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*🎶 म्यूजिक के हवाले से इस्लाम क्या कहता है ?*
हम इसे चंद हदीस और कुरान की रोशनी में समझें :
हजरत इब्ने उमर रज़ि कहते हैं कि,
*"नबी صلى الله عليه وسلم.. ने जब एक बार बांसुरी की आवाज सुनी तो अपने कानों में अंगुली डाल कर उससे दूर चले गये।*
[अबू दाऊद की हदीस न०- 4924, इमाम अल्बानी ने सहीह कहा]
इस हदीस से साबित होता है की सिर्फ़ डफ़ बजाने की इजाज़त है, आज कल के (Music) के यंत्र (Instruments) रखना, उन यंत्र को ईस्तेमाल करना, इश्किया, अख़्लाक़ी, क़बाहत, शिर्क व बेहयाई वाले अश'आर पर मबनी गाने गाना या बजाना इंतिहाई ख़तरनाक और शैतानी ( बुरे काम, गुनाह) में से है।
इर्शाद बारी तआला है :
وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَشْتَرِي لَهْوَ الْحَدِيثِ لِيُضِلَّ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَيَتَّخِذَهَا هُزُوًا أُولَئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ مُهِينٌ
*"और लोगों में से कुछ ऐसे हैं, जो खेल की बाते खरीदते हैं ताकि बग़ैर समझे अल्लाह की राह से बहका दें और उन्हें हसी मज़ाक़ बना लें उनके लिए ज़िल्लत का अज़ाब है।"*
[क़ुरान 31:6]
🎶music और गाने दिलों में रोग पैदा करते हैं, इससे दिल गुनाहों की तरफ़ माइल होते हैं इससे दिल सख्त हो जाता है,इस लिए इस से बचा जाना चाहिए।
कुछ और हदीस पर गौर करें:
एक रिवायत में आता है:
सय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहू अन्हु के शागिर्द ख़ास सय्यदना नाफ़े रहिमहुल्लाह ब्यान फ़रमाते हैं कि : सय्यदना इब्न उमर रज़ियल्लाहू अन्हुमा अपनी उँगलीयाँ अपने कानो पर रख लिये और उस रास्ते से दूर चले गए। और फ़िर मुझ से पूछा : ऐ नाफ़े! क्या भला कुछ सुन रहे हो? मैंने कहा : नही, तो उन्होंने अपनी उंगलियाँ अपने कानो से उठा ली और कहा कि मैं रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ था तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस तरह की आवाज़ सुनी तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐसे ही किया था।
इस रिवायत के मुताल्लिक़ शेख़ ज़ुबैर अली ज़ई रहिमहुल्लाह और शेख़ शोएब रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं कि "हसन" और अल्लामा अल्बानी रहिमहुल्लाह सहीह फ़रमाते हैं।
अबू दाऊद की हदीस न०- 4924
एक और हदीस में बयान है कि
सय्यदना अबि मालिक अशअरी रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं कि : "صلى الله عليه وسلم. ने फ़रमाया :
*"मेरी उम्मत में से लोग ज़रूर शराब पियेंगे और इसके नाम के अलावा कोई और नाम रखेंगे। उनके सिरों पर बाजे गाजे बजाये जाएंगे और गाने वालीयाँ (गाने गायेगी)। अल्लाह तआला उन्हें ज़मीन में धंसा देगा उनमे से बाज़ को बंदर और ख़िंज़ीर (सूअर) बना देगा।"*
