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14 मई की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ 1610 – फ्रांस में हेनरी IV की हत्या हुई और लुईस XIII फ्रांस की गद्दी पर बैठा। 1702 – इंग्लैंड और नीदरलैंड ने फ्रांस और स्पेन के खिलाफ़ युद्ध की घोषणा की। 1719 - न्यू फ्रांस ने स्पेन के साथ युद्ध में बिएनविल, पेंसाकोला पर कब्जा किया। 1767 - ब्रिटिश सरकार ने चाय पर अमेरिकियों का आयात शुल्क घटाया। 1796 - इंग्लैंड में एडवर्ड जेनर ने पहले चेचक का टीकाकरण किया था। 1800 - द्वितीय गठबंधन: जनरल लूयस-एलेक्जेंडर बेर्थियर के तहत फ्रांसीसी सेनाएं ओस्टा घाटी में फोर्ट बर्द में 400 ऑस्ट्रो-पिदममोन सैनिकों द्वारा रोकी गई। 1811 – पराग्वे स्पेन की पराधीनता से मुक्त हुआ। 1870 - नेल्सन फुटबॉल क्लब और नेल्सन कॉलेज के बीच न्यूजीलैंड में पहला रग्बी मैच खेला गया। 1872 – प्रथम श्रेणी क्रिकेट में सरे के खिलाफ एमसीसी के पहले 7 विकेट शून्य के स्कोर पर गिरे। 1878 – पहली बार वैसलीन नाम का रॉबर्ट ए चेसब्राफ ने पंजीकृत करवाया था। 1879 – थॉमस एडिसन यूरोप की एडिसन टेलीफोन कंपनी से जुड़े। 1908 – पहली बार किसी व्यक्ति ने हवाई जहाज में उड़ान भरी। 1912 - चीन ने छह बिजली रेल ऋण समझौते को मना किया। 1914 - वुडरो विल्सन ने मातृ दिवस की घोषणा पर हस्ताक्षर किए।  1941 – 36,000 परशियन यहूदी को गिरफ्तार किया गया। 1944 – ब्रिटिश सैनिकों ने कोहिमा पर कब्जा किया। 1948 – इजराइल ने ब्रिटेन से स्वतंत्रता की घोषणा की। 1963 – कुवैत संयुक्त राष्ट्र का 111 वां सदस्य बना। 1973 – अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने सेना में महिलाओं के समान अधिकार को मंजूरी दी। 1992 – भारत ने तमिल टाइगर्स के नाम से मशहूर श्रीलंकाई विद्रोही संगठन एलटीटीई पर प्रतिबंध लगा दिया था। संयुक्त राष्ट्र और भारत समेत 32 देशों ने उसे आतंकवादी संगठन करार दिया। 1999 - पाकिस्तानी पत्रकार जनम सेठी की पत्रिका फ़्राइडे टाइम्स की जब्ती। 1999- सदी का आखिरी विश्व कप क्रिकेट की लॉडर्स (इंग्लैंड) में शुरुआत। इस पंचांग को सीधे प्राप्त एवं सभी तरह की लेटेस्ट खबरों के लिए "हरियाणा एजुकेशनल अपडेट" फेसबुक पेज ज्वाइन करें। 2001 - भारत और मलेशिया में सात समझौते। 2004 - डेली मिरर नामक पत्रिका ने ईराक में युद्धबंदियों पर कथित अत्याचार को दर्शाने वाली झूठी तस्वीरों के प्रकाशन के लिए ब्रिटेन से माफी मांगी। 2006 - पूर्व कम्यूनिस्ट नेता गिओर्गिओ नैपोलितानों इटली के नये राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित। 2006 - चीन ने कला के स्तर पर चल रही जालसाजी से बचने के लिए एक आयोग का गठन किया। 2007 - जापान ने अपने शांतिवादी संविधान में संशोधन सम्बन्धी विधेयक को मंजूरी दी। 2008 - टाइम्स एनआईई ने इंटरनेशनल न्यूजपेपर मार्केटिंग एसोसियेशन (इनमा) अवार्ड-2008 जीता। 2010- भारत-रूस के बीच रक्षा, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, हाइड्रोकार्बन, व्यापार एवं निवेश आदि में 22 समझोते हुए। 2012 – इजरायल की जेलों में बंद 1500 फिलीस्तीनी कैदी भूख हड़ताल समाप्त करने पर सहमत हुए। 2013 – ब्राजील समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाला 15वां देश बना। 2019 - भारत ने अमेरिका पर जवाबी शुल्क की समय सीमा बढ़ाई। 14 मई को जन्मे व्यक्ति 1657 - शम्भाजी - शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र और उत्तराधिकारी थे। 1883 - अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर - प्रसिद्ध न्यायविद, अधिवक्ता और शिक्षाशास्त्री थे। 1892 - अरुण चन्द्र गुहा - प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिक कार्यकर्ता। 1923 - मृणाल सेन, भारतीय फ़िल्मों के प्रसिद्ध निर्माता व निर्देशक। 1984 – फेसबुक के संस्थापक मार्क एलियट ज़ुकेरबर्ग का जन्म । 1987 - ज़रीन खान एक भारतीय अभिनेत्री व मॉडल। 1997- मानुषी छिल्लर - सौन्दर्य प्रतियोगिता की विजेता । जिन्हें विश्व सुन्दरी 2017 के ताज से नवाज़ा गया। 1998 - तरूनी सचदेव - भारतीय मॉडल एवं बाल अभिनेत्री 14 मई को हुए निधन 1923 - एन.जी. चन्दावरकर - भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे। 1943 - अल्ला बख़्श - अंग्रेज़ी शासन के दौरान एक जमींदार, सरकारी ठेकेदार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं राजनेता थे। 1963 - डॉक्टर रघुवीर, प्रख्यात विद्वान् तथा राजनीतिक नेता। "हरियाणा एजुकेशनल अपडेट" फेसबुक पेज ज्वाइन करें। 1978 - जगदीशचन्द्र माथुर - प्रसिद्ध नाटककार। 2012 - तरुनी सचदेव -भारतीय मॉडल एवं बाल अभिनेत्री (जन्मदिन भी आज के दिन था )। 2016 - कंडासामी कुप्पुसामी- तमिल विद्वान् एवं लेखक। 14 मई के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव छत्रपति श्री शम्भाजी महाराज जयन्ती। डॉ. श्री रघुवीर स्मृति दिवस ।

