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्द
दीर्घायु – दीर्घ है जिसकी आयु
अधमरा – आधा मरा हुआ
निर्विवाद – विवाद से निवृत्त
महाप्रज्ञ – महान् है जिसकी प्रज्ञा
नलकूप – नल से बना है जो कूप
परकटा – पर हैँ कटे जिसके
दुमकटा – दुम है कटी जिसकी
प्राणप्रिय – प्रिय है जो प्राणोँ को
अल्पसंख्यक – अल्प हैँ जो संख्या मेँ
पुच्छलतारा – पूँछ है जिस तारे की
नवागन्तुक – नया है जो आगन्तुक
वक्रतुण्ड – वक्र (टेढ़ी) है जो तुण्ड
चौसिँगा – चार हैँ जिसके सीँग
अधजला – आधा है जो जला
अतिवृष्टि – अति है जो वृष्टि
महारानी – महान् है जो रानी
नराधम – नर है जो अधम (पापी)
नवदम्पत्ति – नया है जो दम्पत्ति
(ii) उपमान वाचक कर्मधारय– इसमेँ एक पद उपमान तथा द्वितीय पद उपमेय होता है। जैसे –
बाहुदण्ड – बाहु है दण्ड समान
चंद्रवदन – चंद्रमा के समान वदन (मुख)
कमलनयन – कमल के समान नयन
मुखारविँद – अरविँद रूपी मुख
मृगनयनी – मृग के समान नयनोँ वाली
मीनाक्षी – मीन के समान आँखोँ वाली
चन्द्रमुखी – चन्द्रमा के समान मुख वाली
चन्द्रमुख – चन्द्र के समान मुख
नरसिँह – सिँह रूपी नर
चरणकमल – कमल रूपी चरण
क्रोधाग्नि – अग्नि के समान क्रोध
कुसुमकोमल – कुसुम के समान कोमल
ग्रन्थरत्न – रत्न रूपी ग्रन्थ
पाषाण हृदय – पाषाण के समान हृदय
देहलता – देह रूपी लता
कनकलता – कनक के समान लता
करकमल – कमल रूपी कर
वचनामृत – अमृत रूपी वचन
अमृतवाणी – अमृत रूपी वाणी
विद्याधन – विद्या रूपी धन
वज्रदेह – वज्र के समान देह
संसार सागर – संसार रूपी सागर
6. द्विगु समास –
जिस समस्त पद मेँ पूर्व पद संख्यावाचक हो और पूरा पद समाहार (समूह) या समुदाय का बोध कराए उसे द्विगु समास कहते हैँ। संस्कृत व्याकरण के अनुसार इसे कर्मधारय का ही एक भेद माना जाता है। इसमेँ पूर्व पद संख्यावाचक विशेषण तथा उत्तर पद संज्ञा होता है। स्वयं 'द्विगु' मेँ भी द्विगु समास है। जैसे –
एकलिंग – एक ही लिँग
दोराहा – दो राहोँ का समाहार
तिराहा – तीन राहोँ का समाहार
चौराहा – चार राहोँ का समाहार
पंचतत्त्व – पाँच तत्त्वोँ का समूह
शताब्दी – शत (सौ) अब्दोँ (वर्षोँ) का समूह
पंचवटी – पाँच वटोँ (वृक्षोँ) का समूह
नवरत्न – नौ रत्नोँ का समाहार
त्रिफला – तीन फलोँ का समाहार
त्रिभुवन – तीन भुवनोँ का समाहार
त्रिलोक – तीन लोकोँ का समाहार
त्रिशूल – तीन शूलोँ का समाहार
त्रिवेणी – तीन वेणियोँ का संगम
त्रिवेदी – तीन वेदोँ का ज्ञाता
द्विवेदी – दो वेदोँ का ज्ञाता
चतुर्वेदी – चार वेदोँ का ज्ञाता
तिबारा – तीन हैँ जिसके द्वार
सप्ताह – सात दिनोँ का समूह
चवन्नी – चार आनोँ का समाहार
अठवारा – आठवेँ दिन को लगने वाला बाजार
