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Current Affairs Quiz 30 May 2020 दैनिक सामान्य ज्ञान क्विज https://www.simplifiedshiksha.com/current-affairs-quiz-30-may/
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वर्षा के कारण नम हुए अफ्रीकी रेगिस्तानों ने टिड्डियों के प्रजनन को बढ़ावा दिया और वर्षा की अनुकूल हवाओं द्वारा इन्हें भारत की ओर बढ़ने में सहायता मिली।
इसके अतिरिक्त कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने हेतु जारी लॉकडाउन के कारण कीटनाशकों का बेहतर ढंग से छिड़काव न हो पाने के कारण भारत, पाकिस्तान और अफग़ानिस्तान में नियमित समन्वय गतिविधियों को प्रभावित किया।
बचाव की बेहतर तैयारी कैसे?
जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक घटना है, अफ्रीका महाद्वीप अपनी सुभेद्यता के कारण टिड्डी दल के हमले में विवश नज़र आ रहा है। अफ्रीकी हॉर्न देश मुख्य रूप से सामाजिक आर्थिक विकास के निम्न स्तर पर स्थित हैं। यहाँ शोध कार्य को बढ़ावा देना चाहिये ताकि टिड्डियों के हमले से पूर्व व्यापक बचाव किया जा सके।
रेगिस्तानी टिड्डी झुंडों को नियंत्रित करने के लिये ऑर्गोफॉस्फेट रसायनों (organophosphate chemicals) का छिड़काव किया जा सकता है। यह छिड़काव उन क्षेत्रों में करना चाहिये जहाँ कृषि कार्य नहीं किये जा रहे हैं क्योंकि यह एक विषाक्त रसायन है।
फसलों पर क्लोरपाइरीफॉक्स (Chlorpyri Fox) रसायन का छिड़काव किया जाना चाहिये क्योंकि यह विषाक्त रसायन नहीं है।
टिड्डियों के द्वारा दिये गए अंडों को नष्ट कर देना चाहिये।
कृषि क्षेत्र के आस-पास खाईयाँ (Trenches) खोद कर अपरिपक्व टिड्डियों को जल और केरोसीन के मिश्रण में गिराया जा सकता है।
ड्रोन आदि का प्रयोग कर उनके प्रजनन स्थलों पर कीटनाशकों का छिड़काव करना चाहिये।
टिड्डी चेतावनी संगठन
(Locust Warning Organization-LWO)
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय (Ministry of Agriculture & Farmers Welfare) के वनस्पति संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय (Directorate of Plant Protection, Quarantine & Storage) के अधीन आने वाला टिड्डी चेतावनी संगठन मुख्य रूप से रेगिस्तानी क्षेत्रों राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में टिड्डियों की निगरानी, सर्वेक्षण और नियंत्रण के लिये ज़िम्मेदार है।
इस संगठन का प्रमुख कार्य निगरानी करना, सर्वेक्षण करना तथा टिड्डी दल के किसी भी प्रकार के हमले को नियंत्रित करना है।
इस संगठन के दो मुख्यालय हैं-फरीदाबाद- यह संगठन के प्रशासनिक कार्यों की देखरेख करता है।
जोधपुर- यह संगठन के तकनीकी कार्यों की देखरेख करता है।
निष्कर्ष
वैश्विक तापन बाढ़ एवं महामारी जैसी विषम आपदाओं को आमंत्रित करता है और आपदाओं को तीव्रता भी प्रदान करता है। वैश्विक तापन के कारण ही टिड्डियों की संख्या में तीव्र वृद्धि हुई। सभी देशों को वैश्विक तापन को कम करने की दिशा में मिलकर प्रयास करना चाहिये। टिड्डियों के हमले के रोकथाम के लिये निगरानी, सर्वेक्षण और नियंत्रण की रणनीति पर काम करना चाहिये।
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भारत में टिड्डी दल
एशिया और अफ्रीका महाद्वीप के एक दर्जन से अधिक देशों में टिड्डी दल (locust swarms) ने फसलों पर हमला किया है। संयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि तीन क्षेत्रों यथा-अफ्रीका का हॉर्न क्षेत्र, लाल सागर क्षेत्र, और दक्षिण-पश्चिम एशिया में स्थिति बेहद चिंताजनक है। अफ्रीका का हॉर्न क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है। इथियोपिया और सोमालिया से टिड्डी दल दक्षिण में केन्या और महाद्वीप के 14 अन्य देशों में पहुँच चुके हैं। लाल सागर क्षेत्र में सऊदी अरब, ओमान और यमन पर टिड्डियों के दल ने हमला किया है, तो वहीँ दक्षिण पश्चिम एशिया में ईरान, पाकिस्तान और भारत में टिड्डियों के झुंडों ने फसल को भारी नुकसान पहुँचाया है।
भारत में राजस्थान, गुजरात और पंजाब के सीमावर्ती गाँवों में भारी मात्रा में टिड्डियों के झुंड आ चुके हैं, जिससे खड़ी फसल को भारी नुकसान पहुँचा है। प्रभावित राज्य की सरकारों को टिड्डी हमलों के विरुद्ध उच्च सतर्कता बरतने के लिये लगातार परामर्श दिया जा रहा है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में आतंक मचाने के बाद टिड्डियों का दल उत्तर प्रदेश के झांसी पहुँच गया है। कृषि विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, यह दल लगभग एक किलोमीटर के इलाके में फैला हुआ है। टिड्डियों के हमले की आशंका के मद्देनज़र दमकल वाहनों को पहले से ही तैयार किया गया था और इन कीटों को भगाने के लिये कीटनाशकों का गहन छिड़काव किया जा रहा है।