BBC कोरोना दिनभर

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" सुर्खियों । : कोविड. - 19 सक्रमंण और भारतीय नागरिक को इससें बाहर निकालने पर चर्चा"

Spotlight Discussion On :- रेलवे बोर्ड के चैयरमेन से बातचीत"

" सामयिकी :- कोरोना वायरस सक्रमंण पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉक्टर तमंय से आकाशवाणी सवांददाता आनंद श्रीवास्तव की बातचीत"

ब्रिटेन की विपक्षी लेबर पार्टी के नव-निर्वाचित नेता कीर स्टारमर (Keir Starmer) द्वारा लेबर फ्रेंड्स ऑफ इंडिया (Labour Friends of India-LFI) समूह के साथ अपने पहले संवाद के दौरान कहा गया कि कश्मीर ‘भारत और पाकिस्तान के बीच ऐसा द्विपक्षीय मुद्दा है जिसे शांतिपूर्वक हल किया जा सकता था’। प्रमुख बिंदु: स्टारमर द्वारा ‘लेबर फ्रेंड्स ऑफ इंडिया’ के समहू के साथ अपने वक्तव्य में भारत के साथ मज़बूत व्यापारिक संबंध बनाने पर ज़ोर दिया गया। कीर स्टारमर द्वारा इस बात पर बल दिया गया कि उनके नेतृत्त्व की लेबर पार्टी सरकार द्वारा भारत के साथ मज़बूत व्यापारिक संबंध कायम करने के अलावा वैश्विक मंच पर जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर सहयोग करने के लिये दृढ़ संकल्पित होगी। लेबर पार्टी का पूर्व रुख: पिछले कुछ समय से भारतीय डायस्पोरा के साथ लेबर पार्टी के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। इन संबंधों में तनाव की स्थिति विशेष रूप से तब ओर बढ़ी जब इसके प्रतिनिधियों द्वारा सितंबर 2019 में एक आपातकालीन नीति प्रस्ताव पारित कर अनुच्छेद 370 को रद्द करने के भारत के फैसले की आलोचना की। पार्टी द्वारा कहा गया कि कश्मीर के संबंध में वहाँ के लोगों को आत्मनिर्णय का अधिकार होना चाहिये। लेबर पार्टी एवं भारतीय प्रवासियों के संबंधों का महत्त्व: ब्रिटेन में भारतीय सबसे बड़े प्रवासी जातीय समुदाय के रूप में हैं, जिनकी संख्या 1.5 मिलियन से भी अधिक है। ब्रिटेन की कुल आबादी में भारतीय का प्रतिशत 2.3 से भी अधिक है जो किसी भी पार्टी के लिये एक महत्त्वपूर्ण वोट बैंक हो सकता हैं। वर्ष 2017 के आम चुनावों में ब्रिटेन में रहने वाले 50 प्रतिशत भारतीयों ने लेबर को वोट दिया था। लेबर पार्टी के घोषणापत्र में भारत: भारत की स्वंत्रता के पहले से ही, ब्रिटेन के कई ‘चुनाव घोषणा पत्रों’ में भारत से संबंधित मुद्दों को शामिल किया जाता रहा हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे इस प्रकार हैं - वर्ष 1945 में भारत की स्वंत्रता का मुद्दा लेबर पार्टी के ‘चुनावी घोषणापत्र’ में शामिल किया गया था जिसमें भारतीयों के लिये ज़िम्मेदार स्व-सरकार (Self-Government) प्रदान करने की बात शामिल थी। वर्ष 1947 में क्लीमेंट रिचर्ड एटली (Clement Richard Attlee) ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने जिनके द्वारा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम,1947 पारित किया गया था। वर्ष 2019 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए एक औपचारिक माफीनामा।

COVID चटाई COVID Mat हाल ही में केरल सरकार ने बताया कि रोगज़नकों (जैसे- वायरस, बैक्टीरिया आदि) को घरों, कार्यालयों, दुकानों एवं संस्थानों में प्रवेश करने से रोकने के लिये ‘केरल स्टेट कोइर कॉरपोरेशन’ (Kerala State Coir Corporation) जल्द ही ‘COVID चटाई’ (COVID Mat) लॉन्च करेगा। प्रमुख बिंदु: ‘केरल स्टेट कोइर कॉरपोरेशन’ ने इस चटाई के तीन मॉडल पेश किये हैं जिन्हें ‘श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी’ द्वारा अंतिम रूप दिया जा रहा है। ‘COVID चटाई’ को तैयार करने के लिये रबर या प्लास्टिक से बने होल्डिंग ट्रे में फाइबर मैट/बीसी20 मैट को लगाया जाएगा और कीटाणुनाशक को संतृप्त होने तक चटाई पर डाला जाएगा। जब कोई व्यक्ति नंगे पैर या जूता पहने हुए चटाई पर कदम रखेगा तो कीटाणुनाशक उसे साफ कर देगा। ‘COVID चटाई’ पर पानी एवं कीटाणुनाशक को प्रत्येक तीन दिन में बदलना होगा। इस चटाई’ के विकास में ‘राष्ट्रीय कोइर अनुसंधान एवं प्रबंधन संस्थान’ (National Coir Research and Management Institute) ‘केरल स्टेट कोइर कॉरपोरेशन’ की मदद कर रहा है। राष्ट्रीय कोइर अनुसंधान एवं प्रबंधन संस्थान’ (National Coir Research and Management Institute- NCRMI): NCRMI एक ऐसा संगठन है जो कोइर (नारियल रेशे) के पारंपरिक क्षेत्र में विभिन्न अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं की खोज कर रहा है। इसे वर्ष 1994 में केरल के कोइर क्षेत्र की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये C-DOCT नाम से स्थापित किया गया था। यह त्रावणकोर-कोचीन साहित्यिक वैज्ञानिक एवं धर्मार्थ सोसायटी अधिनियम, 1956 (Travancore-Cochin Literary Scientific and Charitable Societies Act 1956) के तहत पंजीकृत है।

