SCHİVCHANDRA@snbhi376
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सत्संग संदेश
कौन जाने कौन भीलनी निकल आए
🙏गुरु बहनों बंधुओं:-
साईं गोदड़ीवाले सरकार की महिमा अपरंपार है। उनकी वाणी केवल पढ़ने या सुनने की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन को बदल देने वाला अमृत है।
👉इसलिए विनम्र निवेदन है कि परमेश्वर अमृतवाणी चैनल को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ, ताकि साईं सरकार का प्रेम-संदेश घर-घर तक पहुँचे।
🙏याद कीजिए, जंगल की भीलनी को कौन जानता था? संसार की दृष्टि में वह साधारण थी, पर उसके हृदय में प्रेम असाधारण था। उसने अपने प्रभु के लिए बेर सँभाल कर रखे थे। प्रेम की उस थाली में न वैभव था, न दिखावा था, केवल समर्पण था। और वही समर्पण उसे परमेश्वर का प्रिय बना गया।
🙏आज भी संसार में न जाने कितनी भीलनियाँ और कितने भगत वत्सल हृदय छिपे बैठे हैं। कोई गाँव में है, कोई शहर में, कोई दुःख में है, कोई तलाश में है। कोई ऐसा भी हो सकता है जो वर्षों से सत्य की खोज में भटक रहा हो और साईं सरकार की एक वाणी उसके जीवन का मार्ग बदल दे।
🙏कौन जाने आपकी एक शेयर किसी रोते हुए हृदय तक पहुँच जाए।
🙏कौन जाने किसी निराश मनुष्य को जीने की नई आशा मिल जाए।
🙏कौन जाने किसी भटके हुए जीव को अपने सतगुरु का दर मिल जाए।
🙏कौन जाने किसी के भीतर सोया हुआ प्रेम जाग उठे।
🙏और कौन जाने, किसी के भाग्य में लिखी हुई गुरु-कृपा का द्वार इसी माध्यम से खुल जाए।
🌹साईं सरकार फरमाते थे कि प्रेम बाँटने से घटता नहीं, बढ़ता है। इसलिए आइए, हम भी इस प्रेम की ज्योति को आगे बढ़ाएँ। जिस प्रकार एक दीपक से हजारों दीपक जल जाते हैं और उसका प्रकाश कम नहीं होता, उसी प्रकार गुरु-महिमा का प्रचार और असहाय लोगों के लिए दुआएँ करने से गुरु की कृपा और बरसती है
🪔🪔🪔
यदि साईं सरकार की वाणी ने आपके जीवन में शांति दी है, यदि उनके कलामों ने आपके हृदय को छुआ है, यदि उनके स्मरण से आपको सहारा मिला है, तो इस अमृत को अपने तक सीमित मत रखिए। इसे आगे बढ़ाइए, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, समस्त मानवता की धरोहर है।
हो सकता है आपकी उँगली से किया गया एक छोटा-सा साझा, किसी जीव के लिए मुक्ति का संदेश बन जाए। कौन जाने कौन भीलनी निकल आए, कौन प्रेम का प्यासा निकल आए, कौन साईं का अपना भक्त निकल आए।
साईं सरकार सब पर मेहर करें, सबको प्रेम दें, सबको सेवा दें और सबको अपने चरणों का स्मरण प्रदान करें।
सतसाईं गोदड़ीवाले सरकार की जय।
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👍प्रसंग:-साईं की महफ़िल से निकला जीवन का रहस्य
🙏एक दिन मैं साईं गोदड़ी वाले सरकार की सेवा में बैठा था। संगत भी आसपास बैठी थी। किसी भगत ने बड़ी विनम्रता से प्रश्न किया, “सरकार, जीवन में जो कुछ होता है, क्या सब नियति से होता है? क्या केवल कृपा से ही सब कुछ बदल जाता है?”
🌹साईं सरकार कुछ क्षण मौन रहे। उनकी दृष्टि दूर क्षितिज की ओर थी, मानो किसी गहरे सत्य को देख रही हो। फिर बड़ी सहजता से फरमाया—
🙏“कुछ भी मानिए, कर्म तो ख़ुद ही करना पड़ेगा। नियति होती है, कृपा होती है, प्रबंध होता है, मगर जीवन की दशा और दिशा इंसान के अपने ही अमल से तय होती है।साईं के ये शब्द सुनकर सभा में एक गहरा सन्नाटा छा गया। ऐसा लगा जैसे एक ही वाक्य में जीवन का पूरा ज्ञान समा गया हो।
🌹फिर सरकार समझाने लगे “अगर किसी के भाग्य में अच्छी ज़मीन लिखी हो, समय पर बारिश भी हो जाए, और बीज भी उसे मिल जाएँ, तो यह सब नियति और कृपा है। लेकिन अगर वह खेत में हल ही न चलाए, बीज ही न बोए, तो फसल कहाँ से आएगी?”
🌹हम सब ध्यान से सुन रहे थे।
साईं आगे फरमाने लगे “परमेश्वर अवसर देता है, गुरु मार्ग दिखाता है, कृपा शक्ति देती है, लेकिन कदम तो मनुष्य को स्वयं उठाने पड़ते हैं। जो बैठा रहेगा और केवल भाग्य की प्रतीक्षा करेगा, वह मंज़िल तक नहीं पहुँचेगा।उनकी वाणी मेरे हृदय में उतरती जा रही थी। उस दिन समझ आया कि गुरु कृपा का अर्थ कर्म से भागना नहीं, बल्कि कर्म को सही दिशा देना है।
साईं सरकार ने एक और सुंदर बात कही—
🌹“नाव को नदी में उतार देना प्रबंध है, अनुकूल हवा चलना कृपा है, नदी का अस्तित्व नियति है, मगर चप्पू चलाना नाविक का काम है। जो चप्पू नहीं चलाएगा, वह किनारे तक कैसे पहुँचेगा?”
🌹उस दिन साईं की जुबाँ से निकले ये शब्द मेरे जीवन की पूँजी बन गए। मैंने जाना कि गुरु कृपा का सच्चा सम्मान तभी है जब मनुष्य अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाए।
🌹संदेश:-साईं गोदड़ीवाले सरकार का यह उपदेश हमें सिखाता है कि कृपा और नियति पर विश्वास अवश्य रखें, पर अपने कर्मों की ज़िम्मेदारी भी स्वीकार करें। क्योंकि अंततः इंसान की पहचान उसके अमल से होती है। गुरु रास्ता दिखा सकते हैं, हाथ पकड़ सकते हैं, ठोकरों से बचा सकते हैं, लेकिन चलना तो साधक को स्वयं ही पड़ता है। और शायद इसी सत्य को साईं सरकार ने एक वाक्य में कह दिया था
🌹”नियति होती है,कृपा होती है, प्रबंध होता है, मगर दशा और दिशा जीवन की इंसान के अपने ही अमल से तय होती है।”
🌹यह सकार्थ जन्म की पूर्णता के बाद की अत्यंत विनम्र और प्रेममयी प्रार्थना है। यहाँ साईं अपने गुरुसाईं के चरणों में सम्पूर्ण समर्पण व्यक्त कर रहे हैं,यह केवल शब्द नहीं, बल्कि एक साधक की मंज़िल पर पहुँचकर निकली हुई आत्मा की पुकार है।
🙏“गुरुबहनों बंधुओं” अब इस प्रार्थना के शब्दार्थ भावार्थ जानने की कोशिश करते हैं यही “प्रार्थना“ हम रोज़ शाम को साईं आरती के रूप में गाते हैं इसी में शिष्य के जीवन का सार है 👇
अलिफ़ आज हूँन रज्ज के हज़ किता मिल्या पीर सोहना परदे कज़ मेनू”
अर्थ:-आज मैं पूरी तरह तृप्त हो गया हूँ, क्योंकि मुझे सुंदर पीर यानी सतगुरु का दीदार हो गया।मेरे और गुरु के बीच जो पर्दे थे, वे हट गए।
🌹“लज तज भजके पई क़दमी,
कुंडी गई प्रेम दी वज्ज मेनू”
अर्थ:- मैंने अपनी झूठी लाज और अहंकार छोड़कर गुरु के चरण पकड़ लिए। प्रेम की कुंडी मेरे हृदय पर आकर लग गई।
🌹“गई सज में इश्क़ की गज़ सुनके,
नहीं अक्ल शऊर डा चज़ मेनू”
👉अर्थ :-इश्क़ का गीत सुनकर मैं प्रेम के रंग में रंग गया। अब मुझे दुनियावी बुद्धि और चतुराई का कोई गर्व नहीं रहा।
🌹“पाली लज्ज कुचज नू कज़ साइयां
छट गोदड़ छट ना छज ना मेनू”
👉अर्थ “हे साईं” मेरी बुराइयों और अवगुणों को अपनी दया से ढक लो।
मैं गोदड़ी वाला हूँ, मेरे पास न कोई छत है, न कोई सहारा; अब केवल आपकी शरण है।
👉भावार्थ;-साधना का सबसे बड़ा फल ज्ञान नहीं, प्रेम है। जब तक मनुष्य अपने ज्ञान,प्रतिष्ठा, बुद्धि और अहंकार पर गर्व करता है, तब तक वह गुरु के द्वार पर खड़ा रहता है। लेकिन जिस दिन वह सब छोड़कर चरणों में गिर जाता है, उसी दिन प्रेम का द्वार खुल जाता है।
यहाँ सखी साईं कह रहे हैं:-
“मैंने संसार के मेले देख लिए,
तर्क और ज्ञान के रास्ते भी चल लिया, पर सच्चा सुकून तब मिला जब
मैंने अपने पीर के चरण पकड़ लिए
एक बार की बात सुनाता हूँ जब,
एक भक्त साईं गोदड़ीवाले सरकार के पास आया। वह बड़ा पढ़ा-लिखा था। शास्त्रों का ज्ञाता था। जहाँ जाता, लोग उसका सम्मान करते।
👉उसने साईं से पूछा —
“मुझे परमेश्वर क्यों नहीं मिलता?”
