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अमेरिकी सरकार का बड़ा फैसला, H-1B वीजा पर लगाई अस्थाई रोक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने फैसले को सही करार देते हुए कहा कि इससे उन लाखों अमेरिकियों को मदद मिलेगी, जिन्हें कोविड-19 (COVID-19) प्रकोप के चलते अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में H-1B (एच-1बी) वीजा सहित अन्य विदेशी वर्क-वीजा पर रोक लगा दी है. कोरोना संकट (Corona Virus) के चलते अमेरिका में बढ़ रही बेरोजगारी को देखते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने यह फैसला लिया है. यह रोक इस साल के अंत तक कायम रहेगी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने फैसले को सही करार देते हुए कहा कि इससे उन लाखों अमेरिकियों को मदद मिलेगी, जिन्हें कोविड-19 (COVID-19) प्रकोप के चलते अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है. ट्रंप सरकार ने व्यावसायिक संगठन, कानूनविदों और मानवाधिकार निकायों के विरोध के बावजूद यह फैसला लिया है. भारत पर क्या पड़ेगा प्रभाव अमेरिकी सरकार के इस कदम से भारतीयों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा, क्योंकि H-1B वीजा भारतीय आईटी पेशेवरों के बीच काफी लोकप्रिय है. सरकार के इस कदम से खासतौर पर भारतीय आईटी पेशेवरों सहित कई अमेरिकी और भारतीय कंपनियों पर सीधा असर पड़ेगा, जिन्हें 01 अक्टूबर से वित्तीय वर्ष 2021 के लिए H-1B वीजा जारी किया गया था. अमेरिका में प्रति वर्ष 10 लाख कर्मचारी दूसरे देशों से आते हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने क्या कहा? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस संबंध में कहा कि हमें संयुक्त राज्य अमेरिका के श्रम बाजार पर विदेशी कामगारों के प्रभाव को ध्यान में रखना चाहिए, विशेष रूप से तब जब मौजूदा असाधारण परिस्थितियों के चलते बेरोजगारी दर बढ़ी है. उन्होंने कहा कि अमेरिका में समग्र बेरोजगारी दर में फरवरी और मई के बीच चार गुना उछाल दर्ज किया गया है. हमारे लोगों को अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में नौकरियों के लिए विदेशी नागरिकों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है. इसमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो अस्थायी काम के लिए अमेरिका आते हैं. 17 मिलियन से अधिक नौकरियां गई राष्ट्रपति ट्रंप के मुताबिक, 2020 में फरवरी से अप्रैल के बीच ऐसे उद्योगों में 17 मिलियन से अधिक नौकरियां गई हैं, जहां नियोक्ता H-2B  गैर-आप्रवासी वीजा से जुड़े कर्मचारियों को काम पर रखने में दिलचस्पी दिखाते हैं. इसी अवधि के दौरान,  अमेरिका के 20 मिलियन से अधिक कर्मचारियों ने ऐसे प्रमुख उद्योगों में अपनी नौकरी गंवाई, जो मुख्यरूप से H-1B और L वीजा धारकों से अपने पद भरते हैं.  अन्य विदेशी वर्क-वीजा भी रद्द ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों ने बताया कि H-18, H-4, H-2B, j वीजा (सांस्कृतिक और शैक्षणिक कर्मचारियों के लिए) की कुछ कैटिगरी, L-1 वीजा को सस्पेंड किया गया है. इसका मुख्य उद्देश्य पहले अमेरिकी नागरिकों को नौकरी उपलब्ध कराना है. एच-1बी वीजा क्या है? एच-1बी वीजा गैर-प्रवासी वीजा है. अमेरिकी कंपनियां इसके तहत दूसरे देशों के तकनीकी विशेषज्ञों को नियुक्त करती हैं. नियुक्ति के बाद सरकार से इन लोगों के लिए एच-1बी वीजा मांगा जाता है. अमेरिका की ज्यादातर आईटी कंपनियां प्रत्येक साल भारत और चीन जैसे देशों से लाखों कर्मचारियों की नियुक्ति इसी वीजा के जरिए करती हैं. यूएससीआईएस के अनुसार, एच-1बी वीजा के सबसे बड़े लाभार्थी भारतीय ही हैं. एच-1बी वीजा 3 साल के लिए दिया जाता है जिसे अधिकतम 6 वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकता है. यह वीजा काम करने और अमेरिका में स्थायी नागरिकता के आवेदन दोनो के लिए दिया जाता है. इसका सबसे बड़ा फायदा है कि इसके लिए कोई भी विदेशी आवेदन कर सकता है. इस वीजा के तहत वीजाधारक अपने बच्चों और पति/पत्नी को अमेरिका ला सकता है. वे भी उतने ही साल अमेरिका में रह सकते हैं जितना उनको लाने वाले वीजाधारक की वीजा अवधि है. एच-1बी वीजा के बाद स्थायी नागरिकता के लिए आवेदन किया जा सकता है.