[इब्न माजा : 4020]
इंशा अल्लाह अगली पोस्ट – गौर करने का मकाम, उम्मत के बहनों और भाइयों से ख़ास इल्तज़ा
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_सवाल :- मस्जिद के लिए काफिर से पैसा लेना कैसा है?_
_जवाब :- मांगना जाइज़ नहीं अगर वो अपनी मर्ज़ी से देता है तो लगा सकते हैं, मगर मस्जिद के उन कामों में जो खारिजे मस्जिद कहलाता है, मसलन वज़ू खाना इस्तिन्जा खाना या मज़दूर की मज़दूरी दे दी जाए, या ये भी कर सकते हैं के किसी मुसलमान को उस पैसे का मालिक बना दिया जाए यानि के उसे पैसा देदें,और वो अपनी तरफ से मस्जिद में लगा दे,_
📚 *फतावा रज़विया शरीफ जिल्द 6 सफह,484*
📚 *अह़सनुल फतावा अलमारुफ फतावा खलीलिया जिल्द 2 सफह 566*
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बदमज़हबों की बातें
बदमज़हबों की बातें जब आप पढ़ेंगे या सुनेंगे तो तकलीफ़ का पहुंचना लाज़मी सी बात है। आज हमारे एक अ़ज़ीज़, अ़ल्लामा क़ासिमुल क़ादिरी अल् अज़हरी साहिब ने पैग़ाम भेजा कि उन्हें बदमज़हबों की बातों ने तकलीफ़ पहुंचाई तो इस पर कुछ लिखने का इरादा हो गया।
बदमज़हबों की आदत है कि वो अ़वाम के सामने अहले सुन्नत व जमाअ़त को बदज़ुबान कह कर उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं और ख़ूब अच्छे अख़लाक़ दिखाते हैं लेकिन उनकी असल हम जानते हैं और हर वो शख़्स जानता है जिसने इनको क़रीब से देखा है। ये लोग बिना सोचे समझे कि किस के बारे में कलाम कर रहे हैं, कुछ भी बक देते हैं, इनके यहां किसी का लिहाज़ नहीं और इस हक़ीक़त को हमने कई बार देखा है।
एक वक़्त था कि बदमज़हबों से काफ़ी बहसें होती थीं, एक बार एक बदमज़हब ने इ़ल्मे ग़ैब के मौज़ू पर बेहस करते हुए ये तक कह दिया कि "जब इ़ल्मे ग़ैब था तो जंग में नबी अपने दाँत तुड़वाने क्यों गए थे?" (मआ़ज़ अल्लाह) ये सुनकर बड़ी तकलीफ़ हुई और आज तक याद कर के होती है।
अभी किताब "जा अल हक़" का ख़ातिमा पढ़ रहा था तो मुफ़्ती अह़मद यार ख़ान नईमी रह़िमहु़ल्लाहु तआला लिखते हैं कि "अब हम किताब के आख़िर में चंद ऐसे मसाइल बयान करते हैं कि जिनसे अहले सुन्नत अह़नाफ़ का दिल बाग़ बाग़ होगा क्यों कि वहाबी ग़ैर मुक़ल्लिदीन की ख़ुशक गुफ़्तगु सुनते सुनते दिल घबरा गया।"
वाक़ई में जब हम इनकी बातें सुनते, इनके अक़ाइद और इनकी क़ुरआनो सुन्नत की मन-मानी तशरीह़ात को पढ़ते हैं तो दिल घबरा सा जाता है, अ़वामे अहल सुन्नत को चाहिए कि बदमज़हबों से बिल्कुल दूर रहें और ज़रूरत से ज़्यादा इनसे बहस करने से परहेज़ करें।
अ़ब्दे मुस्तफ़ा
मुह़म्मद स़ाबिर क़ादिरी
10 दिसम्बर, 2023 ई.