साईं मुस्कुराए और बोले —
“तेरे सिर पर क्या रखा है?”
भक्त बोला —
“पगड़ी।”
साईं ने कहा —उसे उतार।”
उसने उतार दी।
फिर साईं बोले —
“अब दिल की पगड़ी भी उतार।”
भक्त समझ नहीं पाया।
साईं ने कहा —
“जिस दिन तू अपने ज्ञान, अपने मान और अपनी अकड़ को उतार देगा, उस दिन परमेश्वर को पाने के लिए कोई पर्दा नहीं बचेगा।”
😂 यह सुनकर भक्त रो पड़ा और चरणों में गिर गया।कहते हैं उस दिन उसके जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान उसे मिला,ज्ञान से नहीं,समर्पण से परमेश्वर मिलता है।
गुरु बहनों बंधुओ:- सकार्थ जन्म का आरम्भ “अलिफ़” से हुआ था और समापन भी “अलिफ़” पर हुआ।
यह कोई संयोग नहीं है।
आरम्भ में अलिफ़ परमेश्वर की खोज थी। अन्त में अलिफ़ परमेश्वर की प्राप्ति का आनंद बन गया।
पहले साधक पूछ रहा था —
“मेरा मालिक कहाँ है?”
अब वही साधक कह रहा है —
आज मैं रज्ज गया, मेरा पीर मिल गया। यही साईं गोदड़शाह सरकार का मार्ग है।
न बड़े तप की ज़रूरत,
न बड़े दिखावे की ज़रूरत।
जरूरत है तो केवल —
लाज छोड़ने की,
अहंकार छोड़ने की,
और प्रेम की कुंडी अपने दिल पर लगने देने की।
🙏साईं भगतों के लिए संदेश
साईं गोदड़ीवाले सरकार का यह अंतिम संदेश मानो —
* गुरु के दरबार में अपनी योग्यता लेकर मत जाओ, अपनी विनम्रता लेकर जाओ।
* अपनी अच्छाइयों का हिसाब मत दो, अपनी कमियाँ समर्पित करो।
* अक्ल और शऊर का घमंड छोड़ो, प्रेम का रास्ता अपनाओ।
* गुरु के चरणों में गिरने वाला कभी छोटा नहीं होता, वही सबसे ऊँचा उठता है।
और अंत में यही अर्ज़ी है
🙏हे साईं गोदड़शाह सरकार! हमारे अवगुणों को अपनी दया की गोदड़ी में ढक लो। हम परदेसी हैं, बेसहारा हैं, हमारी छत भी आप हो और हमारा सहारा भी आप ही हो।”यही सकार्थ जन्म का निष्कर्ष है, यही उसकी मंज़िल है, और यही गुरु प्रेम की अंतिम कमाई है। ॥ सतगुरु महिमा अपार ॥
गोदड़ी वाले साईं तेरी जय जयकार
👍सकारथ जन्म – सम्पूर्ण ग्रन्थ का सार और साईं गोदड़शाह जी का दिखाया मार्ग
🌹जब कोई यात्री किसी ऊँचे पर्वत पर चढ़ता है, तो रास्ते में उसे जंगल भी मिलते हैं, चट्टानें भी, धूप भी और छाँव भी। परन्तु जब वह शिखर पर पहुँचता है और पीछे मुड़कर देखता है, तब उसे समझ आता है कि हर मोड़ उसे मंज़िल की ओर ही ले जा रहा था।
🌹” सकारथ जन्म” भी ऐसी ही एक आध्यात्मिक यात्रा है। यह केवल छंदों का संग्रह नहीं, बल्कि एक साधक की आत्मा का सफ़र है। “अलिफ़” से आरम्भ होकर “ये” तक पहुँचने वाली यह वाणी बताती है कि मनुष्य जन्म कब सार्थक होता है और गुरु की शरण का वास्तविक अर्थ क्या है।
🌹“सकारथ जन्म”ग्रन्थ का मूल संदेश
साईं गोदड़ शाह जी बार-बार एक बात समझाते हैं मनुष्य का सबसे बड़ा सौभाग्य सतगुरु का मिलना है।
👉धन, पद, प्रतिष्ठा, परिवार, ज्ञान ये सब अपने स्थान पर हैं, पर यदि जीवन में सतगुरु का प्रकाश नहीं है तो मनुष्य भीतर से भटकता रहता है।
🌹”सकारथ जन्म” में हमें तीन मुख्य शिक्षाएँ मिलती हैं—
1. गुरु के बिना अज्ञान का अंधकार नहीं मिटता
👉साईं गोदड़ शाह जी ने दिखाया कि सतगुरु केवल उपदेश देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि चेतना को जगाने वाला प्रकाश है। जैसे सूर्योदय होते ही अंधकार स्वयं हट जाता है, वैसे ही गुरु की कृपा से भ्रम दूर होने लगता है।
👉2. प्रेम, सेवा और विनम्रता ही सच्ची साधना है ।पूरे ग्रन्थ में कहीं भी बाहरी प्रदर्शन पर बल नहीं मिलता।
साईं का संदेश है “दिल में प्रेम हो, व्यवहार में नम्रता हो और जीवन में सेवा हो, यही साधना का सार है।
🌹3. अंततः उद्धार कृपा से होता है
ग्रन्थ के अंतिम अध्याय में भक्त स्वीकार करता है “सिमरन, योग, अभ्यास, न करम कीता…”
👉यहाँ साईं समझाते हैं कि मनुष्य को प्रयास अवश्य करना चाहिए, परन्तु मुक्ति का द्वार गुरु की कृपा से ही खुलता है।
👉साईं गोदड़शाह जी का मार्ग आज भी क्यों असरदार है?
क्योंकि यह मार्ग समय से परे है।
👉आज मनुष्य के पास साधन अधिक हैं पर शांति कम है।
👉जानकारी अधिक है पर समझ कम है।
👉संपर्क अधिक हैं पर अपनापन कम है।
👉🌹ऐसे समय में साईं गोदड़ शाह जी का संदेश सीधा और सरल है—
👉* परमेश्वर को बाहर से पहले भीतर खोजो।
👉* मनुष्य से प्रेम करो।
👉* सेवा को पूजा समझो।
👉* गुरु पर विश्वास रखो।
👉* अहंकार छोड़ो।
ये बातें आज भी उतनी ही प्रभावी हैं जितनी सौ वर्ष पहले थीं।
🙏गुरु बहनों बंधुओ:-
एक भगत की कथा सुनाता हूँ समझिए
👉एक बार एक युवक ने सुना कि शहनशाह गोदड़ शाह जी के पास जाने से मन को शांति मिलती है।
वह पहुँचा और बोला—
🌹मेहरबान “साईं”
🙏मैं बहुत परेशान हूँ। मुझे कोई ऐसा मंत्र दे दीजिए जिससे मेरी सारी उलझनें समाप्त हो जाएँ।”
👉साईं मुस्कुराए और उसे एक दीपक देकर बोले “इसे लेकर रात भर चलो और ध्यान रखना कि इसकी लौ न बुझे।युवक पूरी रात दीपक को बचाता रहा। कभी हवा आई, कभी अंधेरा मिला, कभी रास्ता ऊबड़-खाबड़ था, पर उसकी निगाह दीपक पर रही।
सुबह वह वापस आया।
साईं ने पूछा—
👉“रास्ते में कितने लोगों को देखा?”
युवक बोला—
👉ध्यान ही नहीं गया।”
👉“कितनी दुकानें थीं?”
“मुझे नहीं मालूम।”
👉कितने कुत्ते भौंके?”
“मैंने नहीं देखा।”
साईं बोले—
“ क्यों?”
👉युवक ने कहा“मेरा ध्यान तो दीपक की लौ पर था।”
👉तब साईं गोदड़ शाह जी ने फरमाया “जिस दिन जीवन में गुरु के ज्ञान की लौ पर ऐसा ही ध्यान टिक जाएगा, उस दिन संसार की उलझनें तुम्हें बाँध नहीं पाएँगी।”
🌷सम्पूर्ण सकारथ जन्म ग्रन्थ का सार निकला यदि पूरे “सकारथ जन्म” को एक वाक्य में समेटना हो तो वह यह होगा “सतगुरु” के चरणों में प्रेम, विनम्रता, सेवा और पूर्ण विश्वास के साथ जीवन समर्पित कर देना ही मनुष्य जन्म की सार्थकता है।”और अंतिम अध्याय “ये” में पहुँचकर साधक की सारी साधना एक प्रार्थना बन जाती है 🌹👉हंगता हरो मेरी, प्रीत रहे तेरी…”
यही “सकारथ जन्म” का निष्कर्ष है, यही साईं गोदड़शाह जी की शिक्षा है, और यही वह मार्ग है जिसने असंख्य भक्तों के जीवन में प्रकाश, भरोसा और आत्मिक शांति का संचार किया।
🙏🌹 साईं गोदड़शाह जी “सरकार”के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम.