सोहराई खोवर पेंटिंग और तेलिया रूमाल Sohrai Khovar Painting and Telia Rumal 12 मई, 2020 को झारखंड की ‘सोहराई खोवर पेंटिंग’ (Sohrai Khovar Painting) और तेलंगाना के ‘तेलिया रुमाल’ (Telia Rumal) को 'भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री' (Geographical Indications Registry) द्वारा GI टैग दिया गया। प्रमुख बिंदु: ‘सोहराई खोवर पेंटिंग’ झारखंड के हज़ारीबाग ज़िले में स्थानीय एवं प्राकृतिक रूप से विभिन्न रंगों की मिट्टी का उपयोग करते हुए फसल के मौसम एवं शादी-समारोह के दौरान स्थानीय आदिवासी महिलाओं द्वारा प्रचलित एक पारंपरिक एवं अनुष्ठानिक भित्ति कला है। यह पेंटिंग मुख्य रूप से हज़ारीबाग ज़िले में ही प्रचलित है। हालाँकि हाल के वर्षों में इसके प्रचार-प्रसार के कारण इसे झारखंड के अन्य हिस्सों में भी निर्मित किया जा रहा है। इसे परंपरागत रूप से मिट्टी के घरों की दीवारों पर चित्रित किया जाता था किंतु अब इसे अन्य सतहों पर भी चित्रित किया जाता है। इस चित्रकला में लाइनों, बिंदुओं, जानवरों के चित्रों एवं पेड़-पौधों को प्रमुख स्थान दिया जाता है जो अक्सर ‘धार्मिक प्रतिमा-विधा’ (Religious Iconography) का प्रतिनिधित्व करती है। ‘तेलिया रुमाल’ को सूती कपड़े में जटिल हस्तनिर्मित प्रक्रिया द्वारा बनाया जाता है जिसमें तीन विशेष रंगों (लाल, काले व सफेद) में विभिन्न प्रकार के डिज़ाइन एवं रूपांकनों को प्रदर्शित किया जाता है। आज़ादी मिलने से पहले हैदराबाद के निज़ाम के दरबार में कार्य करने वाले अधिकारी चितुकी तेलिया रुमाल (Chituki Telia Rumal) को प्रमुख प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्त्व के रूप में पहनते थे। तेलिया रुमाल को राजस्थान के अजमेर शरीफ की दरगाह पर भी चढ़ाया जाता है।

बंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (Indian Institute of Science-IISc) के शोधकर्त्ताओं ने दूध और डेयरी उत्पादों (Dairy Products) में मेलामाइन (Melamine) की उपस्थिति का पता लगाने के लिये कम लागत वाली एक तकनीक विकसित की है। प्रमुख बिंदु मेलामाइन (Melamine) एक कार्बन आधारित रसायन होता है, जिसे दूध और डेयरी उत्पादों में मिलावट करने के लिये प्रयोग किया जाता है। उल्लेखनीय है कि दूध और डेयरी उत्पादों में मेलामाइन (Melamine) की मिलावट करने से गुर्दे संबंधी बीमारियाँ हो सकती हैं और गुर्दा पूर्णतः खराब भी हो सकता है। शोधकर्त्ताओं के अनुसार, वर्तमान में मेलामाइन की उपस्थिति का पता लगाने के लिये उपयोग की जाने वाली तकनीकें काफी अधिक समय की मांग करती हैं और इनका प्रयोग करने के लिये सामान्यतः महंगे और परिष्कृत उपकरणों और उच्च प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता होती है। उल्लेखनीय है कि IISc के शोधकर्त्ताओं द्वारा विकसित की गई तकनीक के माध्यम से पानी और दूध में मेलामाइन का पता लगाने की प्रक्रिया को काफी तेज़ किया जा सकता है। शोध के दौरान शोधकर्त्ताओं ने मेलामाइन की सांद्रता (Concentrations) की रेंज का पता लगाने के लिये नई तकनीक का प्रयोग किया और यह पाया कि यह तकनीक पानी और दूध में मेलामाइन के 0.1 भाग प्रति मिलियन (Parts Per Million-PPM) तक का पता लगाने में सक्षम है। शोधकर्त्ताओं के अनुसार, इस शोध का परिणाम ज्ञात करने में उन्हें मात्र 4 मिनट का समय लगा। इस शोध के दौरान शोधकर्त्ताओं द्वारा ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग किया गया जो कि कम लागत पर आसानी से उपलब्ध थे, जैसे नैनो कणों (Nanoparticles) को रोशन करने के लिये सामान्य यूवी एलईडी (UV LED) का प्रयोग किया गया, वहीं फ्लोरेसेंस (Fluorescence) का पता लगाने के लिये PIN फोटोडायोड (PIN Photodiode) का प्रयोग किया गया है। इस तकनीक में आसानी से लेड और पारा जैसे अन्य पदार्थों का पता लगाने के लिये परिवर्तन किये जा सकते हैं। शोधकर्त्ताओं का अनुमान है कि भविष्य में इस तकनीक को पर्यावरण और खाद्य गुणवत्ता परीक्षण के लिये एक स्क्रीनिंग उपकरण के रूप में प्रयोग किया जाएगा। भारत में दूध उत्पादन उल्लेखनीय है कि भारत वर्षों से निरंतर विकास के साथ विश्व स्तर पर डेयरी उत्पादों का प्रमुख उत्पादक और उपभोक्ता रहा है। आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018-19 में भारत में तकरीबन 187 मिलियन टन दूध का उत्पादन किया गया था। भारत में दूध उत्पादन की महत्ता का एक मुख्य कारण यह भी है कि दूध किसानों को काफी आसानी से नकदी उपलब्ध कराता है, जबकि फसलों के कारण किसानों को वर्ष में केवल 2-3 बार ही पैसा मिलते हैं। मेलामाइन (Melamine) विदित है कि मेलामाइन (Melamine) एक कार्बन आधारित रसायन होता है जो आमतौर पर नाइट्रोजन से समृद्ध सफेद क्रिस्टल (White Crystals) के रूप में पाया जाता है। व्यापक तौर पर मेलामाइन (Melamine) का प्रयोग प्लास्टिक, गोंद, काउंटरटॉप्स (Countertops) और व्हाइटबोर्ड आदि बनाने के लिये किया किया जाता है। ध्यातव्य है कि कई बार दूध के व्यापारी दूध की मात्रा को बढ़ाने के उद्देश्य से उसमें पानी मिला देते हैं, जिससे दूध में प्रोटीन की मात्रा काफी कम हो जाती है। इस प्रोटीन की मात्रा को संतुलित करने के लिये दूध व्यापारियों द्वारा दूध में मेलामाइन मिलाया जाता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2007 में चीन से निर्यातित कुछ खाद्य पदार्थों में मेलामाइन पाया गया था, जिसके कारण अमेरिका में कई जानवरों की मृत्यु हो गई थी, क्योंकि उन खाद्य पदार्थों का प्रयोग जानवरों के भोजन बनाने हेतु किया गया था।

