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Dhamma Messages Collection

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1) बहुत पहले ज्योतिक' नाम के व्यक्ति के पास बेशुमार धन था और वह अपने घर को रात में दीपक जलाकर प्रकाशित करने की बजाय बहुमूल्य जवाहरातों की चमक से यह उद्देश्य पूरा किया करता था। मेरे लिए सबसे मूल्यवान रत्न हैं - बुद्ध, धर्म तथा संघ। मेरी यह चाहना है कि ये तीनों रत्न रात में ही नहीं बल्कि रात-दिन मेरे अस्तित्व को आलोकित करते रहें। 2) भगवान बुद्ध ने भविष्यवाणी की है कि इस संसार से धर्म तब विलुप्त होगा, जब लोग चार सतिपत्ररिरि` (जो कि विपश्यना का दूसरा नाम है) का अभ्यास करना बंद कर देंगे। मेरी यह भावना है कि लोग जल्दी-से-जल्दी विपश्यना करना सीख जायें ताकि वे इससे कहीं वंचित न रह जायें। इस काम में लगने की प्रेरणा मुझे धर्म के प्रति कृतज्ञता का अनन्य भाव होने से ही मिलती है। मैं भीतर-ही-भीतर जानता हूं कि किसी का भी यह प्रयास तभी सफल हो सकता है जब धर्म की भावना के अनुरूप ही इसे संपन्न किया जाय। भगवान बुद्ध ने घोषणा की थी कि गृहस्थों को ‘हत्थक' नाम के गृहस्थ के आदर्शों का अनुकरण करना चाहिए। हत्थक में आठ प्रकार के सद्गुण थे। इनमें से आठवां गुण यही था कि किसी को भी यह पता न चले कि उसमें ये गुण हैं। "एक सयाना वृद्ध उलूक, बैठा पेड़ बलूत ।" वह सुनता जितना अधिक, बोलता उतना कम; बोलता जितना कम, सुनता उतना अधिक। क्या हम उस सयाने पक्षी की तरह नहीं बन सकते ? 🙏🌷🙏🌷🙏 पुस्तक: ग्लोबल पगोड़ा, विश्व स्तूप । प्रकाशक : विपश्यना विशोधन विन्यास ॥ 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 🌷 धर्म के प्रति कृतज्ञता 🌷 ✍️ श्री स. ना. टंडन 📃 बहुत समय पहले एक व्यापारी जहाज समुद्र में अपना रास्ता खो बैठा और बावेरु' नाम के एक छोटे से द्वीप से जा लगा। उस द्वीप के निवासी समुद्र तट की ओर भागे और जहाज के मस्तूल पर बैठे एक कौवे को देखकर भौंचक्के रह गये। बावेरु में कोई पक्षी नहीं था, इसलिए किसी ऐसे जंतु को पहली बार देखकर अचंभित हो जाना उनके लिए स्वाभाविक ही था। वे उस कौवे को प्राप्त करने के लिए आतुर हो उठे और उन्होंने नाविकों से विनती की कि उनको इसे निकट से देखने दिया जाय। नाविकों ने उनकी बात मान ली। उसे देखकर उनकी आंखें तरसने लगीं- कितना मनमोहक चमकीला वर्ण, चोंचदार मुख, जाज्वल्यमान जवाहरातों के समान दमकती हुई आंखें! वे सौदा करने के लिए लालायित हो उठे। अंततः सौ मुद्रा सौंपकर उस पक्षी को खरीद लिया। जब वह जहाज चला गया तब द्वीपवासियों ने अपने आप को उस कौवे पर न्योच्छावर कर दिया। उन्होंने उसके रहने के लिए एक सुंदर पिंजड़ा तैयार किया। हर समय पुरुष, महिलाएं एवं बच्चे उस पिंजड़े के सामने जमे रहते और जंगली फलों तथा स्वादिष्ट पकवान से उसकी क्षुधा शांत किया करते । अगले वर्ष वही जहाज फिर बावेरु द्वीप पर आया। फिर द्वीपवासी समुद्र तट की ओर भागे। इस बार वे जहाज के भीतर अठखेलियां करते हुए एक मोर को देखकर आश्चर्यचकित रह गये। यह पक्षी बहुत ही अजीबोगरीब मालूम दे रहा था - कौवे से हजार गुना सुंदर। उन्होंने नाविकों से प्रार्थना की कि इसे करीब से देखने का सुअवसर दें। पहले की तरह नाविकों ने इस बार भी उनकी बात मान ली। क्या नजारा था! मोर राजसी अंदाज से जहाज से बाहर निकला। उसने अपने परों को फैला दिया, अंगुलियां चटकाने पर आवाज निकालने लगा, तालियां बजाने पर नाचने लगा और फिर ऐसी मोहक केका देने लगा जिसका क्या कहना! बस, द्वीपवासी पागल-से हो उठे और इस नये पक्षी को प्राप्त करने के लिए पुरजोर याचना करने लगे। पर इस बार सौदा तय होने में बहुत जोर आया। अंततः नाविक दस हजार मुद्राओं के बदले उस सुंदर पक्षी को उन्हें सौंपने पर सहमत हो गये। द्वीपवासियों ने मोर को रत्नजटित पिंजड़े में रखा और उसको