मुक्त व्यापार समझौते: दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार समझौता (South Asia Free Trade Agreement-SAFTA) जैसे कुछ प्रमुख मुक्त व्यापार समझौतों ने बांग्लादेश जैसे देश को भारत के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने में सहायता प्रदान की है, जिन्हें भारतीय बाज़ार तक पहुँच के लिये शून्य शुल्क देना होता है। सरकार को इस तरह के समझौते पर फिर से विचार करना चाहिये और समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिये। सब्सिडी के वितरण में देरी: उद्योग संचालन को आधुनिक बनाने में मदद करने के लिये प्रौद्योगिकी उन्नयन कोष योजना (Technology Upgradation Fund Scheme-TUFS) के तहत सब्सिडी के वितरण में तेज़ी लानी चाहिये। कर संरचना के मुद्दे: जटिल वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Service tax) संरचना घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में वस्त्रों को महँगा और अप्रभावी बना देता है। पुरातन तकनीक: भारतीय वस्त्र उद्योग की नवीनतम प्रौद्योगिकी (विशेष रूप से छोटे उद्योगों में) तक पहुँच की सीमाएँ हैं और प्रतिस्पर्धी बाज़ार में वैश्विक मानकों को पूरा करने में विफलताएँ हैं। स्थिर निर्यात: वस्त्र उद्योग का निर्यात पिछले छह वर्षों से 40 अरब डॉलर के स्तर पर स्थिर रहा है। मानकों का अभाव: भारत में परिधान इकाइयों का औसत आकार 100 मशीनों का है, जो बांग्लादेश की तुलना में बहुत कम है, जहाँ प्रति कारखाने में औसतन कम से कम 500 मशीनें हैं। विदेशी निवेश का अभाव: विदेशी निवेशक उपर्युक्त चुनौतियों के कारण वस्त्र उद्योग में निवेश करने के लिये बहुत उत्साहित नहीं हैं जो एक चिंता का विषय है। COVID-19 से उपज़ी हुई परिस्थितियों से निपटने के लिये वस्त्र उद्योग को अत्यधिक विदेशी निवेश की आवश्यकता है। समाधान के प्रयास भारत के विकास को समावेशी तथा प्रतिभागी बनाने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सरकार का मुख्य जोर वस्त्र क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ विनिर्माण अवसंरचना का निर्माण करना, नवाचार को बढ़ावा देने वाली प्रौद्योगिकी का उन्नयन करना है। साथ ही साथ कौशल तथा परंपरागत शक्तियों को बढ़ाकर वस्त्र विनिर्माण में वृद्धि करने के लिए निम्नलिखित प्रयास किये जा रहे हैं- श्रम कानूनों में सुधार: COVID-19 से उपज़ी हुई परिस्थितियों से निपटने के लिये विभिन्न राज्य सरकारों ने श्रम कानूनों में व्यापक सुधार किये हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और बिहार प्रमुख हैं। ड्यूटी ड्रॉबैक कवरेज में वृद्धिः यह अपनी तरह की पहली योजना है जिसके तहत राज्य यदि लेवियों के रूप में पुनअर्दायगी नहीं कर पाया है तो अब उसकी अदायगी केन्द्र सरकार द्वारा की जाएगी। प्रौद्योगिकी उन्नयन: संशोधित प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि योजना के तहत वर्ष 2022 तक लगभग 95,000 करोड़ रुपये के नये निवेश को प्रेरित करने तथा लगभग 35 लाख लोगों के लिये रोज़गार के सृजन का लक्ष्य रखा गया है। एकीकृत कौशल विकास योजना: वस्त्र क्षेत्र में कुशल श्रमशक्ति की कमी को दूर करने के उद्देश्य से वस्त्र मंत्रालय 15 लाख अतिरिक्त कुशल श्रम शक्ति उपलब्ध कराने के लिये एकीकृत कौशल विकास योजना का क्रियान्वयन कर रहा है। इसके लिये सरकार ने 300 मिलियन अमेरिकी डॉलर आवंटित किये हैं। वस्त्र उद्योग के कामगारों हेतु आवास: वस्त्र कामगारों की आवास योजना की शुरूआत 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान किया गया था। इस योजना का उद्देश्य वस्त्र उद्योग के कामगारों को उद्योगों के उच्च बहुलता वाले क्षेत्र के नज़दीक सुरक्षित पर्याप्त और सुविधाजनक आवास उपलब्ध कराना है। शैक्षिक सुविधाएँ: बुनकरों को उनके अनुकूल शैक्षणिक सेवा उपलब्ध कराने के लिये इग्नू तथा राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गये हैं, जिसके तहत मंत्रालय SC, ST, बीपीएल एवं महिला बुनकरों के मामले में फीस का 75 प्रतिशत उपलब्ध कराती है। आगे की राह संगठित क्षेत्र में विस्तार: भारत, वस्त्र उद्योग के लिये मेगा परिधान पार्क और सामान्य बुनियादी ढाँचा स्थापित करके इस क्षेत्र को संगठित कर सकता है। उद्योगों का आधुनिकीकरण: सरकार का मुख्य फोकस अप्रचलित मशीनरी और प्रौद्योगिकी के आधुनिकीकरण पर होना चाहिये। यह वस्त्र उद्योग के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने में सहायता कर सकता है और इस तरह निर्यात को भी बढ़ा सकता है। विदेशी निवेश आकर्षित करना: भारत सरकार ने वस्त्र उद्योग के लिये कई निर्यात प्रोत्साहन नीतियों को अपनाया है। उदाहरण के लिये, भारत ने स्वचालित मार्ग के तहत भारतीय वस्त्र उद्योग में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति दी है।

भारतीय वस्त्र उद्योग वैश्विक महामारी COVID-19 के कारण प्रारंभ हुए आर्थिक संकट से निपटने के लिये सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को रीबूट (पुनर्जीवित) करने के लिये विकास की रणनीति के रूप में 'आत्मनिर्भरता' को अपनाया है। यह आर्थिक परिदृश्य के साथ ही अन्य सभी पहलुओं में एक मज़बूत राष्ट्र के रूप में उभरने के लिये भारत की अंतर्निहित शक्तियों के उपयोग के बारे में है। हालाँकि, सरकार को उन क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिये, जो पहले से ही आत्मनिर्भर हैं और सहायता मात्र से ही वैश्विक बाज़ार में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। वस्त्र उद्योग ऐसे क्षेत्र का एक ज्वलंत उदाहरण है। निश्चित रूप से वस्त्र उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे पुराने उद्योगों में से एक है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि भारतीय वस्त्र उद्योग को बांग्लादेश और वियतनाम जैसे कई छोटे वैश्विक प्रतिभागियों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इस आलेख में भारतीय अर्थव्यवस्था में वस्त्र उद्योग का महत्त्व, वस्त्र उद्योग की समस्याएँ, सरकार के द्वारा किये जा रहे प्रयासों की समीक्षा की जाएगी। भारतीय वस्त्र उद्योग भारतीय वस्त्र उद्योग, अपनी समग्र मूल्य शृंखला, मजबूत कच्ची सामग्री तथा सशक्त विनिर्माण क्षमता के कारण विश्व के बड़े वस्त्र उद्योगों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इस उद्योग की विशिष्टता इसके व्यापक विस्तार में है जहाँ एक तरफ गहन पूँजी वाले मिल उद्यम हैं वहीं दूसरी ओर सूक्ष्म कारीगरी वाले हस्तशिल्प उद्योग हैं। मिल क्षेत्र, 50 मिलियन स्पिंडल्स (Spindles) और 8,42,000 रोटर्स से अधिक की संस्थापित क्षमता वाली 3400 वस्त्र मिलों के साथ विश्व में दूसरे स्थान पर है। हथकरघा, हस्तशिल्प और छोटे स्तर की विद्युतकरघा इकाई जैसे परंपरागत क्षेत्र ग्रामीण व अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में लाखों लोगों के लिये रोज़गार के बड़े स्रोत हैं। भारतीय वस्त्र उद्योग के कृषि तथा देश की संस्कृति तथा परंपराओं के साथ नैसर्गिक संबंध हैं जो घरेलू तथा निर्यात बाज़ारों, दोनों के लिये उपयुक्त उत्पादों के बहुआयामी विस्तार को संभव बनाते हैं। वस्त्र उद्योग को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:असंगठित क्षेत्र: असंगठित क्षेत्र छोटे पैमाने पर विद्यमान है और इसमें पारंपरिक उपकरणों एवं विधियों का उपयोग किया जाता है। इसमें हथकरघा, हस्तशिल्प और रेशम कीट पालन/सेरीकल्चर (sericulture) शामिल हैं। संगठित क्षेत्र: संगठित क्षेत्र में आधुनिक मशीनरी तथा तकनीकों का उपयोग किया जाता है एवं इसमें कताई, परिधान और पोशाक निर्माण जैसे क्षेत्र शामिल हैं। वस्त्र उद्योग महत्त्वपूर्ण क्यों है? वस्त्र उद्योग, मूल्य के रूप में उद्योग के आउटपुट में 7 प्रतिशत, भारत की जीडीपी में 2 प्रतिशत तथा देश की निर्यात आय में 12 प्रतिशत का योगदान देता है। वस्त्र उद्योग कृषि के बाद प्रत्यक्ष रूप से 10 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार प्रदान करता है। उल्लेखनीय है कि नीति आयोग के विज़न डॉक्यूमेंट के अनुसार अगले 7 वर्षों में यह क्षेत्र 130 मिलियन रोज़गार मुहैया करा सकता है। वस्त्र उद्योग ऐसा क्षेत्र है, जो कृषि और उद्योग के बीच सेतु का कार्य करता है। कपास की खेती हो या रेशम का उत्पादन, इस उद्योग पर बहुत कुछ निर्भर करता है। वस्त्र उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये औद्योगिक उत्पादन, रोज़गार सृजन और निर्यात से प्राप्त आय में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। उद्योग में कपास, प्राकृतिक और मानव निर्मित फाइबर, रेशम आधारित वस्त्र, हाथ से बुना हुआ परिधान और अन्य परिधान शामिल हैं। भारत वर्तमान में वस्त्रों के कुल वैश्विक निर्यात में लगभग 4.5 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है। वस्त्र उद्योग न केवल लाखों परिवारों का पेट भरने का काम करता है, बल्कि यह पारंपरिक कौशल और विरासत का भंडार होने के साथ-साथ हमारी संस्कृति का वाहक भी है। वस्त्र उद्योग की समस्याएँ पुरातन श्रम कानून: इसके तहत विवाद का प्रमुख कारण यह कानून है कि 100 या अधिक श्रमिकों को नियुक्त करने वाली किसी भी फर्म को उन्हें किसी भी प्रकार की नौकरी से निकालने या छंटनी करने से पहले, श्रम विभाग से अनुमति लेनी होगी।लोगों को काम पर रखने और काम से निकालने की प्रक्रिया में लचीलापन लाने के लिये औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 जैसे श्रम कानूनों में संशोधन किया जाना चाहिये। ऐसी फर्मों के आकार का परिसीमन किया जाना चाहिये जिनके लिये रोज़गार को समाप्त करने से पहले श्रम विभाग से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है और सभी फर्मों की दक्षता को प्रोत्साहित करने के मामले में निर्णय लेने की छूट दी जानी चाहिये।

