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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित की अपील सेशंस कोर्ट में की जानी चाहिए, न कि हाई कोर्ट में। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा, "...जब फर्स्ट क्लास या सेकंड क्लास मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए ट्रायल में दोषी ठहराया जाता है तो अपील सेशंस कोर्ट में होती है। BNSS की धारा 413 के प्रावधान के अनुसार, बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित द्वारा दायर अपील भी उसी कोर्ट में होनी चाहिए, जहां ऐसे कोर्ट के दोषी ठहराने के आदेश के खिलाफ आम तौर पर अपील की जाती है। इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा बरी करने के आदेश के खिलाफ उसी कोर्ट में अपील की जानी चाहिए जहां मजिस्ट्रेट द्वारा दोषी ठहराने के आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है, और वह सेशंस कोर्ट है।" उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें याचिकाकर्ता-पीड़ित की बरी करने के खिलाफ अपील पर विचार करने से इनकार कर दिया गया था, लेकिन उन्हें सेशंस कोर्ट में अपील दायर करने की इजाज़त दी गई थी। याचिकाकर्ता का बेटा डिप्रेशन (अवसाद) से पीड़ित था। उसने अस्पताल में भर्ती होने के बाद आत्महत्या कर ली। याचिकाकर्ता का आरोप है कि डॉक्टर और नर्स की लापरवाही के कारण उसकी मौत हुई। IPC की धारा 304A और धारा 34 के तहत FIR दर्ज की गई। जुडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के बाद याचिकाकर्ता ने कलकत्ता हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने अपील करने का अधिकार नहीं है और सेशंस कोर्ट जाने की छूट दी। इससे असंतुष्ट होकर पीड़ित सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। विवादित निष्कर्षों में दखल देने से इनकार करते हुए कोर्ट ने BNSS की धाराओं 413, 415(3) और 419 के बीच संबंध की जांच की। कोर्ट ने कहा कि धारा 419, जो आम तौर पर बरी करने के खिलाफ अपील से संबंधित है, पीड़ित द्वारा दायर अपील पर लागू नहीं होती है, क्योंकि धारा 413 का प्रावधान विशेष रूप से लागू होने वाला उपाय बताता है। धारा 413 का प्रावधान पीड़ित को उस आदेश के खिलाफ अपील करने का अधिकार देता है, जिसके तहत आरोपी को बरी कर दिया गया हो; आरोपी को कम गंभीर अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो; या अपर्याप्त मुआवज़ा तय किया गया हो। महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी अपील उस अदालत में की जाती है "जिसमें आम तौर पर उस अदालत के दोषसिद्धि के आदेश के खिलाफ अपील की जाती है।" BNSS की धारा 415(3) के तहत फर्स्ट या सेकंड क्लास मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए ट्रायल में दोषी ठहराया गया आरोपी सेशन कोर्ट में अपील कर सकता है। इसलिए अदालत ने माना कि मजिस्ट्रेट द्वारा बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ पीड़ित की अपील भी सेशन कोर्ट में ही दायर की जानी चाहिए, चाहे अपराध की प्रकृति कुछ भी हो। अदालत ने कहा, "इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा बरी करने के आदेश के खिलाफ उसी अदालत में अपील की जानी चाहिए, जिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा दोषी ठहराए जाने के आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है, और वह अदालत सेशन कोर्ट है।" इसके अनुसार, SLP खारिज की गई, लेकिन पीड़ित को सेशन कोर्ट में जाने की छूट दी गई। साथ ही यह भी कहा गया, "अगर इस आदेश की तारीख से एक महीने के भीतर अपील दायर की जाती है तो उसे स्वीकार किया जाएगा और मेरिट के आधार पर सुना जाएगा; इसमें उस देरी पर विचार नहीं किया जाएगा, जो याचिकाकर्ता द्वारा नेक नीयत से की गई कार्यवाही के कारण हुई।" Cause Title: Subhas Chandra Sarkar Versus The State of West Bengal & Ors.

Supreme Court Quashes POCSO Case Against Father In Custody Battle; Frames Safeguards To Curb Misuse Of Child Abuse Laws In Matrimonial Disputes https://www.verdictum.in/supreme-court/r-v-e-2026-insc-1049-safeguards-to-curb-misuse-of-child-abuse-laws-matrimonial-disputes-1622713

