3 171
订阅者
-124 小时
-67 天
-1930 天
帖子存档
3 171
Music short notes ✍️
==================
Music Net classes
==================
चतुरंग क्या है ?
चतुरंग यह हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति के शास्त्रीय गान के मंच पर प्रदर्शित की वाली एक शैली है । इसके नाम से ही ज्ञात होता है कि इसमें चार अंगों सम्मिश्रण है । अतः यह चार अंगों के सहयोग से निर्मित गायन शैली चतुरंग को मुख्य रूप से ख्याल अंग के साथ गाया जाता है , परन्तु इसमें ख्याल की अपेक्षा तानों का प्रयोग कम या अल्प किया जाता है ।
चतुरंग की उत्पत्ति
चतुरंग की उत्पत्ति सम्भवतः तीन प्रकार की चतुरंग की उत्पत्ति के सन्दर्भ में विद्वानों में मतभेद हैं , किन्तु ऐसा माना जाता है कि सरगम पुस्तक के लेख में बताया गया है कि शैलियाँ एक ही बन्दिश में बाँधकर शिष्यों को बताने के लिए ही संगीत पण्डिता ने चतुरंग का आविष्कार किया ।
चतुरंग के आविष्कारिक काल मतंग काल से उत्पन्न माना जाता है अर्थात मतंग काल इसका प्रचलन को आरम्भ हुआ । अतः चतुरंग शैली मतंगमुनि के काल से चली आ रही है ” क्रमिक पुस्तक ” मालिका के तीसरे भाग में राग देश में चतुरंग गीत प्रकार दिया गया है , जिसकी रचना बन्दिश के तीन घटकों में हुई ।
चतुरंग के चार अंग क्या हैं ?
चतुरंग में चार अंग होते हैं , जिसके परिणामस्वरूप यह चतुरंग के नाम से जाना जाता है । इसमें सर्वप्रथम पद , तराने के बोल , सरगम और अन्त में तबला या मृदंग के पाट अथवा किसी अन्य भाषा के शब्द रहते हैं । इनका वर्णन इस प्रकार है ।
प्रथम अंग इसमें गीत अथवा कविता के शब्द होते हैं ।।
दूसरा अंग यह तराना कहलाता है , इसमें तराने के बोलों का गायन किया जाता है ।
तीसरा अंग यह सरगम कहलाता है , इसमें विशिष्ट राग की सरगम गाई जाती है ।
चौथा अंग यह मृदंग व पखावज का होता है , इसमें मृदंग व पखावज के बोलों की छोटी – सी परन का गायन किया जाता है ।
चतुरंग की विशेषता
यह द्रुत लय प्रधान गायन – शैली है । इसमें छोटे – छोटे आलाप , बोल आलाप तथा बहलावे होते हैं ।
इसमें भाव पक्ष की अपेक्षा कला पक्ष का अधिक महत्त्व होता है । यह अधिकतर चंचल प्रकृति के रागों में ही गाई जाती है ।
3 171
जिस मूर्च्छना में अंतर गंधार का प्रयोग होता है उसे क्या कहते हैं?
3 171
Music short Notes ✍️
===================
Music Net Classes
===================
त्रिवट क्या है ?
जब किसी तराने में मृदंग के बोलों का प्रयोग किया जाता है , तो उस विशिष्ट गायन शैली को त्रिवट के नाम से बुलाया जाता है । यह हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति के शास्त्रीय गान के मंच पर प्रदर्शित की जाने वाली एक गायन – शैली है ।
त्रिवट की उत्पत्ति
प्राचीनकाल में अलीक्रम प्रबन्ध के एक केवाड नामक प्रबन्ध से इस गायन शैली त्रिवट की उत्पत्ति मानी जाती है । दक्षिण में त्रिवट को एक अन्य नाम चोल्लुकेटु के नाम से पुकारा जाता है । इसकी उत्पत्ति के सन्दर्भ में ऐसा माना जाता है कि मृदंग , तबला आदि शैलियों के मिश्रण के परिणामस्वरूप हुआ है तथा त्रिवट रचनाएँ गुणीजनों द्वारा रची गई हैं ।
त्रिवट शैली की विशेषता क्या है ?