इस रिपोर्ट के अनुसार, देश में पिछड़े वर्गों से आने वाले लोगों में वृद्धिरोध के मामलों में सबसे अधिक वृद्धि (अनुसूचित जाति में 43.6%, अनुसूचित जनजाति में 42.5% और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों में 38.6%) देखी गई थी। आगे की राह: पिछले कुछ वर्षों में भारत में कृषि उपज में भारी वृद्धि हुई है परंतु देश का प्रशासनिक तंत्र कुपोषण को समाप्त करने में सफल नहीं रहा है, इसका सबसे बड़ा कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों में उन्नत किस्म के खाद्य पदार्थों की पहुँच में कमी, जागरूकता का अभाव और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की निष्क्रियता है। देश के विकास में महिला की भूमिका को देखते हुए महिला सशक्तिकरण और जागरूकता के कार्यक्रमों में वृद्धि की जानी चाहिये। ग्रामीण क्षेत्रों में एएनएम् (ANM) और अन्य स्थानीय कार्यकर्ताओं तथा आँगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिये पोषक भोजन की पहुँच में वृद्धि की जानी चाहिये। सरकार द्वारा प्रस्तावित राष्ट्रीय शिक्षा नीति में आँगनबाड़ी केंद्रों की पहुँच में विस्तार की बात कही गई है जो इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है। प्रतिवर्ष देश में विभिन्न सरकारी खाद्य भंडार केंद्रों में उपयुक्त भंडारण संसाधनों या समन्वय के अभाव में बड़ी मात्रा में अनाज बर्बाद हो जाता है, अतः वितरण प्रणाली में सुधार के साथ-साथ भंडारण केंद्रों की नियमित जाँच कर उपयुक्त समाधान किये जाने चाहिये। COVID-19 महामारी के बाद देश में एक बार पुनः ‘1 देश 1 राशनकार्ड’ की मांग तेज़ हुई है, इस कार्यक्रम के माध्यम से देश के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे प्रवासी मज़दूरों को सस्ती दरों पर पोषक तत्त्वों से युक्त अनाज उपलब्ध कराने में सहायता प्राप्त होगी।

Global Nutrition Report 2020) के अनुसार, भारत विश्व के उन 88 देशों में शामिल है, जो संभवतः वर्ष 2025 तक ‘वैश्विक पोषण लक्ष्यों’ (Global Nutrition Targets) को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सकेंगे। मुख्य बिंदु: पोषण लक्ष्य: वर्ष 2012 में World Health Assembly में माँ, शिशु और किशोर बच्चों में 6 पोषण लक्ष्यों की पहचान की गई, जिन्हें वर्ष 2025 तक प्राप्त किया जाना था। 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में वृद्धिरोध या बौनापन (Stunting) के मामलों में 40% की कमी, 19-50 वर्ष की आयु की महिलाओं में एनीमिया (Anaemia) के मामलों में 50% की कमी, कम वज़न के शिशुओं के जन्म के मामलों में 30% की कमी को सुनिश्चित करना, बच्चों में मोटापे के मामलों में वृद्धि को पूरी तरह से रोकना, शिशु के जन्म के पहले 6 महीनों में अनन्य स्तनपान (जन्म के शुरुआती 6 माह में शिशु को केवल माँ का दूध) की दर को 50% तक बढ़ाना, बाल निर्बलता/दुबलापन (Child wasting) के मामलों में कमी लाना और इसे 5% से कम बनाए रखना। ‘विश्व पोषण रिपोर्ट-2020’ और भारत: विश्व पोषण रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में जिन चार मानकों के आँकड़ों उपलब्ध हैं, भारत उनमें से किसी भी लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सकेगा। ये चार मानक 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में वृद्धिरोध, प्रजनन योग्य आयु (Reproductive Age) की महिलाओं में एनीमिया के मामले, बच्चों में मोटापा और अनन्य स्तनपान (Exclusive Breastfeeding) हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत कुपोषण के मामले में सबसे अधिक स्थानीय असमानता वाले देशों में से एक है। हालाँकि पूर्व में भारत में बच्चों और किशोरों में कम वजन के मामलों की दर में कमी लाने में सफलता प्राप्त हुई थी। कुपोषण (Malnutrition): विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कुपोषण किसी व्यक्ति में ऊर्जा और/या पोषक तत्त्वों की कमी, अधिकता अथवा असंतुलन को दर्शाता है। सामान्य रूप से कुपोषण को तीन समूहों में विभाजित किया जा सकता है: अल्प-पोषण (Undernutrition): इसमें निर्बलता/दुबलापन (लंबाई के अनुपात में वज़न में कमी ), वृद्धिरोध (आयु के अनुपात में लंबाई में कमी) और वज़न में कमी शामिल है। सूक्ष्म पोषक तत्त्व संबंधी कुपोषण (Micronutrient-Related Malnutrition): इसमें शरीर में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी (महत्वपूर्ण विटामिन और खनिजों की कमी) या अधिकता (Excess) शामिल है। वजन की अधिकता: इसमें मोटापा या आहार संबंधी गैर-संचारी रोग (जैसे हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और कुछ कैंसर) आदि शामिल हैं। भारतीय बच्चों में कम वजन और कुपोषण: वर्ष 2000 से लेकर वर्ष 2016 तक लड़कों में कम वज़न के मामलों की दर 66% से घटकर 58.1% तक पहुँच गई साथ ही इसी दौरान लड़कियों में कम वज़न के मामलों की दर 54.2% से घटकर 50.1% तक पहुँच गई थी। हालाँकि कम वज़न के मामलों में आई यह कमी अभी भी एशिया के औसत (लड़कों में 35.6% और लड़कियों में 31.8%) से काफी ज़्यादा है। इसके अतिरिक्त भारत में 37.9% बच्चों में वृद्धिरोध या बौनेपन और 20.8% में निर्बलता या दुबलेपन के मामले देखे गए है जबकि एशिया में यह औसत क्रमशः 22.7% और 9.4% है। एनीमिया: रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रजनन योग्य आयु की दो में से एक महिला में एनीमिया के मामले देखे गए है। मोटापा: भारतीयों में वजन बढ़ने और मोटापे के मामलों की दर में काफी वृद्धि (पुरुषों में17.8% और महिलाओं में 21.6%) देखी गई है, जिसके कारण लगभग हर 5 में से एक वयस्क इस समस्या से प्रभावित है। कुपोषण और असमानता: इस रिपोर्ट में कुपोषण और पक्षपात या अन्याय (Inequity) के बीच संबंधों पर विशेष ज़ोर दिया गया है। इनमें भौगोलिक स्थिति, आयु, लिंग, जातीय असमानता, शिक्षा और आर्थिक आधार आदि प्रमुख हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भोजन और स्वास्थ्य प्रणाली में व्याप्त पक्षपात पोषण परिणामों में असमानता को बढ़ाता है, जिससे समाज में अधिक पक्षपात को बढ़ावा मिल सकता है और इस तरह यह समाज में पक्षपात तथा असमानता के एक अंतहीन दुष्चक्र को जन्म देता है। भारत के संदर्भ में: इस रिपोर्ट में भारत की पहचान नाइजीरिया और इंडोनेशिया के साथ उन तीन सबसे खराब देशों में की गई है, जहाँ वृद्धिरोध के मामलों में सबसे अधिक असमानता देखी गई, इनमें विभिन्न समुदायों के बीच वृद्धिरोध के स्तर का अंतर लगभग चार गुना था। उत्तर प्रदेश राज्य में वृद्धिरोध के मामलों की दर 40% से अधिक थी, साथ ही उच्चतम आय वर्ग की तुलना में निम्नतम आय वर्ग के लोगों में ऐसे मामलों की दर दोगुने से भी अधिक थी। वर्ष 2019 में ‘केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय’ और संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (United Nations World Food Programme- WFP) के सहयोग से जारी Food and Nutrition Security Analysis, India, 2019 रिपोर्ट में भी भारत में कुपोषण के मामलों पर चिंताजनक आँकड़े जारी किये गए थे।