शहद, भुना हुआ अनाज, किसमिस, काजू और तरह-तरह के स्वादिष्ट पदार्थ खाने के लिए देने लगे। वे उसको कई प्रकार के 'जूस' भी पिलाने लगे। उन्होंने कौवे की ओर ध्यान देना बंद कर दिया और उसे खिलाना-पिलाना तक भूल बैठे। किसी को उस पर दया आ गयी और उसने उसके पिंजड़े का पल्ला खोल दिया। इस पर वह पक्षी उड़ गया और फिर उस द्वीप पर कभी दिखाई नहीं दिया। धर्म का स्वाद चख लेने के बाद यह एक ऐसी अनमोल संपदा प्राप्त हुई लगती है जैसे था बावेरु द्वीपवासियों के लिए मनमोहक मोर। जीवन में जिन कर्मकांडों के प्रति बहुत रुझान हो चला था वे नदारद हो गये हैं जैसे बावेरु द्वीप से वह घिनौना काक । 🌷 धर्म है क्या? 🌷 यह कुछ ऐसी चीज है जो अपने ही हाथों में है, जिस 'सब' को बिना किसी की मदद लिए मैं स्वयं काम में ले सकता हूं, और वह भी अपने अधिकतम लाभ के लिए। इस कथन को समझने के लिए 'सब' का अर्थ स्पष्ट होना आवश्यक है।' 'सब' क्या है ? इसमें यह ‘सब कुछ’ आ जाता है - - आंख और जो कुछ इससे देखते हैं; - कान और जो कुछ इससे सुनते हैं; - नाक और जो कुछ इससे सूंघते हैं; - जीभ और जो कुछ इससे चखते हैं; - शरीर और जो कुछ इससे छूते हैं; - मन और जो कुछ इससे सोचते हैं। सम्यक संबुद्ध यह उपहासास्पद मानते थे कि इस सूची में कोई त्रुटि निकाल पाय। इसमें न तो कुछ जोड़ने को है और न इसमें से कुछ निकालने को। यही है - ‘सब कुछ', 'सब कुछ', 'सब कुछ'! जब कभी आंख का किसी दृश्य, कान का किसी श्रव्य, नाक का किसी गंध, जीभ का किसी स्वाद, शरीर का किसी स्प्रष्टव्य पदार्थ, मन का किसी चिंतन से संपर्क होता है तब निश्चित तौर पर शरीर में कोई-न-कोई संवेदना जाग उठती है जो कि बदलती रहती है। यदि हम इस संवेदना को इसके वास्तविक स्वरूप, अर्थात इसमें होने वाले परिवर्तन, के साथ जानते रहें तो हम उस परिस्थिति के मालिक हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, हम विश्व के उस सीमा तक मालिक हो जाते हैं जिस सीमा तक हम कुछ-न-कुछ देख रहे, सुन रहे, सूंघ रहे, चख रहे, छू रहे अथवा चिंतन कर रहे होते हैं। यही धर्म है - जो हमारे हाथ में है, जिस 'सब' को कोई बिना किसी की सहायता के उपयोग में ले सकता है, अपने अधिकतम उपयोग के लिए। स्वभावतः हमारी कृतज्ञता ऐसे धर्म के प्रति जागने ही लगेगी जिसको उपयोग में लेना इतना सरल और इतना प्रभावशाली है कि इसकी सहायता से हम विश्व से प्रभावित होने वाले क्षणों में इसके मालिक तक बन सकते हैं। मैं धर्म के प्रति अपनी कृतज्ञता दो प्रकार से प्रकट करता हूं; 1) इससे अपने तन और मन को पूरी तरह से लिप्त होने देकर; 2) इसके अस्तित्व की जानकारी अधिक-से-अधिक भाइयों तथा बहनों तक पहुँचाकर । मैं इसे कैसे कर पाता हूं?

🟡🟡🟡 🌷 आना पान साधना से क्या लाभ है? (What are the advantages of anapana meditation for Children? ) उत्तर- सबसे बड़ा लाभ तो यह है की जीवन में जब कभी कोई कठिनाई आए, फट सांस पर काम करना शुरू कर दें। इससे तुरंत लाभ मिलना शुरू हो जाएगा। 1) परीक्षा के समय लोग नर्वस(चिंतित) हो जाते हैं और याद की हुई बातें भूल जाते हैं। प्रश्न पत्र( question paper) खोलने से पूर्व यदि 2-3 मिनिट तक सांस को जानने का काम कर लिया जाय तो सारी व्याकुलता दूर हो जाती है और याद की हुई बातें स्मृति(memory) पर उभर आती हैं। इससे परीक्षा में निश्चित(definite) सफलता मिलती है। 2) किसी सार्वजनिक सभा (public meeting) में बोलने से पहले यदि 1-2 मिनिट तक साँस को जानते रहें तो मन अत्यंत स्थिर हो जाता है और बिना किसी घबराहट के धारा प्रवाह बोल सकते हैं। 3) कभी मन भटक रहा हो, बैचैन हो तो आना पान पर काम करने से मन का भटकाव और बेचैनी दूर हो जाती है। 4) वर्तमान में जीने का अभ्यास दृढ (firm) होने लगता है। बिना किसी प्रयोजन के भूतकाल में लोट प्लोट(wandering unnecessarily in past and future) लगाना अथवा भविष्य की चिंता करते रहना हमें दुखी ही बनाते हैं। 