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_सवाल-: आजकल मोबाइल पर क़ुरआने पाक की आयतें और हदीस शरीफ़ एस.एम.एस किए जाते हैं क्या उन्हें अपने मोबाइल से डिलीट किया जा सकता है?_
_जवाब-: कुछ इस दस्तूर का जो रिवाज चल पड़ा है समझ में नहीं आता है, और डिलीट करने में, जब उसको पढ़ ले और देख ले और उससे मुस्तफ़ीद हो जाए तो उसको डिलीट करने में हर्ज नहीं है अगर डिलीट करने की ज़रूरत हो तो कर सकता है और अगर रखना उसका मोबाइल में या उसको लिखकर हिफाज़त से रख ले तो बेहतर है और मोबाइल से डिलीट कर दे, (तो कोई हर्ज नहीं)_
*📚 फ़िक़्ही मजालिस, हिस्सा 1, सफ़ह 43*
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_सवाल-: दुरूदे ताज की असल क्या है, यह किसने लिखा, यह कब और कहां लिखा गया, मुझे यह पढ़ना पसंद है बराए करम इसके मुतअल्लिक़ मुझे मशवरा से नवाज़ें उर्दू या इंग्लिश में (अंग्रेजी सवाल)_
_जवाब-: इसके लिखने वाले हज़रत ताजुद्दीन सुबकी अलैहिर्रहमह बहुत बड़े आलिम हैं और यह दुरूद सुन्नियों में मअमूल है और एक बुज़ुर्ग का लिखा हुआ है और बहुत ही बाइसे बरकत है और हज़रत ताजुद्दीन सुबकी अलैहिर्रहमह ग़ालिबन शाम या मिश्र के आलिम थे और सुबकी एक मक़ाम है जिसकी तरफ़ उनकी निस्बत है, कब यह लिखा गया इस वक़्त यह मुझे याद नहीं है,_
📘 *फ़िक़ही मजालिस हिस्सा 1 सफ़ह 43*
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*निक़ाह के मौके पर गाना (खुशी मनाना) और दफ़ बजाना*
*~ वजाहत ~*
*_अल्लाह की हम्द व सना पढ़ सकते हैं साथ ही नबी की नात भी गा सकते हैं।_*
» गाने बजाने की इजाज़त दी गई है इसका मतलब ये ये कतई नहीं है की आप डीजे बजा कर नाचें।
» उपर्युक्त अहादीस में डफ़ बजाने का जिक्र आया है डफ कोई बाजा नहीं है ये एक तरफा ढोल होता है जिसे डफ़ली भी कहा जाता है जो जानवर के चमड़े या प्लास्टिक से बना होता है।
» निकाह अल्लाह के तरफ़ से एक नेमत है ये इंसान की नई ज़िंदगी का आगाज़ है इस लिय इस्लाम निकाह के मौके पर खुशी और जश्न मनाने की इजाज़त देता है।
» साथ ही ये बात भी स्पष्ट हुई कि कुछ अच्छे गाने गा सकते हैं गाते वक्त इस बात का ख्याल रखें उस गाने में शिर्क या कुफ्र वाले अल्फाज़ शामिल हो न।
» और नामहरम का आपस एक महफ़िल में गाना बजाना न सिर्फ हराम है बल्कि आज कल फैला हुआ एक बहुत बड़ा फ़ितना है।
» इस तरह की महफ़िल में शैतान अपनी पूरी फ़ौज के साथ फितने फैलता है, बेहयाई और बेपर्दगी की इन्तेहाँ पार हो जाती है।
» बहुत सी मोमिना औरतें जो आम तौर से तो पर्दा करती है मगर ऐसी महफ़िलों में पूरी तरह से ज़ीनत से सराबोर होकर जाती हैं, और मर्दों को भी पूरी तवज्जो से ऐसी महफ़िलों में किसी न किसी गुनाह में मुब्तिला देखा जाता है। ऊपर से म्यूजिक और तरह तरह की बजे माहौल को और ज़्यादा गैर इस्लामी, खिलाफ ऐ शरीयत बना देता है।
» अल्लाह की नाफरमानी करके जो अपनी शादी शुदा ज़िन्दगी की शुरुआत करेंगे उनके निकाह में बरकतें नाज़िल कैसे होंगी ?
» इस तरह की दावत देने वाले की शुमार जितने लोग मुब्तिला हो रहे होंगे उनके गुनाहो का सबब वो दावत देने होगा ?