टिड्डी दल
मुख्यतः टिड्डी एक प्रकार के उष्णकटिबंधीय कीड़े होते हैं जिनके पास उड़ने की अतुलनीय क्षमता होती है जो विभिन्न प्रकार की फसलों को नुकसान पहुँचाती हैं।
टिड्डियों की प्रजाति में रेगिस्तानी टिड्डियाँ (Schistocerca gregaria) सबसे खतरनाक और विनाशकारी मानी जाती हैं।
आमतौर पर जुलाई-अक्तूबर के महीनों में इन्हें आसानी से देखा जा सकता है क्योंकि ये गर्मी और बारिश के मौसम में ही सक्रिय होती हैं।
अच्छी बारिश और परिस्थितियाँ अनुकूल होने की स्थिति में ये तेज़ी से प्रजनन करती हैं। उल्लेखनीय है कि मात्र तीन महीनों की अवधि में इनकी संख्या 20 गुना तक बढ़ सकती है।
भारत में टिड्डियों की प्रजाति
भारत में टिड्डियों की निम्निखित चार प्रजातियाँ पाई जाती हैं:रेगिस्तानी टिड्डी (Desert Locust)
प्रवासी टिड्डी ( Migratory Locust)
बॉम्बे टिड्डी (Bombay Locust)
ट्री टिड्डी (Tree Locust)
रेगिस्तानी टिड्डी:
रेगिस्तानी टिड्डियों को दुनिया के सभी प्रवासी कीट प्रजातियों में सबसे खतरनाक माना जाता है। इससे लोगों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और आर्थिक विकास पर खतरा उत्पन्न होता है।
ये व्यवहार बदलने की अपनी क्षमता में अपनी प्रजाति के अन्य कीड़ों से अलग होते हैं और लंबी दूरी तक पलायन करने के लिये बड़े-बड़े झुंडों का निर्माण करते हैं।
सामान्य तौर पर ये प्रतिदिन 150 किलोमीटर तक उड़ सकते हैं। साथ ही 40-80 मिलियन टिड्डियाँ 1 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में समायोजित हो सकती हैं।
एक अकेली रेगिस्तानी मादा टिड्डी 90-80 दिन के जीवन चक्र के दौरान 60-80 अंडे देती है।
क्या समय से पूर्व टिड्डियों का हमला पहली बार हुआ?
वर्ष 1950 के बाद टिड्डियों का ऐसा हमला पहली बार देखने को मिल रहा है। दशकों पहले टिड्डी प्लेग (जब दो से अधिक निरंतर वर्षों के लिये टिड्डियों के झुंड का हमला होता है, तो इसे प्लेग कहा जाता है) के भयानक रूप को लंबे समय तक देखा गया था। इस बार, वे अच्छे मानसून के कारण लंबे समय तक इस क्षेत्र में मौज़ूद हैं।
वर्ष 2019 में मानसून पश्चिमी भारत में समय से पहले (जुलाई के पहले सप्ताह से छह सप्ताह पहले) शुरू हुआ, विशेषकर टिड्डियों से प्रभावित क्षेत्रों में। यह सामान्य रूप से सितंबर/अक्टूबर माह के बजाय एक माह आगे नवंबर तक सक्रिय रहा। विस्तारित मानसून के कारण टिड्डी दल के लिये उत्कृष्ट प्रजनन की स्थितियाँ पैदा हुई। इसके साथ ही प्राकृतिक वनस्पति का भी उत्पादन हुआ, जिससे वे लंबे समय तक भोजन के लिये आश्रित रह सकती थीं।
टिड्डियों और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंध
रेगिस्तानी टिड्डे आमतौर पर अफ्रीका के निकट, पूर्वी और दक्षिण-पश्चिम एशिया के अर्ध-शुष्क और शुष्क रेगिस्तान तक सीमित होते हैं, जो वार्षिक रूप से 200 मिमी से कम बारिश प्राप्त करते हैं।
सामान्य जलवायुवीय परिस्थितियों में, टिड्डियों की संख्या प्राकृतिक मृत्यु दर या प्रवासन के माध्यम से घट जाती है।
कुछ मौसम विज्ञानियों का मानना है कि टिड्डियों का इस प्रकार प्रजनन, जो कृषि कार्यों के लिये चिंता का विषय है, हिंद महासागर के गर्म होने का एक अप्रत्यक्ष परिणाम है।
पश्चिमी हिंद महासागर में सकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव या अपेक्षाकृत अधिक तापमान पाया गया परिणामस्वरूप भारत समेत पूर्वी अफ्रीका में घनघोर वर्षा हुई।
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संगठित और असंगठित क्षेत्र में लगभग 50,000 से अधिक प्रसंस्करण इकाइयाँ हैं तथा प्रसंस्करण क्षमता प्रति वर्ष 45.1 मिलियन टन होने का अनुमान है।
यह प्रसंस्करण क्षमता 8.8% CAGR (Compound Annual Growth Rate) की दर से बढ़ रही है और प्रसंस्करण उद्योग की क्षमता वर्ष 2022-23 तक 62.4 मिलियन टन एवं वर्ष 2027-28 तक 86 मिलियन टन तक बढ़ाने के लिये 10 अरब डॉलर का निवेश किये जाने की उम्मीद है।
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रसायन और उर्वरक मंत्रालय (Ministry of Chemicals and Fertilizers) के तहत ‘केंद्रीय प्लास्टिक इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी संस्थान’ (Central Institute of Plastics Engineering & Technology- CIPET) का नाम परिवर्तित कर ‘केंद्रीय पेट्रोरसायन इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी संस्थान’ (Central Institute of Petrochemicals Engineering & Technology- CIPET) कर दिया गया है।
प्रमुख बिंदु:
