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चीन का अर्थ ऑब्जरवेशन सैटेलाइट हैड-4
चीन ने रविवार को एक हाइ रिजॉल्यूशन सैटेलाइट लॉन्च किया है। इस सैटेलाइट के जरिए वो जमीन का सर्वे करेगा और इंटरनेट की नैरोबैंड का भी इस्तेमाल करेगा। इस सैटेलाइट का नाम हैड-4 है। इस सैटेलाइट को चीन के ग्यात्सू प्रांत में जियुक्वान सैटेलाइट लॉन्च सेंटर से छोड़ा गया है। ये सैटेलाइट काफी उच्च क्षमता वाली है। इसमें गॉफ़न-9 02 (Gaofen-9 02) और संकीर्ण इंटरनेट ऑफ थिंग्स (Internet of Things-IoT satellite) भी शामिल हैं। इस हैड-4 को लॉन्ग मार्च -2 डी रॉकेट द्वारा लॉन्च किया गया है।
इस सैटेलाइट को चाइना हेड एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी कंपनी द्वारा विकसित किया गया है और इसे वैश्विक जहाज नवीगा-टायन और वैश्विक उड़ानों के साथ-साथ IoT सूचनाओं का स्टेटस संग्रह करने का काम सौंपा गया है। Gaofen-9 02 एक ऑप्टिकल रिमोट सेंसिंग उपग्रह है जो मीटर से कम के रिज़ॉल्यूशन के साथ तस्वीरें प्रदान करने में सक्षम है। इसका उपयोग भूमि सर्वेक्षण, शहरी नियोजन, सड़क नेटवर्क डिजाइन, कृषि और आपदा राहत में किया जाएगा।
चीन इस उपग्रह की मदद से मिले चित्रों के जरिए प्रस्तावित बेल्ट और सड़क के निर्माण में इस्तेमाल करेगा। जिन क्षेत्रों में अभी तक चीन इस तरह से विकास के काम नहीं कर पा रहा था वहां पर इस उपग्रह के जरिए मिलने वाले चित्रों का अध्ययन करने के बाद काम किया जा सकेगा।
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डिप्लोमैटिक इम्युनिटी
चर्चा में क्यों?
पाक हाई कमीशन के दो अधिकारियों को जासूसी करते रंगे हाथों पकड़ा गया है, जिनका नाम आबिद हुसैन और ताहिर हुसैन है। विदेश मंत्रालय के अनुसार दोनों को पर्सन नॉन-ग्रेटा यानी अवांछित व्यक्ति घोषित कर दिया गया है और उन्हें 24 घंटे में देश छोड़ना होगा।
पाकिस्तान हाई कमीशन के इन दोनों लोगों पर भारत में मुकदमा इसलिए नहीं चलाया जा सकता है क्योंकि ये लोग डिप्लोमैट यानी राजनयिक हैं। डिप्लोमैटिक इम्युनिटी के तहत किसी भी राजनयिक पर दूसरे देश में मुकदमा नहीं चल सकता है। ये एक तरह का अंतरराष्ट्रीय कानून है, जो राजनयिकों को दूसरे देश में सुरक्षा देता है।
क्या है डिप्लोमैटिक इम्युनिटी?
डिप्लोमैटिक इम्युनिटी के तहत किसी भी देश के राजनियक और उसके परिवार की दूसरे देश में सुरक्षा करनी होती है। यानी जैसे पाकिस्तान का राजनयिक है तो उसकी भारत में हर हाल में सुरक्षा करनी होगी। ठीक ऐसे ही भारत के राजनयिक को पाकिस्तान में वहां की पुलिस या सेना कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकती। देशों के पास सिर्फ इतना ही विकल्प होता है कि राजनयिक अगर किसी गैर-कानूनी काम में लिप्त पाया जाता है तो उसे उसके देश वापस भेज दिया जाए। 1961 की वियना कन्वेंसन ऑन डिप्लोमैटिक रिलेशन्स के जरिए इसे लागू किया गया है।
कहां से आई से डिप्लोमैटिक इम्युनिटी?
डिप्लोमैटिक इम्युनिटी का कॉन्सेप्ट आज से नहीं, बल्कि रामायण-महाभारत के वक्त से है। यानी डिप्लोमैटिक इम्युनिटी 1 लाख साल पुरानी परंपरा है, जिसमें वक्त के साथ थोड़ बहुत बदलाव होते रहे हैं। तब भी किसी भी राजदूत को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता था। जब रावण ने हनुमान जी को मारने का आदेश दिया था तो उसके छोटे भाई विभीषण ने तुरंत कहा था कि नियम के मुताबिक किसी भी राजनयिक को नहीं मारा जा सकता है।
राजनयिक को कब हिरासत में लिया जा सकता है?
अगर किसी राजनयिक से कोई खतरा हो, सिर्फ तभी उसे हिरासत में लिया जा सकता है। वो भी ये सुनिश्चित करते हुए कि उसे कोई चोट ना पहुंचे।
किस स्थिति में दूसरे देश में चल सकता है राजनयिक पर मुकदमा?