कोटि-कोटि प्रणाम
🌹”सकारथजन्म”अंतिम अध्याय “ये”
🙏ये:- याचना ब्रह्म स्वरूप मेरी।
चरणां विच सदा नमस्कार सतगुर।।
👉सकारथ जन्म की यह अंतिम विनती है। पूरी सिहरफ़ी में भक्त ने गुरु की महिमा,उनकी लीलाएँ,उनका ज्ञान और उनकी कृपा का वर्णन किया। अब अंत में आकर वह कोई धन, वैभव, सिद्धि या संसार की वस्तु नहीं माँगता। उसकी एक ही याचना है—
हे सतगुरु! मेरा सिर सदा
आपके चरणों में झुका रहे।यही सच्ची भक्ति का शिखर है। जब माँगने वाला केवल गुरु का प्रेम माँगने लगे,तब समझो यात्रा मंज़िल तक पहुँच गई।
🌹🙏हंगता हरो मेरी, प्रीत रहे तेरी।
लाईं न देरी बखशनहार सतगुर।।
👉यहाँ “हंगता” अर्थात अहंकार, मैंपन, अभिमान। भक्त कहता है—
हे दयालु सतगुरु!मेरे भीतर जो अहंकार बैठा है उसे मिटा दो। क्योंकि जहाँ
“मैं” रहता है वहाँ
“तू” नहीं दिखाई देता।
🌹सूफ़ी संत कहते हैं “जब तक मैं था तब तक परमेश्वर न दिखा,
जब परमेश्वर दिखा तब मैं न रहा।” भक्त की प्रार्थना है कि मेरा अहंकार समाप्त हो जाए और आपकी प्रीत मेरे हृदय में सदैव बनी रहे।
🌹👉उपमा नहीं ज़बान बयान करदी।
तूं अलख, अभेद, अपार सतगुर।।
👉अब भक्त स्वीकार करता है कि गुरु की महिमा शब्दों में नहीं समा सकती।
👉“अलख”जिसे देखा नहीं जा सकता।
👉“अभेद” जिसका कोई भेद नहीं जान सकता।
👉“अपार” जिसका कोई पार नहीं पा सकता। जैसे समुद्र को एक छोटे पात्र में नहीं भरा जा सकता, वैसे ही गुरु की महिमा को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। यहाँ भक्त की वाणी रुक जाती है और श्रद्धा बोलने लगती है।
🌹सिमरन,योग,अभ्यास,न करम कीता
बखशनहार गोदड़ तार तार सतगुर।।
👉यह अंतिम पंक्ति सम्पूर्ण “सकारथ जन्म” का सार है।
भक्त स्वीकार करता है—
“मैंने न तो योग किया, न बड़े तप किए, न कठिन साधनाएँ कीं, न कोई विशेष कर्म किए। यदि मेरा उद्धार होगा तो केवल आपकी कृपा से होगा।”
यही संतमत का मूल सिद्धांत है कि अंततः पार लगाने वाली गुरु की दया है।
🙏सत्संग संदेश:- एक बच्चा नदी पार करना चाहता था। उसे तैरना नहीं आता था। उसने नाविक से कहा, “मुझे उस पार पहुँचा दो।”
नाविक ने पूछा, “तैरना जानते हो?”
बच्चा बोला, “नहीं।”
“नाव चलाना जानते हो?”
“नहीं।”
“फिर उस पार कैसे जाओगे?”
👉बच्चा बोला, “मुझे नाव चलानी नहीं आती, पर मुझे आप पर भरोसा है।”
👉नाविक मुस्कुराया और उसे पार पहुँचा दिया।ऐसे ही इस अंतिम अध्याय में भक्त कहता है—
“मुझे योग नहीं आता, तप नहीं आता, साधना नहीं आती, पर मुझे अपने बख्शनहार गोदड़शाह सतगुरु पर पूरा भरोसा है।”
🌹👉“सकारथ जन्म” का आरम्भ गुरु की महिमा से हुआ और समापन भी गुरु की कृपा पर हुआ।इस अंतिम अध्याय का संदेश है, अहंकार मिट जाए,
गुरु प्रेम बस जाए,
सिर चरणों में झुक जाए और
जीवन गुरु की कृपा के भरोसे
समर्पित हो जाए
यही सकारथ जन्म की मंज़िल है।
🌹👉साईं गोदड़शाह जी की कृपा से यह यात्रा “अलिफ़” से चलकर “ये” तक, और ज्ञान से यक़ीन तक पहुँचती है। इति श्री सकारथ जन्म सम्पूर्णम्।
🙏🌹🌹🙏🌹🌹🙏🌹🌹🙏
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मीठे बेर और गुरु की मर्जी🌹
“गुरुबहनों बंधुओं”
यह प्रसंग केवल बेरों का नहीं,
बल्कि समर्पण, संतोष और गुरु की रज़ा को समझने का है।
👉शहनशाह गोदड़ीवाले सरकार एक गाँव में शतरंज खेल रहे थे तभी भक्त उन्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वहाँ पहुँच गए।जहाँ साईं भगतों में बैठे पासा खेल,
खेल रहे थे जब खेल समाप्त हुआ तो सरकार ने प्रेम से कहा साथियो, तुम आराम करो,अब हम भी चलते हैं।” और सूर्यास्त से पहले ही दूसरे गाँव में गर्ज़ मंदों के पास पहुँच गए। मुझे ख़बर मिली की सखी साईं गाँव में आए हैं
👉मेरे मन में इच्छा जागी कि आज सरकार के चरणों में प्रसाद अर्पित करूँ,मैं नज़दीक दुकान पर गया, परंतु दुकानदार ने उधार देने से मना कर दिया। मैं मायूस हुआ ही था कि साईं का फरमान याद आया कि “जो कुछ होता है,साईं की मर्जी से होता है।यही विचार मेरी आध्यात्मिक कमाई बन गया।यदि दुकानदार से झगड़ या नाराज़ होकर शिकायत करता, तो शायद आगे की कृपा से वंचित रह जाता। लेकिन मैंने परिस्थिति को गुरु की इच्छा मानते हुए साईं की महफ़िल की तरफ़ कदम बढ़ा दिए
👉रास्ते में जंगली बेरों के पेड़ मिले। मैंने एक पेड़ से बेर तोड़े, चखे तो मीठे निकले। फिर दूसरे पेड़ से, फिर तीसरे से। इस प्रकार सबसे मीठे बेर चुन-चुन कर एक पोटली में बाँध लिए।
👉सोचिए, पतासे तो पैसे देकर कोई भी खरीद सकता था, पर ये बेर प्रेम से चुने गए थे। इनमें भक्त का समय था, श्रम था, भावना थी और सबसे बढ़कर गुरु की मर्जी में राज़ी रहने का भाव था।
👉जब वह दरबार पहुँचा तब देखा संगत के लिए यह रात्रि किसी दीपावली से कम नहीं थी। हर हृदय आनंद से भरा हुआ था की मैंने शीश झुकाते हुए,जैसे ही बेरों की पोटली सरकार के चरणों में रखी,वैसे ही बिना देर किए “साईं” ने पोटली उठाई, पलंग से खड़े हुए और फरमाया—“पानी,
पानी बहता ही अच्छा लगता है।” फिर घोड़े पर सवार होकर आगे बढ़ गए।
भावार्थ
👉सरकार का यह वचन बड़ा गहरा है।
बहता हुआ पानी निर्मल रहता है, रुक जाए तो सड़ने लगता है।
* प्रेम बहता रहे तो भक्ति बनता है।
* सेवा बहती रहे तो कृपा बनती है।
* दान बहता रहे तो पुण्य बनता है।
* ज्ञान बहता रहे तो प्रकाश बनता है।
और जो व्यक्ति हर परिस्थिति में अटक जाता है—“ऐसा क्यों हुआ, वैसा क्यों हुआ”— उसका मन ठहर जाता है।
👉उस दिन सरकार मानो समझा रहे थे
“जो मेरी रज़ा में बहना सीख गया, वही जीवन के सागर को पार करेगा।”
पतासे नहीं मिले, लेकिन उसके बदले मीठे बेर मिले। और बेरों के बहाने ऐसा सत्संग मिल गया जो आज भी साधकों को राह दिखाता है।
संदेश:-जब जीवन में कोई द्वार बंद हो जाए तो दुखी मत होना। हो सकता है परमेश्वर ने आपके लिए उससे भी मीठे बेर तैयार कर रखे हों।कभी-कभी हमारी इच्छा पूरी नहीं होती, क्योंकि गुरु हमें उससे भी श्रेष्ठ वस्तु देने की तैयारी कर रहे होते हैं। गुरु की मर्जी में राज़ी रहना ही सच्चा सत्संग है।
👉जो मिला उसे प्रसाद मानो, जो नहीं मिला उसे भी कृपा मानो।फिर जीवन के हर बेर में मिठास ही मिठास दिखाई देगी। ॥🙏॥
🌹यह प्रसंग केवल एक यात्रा का वर्णन नहीं, बल्कि गुरु और शिष्य के अनन्त संबंध का जीवंत प्रमाण है।
👉“मीठे बेरों का रहस्य और
गुरु गोदड़ीवाले का अमर आशीर्वाद”
गुरुबहनों बंधुओं:- सोचिए वह दृश्य कितना अद्भुत होगा। रास्ते में लोग पुकार रहे हैं
👁️“वो देखो शहनशाह गोदड़ी वाले जा रहे हैं!” सफेद घोड़ी पर विराजमान साईं “गोदड़ीवाले” सरकार के स्वरूप को जिसने एक बार देख लिया, उसकी आँखें हुस्न ए जमाल से हट ही नहीं रही थी बिल्कुल वैसे ही जैसे चकोर चाँद को निहारता है, वैसे ही लोग अपने साईं के दीदार में खोए हुए थे मगर साईं की घोड़ी तेज़ी से आगे बढ़ गई
👉“गुरु बहनों” बंधुओं संतों की बाहरी यात्रा से अधिक महत्वपूर्ण उनकी भीतर की यात्रा होती है। थोड़ी दूर जाकर शहनशाह जी घोड़ी से उतर कर नहर के पुल पर बैठकर बेर खाने लगते हैं। फिर फरमाते हैं—इतने मीठे बेर तो भीलनी के भी नहीं होंगे।
👉यह केवल बेरों की मिठास नहीं थी। यह उस प्रेम की मिठास थी जो भक्त अपने गुरु के लिए लेकर आया था।
👉याद कीजिए, जब भगवान ने शबरी के बेर खाए थे तो फल नहीं खाए थे, प्रेम खाया था। आज भी संत वही प्रेम खोजते हैं। उन्हें वस्तु नहीं चाहिए, भाव चाहिए।
👉जब साथ कुछ भक्तों ने प्रसाद माँगा तो साईं ने गुठलियाँ नहर में फेंक दीं और फरमाया “इन बेरों में प्रेम और श्रद्धा के साथ थोड़ा गिला-शिकवा भी मिला है।”
👉यहीं से सत्संग का सबसे बड़ा संदेश शुरू होता है। भक्ति का मार्ग फूलों का नहीं, काँटों का मार्ग है,हम सब चाहते हैं कि भक्ति करें, सखी साईं की क़ुर्बत मिले और जीवन में कोई परीक्षा न आए। लेकिन संत कहते हैं कि जहाँ प्रेम होगा वहाँ परीक्षा भी होगी।
👉कभी मन की बात पूरी नहीं होगी।
👉कभी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
👉कभी संसार समझेगा नहीं।
👉कभी अपनों से ठोकर मिलेगी।
👉और यदि हर ठोकर पर शिकायत कर दी, तो मंज़िल तक कैसे पहुँचेंगे?
