपनी पुलिस विशेषज्ञता और क्षमताओं का इस्तेमाल करता है।
इंटरपोल के प्रधान सचिवालय द्वारा, राष्ट्रीय केंद्रीय ब्यूरो (एनसीबी) और अधिकृत संस्थाओं के निवेदन पर 8 तरह के नोटिस जारी किए जाते हैं। ये नोटिस इंटरपोल की चार आधिकारिक भाषाओँ; अंग्रेजी, फ्रेंच, अरबी और स्पेनिश में प्रकाशित किए जाते हैं। इस तरह के नोटिस जारी करने के पीछे इंटरपोल का मकसद सदस्य देशों की पुलिस को सतर्क करना होता है ताकि संदिग्ध अपराधियों को पकड़ा जा सके या खोये हुए व्यक्तियों के बारे में जानकारी जुटाई जा सके।
रेड कॉर्नर नोटिस (Red Corner Notice)
पीला कार्नर नोटिस (Yellow Corner Notice)
ब्लैक कार्नर नोटिस (Black Corner Notice)
बैगनी नोटिस (Purple corner Notice)
ग्रीन कॉर्नर नोटिस (Green Corner Notice)
इंटरपोल-संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद विशेष सूचना (Interpol-United Nations Security Council Special Notice)
ऑरेंज कार्नर नोटिस (Orange Corner Notice)
ब्लू कॉर्नर नोटिस (Blue corner Notice)
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भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग के सभी सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।
भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग के कार्य:
कानून और नियमों के सफल क्रियान्वयन तथा परस्पर समन्वय के माध्यम से सकारात्मक प्रतिस्पर्द्धा और नवाचार को बढ़ावा देना।
उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना।
उपभोगताओं, औद्योगिक क्षेत्र, सरकार और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के बीच समन्वय को बढ़ावा देना।
अपने कार्यों में व्यावसायिकता और पारदर्शिता रखना तथा न-जागरूकता को बढ़ावा देना।
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भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग (The Competition Commission of India- CCI) गूगल के खिलाफ एक शिकायत की जाँच कर रहा है, जिसके तहत गूगल पर आरोप लगाया गया है कि वह देश में अपने मोबाइल भुगतान एप को गलत तरीके से बढ़ावा देने के लिये बाज़ार में अपनी मज़बूत स्थिति का दुरुपयोग कर रहा है।
प्रमुख बिंदु:
इस शिकायत में आरोप लगाया गया है कि गूगल अपने एप स्टोर (App Store) में ‘गूगल पे एप’ (Google Pay App) को अधिक प्रमुखता से दिखाता है, जो इसे अन्य प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के एप की तुलना में अनुचित बढ़त/लाभ प्रदान करता है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि गूगल के इस व्यवहार से उपभोक्ताओं को नुकसान हो रहा है।
गूगल के खिलाफ यह शिकायत फरवरी 2020 में दायर की गई थी परंतु अभी तक CCI ने शिकायतकर्त्ता की पहचान गोपनीय रखी है।
CCI द्वारा गूगल को इस मामले के बारे में सूचित कर दिया गया है, हालाँकि गूगल ने अभी तक इस मामले में अपना पक्ष नहीं रखा है।
गूगल पे (Google Pay):
यह गूगल द्वारा निर्मित एक मोबाइल भुगतान एप (Mobile Payment App) है।
यह एप उपभोक्ताओं को एक बैंक से दूसरे बैंक में धनराशि भेजने और बिल जमा करने जैसी सुविधाएँ प्रदान करता है।
भारतीय डिजिटल पेमेंट बाज़ार में इसका मुकाबला सॉफ्टबैंक समर्थित पेटीएम (PayTM) और वाॅलमार्ट के फोनपे (PhonePe) जैसे एप से है।
जाँच की प्रक्रिया:
वर्तमान में CCI के शीर्ष अधिकारियों द्वारा गूगल पर लगे इन आरोपों की समीक्षा की जा रही है, सामान्यतः ऐसे मामलों में दूसरे पक्ष (इस मामले में गूगल) को CCI के समक्ष अपना पक्ष रखने के लिये बुलाया जाएगा और उसके पश्चात आगे की कर्रवाई की जाएगी।
आरोपों की समीक्षा के बाद CCI इसकी व्यापक जाँच हेतु मामले को किसी जाँच इकाई को दे सकती है अथवा इसे रद्द भी किया जा सकता है।
गूगल पर अविश्वास के मामले:
भारत में गूगल के खिलाफ अविश्वास का यह तीसरा बड़ा मामला है।
वर्ष 2018 में CCI ने गूगल पर ‘ऑनलाइन सर्च में पक्षपात’ करने के मामले में 136 करोड़ रुपए का ज़ुर्माना लगाया था।हालाँकि गूगल ने इस फैसले के खिलाफ अपील की है जिसपर अभी फैसला आना बाकी है।
