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अंतः अस्ति प्रारंभः ✍ अंत से ही एक नई शुरुआत होती है। 𝗧𝗵𝗲 𝗘𝗻𝗱 𝗶𝘀 𝘁𝗵𝗲 𝗕𝗲𝗴𝗶𝗻𝗻𝗶𝗻𝗴. Contact Buy ads: https://telega.io/c/upscstatus
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आज से 15-20 साल पहले लोग
सांई बाबा को पूजते थे.
फिर ट्रेंड आया महादेव का,
उसके बाद नंबर आया खाटू श्याम जी का,
और वर्तमान में ट्रेंड चल रहा है सेठ सांवरिया का
मेरा मकसद किसी की
धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है।
लेकिन जब समय बदलता है,
तो लोग अपना भगवान भी बदल देते हैं,
और तुम तो फिर भी इंसान हो। 🌹
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जीवन में सही मार्ग दिखाने वाले सभी गुरुजनों को
गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं एवं शत-शत नमन। 🌸🙏
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भूल और क्षमा: मानवीय स्वभाव का संतुलन
संसार में कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं है। अज्ञानता, तात्कालिक आवेग या सही-गलत की समझ न होने के कारण जीवन में किसी न किसी स्तर पर हर व्यक्ति से भूल या त्रुटि हो ही जाती है। ऐसे में सामने वाले व्यक्ति की गलती पर निरंतर क्रोधित रहना या मन में प्रतिशोध की भावना पालना, स्वयं अपने मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट करने जैसा है। इसके विपरीत, 'क्षमा' एक ऐसा मानवीय मूल्य है जो न केवल सामने वाले को सुधरने और आत्मनिरीक्षण करने का एक अवसर प्रदान करता है, बल्कि क्षमा करने वाले व्यक्ति को भी मानसिक शांति और आंतरिक स्वतंत्रता देता. है। क्रोध और द्वेष मनुष्य को अतीत के कड़वे अनुभवों में बांधकर रखते हैं, जबकि क्षमा का एक निर्णय व्यक्ति को भविष्य की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है। जीवन की सार्थकता इसी बात में है कि हम गलतियों से सीखें, दूसरों की भूलों को बड़प्पन के साथ स्वीकार करें और समाज में नकारात्मकता के स्थान पर प्रेम और सद्भावना का विस्तार करें।3 979
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ये किताबें उतनी भी पसंद नहीं लेकिन पढ़ लेंगे
सुना है माँ-बाप का सपना यही पूरा करेगी..।
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भारत में लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति और तानाशाही की ओर झुकाव
भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में देखा जाता है, जिसने आजादी के बाद से अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को बचाए रखा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में स्वीडन के 'V-Dem इंस्टीट्यूट' और अमेरिका के 'Freedom House' जैसे वैश्विक संस्थानों ने भारत को 'इलेक्टोरल ऑटोक्रसी' यानी 'चुनावों के जरिए आई तानाशाही' की श्रेणी में रखा है। आज के दौर में तानाशाही का रूप बदल चुका है, जहाँ सैन्य तख्तापलट के बजाय लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आई सरकारें ही धीरे-धीरे संस्थाओं को कमजोर करने लगती हैं। भारत में चुनाव नियमित रूप से होते हैं, लेकिन केवल चुनाव होना ही पूर्ण लोकतंत्र की गारंटी नहीं रह गया है।
देश में तानाशाही प्रवृत्ति के बढ़ने का मुख्य संकेत चुनाव आयोग, सीबीआई, ईडी और न्यायपालिका जैसी स्वायत्त संस्थाओं पर बढ़ते राजनीतिक प्रभाव और विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के आरोपों से मिलता है। इसके साथ ही, मुख्यधारा की मीडिया पर सरकार का अदृश्य नियंत्रण साफ महसूस होता है, जिससे स्वतंत्र पत्रकारिता का दायरा सीमित हुआ है। सरकार पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर कड़े कानूनों के तहत कार्रवाई की जा रही है। हालांकि, भारत सरकार इन दावों को पश्चिमी देशों का पूर्वाग्रह मानकर पूरी तरह खारिज करती है। सरकार का तर्क है कि देश में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार है और राज्यों में विपक्षी दलों का जीतना इस बात का सबूत है कि भारतीय लोकतंत्र पूरी तरह जीवित है।
निष्कर्ष के तौर पर, भारत पूरी तरह से एक तानाशाह देश नहीं बना है, क्योंकि यहाँ अभी भी चुनावी प्रक्रिया सक्रिय है। लेकिन लोकतंत्र का असली मतलब केवल वोट देना नहीं होता, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकार और संस्थाओं की निष्पक्षता का बने रहना सबसे ज्यादा जरूरी है। यदि देश की लोकतांत्रिक संस्थाएं इसी तरह कमजोर होती रहीं, तो देश सिर्फ कागजों पर ही लोकतंत्र रह जाएगा। इसलिए, भारतीय लोकतंत्र की रक्षा के लिए देश के नागरिकों का जागरूक होना बेहद जरूरी है।