5) दिवास्वप्नो( day dreams) जिसमे मानस की बहुत सी शक्ति व्यर्थ चली जाती है, से छुटकारा हो जाता है। 6) यदि किसी से खटपट(dispute) हो जाए और क्रोध उभरने लगे तो देखेंगे की साँस तेज हो गया। इस तेज साँस को देखने लगेंगे तो देखते देखते गुस्सा शांत हो जाएगा। 7) छोटी उम्र में बच्चों को धूम्रपान(smoking) या अन्य किसी प्रकार का व्यसन लग जाए तो यदि वह इनकी तलब( craving) लगने पर थोड़ी देर आना पान का काम करे तो इन व्यसनों की पकड़ ढीली पड़ने लगती है। 🌹गुरूजी- जो बच्चों के कोर्स हैं इन्हे बढ़ावा देने की बहुत ही आवश्यकता है।अगली पीढ़ी इस देश की भी व इस विशव की भी एक ऐसी मानवता को तैयार करे जो सारे संसार में सुख शांति का वातावरण तैयार कर सके।इस छोटी उम्र में ही धर्म का बीज पड़ सके इस और प्रयत्नशील होना चाहिये। 🍁 यह धर्म का जीवन जीने का बीज जितनी जल्दी पड़ जाए उतना ही जीवन अधिक सुखी होगा। इससे मन को वश में करने की विद्या मिलती है, जो जीवन में बहुत काम आएगी। बच्चों के लिए शील सदाचार का जीवन जीना आसान हो जायेगा। 🌷 सांस सांस को जानना, यह ही आनापान। जितना जाने सांस को, हो उतना कल्याण। आते जाते सांस पर, पहरा लगे कठोर। मन भटके तो मोड़ लें, पुनः सांस की ओर। इस पावन अभ्यास से, चित्त सुधरता जाय। एक एक कर पाप की, परत उतरती जाय। -------------- 💐 प्रश्न--कभी कभी शिक्षक होने के नाते राग को बढ़ाना पड़ता है और द्वेष को भी। क्रोध भी करना पड़ता है। उत्तर--उन्ही के कल्याण के लिये क्रोध आया।हम तो सिखा रहे हैं एक अच्छी बात और वह बच्चा सीख ही नही रहा है। हमें क्रोध आया, दो चांटे भी लगाए-ठीक रास्ते चलो। यह रास्ता अच्छा है। लेकिन अगर विपश्यना नही कर रहे हो तो देखोगे की यह करते हुए हमने जो क्रोध जगाया तो अपने आप को दुखी बनाया, और उस क्रोध के साथ जो वाणी हमने कही-- भले ही न्यायिकरण(justify) तो करते हैं की हम ऐसा नही कहते तो वह समझता ही नही। लेकिन उस वाणी के साथ जो तरंगे गयी वे तरंगे उसे कहीं भी समझने लायक नही बनाएंगी। वह और भी ज्यादा व्याकुल होकर गलत रास्ते जाएगा। 🌷तो क्या करें ? जब क्रोध करना हो-- हम इसे क्रोध नही कहते, माने जब कठोरता का व्यवहार करना हो; क्योंकि उस बच्चे को मृदु भाषा बहुत कह कर देख चुके, कुछ भी असर नही होता उसपर। कठोरता की ही भाषा समझता है, तो पहले अपने भीतर देखेंगे-- अंदर समता है ना ! क्रोध तो नही जाग रहा है ना। और इसी बच्चे के प्रति करुणा जाग रही है ना। और कोई भाषा समझता ही नही है यह, तो बड़ी कठोरता से व्यवहार करेंगे। भीतर तो करुणा ही करुणा है। यह अंतर आएगा। 🍁कठोरता की जगह कटुता आ जाती है तो वह अपने लिये भी हानिकारक है, औरो के लिये भी हानिकारक होती है। यह इस विद्या से सीखेंगे। संवेदना जाग रही है। हमको कुछ करना है, तो भीतर क्या संवेदना है, और उस संवेदना से हम नही प्रभावित होते। हम तो समता में हैं, और यह समझ रहे हैं कि इस व्यक्ति के साथ कठोरता का व्यवहार करना है। 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 🌷 प्रगति के लिए सेवा दें 🌷 स्नेहमयी पूज्य माताजी बहुत गम्भीर थीं और हमेशा पूज्य गुरुजी के साथ-साथ परछाईं सी लगी रहतीं। सुबह 6 बजे गुरुजी माताजी धम्मगिरि के हॉल न. 1 या 2 में से मैत्री देते हुए अपने निवास की ओर जाते तब हम साधक दोनों ओर पंक्तिवद्ध खड़े उस अवर्णनीय अविस्मरणीय मंजर की अनुभूति नतमस्तक हो करते रहते। मैंने शुरू के 2-3 शिविरों के बाद मां से पूछा, साधना में प्रगति कैसे होगी? माताजी ने कहा शिविर में सेवा दो। सेवा से साधना में प्रगति कैसे हुई, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण सामने है। अब मैं भी साधकों को सेवा देने के लिए प्रोस्ताहित करती हूं। दूसरा प्रश्न, माताजी मैं पिक्चर देखती हूं। वे बोली- जैसे-जैसे विपश्यना में प्रगति होती है, अपने आप सब छूटता चला जाता है। कुछ छोड़ने की जरूरत नहीं है। मैंने देखा सचमुच कम हुआ और सुधरता चला गया। देखते हैं तब भी ठीक, नहीं देखते हैं तब भी ठीक। गलतियों के लिए क्षमा करें। आपकी बेटी, मंगल मैत्री के साथ। ✍️🏼 पुष्पा माखरिया पुस्तक: मेत्ताविहारिणी माताजी "श्रीमती इलायचीदेवी गोयन्का" । विपश्यना विशोधन विन्यास ॥ 