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शिवाय.. ✍️🙏
स्पीयरमैंने अपने द्वी कारक सिद्धांत में बुद्धि की संरचना में मूल रूप से दो कारकों सामान्य कारक(g-factor ) और विशिष्ट कारक(s-factor ) को नहीं माना है इसमें जी कारक को तर्क और समस्या समाधान करने की क्षमता माना गया है👏
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D.k✍️🙏
समीपस्थ विकास के क्षेत्र की पहचान तब होती है जबएक बच्चा किसी समस्या को हल करने के अंतिम चरण पर पहुंच जाता है लेकिन बिना किसी बाह्य मदद के वह उससे हल नहीं कर पाता है। यह बच्चे के समस्या को हल करने की वर्तमान क्षमता और समस्या हल करने की संभावित क्षमता में अंतरप्रदर्शित करता है।इसे वास्तविक विकास और संभावितविकास के बीच अंतर के रूप में समझा जा सकता है, जिसकी पहचान बच्चे के किसी समस्या को हल करते समय की जा सकती है।सक्षम सहपाठीऔर वरिष्ठ बच्चे की इस अंतर को भरने में मदद करते हैं। 🙏
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Teaching Exam के लिए बेस्ट बुक का collection नीचे दिया गया है आप अपनी सुविधा अनुसार बुक के लिए ऑर्डर कर सकते है
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Teaching exam ke liye all books ka collection hai ,jakar dekh kr le skte.aap log aur tayari kr skte hai.
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सभी विद्यार्थियों से अनुरोध है कि शीघ्र ही ये सारे ग्रुप जॉइन करें। और कम से कम हर विद्यार्थी इस लिंक को 10 ग्रुप तक शेयर करें।
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जिस किसी का सीटेट क्वालीफाई नहीं हुआ है
पूरी तैयारी में कराऊंगा बस आपको
ईमानदारी विश्वास और लगन के साथ पढ़ाई करनी होगी SUBCRIBE करके अदृश्य मत हो जाना प्रत्येक दिन वीडियो अपलोड करूंगा ट्रिक वाली
https://youtube.com/c/BacktoPathshala
अबकी बार सी टेट पार
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*📌बिग ब्रेकिंग न्यूज़*
*सीटेट 2021 जुलाई की अधिसूचना मार्च के दूसरे सप्ताह में जारी हो सकता है। जो लोग नए विद्यार्थी हैं या जो लोग असफल हुए हैं वह अभी से तैयारी में लग जाएं। जुलाई 2021 में होने वाले सीटेट एग्जाम अपने पुराने पैटर्न पर होगा---
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वाक्यांश के लिए एक शब्द : [कुल-50]
1.जंगल में फैलनेवाली आग - दावाग्नि
2.समुद्र में लगने वाली आग - बड़वानल
3.जो सपना दिन में देखा जाए - दिवास्वप्न
4.जिसे कठिनाई से जाना जा सके - दुर्ज्ञेय
5.जो कठिनाई से समझ में आता हो - दुर्बोध
6.अर्द्धरात्रि का समय - निशीथ
7.रंगमंच पर पर्दे के पीछे का स्थान - नेपथ्य
8.आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने वाला - नैष्ठिक
9.नाटक का पर्दा गिरना - पटाक्षेप
10.रंगमंच का पर्दा - यवनिका
11.जो उत्तर न दे सके - निरुत्तर
12.केवल दूध पर जीवित रहने वाला - पयोहारी
13.शरणागत की रक्षा करने वाला - प्रणतपाल