पिछले वर्ष CCI ने गूगल पर एक अन्य मामले में जाँच प्रारंभ की थी, जिसके तहत लगाए गए आरोपों के अनुसार, गूगल मोबाइल निर्माता कंपनियों द्वारा एंड्रॉइड मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम (Android Mobile Operating System) के वैकल्पिक संस्करणों को चुनने की क्षमता को कम करने के लिये बाज़ार में अपनी मज़बूत स्थिति का प्रयोग करता है।
भारतीय डिजिटल भुगतान बाज़ार:
पिछले कुछ वर्षों में देश में मोबाइल और अन्य तकनीकी के विकास के साथ डिजिटल भुगतान में भारी वृद्धि देखने को मिली है।
वर्ष 2019 में भारत का डिजिटल भुगतान बाज़ार लगभग 64.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था।
एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2023 तक भारत का डिजिटल भुगतान बाज़ार 20.2% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (Compound Annual Growth Rate-CAGR) की बढ़त के साथ लगभग 135.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच जाएगा।
साथ ही इसी दौरान वैश्विक स्तर पर भी भारतीय डिजिटल भुगतान बाज़ार की हिस्सेदारी 1.56% (वर्ष 2019) से बढ़कर 2.02% (वर्ष 2023) तक पहुँच जाएगी।
सितंबर 2019 में गूगल द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, भारत में गूगल के डिजिटल भुगतान एप पर सक्रिय उपभोक्ताओं की संख्या लगभग 670 लाख प्रतिमाह तक पहुँच गई थी।
चुनौतियाँ:
पिछले कुछ वर्षों में तकनीकी विकास और इंटरनेट के विस्तार का प्रभाव अन्य क्षेत्रों के साथ मुद्रा विनिमय और बाज़ार पर भी देखने को मिला है।
तकनीकी विकास जहाँ बाज़ारों को जोड़ने और व्यापार के नए अवसरों की खोज में सहायक रहा है, वहीं समय के साथ नियमों में अपेक्षित बदलाव और पारदर्शिता के अभाव में नियामकों की चुनौतियों में वृद्धि हुई है।
वर्तमान में डिजिटल तकनीकी क्षेत्र की कंपनियाँ विदेशी निवेश का एक बड़ा स्रोत हैं ऐसे में नियमों में सख्ती से देश में विदेशी कंपनियों द्वारा किया जाने वाला निवेश प्रभावित हो सकता है।
आगे की राह:
इंटरनेट और ई-व्यापार से जुड़ी चुनौतियों को देखते हुए CCI द्वारा प्रस्तुत ‘मार्केट स्टडी ऑन ई-कॉमर्स इन इंडिया’ (Market Study on E-commerce in India) नामक रिपोर्ट में कंपनियों द्वारा पारदर्शिता को बढ़ाने और स्व-नियामक प्रावधानों में वृद्धि किये जाने पर बल दिया था।
पक्षपात के मामलों में वृद्धि को देखते हुए National Company Law Appellate Tribunal-(NCLAT) द्वारा भी इस बात को दोहराया गया कि कि बड़ी कम्पनियाँ अपने हितों की रक्षा के लिये सकारात्मक प्रतिस्पर्द्धा के नियमों की अनदेखी नहीं कर सकती हैं।
भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग
(The Competition Commission of India- CCI):
भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग एक सांविधिक निकाय (Statutory Body) है।
भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग के कुल सदस्यों की संख्या 7 (एक अध्यक्ष और 6 अन्य सदस्य) निर्धारित की गई है।
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विभिन्न श्रम संघों ने उत्तरप्रदेश तथा मध्यप्रदेश सरकारों द्वारा लिये गए निर्णय की आलोचना की है और चेतावनी दी है कि यदि इन निर्णयों को क्रियान्वित किया जाता है तो श्रम कानूनों के मामले में भारत तकरीबन 100 वर्ष पीछे चला जाएगा।
विभिन्न विशेषज्ञों ने राज्य सरकारों के इन निर्णयों को श्रमिकों के ‘शोषण हेतु एक सक्षम वातावरण निर्मित करने’ के कदम के रूप में परिभाषित किया है।
श्रम कानूनों का निलंबन राज्यों में श्रमिकों के लिये गुलाम जैसी परिस्थितियों को जन्म देगा, जो कि स्पष्ट रूप से श्रमिकों के मानवाधिकार का उल्लंघन है।
विभिन्न ट्रेड यूनियनों ने राज्य सरकार के इस निर्णय को ‘श्रमिक वर्ग पर गुलामी की स्थिति लागू करने के लिये एक क्रूर कदम’ करार दिया है।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और श्रम कानून
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध एक विशिष्ट एजेंसी है, जिसकी स्थापना वर्ष 1919 में की गई थी।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना मुख्य तौर पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानवाधिकारों एवं श्रमिक अधिकारों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का आधार त्रिपक्षीय सिद्धांत है, जिसके तहत संगठन के भीतर आयोजित होने वाली वार्ताओं में सरकारों, श्रमिक संघों के प्रतिनिधियों और सदस्य राष्ट्रों के नियोक्ताओं को एक मंच पर लाया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं जैसे- महामंदी आदि में श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