100_Legal_maxims__1658333320512.pdf4.11 KB

the_rajasthan_excise_act_1950_new-5.pdf8.44 KB

⚖️ BSA SECTION 146 — क्या Cross-Examination में गवाह से ऐसा सवाल पूछ सकते हैं जिसका जवाब पहले से सवाल में ही छिपा हो? जानिए “LEADING QUESTION” का कानून! क्या आपने Court में देखा है कि Advocate गवाह से सीधे पूछते हैं— “यह सही है कि आप घटना के समय वहाँ मौजूद नहीं थे?” ऐसे सवाल को कानून की भाषा में Leading Question कहा जाता है। 📌 BSA SECTION 146 क्या कहती है? Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 की Section 146 के अनुसार ऐसा प्रश्न, जिसमें पूछने वाला व्यक्ति वह उत्तर suggest करता है जिसे वह गवाह से प्राप्त करना चाहता है, Leading Question कहलाता है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात👇 ⚖️ Cross-Examination में Leading Questions पूछे जा सकते हैं। जबकि Examination-in-Chief और Re-Examination में सामान्यतः Leading Questions नहीं पूछे जा सकते, यदि opposite party objection करे, तो Court की permission आवश्यक हो सकती है। 🔥 इसका practical मतलब क्या है? Cross-Examination में Advocate गवाह को ऐसे सवालों के माध्यम से उसके previous statement, version, facts और credibility के संबंध में स्पष्ट उत्तर देने के लिए confront कर सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर सवाल किसी भी तरीके से पूछा जा सकता है। Cross-Examination relevant facts के दायरे में रहनी चाहिए और Court अनुचित या कानून के विरुद्ध questioning को नियंत्रित कर सकती है। ⚖️ एक महत्वपूर्ण बात — “Yes/No” सवाल हमेशा Leading नहीं होता Lal Singh @ Kitthu Silawat v. State of Madhya Pradesh, 24 July 2026 में Madhya Pradesh High Court ने BSA Sections 143, 146 और 157 की चर्चा करते हुए स्पष्ट किया कि केवल ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर “Yes” या “No” में दिया जा सकता है, वह अपने-आप Leading Question नहीं बन जाता। Court ने यह भी समझाया कि leading questions और अपने ही witness से cross-examination जैसी questioning की permission अलग-अलग concepts हैं। TV Today Network Ltd. v. Enormous Sports, Delhi High Court, 21 April 2025 में Court ने BSA Section 146 के तहत examination-in-chief में leading questions पर objection और cross-examination में leading questions की अनुमति के statutory distinction को माना। 👨‍⚖️ याद रखने वाली बात Examination-in-Chief → Leading Questions पर सामान्यतः restriction Cross-Examination → Leading Questions permissible और यदि witness के पुराने written statement से contradiction करना है, तो BSA Section 148 की अलग procedure भी ध्यान में रखनी होगी। 📌 यानी Cross-Examination केवल सवाल-जवाब नहीं है—सही सवाल, सही तरीके और सही legal provision का इस्तेमाल evidence की appreciation में महत्वपूर्ण हो सकता है। ⚠️ यह सामान्य कानूनी जागरूकता है। किसी specific case में evidence, pleadings, previous statements और Court record देखकर अलग legal strategy हो सकती है। #BSASection146 #CrossExamination #EvidenceLaw

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच देश भर में लंबित निष्पादन याचिकाओं (Execution Petitions) के निपटारे से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही है। बता दें, 6 मार्च, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट्स से देश भर की ज़िला अदालतों में लंबित निष्पादन याचिकाओं का डेटा इकट्ठा करने को कहा। कोर्ट ने इस मामले में सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन को 'एमिकस' (न्याय मित्र) नियुक्त किया। सुप्रीम कोर्ट ने निष्पादन याचिकाओं के निपटारे के लिए छह महीने की समय-सीमा तय की थी। सुनवाई के दौरान, कोर्ट को बताया गया कि 'कमर्शियल कोर्ट रूल्स, 2021' का ड्राफ्ट, जिसमें सभी ज़िला अदालतों में 'ज़िला निष्पादन सेल' (District Execution Cell) स्थापित करने का प्रस्ताव है, कमर्शियल मुकदमों में तेज़ी से निष्पादन के लिए एक प्रभावी तरीका साबित होगा। केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि इसे अधिसूचित नहीं किया गया क्योंकि यह 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर' के साथ टकराव पैदा करता है। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने गुरुवार को कहा कि केंद्र सरकार ड्राफ्ट नियमों को शामिल करने के लिए 'कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015' में संशोधन करने पर विचार कर रही है। इसके साथ ही 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर' में भी संबंधित संशोधन करने होंगे। एक अन्य वकील ने बताया कि 'कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट' की धारा 21 में एक 'ओवरराइडिंग प्रावधान' (सर्वोपरि प्रावधान) है, इसलिए CPC के साथ टकराव की स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए, और कमर्शियल मुकदमों के लिए ड्राफ्ट नियमों को अधिसूचित किया जा सकता है। इस पर जस्टिस पारदीवाला ने सुझाव दिया: "आप सभी एक्ट में ही यह कह सकते हैं कि निष्पादन अनुसूची (Schedule) के अनुसार होगा और आप एक ऐसी अनुसूची ला सकते हैं जो एक्ट का हिस्सा बन जाए। लेकिन आपको ऐसा करना होगा।" शंकरनारायणन ने उन मामलों से निपटने के लिए कुछ सुझाव भी दिए जिनमें मुकदमे अभी लंबित हैं। उन्होंने कहा कि लंबित मुकदमों में पक्षकार खुद अपनी संपत्ति की जानकारी दे सकते हैं। हालांकि, इस पर जस्टिस चंद्रन ने टिप्पणी की कि यह तरीका शायद काम न करे, क्योंकि जब तक मुकदमे में कोई डिक्री (अदालत का अंतिम आदेश) नहीं आ जाती, तब तक पक्षकारों से उनकी संपत्ति का विवरण नहीं मांगा जा सकता। जस्टिस पारदीवाला ने भी कहा कि फिलहाल बेंच इस पहलू पर विचार नहीं करेगी। आखिरकार, कोर्ट ने कोई आदेश पारित नहीं किया, क्योंकि उसने कहा कि 7 अक्टूबर को उसे हाईकोर्ट से पिछले 6 महीनों में लंबित निष्पादन याचिकाओं (Execution Petitions) पर हुई प्रगति के संशोधित आंकड़े प्राप्त होंगे। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि हर 6 महीने में आंकड़े मंगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा और निष्पादन याचिकाओं का तेजी से निपटारा करने के लिए हाईकोर्ट स्तर पर एक व्यवस्था बनानी होगी। Case Details: PERIYAMMAL (DEAD THR. LRS.) AND ORS Versus V. RAJAMANI AND ANR. ETC|MA 1889-1891/2025 in C.A. No. 3640-3642/2025 Diary No. 59338