14.एक बार कही हुई बात को दोहराते रहना - पिष्टपेषण
15.जो पूछने योग्य हो - पृष्टव्य
16.प्रमाण द्वारा सिद्ध करने योग्य - प्रमेय
17.रात का भोजन - ब्यालू/ रात्रिभोज
18.जिसकी आंखें मगर जैसी हो - मकराक्ष
19.जिस स्त्री की आंखें मछली के समान हो - मीनाक्षी
20.जिस पुरुष की आंखें मछली के समान हो - मीनाक्ष
21.हरिण के नेत्रों-सी आंखों वाली - मृगनयनी
22.मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा - मुमुक्षा
23.मरने की इच्छा - मुमूर्षा
24.युद्ध करने की इच्छा - युयुत्सा
25.सृजन करने की इच्छा - सिसृक्षा
26.खुले हाथ से दान देने वाला - मुक्तहस्त
27.माता की हत्या करने वाला - मातृहन्ता
28.जिसने मृत्यु को जीत लिया हो - मृत्युंजय
29.वह कन्या जिसका विवाह करने का वचन दे दिया गया हो - वाग्दत्ता
30.व्याकरण का ज्ञाता - वैयाकरण
31.शत्रु का नाश करने वाला - शत्रुघ्न
32.जिसका कोई आदि और अंत न हो - शाश्वत
33.जो सब कुछ जानता हो - सर्वज्ञ
34.सब कुछ पाने वाला - सर्वलब्ध
35.जो गुप्त रूप से निवास करता हो - छद्मवासी
37.दिन और रात के बीच का समय - गोधूलि वेला
38.जिसका अर्थ स्वयं ही सिद्ध है - सिद्धार्थ
39.वह व्यक्ति जिसका ज्ञान अपने ही स्थान तक सीमित है - कूपमंडूक
40.भोजन करने के बाद का बचा हुआ अन्न/जूठन - उच्छिष्ट
41.जिसे सूँघा न जा सके - आघ्रेय
42.वह कवि जो तत्काल कविता कर सके - आशुकवि
43.जिसका कोई शत्रु न जन्मा हो - अजातशत्रु
44.जो इंद्रियों (गो) द्वारा न जाना जा सके - अगोचर
45.किसी बात को अत्यधिक बढाकर कहना - अतिशयोक्ति
46.जिसे बुलाया न गया हो - अनाहूत
47.जो सबके मन की बात जनता हो - अंतर्यामी
48.जो मापा न जा सके - अपरिमेय
49. किसी वस्तु को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा - अभीप्सा
50.आवश्यकता से अधिक धन का ग्रहण न करना - अपरिग्रह
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पद्मावत--
मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित पद्मावत महाकाव्य पर विशेष तथ्य --
💐रचनाकाल 1540 ई.
💐रचनाकार- मलिक मोहम्मद जायसी
💐भाषा अवधी
💐पद्मावत के रचनाकार मलिक मोहम्मद जायसी हैं । 💐इनका जन्म 1492 ईस्वी में हुआ।
💐पद्मावत 1540 ई. में शेरशाह सूरी के समय में लिखी गई
💐सूफी प्रेमाख्यान परंपरा का यह प्रतिनिधि ग्रंथ माना जाता है।
💐रामचंद्र शुक्ल ने इस ग्रंथ को हिंदी का ‘जगमगाता रत्न’ कहां है।
💐पद्मावत में 57 खंड है और अंत में उपसंहार है।
💐पद्मावत की पहली पंक्ति है :
” सुमिरौ आदी एक करतार”
💐57 वें खण्ड की अंतिम पंक्ति है :
“जौहर भई सब इस्तिरीपुरुष भये संग्राम।
बादशाह गढ़ चूरा,चित् उर भा ईस्लाम।।”
💐उपसंहार की अंतिम पंक्ति है :
“बिरिध जो सीस डोलावै पूनि धुनि आवै रीस।
बूढी आयु होअ तुम्हें यह दिन्हे – कीन्हे असीस।।”
💐नागमती वियोग खंड की पहली पंक्ति है :
“नागमती पथ चित्त उर हेरा, पिउ जो गये पुनि कीन्ह न फेरा।”
💐इस नागमती वियोग खंड की अंतिम पंक्ति है:-