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International Labour Organisation-ILO) ने भारत में श्रम कानूनों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस संबंध में राज्यों को स्पष्ट संदेश देने का आग्रह किया है।
प्रमुख बिंदु
गौरतलब है कि हाल ही में देश के 10 केंद्रीय श्रमिक संघों ने पत्र के माध्यम से देश में श्रम कानूनों के निलंबन के मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के समक्ष उठाया था और साथ ही इस विषय पर ILO के हस्तक्षेप की मांग की थी।
ILO की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है, जब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे कुछ अन्य राज्यों ने आर्थिक तथा औद्योगिक प्रगति का हवाला देते हुए आगामी 2-3 वर्षों के लिये बड़ी संख्या में श्रम कानूनों को निलंबित कर दिया है।
श्रम कानूनों का अर्थ और भारत में श्रम कानून
श्रम कानूनों का अभिप्राय कानून के उस खंड से होता है, जो रोज़गार, पारिश्रमिक, कार्य की शर्तों, श्रम संघों और औद्योगिक संबंधों जैसे मामलों पर लागू होते हैं।
श्रमिक, समाज के विशिष्ट समूह होते हैं। इस कारण श्रमिकों के लिये बनाए गए विधान, सामाजिक विधान की एक अलग श्रेणी में आते हैं।
‘श्रम’ भारतीय संविधान के अंतर्गत समवर्ती सूची (Concurrent List) का एक विषय है। राज्य विधानमंडल श्रम कानूनों को लागू कर सकते हैं, किंतु उन्हें केंद्र सरकार की मंज़ूरी की आवश्यकता होगी।
अनुमान के अनुसार, देश में श्रम से संबंधित 200 से अधिक राज्य कानून हैं और 50 केंद्रीय कानून हैं, हालाँकि इसके बावजूद देश में ‘श्रम कानूनों’ की कोई निर्धारित परिभाषा नहीं है।
सामान्य तौर पर भारतीय श्रम कानूनों को चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता है- (1) कार्य स्थिति से संबंधित श्रम कानून (2) मज़दूरी और पारिश्रमिक से संबंधित श्रम कानून (3) सामाजिक सुरक्षा से संबंधित श्रम कानून (4) रोज़गार सुरक्षा एवं औद्योगिक संबंध से संबंधित श्रम कानून।
भारतीय श्रम कानूनों की आलोचना
विशेषज्ञ भारतीय श्रम कानूनों को आमतौर पर ‘अनम्य’ (Inflexible) के रूप में परिभाषित करते हैं।
उदाहरण के लिये कुछ आलोचक तर्क देते हैं कि भारतीय श्रम कानूनों के कारण ही कुछ कंपनियाँ (जिनमें 100 से अधिक श्रमिक कार्यरत होते हैं) नए श्रमिकों को रोज़गार देने से हिचकिचाती हैं, क्योंकि फिर उन्हें श्रमिकों को काम से हटाने के लिये सरकार की मंज़ूरी की आवश्यकता होती है।
आँकड़े दर्शाते हैं कि श्रम कानूनों की ‘अनम्यता’ के कारण ही देश के संगठित क्षेत्र में भी औपचारिक अनुबंध के बिना श्रमिकों को रोज़गार देने की संस्कृति बढ़ती जा रही है।
इसके कारण एक ओर तो संगठन के विकास में बाधा आती है तो दूसरी श्रमिकों को भी रोज़गार सुरक्षा प्राप्त नहीं होती है।
श्रम कानूनों की आलोचना करते हुए यह भी तर्क दिया जाता है कि देश में इस प्रकार के कानूनों की संख्या काफी अधिक है, जिसके कारण अक्सर अनावश्यक जटिलता उत्पन्न होती है और इन कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
इस प्रकार यदि भारत में श्रम कानूनों की संख्या कम होगी और उन्हें आसानी से लागू किया जा सकेगा, तो कंपनियाँ बाज़ार के अनुरूप विस्तार कर सकेंगी और औपचारिक अनुबंध करने में सक्षम होंगी, जिसके परिणामस्वरूप श्रमिकों को बेहतर वेतन और सामाजिक सुरक्षा का लाभ प्राप्त हो सकेगा।
श्रम कानूनों में हुए हालिया परिवर्तन
COVID-19 महामारी के बीच, उत्पादन और मांग में कमी होने के कारण देश के अधिकांश उद्योग गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं, जिसके कारण केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के लिये अर्थव्यवस्था को पुनः पटरी पर लाना काफी चुनौतीपूर्ण बन गया है।