परिवर्तित नाम को तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1975 (तमिलनाडु अधिनियम 27, 1975) के तहत पंजीकृत किया गया है।
‘केंद्रीय पेट्रोरसायन इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी संस्थान’ पूरी तरह से पेट्रोकेमिकल क्षेत्र के विकास के लिये समर्पित होगा, जिसमें एकेडमिक्स, स्किलिंग, टेक्नोलॉजी सपोर्ट एंड रिसर्च इत्यादि क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
CIPET का प्राथमिक उद्देश्य शिक्षा एवं अनुसंधान जैसे संयुक्त कार्यक्रम के माध्यम से प्लास्टिक उद्योग के विकास में योगदान देना रहा है।
संस्थान कई वर्षों की विकास प्रक्रिया से गुजरते हए प्लास्टिक के अभिनव प्रयोंगों पर आधारित ऐसे समाधान विकसित करने के लिये उद्योगों के साथ जुड़ रहा है जो संसाधनों के इस्तेमाल के मामले में युक्तिसंगत होने के साथ ही आसानी से बिकने वाले भी हैं।
CIPET के बारे में
केंद्रीय प्लास्टिक इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी संस्थान (CIPET) की स्थापना वर्ष 1968 में भारत सरकार द्वारा ‘सयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम’ (UNDP) की मदद से चेन्नई में की गई।
वर्तमान समय में यह भारत सरकार के उर्वरक मंत्रालय के अधीन एक प्रमुख राष्ट्रीय संस्थान है।
इसका मुख्यालय गिण्डी, चेन्न्ई में है।
इसका प्राथमिक उद्देश्य शिक्षा एवं अनुसंधान के संयुक्त प्रयासों द्वारा देश में प्लास्टिक उद्योग के विकास में योगदान करना है।
पेट्रोरसायन (Petrochemicals):
पेट्रोरसायन विभिन्न रासायनिक यौगिकों के हाइड्रोकार्बन से प्राप्त किये जाते हैं। ये हाइड्रोकार्बन कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस से व्युत्पन्न होते हैं।
कच्चे तेल के आसवन द्वारा उत्पादित विभिन्न अंशों में से पेट्रोलियम गैस, नेफ्था (Naphtha), केरोसिन और गैस तेल पेट्रोरसायन उद्योग के लिये प्रमुख फीड स्टॉक हैं।
प्राकृतिक गैस से प्राप्त ईथेन, प्रोपेन और प्राकृतिक गैस तरल पदार्थ पेट्रोरसायन उद्योग में उपयोग किये जाने वाले अन्य महत्त्वपूर्ण फीडस्टॉक हैं।
भारत में पेट्रोरसायन उद्योग:
पृष्ठभूमि:
1970 के दशक में, जैविक रसायनों की की मांग में इतनी तेज़ी से वृद्धि हुई कि इस मांग को पूरा करना मुश्किल हो गया। उस समय पेट्रोलियम शोधन उद्योग का तेज़ी से विस्तार हुआ।
इस उद्योग ने 1980 और 1990 के दशक में तेज़ी से वृद्धि दर्ज की।
पेट्रोरसायन उद्योग में मुख्य रूप से सिंथेटिक फाइबर/यार्न, पॉलिमर, सिंथेटिक रबर (इलास्टोमर), सिंथेटिक डिटर्जेंट इंटरमीडिएट्स, परफार्मेंस प्लास्टिक और प्लास्टिक प्रसंस्करण उद्योग शामिल हैं।
पेट्रोरसायन उद्योग का विज़न:
पेट्रोरसायन क्षेत्र की परिकल्पना घरेलू पेट्रोरसायन उद्योग की संभावना को ध्यान में रखते हुए तथा उत्पादन और माँग में वैश्विक बदलाव द्वारा प्रदत्त विकास के अवसरों को देखते हुए की गई है। इसके दृष्टिकोण में प्रमुख रूप से शामिल हैं-
पर्यावरण अनुकूल प्रक्रियाओं एवं प्रौद्योगिकियों का उपयोग करते हुए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी कीमतों के आधार पर मूल्यवर्द्धित, गुणवत्तायुक्त पेट्रोरसायन उत्पादों का विकास करना।
सतत् विकास पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ नए अनुप्रयोगों और उत्पादों का विकास करना।
महत्त्व:
पेट्रोरसायन उद्योग आर्थिक विकास और विनिर्माण क्षेत्र के विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पेट्रोरसायन उद्योग में मूल्यवर्द्धन अन्य उद्योग क्षेत्रों की तुलना में अधिक है।
पेट्रोरसायन उत्पाद वस्त्र, आवास, निर्माण, फर्नीचर, ऑटोमोबाइल, घरेलू सामान, कृषि, बागवानी, सिंचाई, पैकेजिंग, चिकित्सा उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रीकल आदि जैसे जीवन के लगभग हर क्षेत्र को कवर करते हैं।
रसायन एवं पेट्रोरसायन उद्योग संयुक्त रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख योगदानकर्त्ता हैं, जिसमें नमक से लेकर उपग्रह तक के 80,000 से अधिक उत्पाद शामिल हैं। ये उद्योग लगभग 2 मिलियन लोगों को रोज़गार प्रदान करते हैं।
भारतीय रसायन एवं पेट्रोरसायन उद्योग के चालक
मज़बूत आर्थिक विकास, दुनिया की दूसरी सर्वाधिक आबादी, शहरीकरण में तेज़ी और औद्योगिक माँग में भारी वृद्धि भारतीय रासायनिक और पेट्रोरसायन उद्योग के विकास के लिये प्रमुख चालक हैं।
आगे की राह
भारत में प्लास्टिक की मांग में वर्ष 2013-14 से वर्ष 2017-18 के बीच 8.9% की औसत दर वृद्धि हुई है। वर्ष 2022-23 तक यह मांग 24 मिलियन टन और वर्ष 2027-28 तक 35 मिलियन टन तक पहुँचने की उम्मीद है।