‘माइक्रोस्कोपी जर्नल’ (Journal of Microscopy) में प्रकाशित शोध के अनुसार, भारत के डॉक्टरों की एक टीम के रोगों के नैदानिक परीक्षण में फोल्डस्कोप (Foldscope) नामक वहनीय माइक्रोस्कोप का निर्माण तथा सत्यापन किया है। प्रमुख बिंदु: एक माइक्रोस्कोप या सूक्ष्मदर्शी एक ऐसा उपकरण है जिसका उपयोग उन वस्तुओं को देखने के लिये किया जाता है जिन्हें नग्न आँखों से देख पाना संभव नहीं होता है। इस शोध का उद्देश्य विकासशील देशों में वैज्ञानिक उपयोग के लिये वहनीय तथा आसान उपकरण उपलब्ध कराना है। फोल्डस्कोप माइक्रोस्कोप: यह एक वहनीय माइक्रोस्कोप है जिसे सरल घटकों यथा कागज की शीट, लेंस, मोबाइल फोन, गोंद आदि से बनाया जाता है। फोल्डस्कोप माइक्रोस्कोप को फिर से इसके घटकों में पृथक किया जा सकता है। अत: इसका नाम फोल्डस्कोप रखा गया है। फोल्डस्कोप में नमूने की तस्वीरें लेने के लिये मोबाइल फोन का उपयोग किया जाता है जिसे गोंद की बूंदों का उपयोग करके फोल्डस्कोप पर स्थापित किया जा सकता है। इसे बनाने की लागत 100 रुपए से भी कम है। फोल्डस्कोप की कार्य प्रणाली: नमूने के अवलोकन के लिये फोल्डस्कोप के साथ नमूने की स्लाइड को लगाया जाता है। फोल्डस्कोप के साथ मोबाइल फोन को स्थापित किया जाता है तथा इसकी मदद से नमूने को देखा जा सकता है। नमूने की तस्वीरों को मोबाइल के ज़ूम फंक्शन का उपयोग करके बड़ा किया जा सकता है, तथा इसे मोबाइल मेमोरी कार्ड पर संग्रहीत किया जा सकता है। फोल्डस्कोप माइक्रोस्कोप का महत्त्व: यह ले जाने में आसान (Portable) तथा टिकाऊ है, जो पारंपरिक सूक्ष्मदर्शी के समान प्रदर्शन करता है। फोल्डस्कोप का उपयोग मुँह संबंधी स्वास्थ्य जाँच, मूत्र पथ के संक्रमण, लीशमैनियासिस (सैंडफ्लाई के कारण प्रसारित होने वाला एक रोग), शिस्टोसोमियासिस (एक प्रकार का रक्त संबंधी विकार), गुर्दे की पथरी आदि के निदान में उपयोग किया जा सकता है। इसे प्राथमिक निदान (Primary Diagnosis) के लिये उपयोग किया जा सकता है। इसे व्यक्तिगत स्वास्थ्य निगरानी उपकरणों (Personal Health Monitoring Devices) के रूप में सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में नियोजित किया जा सकता है। चिकित्सा क्षेत्र के अलावा इसका उपयोग कृषि में किया जा सकता है। कृषि क्षेत्र में फसलों तथा जानवरों को प्रभावित करने वाले विभिन्न सूक्ष्मजीवों का पता लगाने में इसका उपयोग किया जा सकता है।