पंचामृत – पाँच अमृतोँ का समाहार
त्रिलोकी – तीन लोकोँ का
सतसई – सात सई (सौ) (पदोँ) का समूह
एकांकी – एक अंक है जिसका
एकतरफा – एक है जो तरफ
इकलौता – एक है जो
चतुर्वर्ग – चार हैँ जो वर्ग
चतुर्भुज – चार भुजाओँ वाली आकृति
त्रिभुज – तीन भुजाओँ वाली आकृति
पन्सेरी – पाँच सेर वाला बाट
द्विगु – दो गायोँ का समाहार
चौपड़ – चार फड़ोँ का समूह
षट्कोण – छः कोण वाली बंद आकृति
दुपहिया – दो पहियोँ वाला
त्रिमूर्ति – तीन मूर्तियोँ का समूह
दशाब्दी – दस वर्षोँ का समूह
पंचतंत्र – पाँच तंत्रोँ का समूह
नवरात्र – नौ रातोँ का समूह
सप्तर्षि – सात ऋषियोँ का समूह
दुनाली – दो नालोँ वाली
चौपाया – चार पायोँ (पैरोँ) वाला
षट्पद – छः पैरोँ वाला
चौमासा – चार मासोँ का समाहार
इकतीस – एक व तीस का समूह
सप्तसिन्धु – सात सिन्धुओँ का समूह
त्रिकाल – तीन कालोँ का समाहार
अष्टधातु – आठ धातुओँ का समूह
संधि व समास
असमानता –
1. संधि मेँ दो ध्वनियोँ या वर्णोँ का योग है जबकि समास मेँ दो शब्दोँ या पदोँ का मेल होता है।
2. संधि मेँ ध्वनी विकार आवश्यक है जबकि समास मेँ ध्वनि विकार तभी होता है जब सामासिक पद मेँ संधि की स्थिति हो अन्यथा नहीँ।
समानता –
1. दोनोँ ही नवीन शब्द–सृजन मेँ सहायक हैँ।
2. दोनोँ ही शब्दोँ को संक्षिप्त करने मेँ सहायक हैँ।
3. दोनोँ ही कम शब्दोँ मेँ अधिक भाव प्रकट करने की ‘समास–शैली–निर्माण’ मेँ सहायक हैँ
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दीर्घायु – दीर्घ है जिसकी आयु
अधमरा – आधा मरा हुआ
निर्विवाद – विवाद से निवृत्त
महाप्रज्ञ – महान् है जिसकी प्रज्ञा
नलकूप – नल से बना है जो कूप
परकटा – पर हैँ कटे जिसके
दुमकटा – दुम है कटी जिसकी
प्राणप्रिय – प्रिय है जो प्राणोँ को
अल्पसंख्यक – अल्प हैँ जो संख्या मेँ
पुच्छलतारा – पूँछ है जिस तारे की
नवागन्तुक – नया है जो आगन्तुक
वक्रतुण्ड – वक्र (टेढ़ी) है जो तुण्ड
चौसिँगा – चार हैँ जिसके सीँग
अधजला – आधा है जो जला
अतिवृष्टि – अति है जो वृष्टि
महारानी – महान् है जो रानी
नराधम – नर है जो अधम (पापी)
नवदम्पत्ति – नया है जो दम्पत्ति
(ii) उपमान वाचक कर्मधारय– इसमेँ एक पद उपमान तथा द्वितीय पद उपमेय होता है। जैसे –
बाहुदण्ड – बाहु है दण्ड समान
चंद्रवदन – चंद्रमा के समान वदन (मुख)
कमलनयन – कमल के समान नयन
मुखारविँद – अरविँद रूपी मुख
मृगनयनी – मृग के समान नयनोँ वाली
मीनाक्षी – मीन के समान आँखोँ वाली
चन्द्रमुखी – चन्द्रमा के समान मुख वाली
चन्द्रमुख – चन्द्र के समान मुख
नरसिँह – सिँह रूपी नर
चरणकमल – कमल रूपी चरण
क्रोधाग्नि – अग्नि के समान क्रोध