ऐसा सिर्फ एक ही स्थिति में हो सकता है जब राजनयिक पर से डिप्लोमैटिक इम्युनिटी को हटा लिया जाए और ऐसा सिर्फ राजनियक का देश ही कर सकता है। हालांकि, अपने ही राजनयिक पर दूसरे देश में मुकदमा चलना शर्म की बात होती है, इसलिए ऐसा होता बहुत ही कम है। हां वो बात अलग है कि राजनयिक के देश वापस आने के बाद वहां पर उसके खिलाफ कोई मुकदमा चलाया जाए।
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भारतीय पशुओं की कम दुग्ध उत्पादन क्षमता के कारण दुग्ध उत्पादन की लागत बहुत उच्चहै। उदाहरण के लिए भारत में औसतन उत्पादन प्रतिवर्ष प्रति पशु 1806 किलोग्राम है, जबकि वैश्विक औसत प्रतिवर्ष प्रति पशु 2310 किलोग्राम है वहीं डेनमार्क में यह 6273 किग्रा प्रति वर्ष।
भारत में दुग्ध अवसंरचना के प्रसंस्करण एवं भंडारण हेतु बुनियादी अवसंरचना लगभग ना के बराबर है जिससे इस क्षेत्र में मूल्य संवर्धन नहीं हो पाता
विकसित देशों में जहां पर बड़ी डेयरी कंपनियां डेयरी फार्म ऊपरनिर्भर है तो वहीं भारत में डेयरी फार्मिंग का अभी विकास नहीं हुआ है और यह एक मात्र निर्वाह गतिविधि है।
जहां विकसित देशों में डेरी फार्मिंग की गतिविधियां व्यापक स्तर पर होती हैं तो वहीं भारत में प्रमुख दुग्ध उत्पादन लाखों छोटे उत्पादकों से होता है जिनके पास औसतन एक या दो दुधारू पशु होते हैं
जहां विदेशों में अधिकांश दुग्ध उत्पादन का विपणन संगठित क्षेत्र के द्वारा होता है वही भारत में यह मात्र 20% है जबकि बाकी दुग्ध विपणन असंगठित क्षेत्र के द्वारा होता है।
विकसित देशों के विपरीत भारत में दुग्ध उत्पादन एवं आपूर्ति श्रृंखला में छोटे विक्रेताओं एवं स्थानीय उत्पादकों के कारण आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है एवं दुग्ध उत्पादन की लागत भी बढ़ जाती है।
भारत में दुग्ध उत्पादन में स्वच्छता के बुनियादी मानकों का पालन नहीं किया जाता इसके साथ ही दुग्ध में कीटाणुओं और जीवाणुओं के कारण 68.5% दूषित दुग्ध की आपूर्ति होती है।
भारत में दुग्ध विपणन श्रृंखला में 80% से ज्यादा हिस्सा तरल दूध का होता है जबकि इसके प्रसंस्करण पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता
इस तरह की आपूर्ति श्रृंखला, अक्षमताओं को स्पष्ट रूप से प्रभावित करती है, जहां उत्पादित दूध का एक बड़ा हिस्सा स्वच्छता के बुनियादी मानकों का पालन नहीं करता है।
डेयरी क्षेत्र का SWOT(क्षमता, चुनौतियां और आसन्न खतरे) विश्लेषण
1. डेयरी क्षेत्र के विकास की क्षमता
भारत में व्यापक मात्रा में उपलब्ध पशुधन की आबादी जिससे सतत पुनरुत्पादनके द्वारा भविष्य में आपूर्ति और उद्योग के विकास को जारी रखा जा सकता है। भारत में कुछ प्रमुख दूध उत्पादक नस्ल-
गायों की प्रमुख देशी नस्लें : साहिवाल,लाल सिन्धी, गीर,थपाकर,काकरेज
प्रमुख गायों की विदेशी नस्लें: जर्सी (जर्सी द्वीप),हौल्सटी- फ्रीजियन (नीदर लैण्ड), ब्राउन स्विस (स्विटजरलैण्ड)
संकर गाय:1. करन फ्रीज, करन स्विस-
भैसों की प्रमुख नस्लें: मुर्रा(हरियाणा एवं पंजाब), मेहसाना (गुजरात), सूरती (गुजरात), नीली-राबी (पंजाब)
यद्यपि भारतीय दुधारू पशुओं की उत्पादकता कम है लेकिन इन पशुओं के दुग्ध उत्पादन क्षमता में सुधार की व्यापक गुंजाइश है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में लगातार हो रही वृद्धि आय को बढ़ाएगी जिससे मध्यमवर्ग की क्रय शक्ति क्षमता में वृद्धि होगी एवं यह मांग को बनाए रखेगी।