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 *🙏सुप्रभात नमस्कार🙏* *🌹प्रकृति का *काल-चक्र* *अर्थात दु:ख गामिनी प्रतिपदा 🌹* *ही* *प्रतीत्य- समुत्पाद (कार्य कारण का सिद्धांत)* *( PRINCIPLE OF WHAT HAPPENS WHEN)* *🌻भगवान बुद्ध की अद्वितीय खोज🌻* *1-अविद्या(वेहोशी,नादानी) के कारण संस्कार अर्थात कर्म- फल के बीज पैदा होते हैं।* *2-संस्कार के कारण विज्ञान (शरीर का विज्ञान) उत्पन्न होता है।* *3-विज्ञान के कारण शरीर में नाम-रूप (जड़-चेतन) की धारा प्रवाहित होती है।* *4-नाम- रूप अर्थात (जड़- चेतन) के कारण छह आयतन (मन सहित छह इंद्रियां ) प्रकट होते हैं।* *5-छह आयतनों के कारण स्पर्श (इंद्रियों के विषयों का इंद्रियों से टकराना) होता है।* *6-स्पर्श के कारण वेदना (सुखद या दु:खद)अनुभव होती है।* *7- वेदना के कारण तृष्णा (सुखद है तो और ज्यादा सुख भोगने की, अगर दु:खद है तो दूर धकेलने की) उत्पन्न होती है।* *8- तृष्णा के कारण उपादान अर्थात आसक्ति (मृग-तृष्णा) पैदा हो जाती है।* *9-उपादान के कारण भव अर्थात संसार की उत्पत्ति होती है।* *10-भव के कारण जाति अर्थात जन्म हो जाता है।* *11-जाति के कारण बूढ़ा होना, मरना, शोक करना, रोना, पीटना, दुखित होना, बेचैन और परेशान होना होता है।* *12-इस प्रकार सारे के सारे दु:ख समुदय का मानव जीवन में उदय होता है।* *🙏 सबका मंगल हो सबका कल्याण हो सभी सुखी और स्वस्थ हों🙏* 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 🌷अनमोल जीवन🌷 धर्म की केवल चर्चा होकर रह जाय, धर्म को केवल मनोरंजन का विषय समझ कर रह जायँ तो भाई बहुत कुछ खो दिया । इस तरह की धर्म सभाओं में आना, बुरी बात नहीं है लेकिन अगर यह मनोरंजन का विषय हो गया - चलो आज इनको सुन लिया , कल उनकी सुनें , परसों उसकी सुनें . . . । सुनते ही रह जाओगे सारी जिंदगी भर । करोगे कुछ नहीं । जिस दिन यह जान लोगे कि मुझे करना है । मुझे सत्य को अनुभूति पर उतार कर स्वयं देखना हैं कि मेरा विकार कहां जागता है ? कैसे संवर्धन करता है ? उसको कैसे रोका जा सकता हैं ? कैसे जड़ों से दूर किया जा सकता हैं ? बस , कल्याण का रास्ता मिल गया ।इसे देखने की विद्या को विपश्यना कहते हैं । यह बहुत प्राचीन , बहुत पुरानी विद्या है । भगवान बुद्ध कहते हैं - मैं चारों ओर जिसको देखूं , वही बहुत बोलता हैं । बोलने वाले को बोलने का व्यसन लग गया , बोले जा रहा हैं । बड़ा खुश होता हैं , देखो इतने लोग सुन रहे हैं मुझे । देखो , मैं कितना अच्छा वक्ता हूं , कैसा अच्छा धर्म - गुरु हूं । यही व्यसन लग गया । और सुनने वालों को यह व्यसन लग गया कि आज तो बहुत अच्छा सुना , अरे आज तो धर्म इतना बढ़िया सुना , इतना बढ़िया सुना । दोनों अपनी मस्ती में हैं । तो कहते हैं कि भाई , कथे न होई - बोलने से कुछ नहीं होता , सुने न होई - केवल सुनने से कुछ नहीं होता । तो किससे होता हैं ? तो भगवन कहते हैं - कीये होई !! करने से होता हैं. । करने से होगा भाई । काम करना हैं. । मनुष्य का जीवन बड़ा अनमोल जीवन । अनमोल जीवन इस माने में कि यह काम कोई पशु नहीं कर सकता । कोई पक्षी नहीं कर सकता , कोई प्रेत - प्राणी नहीं कर सकता , कोई कीट - पतंग नहीं कर सकता । यह काम केवल मनुष्य कर सकता हैं । प्रकृति ने इतनी बड़ी शक्ति मनुष्य को दी हैं कि वह अंतर्मुखी हो करके अपने विकारों के उद्गम क्षेत्र में जा करके, उनका निष्कासन कर सकता हैं , उनको निकाल सकता हैं , भव से मुक्त हो सकता हैं । अरे , ऐसा अनमोल जीवन और बाहरी बातों में बिता दें ? नहीं, अब होश जागना चाहिए । अंतर्मुखी होकर सत्य का दर्शन करें और सही माने में अपना कल्याण कर लें !