Samarpan_World
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Repost from Mᴀᴀ Pᴜsʜᴘ
माँ - पुष्प ३
🌺🌺🌺
यही पूर्ण समर्पण का भाव बूंँद से सागर बनने में हमारी सहायता करता है |
मातृत्व तथा मोह में एक धागे - सा सूक्ष्म अंतर है | मातृत्व सभी को खुशी देता है , साथ ही स्वतंत्रता भी देता है | मोह दूसरों को खुशी तो देता है किंतु बंधनकारक होता है | मोह नकारात्मक भावों की जागृति का कारण भी बनता है ,जैसे - वस्तु या व्यक्ति से मोह हो तो खो जाने का ' भय ' ,किसी और के पास जाए तो ' ईर्ष्या ' , 'क्रोध ' जैसे भाव मन में उठने लगते हैं | मातृत्व तो दूसरों की खुशी में सुख प्राप्ति करवाता है | स्त्रियों में मातृत्व का भाव प्रकृति दत है किंतु साथ ही मोहपाश भी प्रकृति ने दिया है | मातृत्व भाव स्त्री को आध्यात्मिक विकास में सहायक है किंतु ' मोह ' भाव पर नियंत्रण भी उतना ही महत्वपूर्ण है | हे ईश्वर ! हे गुरुशक्तियों , मुझे मोहपाश में मत बंँधने देना ! ! !
" मैडम , बाइ !":कहते हुए वह लड़की उसके घर गई | उसके बोलने से मैं अपनी विचार तंद्रा से बाहर आई | मैंने दीपक तैयार कर प्रज्वलित किया तथा प्रणाम किया | भोजन की तैयारी की , कुकर गैस पर रखा तथा धूप की | अनुराग - अम्बरीष भी घर आए तथा हाथ - पैर - मुंँह धोकर ' शुभम् करोति ' किया फिर हम ध्यान करने बैठे | ध्यान लगते ही लाल - सुनहरी गोद में आकर बैठ गए | थोड़ी देर बाद वे पेट से कुछ गुडूरडडड गुडूरडडडड जैसी आवाज निकालने लगे |
ध्यान होने पर मैंने कहा , " अनुराग , खाना खाने बैठने की तैयारी करो और अम्बरिष , तुम थाली , कटोरी , ग्लास लाकर रखो | अनुराग बेटा , पानी भी लाकर रखना |"
🙏
पेज :- ६९
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| 3 | llप्रेममय जयतेll
*आवश्यक नहीं कि सब तुम्हारी बात मानें ही, सब समझें ही क्योंकि* यह अनुभूति का ज्ञान अंतिम हैl जिसके जीवन में अभी उसके कर्मो के कारण भोग भोगने बाकी है उसे वह अपने भोग भोगे बिना तुम्हारी अनुभूति का ज्ञान समझ में नहीं आएगाl यह आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए आत्मा की परिपक्व स्थिति की आवश्यकता होती हैl वह जब तक नहीं होती, यह ज्ञान भी नहीं समझ में आएगाl
हिमालय मे डॉक्टर बाबा ने पूज्य गुरुदेवजी कोl
हिमालय का समर्पण योग ४
llवसुधैव कुटुंबकम्ll
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| 5 | llप्रेममय जयतेll
*आवश्यक नहीं कि सब तुम्हारी बात मानें ही, सब समझें ही क्योंकि* यह अनुभूति का ज्ञान अंतिम हैl जिसके जीवन में अभी उसके कर्मो के कारण भोग भोगने बाकी है उसे वह अपने भोग भोगे बिना तुम्हारी अनुभूति का ज्ञान समझ में नहीं आएगाl यह आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए आत्मा की परिपक्व स्थिति की आवश्यकता होती हैl वह जब तक नहीं होती, यह ज्ञान भी नहीं समझ में आएगाl
हिमालय मे डॉक्टर बाबा ने पूज्य गुरुदेवजी कोl
हिमालय का समर्पण योग ४
llवसुधैव कुटुंबकम्ll
🌞🏔️🧘🏻♂️🪷🧘🏻♀️🏔️🌝 | 1 |
| 6 | https://www.instagram.com/reel/DeBeHQoz6Ky/?stkn=MWF2cGUwanJ1dG9xNQ== | 30 |
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| 8 | ॥प्रेममय जयते॥
.... *प्राचीन मान्यताएँ और परम्पराएँ... उनमें बदलाव आवश्यक होता है*....