भारतीय लोगों में दूध का उपयोग दैनिक आहार का हिस्सा है जो दूध की मांग में लगातार वृद्धि को आश्वस्त करती है।
कृषि के उपरांत फसल अवशिष्ट कम लागत के चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करती है जिससे दुग्ध उत्पादन की लागत कम रखने में मदद मिलेगी।
भारत में दुग्ध उत्पादन क्षेत्र में सहकारी संरचना का व्यापक विकास हुआ है जिससे दुग्ध सहकारी समितियां किसानों को दुग्ध का उचित मूल्य दिलाने में सक्षम है।
2. भारतीय डेयरी क्षेत्र की चुनौतियां
मिश्रित नस्ल और उच्च दुग्ध देने वाली पशुओं की सीमित मात्रा एवं डेयरी क्षेत्र में कम दूध देने वाली पशुओं की ज्यादा मात्रा
सड़क जैसे संचार मार्ग समेत अवसंरचना का कम विकास जिससे किसानों को प्रसंस्करण हेत कच्चे दूध की आपूर्ति में दिक्कत आती है।
भारत के अधिकांश डेरी फार्म आधुनिक वैज्ञानिक डेयरी तकनीकों से अनभिज्ञ हैं एवं वे स्वच्छ दुग्ध उत्पादन और एकीकृत आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने में अक्षम है।
इसके अलावा डेयरी उद्योग की कम विकास दर, निवेश पर कम रिटर्न, अनुसंधान की कमी, विश्वसनीय दुग्ध उत्पादन के डाटा का अभाव एवं डेयरी क्षेत्र में निवेशकों की कमी इस क्षेत्र की प्रमुख समस्या है।
3. डेयरी क्षेत्र पर आसन्न खतरे
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नगरीकरण और औद्योगिकरण के कारण दूध की मांग में वृद्धि से इस क्षेत्र पर दबाव ज्यादा है एवं अत्यधिक चराई से भूमि के क्षरण की संभावना लगातार बढ़ती जा रही है।
पशुओं के मिश्रित नस्लों के कारण कई सारे देसी नस्लों के अस्तित्व पर संकट आ गया है।
दूध में मिलावट और सिंथेटिक दूधों के कारण उपभोक्ता का विश्वास लगातार कम हो रहा है। इसी का कारण है कि लोग सोया मिल्क, कोकोनट मिल्क जैसे विकल्पों को बढ़ावा दे रहे हैं जिससे डेयरी के दूध की मांग में कमी आ रही है।
अभी भी दुग्ध उत्पादन क्षेत्र में मध्यस्थ लोगों का बोलबाला है जो दुग्ध उत्पादन की आपूर्ति श्रृंखला को व्यापक स्तर से लगातार प्रभावित कर रहे हैं जिससे एक और किसानों को कम मूल्य मिलता है तो वहीं उपभोक्ता को अधिक मूल्य देना पड़ता है।
किसानों में जागरूकता का घोर अभाव है उदाहरण के लिए सूक्ष्मजीव, रासायनिक संदूषक और अवशिष्ट एंटीबायोटिक दवाओं के संदर्भ में वह घोर अनभिज्ञता का परिचय देते हैं।
भारत में डेयरी उद्योग समेत पशुपालन उद्योग को बढ़ावा देने वाले कोर कार्यक्रम
राष्ट्रीय डेयरी योजना चरण I (NDP I)
गोजातीय प्रजनन और डेयरी विकासपर राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPBBDD)
राष्ट्रीय पशुधन मिशन (एनएलएम)
पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण (एलएच और डीसी)
डेयरी उद्यमिता विकास योजना (DEDS)
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY)
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम)
कोल्ड चेन के लिए स्कीम, वैल्यू एडिशन और संरक्षण अधोसंरचना
राष्ट्रीय गोकुल मिशन
एफएमडी और ब्रुसेलोसिस के लिए राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम
राष्ट्रव्यापी कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम (एनएआईपी)
गुणवत्ता दुग्धक कार्यक्रम
क्या होना चाहिए आगे की राह?