🌹यह बात साईं समझा रहे थे—“छोटी-छोटी बातों पर गिले-शिकवे मत करो। जो गुरु पर विश्वास रखता है, वह परिस्थितियों से नहीं डोलता।”
👉गुरु का संबंध केवल इस जन्म का नहीं फिर सखी साईं ने जो शब्द मेरी तरफ़ देखते हुए कहे, वे साधारण शब्द नहीं थे “तू मेरा बच्चा है। तेरा और मेरा कई जन्मों का साथ है।”
👉गुरुबहनों बंधुओं संसार के रिश्ते जन्म के साथ बनते हैं और मृत्यु के साथ छूट जाते हैं। लेकिन गुरु का रिश्ता आत्मा से होता है।
👉हम भूल जाते हैं,पर गुरु नहीं भूलता
👉हम दूर चले जाते हैं, पर गुरु की नज़र हम पर बनी रहती है।
👉हम अपने पिछले जन्म नहीं जानते, पर पूर्ण संत आत्मा की यात्रा को जानते हैं।
🌹साईं ने फरमाया:-
“तू नहीं जानता, पर मैं सब जानता हूँ।”
👉साईं ने सबसे बड़ा अनोखा आशीर्वाद दिया धन नहीं। दौलत नहीं।
राज-पाट नहीं इतना कहा याद रखना “मोह-माया तुम्हें तंग नहीं करेगी
* यह बहुत बड़ा वरदान है। क्योंकि धन का होना या न होना समस्या नहीं है।
*धन का मन पर चढ़ जाना समस्या है। साईं चाहते थे कि उनका बच्चा संसार में रहे, अपने कर्तव्य निभाए, पर उसका हृदय गुरु चरणों से कभी अलग न हो।
👉गरीबी आए तो भगत बंदा न टूटे।
अमीरी आए तो विनम्रता न छूटे।
यही सच्चा वैराग्य है।
👉संत जब सामान्य अवस्था में बोलते हैं तो वह उपदेश होता है।लेकिन जब कृपा की अवस्था में बोलते हैं तो वह वचन बन जाता है।
👉जब यह वचन उतर रहे थे तब साईं के मुखमंडल की आभा इतनी बढ़ गई कि कोई उनकी ओर देख नहीं पा रहा था। यह केवल चेहरे का प्रकाश नहीं था, यह उस दिव्य चेतना का प्रकाश था जिसमें गुरु अपने शिष्य के भविष्य पर कृपा की मुहर लगा रहे थे। और वहाँ उपस्थित लोग यह दृश्य देखकर भाव-विभोर हो गए,मेरे साथ उनकी भी आँखों से आँसू बह रहे थे, क्योंकि वे केवल बातचीत नहीं देख रहे थे।वे एक आत्मा और उसके सद्गुरु का अनादि संबंध देख रहे थे।
संदेश:-आज भी यदि हमारे जीवन में कठिनाइयाँ आएँ, तो इस प्रसंग को याद रखना।“साईं से”“गुरुभाई बहनों” से गिले-शिकवे होने से,भक्ति कमजोर होती है। विश्वास से भक्ति मजबूत होती है।
👉गुरु को हमारा प्रेम चाहिए,
शिकायत नहीं।
👉समर्पण चाहिए, शर्तें नहीं।
और जब गुरु कह दे—
👉“तू मेरा है”तो फिर संसार की कोई शक्ति उस आत्मा को गुरु-कृपा से अलग नहीं कर सकती।
👉“प्रेम के बेर ही गुरु को प्रिय हैं, पर उनमें शिकायत की कड़वाहट न मिले। श्रद्धा का फल जितना निर्मल होगा, गुरु-कृपा उतनी ही मधुर होगी।” ॥

🟣अलफ़:-आद जुगाद त्रय काल दर्शी
🌹 आद जुगाद त्रय काल दर्शी।
महिमा अपर अपार आनन्द सतगुर ।।
🌹मिट्टे भीलनी दे खादे बेर जूठे।
निरपक्ष निर्दोष आबन्द सतगुर।।
🌹आपे राम लक्ष्मण हनुमान बन के। लंका जा कट्टे सिया फन्द सतगुर ।।
🌹सागर मथन करके कढे रतन चौदाँ।
गोदड़ सब समरथ मुकन्द सतगुर ।।
भावार्थ:- सकारथ जन्म के अंतिम चरण में साईं गोदड़ीवाले सरकार अपने वास्तविक स्वरूप का संकेत देते हैं। पूरी सिहरफ़ी में कभी भक्तों के प्रसंग आए, कभी प्रेमियों के, कभी संतों के, कभी परमेश्वर की लीलाओं के; पर यहाँ आकर स्पष्ट कर दिया कि जो शक्ति सब युगों में कार्य करती रही, वही सतगुरु तत्व है।
👉“आद जुगाद त्रय काल दर्शी” का अर्थ है — जो आदि से है, युगों से है, भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों को देखता है। इसलिए आपने अक्सर कहा है कि साईं गोदड़ीवाले त्रिलोकदर्शी थे। यह पंक्ति उसी सत्य की ओर संकेत करती है कि कामिल सतगुरु केवल वर्तमान नहीं देखते, वे समय की सीमाओं से परे होते हैं।
🌹👉🔑एक बार किसी ने सोचा कि संत तो सामने बैठे हैं, इन्हें क्या पता कि मेरे मन में क्या चल रहा है। वह संगत में बैठा रहा लेकिन भीतर ही भीतर अलग विचार करता रहा। जब विदा लेने लगा तो साईं सरकार मुस्कराए और बोले—
👉“बंदे, जिस बात को तू छिपाने की कोशिश कर रहा था, वह तो सुबह से हमारे सामने खुली पड़ी थी।” वह व्यक्ति हैरान रह गया। उसने किसी से कुछ कहा नहीं था, पर उसके मन का भेद सामने आ गया। तब समझ आया कि कामिल संत केवल चेहरा नहीं देखते, वे हृदय की किताब भी पढ़ते हैं। यही “त्रय काल दर्शी” का संकेत है।
🌹👉“मिट्टे भीलनी दे खादे बेर जूठे”
यह शबरी के प्रेम की ओर इशारा है। भीलनी ने प्रेम से बेर चख-चखकर दिए थे कि कहीं खट्टे न हों। संसार ने उन्हें जूठा कहा, पर परमेश्वर ने उनमें प्रेम देखा।सतगुरु पक्षपात नहीं करते। वे न जाति देखते हैं, न धन, न पद। जहाँ प्रेम है, वहाँ वे स्वयं चले जाते हैं।
👉एक उदाहरण से। समझिए:-
मान लीजिए एक ओर सोने-चाँदी से सजा महल हो और दूसरी ओर एक गरीब की कच्ची झोपड़ी। महल वाला कहे “मैंने सजावट की है।”
गरीब कहे “मेरे पास कुछ नहीं, बस प्रेम है।संतों का इतिहास बताता है कि वे अक्सर उसी झोपड़ी में पहुँचे जहाँ प्रेम था। शबरी के बेर इसी सत्य का प्रतीक हैं।
👉“आपे राम लक्ष्मण हनुमान बन के”
यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि सतगुरु केवल किसी एक शरीर का नाम हैं। भाव यह है कि धर्म की स्थापना, भक्तों की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए जो दिव्य शक्ति कार्य करती है, वही सतगुरु तत्व है। राम में भी वही प्रकाश था, लक्ष्मण में भी वही सेवा थी, हनुमान में भी वही समर्पण था।
👉सीता जी बंधन में थीं, और उस बंधन को काटने के लिए पूरी लीला चली। इसी प्रकार आज भी जीव मोह, अहंकार और अज्ञान के बंधनों में बँधा है। सतगुरु उसी बंधन को काटने आते हैं।
👉सागर मथन करके कढे रतन चौदह
समुद्र मंथन में चौदह रत्न निकले थे। पर यहाँ एक और गहरा संकेत है।
👉मन भी एक समुद्र है। उसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह के विष भी हैं और प्रेम, भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य के रत्न भी। जब सतगुरु कृपा की मथानी चलाते हैं तो भीतर छिपे रत्न प्रकट होने लगते हैं। जिस मन में पहले अंधकार था, वही मन प्रकाश का घर बन जाता है।
🙏गुरुबहनों बंधुओं आज सत्संग संदेश:- “सकारथ जन्म” का यह अंतिम अलफ़ मानो पूरी पुस्तक का निष्कर्ष है * सतगुरु त्रिकालदर्शी हैं।
* सतगुरु प्रेम के भूखे हैं।
* सतगुरु भक्तों के बंधन काटने वाले हैं।
* सतगुरु भीतर छिपे रत्नों को प्रकट करने वाले हैं।
* सतगुरु सर्वसमर्थ हैं।
इसलिए अंतिम पंक्ति में साईं फ़रमाते हैं
🙏”गोदड़ सब समरथ मुकन्द सतगुर”
अर्थात् साईं गोदड़शाह सरकार वह समर्थ सतगुरु हैं जो जीव को संसार के बंधनों से मुक्त करके परम आनन्द तक पहुँचाने की सामर्थ्य रखते हैं। और जब शाम की आरती में यह छंद गाया जाता है, तो यह केवल स्तुति नहीं रहती; यह श्रद्धा का उद्घोष बन जाता है कि:-
“हे त्रिकालदर्शी सतगुरु”
जैसे आपने शबरी का प्रेम स्वीकार किया, जैसे सीता के बंधन कटवाए, जैसे समुद्र से रत्न निकाले, वैसे ही हमारे हृदय के भीतर छिपे प्रेम और ज्ञान को भी प्रकट कर दीजिए।”
“सबको खुशहाली””साईं प्रेम”
👍सकारथ जन्म “लाम”
साईं महफ़िल के साथियो आज सुनिए सकारथ जन्म “लाम” की व्याख्या
👉महाभारत का यह प्रसंग केवल युद्ध की कथा नहीं, यह प्रेम की पहचान है।
यह बताता है कि सतगुरु कहाँ जाते हैं, किसके घर बैठते हैं, और किसके प्रेम से बंध जाते हैं।
👉एक तरफ़ हस्तिनापुर का राजमहल था…सोने के थाल… चाँदी के प्याले…दास-दासियाँ खड़ी थीं…दुर्योधन ने सोचा “आज कृष्ण मेरे महल आएँगे, मेरा वैभव देखेंगे।”
👉और दूसरी तरफ़ बिदुर का छोटा सा घर…न ऊँची दीवारें…न शाही पकवान…बस आँखों में प्रेम और हृदय में प्रभु के लिए तड़प।
🌹तभी छंद आता है—लाम:
लै भोजन बिदुर साग आया।
खादा नाल प्रेम दयाल सतगुर।।
👉जब श्रीकृष्ण बिदुर के घर पहुँचे तो बिदुर की हालत ही बदल गई।कहते हैं प्रेम में इंसान सुध-बुध भूल जाता है।बिदुर इतने प्रेम में डूब गए कि केले छील-छीलकर छिलके ही कृष्ण को खिलाने लगे और फल नीचे फेंकते गए।
👉अब ज़रा सोचिए…दुनिया कहेगी “ये क्या कर रहे हो?” पर प्रेम का हिसाब दुनिया नहीं समझती।
👉और लीला देखो…कृष्ण छिलके भी ऐसे खा रहे हैं जैसे अमृत हो।
क्यों?