Repost from Justice junction
“केस दर्ज होते ही ₹30 लाख दे दो... आरोप झूठा निकले तो क्या?” मयंक नाथ का चंद्रशेखर आजाद पर तीखा तंज सांसद चंद्रशेखर आजाद ने SC/ST Act के तहत पीड़ितों को मिलने वाली मुआवजा राशि बढ़ाकर कम से कम ₹30 लाख करने की मांग की है। उनका कहना है कि पीड़ित परिवारों को पर्याप्त आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। इस पर सोशल एक्टिविस्ट मयंक नाथ ने सवाल उठाया कि अगर FIR के शुरुआती चरण में ही बड़ी मुआवजा राशि दी जाती है और बाद में आरोप साबित नहीं होते, तो पैसे की वापसी और झूठी शिकायत पर जवाबदेही की व्यवस्था क्या होगी? उन्होंने इसी पर तंज कसते हुए कहा, “आरोप सही निकले तो दोषी से पैसा वसूलो, लेकिन झूठा निकले तो न पैसा वापस, न कार्रवाई? मतलब मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू!” #ChandrashekharAzad #SCSTAct #Compensation #EqualJustice #IndianLaw #MayankNath

The Supreme Court took suo motu cognizance of the Patna High Court's judgment which held that allegations of attempting to remove a woman's salwar and physically molesting by pressing her chest do not constitute 'attempt to rape'. The bench of CJI Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi and Justice V Mohana noted that some of the observations of the High Court were offensive. "There are some offending observations," CJI Surya Kant told Bihar Advocate General SD Sanjay. "We will be able to set aside only after hearing the accused...you please make sure through local police that he is served," CJI added. The Patna High Court held that allegations of attempting to remove a woman's salwar and physically molesting by pressing her chest, without evidence of penetration or any overt act unequivocally establishing an intention to commit rape, do not constitute the offence of attempt to rape. Observing that the allegations "at best" disclosed an offence of outraging the modesty of a woman under Section 354 of the Indian Penal Code, the Court set aside the appellant's conviction under Sections 376 read with 511 IPC. In July, the CJI's bench was informed about the Patna High Court's order during the hearing of the suo motu case taken up over the Allahabad High Court verdict that grabbing the breasts of a minor girl, breaking the string of her pyjama and trying to drag her beneath a culvert would not come under the offence of 'attempt to rape'. Senior Advocate Shobha Gupta submitted that despite the Supreme Court taking suo motu case over the Allahabad High Court order and setting it aside, the Patna High Court order came to be passed in similar facts and making similar observations. Senior Advocate HS Phoolka supplemented Gupta's submissions. The Supreme Court had set aside the Allahabad High Court's controversial ruling, and issued guidelines to judges on sensitively handling sexual offences. Case: IN RE: ORDER DATED 09.07.2026 PASSED BY THE HIGH COURT OF JUDICATURE AT PATNA IN CRIMINAL APPEAL (SJ) NO. 775/2013 AND ANCILLARY ISSUES Versus, SMW(Crl) No. 5/2026