झारखंड समेत देश के विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने राज्य सरकार के इस कदम की सराहना की है। विशेषज्ञों के अनुसार, झारखंड सरकार की इस नई योजना के कार्यान्वयन से कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के प्रकोप के बाद शहरी क्षेत्रों लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों को काफी मदद मिलेगी।उल्लेखनीय है कि झारखंड के राज्य ग्रामीण विकास विभाग द्वारा अब तक 2.5 लाख प्रवासी श्रमिकों का कौशल सर्वेक्षण किया गया है और इस सर्वेक्षण से यह ज्ञात हुआ है कि विभिन्न राज्यों से लौटे 30 प्रतिशत श्रमिक अकुशल श्रमिक हैं। निष्कर्ष झारखंड सरकार द्वारा शुरू की जा रही यह योजना मौजूदा परिस्थितियों के संदर्भ में एक सराहनीय कदम है, आवश्यक है कि राज्य सरकार द्वारा तैयार किये गए मसौदे पर सभी हितधारकों के साथ विचार विमर्श किया जाए और सभी उपयुक्त सुझावों के साथ इसमें सुधार कर इसे जल्द-से-जल्द लागू किया जाए, ताकि महामारी से प्रभावित गरीब श्रमिक को तत्काल इस योजना से लाभ प्राप्त हो सके।भारत सरकार के सामाजिक विकास कार्यक्रम MGNREGA के आधार पर झारखंड सरकार शहरी अकुशल श्रमिकों के लिये रोज़गार गारंटी योजना शुरू करने पर विचार कर रही है। प्रमुख बिंदु झारखंड सरकार की इस योजना के तहत शहरी श्रमिक कम-से-कम 100 दिन का रोज़गार प्राप्त कर सकेंगे। ध्यातव्य है कि झारखंड सरकार की यह योजना अपने मूल उद्देश्य में भारत सरकार के महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम अर्थात् मनरेगा कार्यक्रम से पूरी तरह विपरीत है।जहाँ एक ओर केंद्र सरकार के मनरेगा कार्यक्रम में मुख्य रूप से अकुशल श्रम करने के इच्छुक ग्रामीण वयस्कों को लक्षित किया गया है, वहीं झारखंड सरकार की इस योजना में राज्य के शहरी श्रमिकों को लक्षित किया गया है। झारखंड के शहरी गरीबों को मौजूद संकट के दौर में आजीविका का एक साधन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की जा रही इस योजना का नाम मुख्यमंत्री श्रमिक (SHRAMIK- Shahri Rozgar Manjuri For Kamgar) योजना रखा जाएगा। गौरतलब है कि इस योजना के तहत दी जाने वाली मज़दूरी राज्य में मनरेगा (MGNREGA) कार्यक्रम के तहत दी जा रही मज़दूरी से लगभग 40 प्रतिशत अधिक होगी। विदित हो कि झारखंड में मनरेगा कार्यक्रम के तहत प्रतिदिन 194 रुपए के हिसाब से भुगतान किया जाता है। इस संबंध में तैयार किये गए मसौदे के अनुसार, योजना के तहत काम, मांग के आधार पर प्रदान किया जाएगा और इसमें काम को स्वच्छता, जल संचयन, वृक्षारोपण, सार्वजनिक निर्माण या मरम्मत और आश्रय गृहों के प्रबंधन जैसी विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। मनरेगा की तरह झारखंड सरकार की योजना में भी बेरोज़गारी भत्ते का प्रावधान किया गया है, योजना के तहत बेरोज़गारी भत्ता तभी प्रदान किया जाएगा, जब कोई शहरी स्थानीय निकाय रोज़गार की मांग करने वाले व्यक्ति को 15 दिन के भीतर रोज़गार उपलब्ध कराने में विफल रहता है। ध्यातव्य है कि इस कार्य के लिये शहरी स्थानीय निकायों (Urban Local Bodies-ULBs) को अलग से फंड प्रदान किया जाएगा। कार्य पूरा होने के सात दिनों के भीतर राशि श्रमिकों के बैंक खाते में जमा कर दी जाएगी, जिससे योजना के तहत मज़दूरी के भुगतान में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकेगी। योजना के मसौदे में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी स्थिति में कार्य पूरा होने के पश्चात् 15 दिनों के भीतर मज़दूरी का भुगतान करना अनिवार्य होगा। इससे पूर्व केरल ने शुरू की थी योजना इस योजना के कार्यान्वयन के साथ ही शहरी गरीबों के लिये रोज़गार गारंटी योजना शुरू करने वाला झारखंड देश का दूसरा राज्य बन जाएगा, जबकि इससे पूर्व केवल केरल सरकार द्वारा इस प्रकार की व्यवस्था की गई थी। ध्यातव्य है कि केरल में ‘अय्यनकाली शहरी रोज़गार गारंटी योजना’ (Ayyankali Urban Employment Guarantee Scheme) का कार्यान्वयन किया जा रहा है। केरल सरकार की यह योजना भी मनरेगा (MGNREGA) के ही समान है, किंतु इसमें ग्रामीण श्रमिकों के स्थान पर शहरी गरीबों को लक्षित किया गया है। केरल सरकार की इस योजना में महिलाओं को खास प्राथमिकता दी गई है, योजना से संबंधित नियमों के अनुसार, योजना के कुल लाभार्थियों में से लगभग 50 प्रतिशत महिलाएँ होंगी। योजना की आवश्यकता भारत में यह एक बहुप्रचलित धारणा है कि गरीब का मतलब ग्रामीण होता है, जो कि आंशिक रूप से भले ही सही हो सकता है, किंतु पूर्ण रूप से सही नहीं है। इस धारणा के कारण देश में ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिये तो काफी योजनाएँ बनाई गई हैं, किंतु शहरी क्षेत्रों को केंद्र में रखकर को कोई भी योजना नहीं बनाई है। ऐसे में जब भी कोई संकट आता है, तो इसके कारण देश की शहरी आबादी काफी अधिक प्रभावित होती है। महत्त्व एक अनुमान के अनुसार, राज्य के लगभग 13-14 लाख परिवार शहरी क्षेत्रों में रहते हैं, जिसमें से तकरीबन 15 प्रतिशत लोग आकस्मिक मज़दूर के रूप में कार्य करते हैं।

आँकड़ों के मुताबिक, कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के मद्देनज़र लागू किये गए लॉकडाउन के कारण झारखंड के शहरी क्षेत्रों के तकरीबन 25 प्रतिशत परिवार काफी बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। वहीं दूसरी ओर कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के 1 मई से अब तक झारखंड में लगभग पाँच लाख से अधिक प्रवासी श्रमिक अन्य क्षेत्रों से वापस लौट कर आए हैं, जिन्हें आजीविका उपलब्ध कराना राज्य सरकार के समक्ष एक बड़ी चुनौती बन गया है। झारखंड समेत देश के विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने राज्य सरकार के इस कदम की सराहना की है। विशेषज्ञों के अनुसार, झारखंड सरकार की इस नई योजना के कार्यान्वयन से कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के प्रकोप के बाद शहरी क्षेत्रों लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों को काफी मदद मिलेगी।उल्लेखनीय है कि झारखंड के राज्य ग्रामीण विकास विभाग द्वारा अब तक 2.5 लाख प्रवासी श्रमिकों का कौशल सर्वेक्षण किया गया है और इस सर्वेक्षण से यह ज्ञात हुआ है कि विभिन्न राज्यों से लौटे 30 प्रतिशत श्रमिक अकुशल श्रमिक हैं। निष्कर्ष झारखंड सरकार द्वारा शुरू की जा रही यह योजना मौजूदा परिस्थितियों के संदर्भ में एक सराहनीय कदम है, आवश्यक है कि राज्य सरकार द्वारा तैयार किये गए मसौदे पर सभी हितधारकों के साथ विचार विमर्श किया जाए और सभी उपयुक्त सुझावों के साथ इसमें सुधार कर इसे जल्द-से-जल्द लागू किया जाए, ताकि महामारी से प्रभावित गरीब श्रमिक को तत्काल इस योजना से लाभ प्राप्त हो सके।