क्योंकि वहाँ छिलका नहीं था प्रेम था।
👉संत भी ऐसे ही होते हैं गुरु दीवानों उन्हें आपके घर की अमीरी नहीं चाहिए।उन्हें आपका साफ़ दिल चाहिए।
👉कई लोग सोचते हैं —
“हमारे पास देने को क्या है?”
पर सतगुरु साईं कहते हैं —
“मुझे तेरी दौलत नहीं,
तेरी मुहब्बत चाहिए।”
🌹आगे साईं सरकार फ़रमाते हैं
षठ रस पकवान ते फल अमृत।
मेवे दुर्योधन दे दित्ते टाल सतगुर।।
👉दुर्योधन के महल में छप्पन भोग लगे थे। सारी दुनिया का स्वाद वहाँ मौजूद था।पर सतगुरु ने सब ठुकरा दिया।
👉क्यों? क्योंकि जहाँ अहंकार होता है, वहाँ कृपा नहीं उतरती। दुर्योधन चाहता था कि कृष्ण उसके वैभव से प्रभावित हो जाएँ। पर परमेश्वर बिकते नहीं। संत झूठी शान के आगे झुकते नहीं।
👉”साईं दीवानों ” याद रखने वाली बात
जिस थाली में अहंकार परोसा हो,
वहाँ सतगुरु भोजन नहीं करते।
और जिस मिट्टी के कटोरे में प्रेम रखा हो, वहाँ परमेश्वर स्वयं बैठ जाते हैं।
👉फिर देखो साईं की दया फ़रमाते हैं
🌹बणया सारथी अर्जुन दा प्रीत करके
कीती जीत सुदर्शन दे नाल सतगुर।।
👉जो तीनों लोकों का मालिक है…
वही अर्जुन का सारथी बन गया।
यह बहुत बड़ा रहस्य है। सतगुरु जब प्रेम करते हैं, तो केवल आशीर्वाद नहीं देते वे जीवन की लगाम अपने हाथ में ले लेते हैं।
👉अर्जुन युद्धभूमि में खड़ा काँप रहा था।अपने ही रिश्तेदार सामने थे।
मन भ्रम में था।और ऐसे समय श्रीकृष्ण ने केवल रथ नहीं चलाया…उन्होंने अर्जुन का विवेक जगाया।
👉साईं को चाहने वालो
जीवन भी कुरुक्षेत्र है।
हर रोज़ भीतर युद्ध चलता है
मोह और सत्य का…
अहंकार और नम्रता का…
माया और साईंनाम का…
जिसका सारथी मन बन जाए,
वह भटक जाता है।
जिसका सारथी सतगुरु बन जाए,
वह पार हो जाता है।
🌹और आख़िर में साईं की कलम कहती है” भीम सैन दा प्रण निभा गोदड़
मारे दुर्योधन दुशासन सम्भाल सतगुर।
👉यह केवल गदा युद्ध नहीं है।
यह अधर्म के अंत की घोषणा है।
दुर्योधन और दुशासन बाहर भी हैं
और भीतर भी।
शब्द अर्थ :-
👉* दुर्योधन = अहंकार
* दुशासन = क्रोध और वासनाएँ
* भीम = आत्मबल
* अर्जुन = विवेक
* और सारथी = सतगुरु
जब तक भीतर का दुर्योधन जीवित है, मन अशांत रहेगा।पर जिस दिन सतगुरु की कृपा हुई, भीतर का महाभारत समाप्त होने लगता है।
👉गुरुबहनों बंधुओं महफ़िल के दीवानों; सतगुरु को आपके घर की सजावट नहीं चाहिए। उन्हें आपके दिल की सफ़ाई चाहिए।
👉बिदुर का साग आज भी स्वीकार होता है अगर उसमें प्रेम हो। और दुर्योधन के पकवान आज भी ठुकरा दिए जाते हैं…अगर उनमें अहंकार हो।
👉इसलिए प्रेम से जुड़ो,नम्रता से जुड़ो और अपने जीवन की लगाम सतगुरु को सौंप दो। फिर देखना जीवन का कुरुक्षेत्र भी विजय में बदल जाएगा।दिल दिमाग़ में सकूँ तो आयेगा ही दुनिया भी खूबसूरत लगने लगेगी
“जय साईं””जय प्रमश्वर”
👍सकारथ जन्म — “लाम” प्रसंग
🌹“लाम” का यह प्रसंग केवल बिदुर और दुर्योधन की कथा नहीं है।यह हर उस भक्त की कहानी है जिसने कभी यह सोचा हो “क्या सतगुरु मेरे जैसे छोटे, ग़रीब, टूटे इंसान के घर भी आएँगे?” एक तरफ़ राजमहल था…
दूसरी तरफ़ प्रेम की झोपड़ी।
और परमेश्वर ने महल नहीं चुना…
दिल चुना।
🌹लाम:- लै भोजन बिदुर साग आया।
खादा नाल प्रेम दयाल सतगुर।।
जब श्रीकृष्ण बिदुर के घर पहुँचे तो वहाँ न सोने के थाल थे, न शाही पकवान।बस प्रेम था… आँखों में आँसू थे… और हृदय में तड़प थी।
कहते हैं बिदुर प्रेम में इतने डूब गए कि केले के छिलके ही प्रभु को खिलाने लगे।फल नीचे गिरते गए, छिलके कृष्ण खाते गए।
दुनिया कहती “ये क्या भूल कर दी?”
पर प्रेम में भूल नहीं होती…
वहाँ तो आत्मा बोलती है।
और सतगुरु ने सिद्ध कर दिया —
उन्हें भोजन नहीं, भाव चाहिए।
🌹👉संगतो, इसी प्रसंग के साथ एक अनुभव याद आता है एक बार मेरी कच्ची झोपड़ी में साईं ने आने का वादा किया। मैं सुबह से राह देख रहा था।
मन में खुशी भी थी और घबराहट भी —
“मेरे छोटे से घर में सरकार आएँगे…”
👉इतने में किसी ने आकर कहा —
अरे, तेरे घर के सामने जो अमीर का बड़ा मकान है, वहाँ बहुत सजावट हुई है…रोशनी लगी है… बड़े-बड़े पकवान बने हैं…साईं तो वहीं जाएँगे।”
👉बस संगतो…यह सुनकर दिल काँप गया। मन में हलचल हुई…
एक पल को लगा “शायद मेरी झोपड़ी छोटी पड़ गई…”
मैं बेचैन बैठा था…
तभी अचानक देखा —
साईं मेरे सामने खड़े मुस्कुरा रहे हैं।
ना उन्हें टूटी दीवारें दिखीं…
ना कच्ची छत…उन्होंने सीधे दिल में कदम रखा। और केवल आए ही नहीं…दो-तीन दिन वहीं ठहरे।
👉उधर अमीर लोग बार-बार बुलाने आते रहे। बड़े आग्रह हुए। पर साईं हर बार मुस्कुराकर मना कर देते।
फिर एक दिन मैंने ही अर्ज़ की —
सरकार, वहाँ भी चलिए,सखियाँ आपका इंतज़ार कर रही होंगी,सब आपके दीवाने हैं…”
और संगतो…साईं ने मेरी अर्ज़ स्वीकार कर ली।
👉उस दिन समझ आया —
संत जब गरीब के घर आते हैं,
तो केवल कदम नहीं रखते…
उस गरीब की शान बढ़ा जाते हैं।
🌹षठ रस पकवान ते फल अमृत।
मेवे दुर्योधन दे दित्ते टाल सतगुर।।
दुर्योधन के पकवान ठुकरा दिए गए,
क्योंकि उनमें अहंकार था।
और बिदुर का साग स्वीकार हो गया,
क्योंकि उसमें प्रेम था।
यही संतों की पहचान है।
वे वहाँ नहीं जाते जहाँ केवल दिखावा हो। वे वहाँ जाते हैं जहाँ सच्चा बुलावा हो।
🌹बणया सारथी अर्जुन दा प्रीत करके
कीती जीत सुदर्शन दे नाल सतगुर।।
जो सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है, वही अर्जुन का सारथी बन गया।
क्यों? क्योंकि प्रेम परमेश्वर को झुका देता है। जब भक्त सच्चा हो जाए,
तो सतगुरु उसके जीवन की लगाम अपने हाथ में ले लेते हैं। और फिर चाहे जीवन में कितना भी महाभारत क्यों न हो विजय निश्चित हो जाती है।
🌹भीम सैन दा प्रण निभा गोदड़ ।
मारे दुर्योधन दुशासन सम्भाल सतगुर।यह युद्ध बाहर का भी है और भीतर का भी। * दुर्योधन यानी अहंकार
* दुशासन यानी क्रोध और वासनाएँ
* अर्जुन यानी विवेक
* भीम यानी आत्मबल
* और सारथी यानी सतगुरु
जिसके भीतर सतगुरु बैठ जाएँ,
वहाँ अंततः अधर्म हारता ही है।
संगतों भाव संदेश:-
अगर आपकी झोपड़ी छोटी है तो घबराना मत। अगर जीवन टूटा हुआ है तो शर्माना मत।
सतगुरु दीवारें नहीं देखते दिल देखते हैं। दुनिया अमीरी से प्रभावित हो सकती है,पर कामिल फ़क़ीर प्रेम से बंधते हैं।
याद रखना दुर्योधन के महल इतिहास बन गए,पर बिदुर का साग अमर हो गया। इसलिए अपने दिल को प्रेम से सजाओ।जहाँ प्रेम होगा, वहाँ साईं स्वयं चलकर आएँगे।
“जय साईं प्रमश्वर”
🔑🔐 गुरु की चाबी 🔐 🔑
उस समय पंजाब की धरती पर एक ऐसा प्रकाश फैला हुआ था, जिसका तेज़ चारों दिशाओं में सूर्य के समान चमकता था। वह प्रकाश था शहर्नशाह साईं गोदड़ शाह का।
उनका दरबार ऐसा था जहाँ सुबह की पहली किरण से लेकर रात की अंतिम घड़ी तक संगतों का ताँता लगा रहता। कोई दुःखी आता, कोई रोगी आता, कोई ज्ञान की प्यास लेकर आता, तो कोई केवल उनके दर्शन मात्र से अपने जीवन को धन्य करने आता।
👉केवल सामान्य लोग ही नहीं,बड़े बड़े ऋषि, मुनि, योगी, संन्यासी और विद्वान संत भी शहर्नशाह जी के चरणों में बैठकर आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते थे।जो भी आता,खाली नहीं लौटता। किसी को प्रेम मिलता, किसी को नाम का रहस्य,किसी को आत्मा का सुकून, तो किसी को अपने जीवन का मार्ग।
👉उन्हीं संतों में एक अत्यंत पढ़े-लिखे, ज्ञानी,ध्यानी और शास्त्रों के बड़े विद्वान सेवक जिनका नाम तेजस्वी था बैठा हुआ था जो बारह वर्षों से वे शहर्नशाह जी की सेवा में उपस्थित था,साईं की संगत करते और दरबार की महफ़िलों में रहते।
👉एक दिन विनम्र होकर उन्होंने हाथ जोड़कर अर्ज़ की —“सरकार!