त्रिवट शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
त्रिवट शैली में तराना के समान ही सामान्यतः इसे भी द्रुत लय में गाए जाने का प्रचलन है । गायक द्वारा मृदंग अथवा पखावज के बोल जिस प्रकार विभिन्न लयों में गाए जाते हैं , वैसे ही बोल उसी लय में मृदंग अथवा पखावज वादक द्वारा बजाए जाते हैं इस प्रकार मृदंग के साथ गाए जाने पर अद्भुत रस का सृजन होता है । यह प्रक्रिया विशेष रूप से स्वर व लय प्रधान मानी जाती है ।
प्रबन्ध की दृष्टि से त्रिवट शैली केवल पाटादारों का स्वर व ताल प्रयोग की जाती है अतः इसमें पाट नामक अंग और परोक्ष रूप में स्वर व ताल नामक अंगों की गणना भी की जा सकती है ।
त्रिवट में कविता नहीं होती , अपितु तराने के बोलों को ही मृदंग या पखावज की सहायता से छन्दोबद्ध करके स्वर और ताल के साथ गाया जाता है ।
3 171
Music short notes ✍️
==================
Music Net classes
==================
तराना
क्या है तराना ? तराना शब्द पर ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करने पर हिन्दुस्तानी संगीत की विशेषताओं का पता चलता है । तराना का सम्बन्ध स्वर और वर्ण दोनों से होता है । इस दृष्टि से देखने पर यह प्रतीत होता है कि तराना शब्द हिन्दी या संस्कृत का नहीं वरन् फारसी का है ।
तराना की उत्पत्ति
विद्वानों के मतानुसार तराना की उत्पत्ति ‘ तरूनम ‘ शब्द से हुई है । तरूनम अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ स्वर माधुर्य , खुश , आवाज आदि है । जब कोई कवि अपनी रचना को गाता है तो वह एक विशेष प्रकार की धुन का प्रयोग करता है उसी लोग तरूनम कहते हैं ।
तराने के आविष्कार के विषय में कई मत हैं कुछ लोग तराने का आविष्कारक अमीर खुसरो को मानते हैं । मारिफुन्नगमात के रचयिता अली के अनुसार , यह तर्ज तराना दिल्ली घराने के अमीर खुसरो का आविष्कार किया हुआ है । श्रीपद बन्द्योपाध्याय के अनुसार “ तराना लोकप्रिय गायन का एक प्रकार है जिसमें अर्थहीन शब्द जैसे ता , ना , दानी आदि के प्रयोग से तराना शैली बनी है । “
तराना क्या है ?
‘ तराना ‘ एक प्रकार की आधुनिक गायन शैली में गीत का प्रकार है ।
इसका निर्माण निरर्थक वर्णों से होता है ।
यह द्रुत लय में गाई जाने वाली गायन शैली है ।
स्वर , ताल , अनवद्ध वाद्यों के पाट तथा तेन अंगों से बनी हुई रचना , जो द्रुतलय गाई जाती है , वह तराना नाम से पुकारी जाती है ।
इसमें लय का महत्त्व अधिक होता है , क्योंकि इसके बोलों का आधार तीव्र गति पर निर्भर माना जाता है ।
इसमें अर्थहीन बोलों को कहने व गाने हेतु अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है ।
इसमें वर्ण की वैचित्र्यता , चामत्कारिक रूप से परिलक्षित होती है ।
इसकी रचना तीनताल एकताल झपताल तथा आड़ा – चौताल आदि तालों में की जाती है ।
दक्षिण भारतीय संगीत में इसे ‘ तिल्लाना ‘ के नाम से बुलाते हैं ।
वास्तव में , हिन्दू मुस्लिम संस्कृति के समय हुए संसर्ग से जिन गायन शैलियों का निर्माण हुआ था , यह भी उन्हीं में से एक मानी जाती है ।
तराना की विशेषता क्या है ?