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Asian Development Bank-( ADB) और भारत ने महाराष्ट्र में सड़कों के सुधार के लिये 177 मिलियन डॉलर के ऋण पर हस्ताक्षर किये।
प्रमुख बिंदु:
उल्लेखनीय है कि ADB द्वारा प्रदत इस ऋण की मदद से महाराष्ट्र के 2 प्रमुख ज़िलों की सड़कों, 450 किलोमीटर के 11 राज्यमार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, अंतर्राष्ट्रीय सड़कों, बंदरगाह, हवाई अड्डे, ज़िला मुख्यालय, औद्योगिक क्षेत्र और कृषि क्षेत्र की सड़कों में सुधार किया जाएगा।
महाराष्ट्र लोक निर्माण विभाग की परियोजनाओं से जुड़े कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा ताकि सड़कों के डिज़ाइन, योजना और सड़क सुरक्षा पर कार्य करते समय उन्हें जलवायु परिवर्तन और आपदा के अनुकूल निर्मित किया जा सके।
उद्देश्य:
राज्य में ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी केंद्रों को जोड़ने वाली सड़कों में सुधार कर ग्रामीण लोगों को बेहतर बाज़ार, रोज़गार के अवसर और सेवाएँ उपलब्ध कराना।
राज्य के प्रमुख शहरों और कस्बों तक बेहतर आवागमन का विस्तार करना जिससे विकास और आजीविका के अवसर में वृद्धि हो सके। उल्लेखनीय है कि ऐसे उपाय लोगों की आय में असमानता को कम करने में सहायक साबित हो सकते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सर्वोत्तम कार्य प्रणाली के माध्यम से सड़क सुरक्षा हेतु एक रूप-रेखा तैयार करना। इस रूप-रेखा से सड़क दुर्घटना में कम आएगी।
ADB द्वारा प्रदत इस ऋण का उद्देश्य सड़कों की रख-रखाव प्रणाली में सुधार भी करना है।
ADB के अन्य वित्तीय सहयोग:
गौरतलब है कि पूर्व में एशियाई विकास बैंक द्वारा COVID-19 से निपटने हेतु भारत को 2.2 बिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता का आश्वासन दिया गया है।
COVID-19 के मद्देनज़र ADB ने भारत सहित विकासशील सदस्य देशों की आपातकालिक ज़रूरतों को पूरा करने हेतु लगभग 6.5 बिलियन डॉलर के प्रारंभिक पैकेज की घोषणा की है।
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अनुमान के अनुसार, उत्तर प्रदेश और बिहार में देश के कुल अंतर-राज्य प्रवासियों का क्रमशः 25 प्रतिशत और 14 प्रतिशत हिस्सा है, इसके बाद राजस्थान (6 प्रतिशत) और मध्य प्रदेश (5 प्रतिशत) का स्थान है। इसका अर्थ है कि तकरीबन 4-6 मिलियन लोग उत्तर प्रदेश में और 1.8-2.8 मिलियन बिहार में वापस लौटेंगे।
प्रवासियों की आजीविका
वर्ष 2017 से वर्ष 2019 के मध्य CSDS द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 22 प्रतिशत प्रवासियों की मासिक घरेलू आय 2,000 रुपए है।
वहीं 32 प्रतिशत प्रवासियों की आय 2,000 रुपए से 5,000 रुपए के मध्य, 25 प्रतिशत प्रवासियों की आय 5000 रुपए से 10000 रुपए के मध्य, 13 प्रतिशत प्रवासियों की आय 10000 रुपए से 20000 रुपए के मध्य और केवल 8 प्रतिशत प्रवासियों की आय 20000 से अधिक है।
अर्थव्यवस्था में प्रवासी श्रमिकों की भूमिका
भारत में रह रहे लाखों प्रवासी कामगार हैं जो मुख्य रूप से निर्माण उद्योग, घरेलू सहायक और सड़क विक्रेताओं (Street Vendors) के रूप में कार्य करते हैं। अनुमान के अनुसार, तकरीबन एक तिहाई प्रवासी निर्माण क्षेत्र में कार्यरत हैं।
अधिकांश प्रवासी श्रमिक निर्माण क्षेत्र, ईंट निर्माण उद्योग, खनन और उत्खनन उद्योग, होटल तथा रेस्तरां आदि में कार्यरत हैं।
विदित हो कि ये सभी क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के अभिन्न अंग हैं, और देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में उल्लेखनीय योगदान देते हैं।
देश में अधिकांश प्रवासी श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिसके कारण इनके संबंध में किसी भी प्रकार के आधिकारिक आँकड़े का अभाव है।
प्रवासी मज़दूरों की समस्या
भारत जैसे विशाल देश में अभी तक प्रवासी समुदाय के आकार और महत्त्व को सही ढंग से पहचाना नहीं जा सका है। इस समुदाय के संबंध में आधिकारिक आँकड़े का अभाव इनके विकास में एक बड़ी बाधा के रूप में सामने आया है।
अधिकांश शहरी क्षेत्रों में प्रवासियों को पीने के पानी, बिजली, सुरक्षित घरों जैसी सुविधाओं के अभाव में प्रवासी मज़दूरों को छोटी और गंदी बस्तियों में रहना पड़ता है, जिसके कारण उनके लिये सोशल डिस्टेंसिंग जैसे सामाजिक मानकों का पालन करना काफी मुश्किल होता है।
दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में प्रवासी श्रमिकों की संख्या इतनी अधिक है कि उन्हें अपनी आवश्यकता के अनुसार कार्य ही नहीं मिल पाता है और यदि कार्य मिलता भी है तो काफी कम वेतन पर, जिससे वे शोषण के प्रति भी काफी संवेदनशील होते हैं।