भारत सरकार के सामाजिक विकास कार्यक्रम MGNREGA के आधार पर झारखंड सरकार शहरी अकुशल श्रमिकों के लिये रोज़गार गारंटी योजना शुरू करने पर विचार कर रही है। प्रमुख बिंदु झारखंड सरकार की इस योजना के तहत शहरी श्रमिक कम-से-कम 100 दिन का रोज़गार प्राप्त कर सकेंगे। ध्यातव्य है कि झारखंड सरकार की यह योजना अपने मूल उद्देश्य में भारत सरकार के महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम अर्थात् मनरेगा कार्यक्रम से पूरी तरह विपरीत है।जहाँ एक ओर केंद्र सरकार के मनरेगा कार्यक्रम में मुख्य रूप से अकुशल श्रम करने के इच्छुक ग्रामीण वयस्कों को लक्षित किया गया है, वहीं झारखंड सरकार की इस योजना में राज्य के शहरी श्रमिकों को लक्षित किया गया है। झारखंड के शहरी गरीबों को मौजूद संकट के दौर में आजीविका का एक साधन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की जा रही इस योजना का नाम मुख्यमंत्री श्रमिक (SHRAMIK- Shahri Rozgar Manjuri For Kamgar) योजना रखा जाएगा। गौरतलब है कि इस योजना के तहत दी जाने वाली मज़दूरी राज्य में मनरेगा (MGNREGA) कार्यक्रम के तहत दी जा रही मज़दूरी से लगभग 40 प्रतिशत अधिक होगी। विदित हो कि झारखंड में मनरेगा कार्यक्रम के तहत प्रतिदिन 194 रुपए के हिसाब से भुगतान किया जाता है। इस संबंध में तैयार किये गए मसौदे के अनुसार, योजना के तहत काम, मांग के आधार पर प्रदान किया जाएगा और इसमें काम को स्वच्छता, जल संचयन, वृक्षारोपण, सार्वजनिक निर्माण या मरम्मत और आश्रय गृहों के प्रबंधन जैसी विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। मनरेगा की तरह झारखंड सरकार की योजना में भी बेरोज़गारी भत्ते का प्रावधान किया गया है, योजना के तहत बेरोज़गारी भत्ता तभी प्रदान किया जाएगा, जब कोई शहरी स्थानीय निकाय रोज़गार की मांग करने वाले व्यक्ति को 15 दिन के भीतर रोज़गार उपलब्ध कराने में विफल रहता है। ध्यातव्य है कि इस कार्य के लिये शहरी स्थानीय निकायों (Urban Local Bodies-ULBs) को अलग से फंड प्रदान किया जाएगा। कार्य पूरा होने के सात दिनों के भीतर राशि श्रमिकों के बैंक खाते में जमा कर दी जाएगी, जिससे योजना के तहत मज़दूरी के भुगतान में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकेगी। योजना के मसौदे में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी स्थिति में कार्य पूरा होने के पश्चात् 15 दिनों के भीतर मज़दूरी का भुगतान करना अनिवार्य होगा। इससे पूर्व केरल ने शुरू की थी योजना इस योजना के कार्यान्वयन के साथ ही शहरी गरीबों के लिये रोज़गार गारंटी योजना शुरू करने वाला झारखंड देश का दूसरा राज्य बन जाएगा, जबकि इससे पूर्व केवल केरल सरकार द्वारा इस प्रकार की व्यवस्था की गई थी। ध्यातव्य है कि केरल में ‘अय्यनकाली शहरी रोज़गार गारंटी योजना’ (Ayyankali Urban Employment Guarantee Scheme) का कार्यान्वयन किया जा रहा है। केरल सरकार की यह योजना भी मनरेगा (MGNREGA) के ही समान है, किंतु इसमें ग्रामीण श्रमिकों के स्थान पर शहरी गरीबों को लक्षित किया गया है। केरल सरकार की इस योजना में महिलाओं को खास प्राथमिकता दी गई है, योजना से संबंधित नियमों के अनुसार, योजना के कुल लाभार्थियों में से लगभग 50 प्रतिशत महिलाएँ होंगी। योजना की आवश्यकता भारत में यह एक बहुप्रचलित धारणा है कि गरीब का मतलब ग्रामीण होता है, जो कि आंशिक रूप से भले ही सही हो सकता है, किंतु पूर्ण रूप से सही नहीं है। इस धारणा के कारण देश में ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिये तो काफी योजनाएँ बनाई गई हैं, किंतु शहरी क्षेत्रों को केंद्र में रखकर को कोई भी योजना नहीं बनाई है। ऐसे में जब भी कोई संकट आता है, तो इसके कारण देश की शहरी आबादी काफी अधिक प्रभावित होती है। महत्त्व एक अनुमान के अनुसार, राज्य के लगभग 13-14 लाख परिवार शहरी क्षेत्रों में रहते हैं, जिसमें से तकरीबन 15 प्रतिशत लोग आकस्मिक मज़दूर के रूप में कार्य करते हैं। आँकड़ों के मुताबिक, कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के मद्देनज़र लागू किये गए लॉकडाउन के कारण झारखंड के शहरी क्षेत्रों के तकरीबन 25 प्रतिशत परिवार काफी बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। वहीं दूसरी ओर कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के 1 मई से अब तक झारखंड में लगभग पाँच लाख से अधिक प्रवासी श्रमिक अन्य क्षेत्रों से वापस लौट कर आए हैं, जिन्हें आजीविका उपलब्ध कराना राज्य सरकार के समक्ष एक बड़ी चुनौती बन गया है।

जापान की एक स्थानीय परिषद में चीन और ताइवान के साथ विवादित सेनकाकू द्वीपीय क्षेत्र में स्थित कुछ द्वीपों की प्रशासनिक स्थिति बदलने वाले विधेयक को मंज़ूरी दी गई है। प्रमुख बिंदु: विधेयक के अनुसार, टोक्यो द्वारा नियंत्रित सेनकाकू द्वीप के पास स्थित एक द्वीप जिसे जापान में 'टोनोशीरो' (Tonoshiro) तथा ताइवान और जापान में दियोयस (Diaoyus) के नाम से जाना जाता है, का नाम बदलकर टोनोशीरो सेनकाकू (Tonoshiro Senkaku) कर दिया गया है । ओकिनावा द्वीप पर ‘इशिगाकी’ नामक एक नगर स्थित है। इशिगाकी नगर परिषद के एक हिस्से को टोनोशीरो के रूप में भी जाना जाता है, इससे लोगों में क्षेत्र को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। अत: इस भ्रम की स्थिति से बचने के लिये क्षेत्र के नाम में परिवर्तन किया गया है। चीन की प्रतिक्रिया: चीन, डियाओयू द्वीप तथा उससे संबद्ध क्षेत्र को अपनी सीमा में स्थित मानता है। चीन के अनुसार जापान द्वारा क्षेत्र की प्रशासनिक स्थिति में किया गया बदलाव चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता का उल्लंघन करता है तथा चीन अपनी संप्रभुता की रक्षा करने के लिये दृढ़ है। इसके अतिरिक्त चीन ने द्वीपों के आसपास के क्षेत्र में ‘जहाजों के बेड़े’ को भेज दिया है। ताइवान की प्रतिक्रिया: ताइवान का कहना है कि डियाओयू द्वीपीय क्षेत्र उसके क्षेत्र का हिस्सा है तथा इन द्वीपों की प्रशासनिक स्थिति में किया जाने वाला किसी प्रकार का बदलाव ताइवान के लिये अमान्य है। सेनकाकू द्वीप विवाद: अवस्थिति:इस विवाद का कारण पूर्वी चीन सागर में स्थित आठ निर्जन द्वीप हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 7 वर्ग किमी. है. ये ताइवान के उत्तर-पूर्व, चीनी मुख्य भूमि के पूर्व में और जापान के दक्षिण-पूर्व प्रांत, ओकिनावा के दक्षिण-पश्चिम में स्थित हैं। पृष्ठभूमि:सेनकाकू/डियाओयू द्वीपों को औपचारिक रूप से वर्ष 1895 से जापान द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एक लघु अवधि के लिये संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा भी इस क्षेत्र को नियंत्रित किया गया था। यहाँ के अनेक द्वीपों पर लोगों का निजी नियंत्रण रहा है। चीन ने वर्ष 1970 के दशक में इस क्षेत्र पर ऐतिहासिक अधिकारों का हवाला देते हुए सेनकाकू/दियाओयू द्वीपों पर दावे करना शुरू कर दिया। सितंबर, 2012 में जापान द्वारा एक निजी मालिक से विवादित द्वीपों को खरीदने पर तनाव फिर से शुरू हो गया। विवादित क्षेत्र का आर्थिक महत्त्व: यहाँ संभावित तेल एवं प्राकृतिक गैस के भंडार हैं, प्रमुख शिपिंग मार्गों के पास स्थित है, समृद्ध मत्स्यन क्षेत्र में स्थित है। विवाद का कारण: यह क्षेत्र चीन-जापान-ताइवान के अतिव्यापी Exclusive Economic Zone- (EEZ) में स्थित है क्योंकि चीन और जापान को अलग करने वाले पूर्वी चीन सागर की लंबाई केवल 360 समुद्री मील है, जबकि EEZ की लंबाई 200 समुद्री मील मानी जाती है। अमेरिका की भूमिका: वर्ष 2014 में अमेरिका ने यह स्पष्ट किया था जापान की सुरक्षा के लिये की गई 'अमेरिका-जापान सुरक्षा संधि' विवादित द्वीपों को भी कवर करती है। अत: सेनकाकू द्वीप विवाद में अमेरिका भी शामिल हो सकता है। निष्कर्ष: बढ़ती राष्ट्रवादी भावना तथा राजनीतिक अविश्वास देशों को बड़े संघर्ष की ओर ले जा सकता है, अत: देशों को चाहिये कि वे विवाद का शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालने का प्रयास करें।