उद्योगों की इस तनावपूर्ण स्थिति को संबोधित करने के लिये उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे कुछ अन्य राज्यों ने अपने-अपने श्रम कानूनों में व्यापाक बदलाव किये हैं और उन्हें कुछ समय के लिये निलंबित कर दिया है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने अगले तीन वर्षों के लिये कुछ प्रमुख श्रम कानूनों को छोड़कर लगभग 35 श्रम कानूनों के प्रावधानों से व्यवसायों को छूट देने वाले अध्यादेश को मंज़ूरी दे दी है।
हालाँकि, बंधुआ मज़दूरी, बच्चों व महिलाओं के नियोजन संबधित श्रम अधिनियम और वेतन संदाय अधिनियम से संबंधित कानूनों में कोई छूट नहीं दी जाएगी।
इसी प्रकार मध्य प्रदेश सरकार ने भी अगले 1000 दिनों के लिये कई श्रम कानूनों को निलंबित कर दिया है।
मध्यप्रदेश द्वारा किये गए बदलावों के अनुसार, नियोक्ता अपने कर्मचारियों की सहमति से कारखानों में कार्य की अवधि 8 से 12 घंटे तक बढ़ा सकते हैं। सप्ताह में ओवरटाइम की अवधि अधिकतम 72 घंटे तक सुनिश्चित की जाएगी।
वहीं श्रम कानूनों के उल्लंघन के मामले में नियोक्ता को दंड से भी छूट प्रदान की गई है।
श्रम कानूनों में बदलाव की आलोचना
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'यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी' (European Space Agency- ESA) के 'स्वॉर्म' (Swarm) उपग्रहों द्वारा प्राप्त आँकड़ों के अध्ययन से दक्षिण अटलांटिक क्षेत्र के ऊपर ‘चुंबकीय विसंगति’ (Magnetic Anomaly) का पता चला है। चुंबकीय विसंगति पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में स्थानिक भिन्नता को बताता है।
प्रमुख बिंदु:
चुंबकीय विसंगति को 'दक्षिण अटलांटिक विसंगति' (South Atlantic Anomaly- SAA) के रूप में भी जाना जाता है।
'दक्षिण अटलांटिक विसंगति' का विस्तार दक्षिण अमेरिका से दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका तक है।
वर्ष 1970 के बाद से चुंबकीय विसंगति के आकार में लगातार वृद्धि देखी गई है तथा यह 20 किमी. प्रतिवर्ष की गति से पश्चिम की ओर बढ़ रही है।
दक्षिण अटलांटिक विसंगति (South Atlantic Anomaly- SAA):
‘दक्षिण अटलांटिक विसंगति’ अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के बीच के क्षेत्र में पृथ्वी के भू-चुंबकीय क्षेत्र के व्यवहार को संदर्भित करता है।
दक्षिण अटलांटिक विसंगति पृथ्वी के निकटस्थ उस क्षेत्र को बताता है जहाँ पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र, सामान्य चुंबकीय क्षेत्र की तुलना में कमज़ोर पाया गया है।
दक्षिण अटलांटिक विसंगति का कारण:
दक्षिण अटलांटिक विसंगति (SAA) एक ऐसा क्षेत्र है जहां पृथ्वी की ‘वान एलन रेडियशन बेल्ट' (Van Allen Radiation Belt) पृथ्वी की सतह के निकटतम आ जाती है।
दक्षिण अटलांटिक विसंगति क्षेत्र में 'वान एलन रेडियशन बेल्ट' की ऊँचाई सामान्य से 200 किमी. तक कम हो गई है। इससे इस क्षेत्र में ऊर्जावान कणों का प्रवाह बढ़ जाता है।
वान एलन रेडिएशन बेल्ट (Van Allen Radiation Belt):
किसी भी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र के कारण ग्रह के चारों तरफ आवेशित एवं ऊर्जावान कणों की एक ‘रेडिएशन बेल्ट’ (Radiation Belt) पाई जाती है।
‘वान एलन रेडिएशन बेल्ट’ पृथ्वी के चारों ओर विकिरण बेल्ट को संदर्भित करता है।
इन बेल्टों की खोज वर्ष 1958 में डॉ. जेम्स वान एलन तथा उनकी टीम द्वारा की गई थी। डॉ. जेम्स वान एलन के नाम पर ही पृथ्वी के रेडिएशन बेल्ट को ‘वान एलन रेडिएशन बेल्ट’ कहा जाता है।
बृहस्पति, शनि जैसे ग्रहों के भी समान रेडिएशन बेल्ट पाई जाती है।
ये बेल्ट पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर के आंतरिक भाग में पाई जाती है।
वान एलन रेडिएशन बेल्ट का निर्माण:
ऐसा माना जाता है कि रेडिएशन बेल्ट के मुख्य घटकों का निर्माण सौर पवन तथा कॉस्मिक विकिरणों से होता हैं। पृथ्वी के दो रेडिएशन बेल्ट हैं। एक ‘आंतरिक वान एलन रेडिएशन बेल्ट’ और दूसरा ‘बाहरी रेडिएशन बेल्ट’।
आंतरिक रेडिएशन बेल्ट:
आंतरिक बेल्ट पृथ्वी की सतह से 1000 किमी. से 6000 किमी. की ऊँचाई तक विस्तृत है।
आंतरिक बेल्ट में प्रोटॉन तथा इलेक्ट्रॉनों का एक संयोजन होता है।
बाह्य रेडिएशन बेल्ट:
बाह्य बेल्ट पृथ्वी सतह से 15,000 किमी. से 25,000 किमी. तक विस्तृत है।
बाह्य विकिरण बेल्ट में मुख्यत: ऊर्जावान तथा आवेशित इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं।
चुंबकीय क्षेत्र के कमज़ोर होने का कारण:
विगत 200 वर्षों में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में औसतन 9% की कमी हुई है। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में सबसे अधिक कमी SAA क्षेत्र में देखने को मिली है।
विगत 50 वर्षों में SAA के क्षेत्र में विस्तार हुआ है तथा यह लगातार पश्चिम की ओर बढ़ गया है।
SAA का प्रभाव:
‘मैग्नेटिक शील्ड’ (Magnetic Shield) चुंबकीय ध्रुव के स्थान को निर्धारित करने में मदद करता है। SAA प्रभाव के कारण पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव को फिर से निर्धारित करने की आवश्यकता हो सकती है।
‘मैग्नेटिक शील्ड’ (Magnetic Shield) अवांछित विकिरण को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, अत: SAA के कारण चुंबकीय विकिरण प्रभाव में वृद्धि हो सकती है।
यह वैश्विक उपग्रह एवं दूरसंचार प्रणाली को प्रभावित कर सकता है, स्मार्टफोन में मैपिंग एवं नेविगेशन प्रणाली भी इससे प्रभावित हो सकती है।
SAA के कारण पक्षियों का अंतर्राष्ट्रीय प्रवास प्रभावित हो सकता है। यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि पक्षी तथा जानवरों का मौसमी प्रवास पृथ्वी के बाह्य वायुमंडल में परिवर्तन से प्रभावित होता है।
निष्कर्ष:
दक्षिण अटलांटिक विसंगति के बारे में भी वैज्ञानिक समझ अपर्याप्त है, अत: भविष्य में इसका क्या प्रभाव होगा यह अभी अज्ञात है, लेकिन विभिन्न शोधों के अनुसार भविष्य में पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। इसलिये संचार व्यवस्था में आवश्यक सुरक्षा उपायों को अपनाना चाहिये ताकि संचार व्यवस्था विकरण प्रभावों से न्यूनतम प्रभावित हो।
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एक चीन नीतियह चीन के उस पक्ष का कूटनीतिक समर्थन है कि विश्व में सिर्फ एक चीन है और ताइवान चीन का ही एक हिस्सा है।
एक नीति के तौर पर इसका अर्थ है कि ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ (चीनी जन-गणराज्य या पी.आर.सी.,जो चीन का मुख्य भू-भाग है) से कूटनीतिक संबंधों के इच्छुक देशों को ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ (चीनी गणराज्य या आरओसी यानी ताइवान) से संबंध तोड़ने होंगे।
इस नीति के तहत अधिकांश देशों के औपचारिक संबंध ताइवान के बजाय चीन के साथ हैं। ताइवान को चीन अपने से टूटकर अलग प्रदेश मानता है, जो एक दिन मुख्य चीन में मिल जाएगा।
यद्यपि ताइवान की सरकार का यह मानना है कि यह एक स्वतंत्र देश है, जो औपचारिक रूप से ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ कहा जाता है, लेकिन इस नीति (एक चीन नीति) के कारण ताइवान अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से पृथक् पड़ गया है।
दक्षिण चीन सागर विवादसर्वप्रथम वर्ष 1947 में मूल रूप से चीन गणराज्य की कुओमितांग सरकार ने ‘इलेवन डैश लाइन’ (Eleven Dash line) के माध्यम से दक्षिण चीन सागर में अपने दावों को प्रस्तुत किया था।
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा मुख्य भूमि चीन पर अधिकार करने और वर्ष 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का गठन करने के बाद टोंकिन की खाड़ी को इलेवन डैश लाइन से बाहर कर दिया गया। परिणामस्वरूप इलेवन डैश लाइन को अब ‘नाईन डैश लाइन’ (दक्षिण चीन सागर पर चीन द्वारा खींची गई 9 आभासी रेखाएँ) के नाम से जाना जाने लगा।
‘नाईन डैश लाइन’ के कारण दक्षिण चीन सागर में दावेदारी को लेकर चीन व ताइवान के बीच अक्सर विवाद होता रहता है।
एक चीन नीति का उद्भव
इस नीति की शुरुआत 1949 से होने लगी थी, जब चीनी गृहयुद्ध के पश्चात् हारी हुई सत्ताधारी राष्ट्रवादी पार्टी जिसे ‘कुओमिंतांग’ भी कहा जाता है, ताइवान लौटी और च्यांग काई शेक के नेतृत्व में वहीं ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना की गई। जबकि जीते हुए साम्यवादियों ने ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की घोषणा की। दोनों पक्षों ने यह दावा किया कि वे पूर्ण चीन का प्रतिनिधित्व करते हैं।