अब आज के हालात ए हाजिरा पर नज़र डालते हैं तो कलेजा मुंह को आता है। *न्यू जेनरेशन को लगाता है कि शादी के मौके पर जश्न मनाने और डफ़ बजाने की इजाज़त है तो बाजा और म्यूजिक बजा सकते हैं तो इसकी इजाज़त इस्लाम में नहीं है।*
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_सवाल -: क्या मुसलमान का किसी ग़ैर मुस्लिम की शादी में शरीक होना जाइज़ है और क्या मुसलमान किसी ग़ैर मुस्लिम की दावत में जाकर सब्ज़ियां खा सकता है?_
_जवाब-: दावत में जाने की ज़रूरत ही क्या है और शादी में शरीक होने की क्या ज़रूरत है उनसे जो ताल्लुक़ात हैं बरबिनाए ज़रूरत बरबिनाए हाजत उनकी इजाज़त है,_
*📚 फ़िक़्ही मजालिस, हिस्सा 1, सफ़ह 43*
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_सवाल -: मैं काम पर जाते वक़्त और वापस आते वक़्त क़ुरआन की तिलावत मोबाइल हेडफोन के ज़रिए सुनता हूं अक्सर मेरी आंख लग जाती है और क़ुरआन की तिलावत चलती रहती है तो इस सूरत में क़ुरआन की बेहुरमति का मुझ पर गुनाह होगा, (या नहीं)_
_जवाब -: जब तक वह जागता है जागते में सुने और अगर बेइख्तियार आंख लग जाती है तो इल्ज़ाम नहीं है,_
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*💦 पाकी और सफ़ाई का बयान!*
*जिस्म की फ़ालतू चीजों से पाकी*
⚠️ ईसमें हम उन चीज़ों का ज़िक्र करेंगे जो नापाक तो नहीं होती मगर सही तरह से पाकी हासिल करने में रुकावट पैदा करती हैं। कभी-कभी तो इन चीज़ों की वजह से वुज़ू और ग़ुस्ल भी सही नहीं हो पाता जिससे इबादतें बर्बाद हो सकती हैं। लिहाज़ा इस पर ध्यान देना ज़रूरी है। यह तीन (3) तरह की होती हैं।
*1⃣ मैल:-* सिर और दाढ़ी के बालों में जमा होने वाले मैल और जुओं का साफ़ करना मुस्ताहिब है। इनकी सफ़ाई के लिये बालों को धोने, तेल लगाने और कंघा करने का हुक्म है।
🙌🏾 इसी तरह कानों, दाँतों और नाख़ूनों वग़ैरा में जो मैल जम जाता है उसे साफ़ करना भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि जमे हुए मैल से सिर्फ़ सही तरह से पाकी हासिल करने में ही रुकावट नहीं आती बल्कि तरह-तरह की बीमारियाँ होने का भी ख़तरा रहता है।
*📚To be continue..*
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*💦 पाकी और सफ़ाई का बयान!*
जब बैतुलख़ला (Toilet) को जाएं तो इन बातों का ख़्याल रखना बहुत ज़रूरी है।
जिस जगह वुज़ू या गु़स्ल किया जाता हो वहाँ पेशाब करना मकरुह है।
⚠️ नंगे सिर बैतुलख़ला (Toilet) में जाना या अपने साथ कोई ऐसी चीज़ ले जाना जिस पर कोई दुआ या अल्लाह और रसूल या किसी बुज़ुर्ग का नाम लिखा हो मना है। बात करना भी मकरुह है।
🚫 जब तक बैठने के करीब न हो बदन से कपड़ा न हटाये और ज़रूरत से ज़्यादा बदन न खोलें।
छींक या सलाम या अज़ान का जवाब ज़ुबान से न दे।
*📚To be continue..*
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*क्या इस्लाम इस्लाम निकाह के मौके पर खुशी और जश्न मनाने से मना करता है?*
*निक़ाह के मौके पर गाना (खुशी मनाना) और दफ़ बजाना*