सरकार के द्वारा दुग्ध उत्पाद अवसंरचना निर्माण एवं इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना चाहिए । भारत द्वारा किसानों की 2 गुना आय बढ़ाने में इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है इसके लिए किसानों को उचित प्रशिक्षण, उच्च नस्ल के पशुओं की उपलब्धता, पशुओं की सार्वभौमिक ब्रीडिंग, पशु रोग नियंत्रण एवं चिकित्सकों का सर्वसुलभ होना इत्यादि कदम उठाना आवश्यक है। आपूर्ति श्रृंखला में मध्यस्थों का उन्मूलन आवश्यक है क्योंकि बिना इसके आपूर्ति श्रृंखला बढ़िया नहीं होगी एवं इससे ना किसानों को फायदा होगा और ना ही उपभोक्ता को। इसी के साथ किसानों को स्वयंसेवी संगठनों इत्यादि के द्वारा जागरूक बनाकर सतत कृषि को बढ़ावा देते हुए पशुपालन को ग्रामीण आजीविका का एक अभिन्न अंग बनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिये।
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विश्व दुग्ध दिवस पर भारतीय डेयरी क्षेत्र का एक समग्र अध्ययन
प्रतिवर्ष 1 जून को पूरे विश्व में विश्व दुग्ध दिवस (World Milk Day) मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य डेयरी क्षेत्र के विकास, दुग्ध उत्पादन गतिविधियां एवं दूध के पोषण संबंधी महत्त्व का प्रचार प्रसार करना है। खाद्य एवं कृषि संगठन के द्वारा वर्ष 2001 से प्रति वर्ष 1 जून को इस दिवस को मनाया जा रहा है। वर्ष 2020 विश्व दुग्ध दिवस की 20वीं वर्षगांठ है।
एक पौष्टिक आहार के रूप में दूधका महत्व
दूध में प्रोटीन,विटामिन (ए, बी 2, डी, के),फॉस्फोरस,मैग्नीशियम, आयोडीन,वसा (फैट)समेत कई महत्वपूर्ण खनिज पाए जाते हैं। दूध के नियमित सेवन से शरीर में कैल्शियम की पर्याप्त आपूर्ति होती है जो हड्डियों को मजबूत बनाती है। उच्च मात्रा में प्रोटीन बच्चों के शारीरिक विकास समेत बड़े लोगों के मांसपेशियों की मरम्मत करती है। दूध में विटामिन जहां शरीर के इम्यून सिस्टम को बढ़िया बनाता है वही बसा पर्याप्त मात्रा में शरीर को ऊर्जा उपलब्ध करवाती है।
भारत में दुग्ध क्रांति के जन्मदाता: डॉ॰ वर्गीज़ कुरियन
आज भारत दुग्ध उत्पादन में विगत कई वर्षों से दुनिया में प्रथम स्थान पर काबिज है। भारत की इस उपलब्धि की शुरुआतडॉ॰ वर्गीज़ कुरियन के दृष्टि पटल पर आने से प्रारंभ होती है। डॉ वर्गीज कुरियन ने प्रतिष्ठित दुग्ध ब्रांड अमूल को स्थापित करने एवं सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अमूल की सफलता से आशान्वित होकर तात्कालिक प्रधानमंत्रीलालबहादुर शास्त्री ने अमूल मॉडल को देश के अन्य स्थानों पर फैलाने के लिए राष्ट्रीय दुग्ध विकास बोर्ड (एनडीडीबी) का गठन 1965 में किया और डॉ. कुरियन को बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। डॉ वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में 1970 में ऑपरेशन फ्लड शुरू किया जिससे भारत में श्वेत क्रांति का आगाज हुआ और भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बन गया।
भारत में दुग्ध उत्पादनकी वर्तमान स्थिति
भारत में दुग्ध उत्पादन में पिछले 5 वर्षों से 6.4 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो रही है और यह 2014-15 के 146.3 मिलियन मेट्रिक टन से बढ़कर 2018-19 में 187.7 मिलियन मेट्रिक टन हो गया है।इसी तरह दूध की प्रति व्यैक्ति उपलब्ध2ता वर्ष 2013-14 के 307 ग्राम से बढ़कर वर्ष 2018-19 में 394 ग्राम के स्तिर पर पहुंच गई है।
वर्ष 2009 से वर्ष 2014 तक की अवधि के दौरान दूध उत्पा़दन की वार्षिक वृद्धि दर 4.2 प्रतिशत आंकी गई थी जो वर्ष 2014 से वर्ष 2019 तक की अवधि के दौरान बढ़कर 6.4 प्रतिशत हो गई है। वर्ष 2014 से वर्ष 2019 तक की अवधि के दौरान विश्वष दूध उत्पाादन की वार्षिक वृद्धि दर में 1.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इस उत्पादित दूध का लगभग 54 प्रतिशत बाजार में बेचे जाने के लिए अतिरिक्ति रूप से उपलब्धे है जबकि बाकी 46 प्रतिशत स्थानीय खपत के लिए गांवों में ही है। किसानों के पास उपलब्ध विपणन योग्य अतिरिक्तू दूध में से केवल 36 प्रतिशत संगठित क्षेत्र द्वारा सहकारिता और निजी क्षेत्र के माध्य्म से समान मात्रा में बेचा जा रहा है। शेष 64 प्रतिशत अतिरिक्त् दूध को भी विभिन्न हस्तक्षेपों के माध्यम से संगठित क्षेत्र के जरिए बेचे जाने की व्यवस्था करने की आवश्यकता है। पिछले 2 वर्षों के दौरान सहकारी क्षेत्र में दूध की खरीद लगभग 9 प्रतिशत की दर से बढ़ी है।