रोज़गार की अस्थायी प्रकृति के कारण प्रवासी मज़दूरों को अक्सर अपराधी के रूप में देखा जाता है और सोशल मीडिया ने इस मानसिकता को और अधिक बढ़ावा दिया है।
आगे की राह
सर्वप्रथम आवश्यक है कि प्रवासियों को भी भारतीय समाज के एक विशिष्ट हिस्से के रूप में मान्यता दी जाए और नीति निर्माण के समय प्रवासियों के मुद्दों पर भी विचार किया जाए।
उन प्रतिबंधों को शिथिल किया जाना चाहिये जो प्रवासियों को उनके गंतव्य शहरों में राशन जैसे महत्त्वपूर्ण लाभ प्राप्त करने से रोकते हैं।
प्रवासी मज़दूरों के लिये देश के हर राज्य में मनरेगा, उज्ज्वला, सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी योजनाओं को उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जानी चाहिये।
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National Human Rights Commission-(NHRC) ने गृह मंत्रालय समेत रेलवे बोर्ड और बिहार तथा गुजरात सरकार को ‘श्रमिक स्पेशल ट्रेनों’ में यात्रा कर रहे कुछ प्रवासी श्रमिकों की कथित मौत और भोजन तथा पानी के अनुचित प्रबंधन को लेकर नोटिस जारी किया है।
प्रमुख बिंदु
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने नोटिस में ‘श्रमिक स्पेशल ट्रेनों’ के देर से शुरू होने के साथ-साथ उनके अपने गंतव्य स्थान तक कई दिनों में पहुँचने जैसी बातों का उल्लेख किया है।
NHRC ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि प्रवासी मज़दूर लंबी अवधि और पीने के पानी तथा भोजन की व्यवस्था के अभाव में अपनी यात्रा के दौरान अपनी जान गंवा रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि बीते कुछ दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनसे ‘श्रमिक स्पेशल ट्रेनों’ की छवि धूमिल हुई है। उदाहरण के लिये देश के कई क्षेत्रों में कथित तौर पर भूख के कारण ‘श्रमिक स्पेशल ट्रेनों’ में लोगों की मौत की खबरें सामने आए हैं।एक अन्य घटना में एक ‘श्रमिक स्पेशल ट्रेन’ को अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचने के लिये 9 दिनों का समय लगा।
मानवाधिकार आयोग का मानना है कि यदि इस प्रकार की घटनाएँ सत्य हैं तो इनसे देश के भीतर काफी व्यापक स्तर पर श्रमिकों के मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
श्रमिक स्पेशल ट्रेन
केंद्र सरकार ने COVID-19 महामारी के मद्देनज़र लागू किये गए देशव्यापी लॉकडाउन को देखते हुए 1 मई (मज़दूर दिवस) को देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे श्रमिकों को अपने गृह राज्यों तक वापस पहुँचाने के लिये ‘श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की शुरुआत की थी।
इस प्रकार की पहली विशेष ट्रेन हैदराबाद से हटिया, झारखंड के लिये रवाना की गई थी।
रेल मंत्रालय के अनुसार, 28 मई, 2020 तक देश भर के विभिन्न राज्यों से 3736 ‘श्रमिक स्पेशल’ ट्रेनें चलाई गई हैं और इन विशेष ट्रेनों के माध्यम से अब तक 50 लाख से अधिक लोगों को उनके गृह राज्य तक पहुँचाया गया है।
प्रवासी श्रमिक- एक बार पुनः चर्चा में
कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के कारण लागू किये गए देशव्यापी लॉकडाउन ने बीते कुछ दिनों में भारत के उस वर्ग विशिष्ट को एक बार पुनः चर्चा में ला दिया है, जो कार्य और आजीविका की तलाश में अपने गृह राज्य से बाहर रहते हैं।
हालाँकि देश में अंतर-राज्य प्रवासियों (Inter-State Migrants) का कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं है, किंतु वर्ष 2011 की जनगणना, NSSO के सर्वेक्षण और आर्थिक सर्वेक्षण पर आधारित अनुमान के अनुसार, देश में कुल 65 मिलियन अंतर-राज्य प्रवासी हैं, जिसमें से 33 प्रतिशत प्रवासी श्रमिक हैं।
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (CSDS) और अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा संयुक्त रूप से वर्ष 2019 में किये गए एक अध्ययन के अनुसार, भारत के बड़े शहरों में 29 प्रतिशत आबादी दैनिक वेतनभोगी है।यह उन्ही लोगों की संख्या है जो अपने गृह राज्य वापस जाना चाहते हैं, क्योंकि दैनिक वेतनभोगी होने के कारण मौजूदा लॉकडाउन के कारण इनकी आजीविका के सभी साधन बंद हो गए हैं और ऐसे में इन लोगों के लिये बड़े शहरों में रहना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।
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अमेरिका के 'प्रतिनिधि सभा' (House of Representatives) ने ‘उइगर मानवाधिकार विधेयक’ (Uighur Human Rights Bill) को मंज़ूरी दी है। विधेयक में ट्रंप प्रशासन से चीन के उन शीर्ष अधिकारियों को दंडित करने की मांग की गई है जिनके द्वारा अल्पसंख्यक मुसलमानों को हिरासत में रखा गया है।