प्रेसेना ग्लेशियर Presena glacier हाल ही में पर्यावरणीय संरक्षणवादियों के एक दल ने ग्लोबल वार्मिंग के कारण उत्तरी इटली में प्रेसेना ग्लेशियर (Presena Glacier) को पिघलने से रोकने के लिये इसके 100,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में जियोटेक्सटाइल तिरपाल शीट बिछाने की प्रक्रिया शुरू की। प्रमुख बिंदु: स्की सीज़न (Ski Season) की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत के साथ ही यह 6 सप्ताह की प्रक्रिया (ग्लेशियर संरक्षण की प्रक्रिया) प्रत्येक वर्ष दोहराई जाती है। जबकि प्रेसेना ग्लेशियर पर से तिरपाल शीट हटाने की प्रक्रिया सितंबर महीने से शुरू होती है। स्की सीज़न (Ski Season): यह एक ऐसी अवधि है जब स्कीइंग (Skiing), स्नोबोर्डिंग (Snowboarding) एवं अन्य अल्पाइन स्पोर्ट्स स्की रिसॉर्ट के लिये अनुकूल होते हैं। स्कीइंग, बर्फ पर फिसलने के लिये स्की का उपयोग करके चलने का एक साधन है। एक स्की रिसॉर्ट स्कीइंग, स्नोबोर्डिंग एवं अन्य शीतकालीन खेलों के लिये विकसित एक रिसॉर्ट है। गौरतलब है कि ग्लेशियर को ढकने के लिये जियोटेक्सटाइल तिरपाल (Geotextile Tarpaulins) का प्रयोग किया जा रहा है जो सूर्य की किरणों को परावर्तित करता है और भीतर के तापमान को बाहर के तापमान से कम बनाए रखता है। इसके जरिये बड़े स्तर पर बर्फ को संरक्षित करने में मदद मिलती है। ग्लेशियर संरक्षण परियोजना पहली बार वर्ष 2008 में इटालियन फर्म कारोसेलो-टोनाले (Carosello-Tonale) द्वारा शुरू की गई थी। उस समय प्रेसेना ग्लेशियर के केवल 30,000 वर्ग मीटर क्षेत्र को कवर किया गया था। वर्ष 1993 से प्रेसेना ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिंग के कारण अपनी मात्रा का एक तिहाई से अधिक भाग खो चुका है। प्रेसेना ग्लेशियर (Presena Glacier): यह उत्तरी इटली में ट्रेंटिनो (Trentino) एवं लोम्बार्डी (Lombardy) के क्षेत्रों के बीच अवस्थित है। यह ग्लेशियर प्रेसनेल्ला माउंटेन (Presanella Mountain) समूह का हिस्सा है।

COVID-19 के बाद आये एक वैश्विक आर्थिक संकट के बाद अमेरिकी सरकार ने 31 दिसम्बर, 2020 तक ‘ग्रीन कार्ड और गैर-प्रवासी कार्य वीज़ा’ को निलंबित करने का फैसला किया है। इसका उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों के लिए नौकरियां सुरक्षित करना है। इस कार्यकारी आदेश पर 22 जून, 2020 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हस्ताक्षर किए। पृष्ठभूमि ग्रीन कार्ड और गैर-प्रवासी वर्क वीजा के निलंबन से अमेरिका में लगभग 5,25,000 नौकरियां पैदा होंगी। कोविड ​​-19 के कारण, रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका में रिकॉर्ड 47 मिलियन लोग अपनी नौकरी खो सकते हैं। निलंबित कार्य वीजा एच -1 बी H-4 कुछ H-1B पति-पत्नी के लिए कम कौशल श्रमिकों के लिए एच -2 बी इंट्रा-कंपनी ट्रांसफर के लिए एल -1 शैक्षणिक व सांस्कृतिक कर्मियों के लिए J वीज़ा एच -1 बी वीजा कार्यक्रम में सुधार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने प्रशासन को वर्तमान एच -1 बी वीज़ा कार्यक्रम में सुधार करने के निर्देश दिए थे। सुधार के अनुसार, अप्रवासी श्रमिक जिन्हें भर्तीकर्ता द्वारा उच्चतम मजदूरी की पेशकश की जाती है, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी, यह सुनिश्चित करता है कि संयुक्त राज्य के नागरिकों के वेतन की रक्षा की जाए क्योंकि नियोक्ता कम लागत वाले विदेशी श्रम की भर्ती नहीं कर पाएंगे। भारत पर प्रभाव हर साल H-1B वीजा 85,000 लोगों को ही जारी किया जाता है, इनमें से रिकॉर्ड के अनुसार वीजा कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थी भारतीय थे। कुल 85,000 लाभार्थियों में से 70 प्रतिशत से अधिक भारत से हैं।