तराना की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
गायक तराना बहुधा बड़े और छोटे ख्याल के बाद गाते हैं । प्रायः ख्याल गायक ख्याल गायन के पश्चात् तराना गाना प्रारम्भ कर देते थे , जो मन को रंजित कर वाला प्रतीत होता था । इस गायकी को प्राचीन ओम् , तत् , सत् आदि स्तुति मूलक शब्दों का विकृत रूप कहा गया है ।
वर्तमान काल में ये तराने के नाम से जानी जाती हैं , परन्तु प्राचीनकाल में इस गायन – शैली के प्रकार को स्तोम – अक्षर अथवा शुष्क – अक्षर के नाम से पुकारा जाता था । इनका कोई विशिष्ट अर्थ नहीं होता , परन्तु इन्हे ओंकार के सामान माना जाता है । इसमें भाव पक्ष की अपेक्षा कला पक्ष की अधिक प्रधानता होती है । तरानों की प्रसिद्धता के परिणामस्वरूप बहादुर हुसैन खाँ , तानरस खा तथा नत्थू खाँ आदि के तराने प्रसिद्ध हैं ।
तराने के गीत के स्थान पर इस प्रकार के निरर्थक वर्ण होते हैं ; जैसे—
ओद , नीं , तोम , दोम , त , न , न , न , न , न , तदानी , नोम , ओदानी ।
-न , ता , ना , ना , ना , ना , ना , दिर आदि ।
इस प्रकार , गीतियों द्वारा पेचीदा स्वर संचारों को चामत्कारिक ढंग से गूंथकर गाना ( द्रुत लय में ) तराना कहलाता है । अतः ऐसा माना जाता हैं कि मुसलमानों को स्तुति मूलक स्वरों का ज्ञान न होने के कारण उन्होंने इसको विभक्त या विकृत करके गाना शुरू किया , जिसके परिणामस्वरूप इस गायन शैली का जन्म हुआ ।
3 171
ख्याल गायन शैली – ‘ ख्याल ‘ हिन्दुस्तानी कण्ठ संगीत की सर्वाधिक प्रिय ( लोकप्रिय ) शैली ‘ ख्याल ‘ फारसी भाषा का शब्द है । ख्याल का अर्थ विचार या कल्पना है । जब एक गायक अपनी प्रौढ़ कल्पना को स्वर , लय , तान के माध्यम से सांगीतिक आकार देता है , तो उसे ख्याल कहा जाता है । प्रसिद्ध सूफी सन्तों की रचना ख्याल कही गई है । कल्पना ख्याल शैली का ही प्राण है ।
ख्याल गायन शैली का आविष्कार
ख्याल का आविष्कार यह गीत शैली कब से प्रारम्भ हुई , इसके विषय में दो मत पाए जाते हैं । एक तो यह कि इसका आविष्कार ई . 14 में अमीर खुसरो ने किया और दूसरा यह कि इसकी परम्परा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है ।
विद्वानों के अनुसार , मध्यकालीन संगीत में प्रचलित ‘ रूपक ‘ नामक प्रबन्ध से ख्याल शैली का विकास हुआ है । एक मत के अनुसार ख्याल का आविष्कारक अमीर खुसरो को माना जाता है , लेकिन उसके ग्रन्थों को देखने पर यह ज्ञात होता है कि उस समय कव्वाली आदि , प्रचार में ख्याल का उल्लेख नहीं मिलता है । तानसेन के समय में भी ख्याल गीत का नाम सुनने में नहीं आता , क्योकि इस समय तो ध्रुपद गायकी प्रचलित थी । ऐसा माना जाता है कि ब्रज के कुछ प्रदेशों में ख्याल नामक लोकगीतों की परम्परा प्राप्त होती है ।
‘ चौरासी वैष्णवन की वार्ता ‘ नामक वार्ता साहित्य में एक गायिका द्वारा ख्याल और टप्पा नामक गीतों के गायन का उल्लेख है । अत : इस शैली के निर्माण में तत्कालीन ख्याल गीतों का योगदान रहा हो , तो कोई आश्चर्य नहीं है ।