प्रमुख बिंदु:
विधेयक के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति को चीन में मुसलमानों के खिलाफ होने वाली अपराध की निंदा करनी होगी तथा शिनजियांग प्रांत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में शिविरों को बंद करने की अपील करनी होगी।
यह विधेयक वरिष्ठ चीनी अधिकारियों; जिनमें शिनजियांग कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव आदि शामिल हैं, के खिलाफ प्रतिबंधों का आह्वान करता है।
विधेयक में शामिल अन्य प्रावधान:
इस विधेयक के अनुसार, अमेरिका के राज्य सचिव को शिनजियांग प्रांत में पुन: शिक्षा और जबरन श्रम शिविरों में रखे गए लोगों की संख्या की जानकारी देनी होगी।
विधेयक, उन प्रौद्योगिकी को चीन को निर्यात कने पर प्रतिबंध लगाता है जो चेहरे तथा आवाज के आधार पर व्यक्तिगत पहचान और निगरानी करने में उपयोग किया जा सकता है।
उइगर मुस्लिम (Uighur Muslim):
उइगर मुस्लिम चीन के शिनजियांग प्रांत में निवास करने वाले अल्पसंख्यक हैं।
चीन के शिनजियांग प्रांत में इनकी जनसंख्या तकरीबन 40 प्रतिशत है।
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के विशेषज्ञों के अनुसार, कम से कम 1 मिलियन उइगर मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समूहों को शिनजियांग प्रांत के शिविरों में नज़रबंद रखा गया है।
चीन का पक्ष:
चीनी सरकार ने लगातार दावा किया है कि वह शिनजियांग प्रांत के शिविरों में लोगों को ‘स्वैच्छिक शिक्षा’ और ‘व्यावसायिक प्रशिक्षण’ प्रदान कर रहा है।
चीन ने उइगरों तथा अन्य अल्पसंख्यकों के साथ दुर्व्यवहार संबंधित घटनाओं से इनकार किया है। चीन के अनुसार, वह उइगरों तथा अन्य अल्पसंख्यकों को इस्लामी चरमपंथ तथा अलगाववाद से बाहर लाने के लिये उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण दे रहा है।
अमेरिका का पक्ष:
अमेरिका का मानना है शिनजियांग में आधुनिक नज़रबंदी के शिविर हैं जहाँ होलोकॉस्ट (बड़े स्तर पर नरसंहार) के बाद इतने बड़े स्तर पर लोगों का दमन किया जा रहा है।
अनेक लीक हुए दस्तावेज़ों के अनुसार, शिविरों को उच्च सुरक्षा वाली जेलों के रूप में चलाया जा रहा है, जिसमें कठोर अनुशासन, दंड की व्यवस्था है तथा इन शिविरों से किसी को बाहर जाने की अनुमति नहीं है।
भारत का हित:
अनेक मुस्लिम बहुसंख्यक देशों का मानना है कि भारत, चीन की ‘मुस्लिम अल्पसंख्यक नीति’ का खुलकर विरोध नहीं करता है, क्योंकि भारत खुद कश्मीर जैसे क्षेत्रों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ कठोर नीति को बढ़ावा दे रहा है।
क्यों लाया गया उइगर मानवाधिकार विधेयक?
हाल ही में चीन की संसद के समक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा पर मसौदा प्रस्तुत किया गया था, जो पहली बार चीन की सरकार को हॉन्गकॉन्ग के लिये राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों का मसौदा तैयार करने तथा इस ‘विशेष प्रशासनिक क्षेत्र में अपने राष्ट्रीय सुरक्षा अंगों को संचालित करने की अनुमति देता है।
चीन के इस मसौदे को प्रस्तुत करने के बाद अमेरिकी संसद द्वारा हांगकांग में सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन को समर्थन देने वाले कानून को पेश किया गया।
अमेरिकी संसद में हॉन्गकॉन्ग प्रदर्शन के समर्थन देने वाले कानून को पेश करने के बाद चीन ने प्रतिक्रिया में कहा था कि अमेरिकी सैन्य जहाज़ों और विमानों को हॉन्गकॉन्ग जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी साथ ही अमेरिका के कई ‘गैर-सरकारी संगठनों’ के खिलाफ प्रतिबंधों की घोषणा भी की गई।
आगे की राह:
विधेयक पर अभी सीनेट के अनुमोदन की आवश्यकता है, जिसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास अनुमोदन के लिये भेज जाएगा। जहाँ राष्ट्रपति ट्रंप विधेयक पर हस्ताक्षर अथवा वीटो कर सकते हैं।
राष्ट्रपति को 120 दिनों के भीतर ज़िम्मेदार अधिकारियों की सूची बनाकर, उन पर कार्यवाही करनी होगी।
उइगर मानवाधिकार विधेयक बिल के पारित होने के बाद चीन और अधिक मज़बूत प्रतिक्रिया कर सकता है जिससे अमेरिका और चीन के मध्य विवाद और अधिक गहरा सकता है।
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मध्यप्रदेश में जलविद्युत परियोजनाओं एवं बहुउद्देशीय परियोजनाओं का वित्तपोषण
Financing Hydro-electric projects & Multipurpose projects in Madhya Pradesh
‘ऊर्जा वित्त निगम’ (Power Finance Corporation- PFC) ने मध्य प्रदेश में 22,000 करोड़ रुपए की 225 मेगावाट क्षमता वाली पनबिजली परियोजनाओं एवं बहुउद्देशीय परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिये ‘नर्मदा बेसिन प्रोजेक्ट कंपनी लिमिटेड (NBPCL) के साथ एक समझौता किया है।