ओडिशा के पूरी में जगन्नाथ यात्रा का आयोजन किया गया, इसमें श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। हालांकि इस बार COVID-19 के कारण आयोजन स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी दिशानिर्देशों के मुताबिक हुआ। इस मौके पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों को शुभकामनाएं दी। रथ यात्रा का पौराणिक इतिहास यह घटना भगवान जगन्नाथ को अपने भाई, भगवान बलराम और बहन सुभद्रा के साथ रथ में यात्रा करते हुए चिह्नित करती है। यह दुनिया भर से तीर्थयात्रियों और आगंतुकों को आकर्षित करता है। त्योहार प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है। इसकी उत्पत्ति के बारे में एक किंवदंती के अनुसार, जगन्नाथ ने प्रति वर्ष एक सप्ताह के लिए अपने जन्मस्थान पर जाने की इच्छा व्यक्त की है। इस प्रकार, देवताओं को हर साल गुंडिचा मंदिर, पुरी, ओडिशा ले जाया जाता है। एक अन्य किंवदंती के अनुसार, सुभद्रा, अपने माता-पिता के घर द्वारका जाना चाहती थीं, और उनके भाई इस दिन उन्हें वापस द्वारका ले गए। रथ यात्रा उस यात्रा का एक स्मरणोत्सव है। भगवद पुराण के अनुसार, यह भी माना जाता है कि इसी दिन कृष्ण और बलराम कासना के निमंत्रण पर एक कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए मथुरा गए थे। रथ यात्रा से पहले स्नान यात्रा जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को जय जगन्नाथ और` हरिबोल` के अनुष्ठानों और मंत्रोच्चार के बीच जप-तप और स्नान के दौरान स्नान के रूप में जाना जाता है, और जयंती माह की पूर्णिमा के दिन शंखनाद किया जाता है। रथ यात्रा से पहले अनावर्ष स्नान समारोह चित्रित लकड़ी के देवताओं को अलग करता है। इसलिए मुख्य पुजारी को छोड़कर किसी को भी 15 दिनों की अवधि के लिए श्रद्धांजलि अर्पित करने और दर्शन करने की अनुमति नहीं है, जिसे अनावर्ष समय के रूप में जाना जाता है। कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ ने स्वयं राजा इंद्रद्युम्न को इस अनावर्ष काल के बारे में आदेश दिया था। रथ यात्रा से पहले नेत्रोत्सव भगवान जगन्नाथ के कट्टर भक्त के लिए, अनावर्ष समय वास्तव में अलगाव का एक कठिन समय है। चित्रों को फिर से चित्रित किया जाता है और श्रद्धालुओं को देखने और श्रद्धांजलि देने के लिए रत्नावेदी या मुख्य मंच पर लाया जाता है। इस समारोह को नेत्रोत्सव नाम दिया गया है। इस दिन लोग सभी नए और युवा रूप में देवताओं को देखने का अवसर लेते हैं। इसे नव यौवन दर्शन कहा जाता है। रथ यात्रा से पहले नबाकलेबेरा नबाकलेबारा पुरी और दुनिया के अधिकांश जगन्नाथ मंदिरों से जुड़ा एक प्राचीन अनुष्ठान है, जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की मूर्तियों को मूर्तियों के नए सेट से बदल दिया जाता है। मुख्य रथ यात्रा महोत्सव “कार फेस्टिवल” की मुख्य यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा की बड़ी प्रतिमाएँ शामिल हैं, जिन्हें प्रत्येक वर्ष, प्रत्येक रथ पर, मंदिर से, जहाँ जगन्नाथ का रथ, नंदीघोष, 35 फीट का चौकोर है, मंदिर से ले जाया जाता है।बलभद्र के रथ को तलध्वज कहा जाता है, जिसका रंग नीला होता है और इसमें 14 पहिए होते हैं। सुभद्रा का रथ सबसे छोटा है, जिसमें 12 पहिए हैं और इसे देवदलन कहा जाता है। भगवान जगन्नाथ की मासिर बारी फिर मंदिर से चित्रों को दो मील दूर गुंडिचा बारी के जगन्नाथ के घर में ले जाया जाता है। वे एक पखवाड़े के लिए एकांत स्थान पर सीमित रहते हैं जहाँ उनका उपचार किया जाता है, उन्हें विशेष आयुर्वेदिक दवा और कुछ विशेष तरल आहार दिए जाते हैं जिन्हें सरपना कहा जाता है। एक सप्ताह के आराम के बाद, उन्हें पुरी के मंदिर में वापस ले जाया जाता है। यह वापसी कार उत्सव या बाहुडा यात्रा आषाढ़ शुक्ल दशमी से शुरू होती है। रथयात्रा के दिन, मंदिर के कर्मचारी और मंडली के सदस्य भारी मात्रा में खाद्य पदार्थों को पकाते हैं, और हर कोई महाप्रसादम का आनंद लेने के लिए उतना ही आनंद लेता है जितना कि वे उपभोग करने के लिए करते हैं। पुरी की रथ यात्रा की निरंतर सफलता ओडिशा के लिए इतनी महत्वपूर्ण है कि राज्य सरकार ने यात्रा को “राज्य उत्सव” घोषित किया है।

23 जून, 1894 में अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति की स्थापना पेरिस में की गयी थी। इसके चलते 23 जून को अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति के स्थापना दिवस को मनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक दिवस पहली बार वर्ष 1948 में मनाया गया था। कुल 9 देशों ने अपने-अपने देशों में 1948 में इस दिवस को मनाया। 2020 के लिए महत्व महामारी के इन समय के दौरान, अपने होम वर्कआउट को साझा करके, ओलंपियन दुनिया भर में कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं। एक महामारी के समय ओलंपियन द्वारा किए गए ये प्रयास हर किसी को मन और शरीर में स्वस्थ रहने के लिए सक्रिय होने के महत्व का एहसास कराते है। अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति द्वारा ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन ओलंपिक खेलों का आयोजन किया जाता है। यह एक गैर-सरकारी खेल संगठन है जिसका मुख्यालय स्विट्जरलैंड के लॉसेन में है। इसकी स्थापना पियरे डी कुबरटिन और डेमेत्रियोस विकेलस ने 23 जून, 1894 को की थी।

सीबीआईसी द्वारा “तुरंतकस्टम्स”कार्यक्रमके तहत पेपरलेस एक्सपोर्ट्स की सुविधा दी गयी केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) के चेयरमैन श्री अजीत कुमारने एक सुरक्षित क्यूआर कोड शिपिंग बिल का अनावरण किया, जिसे सीमा शुल्क विभाग द्वारा निर्यात की अनुमति देने के बाद निर्यातकों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से भेजा जाएगा। इससे निर्यात के प्रमाण के लिएनिर्यातकों को सीमा शुल्क अधिकारियों से संपर्क करने की आवश्यकता समाप्त हो गयी है। इसके माध्यम से शिपिंग बिल को जमा करने से लेकर निर्यात-अनुमति के अंतिम आदेश तक, सीमा शुल्क निर्यात प्रक्रिया पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक आधारित भी हो गयी है। आज की पहल सीबीआईसी द्वारा अपने “तुरंतकस्टम्स”कार्यक्रम के तहत फेसलेस, पेपरलेस और कॉन्टैक्टलेस कस्टम्सकी ओर एक और कदम है। ये सुधार आयातकों, निर्यातकों और अन्य हितधारकों के लिए समय और लागत को कम करने के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकी के उन्नत उपयोग पर आधारित हैं, जिससे वर्ल्ड बैंक के डूइंग बिजनेस रिपोर्ट के सीमा-पार व्यापार मानकों के सन्दर्भ में भारत की रैंकिंग में सुधार हुआ है। निर्यात के लिए पेपरलेस दस्तावेज का शुभारंभ,15 अप्रैल 2020 को आयात के लिए शुरू की पहल की अगली कड़ी है। शिपिंग बिल को इलेक्ट्रॉनिक रूप में भेजने से इन दस्तावेजों को कागज में प्रस्तुत करने की वर्तमान आवश्यकता दूर हो जायेगी, जिससे ग्रीन कस्टम्स को बढ़ावा मिलेगा। निर्यातकों को इस उद्देश्य के लिए सीमा शुल्क कार्यालय जाने की जरूरत नहीं रह जायेगी और वे व्यवसाय को बढ़ावा देने में अपने समय का बेहतर उपयोग कर सकेंगे। श्री अजीत कुमार ने कहा कि यह सीमाशुल्क क्लीयरेंस प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और त्वरित बनाने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग करने का प्रयास है। “तुरंत कस्टम्स”, जिसका मुख्य घटक फेसलेस असेसमेंट है, को विभिन्न चरणों में 1 जनवरी 2021 तक पूरे देश में लागू किया जाएगा।