18 वीं शताब्दी में सुल्तान मुहम्मद शाह के दरबारी गायक नियामत खाँ ( सदारंग ) ने इस शैली को शास्त्रीय संगीत में प्रतिष्ठा दिलाई , उनकी ख्याल की अनेक रचनाएँ पीढ़ी – दर – पीढ़ी से प्रचलित रही हैं । सदारंग स्वयं तानसेन के वंशज थे और इनकी अपनी तथा उनके वंशज की गायिकी ध्रुपद गायकी थी , लेकिन युग परिवर्तन की प्रवृत्तियों को ध्यान में रखकर इन्होंने ख्याल गीतों का प्रवर्तन किया , जिसमें स्वर सौन्दर्य के आविष्कार के लिए पर्याप्त स्थान था ।
ध्रुपद की लयकारिता और कव्वाली की तान , इन दोनों के सम्मिश्रण से ख्याल गायकी का निर्माण हुआ । मतभेद चाहे कितने भी रहे हों , परन्तु आधुनिक काल में ख्याल गायन सबसे प्रमुख गायन शैली बन चुकी है ।
ख्याल गायन की विधि
ख्याल गायन को प्रारम्भ करने की दो शैलियाँ प्रचलित हैं । ‘ ख्याल ‘ की गायकी ‘ लचीली ‘ है , इसमें गायक स्वतन्त्र रूप से विचरण कर सकता है । 1. प्रथम ख्याल की बन्दिश शुरू करने से पहले राग के स्वरूप का आलाप विस्तारपूर्वक करना । 2. दूसरा राग के स्वरूप को स्थापित करने हेतु अकारादि में अत्यन्त संक्षिप्त आलाप करना ।
ख्याल के भेद
ख्याल गायन लय , परम्परा और विधि के आधार पर तीन प्रकार से भेद किया जाता है –
विलम्बित ख्याल – यह ख्याल गम्भीर प्रकृति का होता है । इसके प्रचारक सदारंग – अदारंग दो भाई माने जाते हैं । ये दोनों भाई मुहम्मद शाह रंगीले के दरबारी गायक थे । बड़े ख्याल का आलाप व बोलालाप द्वारा विस्तार किया जाता है । यह शृंगार , शान्त व करुण रस प्रधान होता है । विलम्बित ख्याल का आविष्कार १६ वीं शताब्दी में सुल्तान हुसैन शक ने किया । इसके गीत को स्थायी एवं अन्तरा नामक दो भागों में बाँटा गया है । इसमें एकताल , झूमरा , तिलवाड़ा , आड़ा – चौताल आदि प्रयोग होती हैं ।
मध्य लय के ख्याल – इस प्रकार के ख्याल में लय साधारण रहती है । इसमें चंचलता का समावेश होता है । लय के साथ शब्दों व स्वरों का खिलवाड़ करते हुए बोलतान व तान आदि गाते समय गायक को अपनी कला कौशल व प्रतिभा दर्शाने का पूर्ण अवसर मिलता है ।
द्रुत ख्याल – इस ख्याल की उत्पत्ति 14 वीं शताब्दी में अमीर खुसरो ने की । अमीर खुसरो ने सर्वप्रथम कव्वाली ख्याल का प्रचार किया और उसी को वर्तमान में द्रुत ख्याल कहकर पुकारा जाता है । इसमें शृंगार या करुण रस प्रधान होते हैं । स्थायी व अन्तरा इसके दो भाग होते हैं । इसमें शब्द अधिक होते हैं एवं ठहराव कम होता है । छोटे ख्याल में आलाप , बोलालाप , बोल – तानें व सरगम प्रमुख रहती हैं । छोटे ख्याल में मध्य लय की तालों – एकताल , त्रिताल , झपताल , तीनताल तथा रूपक आदि का प्रयोग किया जाता है ।
3 171
Music short notes ✍️
==================
Music Net classes
==================
सादरा गायन शैली क्या है ?