प्रमुख बिंदु:
‘ऊर्जा वित्त निगम’ (PFC), केंद्रीय विद्युत मंत्रालय के तहत एक सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSU) है और भारत की अग्रणी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (Non-Banking Financial Company-NBFC) भी है।
‘नर्मदा बेसिन प्रोजेक्ट्स कंपनी लिमिटेड’ (NBPCL) मध्य प्रदेश सरकार के पूर्ण स्वामित्त्व वाली कंपनी है।
इस समझौते के तहत वित्तपोषित की जाने वाली कुछ प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएँ हैं:
बसनिया बहुउद्देशीय परियोजना, डिंडोरी
चिंकी बोरस बहुउद्देशीय परियोजना नरसिंहपुर रायसेन, होशंगाबाद
सक्कर पेंच लिंक नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा
दूधी परियोजना छिंदवाड़ा होशंगाबाद आदि।
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पांच भारतीय शांति रक्षकों को मरणोपरांत ‘दैग हैमरस्कोल्द पदक’
पांच भारतीय शांति रक्षकों समेत 83 सैन्य, पुलिस और असैन्य कर्मियों को मरणोपरांत प्रतिष्ठित संयुक्त राष्ट्र पदक से इस हफ्ते सम्मानित किया जाएगा। इन सभी ने संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षा अभियानों में भाग लेते हुए पिछले साल अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। बता दें कि पदक का नाम संयुक्त राष्ट्र के दूसरे महासचिव के नाम पर रखा गया है। इनकी 1961 में एक रहस्यमयी विमान दुर्घटना में मौत हो गई थी। बाद में इन्हें मरणोपरांत नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
दक्षिण सूडान में संयुक्त राष्ट्र के मिशन में सेवा देने वाले मेजर रवि इंदर सिंह संधू और सार्जेट लाल मनोत्रा तरसेम, लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल में सार्जेट रमेश सिंह, यूएन डिसएंगेजमेंट ऑब्जर्वर फोर्स में काम करने वाले पी. जॉनसन बेक और कांगो में संयुक्त राष्ट्र के मिशन में काम करने वाले एडवर्ड ए पिंटो को 29 मई को अंतरराष्ट्रीय संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दिवस पर मरणोपरांत दैग हैमरस्कोल्द पदक दिया जाएगा।
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अंतरिक्ष स्टार्टअप कंपनी वेस्टास्पेश टैक्नालाजी
अंतरिक्ष स्टार्टअप कंपनी वेस्टास्पेश टैक्नालाजी ने कहा कि वह देश में 5जी सेवाओं के लिये सितंबर से 35 से अधिक उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजना शुरू करेगी। कंपनी 2021 तक इस नई पीढी का नेटवर्क चालू करना चाहती है। वेस्टास्पेश के नवोन्मेषी समाधान को देश और दुनिया में पहुंचाने के लिये वेस्टास्पेश को अमेरिका स्थित नेक्स्ट केपिटल एलएलसी से एक करोड़ रुपये का वित्तपोषण प्राप्त हुआ है। यह अमेरिका की निवेश और सलाहकार कंपनी है।
क्या है कंपनी की योजना?
वेस्टास्पेश टैक्नालाजीज के संस्थापक एवं सीईओ अरुण कुमार सुरेबन ने कहा कि नई पीढी के उपग्रह का शुरुआती संस्करण सितंबर 2020 में छोड़ने की योजना है। इसके साथ ही 2021 की शुरुआत में पूरी तरह से परिचालन वाले उपग्रहों को अंतरिक्ष की निचली कक्षा अथवा मू-समकालिक भूमध्य रेखीय कक्षा में स्थापित किया जाएगा।
5जी सेवाओं के देशभर में कवरेज सुनिश्चित करने के लिये हम 35 से अधिक उपग्रहों को अंतरिक्ष में छोड़ने जा रहे हैं। इसके जरिये हम फाइबर नेटवर्क का विकल्प भी उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहे हैं। किसी भी 5जी फोन को सीधे उपग्रह से सिगनल प्राप्त होंगे। हमें 2021 की शुरुआत में ही परिचालन शुरू होने की उम्मीद है। कंपनी 5जी परिचालन के लिये 28गीगाहट्र्ज बैंड के स्पेक्टूम के लिये दूरसंचार विभाग से बातचीत कर रही है।
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My Son Temple ( माई सन टेंपल)
चर्चा में क्यों?
हाल ही में वियतनाम में स्थित माई सन टेंपल में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा खुदाई के दौरान बलुआ पत्थर का विशाल शिवलिंग की प्राप्ति हुई है। इसके पहले भी इस मंदिर परिसर सेकई मूर्तियां और कलाकृतियां प्राप्त हुई है जिसमें भगवान राम और सीता की शादी की कलाकृति और नक्काशीदार शिवलिंग प्रमुख हैं।
माई सन टेंपल के बारे में
माई सन टेंपल परिसर दक्षिण एशियाई देश वियतनाम के क्वांग नाम प्रांत के दुय फू गांव के पास स्थित है। मंदिर परिसर करीब दो किलोमीटर लंबी-चौड़ी घाटी में स्थित है जो दो पहाड़ों से घिरा हुआ है। वियतनाम स्थित ‘माई सन मंदिर’ समेत अन्य मंदिरों पर हिंदू धर्म का प्रभाव है और यहां कृष्ण, विष्णु तथा शिव की मूर्तियां हैं।
कौन थे इन मंदिरों के निर्माता?