🪷🙏🪷 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 🌷"विपश्यना🌷 भगवान बुद्ध निशब्दप्रेमी थे। जहाँ कोलाहल होता वहां से दूर रहते थे। भगवान के जीवन काल में ऐसी अनेक घटनाए घटी, जब वे किसी आश्रम के सामने से निकलते और वहां का आचार्य चाहता की कुछ देर के लिए भगवान उसके आश्रम में पधारे, तब वह कोलाहल करने वाले भक्तो को कहता की हम सब को मोन हो जाना चाइये ताकि भगवान हमारे आश्रम में पधारे। उनके मौन हो जाने पर ही भगवान उस आश्रम में प्रवेश करते। विपश्यना मौन की साधना है। साधना करते हुऐ किसी शब्द का उच्चारण नहीं करना होता। वाणी से ही नहीं, बल्कि मन से भी नहीं करना होता। केवल यथाभूत को जानना होता है और अनुभूति के स्तर पर उसके अनित्य स्वभाव को समझते हुऐ समता पुष्ट करते रहना होता है। 🟠🟠🟠

इस साढ़े तीन हाथ की काया में सारा संसार समाया हुआ है। इसी शरीर में भवचक्र समाया हुआ है। भवचक्र का कारण समाया हुआ है। भवचक्र से विमुक्त होना समाया हुआ है। भवचक्र से विमुक्त होने का उपाय समाया हुआ है। इसीलिए मुमुक्षु साधक के लिए शरीर-निरीक्षण का इतना बड़ा महत्त्व है। शरीर के आधार पर प्रवर्तमान प्रपंच की सम्यक जानकारी नहीं होती तो अपने भीतर भवचक्र प्रवर्तन होते ही रहता है। इसकी सम्यक जानकारी होती रहे तो भवचक्र का निरोध होते-होते नितांत भवविमुक्ति का साक्षात्कार हो जाता है। हमारी छहों इंद्रियां- आंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा और मन शरीर पर आधारित हैं और इन छह ऐंद्रिय दरवाजों को छोड़कर अन्य किसी दरवाजे से हमारा लोक-संपर्क हो नहीं सकता। इन छहों इंद्रियों के संपर्क में आता है तो ही संसार हमारे लिए संसार है अन्यथा उसका हमारे लिए कोई अस्तित्व ही नहीं। कोई रूप आंख के संपर्क में आता है तो ही हमारे लिए रूप है अन्यथा उसका कोई अस्तित्व नहीं। इसी प्रकार जब कोई शब्द कान के संपर्क में, गंध नाक के संपर्क में, रस जीभ के संपर्क में, स्प्रष्टव्य पदार्थ त्वचा के संपर्क में, विचार-चिंतन-कल्पना आदि मन के संपर्क में आते हैं तो ही हमारे लिए उनका कोई अर्थ है अन्यथा उनका कोई अस्तित्व ही नहीं। हमारे लिए सारे संसार का अस्तित्व शरीर में स्थित इन छह दरवाजों पर ही प्रकट होता है। इसलिए ठीक ही कहा गया है कि सारा संसार इस साढ़े तीन हाथ की काया में समाया हुआ है। परम सत्य की खोज करने वाला सच्चा शोध-प्रिय वैज्ञानिक साधक जब सभी कल्पनाजन्य निकम्मी, निरर्थक दार्शनिक मान्यताओं को एक ओर रखकर केवल अनुभूत सत्र को ही स्वीकार करता हुआ अनुसंधान का काम शुरू कर देता है तो उसके लिए प्रकृति अपने सभी रहस्यों का उद्घाटन करने लगती है। साधक स्वमुखी होकर स्थूल सत्यों से आरंभ कर सूक्ष्म सत्यों को जानता हुआ इस अवस्था तक पहुँच जाता है जहां काया और चित्त के सभी प्रपंच स्पष्ट होने लगते हैं। साधक देखता है कि चक्षु और रूप के संपर्क से चक्षु-विज्ञान उत्पन्न होता है। यानी मानस का वह खण्ड प्रकट होता है जो चक्षु और रूप के संपर्क सत्य को जानने का काम करता है। वह यह भी जान लेता है कि यह संपर्क होते ही एक तरंग पैदा होती है, शरीर पर संवेदना पैदा होती है। जैसे किसी कांसे के बर्तन को छूने पर उसमें झंझनाहट पैदा होती है। इतने में संज्ञा यानी मानस का एक और खंड जागता है जिसका काम है, चक्षु, के संपर्क में आए हुए रूप को पहचानना। नारी है? नर है? काला है ? गौरा है ? सुंदर है ? असुंदर है ? और इस पहचान के आधार पर उसका मूल्यांकन करना। जैसे संज्ञा ने पहचानने और मूल्यांकन करने का काम किया, चक्षु, और रूप से शरीर पर उत्पन्न हुई