सादरा अर्द्धशास्त्रीय संगीत और लोकगीत के बीच की कड़ी है गायन की यह शैली दादरा से बहुत मिलती – जुलती है । सादरा को अधिकतर कथक गायक गाते हैं । इसमें कहरवा , रूपक , झपताल तथा दादरा इन तालों का प्रयोग होता है । भाव की दृष्टि से गीतों में शृंगार रस और उसकी चंचलता की प्रधानता रहती है इसलिए इसकी प्रकृति प्रायः ठुमरी की तरह होती है ।
ठुमरी गायक सादरा भली प्रकार गा सकते हैं । वाजिद अली शाह ने कई सादरा गीत भी लिखे जो कि अधिकांशतः खमाज राग में हैं । कुछ विद्वानों का ऐसा विचार है कि मध्यकाल में ठुमरी के साथ मिलती – जुलती एक और शैली प्रचार में आई जिसको सादरा कहा गया ।
क्रमिक पुस्तक मालिका के 6 भागों में ध्रुवपद के अन्तर्गत झपताल की बन्दिशें भी प्राप्त होती हैं , जिससे सादरा शैली का आभास मिलता है । राग बिहाग , कायम रहे राज़ और उमर दराज आदि रचनाएँ सादरा के अन्तर्गत गाई जाती हैं ।
सादरा की विशेषता
सादरा शैली की निम्न विशेषताएँ हैं –
• सादरा के भाग ध्रुवपद की भाँति दो अथवा चार स्थायी , अन्तरा संचारी आभोग आते हैं । इस गायन में ध्रुवपद तथा होरी गायन से अधिक चपलता है । सादरा गायन में स्थायी को शुद्धता से ध्रुपद की परम्परा से गाया जाता है । लय बाँट का कार्य जिसे उपज भी कहते हैं और बोलतान का प्रयोग ही सादरा गायन की विशेषता है ।
• प्रायः झपताल में व कभी – कभी 10 मात्राओं वाली सूलफाक ताल में ध्रुपद अंग से गाया जाने वाला गीत सादरा कहलाता है । उत्तर भारत में ध्रुवपद के समान ही सादरा गायन प्रचलित था और आज भी ख्याल गायकों से इस विधा को सुना जा सकता है
3 171
Music short notes ✍️
==================
Music Net Classes
==================
धमार गायन शैली क्या है ?
घमार – जिसमें होरी की धूमधाम के साथ गीत का गायन होता है , वह धमार गीत कहलाता है । यह ध्रुपद शैली से गाया जाने वाला एक गीत है । चौदह मात्राओं की धमार ताल के निबद्ध गीत में अधिकांशत : होरी सम्बन्धी पदों की रचना होती है । राधा और कृष्ण इस गीत के नायक होते हैं । इसका जन्म स्थान ब्रज को माना जाता है । फाग से सम्बन्धित होने के कारण इसे ‘ पक्की होरी ‘ भी कहते हैं ।
धमार गीत की व्युत्पत्ति
धमार गीत की व्युत्पत्ति यह गायकी एक रंगारंग परम्परा की गायन शैली है , इसी कारण ‘ धमार ‘ को धमाल – धमार ’ और ‘ घमारी ’ के नाम से भी बुलाया जाता है । धमाल का अभिप्राय ही धमा – चौकड़ी करना है । धमार शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा की ‘ धम् ‘ धातु से हुई ‘ धम् ’ धातु में अच् प्रत्यय लगने पर ‘ धमार ‘ शब्द बनता है । धमार का उद्देश्य गम्भीरता से हटकर रंगीन वातावरण उत्पन्न करना है , इसलिए इसकी शैली लय प्रधान है । धमार गीत एक सामूहिक गीत है , जो टोलियों में गाया जाता है । मूल रूप से धमार गीत होली सम्बन्धी गीत है । यह शृंगार रस से परिपूर्ण गायकी है । इसकी शैली लय प्रधान है , जिसके स्थायी व अन्तरा दो भाग होते हैं । धमार गीत, ध्रुपद तथा ख्याल बीच वाली स्थिति के निदर्शक हैं । धमार का मूल धम्माली प्रबन्ध में है , जिसका सबसे पहले उल्लेख ‘ संगीत शिरोमणि ‘ में किया गया है ।
धमार गीतों की परम्परा
धमार गीतों की परम्परा सदारंग और अदारंग के बाद आगे बढ़ी है । सदारंग के पुत्र मनरंग ने जयपुर दरबार का आश्रय लिया और उन्होंने अनेक धमारों की रचना की । इसी प्रकार मनरंग ने भी पारम्परिक धमारों की रचना की । सबरंग ने भी धमार गीतों की रचना की । निःसन्देह धमार गीत भी शास्त्रीय परम्पराओं के प्रमुख गीत रहे हैं ।
सादरा भारतीय उपमहाद्वीप के हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की एक मुखर शैली है । भीतर ( ताल ) , तेवरा ( 7 बीट्स ) , सोवोल ( 10 बीट्स ) और ( 12 बीट्स ) या 10 बीट झपताल की रचना को सादरा कहा जाता है ।
3 171
वह तान जिसमें, तान के साथ गीत के शब्द गाए जाते हैं, उसे क्या कहते हैं?
3 171
जिस मूर्च्छना में अंतर गंधार का प्रयोग होता है, उसे क्या कहते हैं ?