तक़रीबन बारह वर्ष हो गए आपकी सेवा करते हुए, पर आपने एक बार भी नहीं पूछा कि तुझे क्या चाहिए?”
👉शहर्नशाह जी मंद-मंद मुस्कुराए।
साईं की आँखों में करुणा भी थी और रहस्य भी,”फरमाया” तूने भी तो कभी नहीं कहा कि तुझे क्या चाहिए।”
“तेजस्वी” सिर झुका कर बोले —“सरकार! मुझे अपना नाम दान बख्श दीजिए। मैं आपको अपना गुरु धारण करना चाहता हूँ।”
👉“सखी शहंशाह” जी कुछ क्षण शांत रहे। फिर बोले तुम्हारे ताले की चाबी मैंने किसी और को दे रखी है। तुम्हारा गुरु मैं नहीं, वही होगा जिसके हाथ में वह चाबी है। हाँ, तूने जो बारह वर्ष सेवा की है, उसका फल यह है कि अब तुझे अपने गुरु को ढूँढना नहीं पड़ेगा। चार-पाँच दिन बाद वह स्वयं तुझसे यहीं मिलेगा।”
👉यह सुनकर हैरान भी हुए और भीतर से बेचैन भी।मन में प्रश्न उठा,
ऐसा कौन हो सकता है
जिसे शहर्नशाह जी ने मेरी आत्मा की चाबी सौंप दी हो?”
👉खैर चार-पाँच दिन बीत गए।
एक दिन सीहरी दरबार में जो पहुँचे,वह साधारण वस्त्र,शांत चेहरा और बिल्कुल सहज स्वभाव।उन्हें देखकर कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि यह कोई ऊँची आध्यात्मिक अवस्था वाला पुरुष संत होगा।इन्हें अक्सर सिंह कह कर भगत बुलाते थे आए दिन भर साईं की सोहबत में रहे
👉रात्रि को महफ़िल समाप्त हुई।
अंतर्यामी शहंशाह जी ने आदेश दिया “तुम दोनों इकठ्ठे रात्रि विश्राम करोगे रहस्य की बात थी
(यानी आज से गुरु को
शिष्य मिलना था)
रात आधी से अधिक बीत चुकी थी। दोनों जाग रहे थे और लेटे-लेटे बातें कर रहे थे। तभी साधारण दिखने वाले “सिह” की आवाज़ तेजस्वी के कानों में अचानक आई ,आज मेरा एक शिष्य बनेगा, जो मेरे आसपास ही है यह सुनकर तेजस्वी को यह बात चुभ गई। उन्होंने तुरंत उत्तर दिया,मैं तुम्हारा शिष्य नहीं बनूँगा। मैं इतना पढ़ा-लिखा विद्वान, और तुम अनपढ़! हाँ, तुम्हारा शिष्य मैं नहीं, कोई और हो सकता है।”
👉“सिंह” मुस्कुराए।
बोले कोई और नहीं,मेरा शिष्य होगा तू ही,अब दोनों के बीच यही चर्चा कई रातों तक चलती रही।तेजस्वी का ज्ञान उनके अहंकार को छोड़ने नहीं देता था, और “सिंह” की वाणी भीतर कहीं सत्य का स्पर्श कर रही थी।
👉कुछ दिनों बाद बात खुल गई जब दोपहर के समय शहंशाह गोदड़ीवाले ने दोनों को गुरु-शिष्य बनाकर साथ जाने का आदेश दिया।उस समय धूप इतनी प्रचंड थी कि धरती आग के समान तप रही थी। चलना भी कठिन हो रहा था। तभी शहंशाह जी ने आकाश की ओर देखा और आदेश दिया —
👉“इन्द्र! देव” ये दोनों मेरे बड़े प्यारे बच्चे हैं। इन्हें धूप और गर्मी नहीं लगनी चाहिए।”
👉फिर क्या था जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने आकाश को बदल दिया हो। अचानक बादल घिर आए और सूर्य की तपिश ढक गई।संगत यह लीला देखकर विस्मित रह गई। सभी के मुख से बस यही निकला —
“वाह शहर्नशाह!”उस क्षण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रकृति साईं के आदेश की प्रतीक्षा में खड़ी हो।
साईं चाहे जिसे नवाज़ें
कब कहाँ कैसे कोई नहीं जानता
🟣 “साईं के आगे क्या छुपाना”
👉उस दिन मेरा छोटा सा घर मुझे और भी छोटा लग रहा था।दीवारों की उखड़ी हुई,मिट्टी,पुराना बिछौना,रसोई में बस थोड़ा सा सामान…
👉दिल में एक ही बात थी “अगर आज “साईं” मेरे घर आ गए तो मैं क्या पेश करूँगा…?”
👉गरीबी इंसान से बहुत कुछ छीन लेती है,मगर सबसे पहले उसका आत्मविश्वास छीनती है मैं भी उसी सोच में डूबा था।
तभी बाहर से आवाज़ आई—
🌹“ओए… दरवाज़ा खोल…”
आवाज़ पहचानते ही दिल धड़क उठा।
ये तो मेरे साईं थे
मेरे गोदड़ीवाले सरकार
घबराहट में मैंने जल्दी-जल्दी टूटी चीज़ें एक तरफ़ छुपाईं। पुराना बर्तन पीछे रख दिया। सोचा कहीं साईं मेरी हालत ना हो देख ले “ तभी”
🌹दरवाज़ा खुला।
साईं अंदर आए।
वही फकीरी चाल,वही रहमत भरी नज़र, उन्होंने चारों तरफ़ देखा।
फिर मेरी तरफ़ देखकर हल्का सा मुस्कुराए। मैं नज़रें झुकाकर खड़ा रहा।
🌹👉”साईं” बोले क्या-क्या छुपाएगा
यह सुनकर,मेरे अंदर जैसे
कुछ टूट गया,साईं ने पास बुलाया और बोले—
👉“जिसने तेरे दिल के दर्द देखे हैं,
उससे अपने घर की हालत छुपाता है?”