कुसुमकोमल – कुसुम के समान कोमल
ग्रन्थरत्न – रत्न रूपी ग्रन्थ
पाषाण हृदय – पाषाण के समान हृदय
देहलता – देह रूपी लता
कनकलता – कनक के समान लता
करकमल – कमल रूपी कर
वचनामृत – अमृत रूपी वचन
अमृतवाणी – अमृत रूपी वाणी
विद्याधन – विद्या रूपी धन
वज्रदेह – वज्र के समान देह
संसार सागर – संसार रूपी सागर
6. द्विगु समास –
जिस समस्त पद मेँ पूर्व पद संख्यावाचक हो और पूरा पद समाहार (समूह) या समुदाय का बोध कराए उसे द्विगु समास कहते हैँ। संस्कृत व्याकरण के अनुसार इसे कर्मधारय का ही एक भेद माना जाता है। इसमेँ पूर्व पद संख्यावाचक विशेषण तथा उत्तर पद संज्ञा होता है। स्वयं 'द्विगु' मेँ भी द्विगु समास है। जैसे –
एकलिंग – एक ही लिँग
दोराहा – दो राहोँ का समाहार
तिराहा – तीन राहोँ का समाहार
चौराहा – चार राहोँ का समाहार
पंचतत्त्व – पाँच तत्त्वोँ का समूह
शताब्दी – शत (सौ) अब्दोँ (वर्षोँ) का समूह
पंचवटी – पाँच वटोँ (वृक्षोँ) का समूह
नवरत्न – नौ रत्नोँ का समाहार
त्रिफला – तीन फलोँ का समाहार
त्रिभुवन – तीन भुवनोँ का समाहार
त्रिलोक – तीन लोकोँ का समाहार
त्रिशूल – तीन शूलोँ का समाहार
त्रिवेणी – तीन वेणियोँ का संगम
त्रिवेदी – तीन वेदोँ का ज्ञाता
द्विवेदी – दो वेदोँ का ज्ञाता
चतुर्वेदी – चार वेदोँ का ज्ञाता
तिबारा – तीन हैँ जिसके द्वार
सप्ताह – सात दिनोँ का समूह
चवन्नी – चार आनोँ का समाहार
अठवारा – आठवेँ दिन को लगने वाला बाजार
पंचामृत – पाँच अमृतोँ का समाहार
त्रिलोकी – तीन लोकोँ का
सतसई – सात सई (सौ) (पदोँ) का समूह
एकांकी – एक अंक है जिसका
एकतरफा – एक है जो तरफ
इकलौता – एक है जो
चतुर्वर्ग – चार हैँ जो वर्ग
चतुर्भुज – चार भुजाओँ वाली आकृति
त्रिभुज – तीन भुजाओँ वाली आकृति
पन्सेरी – पाँच सेर वाला बाट
द्विगु – दो गायोँ का समाहार
चौपड़ – चार फड़ोँ का समूह
षट्कोण – छः कोण वाली बंद आकृति
दुपहिया – दो पहियोँ वाला
त्रिमूर्ति – तीन मूर्तियोँ का समूह
दशाब्दी – दस वर्षोँ का समूह
पंचतंत्र – पाँच तंत्रोँ का समूह
नवरात्र – नौ रातोँ का समूह
सप्तर्षि – सात ऋषियोँ का समूह
दुनाली – दो नालोँ वाली
चौपाया – चार पायोँ (पैरोँ) वाला
षट्पद – छः पैरोँ वाला
चौमासा – चार मासोँ का समाहार
इकतीस – एक व तीस का समूह
सप्तसिन्धु – सात सिन्धुओँ का समूह
त्रिकाल – तीन कालोँ का समाहार
अष्टधातु – आठ धातुओँ का समूह
संधि व समास
असमानता –
1. संधि मेँ दो ध्वनियोँ या वर्णोँ का योग है जबकि समास मेँ दो शब्दोँ या पदोँ का मेल होता है।
2. संधि मेँ ध्वनी विकार आवश्यक है जबकि समास मेँ ध्वनि विकार तभी होता है जब सामासिक पद मेँ संधि की स्थिति हो अन्यथा नहीँ।