क्रय शक्ति समानताएं और भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार: 2017 अंतरराष्ट्रीय तुलना कार्यक्रम के परिणाम विश्व बैंक ने अंतरराष्ट्रीय तुलना कार्यक्रम (आईसीपी) के तहत संदर्भ वर्ष 2017 के लिए नई क्रय शक्ति समानताएं (पीपीपी) जारी की हैं जो विश्व भर की अर्थव्यवस्थाओं में जीवन की लागत में अंतरों को समायोजित करती है। वैश्विक रूप 176 अर्थव्यवस्थाओं ने आईसीपी के 2017 चक्र में भाग लिया। 2. अंतरराष्ट्रीय तुलना कार्यक्रम (आईसीपी) संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी आयोग (यूएनएससी) के दिशानिर्देश के तहत दुनिया की सबसे बड़ी डाटा-संग्रह पहल है जिसका लक्ष्य क्रय शक्ति समानताओं (पीपीपी) की उत्पत्ति करना है जो सभी अर्थव्यवस्थाओं के बीच तुलना किए जाने के लिए आर्थिक गतिविधियों के उपायों को रूपांतरित करने के लिए अहम हैं। पीपीपी के साथ-साथ, आईसीपी मूल्य स्तर सूचकांकों (पीएलआई) और जीडीपी व्यय के अन्य क्षेत्रीय तुलना योग्य समुच्चयों की भी उत्पत्ति करता है। 3. भारत ने 1970 में इसकी शुरूआत से लगभग सभी आईसीपी दौरों में भाग लिया है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय भारत के लिए राष्ट्रीय कार्यान्वयन एजंसी (एनआईए) है जिसके पास राष्ट्रीय आईसीपी कार्यकलापों के योजना निर्माण, समन्वयन तथा कार्यान्वयन की जिम्मेदारी है। भारत को आईसीपी 2017 चक्र के लिए स्टैटिक्स आस्ट्रिया के साथ-साथ आईसीपी गवर्निंग बोर्ड का सह अध्यक्ष बनने का गौरव भी हासिल होता रहा है। विश्व व्यापी स्थिति 4. सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) स्तर पर प्रति डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की क्रय शक्ति समानताएं (पीपीपी) 2017 में 20.65 है जो 2011 में 15.55 थी। भारतीय रुपये का अमेरिकी डॉलर के साथ विनिमय दर समान वर्ष की इसी अवधि के 46.67 के मुकाबले अब 65.12 है। इसके तदनुरूप बाजार विनिमय दर का पीपीपी का अनुपात-मूल्य स्तर सूचकांक (पीएलआई) का उपयोग भारत की अर्थव्यवस्था की कीमत के स्तरों की तुलना के लिए किया जाता है जो 2011 के 42.99 की तुलना में 2017 में 47.55 है। 5. 2017 में, भारत ने तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी वैश्विक स्थिति को बनाये रखा तथा इसे मजबूत बनाया, जो क्रमशः चीन (16.4 प्रतिशत) और अमेरिका (16.3 प्रतिशत) की तुलना में पीपीपी के लिहाज से वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6.7 प्रतिशत (वैश्विक रूप से कुल 119,547 बिलियन अमेरिकी डॉलर में से 8,051 बिलियन अमेरिकी डॉलर) था। भारत वैश्विक वास्तविक एकल उपभोग एवं वैश्विक सकल पूंजी निर्माण में अपने पीपीपी आधारित हिस्से के लिहाज से भी तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। क्षेत्रीय स्थिति: एशिया-प्रशांत क्षेत्र 6. 2017 में, भारत ने विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी क्षेत्रीय स्थिति बनाये रखी जो पीपीपी के लिहाज से क्षेत्रीय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 20.83 प्रतिशत (एशिया प्रशांत के कुल 232,344 बिलियन हांगकांग डॉलर में से 48,395 हांगकांग डॉलर) था, जहां चीन का प्रतिशत 50.76 प्रतिशत (प्रथम) तथा इंडोनेशिया का 7.49 प्रतिशत (तृतीय) था। भारत क्षेत्रीय वास्तविक एकल उपभोग एवं क्षेत्रीय सकल पूंजी निर्माण में अपने पीपीपी आधारित हिस्से के लिहाज से भी दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। 7. एशिया प्रशांत क्षेत्र में 22 प्रतिभागी देशों के बीच सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर प्रति हांगकांग डॉलर भारतीय रुपये की क्रय शक्ति समानता (पीपीपी) अब 2017 में 3.43 है जबकि 2011 में यह 2.97थी। भारतीय रुपये से हांगकांग डॉलर की विनिमय दर इसी अवधि की तुलना में 6.00 से बढ़कर अब 8.36 है। भारत का मूल्य स्तर सूचकांक (पीएलआई) 2011 के 71.00 की तुलना में अब 2017 में 64.00 है। 8. आईसीपी 2017 के परिणाम आईसीपी वेबसाइट और विश्व बैंक के डाटाबैंक तथा डाटा कैटलॉग पर उपलब्ध हैं। पूर्व आईसीपी संदर्भ वर्ष, 2011 के संशोधित परिणाम तथा 2012-2016 की अवधि के लिए वार्षिक पीपीपी के अनुमान भी जारी कर दिए गए। अगली आईसीपी तुलना संदर्भ वर्ष 2021 के लिए की जाएगी।

कोविड-19 से लड़ाई में पीएम केयर्स फंड के अंतर्गत दिए जाएंगे 50,000 मेड इन इंडिया वेंटिलेटर पीएम केयर्स फंड ट्रस्ट ने सभी राज्यों/ संघ शासित क्षेत्रों में सरकार द्वारा चलाए जा रहे कोविड अस्पतालों को 50,000 ‘मेड इन इंडिया’ वेंटिलेटर की आपूर्ति के लिए 2,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। इसके अलावा प्रवासी कामगारों के कल्याण के लिए 1,000 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की गई है। 50,000 वेंटिलेटर में से 30,000 वेंटिलेटर एम/एस भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड द्वारा बनाए जा रहे हैं। बाकी 20,000 वेंटिलेटर एग्वा हैल्थकेयर (10,000), एएमटीजेड बेसिक (5,650), एएमटीजेड हाई एंड (4,000) और एलायड मेडिकल (350) द्वारा बनाए जा रहे हैं। अभी तक 2,923 वेंटिलेटर बनाए जा चुके हैं, जिनमें से 1,340 वेंटिलेटरों की आपूर्ति राज्यों/ संघ शासित क्षेत्रों को कर दी गई है। वेंटिलेटर हासिल करने वाले प्रमुख राज्यों में महाराष्ट्र (275), दिल्ली (275), गुजरात (175), बिहार (100), कर्नाटक (90), राजस्थान (75) शामिल हैं। जून, 2020 के अंत तक सभी राज्यों/ संघ शासित क्षेत्रों को अतिरिक्त 14,000 वेंटिलेटर की आपूर्ति कर दी जाएगी। इसके अलावा प्रवासी कामगारों के कल्याण के लिए राज्यों/ संघ शासित क्षेत्रों को 1,000 करोड़ रुपये की धनराशि पहले ही जारी की जा चुकी है। सभी राज्यों/ संघ शासित क्षेत्रों को 2011 की जनसंख्या के लिए 50 प्रतिशत भार, पॉजिटिव कोविड-19 मामलों की संख्या के लिए 40 प्रतिशत भार और सभी को समान रूप से 10 प्रतिशत के फॉर्मूले के आधार पर कोष का वितरण किया गया है। इस सहायता को प्रवासियों के आश्रय, खाना, चिकित्सा उपचार और परिवहन की व्यवस्था में उपयोग किया जाना है। इस धनराशि को हासिल करने वालों में महाराष्ट्र (181 करोड़ रुपये), उत्तर प्रदेश (103 करोड़ रुपये), तमिलनाडु (83 करोड़ रुपये), गुजरात (66 करोड़ रुपए), दिल्ली (55 करोड़ रुपये), पश्चिम बंगाल (53 करोड़ रुपये), बिहार (51 करोड़ रुपये), मध्य प्रदेश (50 करोड़ रुपये) राजस्थान (50 करोड़ रुपये) और कर्नाटक (34 करोड़ रुपये) प्रमुख हैं।

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