👉मेरी आँखों से आँसू बह निकले।
साईं पुराने बिछौने पर ही बैठ गए।
मैं बार-बार कहता रहा—
“साईं… बैठने लायक कुछ नहीं…”
साईं बोले—“जहाँ प्रेम हो,
वहाँ जगह छोटी नहीं होती।”
👉फिर उन्होंने सूखी रोटी का टुकड़ा उठाया आचार के साथ ऐसे खाया जैसे किसी ने शाही दावत पेश की हो।
👉उस पल मुझे समझ आया —
मैं गरीबी छुपा रहा था,
और साईं प्रेम सिखा रहे थे।
जैसे वे बता रहे थे कि
सतगुर से कुछ भी छुपा नहीं।
ना घर की हालत…
ना दिल की हालत…
साईं की नज़र टूटी दीवारों पर
नहीं गई,सीधे दिल के भीतर गई ।।
👉संदेश:- इंसान दुनिया से अपना दुख छुपा सकता है, मगर कामिल सतगुर से कुछ नहीं छुपता।
👉🌹साईं गोदड़ीवाले सरकार तो दिलों के हाल पढ़ लेते थे,पढ़ लेते हैं
साईं कमी नहीं देखते
साईं प्रेम देखते हैं।
जिस घर में सच्ची श्रद्धा हो,
वहाँ फकीरी भी बरकत बन जाती है।
🌹“छिलकों में छुपा अमृत”
👉रात का समय था। नगर शांत था, मगर बिदुर के छोटे से घर में आज अजीब सी हलचल थी। ऐसा लगता था जैसे हवा भी कोई शुभ समाचार लेकर चल रही हो।
👉बिदुर साधारण जीवन जीने वाला भक्त था। ना महल, ना नौकर, ना दौलत। लेकिन दिल ऐसा जिसमें हर साँस के साथ सतगुर का नाम बसता था।
👉उस रात अचानक बाहर से किसी के कदमों की आहट आई। दरवाज़ा खुला तो सामने वही फकीरी नूर हाथ में बंसी ऊपर साधारण कम्बली चेहरे पर रहमत की मुस्कान भगवान सतगुर स्वयं खड़े थे। बिदुर की आँखें भर आईं। वह घबराकर उठ पड़ा और चरणों में गिर गया।
👉“आज मेरा घर नहीं मेरा मुकद्दर जाग गया…उसकी आवाज काँप रही थी। बिदुर की पत्नी भी दौड़ी चली आई। जिसे खबर मिली कि स्वयं सतगुर घर आए हैं, उसका मन प्रेम में डूब गया। उसे ना होश रहा, ना दुनिया याद रही।
👉जल्दी-जल्दी केले लाने लगी।
हाथ काँप रहे थे आँखों से आँसू बह रहे थे…और प्रेम की मस्ती में उससे एक अजीब भूल हो गई।
👉वह केले छीलती जाती…
फल नीचे फेंकती जाती…
और छिलके सतगुर को खिलाती जाती। बिदुर ने देखा तो दंग रह गया।
वह कुछ कहने ही वाला था कि सामने का दृश्य देखकर रुक गया।
👉सतगुर बड़े प्रेम से वे छिलके खा रहे थे…ऐसे जैसे कोई अमृत ग्रहण कर रहा हो। उनकी आँखों में करुणा थी।
चेहरे पर मुस्कान थी। क्योंकि वे छिलके नहीं खा रहे थे — वे प्रेम खा रहे थे।
👉🌹तभी सतगुर बोले— “बिदुर…
दुनिया फल देखती है,
हम भावना देखते हैं।”
घर में सन्नाटा छा गया।
उस क्षण जैसे समय भी ठहर गया।
👉फिर सतगुर ने कहा—
“जहाँ प्रेम सच्चा हो,
वहाँ भूल भी भेंट बन जाती है।”
कहते हैं उस दिन बिदुर के छोटे से घर में जो कृपा बरसी,वह बड़े-बड़े राजमहलों को भी नसीब ना हुई।
👉संदेश:- संतों के दरबार में वस्तु की कीमत नहीं होती, भावना की कीमत होती है। सूखी रोटी भी प्रेम से मिले तो प्रसाद बन जाती है, और बिना प्रेम के छप्पन भोग भी खाली रह जाते हैं।
🌹साईं गोदड़ीवाले सरकार यही समझाते थे कि सतगुर को दिखावा नहीं चाहिए एक सच्चा दिल चाहिए, जो प्रेम में डूबा हो।
🌹“बिदुर के प्रेम की अमृत परीक्षा”
सकारथ जन्म की यह वाणी केवल एक कथा नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और गुरु-भक्ति का गहरा रहस्य खोलती है। यहाँ भगवान सतगुर किसी महल में नहीं, बल्कि एक भक्त के सादे घर में आते हैं। यही संतमत का सिद्धांत है परमेश्वर को वैभव नहीं, प्रेम चाहिए।
🌹हथ बन्सी ऊपर ओढ़ कम्बली।
आए बिदुर दे गृह भगवान सतगुर ।।
👉यहाँ दृश्य बड़ा सुंदर है। हाथ में बंसी, ऊपर साधारण कम्बली ओढ़े भगवान सतगुर बिदुर के घर पहुँचे। इसका भाव यह है कि परमात्मा जब भक्त के घर आता है तो राजसी ठाठ में नहीं, प्रेम की सादगी में आता है। संत भी अक्सर फकीरी वेश में इसलिए रहते हैं ताकि दुनिया समझे असली दौलत भीतर की है।
🌹बिदुर उठ के आदर सतकार कीता।
चरणी शीश धरया गुण गान सतगुर।।
👉बिदुर ने दौड़कर स्वागत किया, चरणों में सिर झुका दिया। यह केवल प्रणाम नहीं था यह अहंकार का समर्पण था। जिस घर में गुरु के चरणों का आदर होता है, वहाँ कृपा अपने आप उतरती है।
🌹पत्नी बिदुर दी छिल के दे केला।
फल गिरे नीचे छिल खान सतगुर।।
👉यही इस कथा का सबसे गूढ़ भाव है। बिदुर की पत्नी प्रेम में इतनी मग्न हो गई कि केले के छिलके ही सतगुर को खिलाने लगी और असली फल नीचे गिरते गए। दुनियावी दृष्टि से यह भूल थी, पर प्रेम की दृष्टि से यह सबसे बड़ा प्रसाद बन गया।
🌹संतमत कहता है जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ नियम पीछे रह जाते हैं।
गुरु वस्तु नहीं देखते, भावना देखते हैं।
🌹अन्तर्यामी प्रेम विच मस्त होए।
गोदड़ छिल खादी अमृत जान सतगुर
👉अन्तर्यामी सतगुर सब जानते थे।उन्होंने छिलकों को भी अमृत समझकर स्वीकार किया क्योंकि उनमें निष्कपट प्रेम मिला हुआ था।
🌹यही शिक्षा है अगर दिल में सच्चा प्रेम हो तो सूखी रोटी भी अमृत बन जाती है,और यदि प्रेम न हो तो सोने की थाली भी खाली है।
🌹साईं गोदड़ीवाले सरकार की फकीरी भी यही संदेश देती है कि परमेश्वर को बाहरी दिखावा नहीं चाहिए, उसे प्रेम का एक सच्चा कण चाहिए। जिस भक्त का मन निर्मल हो जाए,उसके छोटे से अर्पण को भी सतगुर अनमोल मान लेते हैं।
👍कामिल रहबर की रहमत
👉परेशानी उन्हें होनी चाहिए
जिनका कोई रहबर नहीं होता।
जिसके सिर पर किसी कामिल संत का हाथ हो,उसकी राह चाहे कठिन हो,
मगर मंज़िल कभी दूर नहीं होती।
👉रहबर केवल रास्ता नहीं दिखाता,
वह गिरने पर संभालता भी है,
टूटे हुए मन को जोड़ता भी है,
और अंधेरे वक़्त में उम्मीद का दिया भी जलाता है।
👉अगर रहबर कामिल हो तो फिर कहना ही क्या। जैसे
हमें साईं गोदड़ीवाले सरकार का आशीर्वाद मिला। ऐसे संतों की निगाह साधारण नहीं होती।वे इंसान के चेहरे से ज़्यादा उसकी रूह को पढ़ कर मुश्किलों का हल निकालते हैं
👉संतों के दरबार की व्यवस्था भी निराली होती है। वहाँ केवल कर्मकांड नहीं चलता,वहाँ दिल की सादगी और सच्चाई काम करती है
👉पंडितों की दुनिया में पाठ, पूजा, मंत्र, नियम और विधियाँ होती हैं,
लेकिन कामिल संतों की दुनिया में
सबसे बड़ा मंत्र संत की मर्ज़ी होती है।
👉उनके मुख से निकला हुआ शब्द
केवल शब्द नहीं होता, वह दुआ भी होता है, हुक्म भी होता है, और तक़दीर बदलने वाली रहमत भी।
👉हज़ारों लोग किताबें पढ़कर भी नहीं बदलते, लेकिन एक कामिल फ़क़ीर की एक नज़र पूरी ज़िंदगी बदल देती है।
👉वे चाहें तो पापी को नवाज़ दें,
अज्ञानी को ज्ञानी बना दें, रोते हुए को हँसा दें,और मिटती हुई आशा में
फिर से जीवन भर दें।
👉क्योंकि संत अपनी ताक़त अपने लिए नहीं रखते, वे परमेश्वर की रहमत के ज़रिया बनकर आते हैं।
👉इसीलिए संतों के दर पर केवल सिर नहीं झुकाया जाता वहाँ अपना अहंकार उतारा जाता है।
सत्संग संदेश
👉जिसके पास कामिल रहबर हो, वह कभी अकेला नहीं होता।
👉संत नियमों से नहीं, रहमत से काम करते हैं।
👉कामिल संत का शब्द टलता नहीं, समय आने पर फल देता है।
👉जहाँ दुनिया हार मान लेती है, वहाँ संत की कृपा रास्ता बना देती है।
👉संतों की पहचान उनके चमत्कार से नहीं, बदले हुए जीवनों से होती है।
👍गुरुभाई बंधुओं :-🙏
यह केवल एक बीमारी की कथा नहीं, बल्कि गुरु-विश्वास, संयम और संत-आज्ञा की महिमा का उदाहरण है।
👉हम सोच भी नहीं सकते कि वह कैसा दौर रहा होगा जब लोग अपने दुख लेकर साईं गोदड़शाह के चरणों में बैठते थे और वहाँ से केवल इलाज नहीं, जीवन की दिशा लेकर लौटते थे।
👉उस बुज़ुर्ग पिता की हालत भी कैसी रही होगी एक तरफ़ बेटे की बीमारी, दूसरी तरफ़ डॉक्टर की सलाह, और तीसरी तरफ़ गुरु का हुक्म।
👉मन डगमगाता है ऐसे समय में। इंसान सोचता है “अगर यह ना किया तो कहीं बच्चा…” लेकिन संत का दरबार तर्क से नहीं, विश्वास से चलता है।
🌹जब साईं सरकार ने फ़रमाया —
“मरता है तो मर जाए,
ब्रांडी नहीं पिलानी।”
तो यह केवल शराब रोकना नहीं था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को एक सिद्धांत देना था कि जिस वस्तु से चेतना गिरती हो, विवेक नष्ट होता हो, परिवार टूटते हों उसे दवा का नाम देकर भी आदत मत बनाओ।
👉और फिर अगले ही क्षण उनका करुणा से भरा वचन —
“मरेगा कैसे, जिसे संत नवाज़ें।”
यही तो संतों की लीला है।
पहले विश्वास की परीक्षा,
फिर रहमत की वर्षा।
👉उस पिता को केवल बेटा वापस नहीं मिला, उसे जीवन की शिक्षा मिली —
कि गुरु का हुक्म परिस्थितियों से बड़ा होता है।
👉आज के समय में वही चीज़ “स्टाइल”, “फैशन”, “स्टेटस” और “पार्टी कल्चर” बन गई।
👉लोग शराब को आधुनिकता समझ बैठे हैं, मगर फिर मन की शांति, घर का सुख, और कृपा की उम्मीद भी रखते हैं।
👉संतों की राह नशे से नहीं,
नज़र की पवित्रता से चलती है।
जिस शरीर में नाम बसाना हो,
उसमें नशे का ज़हर क्यों भरा जाए?