निकाह के मौके पर ऐलान करने और खुशी का इजहार करने के लिये इस्लाम में गाने और दफ़ बजाने की इजाजत है। इस बारे में नबी صلى الله عليه وسلم. की जो अहादीस हमें मिलती है, वो ये हैं,
अम्मी आयशा रज़ि से रिवायत है कि उन्होंने एक अन्सारी लड़की का निकाह करवाया तो रसूलल्लाह صلى الله عليه وسلم. ने फरमाया:
*"ऐ आयशा! क्या तुम्हारे पास लहव-(दफ़ बजाने या गाने वाला) नहीं था? अन्सार को दफ़ और अशआर(शायरी) पसन्द है।"*
[सहीह बुखारी - 5162, मिश्कात उल मसाबीह - 3141]
हजरत रबीआ बिन्ते मुअविज बिन अफरा रज़ि रिवायत करती हैं कि अल्लाह के रसूल صلى الله عليه وسلم मेरे निकाह में शरीक हुये जिसमें कुछ बच्चियां दफ़ बजा रही थी और जंगे बद्र में शहीद हुये अपने बुजुर्गों का जिक्र कर रही थी। तो अचानक एक लड़की ने ये भी कहा, *“हममें एक नबी मौजूद हैं, जो कल होने वाली बातों को जानते हैं।”* इस पर आप صلى الله عليه وسلم. ने फरमाया: *"इसे छोड़ दो और जो पहले कह रही थी वही कहो।"* [सहीह बुखारी - 5147, इब्ने माज़ा - 1897]
हजरत आमिर बिन साद बिन अबी वक्कास रह. बयान करते हैं कि मैं एक शादी के मौके पर क़ुराज़ा बिन काब और अबू मसऊद अंसारी रज़ि के पास गया तो देखा कि कुछ बच्चियां गा रही थी।
मैंने कहा, *“ऐ अल्लाह के रसूल صلى الله عليه وسلم के साथियों और जंगे बद्र के गाजियों, आपके सामने ये क्या किया जा रहा है? (आप इसे रोकते क्यों नहीं?)”*
तो उन दोनों ने जवाब दिया, *“अगर तुम चाहो तो हमारे साथ बैठो और सुनो (जैसे हम सुन रहे हैं) और अगर चाहो तो यहाँ से चले जाओ। शादी के मौके पर हमें गाने-बजाने की इजाजत दी गई है।”* [मिश्कात - 3159]
इंशा अल्लाह अगली पोस्ट – वजाहत
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*💦 पाकी और सफ़ाई का बयान!*
🚽 जब बैतुलख़ला (Toilet) को जाएं तो इन बातों का ख़्याल रखना बहुत ज़रूरी है।
क़िबले की तरफ़ मुँह और पीठ करके न बैठें चाहे अन्दर हो या बाहर और अगर भूले से बैठ गये तो याद आते ही फ़ौरन रुख़ बदल दें।
बच्चे को पाख़ाना, पेशाब कराने वाला भी यह ख़्याल रखें कि बच्चे का मुँह क़िबले को न हो, नहीं तो कराने वाला गुनाहगार होगा।
💨 हवा के रुख़ पेशाब न करें और उसकी छीटों से बचें, यह अज़ाबे क़ब्र का बाइस हो सकता है।
कुँए, हौज़ या चश्में के किनारे/बहते पानी/घाट/फलदार या सायादार पेड़ के नीचे/खेत जिसमें फ़सल हो/मस्जिद या ईदगाह के क़रीब/क़ब्रिस्तान/पालतू जानवरों के बंधने की जगह, इन सब जगहों में पेशाब पाख़ाना करना मकरुह है।
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*किराये के मकान पर ज़कात*
_सवाल :- किराए पर जो मकान दिया गया है उस मकान की क़ीमत और किराए पर ज़कात का क्या हुक्म होगा ?_
_जवाब :- जो मकान किराए पर दिया हुवा है उसकी क़ीमत पर ज़कात फ़र्ज़ नहीं अलबत्ता निसाब का साल पूरे होने पर अगर किराए वाली रक़म हाजते असलिय्या के इलावा मौजूद है तो वह दीगर अमवाले ज़कात के साथ हिसाब में शुमार होगी, अगर शराइत पाई गएं तो उस पर ज़कात फ़र्ज़ होगी_