संवेदना में परिवर्तन आने लगा। मानस का संवेदनशील खंड अपना काम करने लगा। मूल्यांकन अच्छा हुआ तो संवेदना सुखद हो गयी, बुरा हुआ तो दुःखद । अब मानस का चौथा खण्ड अपना काम शुरू करता है। शारीरिक संवेदना सुखद हो तो राग की, दुःखद हो तो द्वेष की प्रतिक्रिया करने लगता है। यों मानस के चारों खण्ड किस प्रकार काम करते हैं, यह बात स्पष्ट मालूम होने लगती है। राग से सुखद संवेदना की वृद्धि होती है, सुखद संवेदना से राग की वृद्धि होती है। द्वेष से दुःखद संवेदना की वृद्धि होती है, दुःखद संवेदना से द्वेष की वृद्धि होती है। साधक यह भी समझता है कि इस प्रकार संवेदनाओं के आधार पर राग-द्वेष का एक कुचक्र चल पड़ता है, जिसका संवर्धन होते ही रहता है। जैसे चक्षु और रूप के संस्पर्श से उत्पन्न हुई संवेदना के आधार पर प्रपंच आरंभ होता है वैसे ही नाक और गंध के संस्पर्श से, कान और शब्द के संस्पर्श से, जीभ और रस के संस्पर्श से, त्वचा और स्पष्टव्य पदार्थ के संस्पर्श से, मन और चिंतन के संस्पर्श से उत्पन्न हुई संवेदना के आधार पर प्रपंच आरंभ होता है और राग-द्वेष के भवचक्र संवर्धन का कारण बन जाता है। साधक निरर्थक दार्शनिक बातों के जंजाल में न पड़कर, इसी प्रपंच को साक्षीभाव से देखने लगता है तो अभ्यास करते-करते राग-द्वेष के भवचक्र से छुटकारा पा ही लेता है। आओ साधको! सभी शारीरिक संवेदनाओं और उनसे उत्पन्न होने वाले प्रपंच को साक्षीभाव से देखना सीखें और इस प्रकार भवचक्र से विमुक्त हों! इसी में हमारा सही मंगल है, सही कल्याण है! क्रमश:......(भाग-4) विपश्यना पत्रिका संग्रह (भाग-5) विपश्यना विशोधन विन्यास ॥ भवतु सब्ब मंङ्गलं !!

इसलिए 'दुक्ख सच्च' (दुःख), 'समुदय सच्च’ (इसके उदय), 'निरोध सच्च' (इसके व्यय) और “दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा सच्च” (दुःख समापन की ओर ले जाने वाला मार्ग) को अनुभव करने और समझने के लिए व्यक्ति को संवेदनाओं के साथ काम करना पड़ता है और वेदना की सच्चाई को (वेदना सच्च), वेदना के समुदय को (वेदना समुदय सच्च), वेदना के निरोध को (वेदना निरोध सच्च) और वेदना निरोध के मार्ग (वेदना निरोधगामिनी पटिपदा सच्च) को जानना पड़ता है। इस प्रक्रिया को 'वेदना संयुत्त' के 'समाधि सुत्त' में स्पष्टतया वर्णन किया गया है; “समाहितो संपजानो, सतो बुद्धस्स सावको वेदना च पजानाति, वेदनानं च संभवं यत्थ चेता निरुज्झन्ति मग्गं च खयगामिनं वेदनानं खया भिक्खु निच्चतो परिनिब्बुतो ति॥” - बुद्ध का श्रावक (अनुगामी) समाधि, संपजञ्ञ और अनित्यता को निरंतर प्रज्ञापूर्वक वेदनाओं को, उनके उदय, उनके व्यय और उनके निरोध के मार्ग को जानता है। एक साधक जो वेदनाओं के समापन तक पहुँच गया, वह राग से मुक्त हो गया, पूर्ण मुक्त हो गया। बुद्ध आगे बड़े बलपूर्वक कहते हैं कि “अरियो अट्ठङ्गिको मग्गो” (आर्य आठ अंगों वाला मार्ग) का लक्ष्य वेदना' का ज्ञान और 'वेदना निरोध' तक की स्थिति तक पहुँचना है । “तिस्सो इमा, भिक्खवे वेदना । कतमा तिस्सो ? सुखा वेदना, दुक्खा वेदना, अदुक्खमसुखा वेदना । इमा खो, भिक्खवे, तिस्सो वेदना । इमासं खो, भिक्खवे, तिस्सानं वेदनानं अभिञ्ञाय परिज्ञाय परिक्खाय पहानाय.... अयं अरियो अट्ठङ्गिको मग्गो भावेतब्बो.... -तीन तरह की कायिक वेदनाएं होती हैं। कौन सी तीन ? प्रिय संवेदना, अप्रिय संवेदना और तटस्थ संवेदना। साधकों, पूरे बोध, क्रमिक उन्मूलन और इन तीन प्रकार की कायिक संवेदनाओं के समापन के लिए आर्य अष्टांगिक मार्ग का अभ्यास करना चाहिए । संवेदनाएं (वेदना) उपकरण हैं। जिनसे हम चार आर्य सत्य और आर्य आठ अंगों वाले मार्ग पर आचरण कर सकते हैं और अनिच्च (अनित्य) स्वभाव को जानते हुए हम अविद्या और तृष्णा के बंधनों से मुक्त होते हैं और परम सत्य; 'निब्बान', दुःख विमुक्ति, एक स्थिति जो वेदना के क्षेत्र से परे नाम रूप के क्षेत्र से परे है, तक पहुंच पाते हैं। विपश्यना विशोधन विन्यास ॥ भवतू सब्ब् मंगल 🙏🏻🙏🏻🪷 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 ॥ वेदना और चार आर्य सत्य ॥ चार आर्य सत्य भगवान बुद्ध की शिक्षा का सार हैं। अंगुत्तर निकाय में बुद्ध ने कहाः “वेदियमानस्स खो पनाहं, भिक्खवे, इदं दुक्खं ति पञ्ञपेमि अयं दुक्ख समुदयो ति पञ्ञापेमि अयं दुक्ख निरोधोति पञ्ञामि।” - साधकों, जो वेदनाओं को अनुभव करता है। उसे मैं दुक्ख आर्य सत्य सिखाता हूं, मैं दुःख समुदय सत्य सिखाता हूं, मैं दुःख निरोध सत्य सिखाता हूं और मैं दु:ख निरोधगामिनी प्रतिपदा सिखाता हूं। इस परिच्छेद में बुद्ध सुस्पष्ट कहते हैं कि चार आर्य सत्यों को केवल वेदना के सहारे ज्ञात किया जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है और अभ्यास किया जा सकता है। उन्होंने आर्य सत्यों को वेदना के परिपेक्ष्य में यह कहते हुए विश्लेषण किया; “यं किञ्चि वेदयितं, तं पि दुक्खस्मि” - जो कुछ संवेदनाएं किसी को अनुभव होती हैं, सब दु:ख ही है। दुःख वेदना (अप्रिय संवेदना) ही दुःख नहीं है, परंतु सुख वेदना (प्रिय संवेदना) और अदुःख-असुख वेदना (तटस्थ संवेदना) भी अपने अनित्य स्वभाव के कारण दुःख है । उत्पन्न होना और नष्ट हो जाना, अनिच्च (अनित्यता) वेदना की विशिष्टता है। प्रत्येक सुख संवेदना में दुःख का बीज है क्योंकि यह नष्ट होगी ही। हम अज्ञान में ऐसे जकड़े हुए हैं कि जब कोई प्रिय संवेदना उत्पन्न होती है, इसके अनित्य स्वभाव को जाने बिना ही इसके प्रति राग और आसक्ति प्रतिक्रिया करने लगते हैं। यही दुःख की शुरुआत करती है; “तण्हा दुक्खस्स संभवं” - राग दुःख का मूल है। वास्तव में, राग ही दुःख का उद्गम नहीं है बल्कि स्वयं दुःख ही है। जैसे ही राग जागता है, दुःख जागता है। भगवान बुद्ध ने चार आर्य सत्यों में से दूसरे की व्याख्या "तण्हा पच्चया दुक्ख” नहीं करके “दुःख समुदय” की। दूसरे शब्दों में, राग दुःख की पूर्व शर्त मात्र नहीं है; यह स्वयं दुःख से अपृथक्करणीय है। “तण्हा दुक्खस्स संभवं” में इसी कथन पर स्पष्ट बल है। वस्तुतः ‘तण्हा' और 'दुक्ख' सहजात हैं। जैसे ही 'तण्हा' जगती है, व्यक्ति अपने मानस की समता खो देता है, अशांत हो जाता है, तनावग्रस्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में दु:ख अनुभव करने लगता है। उसी प्रकार जब संवेदना उत्पन्न होती है और तृष्णा (तण्हा) में बदलती है तो यह दुःख ही है। अतः जब कभी 'वेदना' शब्द का प्रयोग धर्म धारण करने के संदर्भ में किया जाता है, यह दुःख का बोध ही व्यक्त करता है। यहां तक कि तटस्थ संवेदना भी है यदि इसके अनित्य स्वभाव की उपेक्षा कर दी। इसलिए केवल दु:ख वेदना के ही लिए नहीं लेकिन सुख वेदना और असुख-अदुःख वेदना के लिए भी भगवान बुद्ध ने उचित 'वेदना' शब्द का प्रयोग, दुःख का पर्यायवाची किया है। चार आर्य सत्यों के संदर्भ में पुनः इसी तथ्य पर बल देते हुए भगवान बुद्ध ने सुत्तनिपात के “द्वययातन सुत्त" में कहा; “यं किञ्चिदुक्खं संभवोति सब्बं वेदना पच्चयाति अयमेकानुपस्सना। वेदनानं त्वेव असेस विराग निरोधा नत्थि दुक्खस्स संभवोति, अयं दुतियानुपस्सना।” - जो कुछ दुःख उत्पन्न होता है, यह संवेदना के कारण होता है- यह प्रथम अनुपस्सना है (निरंतर ध्यान से देखना) । संवेदना के संपूर्ण समापन से आगे कोई दुःख उत्पन्न नहीं होता - यह द्वितीय अनुपस्सना है। प्रथम अनुपस्सना वेदना को निरंतर दुःख समझना है। द्वितीय अनुपस्सना में वह वास्तविकता है जो वेदना, स्पर्श और षडायतन के क्षेत्र से बाहर है। यह एक अर्हत की निरोध समापत्ति की स्थिति है अर्थात निब्बानिक अनुभूति। इस द्वितीय अनुपस्सना से साधक इस सत्य का साक्षात्कार करता है कि निरोध समापत्ति के क्षेत्र में दुःख नहीं है, क्योंकि वहां कोई वेदना ही नहीं है। यह वेदना क्षेत्र