भारत में दुग्ध उत्पादन क्षेत्र की चुनौतियां
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श्रीमहेंद्रनाथपाण्डेय ने बताया कि हम न सिर्फ देश के श्रमिकों बल्कि वंदे भारत मिशन के द्वारा विदेशों से वापस आ रहे नागरिकों की ट्रेनिंग और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। साथ ही वापस आने वाले नागरिकों की “स्वदेश” यानी कि स्किल्ड वर्कर्स अराइवल डेटाबेस फ़ॉर एम्प्लॉयमेंट सपोर्ट कार्ड के माध्यम से स्किल मैपिंग की जानी है।इसके लिए हम उड्डयन मंत्रालय एवं विदेश मंत्रालय के साथ सामंजस्य स्थापित कर कार्य कर रहे हैं। इसके अलावा, मंत्रालय से सम्बद्ध संस्थानों से शिक्षण एवं ट्रेनिंग प्राप्त कर रहे छात्रों को किसी भी प्रकार की कठिनाइयों का सामना न करना पड़े, इसके लिए हमने कई पहल शुरू की थीं। बैठक में इन पहलों के क्रियान्वन से जुड़े मुद्दों पर भी विस्तृत चर्चा की गई।मंत्रालय ने बताया कि हमेशा से हमारा मुख्य फोकस उद्यमशीलता ही रहा है, और आज इस संकट की घड़ी में भी हम युवाओं को इस दिशा में आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रयासरत हैं।हमें भली भांति ज्ञात है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के सपने को पूरा करने के लिए युवाओं में उद्यमशीलता की भावना जागृत करना बहुत ज़रूरी है। क्योंकि आज का युवा अगर नौकरी के पीछे न भागते हुए, इसकी जगह यदि नौकरियों का सृजन करने वाला बनेगा तो हम जल्द ही आत्मनिर्भर भारत अभियान के लक्ष्य को प्राप्त करेंगे।
मंत्रालय ने बताया कि आने वाले समय को देखते हुए हम नए कौशलों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, क्योंकि अगर भविष्य के परिदृश्य में देखें तो चीजें बहुत तेजी से बदलने वाली हैं। इसलिए इसके महत्व को समझते हुए हम इसपर विशेष कार्ययोजना तैयार कर रहे हैं। इसके साथ ही हम ई-स्किलिंग पहल के माध्यम से, लोगों को उनके मौजूदा कौशल को बढ़ाने की संभावनाओं को नया आयाम दे रहे हैं। भले ही यह लॉकडाउन हमारे लिए बहुत सी समस्याएं लेकर आया है, लेकिन इसने हमें आपदाओं को अवसरों में बदलने तथा अपनीस्किल को ब्रश-अप एवं अपस्किल करने का एक बेहतरीन अवसर दिया है।
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कोविड-19 के बादके हालातों एवं विकास परियोजनाओं पर कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्री महेंद्र नाथ पाण्डेय ने की समीक्षा बैठक
एमएसडीई द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न अभियानों की महेंद्र नाथ पाण्डेय ने की समीक्षा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देशभर में कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम के लिए सरकार हरसंभव कोशिश कर रही है। ऐसे में कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्री श्री महेंद्र नाथ पाण्डेय ने कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में अपना योगदान दे रही स्किल इंडिया से जुड़ी इकाइयों के सहयोग तथा उनकी योजनाओं के प्रगति कार्य एवं इस वैश्विक महामारी के बाद की कार्ययोजनाओं को लेकर समीक्षा बैठक मंगलवारकोकी।इस दौरान उन्होंने मंत्रालयके वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कोविड-19 की रोकथाम एवं संकट काल में देश के प्रवासी श्रमिकों समेत वंदे भारत मिशन के तहत विदेशों से आ रहे कामगारों के लिए शुरू की जा रही परियोजनाओं एवं विभिन्न पहलों पर विस्तृत चर्चा की। इस बैठक में मुख्य रूप से डीजीटी, एनएसडीसी, जेएसएस समेत मंत्रालय से सम्बद्ध कई इकाइयों ने भाग लिया।
मंत्रालय के हवाले से बताया गया कि इस वैश्विक महामारी ने देश में बड़े पैमाने पर व्यवधान पैदा किये हैं, जोकि बहुत ही चिंताजनक हैं।प्रवासी श्रमिकों की बहुत बड़ी आबादी अपने गृहराज्यों की तरफ लौट चुकी है। इसके अलावा वंदे भारत मिशन के द्वारा विदेशों से भी नागरिक भारत लौट रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में इस रिवर्स माइग्रेशन से अर्थव्यवस्था पर बहुत ही बड़ा प्रभाव पड़ने की आशंका है, क्योंकि हम कोरोना के चलते पहले से ही काफी मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।