इस अवधि में राज्यसभा धन विधेयक को संशोधन अथवा बिना संशोधन के साथ लोक सभा को लौटाने को बाध्य है। यद्यपि लोक सभा इन संशोधन प्रस्तावों को ठुकरा सकती है। 'त्रावणकोर कोचीन विनियोग विधेयक'- 1956, आयकर विधेयक- 1961 जैसे कुछ अवसरों के समय राज्यसभा द्वारा धन में किये गए संशोधनों को लोक सभा द्वारा स्वीकार किया गया था। परंतु यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि उस समय तात्कालिक सरकार को राज्यसभा में भी बहुमत प्राप्त था। महत्त्वपूर्ण विधेयकों पर व्यापक चर्चा: कुछ विधेयकों जैसे भ्रष्टाचार निरोधक विधेयक (Prevention of Corruption Bill)-1987 को पास करने में राज्यसभा द्वारा बहुत लंबा समय लिया गया क्योंकि वह इन विधेयकों पर व्यापक आम सहमति बनाना चाहती थी। हालाँकि कुछ मामलों में जैसे- 25 अगस्त, 1994 को सरकार का राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के बावजूद एक दिन में पाँच संविधान संशोधन विधेयक पारित किये गए। राज्यसभा ने लोकसभा द्वारा पारित कई विधेयकों में संशोधन भी किये हैं तथा इन संशोधनों को लोकसभा द्वारा भी स्वीकार किया गया है। वर्तमान सरकार में राज्यसभा की भूमिका: वर्तमान सरकार को राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के बावजूद जीएसटी, दिवाला और दिवालियापन संहिता, तीन तलाक, गैरकानूनी गतिविधियों, जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन, नागरिकता संशोधन आदि से संबंधित ऐतिहासिक कानून पारित किये गए हैं। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि राज्यसभा में सदस्य संख्या कानून बनाने के संबंध में बड़ा मुद्दा नहीं है। राज्यसभा की उत्पादकता: सचिवालय विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 1997 तक राज्यसभा की उत्पादकता 100% या उससे भी अधिक रही है। हालाँकि पिछले 23 वर्षों ने राज्यसभा में बढ़ती रुकावटों के कारण राज्यसभा की उत्पादकता में लगातार कमी देखी गई है। वर्ष 1998-2004 के दौरान राज्यसभा की उत्पादकता में 87% तक की कमी देखी गई है। वर्ष 2005-14 के दौरान राज्यसभा की उत्पादकता 76% रही जबकि वर्ष 2015-19 के दौरान उत्पादकता 61% देखी गई। वर्ष 1978-2004 के दौरान सदन के कुल कार्यात्मक समय में राज्यसभा का हिस्सा 39.50% था। जिसमें लगातार कमी देखी गई है तथा यह वर्ष 2005-14 के दौरान घटकर 21.99% तथा वर्ष 2015 के बाद से घटकर 12.34% रह गया है। राज्यसभा की उत्पादकता में गिरावट मुख्य रूप से प्रश्नकाल में व्यवधान, विधेयकों को बिना चर्चा के पारित करने के रूप में देखी गई है। हालाँकि राज्यसभा लघु अवधि की चर्चा, शून्य काल, बजट पर चर्चा, धन्यवाद प्रस्ताव आदि के तहत विचार-विमर्श के समय में लगातार वृद्धि देखी गई है। यह वर्ष 1978-2004 के दौरान 33.54% से बढ़कर वर्ष 2005-2014 के दौरान 41.42% तथा वर्ष 2015-19 के दौरान 46.59% हो गया है। इन प्रस्तावों पर चर्चा के समय में वृद्धि के बावजूद राज्यसभा की उत्पादकता में कमी देखी गई है। निष्कर्ष: राज्यसभा एवं लोकसभा दोनों सदनों ने वर्ष 1952 के बाद से देश के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन लाने में रचनात्मक भागीदार की भूमिका निभाई है। दोनों सदनों की संरचना में व्यापक अंतर होने के बावजूद दोनों सदनों ने सहयोग और सहकारिता की भावना के आधार पर कार्य किया है। अत: राज्यसभा एक 'व्यवधानकारी' सदन न होकर एक ‘रचनात्मक’ सदन है।