“नहिं पावस ओहि देसरा नहि हेवंत बासंत।
ना कोकिल ना पपीहरा जेहिं सुनै आवे कंत।।”
💐रामचंद्र शुक्ल ने नागमती वियोग खंड को हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर कहा है ।
💐पद्मावत में बारहमासा आषाढ माह से प्रारंभ होता है। पहली पंक्ति है :
“चढौ आकाश गगन घन गाजा”
💐पद्मावत में एक पद मिलता है जिसके आधार पर पद्मावत की प्रतीकात्मक व्याख्या की जाती है हालांकि माता प्रसाद गुप्त इस पद को प्रक्षिप्त मानते हैं।
“तन चित उर मन राजा कीन्हा।
हिय सिंहलगढ बुधि पद्मनी चिन्हा।।“
💐प्रतीक इस प्रकार है :-
तन /शरीर -चित्तौड़गढ़
मन- रत्नसेन
ह्रदय- सिंहलगढ़
बुद्धि- पद्मावती
दुनिया धंधा/ सांसारिकता - नागमती
गुरु -- हीरामन तोता
माया-- अलाउद्दीन खिलजी
शैतान -- राघव चेतन
पद्मावत के स्वरूप के बारे में विभिन्न विद्वानों के मत :
💐पद्मावत में प्रेम की प्रधानता निर्विवाद है किंतु इसके स्वरूप को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। जो इस प्रकार से है : —
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार :
💐शुक्ल जी ने पद्मावत के प्रेम को अलौकिक, एकांतिक एवं आध्यत्मिक माना है ।
💐शुक्ल जी पद्मावत को समासोक्ति व अन्योक्क्तिपरक काव्य माना है।
💐शुक्ल जी के अनुसार पद्मावत‘ हिंदी साहित्य का जगमगाता रत्न‘ है ।
💐शुक्ल के अनुसार प्रबंध के क्षेत्र में पद्मावत का स्थान रामचरितमानस के बाद दूसरा है।
विजय देव नारायण साही के अनुसार :
💐विजयदेव नारायण साही ने पद्मावत के प्रेम को लौकिक माना है। इनके अनुसार जायसी को बैकुंठी प्रेम की तलाश नहीं है बल्कि वह तो ऐसा प्रेम चाहते हैं जो प्रेम करने वाले कोई बैकुंठी बना दे।
💐जायसी यदि सूफी है तो कुजात सूफी हैं ।
💐जायसी पहले कवि है बाद में सूफी है।
💐पद्मावत एक महाकाव्यात्मक त्रासदी है।
माता प्रसाद गुप्त के अनुसार :
💐पद्मावत ना तो समासोक्ति है ना ही अन्योक्ति बल्कि वह तो ‘स्वभावोक्ति’ है और जो कुछ उसके स्वभाव में है वह है – प्रेम।
💐वासुदेवशरण अग्रवाल ने पद्मावत की ‘संजीवनी टीका’ लिखी है। इसका 1956 ईस्वी में दूसरा साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है।
💐 वासुदेव शरण अग्रवाल जी ने जायसी को पृथ्वी पुत्र की संज्ञा दी है । ‘पृथ्वी पुत्र’ नाम से इन्होंने निबंध संग्रह भी लिखा है।
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🟦 भारत के प्रमुख दर्रे
■ काराकोरम दर्रा - जम्मू कश्मीर
■ जोजिला दर्रा - जम्मू कश्मीर
■ पीरपंजाल दर्रा - जम्मू कश्मीर
■ बनिहाल दर्रा - जम्मू कश्मीर
■ बुर्जिल दर्रा - जम्मू कश्मीर
■ शिपकीला दर्रा - हिमाचल प्रदेश
■ रोहतांग दर्रा - हिमाचल प्रदेश
■ बड़ालाचा दर्रा - हिमाचल प्रदेश
■ लिपुलेख दर्रा - उत्तराखंड
■ माना दर्रा - उत्तराखंड
■ नीति दर्रा - उत्तराखंड
■ नाथूला दर्रा - सिक्किम
■ जैलेप्लो दर्रा - सिक्किम
■ बोम्डिला दर्रा - अरुणाचल प्रदेश
■ यांग्याप दर्रा - अरुणाचल प्रदेश
■ दिफू दर्रा - अरुणाचल प्रदेश
■ तुजु दर्रा - मणिपुर