_*🪶फतावा रज़विया में है:* (किराए के) मकानात पर ज़कात नहीं, अगरचे पचास करोड़ के हों, किराया से जो साल तमाम पर पस उस पर ज़कात आएगी, अगर खुद या और माल से मिल कर क़दरे निसाब हो।_
_सबक :- खुलासा यह आसानी से समझे कि जो मकान की क़ीमत है मसलन पचास लाख तो उस पर ज़कात नहीं होगा क्योंकि वो मकान है जोकि माले ज़कात में शुमार नहीं होता, मगर जो किराया आता है तो चूंकि वो पैसे की शक्ल में होता है तो अगर वो हाजते असलिय्या यानी ज़रूरत से ज़ियादा है तो इस पैसे पर ज़कात होगा!_
_वल्लाहु आलम_
*📚 सौ शरई मसाइल का मजमुआ सफा 42*
*📚 फतावा रज़विया जिल्द 10 सफा 161*
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_सवाल-: जुमा के पहले ख़ुत्बे में हाथ नाफ़ के नीचे रखते हैं और दूसरे ख़ुत्बे में घुटनों के ऊपर रखते हैं पहले और दूसरे ख़ुत्बे के दरमियान जब ख़तीब साहब बैठ जाते हैं उस वक़्त हाथ किस हालत में होने चाहिए?_
_जवाब-: इस सिलसिले में कोई तहदीद नहीं है जिस तौर पर मयस्सर हो और घुटनों पर हाथ रखना ही आम दस्तूर है,_
_सवाल-: क़ुरआन शरीफ़ की कोई सूरत या आयत या क़ुरआन शरीफ़ की तिलावत बहुत सारे लोग एक जगह होकर बुलंद आवाज़ में पढ़ सकते हैं?_
_जवाब-: यह जाइज़ नहीं है,_
*📚 फ़िक़्ही मजालिस, हिस्सा 1, सफ़ह 43*
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*💦 पाकी और सफ़ाई का बयान!*
🚽 इस्तिन्जे के लिए बैतुलख़ला (Toilet) में जाने के लिए भी इस्लाम में आदाब बताए गए हैं जो इस तरह हैं।
जब बैतुलख़ला (Toilet) को जाये तो मुस्तह़ब है कि पहले बाहर यह दुआ पढ़ ले
*اَللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْخُبْثِ وَالْخَبَائِث*
तर्जुमा:- "ऐ अल्लाह मैं तेरी पनाह मांगता हूँ नापाकी और शैतानों से।"
फिर बायाँ पाँव पहले अंदर रखें और निकलते वक़्त पहले दाहिना पाँव बाहर निकाले और बाहर निकल कर यह पढ़ें:-
*اَلْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَذْهَبَ عَنِّيِ الْأَذٰى وَعَافَانِيۡ*
तर्जुमा:- "सब तारीफ़ें हैं अल्लाह के लिये जिसने वह चीज़ मुझसे दूर की जो तकलीफ़ देती और मुझे आराम दिया।"
*⚠️ Note:- दोनों दुआ जो उपर लिखी गई है toilet के बाहर ही पढे।*
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*निक़ाह का ऐलान*
निकाह नबी صلى الله عليه وسلم की सुन्नत है और ये खुशी का मौका है इसलिए निकाह का ऐलान किया जाना चाहिए आइए इसे अहादीस की दलाइल से समझते हैं
हजरत मुहम्मद बिन हातिब जुमहई कहते हैं कि रसूलल्लाह صلى الله عليه وسلم. ने फरमाया:
*"हराम और हलाल निकाह के बीच फ़र्क़ ये है कि दफ़ बजाया जाये और निकाह का ऐलान किया जाये।"*
[इब्ने माज़ा - 1896, तिर्मिज़ी - 1088]
जब हजरत हबार रज़ि ने अपनी बेटी का निकाह किया तो उन्होंने दफ़ बजा कर इसका ऐलान किया। इसकी आवाज सुनकर नबी صلى الله عليه وسلم. ने पूछा, “ये क्या है (यानी ये आवाजें क्यों आ रही है?)” इस पर लोगों ने कहा, “हबार ने अपनी बेटी की शादी की है।” इस पर नबी صلى الله عليه وسلم. ने फरमाया: *"निकाह का ऐलान करो। निकाह का ऐलान करो। ये निकाह है, जिना नहीं है।"* [सिलसिला सहीह 1444]