राज्यसभा की भूमिका, राज्यसभा में बहुमत का महत्त्व चर्चा मे क्यों? वर्तमान सरकार के पास लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद राज्यसभा में बहुमत नहीं है। ऐसी स्थिति ने राज्यसभा की कानून निर्माण में भूमिका को पुन: चर्चा के केंद्र में ला दिया है। प्रमुख बिंदु: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार, संघ के लिये एक संसद होगी, जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी। भारतीय संविधान, लोकसभा और राज्यसभा को कुछ अपवादों को छोड़कर कानून निर्माण की शक्तियों में समान अधिकार देता है। राज्यसभा का संगठन: भारतीय संविधान का अनुच्छेद-80, राज्यसभा के गठन का प्रावधान करता है। राज्यसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 हो सकती है, परंतु वर्तमान में यह संख्या 245 है। इनमें से 12 सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा से संबंधित क्षेत्र के 12 सदस्यों को मनोनीत किया जाता है। यह एक स्थायी सदन है अर्थात् राज्यसभा का विघटन कभीं नहीं होता है। राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। जबकि राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्यों का चुनाव दूसरे वर्ष में किया जाता है। जो इसकी स्थायी प्रकृति को दर्शाता है। राज्यसभा में बहुमत का महत्त्व: संसद के दोनों सदनों के संगठन तथा संरचना में व्यापक अंतर होने के बावजूद राज्यसभा में सरकार के बहुमत की उपस्थिति से कानून निर्माण प्रक्रिया, प्रतिकूल रूप से प्रभावित नहीं हुई है। इसे निम्नलिखित उदाहरणों से समझ सकते हैं। बहुमत के अभाव के बावजूद विधेयकों का पास होना: वर्ष 1952 के प्रथम आम चुनावों से पिछले 68 वर्षों के दौरान सरकार राज्यसभा में केवल 29 वर्षों के लिये बहुमत में रही जबकि शेष 39 वर्षों के लिये अल्पमत में रही है। इसके बावजूद वर्ष 1952 से राज्यसभा ने 5,472 बैठकों में 3,857 विधेयकों को पारित किया है। राज्यसभा ने अपनी 68 वर्षों की इस लंबी यात्रा में विधान निर्माण बहुत कम मामलों में एक 'अवरोधनकारी सदन' की भूमिका निभाई है। संयुक्त बैठक का आयोजन: संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाने का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद-108 में है। इस प्रावधान के तहत लोकसभा से पारित किसी सामान्य विधेयक को राज्यसभा की मंज़ूरी न मिलने की स्थिति में संयुक्त बैठक के जरिये उसे पारित किया जा सकता है। अब तक संसद ने दोनों सदनों के बीच मतभेदों को हल करने के लिये केवल तीन संयुक्त बैठकों का आयोजन किया गया है। प्रथम, संयुक्त बैठक का आयोजन वर्ष 1961 में किया गया था, जब तत्कालीन सरकार को राज्यसभा में बहुमत होने के बावजूद 'दहेज निषेध विधेयक (Dowry Prohibition Bill)- 1959 के मामले में हार का सामना करना पड़ा था। द्वितीय, संयुक्त बैठक वर्ष 1978 में आयोजित की गई जब राज्यसभा द्वारा ‘बैंकिंग सेवा आयोग (निरसन) विधेयक’ (Banking Services Commission (Repeal) Bill)- 1977 को अस्वीकार कर दिया गया। तृतीय, संयुक्त बैठक का आयोजन वर्ष 2002 में ‘आतंकवाद निरोधक विधेयक’ (Prevention of Terrorism Bill)- 2002 के राज्यसभा में पारित नहीं होने पर किया गया। सरकार को बहुमत होने के बावजूद हार का सामना करना पड़ा: राज्यसभा को कुछ मामलों में प्रतिगामी सदन (Regressive House) के रूप में देखा जा सकता है जब सरकार को राज्यसभा में बहुमत होने के बावजूद हार का सामना करना पड़ा। जब पूर्ववर्ती शासकों की प्रिवी पर्स को समाप्त करने वाले 24वें संविधान संशोधन विधेयक (Constitution (Twenty-fourth Amendment) Bill)-1970 को लोकसभा द्वारा पारित करने के बावजूद, राज्यसभा द्वारा अस्वीकार कर दिया। वर्ष 1989 में संविधान (64वाँ और 65वाँ संशोधन) विधेयक (Constitution (Sixty-fourth and Sixty-fifth Amendment) Bills); जिसमें स्थानीय सरकारों को सशक्त करने संबंधी प्रावधान शामिल थे, के संबंध में सरकार के पास बहुमत होने के बावजूद हार का सामना करना पड़ा। संसद के दोनों सदनों के मध्य मतभेद: दोनों सदनों के बीच सौहार्द की भावना में निम्नलिखित कुछ अवसरों पर मतभेद देखने को मिला: वर्ष 1952 में राज्यसभा के सदस्यों को Public Accounts Committee में शामिल नहीं करने के मामले; आयकर (संशोधन) विधेयक (Income Tax (Amendment) Bill)- 1953 को धन विधेयक के रूप में पेश करने के मामले; ‘प्रमुख बंदरगाह न्यास विधेयक’ (Major Port Trust Bill)-1963 को राज्यसभा सदस्यों को शामिल किये बिना लोकसभा की चयन समिति को पेश करने के मामले पर; वर्ष 1954, 1971, 1972 और 1975 में राज्यसभा के विघटित करने के लिये लोकसभा द्वारा प्रस्ताव पारित किये गए। हालाँकि इस प्रकार के प्रयास विफल रहे। धन विधेयक के संबंध में भूमिका: संविधान के अनुच्छेद 110(3) के अनुसार कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका निर्धारण लोकसभा अध्यक्ष करता है। राज्यसभा धन विधेयक को अधिकतम 14 दिनों के लिये अपने पास रख सकती है।