ऐसे में इन परिस्थितियों को संभालने के लिए मंत्रालय स्थानीय प्रशासन की सहायता से अपने सीमित संसाधनों के बल पर, गृह राज्यों को लौट चुके प्रवासी श्रमिकों को उनके घर के पास ही नौकरी उपलब्ध कराने की योजना पर कार्य कर रही है। इस योजना में कृषि क्षेत्र भी विशेष रूप से शामिल है, जो हमारे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालयइस योजना के लिए पहले से ही कार्य शुरू कर चुका है, लेकिन इसके साथ ही हमें प्रवासी श्रमिकों के एक व्यापक डेटाबेस के लिए राज्य सरकारों के समर्थन की आवश्यकता है। यह डेटाबेस री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग की आवश्यकताओं का आकलन करने के साथ ही अपने मौजूदा कौशलों की मैपिंग भी करेगा। मंत्रालय का सबसे अधिक फोकस शीर्ष श्रमबल प्रदान करने वाले राज्यों जैसे कि उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश और झारखंड पर है।
श्री महेंद्र नाथ पाण्डेय, मंत्री कौशल विकास एवं उद्यमशीलता ने कहा “ हम अपनेस्किल इंडियामिशन की सहायता से देश भर में आर्थिक गतिविधियों को चलाने हेतु कुशल श्रमबल उपलब्ध कराने की दिशा में पूरी प्रतिबद्धता एवं कर्त्तव्यनिष्ठा के साथ कार्य कर रहे हैं। चूंकि देश इस समय कोरोना के मुश्किल दौर से गुजर रहा है, इसलिए इस चुनौतीपूर्ण समय में हम सभी को संयम औरसावधानी के साथ आगे आकर एक दूसरे का समर्थन करने की आवश्यकता है, ताकि हम कंधे से कंधा मिलाकर इन विषम परिस्थितियों का सामना करने के लिए सक्षम हो सकें। इसके साथ ही मैंने सभी विभागों को प्रशिक्षण के पैमाने को बढ़ाने के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकी और ऑनलाइन पाठ्यक्रमों का उपयोग करने एवं राज्य के संबंधित अधिकारियों एवं राज्य कौशल निगमों को एक साथ मिलकर काम करने के निर्देश दिए हैं, ताकि स्थानीय स्तर पर श्रमिकों की स्किल मैपिंग, उत्थान और रोजगार से संबंधित सहायता सुनिश्चित की जा सके।यहीं नहीं हम प्रधानमंत्री जी के “वोकल फॉर लोकल” के संदेशपर अमल करते हुए श्रमिकों को उनके आवासों के पास ही रोजगार के ऐसे अवसर उपलब्ध करवाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिससे न सिर्फ इन श्रमिकों कि बल्कि घरेलु अर्थवयवस्था को भी एक नई गति मिल सकें।हमारा ध्यान लोकल उत्पादों पर रहेगा, ताकि उन्हें अधिक से अधिक प्रचारित कर एक स्वस्थप्रतियोगिता में लाया जा सकें। मुझे पूरी उम्मीद है कि आने वाले सालों में हम अपने स्किल वर्कफोर्स की मदद से एक अर्थ जगत में एक नई क्रांति लेकर आयेंगे।”
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केंद्रीय बिजली मंत्री ने बिजली में अखिल भारतीय रियल टाइम मार्केट लांच किया
भारतीय बिजली बाजार रियल टाइम के निकट पहुंचा
बिजली एवं नवीन तथा नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा कौशल विकास एवं उद्यमशीलता राज्य मंत्री श्री आर के सिंह ने 03 जून, 2020 को नई दिल्ली में वीडियो कांफ्रेंस के जरिये बिजली में अखिल भारतीय रियल टाइम मार्केट लांच किया। इसने भारतीय बिजली बाजार को विश्व में कुछ बिजली बाजारों के लीग में स्थापित कर दिया है, जिनके पास रियल टाइम मार्केट है।
कार्यक्रम के दौरान बोलते हुए, बिजली मंत्री ने रेखांकित किया कि रियल टाइम मार्केट पूरे भारत के क्रेताओं एवं विक्रेताओं के लिए उनकी बिजली आवश्यकताओं की पूर्ति को प्रचालन के वास्तविक समय के निकट लाने का एक संगठित मार्केट प्लेटफार्म है। रियल टाइम मार्केट लागू किए जाने से वास्तविक समय संतुलन उपलब्ध कराने के लिए बाजार में अपेक्षित लचीलापन आएगा, जबकि प्रणाली में उपलब्ध अधिशेष क्षमता का ईष्टतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।