से बाहर है। बुद्ध इसी में आगे कहते हैं; “सुखं वा यदि वा दुक्खं, अदुक्खमसुखं सह, अज्झतं च बहिद्धा च, यं किञ्चि अत्थि वेदितं, एवं दुक्खं ति ञत्वान, मोस धम्मं पलोकिनं, फुस्स फुस्स वयं पस्सं, एवं तत्थ विरज्जति, वेदनानं खया भिक्खु, निच्चतो परिनिब्बुतो॥" - जो कुछ भी संवेदना प्रिय, अप्रिय या तटस्थ कोई काया के अंदर या बाहर अनुभव करता है, वे सब भ्रांतिजनक हैं, वे सब भंगुर हैं, वे सब दुःख हैं । एक साधक देखता है कि जहां कुछ भी काया में स्पर्श है, संवेदनाएं हैं वे सब क्षय हो जाती हैं (जैसे ही वे उत्पन्न होती हैं)। संवेदनाओं के अवसान के साथ जब इस सत्य को जानता है, तब साधक राग से मुक्त जाता है, पूर्ण विमुक्त हो जाता है। इस सत्य में जो व्यक्ति भली प्रकार प्रतिष्ठित हो जाता है वह वेदना के प्रति राग और आसक्ति के स्वभाव से मुक्त हो जाता है और उस स्थिति तक पहुँच जाता है जहां कोई वेदना ही नहीं है (वेदना क्षय)। (यह निर्वाण की स्थिति है जहां द्वितीय अनुपस्सना में पहुँचते हैं)। एक साधक जिसने अर्हत फल की स्थिति का अनुभव कर लिया हो, वह 'निच्छातो' (सब कामनाओं से मुक्त) हो जाता है। ऐसा व्यक्ति ‘परिनिब्बुतो' (सर्वथा मुक्त) हो जाता है।

🟡🟡🟡 🌷सचमुच रत्न ही तो लाया🌷 समस्त व्यापार उद्योग और नौकरियों के राष्ट्रीयकरण कर लिए जाने के कारण बरमा के अनेक भारतीय आजीविका-विहीन हो गए थे। अतः बड़ी संख्या में स्वदेश लौटने लगे थे। बर्मा छोड़ते हुए वह अपने साथ कोई आभूषण या अन्य मूल्यवान वस्तुएं नहीं ले जा सकते थे। अपनी जीवनभर की कमाई में से जो कुछ बचा पाए थे उसे यूं छोड़कर जाना अनेकों के लिए कठिन था। अतः आसक्तिवश वे इसे अवैध तरीके से ले जाना चाहते थे। बरमा लालमणि आदि रत्नों का घर था। अतः एक तरीका लोग यह अपनाते थे कि ऐसे कीमती रत्न छिपाकर साथ ले जाते थे। बर्मी सरकार के अधिकारी उसे रोकने के लिए बहुत सतर्क रहते थे। हवाई अड्डे पर कस्टम के अधिकारी खूब कड़ी चेकिंग करते थे। जिस दिन मैं बरमा छोड़ रहा था, हवाई अड्डे पर पहुँचकर इमिग्रेशन की औपचारिकता पूरी करके कस्टम के काउंटर पर गया तो एक परिचित अफसर दिखाई दिया। उसने मुस्करा कर पूछा- “गोयन्का, तुम भी जा रहे हो?" "हां भाई, जा तो रहा हूं!” मैंने भी मुसकराते हुए उत्तर दिया। “कोई कीमती चीज तो साथ नहीं ले जा रहे ?” उसने पूछा- “हां भाई, ले जा रहा हूं, एक कीमती रत्न ले जा रहा हूं!” मैंने मुसकराकर उत्तर दिया। कस्टम का अफसर घबराया। परिचित होते हुए भी उसे अपने दायित्व का बोध था। वह बहुत सजग होकर मेरा सामान खोल-खोलकर देखने लगा, आखिर सामान था ही कितना, एक छोटे से बक्से में चंद पहनने के कपड़े और कुछ पुस्तकें। उसे कुछ नहीं मिल रहा था और उसकी परेशानी बढ़ रही थी। मैं मुसकराकर देख रहा था। आखिर उसकी परेशानी दूर करते हुए मैंने कहा, “भाई मेरे, मैं जो रत्न यहां से ले जा रहा हूं, वह अपने देश पर भारत का पुराना कर्ज है, उसे उतारने के काम आयगा । यह रत्न मूलतः भारत से ही आया था। आज इसकी वहां बहुत आवश्यकता है। इसे यहां से ले जाने पर बर्मा विपन्न नहीं होगा। "मैं जो ले जा रहा हूं, वह धर्म का रत्न है।" चुंगी का अधिकारी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। वह जानता था कि मैं सयाजी का विपश्यी शिष्य हूं। हँसते बोला- “यह रत्न तो तुम अवश्य ले जाओ! मुझे प्रसन्नता है कि तुम इससे हमारे देश का पुराना कर्ज चुका सकोगे।" और यही तो किया मैंने। भारत का यह धर्म-रत्न भारत को लौटाने आया, जो कि गुरुदेव की तीव्र धर्म-कामना थी। बाद में मेरे मित्रों से सूचना मिली कि वह चुंगी का अधिकारी जब-जब धर्म बांटने के कार्य में मिलनेवाली सफलता के समाचार सुनता तो बड़ा प्रसन्न होता। वर्ष २१, बुद्धवर्ष २५३५, माघ पूर्णिमा, दि.१८-०२-१९९२, अंक ८ विपश्यना पत्रिका संग्रह (भाग-7) विपश्यना विशोधन विन्यास ।। 🟠🟠🟠