यहां पर बड़ी मात्रा में परित्यक्त और आंशिक रूप से ध्वस्त हिन्दू मंदिर स्थित हैं जिनका निर्माण चंपा के राजाओं ने चौथी से 14वीं शताब्दी के बीच कराया था। आपको बता दें इन मंदिरों की व्यापक श्रृंखला विश्व विरासत स्थल में शामिल ‘माई सन सेंचुरी’ में स्थित है। इन मंदिरों में से अधिकांश मंदिर अमेरिका वियतनाम युद्ध (1955 से 1975) के दौरान नष्ट हो गए।
प्राचीन काल में वियतनाम में स्थित चंपा क्षेत्र एक हिंदू राज्य था एवं यहां पर हिंदू संस्कृति का बोलबाला था। इस क्षेत्र में स्थानीय समुदाय चम का शासन दूसरी शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक रहा था। चम समुदाय में अधिकांश लोग हिंदू धर्म एवं संस्कृति से संबंधित थे, लेकिन आगे चलकर इस समुदाय के अधिकांश लोगों ने बौद्ध और इस्लाम धर्म को अपना लिया।
वर्तमान में चम समुदाय की आबादी 170,000 है जो यहाँ के तीन प्रांतों में फैले हैं जिनमें हिंदुओं की आबादी 100,000 से ऊपर है । चंपा क्षेत्र में स्थित कुछ मंदिरों में आज भी पूजा होती है।
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28 मई, 2020 को परिसीमन आयोग ने अप्रैल, 2020 में अपनी बैठक के दौरान दिए गए निर्देशों की प्रगति की समीक्षा के लिए एक बैठक आयोजित की।
मुख्य बिंदु
राज्य चुनाव आयुक्त का विवरण मणिपुर, आंध्र प्रदेश, केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और असम के राज्यों से प्राप्त किया गया। जनगणना के आंकड़े भी रजिस्ट्रार जनरल से प्राप्त किए गए हैं।
परिसीमन क्या है?
परिसीमन राज्य विधानसभा और लोकसभा सीटों की सीमाओं को जनसंख्या में परिवर्तन के संबंध में फिर से परिभाषित करने का कार्य है। परिसीमन का मुख्य उद्देश्य विधान सभा और संसद में समान जनसंख्या के समान क्षेत्रों में समान प्रतिनिधि प्रदान करना है। परिसीमन आयोग द्वारा परिसीमन का कार्य किया जाता है।
परिसीमन आयोग
अनुच्छेद 82 के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद संसद द्वारा परिसीमन अधिनियम लाया जाता है। यह आयोग सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्यों के चुनाव आयुक्तों से बना होता है।
परिसीमन का कार्य चार बार किया गया है। परिसीमन 1952, 1963, 1973 और 2002 में लागू किया गया था। अंतिम परिसीमन 2002 में शुरू हुआ था और 2001 की जनगणना के आधार पर 2008 में समाप्त हुआ था।
हाल के दिनों में कोई परिसीमन क्यों नहीं हुआ?
किसी राज्य को आवंटित लोकसभा सीटों की संख्या उस संख्या और राज्य की जनसंख्या के बीच के अनुपात पर आधारित होती है। हालाँकि, इस प्रावधान के तहत, जनसंख्या नियंत्रण में कम रुचि लेने वाले राज्यों का अधिक प्रतिनिधित्व था।
1976 में, आपातकालीन अवधि के दौरान, परिसीमन को 2001 तक निलंबित कर दिया गया था। इसे बाद में 2026 तक बढ़ा दिया गया था। इस प्रकार, हाल के दिनों में कोई परिसीमन नहीं किया गया।
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उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में 800 किलोमीटर सड़क में हर्बल रोड्स प्रोजेक्ट को लागू करने का निर्णय लिया है।
मुख्य बिंदु
इस परियोजना के तहत, राज्य सरकार सड़क के दोनों ओर औषधीय मूल्यों वाले पौधों का रोपण करेगी। इन औषधीय पेड़-पौधों में नीम, पीपल, सहजन आदि शामिल हैं। यह पौधे औषधियों के लिए कच्चा माल प्रदान करेंगे और भूमि के कटाव को रोकने में भी मदद करेंगे। इस परियोजना के लिए 800 किलोमीटर की सड़क को राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग के साथ चुना गया है।
महत्व
यह परियोजना 18 जिलों में शुरू की गई थी। इस तरह की पहल को दिल्ली-यमुनोत्री स्टेट हाईवे 57 में पहले ही लागू किया जा चुका है। इसमें लगभग 34 किस्म के औषधीय पेड़ लगाए जायेंगे।
इस परियोजना का उद्देश्य घरों में बोनसाई और कैक्टस जैसी गैर-देशी प्रजातियों के विकास को कम करना है।
लाभ
ब्राह्मी का पौधा स्मृति को तेज करता है, अश्वगंधा का उपयोग सामान्य कल्याण में किया जाता है। उल्लेखनीय है कि अश्वगंधा को हाल ही में COVID-19 से लड़ने के लिए अध्ययन में शामिल किया गया था। इसे हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है।