आरोग्य सेतु एप को सार्वजनिक-निजी साझेदारी (Public-Private Partnership) के माध्यम से तैयार एवं गूगल प्ले स्टोर पर लॉन्च किया गया है। इस एप का मुख्य उद्देश्य COVID-19 से संक्रमित व्यक्तियों एवं उपायों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराना होगा। यह एप 11 भाषाओं में उपलब्ध है और साथ ही इसमें देश के सभी राज्यों के हेल्पलाइन नंबरों की सूची भी दी गई है। किसी व्यक्ति में कोरोनावायरस के जोखिम का अंदाज़ा लगाने के लिये आरोग्य सेतु एप द्वारा ब्लूटूथ तकनीक, एल्गोरिदम (Algorithm), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का प्रयोग किया जाता है। एक बार स्मार्टफोन में इन्स्टॉल होने के पश्चात् यह एप नज़दीक के किसी फोन में आरोग्य सेतु के इन्स्टॉल होने की पहचान कर सकता है। कौन प्राप्त कर सकता है यह डेटा आरोग्य सेतु एप के संबंध में सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, एप के प्रतिक्रिया डेटा (Response Data) को एप के डेवलपर यानि राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (National Informatics Centre-NIC) द्वारा ऐसे मंत्रालय, विभागों और संस्थाओं के साथ साझा किया जाएगा, जहाँ नीति निर्माण के लिये इस प्रकार का डेटा एक आवश्यक घटक हो। इसमें केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों/स्थानीय सरकारों के स्वास्थ्य विभाग, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, केंद्र और राज्य सरकारों के अन्य मंत्रालय तथा विभाग और केंद्र/राज्य/स्थानीय सरकारों के अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान आदि शामिल हैं। जारी किये गए निर्देशों में तीसरे पक्ष के साथ भी डेटा साझा करने संबंधी नियमों का उल्लेख किया गया है। नियमों के अनुसार, ऐसा केवल तभी किया जाएगा जब यह COVID-19 के संबंध में प्रतिक्रियाओं और नीतियों के निर्माण में प्रत्यक्ष रूप से अनिवार्य हो। इसके अतिरिक्त, COVID-19 से संबंधित अनुसंधान के लिये भी प्रतिक्रिया डेटा (Response Data) को भारतीय विश्वविद्यालयों या अनुसंधान संस्थानों और भारत में पंजीकृत अनुसंधान संस्थाओं के साथ साझा किया जा सकता है। डेटा साझाकरण संबंधी नियम सरकार द्वारा दिये गए निर्देशों के अनुसर मंत्रालयों, सरकारी विभागों और अन्य प्रशासनिक एजेंसियों के साथ जो प्रतिक्रिया डेटा (Response Data) साझा किया जाएगा वह डी-आइडेंटिफाईड (De-Identified) रूप में होना अनिवार्य है। डी-आइडेंटिफिकेशन (De-identification) का अभिप्राय किसी की व्यक्तिगत पहचान को प्रकट होने से रोकने के लिये प्रयोग की जाने वाली प्रक्रिया से है। इसका अर्थ है कि जनसांख्यिकीय डेटा के अतिरिक्त प्रतिक्रिया डेटा (Response Data) से वह सभी सूचनाएँ हटा ली जाएंगी जो किसी व्यक्ति की पहचान को संभव बना सकती हैं। इसके अतिरिक्त NIC जहाँ तक संभव हो सके डेटा के साझाकरण का दस्तावेज़ीकरण (Documentation) करेगा और उन एजेंसियों की सूची बनाएगा जिनके साथ इस प्रकार का डेटा साझा किया गया है। डेटा साझाकरण के इन दस्तावेज़ों में डेटा साझा करने का समय, किस व्यक्ति के साथ डेटा साझा किया गया है, साझा किये गए डेटा की श्रेणी और डेटा साझा करने का उद्देश्य जैसी जानकारियाँ शामिल होंगी। दिशा-निर्देशों के अनुसार, कोई भी संस्था 180 से अधिक दिनों के लिये आरोग्य सेतु से संबंधित किसी भी डेटा को अपने पास नहीं रख सकती है। संबंधित चिंताएँ इस एप को लेकर कई विशेषज्ञों ने निजता संबंधी चिंता ज़ाहिर की है। विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार द्वारा ऐसी कोई विशेष गारंटी नहीं दी गई है, कि हालत सुधरने के पश्चात् उपयोगकर्त्ताओं से संबंधित व्यक्तिगत डेटा को नष्ट कर दिया जाएगा। इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस के माध्यम से एकत्रित किये जा रहे डेटा के प्रयोग में लाए जाने से निजता के अधिकार का हनन होने के साथ ही सर्वोच्च न्यायलय के आनदेश का भी उल्लंघन होगा जिसमें निजता के अधिकार को संवैधानिक अधिकार बताया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, तीसरे पक्ष के साथ डेटा साझा करने की नीति चिंता का सबसे महत्त्वपूर्ण विषय है, क्योंकि इससे उपयोगकर्त्ताओं के निजी डेटा के दुरुपयोग की संभावना और अधिक प्रबल हो गई है।