रियल टाइम मार्केट एक दिन में प्रत्येक 30 मिनट के लिए होगा, जोकि समान मूल्य के साथ दोहरी पक्ष वाली नीलामी पर आधारित होगा। ‘गेट क्लोजर’ की अवधारणा बाजार प्रचालन के घंटों के दौरान अनुसूचियों में वांछित दृढ़ता लाने के लिए लागू की गई है। क्रेताओं एवं विक्रेताओं को प्रत्येक 15 मिनट के टाइम ब्लाक के लिए खरीद/बिक्री बोलियों को प्रस्तुत करने का विकल्प होगा। प्रस्तावित रियल टाइम मार्केट डिस्काम के लिए प्रतिस्पर्धी मूल्य पर बड़े बाजार में पहुंच के लिए एक वैकल्पिक तंत्र उपलब्ध कराएगा। दूसरी तरफ, जेनेरेटर भी अपनी गैर-अधिग्रहित क्षमता के साथ रियल टाइम मार्केट में भाग लेने के द्वारा लाभान्वित होंगे। लंबी अवधि के अनुबंध एवं इस बाजार में सहभागिता करने वाले जेनेरेटरों के लिए डिस्कामों के साथ लाभ साझा करने हेतु एक तंत्र उपलब्ध कराया गया है। नेशनल लोड डिस्पैच सेंटर-पोसोको रियल टाइम मार्केट संरचना में त्वरित लेनदेन तथा निपटान सुनिश्चित करने के लिए पावर एक्सचेंजों के साथ समन्वयन में आवश्यक आटोमेशन सुगम करा रहा है।
भारत सरकार का 2022 तक 175 जीडब्ल्यू आरई क्षमता का लक्ष्य पूरे भारत में त्वरित नवीकरणीय पैठ को प्रेरित कर रहा है। रियल टाइम मार्केट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन की अनिरंतर एवं परिवर्तनशील प्रकृति के कारण ग्रिड प्रबंधन की चुनौतियों को कम करने में मदद करेगा और इसलिए ग्रिड में नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों की उच्चतम मात्रा को समेकित करने में सहायता करेगा।
ऐसी उम्मीद की जाती है कि बोली लगाने के अल्प समय, तेज समय निर्धारण और परिभाषित प्रक्रियाएं (अर्थात गेट क्लोजर) से प्रतिभागी पूरे अखिल भारतीय ग्रिड में संसाधनों की सुविधा पा सकेंगे, जिससे प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा। इससे प्रभावी बिजली खरीद योजना निर्माण, कार्यक्रम निर्धारण, डिस्पैच एवं हैंडलिंग के साथ यूटिलिटीज द्वारा बेहतर पोर्टफोलियो प्रबंधन में मदद मिलेगी।
वितरण कंपनियां ईष्टतम तरीके से अपने पावर पर्चेज पोर्टफोलियों को प्रबंधित करने में सक्षम होंगी और उन्हें अत्यधिक क्षमता की आवश्यकता नहीं होगी। इससे बिजली खरीद की लागत ईष्टतमीकरण में मदद मिलेगी तथा भरोसेमंद आपूर्ति के साथ उपभोक्ताओं को सेवाएं दी जा सकेंगी क्योंकि बिजली की कोई भी अंतिम मिनट की खरीद आसानी से रियल टाइम मार्केट से की जा सकेगी। अंतिम मिनट के बदलावों के कारण लोड शेडिंग द्वारा ग्रिड को प्रबंधित करने की पहली की व्यवस्था से आसानी से बचा जा सकेगा। इस प्रकार सभी हितधारकों के लिए यह लाभ की स्थिति है। जेनरेटर को अपने अधिशेष को बेचने का अवसर मिलेगा, आरई जेनरेशन की परिवर्तनशीलता का बेहतर प्रबंधन होगा, पारेषण प्रणालियों का बेहतर उपयोग होगा, डिस्काम को बिजली बेचने या खरीदने का अवसर मिलेगा तथा अंत में उपभोक्ताओं को भरोसेमंद बिजली आपूर्ति हो सकेगी।
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वी एन दत्त ने एन एफ एल के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक का पदभार संभाला
श्री वीरेंद्र नाथ दत्त, निदेशक (विपणन), नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड - एन एफ एल ने कंपनी के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक का अतिरिक्त प्रभार संभाल लिया है। श्री दत्त अक्टूबर, 2018 से कंपनी में निदेशक (विपणन) के रूप में जुड़े हुए है।
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से एमबीए, श्री दत्त को फर्टिलाइजर उद्योग के अलावा गेल इंडिया और ओएनजीसी जैसी बड़ी सरकारी कम्पनियों में कार्य का 35 साल से अधिक का अनुभव है।
एनएफएल में कार्यभार ग्रहण करने से पहले, वह गेल (इंडिया) लिमिटेड में कार्यकारी निदेशक थे जहां वे कॉरपोरेट रणनीति, योजना और एडवोकेसी के अलावा कंपनी के देश भर में विपणन कारोबार के प्रभारी थे । वे महानगर गैस लिमिटेड, मुंबई के बोर्ड में निदेशक भी रह चुके हैं ।
1995 में गेल इंडिया में कार्यभार ग्रहण करने से पहले श्री दत्त ने ओएनजीसी में भी 10 साल तक कार्य किया है |
निदेशक (विपणन), एनएफएल के रूप में कार्य करते हुए श्री दत्त ने कंपनी की उर्वरक बिक्री को विगत दो वर्षों में 32 प्रतिशत वृद्धि के साथ 43 लाख मी.टन से 57 लाख मी.टन तक पहुँचाने में मुख्य भूमिका निभाई है । इस अवधि के दौरान, एनएफएल ने उर्वरक उद्योग में अखिल भारतीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।
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मंत्रिमंडल ने आयुष मंत्रालय के अंतर्गत अधीनस्थ कार्यालय के रूप में भारतीय औषध और होम्योपैथी (पीसीआईएमऔरएच) के लिए औषधकोष आयोग की स्थापना को मंजूरी दी