*~ वजाहत ~*
› ऊपर बयान की गई अहादीस से ये बात मालूम होती है कि निकाह का ऐलान ज़रूरी है, *निकाह एक पाक रिश्ता है* और इसका एक मकसद है।
› और जब किसी पाक मक़सद को अंजाम दिया जाय तो उसका ऐलान होना चाहिए। जैसे आज शादी का कार्ड छपवाया जाता है।
› जब निकाह होता है तो दो अजनबी मर्द व औरत ज़िंदगी साथ गुजारने के लिए एक नए बंधन में बंध रहे होते हैं और इस रिश्ते में बधने का मक़सद एक दुसरे से सुकुन हासिल करना और औलाद के ज़रिए एक खानदान वजूद में लाना है।
› साथ ही ऐलान का मकशद ये है की उनकी पाक दामनी पर कोई उंगली न उठाए।
› शरीयत ए इस्लामिया ये चाहती है कि जब दो अनजान लोग आपस में मिले , एक रिश्ते में बंधे तो ये काम चोरी छिपे न हो क्यूं कि चोरी छिपे अच्छे काम नहीं होते ।
› इससे ये बात भी साफ़ होती है कि जो लोग भाग कर चोरी छिपे निकाह कर लेते हैं वो जिना के बराबर है।
इंशा अल्लाह अगली पोस्ट –क्या इस्लाम निकाह के मौके पर खुशी और जश्न मनाने से मना करता है?
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*🍛रोज़ा और लिपिस्टिक💄*
_सवाल :- रोज़े की हालत में लिपिस्टिक लगाना कैसा !?_
_जवाब :- रोज़े की हालत में औरतें लिपिस्टिक लगा सकती हैं इस से रोज़ा नहीं टूटता, अलबत्ता जिन औरतों को होंटो पर ज़बान फेरने की आदत हो तो वो रोज़े की हालत में लिपिस्टिक लगाने से गुरेज़ (परहेज) करें, क्योंकि इस तरह करने से अगर लिपिस्टिक का कोई जुज़ (हिस्सा) हल्क़ से नीचे गिर गया तो रोज़ा टूट जाएगा_
_प्रोफेसर मुफ्ती मुनीबुर रहमान साहब फरमाते हैं: रोज़े की हालत में ख्वातीन का मेकअप करना जाइज़ है बशर्ते कि गैर महरम मर्दों के सामने बेपर्दगी और नमो नुमाइश न हो, लिपिस्टिक लगाना जाइज़ है बशर्ते कि इसके अज्ज़ा तर्कीबी (मिलावट) में कोई नापाक चीज़ शामिल न हो और अगर लिपिस्टिक वाटर प्रूफ है और उसके लगे रहने की वजह से होंटो की जिल्द (हिस्सा) वुज़ू के दौरान पानी से तर (गीला) नहीं होती तो वुज़ू अदा नहीं होगा, और ऐसे तमाम वुज़ू से नमाज़ सही अदा नहीं होगी और जो किसी शरई फ़र्ज़ की सेहत (सही) अदा में मानेअ (रुकावट) बन जाए वह जाइज़ नहीं है_
_सबक :- खुलासा यह कि लिपिस्टिक लगाना फी नफ्सी कोई बुरी चीज़ नहीं है जबकि उस में कोई नजासत वाली चीज़ न मिला हो, और ना महरम के लिए न हो बस अपने घर में रहने के लिए लगाए तो इस में कोई हर्ज नहीं यानी जाइज़ है, और इस से रोज़े में भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा मगर अपनी आदतों को देख ले कि कहीं बताई गई सूरत वाली आदत तो नहीं, (और दौरे हाजिर में अक्सर ख्वातीनों की ऐसी आदत पाई जाती है) अगर हो तो न ही लगाए रोज़े की हालत वरना हो सकता हो कि आपका रोज़ा इस से बेकार हो जाए, और अगर वाटर प्रूफ वाला हुआ तो वुज़ू न होने की सूरत में नमाज़ भी न होगी, बेहतर है इस से परहेज ही किया जाए!_
_वल्लाहु आलम_
*📚 राहे शरीअत सफा 156*
*📚 तफहीमुल मसाइल जिल्द अव्वल सफा 190*
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*💦 पाकी और सफ़ाई का बयान!*