समानता –
1. दोनोँ ही नवीन शब्द–सृजन मेँ सहायक हैँ।
2. दोनोँ ही शब्दोँ को संक्षिप्त करने मेँ सहायक हैँ।
3. दोनोँ ही कम शब्दोँ मेँ अधिक भाव प्रकट करने की ‘समास–शैली–निर्माण’ मेँ सहायक हैँ
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्ता पर आरुढ़
शरणागत – शरण मेँ आया हुआ
गजारुढ़ – गज पर आरुढ़
।♦ तत्पुरुष समास के उपभेद –
उपर्युक्त भेदोँ के अलावा तत्पुरुष समास के दो उपभेद होते हैँ –
(i) अलुक् तत्पुरुष – इसमेँ समास करने पर पूर्वपद की विभक्ति का लोप नहीँ होता है। जैसे—
युधिष्ठिर—युद्धि (युद्ध मेँ) + स्थिर = ज्येष्ठ पाण्डव
मनसिज—मनसि (मन मेँ) + ज (उत्पन्न) = कामदेव
खेचर—खे (आकाश) + चर (विचरने वाला) = पक्षी
(ii) नञ् तत्पुरुष – इस समास मेँ द्वितीय पद प्रधान होता है किन्तु प्रथम पद संस्कृत के नकारात्मक अर्थ को देने वाले ‘अ’ और ‘अन्’ उपसर्ग से युक्त होता है। इसमेँ निषेध अर्थ मेँ ‘न’ के स्थान पर यदि बाद मेँ व्यंजन वर्ण हो तो ‘अ’ तथा बाद मेँ स्वर हो तो ‘न’ के स्थान पर ‘अन्’ हो जाता है। जैसे –
अनाथ – न (अ) नाथ
अन्याय – न (अ) न्याय
अनाचार – न (अन्) आचार
अनादर – न (अन्) आदर
अजन्मा – न जन्म लेने वाला
अमर – न मरने वाला
अडिग – न डिगने वाला
अशोच्य – नहीँ है शोचनीय जो
अनभिज्ञ – न अभिज्ञ
अकर्म – बिना कर्म के
अनादर – आदर से रहित
अधर्म – धर्म से रहित
अनदेखा – न देखा हुआ
अचल – न चल
अछूत – न छूत
अनिच्छुक – न इच्छुक
अनाश्रित – न आश्रित
अगोचर – न गोचर
अनावृत – न आवृत
नालायक – नहीँ है लायक जो
अनन्त – न अन्त
अनादि – न आदि
असंभव – न संभव
अभाव – न भाव
अलौकिक – न लौकिक
अनपढ़ – न पढ़ा हुआ
निर्विवाद – बिना विवाद के
3. द्वन्द्व समास –
जिस समस्त पद मेँ दोनोँ अथवा सभी पद प्रधान होँ तथा उनके बीच मेँ समुच्चयबोधक–‘और, या, अथवा, आदि’ का लोप हो गया हो, तो वहाँ द्वन्द्व समास होता है। जैसे –
अन्नजल – अन्न और जल
देश–विदेश – देश और विदेश
राम–लक्ष्मण – राम और लक्ष्मण
रात–दिन – रात और दिन
खट्टामीठा – खट्टा और मीठा
जला–भुना – जला और भुना
माता–पिता – माता और पिता
दूधरोटी – दूध और रोटी
पढ़ा–लिखा – पढ़ा और लिखा
हरि–हर – हरि और हर
राधाकृष्ण – राधा और कृष्ण
राधेश्याम – राधे और श्याम
सीताराम – सीता और राम
गौरीशंकर – गौरी और शंकर
अड़सठ – आठ और साठ
पच्चीस – पाँच और बीस
छात्र–छात्राएँ – छात्र और छात्राएँ
कन्द–मूल–फल – कन्द और मूल और फल
गुरु–शिष्य – गुरु और शिष्य
राग–द्वेष – राग या द्वेष
एक–दो – एक या दो
दस–बारह – दस या बारह
लाख–दो–लाख – लाख या दो लाख
पल–दो–पल – पल या दो पल
आर–पार – आर या पार