तब से चीन के सत्ताधारी कम्युनिस्ट दल ने यह धमकी दी है कि अगर ताइवान स्वयं को कभी भी औपचारिक रूप से स्वतंत्र घोषित करता है तो वह उस पर बल प्रयोग करेगा, लेकिन हालिया वर्षों में उसने इस द्वीप के साथ नरम कूटनीतिक तरीके को अपनाया है।
शुरुआत में अमेरिका समेत कई देश साम्यवादी चीन के बजाय ताइवान को तरजीह देते रहे थे, लेकिन कूटनीतिक रुख तब बदलने लगा जब 1970 के दशक की शुरुआत में चीन और अमेरिका ने रिश्ते बनाने की पारस्परिक आवश्यकताओं को समझा और उसके बाद अन्य देश बीजिंग के पक्ष में ताइपे (ताइवान की राजधानी) से रिश्ते तोड़ने लगे।
हालाँकि अब भी कई देश ताइवान के साथ व्यापार कार्यालयों या सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा अनौपचारिक संबंध बनाए हुए हैं और अमेरिका ताइवान का सबसे महत्त्वपूर्ण सुरक्षा और व्यापार मित्र देश है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कौन विजेता बना?
बीजिंग अपने दावे को मज़बूती से आगे बढ़ाने में सक्षम रहा है और इस नीति से उसको सबसे अधिक फायदा हुआ है, जिससे ताइवान कूटनीतिक रूप से कमज़ोर हो गया है।
पूर्व में ताइवान (रिपब्लिक ऑफ चाइना) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का हिस्सा था। शीतयुद्ध के दौरान ताइवान को अमरीका का पूरा समर्थन मिला हुआ था, परंतु फिर हालात एकदम से बदल गए।
ताइवान के लिये वर्ष 1971 के बाद से चीजें बदलने लगी। अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन को पहचान दी और यह कहा कि ताइवान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से हटना होगा। वर्ष 1971 से चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का हिस्सा हो गया और वर्ष 1979 में ताइवान की संयुक्त राष्ट्र से आधिकारिक मान्यता खत्म हो गई और तब से ताइवान का पतन शुरू हो गया।
विश्व के अधिकतर देशों और यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा भी ताइवान को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं दी गई है।
अब विश्व भर में केवल 16 देश ही ताइवान को एक देश के रूप में मान्यता प्रदान कर रहे हैं, जिसमें से प्रशांत महासागर के पाँच छोटे द्वीपीय देश शामिल हैं। भारत ताइवान को अलग देश के रूप में मान्यता नही प्रदान करता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका
संयुक्त राज्य अमेरिका को ताइवान का महत्वपूर्ण मित्र और सहयोगी माना जाता है।
परंतु वर्ष 1970 में आर्थिक प्रगति के बाद अमेरिका नए बाजार तलाश रहा था। उस समय चीन की आबादी 60 करोड़ थी जबकि ताइवान की महज़ एक करोड़ के आसपास। ऐसे में अमेरिकी कॉर्पोरेट चाहते थे कि अमरीका चीन को मान्यता दे, तो इस तरह से ताइवान यहाँ कमजोर पड़ गया।
एक चीन नीति पर भारत का दृष्टिकोण
चीन के कई पड़ोसियों की तरह भारत ने भी हालिया वर्षों में चीनी विदेश नीति के अधिक स्वीकारात्मक और राष्ट्रवादी विचार को ही अपनाया है।
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इन द्विपक्षीय संबंधों में कई बार घर्षण उत्पन्न हुआ, जैसे–विवादित सीमाओं पर चीन द्वारा भारत में घुसपैठ करना, पाकिस्तान आधारित आतंकवादियों पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा आरोपित प्रतिबंधों को रोकने के चीन के प्रयासों के बाद और भारतीय प्रधानमंत्री एवं दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा, जिसके अधिकतर हिस्से को चीन के द्वारा ‘दक्षिणी तिब्बत’ कहा जाता है, आदि।
हाल ही में ताइवान से तनाव के क्रम में चीन ने भारत से एक चीन नीति का समर्थन करने की अपील की है।
भारत को इस स्थिति में चीन को कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के ऊपर भारतीय संप्रभुता को स्वीकार करने के लिये विवश करना होगा।
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चीन-ताइवान संबंधों का मूल्यांकन करते हुए भारत की भूमिका की समीक्षा