मुसलमान के लिए सबसे पहले और ज़रूरी बात यह है कि वह पाक व साफ़ रहे।
अपने जिस्म को पाक व साफ़ करने, पाख़ाना या पेशाब करने से जो निजासत जिस्म पर लगी रह जाती हैं, ऐसी निजासत (गंदगी) से अपने बदन को पाक व साफ़ करने को इस्तन्जा करना कहते हैं। इसके लिए बेहतर और सुन्नत तरीक़ा तो यह है कि पहले तीन या उससे ज़्यादा ताक़ (odd) मिट्टी के ढेले लेकर निजासत को अच्छी तरह साफ़ करलें और फिर पानी से तीन बार धोलें सिर्फ़ पानी ही से धो लिया तो भी जाइज़ है।
इस्तन्जा करने में इन बातों का ख़ास ख़्याल रखें।
💦 दाहिने हाथ से पानी बहायें और बायें हाथ से धोयें और पानी का बर्तन ऊँचा रखें कि छींटें न पड़ें, पहले पेशाब की जगह धोयें फिर पाख़ाने की और गदंगी साफ़ होने के बाद पाक करने के लिए तीन बार धोकर हाथ से पोंछ लें।
📃 काग़ज़ से इस्तिन्जा करना मना है चाहे उस पर कुछ लिखा हुआ हो या नहीं।
जिस ढेले से एक बार इस्तिन्जा कर लिया उसे दोबारा काम में लाना मकरुह है।
मर्द लुंजा हो तो उसकी बीवी इस्तिनजा करा सकती है और औरत कोे उसका शौहर।
*📚To be continue..*
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_सवाल -: अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल और रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम के हाज़िर व नाज़िर होने में क्या फ़र्क़ है?_
_जवाब -: ना अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल का नाम हाज़िर है और ना उसका नाम नाज़िर है और हाज़िर और नाज़िर होने से अल्लाह तबारक व तआला मुनज़्ज़ाह है इसलिए के हाज़िर वह है जो किसी मकान में मौजूद हो और कुल मकान उसके घेरे और अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल उससे पाक है के कोई चीज़ उसका इहाता करे या वह किसी मकान में हुलूल करे उस पर ज़माना और मकान जारी नहीं होते और नाज़िर उसको कहते हैं जो हज़क़हके ज़रिए से और आंख की पुतली के ज़रिए से देखे इसका हक़ीक़तन मिस्दाक़ नाज़िर का यह है और अल्लाह तबारक व तआला इस मअ्ना से भी पाक है, हाज़िर व नाज़िर, यह ख़ास हुज़ूर सरवरे आलम सल्लल्लाहु तबारक व तआला अलैहि व सल्लम की शान है के हुज़ूर अलैहिस्सलाम की रूहे-पाक रूहुल अरवाह है और तमाम अरवाह से सबसे बड़ी रूह है और हुज़ूर अलैहिस्सलाम की रूहे-पाक आसमानों को ज़मीनों को सबको मुहीत़ है (भरे हुए हैं)_
*📚 फ़िक़्ही मजालिस, हिस्सा 1, सफ़ह 42*
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_सवाल -: जिस जगह पर अक्सरियत बद'मज़हबों (यानी वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस, शिआ वग़ैरहा फ़िरक़ाहाए बातिला) की हो वहां पर गोश्त खाने का क्या हुक्म है?_
_जवाब -: अक्सरियत अगर बदमज़हबों की है और ज़बीहे पर वही क़ाबिज़ हैं तो इस सूरत में एहतियात यही है के गोश्त उनके हाथ का ना खाए इसलिए कि उनके हाथ का ज़बीहा मिसले मुर्दार हराम है और उससे परहेज़ इसको लाजिम है,_
📘 *फ़िक़ही मजालिस हिस्सा 1 सफ़ह 42*
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