हाल ही में इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology- MeitY) ने आरोग्य सेतु एप के संबंध में सरकारी एजेंसियों और तीसरे पक्ष के साथ इसके डेटा को साझा करने को लेकर दिशा-निर्देश जारी किये हैं। प्रमुख बिंदु उल्लेखनीय है कि कई विशेषज्ञों ने आरोग्य सेतु एप की प्रभावकारिता और सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगाए थे। साथ ही कानूनी विशेषज्ञों ने आरोग्य सेतु एप की गोपनीयता नीति पर भी चिंता ज़ाहिर की थी। विशेषज्ञों का मत है कि सरकार को आरोग्य सेतु एप की डेटा संबंधित नीति को व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानूनों के साथ संलग्न करना चाहिये। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में भारत का व्यक्तिगत डेटा संरक्षण बिल संसद द्वारा अनुमोदित किये जाने की प्रक्रिया में है। COVID-19 और व्यक्तिगत डेटा का महत्त्व इस संबंध में देश के IT सचिव अजय प्रकाश साहनी द्वारा जारी कार्यकारी आदेश के अनुसार, ‘COVID-19 महामारी को उचित ढंग से संबोधित करने के लिये स्वास्थ्य प्रतिक्रियाओं और नीतियों का निर्माण किया जाना आवश्यक है, जिसके लिये नीति निर्माताओं को आम लोगों के व्यक्तिगत डेटा की आवश्यकता होगी।’ विदित हो कि यहाँ, एक व्यक्ति से अभिप्राय उन लोगों से है जो या तो संक्रमित हैं या उनके लिये संक्रमित होने का उच्च जोखिम है अथवा जो संक्रमित व्यक्तियों के संपर्क में आए हैं। अतः नीति निर्माण से संबंधित उद्देश्य की पूर्ति के लिये और यह सुनिश्चित करने के लिये कि एप के माध्यम से एकत्रित किये गए डेटा को उपयुक्त तरीके से इकट्ठा, संसाधित और साझा किया जाए, सरकार ने ये दिशा-निर्देश जारी किये हैं। उल्लेखनीय है कि केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों द्वारा सोशल डिस्टेंसिंग जैसे एहतियाती उपायों और संक्रमित व्यक्तियों के उपचार से संबंधित कई एडवाइज़री और बयान जारी किये हैं। ऐसे में इन सभी के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के साथ आवश्यक डेटा को साझा करने की आवश्यकता है। किस प्रकार का डेटा एकत्र करेगा आरोग्य सेतु एप आरोग्य सेतु एप के माध्यम से एकत्र किये गए डेटा को मुख्य तौर पर 4 श्रेणियों में विभाजित किया गया है- (1) जनसांख्यिकीय संबंधी डेटा (2) संपर्क संबंधी डेटा (3) स्व-मूल्यांकन संबंधी डेटा (4) स्थान संबंधी डेटा। इन सभी को समग्र रूप से प्रतिक्रिया डेटा (Response Data) कहा जाता है। जनसांख्यिकीय संबंधी डेटा में नाम, मोबाइल नंबर, आयु, लिंग, पेशे और यात्रा इतिहास जैसी सामान्य जानकारी एकत्रित की जाती हैं। संपर्क संबंधी डेटा किसी अन्य व्यक्ति के संबंध में होता है जो एप के उपयोगकर्त्ता के संपर्क में आया है, इस प्रकार के डेटा में संपर्क की अवधि, व्यक्तियों के मध्य समीप दूरी और भौगोलिक स्थान आदि भी शामिल होते हैं। स्व-मूल्यांकन संबंधी डेटा में एप के प्रयोगकर्त्ता द्वारा एप में मौजूदा स्व-मूल्यांकन परीक्षण (Self-Assessment Test) में दी गई प्रतिक्रियाओं को शामिल किया जाता है। स्थान संबंधी डेटा में किसी व्यक्ति की भौगोलिक स्थिति का विवरण शामिल होता है। आरोग्य सेतु एप

ब्रिटेन की विपक्षी लेबर पार्टी के नव-निर्वाचित नेता कीर स्टारमर (Keir Starmer) द्वारा लेबर फ्रेंड्स ऑफ इंडिया (Labour Friends of India-LFI) समूह के साथ अपने पहले संवाद के दौरान कहा गया कि कश्मीर ‘भारत और पाकिस्तान के बीच ऐसा द्विपक्षीय मुद्दा है जिसे शांतिपूर्वक हल किया जा सकता था’। प्रमुख बिंदु: स्टारमर द्वारा ‘लेबर फ्रेंड्स ऑफ इंडिया’ के समहू के साथ अपने वक्तव्य में भारत के साथ मज़बूत व्यापारिक संबंध बनाने पर ज़ोर दिया गया। कीर स्टारमर द्वारा इस बात पर बल दिया गया कि उनके नेतृत्त्व की लेबर पार्टी सरकार द्वारा भारत के साथ मज़बूत व्यापारिक संबंध कायम करने के अलावा वैश्विक मंच पर जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर सहयोग करने के लिये दृढ़ संकल्पित होगी। लेबर पार्टी का पूर्व रुख: पिछले कुछ समय से भारतीय डायस्पोरा के साथ लेबर पार्टी के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। इन संबंधों में तनाव की स्थिति विशेष रूप से तब ओर बढ़ी जब इसके प्रतिनिधियों द्वारा सितंबर 2019 में एक आपातकालीन नीति प्रस्ताव पारित कर अनुच्छेद 370 को रद्द करने के भारत के फैसले की आलोचना की। पार्टी द्वारा कहा गया कि कश्मीर के संबंध में वहाँ के लोगों को आत्मनिर्णय का अधिकार होना चाहिये। लेबर पार्टी एवं भारतीय प्रवासियों के संबंधों का महत्त्व: ब्रिटेन में भारतीय सबसे बड़े प्रवासी जातीय समुदाय के रूप में हैं, जिनकी संख्या 1.5 मिलियन से भी अधिक है। ब्रिटेन की कुल आबादी में भारतीय का प्रतिशत 2.3 से भी अधिक है जो किसी भी पार्टी के लिये एक महत्त्वपूर्ण वोट बैंक हो सकता हैं। वर्ष 2017 के आम चुनावों में ब्रिटेन में रहने वाले 50 प्रतिशत भारतीयों ने लेबर को वोट दिया था। लेबर पार्टी के घोषणापत्र में भारत: भारत की स्वंत्रता के पहले से ही, ब्रिटेन के कई ‘चुनाव घोषणा पत्रों’ में भारत से संबंधित मुद्दों को शामिल किया जाता रहा हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे इस प्रकार हैं - वर्ष 1945 में भारत की स्वंत्रता का मुद्दा लेबर पार्टी के ‘चुनावी घोषणापत्र’ में शामिल किया गया था जिसमें भारतीयों के लिये ज़िम्मेदार स्व-सरकार (Self-Government) प्रदान करने की बात शामिल थी। वर्ष 1947 में क्लीमेंट रिचर्ड एटली (Clement Richard Attlee) ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने जिनके द्वारा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम,1947 पारित किया गया था। वर्ष 2019 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए एक औपचारिक माफीनामा।