👉“उस ज़माने के लोग खुशक़िस्मत थे,जो दवा से पहले दुआ पर भरोसा रखते थे। और आज का इंसान दुआ भी चाहता है,मगर आदतें छोड़ना नहीं चाहता।”और अंत में यही संदेश निकलता है —
👉गुरु पर विश्वास केवल माथा टेकने से नहीं होता,बल्कि उनकी कही बात को जीवन में उतारने से होता है।
👉 “नरसी की हुण्डी और साँवल शाह की लीला” पुराने समय की बात है।
एक भगत था — नरसी।
दिल इतना साफ़ कि उसके पास धन कम था, मगर भरोसा बेहिसाब था।जिसका सहारा संसार नहीं, उसका सहारा उसका सतगुरु था।
एक दिन ऐसी घड़ी आई कि हुण्डी भरनी थी। लोगों ने कहा:
“नरसी, सोच ले…
दुनिया भरोसे से नहीं, दाम से चलती है।” मगर नरसी मुस्कुराया।
उसने कहा: दुनिया दाम से चलती होगी, मेरा काम तो मेरे साँवल शाह से चलता है।”
लोग हँस पड़े।
किसी ने ताना मारा:
“अगर तेरा सतगुरु इतना ही बड़ा शाह है, तो आकर खुद हुण्डी भर दे।”
नरसी ने सिर झुका लिया।
आँखें बंद कीं और भीतर ही भीतर अपने साँवल शाह को याद किया।
ना कोई शोर…
ना कोई मंत्र…
सिर्फ़ एक सच्ची पुकार।
कहते हैं उसी समय बाज़ार में एक अजनबी शाह आया। चेहरे पर नूर, चाल में सुकून, और आँखों में ऐसी रहमत कि देखने वाला ठहर जाए।
उसने जाकर कहा:
“नरसी की हुण्डी कहाँ है?”
लोग हैरान हुए। उस अजनबी ने बिना हिसाब पूछे पूरी हुण्डी भर दी।
और जाते-जाते इतना कहा:
“अगर और चाहिए हो, तो बता देना…”
अब लोगों के चेहरों का रंग बदल चुका था। जो हँस रहे थे, वही अब सोच में थे।
किसी ने दौड़कर नरसी से कहा:
“तेरा शाह आया था!”
नरसी की आँखें भर आईं।
वह समझ गया ये कोई साधारण आदमी नहीं था।ये मेरे सतगुरु की लीला थी।
वह रोते हुए बोला:
“नरसी शाह मेरा ,मैं हाँ शाह उसदा…”
यानी मैं उसका हूँ और वो मेरा है।
अब हमारे बीच कोई दूरी नहीं रही।
उस दिन बाज़ार वालों ने पहली बार समझा कि संतों के भक्त अकेले नहीं होते। जहाँ संसार के रास्ते बंद होते हैं,
वहाँ से सतगुरु की रहमत शुरू होती है।
संदेश:-सच्चा भगत वही है जो मुसीबत में भी गुरु पर शक नहीं करता।क्योंकि कामिल सतगुरु देर कर सकते हैं लेकिन अपने भक्त की लाज कभी टूटने नहीं देते।
सकारथ जन्म — “वा”
यह अध्याय भक्त नरसी और साँवल शाह सतगुरु की उस दिव्य लीला को प्रकट करता है जहाँ गुरु और भगत के बीच कोई भेद नहीं रह जाता। यह केवल एक हुण्डी भरने की कथा नहीं, बल्कि विश्वास, समर्पण और गुरु-कृपा का जीवंत प्रमाण है।
वा-वस पिया नरसी याद कीता।
बेशुमार हुँडी लौ नाम सतगुर ।।
जब भक्त नरसी ने प्रेम और विश्वास से सतगुरु को याद किया, तब उसकी पुकार केवल शब्द नहीं रही वह आत्मा की आवाज़ बन गई। “बेशुमार हुण्डी” का अर्थ केवल धन नहीं, बल्कि जीवन की हर कमी, हर चिंता और हर आवश्यकता है, जिसे भक्त गुरु के नाम पर छोड़ देता है।
संदेश यह है कि जहाँ संसार हिसाब देखता है, वहाँ सतगुरु प्रेम देखते हैं।
साँवल शाह बन के हुन्डी भरी नरसी।
लौ होर जितने चाहो दाम सतगुर ।।
यहाँ लीला अपने चरम पर पहुँचती है। सतगुरु स्वयं साँवल शाह बनकर आए और नरसी की हुण्डी भर दी।यह केवल सहायता नहीं थी यह घोषणा थी कि:
“जो भक्त गुरु पर पूर्ण भरोसा करता है, उसकी लाज गुरु स्वयं रखते हैं।”
“लौ होर जितने चाहो दाम” का भाव यह है कि परमेश्वर और सतगुरु की रहमत सीमित नहीं होती। संसार देने से पहले सोचता है, मगर सतगुरु कृपा बरसाने में हिसाब नहीं करते।
नरसी शाह मेरा, मैं हां शाह उसदा।
कोई भिन्न ना भगत मुदाम सतगुर ।।
यह पंक्ति सूफ़ियाना इश्क़ का सार है।
भक्त कहता है “नरसी मेरा है और मैं नरसी का हूँ।”यहीं गुरु और शिष्य का भेद मिट जाता है।
जब प्रेम पूर्ण हो जाए तो “मैं” और “तू” समाप्त हो जाते हैं। यही फ़ना की अवस्था है, जहाँ भक्त अपनी अलग पहचान खोकर गुरु के रंग में रंग जाता है।यह केवल रिश्ता नहीं रूहानी एकता है।
साँवल शाह सारे, शाह शाह कीते।
गोदड़ धन पाके धन-धन शाम सतगुर
जिसे साँवल शाह का संग मिला, वह भीतर से धनवान हो गया।यहाँ “शाह” केवल अमीर नहीं, बल्कि आत्मिक रूप से समृद्ध इंसान का प्रतीक है।
“गोदड़ धन” का भाव यह है कि जिसने गुरु की गोदड़ी पकड़ ली, उसने संसार का सबसे बड़ा खज़ाना पा लिया।
फिर चाहे बाहरी जीवन साधारण हो, भीतर का मन बादशाह बन जाता है।
सत्संग योग्य संदेश
संसार के दरबार में कागज़, गवाह और प्रमाण माँगे जाते हैं,मगर सतगुरु के दरबार में केवल विश्वास चलता है।
भक्त नरसी ने धन नहीं दिखाया,
उसने भरोसा दिखाया और सतगुरु ने साबित कर दिया कि: “जहाँ सच्चा समर्पण हो,वहाँ गुरु स्वयं रूप बदलकर भी भक्त की लाज रख लेते हैं।”
यही सकारथ जन्म का रहस्य है —
गुरु केवल उपदेश नहीं देते,वो समय आने पर अपने भक्त के लिए स्वयं चलकर भी आते हैं।
👍 संतजनों की जुबान से सुना
एक दर्द भरा रहस्यमय जीवन।
सखी हारांवाले सरकार जैसा सखावत करने वाला संत उस दौर में कोई नहीं था फिर भी जीवन भर मुश्किलों ने साथ नहीं छोड़ा,चाहते तो अपने लिए भी कुछ करते मगर संत देवों के रहस्य रहस्य ही रहे
👉अब बात सुनिए गुरुबहनों बंधुओ
सृष्टि की उत्पति माने जाने वाले जब धरती पर आए तो जीवन भर भागते रहे बुरी अलामतें आशीर्वाद भी लेती रही और तंग भी करती रही
“भगवान श्रीराम को ही लीजिए
जो बारह कलाँ और भगवान कृष्ण सोलह कला सम्पूर्ण हुए,उनके लिये दुर्लभ कुछ भी नहीं था परन्तु कितने आश्चर्य की बात सभी के जीवन में आराम सुख नहीं था
👉भगवान श्रीराम 14 वर्ष वनवास में समय भोगते रहे कष्ट का सामना करते रहे
👉वहीं श्रीकृष्ण जंगल जंगल भागते रहे,बचपन से कभी मथुरा,कभी द्वारका और कभी कौरव पांडवों में युद्ध में रहे
इसके अलावा के बड़े- बड़े संत जैसे ईसा मसीह और गुरु गोबिन्द सिंह जी आदि ने अपने जीवन में क्या सुख पाया
👉अभी तक कोई इस रहस्य को समझ नहीं पाया है। क्योंकि दूसरों को सुख देने वाले कष्ट हरने वाले स्वयं सुखों से वंचित क्यों रहे।
👉गुरु बहनों बंधुओं हमारे लिए संदेश यही है आम इंसान की हैसियत ही क्या है जो बिना गुरु के आशीर्वाद के चुनौतियों का सामना कर सके
निश्चिंत रहो ग़म छोड़ के साईं के सहारे जिओ जो तमाम अंधेरों को हरने वाले हैं उजालों की रह है
“जय साईं जय साईं”
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