पाप–पुण्य – पाप या पुण्य
उल्टा–सीधा – उल्टा या सीधा
कर्तव्याकर्तव्य – कर्तव्य अथवा अकर्तव्य
सुख–दुख – सुख अथवा दुख
जीवन–मरण – जीवन अथवा मरण
धर्माधर्म – धर्म अथवा अधर्म
लाभ–हानि – लाभ अथवा हानि
यश–अपयश – यश अथवा अपयश
हाथ–पाँव – हाथ, पाँव आदि
नोन–तेल – नोन, तेल आदि
रुपया–पैसा – रुपया, पैसा आदि
आहार–निद्रा – आहार, निद्रा आदि
जलवायु – जल, वायु आदि
कपड़े–लत्ते – कपड़े, लत्ते आदि
बहू–बेटी – बहू, बेटी आदि
पाला–पोसा – पाला, पोसा आदि
साग–पात – साग, पात आदि
काम–काज – काम, काज आदि
खेत–खलिहान – खेत, खलिहान आदि
लूट–मार – लूट, मार आदि
पेड़–पौधे – पेड़, पौधे आदि
भला–बुरा – भला, बुरा आदि
दाल–रोटी – दाल, रोटी आदि
ऊँच–नीच – ऊँच, नीच आदि
धन–दौलत – धन, दौलत आदि
आगा–पीछा – आगा, पीछा आदि
चाय–पानी – चाय, पानी आदि
भूल–चूक – भूल, चूक आदि
फल–फूल – फल, फूल आदि
खरी–खोटी – खरी, खोटी आदि
4. बहुव्रीहि समास –
जिस समस्त पद मेँ कोई भी पद प्रधान नहीँ हो, अर्थात् समास किये गये दोनोँ पदोँ का शाब्दिक अर्थ छोड़कर तीसरा अर्थ या अन्य अर्थ लिया जावे, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैँ। जैसे – 'लम्बोदर' का सामान्य अर्थ है– लम्बे उदर (पेट) वाला, परन्तु लम्बोदर सामास मेँ अन्य अर्थ होगा – लम्बा है उदर जिसका वह—गणेश।
अजानुबाहु – जानुओँ (घुटनोँ) तक बाहुएँ हैँ जिसकी वह—विष्णु
अजातशत्रु – नहीँ पैदा हुआ शत्रु जिसका—कोई व्यक्ति विशेष
वज्रपाणि – वह जिसके पाणि (हाथ) मेँ वज्र है—इन्द्र
मकरध्वज – जिसके मकर का ध्वज है वह—कामदेव
रतिकांत – वह जो रति का कांत (पति) है—कामदेव
आशुतोष – वह जो आशु (शीघ्र) तुष्ट हो जाते हैँ—शिव
पंचानन – पाँच है आनन (मुँह) जिसके वह—शिव
वाग्देवी – वह जो वाक् (भाषा) की देवी है—सरस्वती
युधिष्ठिर – जो युद्ध मेँ स्थिर रहता है—धर्मराज (ज्येष्ठ पाण्डव)
षडानन – वह जिसके छह आनन हैँ—कार्तिकेय
सप्तऋषि – वे जो सात ऋषि हैँ—सात ऋषि विशेष जिनके नाम निश्चित हैँ
त्रिवेणी – तीन वेणियोँ (नदियोँ) का संगमस्थल—प्रयाग
पंचवटी – पाँच वटवृक्षोँ के समूह वाला स्थान—मध्य प्रदेश मेँ स्थान विशेष
रामायण – राम का अयन (आश्रय)—वाल्मीकि रचित काव्य
पंचामृत – पाँच प्रकार का अमृत—दूध, दही, शक्कर, गोबर, गोमूत्र का रसायन विशेष
षड्दर्शन – षट् दर्शनोँ का समूह—छह विशिष्ट भारतीय दर्शन–न्याय, सांख्य, द्वैत आदि
चारपाई – चार पाए होँ जिसके—खाट
विषधर – विष को धारण करने वाला—साँप
अष्टाध्यायी – आठ अध्यायोँ वाला—पाणिनि कृत व्याकरण
चक्रधर – चक्र धारण करने वाला—श्रीकृष्ण
पतझड़ – वह ऋतु जिसमेँ पत्ते झड़ते हैँ—बसंत
दीर्घबाहु