वैश्विक महामारी COVID-19 से जुड़ी जानकारी छिपाने के मुद्दे पर चौतरफा घिरा चीन अमेरिका सहित दुनिया के तमाम देशों के निशाने पर है। अब चीन के भीतर भी शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं। इससे वैश्विक व्यवस्था तथा जनता का ध्यान भटकाने के लिये चीन का शीर्ष नेतृत्व अब राष्ट्रवाद के बहाने भारत के साथ सीमा पर लगातार तनाव बढ़ा रहा है और साथ ही उसने ताइवान की तरफ दो विमानवाहक पोतों को रवाना कर दिया गया है। चीन के इस कदम से ताइवान पर हमले की आशंका बढ़ गई है।
ताइवान पर दबाव बढ़ाने के लिये चीन ने दक्षिण चीन सागर में एक नौ-सैन्य अभ्यास प्रारम्भ किया है। इस बीच संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी दक्षिण चीन सागर में अपने विमानवाहक पोत तैनात कर दिया है, वैश्विक महामारी COVID-19 के बीच ताइवान दक्षिण चीन सागर में संयुक्त राज्य अमेरिका व चीन के बीच तनाव का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। इसके साथ ही ताइवान के World Health Assembly में शामिल होने के प्रयास से भी चीन को झटका लगा था।
इस आलेख में ताइवान की भौगोलिक स्थिति, चीन-ताइवान इतिहास, चीन-ताइवान के बीच विवाद के कारण, तथा ‘एक देश दो प्रणाली’ और ‘एक चीन नीति’ के मुद्दे पर विमर्श करने के प्रयास किया जाएगा।
ताइवान की भौगोलिक स्थिति
ताइवान पूर्व एशिया का एक द्वीप है। यह द्वीप अपने आस-पास के द्वीपों को मिलाकर चीनी गणराज्य का अंग है, इस गणराज्य का मुख्यालय ताइवान द्वीप है।
ऐतिहासिक व सांस्कृतिक दृष्टि से यह मुख्य भूमि (चीनी जन-गणराज्य या पी.आर.सी.) का अंग रहा है, परंतु इसकी स्वायत्तता व स्वतंत्रता को लेकर चीनी जन-गणराज्य (People’s Republic of China-PRC) और चीनी गणराज्य (Republic of China-ROC) जिसे अब ताइवान के नाम से जानते हैं के बीच विवाद है।
ताइवान की राजधानी ताइपे एक वित्तीय केंद्र भी है, जो ताइवान के उत्तरी भाग में स्थित है।
ताइवानी लोग अमाय (Amoy), स्वातोव (Swatow) और हक्का (Hakka) भाषाएँ बोलते हैं। मंदारिन (Mandarin) राजकार्यों की भाषा है।
चीन-ताइवान इतिहास
चीन के प्राचीन इतिहास में ताइवान का उल्लेख बहुत कम मिलता है, परंतु प्राप्त प्रमाणों के अनुसार ज्ञात होता है कि तांग राजवंश (618-907ई.) के समय से चीनी लोग मुख्य भूमि से निकलकर ताइवान में बसने लगे थे।
वर्ष 1624 से 1661 तक चीन एक डच (वर्तमान में नीदरलैंड) उपनिवेश था।
17वीं शताब्दी में चीन में मिंग वंश का पतन हुआ, और मांचू लोगों ने चिंग वंश की स्थापना की।
वर्ष 1683 से 1895 तक मुख्य भूमि चीन पर ताइवान का शासन था।
वर्ष 1895 में, जापान ने पहला चीन-जापानी युद्ध जीता और युद्ध के बाद ताइवान जापान के नियंत्रण में आ गया।
द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की पराजय के बाद पाट्सडैम (1945), काहिरा (1946) की घोषणाओं के मुताबिक ताइवान पर राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी का अधिकार फिर से मान लिया गया।
अगले कुछ वर्षों में चीन में हुए गृहयुद्ध से माओत्से तुंग (Mao Tse Tung) के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने चियांग काई शेक (Chiang Kai-shek) के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी को पराजित किया था।
कम्युनिस्टों से हार के बाद राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी ने ताइवान में अपनी सरकार बनाई। वर्ष 1951 में सैन फ्रांसिस्को की संधि के अनुसार, जापान ने ताइवान से अपने स्वधिकारों को समाप्त घोषित कर दिया।
वर्ष 1952 में ताइपे में चीन-जापान संधि वार्ता हुई। किंतु किसी भी संधि में ताइवान पर चीन के नियंत्रण का कोई संकेत नहीं किया गया।
विवाद का कारण
एक देश दो प्रणालीडेंग शियाओपिंग (Deng Xiaoping) द्वारा वर्ष 1970 के आसपास देश के शासन की बागडोर संभालने के बाद एक देश दो प्रणाली (One Country Two Systems) नीति प्रस्तावित की गई थी। डेंग की इस योजना का मुख्य उद्देश्य चीन और ताइवान को एकजुट करना था।
इस नीति के माध्यम से ताइवान को उच्च स्वायत्तता देने का वादा किया गया था। इस नीति के तहत ताइवान चीनी संप्रभुता के अंतर्गत अपनी पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली का पालन कर सकता है, एक अलग प्रशासन चला सकता है और अपनी सेना रख सकता है। हालाँकि ताइवान ने कम्युनिस्ट पार्टी के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