हमारी कई प्राचीन मान्यताएँ और परम्पराएँ उस समय की स्थिति के अनुसार होती हैं। आज के समय के अनुसार उनमें बदलाव आवश्यक होता है। शास्त्रों में भी कई बातें लिखी होती हैं। वे उस समय की स्थिति और आवश्यकता को देखकर लिखी होती हैं। शास्त्र जब हजारों साल पुराने हो जाते हैं और मनुष्य आज के समय के अनुसार होता है तो बड़ा कठीण प्रश्न होता है कि शास्त्र के आधार पर बात को माना जाए या आज की परिस्थिति के अनुसार उसे माना जाए। मनुष्य इसका निर्णय ही नहीं ले पाता, इसलिए वह एक ही स्थान पर स्थित हो जाता है। और रुढ़ीवादी लोग डराते हैं - शास्त्र की बात नहीं मानी तो भगवान नाराज हो जाएँगे और नाराज हो गए तो वे तुम्हारे जीवन में कुछ बुरा करेंगे। और *इस डर के मारे बेमन से ही लोग आज की स्थिति में योग्य लगे या न लगे, वही बात करते हैं जो शास्त्र कहते हैं।*
हिमालय का समर्पण योग ५ (सजीव व पवित्र ग्रंथ)
॥वसुधैव कुटुंबकम्॥
🌞🏔️🧘🏻♂️🪷🧘🏻♀️🏔️🌝 | 59 |
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| 10 | ॥प्रेममय जयते॥
*"मृतव्यक्ति"* के *"फोटो"* भी घर में नही लगाना चाहिए। क्योंकि हम उन्हें देखकर बार-बार *"भूतकाल"* में जाते है़, ऐसा मेरा अनुभव है़।
पूज्य गुरुदेव
6/8/2020
"मृत्यु" - इस संदेश से।
॥वसुधैव कुटुम्बकम्॥
🌞🏔️🧘🏻♂️🪷🧘🏻♀️🏔️🌝 | 67 |
| 11 | . | 73 |
| 12 | ॥प्रेममय जयते॥
*'श्राद्धपक्ष'* हमको याद कराता है़, जैसे हमारे पुर्वज गये वैसे हमें एक दिन जाना ही है़। यह शरीर नाशवान है़। "जिसका स्टेशन आ जाता है़, वह मुसाफिर ट्रेन में से उतर ही जाता है़।" हमारे पूर्वज जिवनभर ही धन संपत्ति जमा करते रहे है़। और कुछ भी साथ नहीं ले पाएँ। सबकुछ यही का यही धरा रह गया है़।श्राद्धपक्ष हमारे में ऐसा *विरक्ती का भाव* जगाता है़। तब कही जाकर *भीतर की* जगदम्बा का "नवरात्र" आता है़।
पूज्य गुरुदेव
17/09/20
के संदेश से।
॥वसुधैव कुटुम्बकम्॥
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| 14 | ॥प्रेममय जयते॥
*प्रश्न ४* : पिंडदान और कर्मकांड नहीं करने से क्या मृतक की आत्मा भटकते रहती है?
*समाधान* : सब कुछ विश्वास पर है, मानने पर है। (यदि सोचेंगे की कर्मकांड आदि न करने पर आत्मा भटकेगी, तो भटकेगी; नहीं तो नहीं भटकेगी)
पूज्य गुरुदेव के साथ प्रश्नोतरी
*मधुचैतन्य नवंबर २०२३*
॥वसुधैव कुटुम्बकम्॥
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| 16 | ॥प्रेममय जयते॥
*प्रश्न 3* : पिंडदान आदि नहीं करने से मृतक की आत्मा अपने कुटुम्बियों को और आने वाली पीढ़ी के सुख शांति में और कार्य की सफलता में रुकावट पैदा करती है? क्या वो आत्मा पितृदोष बनके हमें परेशान करती है?
*समाधान :* नहीं करती। मॉं कभी बेटे को परेशान कर सकती है क्या? मॉं कभी बुरा कर नहीं सकती।
पूज्य गुरुदेव के साथ प्रश्नोत्तरी
*मधुचैतन्य नवंबर २०२३*
॥वसुधैव कुटुम्बकम्॥
🌞🏔️🧘🏻♂️🪷🧘🏻♀️🏔️🌝 | 119 |
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| 18 | ॥प्रेममय जयते॥
*प्रश्न २:* पिंडदान और कर्मकांड किए बिना क्या सद्गति नहीं मिलती?
*समाधान* : सब सोचने के ऊपर है, विश्वास की बात है। यदि मृतक के स्नेहीजन सोचेंगे कि पिंडदान और कर्मकांड किए बिना सद्गति होती है, तो होती है; नहीं, तो नहीं होगी! यदि चित्त से करते हैं, तो इन सबकी आवश्यकता नहीं है; भाव से प्रार्थना करते हैं, तो भी इन सबकी आवश्यकता नहीं है। परंतु, यदि लगता है कि आपका इतना भाव नहीं है तो फिर यह पिंडदान, कर्मकांड है।
पूज्य गुरुदेव के साथ प्रश्नोत्तरी
मधुचैतन्य - नवंबर २०२३
॥वसुधैव कुटुम्बकम्॥
🌞🏔️🧘🏻♂️🪷🧘🏻♀️🏔️🌝 | 111 |
| 19 | . | 65 |
| 20 | ॥प्रेममय जयते॥
*प्रश्न १:* जो आत्मा चली गई होती है उसका उसके शरीर के नाम, शरीर के रिश्तों से संबंध समाप्त हो चुका होता है, तो उस चली गई आत्मा के लिए प्रेम भाव के कारण श्रद्दांजली के रुप में उस आत्मा के नाम से स्नेहजनों ने किए सत्कर्म उस आत्मा के मोक्ष के मार्ग में कैसे रुकावट बनते हैं?
*समाधान* : उसके (मृतक) नाम से करते हैं इसलिए (कर्म) जुड़ते हैं। (उसके नाम से नहीं करेंगे तो नहीं जुड़ेंगे)
पूज्य गुरुदेव के साथ प्रश्नोत्तरी
*मधुचैतन्य - नवंबर २०२३*
॥वसुधैव कुटुम्बकम्॥
🌞🧘🏻♂️🏔️🪷🏔️🧘🏻♀️🌝 | 79 |