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एफएआईटीएच परीक्षण
FAITH Trial
COVID-19 की उपचार रणनीति के तहत ‘ग्लेनमार्क फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड’ (Glenmark Pharmaceuticals Ltd.), एफएआईटीएच परीक्षण (FAITH Trial) से संबंधित अध्ययन शुरू करेगा।
प्रमुख बिंदु:
यह एक नया संयोजन नैदानिक परीक्षण है जिसे एफएआईटीएच (FAvipiravir+UmIfenovir Trial in Indian Hospital -FAITH) कहा जाता है।
संभावित COVID-19 उपचार रणनीति के रूप में इस परीक्षण में दो एंटीवायरल दवाओं [फेविपिराविर (Favipiravir) एवं उमिफेनोविर (Umifenovir)] की संयुक्त प्रभावकारिता का परीक्षण करने के लिये एक नया यादृच्छिक, ओपन-लेबल अध्ययन शामिल है।
इन दोनों एंटीवायरल ड्रग्स/दवाओं के कार्य करने के अलग-अलग तंत्र हैं और उनका संयोजन, रोग के प्रारंभिक चरण के दौरान रोगियों में उच्च वायरल की स्थिति के दौरान प्रभावी ढंग से निपटने में बेहतर उपचार प्रभावकारिता प्रदर्शित कर सकता है
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28 मई को स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर की जन्म वर्षगाँठ के रूप में मनाया गया। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने विनायक दामोदर सावरकर को श्रद्धांजली अर्पित की और कहा कि देश सदैव विनायक दामोदर सावरकर के बलिदान को याद रखेगा।
विनायक दामोदर सावरकर (1883-1966)
विनायक दामोदर सावरकर को वीर सावरकर के नाम से जाना जाता था, उनका जन्म 28 मई, 1883 को महाराष्ट्र के नासिक में हुआ था।
वे एक स्वतंत्रता सेनानी थे, उन्होंने 1887 की क्रांति को स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध कहा था।
उन्होंने पुणे में अभिनव भारत सोसाइटी नामक संगठन की थी लन्दन में उन्होंने फ्री इंडिया सोसाइटी का गठन किया।
विनायक दामोदर सावरकर ने “जोसफ मैजिनी – जीवन कथा व राजनीती” नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने 1857 की क्रान्ति पर “द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस” नामक पुस्तक का प्रकाशन किया था। इसके अलावा उन्होंने रत्नागिरी में कैद के दौरान “हिंदुत्व – हु इस हिन्दू” नामक पुस्तक भी लिखी।
हालांकि वे हिन्दू महासभा के संस्थापक नही थे, परन्तु वे 1937 से 1943 के बीच हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे।
वीर सावरकर ने भारत को “हिन्दू राष्ट्र” के रूप में एक निर्मित किये जाने का समर्थन किया, उन्होंने राष्ट्रवादी राजनीतिक विचारधारा “हिंदुत्व” के विकास किया।
उनके सम्मान में अंडमान व निकोबार के पोर्ट ब्लेयर के हवाईअड्डे का नाम वीर सावरकर अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा रखा गया है।
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नासा के लिए स्पेस एक्स की ऐतिहासिक पहली मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान 27 मई को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए रवाना होने वाली थी। अब इस मिशन को ख़राब मौसम के कारण शनिवार तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। इस मिशन को डेमो-2 कहा जाता है और यह नासा के दो अंतरिक्ष यात्रियों बॉब बेहेनकेन और डग हर्ले को इस कक्षा में लॉन्च करेगा। स्पेस एक्स के क्रू ड्रैगन अंतरिक्ष यान का उपयोग एक फाल्कन 9 रॉकेट का उपयोग किया जायेगा। 2011 से, नासा ने अपने सभी अंतरिक्ष यात्रियों को रूस के सोयूज कैप्सूल के माध्यम से भेजा है।
स्पेस एक्स
स्पेस एक्स एक निजी अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी है। इसकी स्थापना एलोन मस्क द्वारा 6 मई, 2002 को की गयी थी। एलोन मस्क स्पेस एक्स के वर्तमान सीईओ हैं। इस अन्तरिक्ष एजेंसी की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य अन्तरिक्ष परिवहन की लागत कम करना तथा मंगल गृह पर मानव बस्ती की स्थापना करना है। स्पेस एक्स ने फाल्कन रॉकेट्स की श्रृंखला तैयार की है। अंतिरक्ष परिवहन की लागत को कम करने के लिए स्पेस एक्स ने री-यूजेबल रॉकेट्स (पुनः इस्तेमाल किये जा सकने वाले राकेट) निर्मित किये हैं। इन रॉकेट्स के अधिकत्तर हिस्सों को अन्य लांच में भी इस्तेमाल किया जाता है।