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने आयुष मंत्रालय के अंतर्गत अधीनस्थ कार्यालय के रूप में भारतीय औषध और होम्योपैथी (पीसीआईएमऔरएच) के लिए औषधकोष (फार्माकपीआ) आयोग की पुर्न स्थापना को अपनी मंजूरी दे दी है। इसमें गाजियाबाद में 1975 से स्थापित दो केन्द्रीय प्रयोगशालाओं- फार्माकपीआ लेबोरेट्री फॉर इंडियन मेडिसिन (पीएलआईएम) और होम्योपैथिक फार्माकपीआ लेबोरेट्री (एचपीएल) का विलय कर दिया गया है।
वर्तमान में 2010 से स्थापित आयुष मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय औषध और होम्योपैथी (पीसीआईएमऔरएच) के लिए औषधकोष आयोग एक स्वयत्तशासी संगठन है। विलय का उद्देश्य तीनों संगठनों की बुनियादी ढांचा सुविधाओं, तकनीकी मानव श्रम और वित्तीय संस्थानों का अधिकतम इस्तेमाल करना है ताकि आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी दवाओं के नतीजों के मानकीकरण में वृद्धि की जा सके जिससे प्रभावी नियंत्रण और गुणवत्ता नियंत्रण की दिशा में बढ़ा जा सकेगा।
विलय से औषधकोश और लिखे गए नुसखे के विवरण का प्रकाशन और आयुष दवाओं के मानकों का केन्द्रित और संसक्त विकास को बढ़ावा मिलेगा। इससे पीसीआईएमऔरएच की मिली हुई अवसंरचना और इसकी प्रयोगशालाओं में आवश्यक संशोधन करके और औषधि और प्रसाधन सामग्री नियम 1945 के प्रावधानों को अधिकार देकर कानूनी दर्जा प्रदान किया जा सकेगा। इस संबंध में स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक, औषध महानियंत्रक और आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी औषध तकनीकी सलाहकार बोर्ड (एएसयूडीटीएबी) के साथ सलाह-मशविरा किया जा चुका है जो औषधि और प्रसाधन सामग्री कानून 1940 के अंतर्गत एक वैधानिक संगठन है जो एएसएलटी औषधियों के नियंत्रण से जुड़े मामलों में केन्द्र और राज्य सरकारों को सलाह देता है। वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने विलय किए गए संगठनों के पद और पदानुक्रम ढांचे को फिर से तैयार करने की सहमति दे दी है।
पीएलआईएम और एचपीएल पीसीआईएमऔरएच के अधीनस्थ कार्यालय होने के कारण- आयुष मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त्शासी संगठन है जिसका पीसीआईएमऔरएच की स्थापना के लिए, एक साझा प्रशासनिक नियंत्रण के साथ मंत्रालय के अधीनस्थ कार्यालय के रूप में विलय होना है।
विलय के बाद पीसीआईएमऔरएच के पास मंत्रालय के अंतर्गत पर्याप्त प्रशासनिक ढांचा होगा जिससे औषधकोष कार्य की क्षमता और परिणामों में वृद्धि और आयुर्वेद, सिद्ध,यूनानी और होम्योपैथी औषधियों के औषधकोष मानकों के परस्पर हितों को हासिल करने का प्रयास किया जाएगा जिससे औषधियों के मानकीकरण कार्य का दोहराव और ओवरलेपिंग रोकी जा सकेगी और संसाधनों का प्रभावी तरीके से अधिकतम इस्तेमाल हो सकेगा।
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इससे किसानों को अधिक विकल्प मिलेंगे। बाजार की लागत कम होगी और उन्हें अपने उपज की बेहतर कीमत मिल सकेगी। इसके अलावा अतिरिक्त उपज वाले क्षेत्रों में भी किसानों को उनके उत्पाद के अच्छे दाम मिल सकेंगे और साथ ही दूसरी ओर कम उपज वाले क्षेत्रों में उपभोक्ताओं को भी ज्यादा कीमतें नहीं चुकानी पड़ेंगी। अध्यादेश में कृषि उत्पादों का सुगम कारोबार सुनिश्चित करने के लिए एक ई-प्लेटफॉर्म बनाए जाने का भी प्रस्ताव है।
एक देश, एक कृषि बाजार
अध्यादेश का मूल उद्देश्य एपीएमसी बाजारों की सीमाओं से बाहर किसानों को कारेाबार के अतिरिक्त अवसर मुहैया कराना है जिससे उन्हें प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में अपने उत्पादों की अच्छी कीमतें मिल सकें।
यह निश्चित रूप से ‘एक देश, एक कृषि बाजार’ बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगा और कठोर परिश्रम करने वाले हमारे किसानों के लिए उपज की मुंह मांगी कीमत सुनिश्ति करेगा।
किसानों को प्रसंस्करणकर्ताओं, एग्रीगेटर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों से जोड़कर सशक्त बनाना
कैबिनेट ने ‘मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश, 2020’ को स्वीकृति दे दी है।
पृष्ठभूमि
भारतीय कृषि को खेतों के छोटे आकार के कारण विखंडित खेती के रूप में वर्गीकृत किया जाता और मौसम पर निर्भरता, उत्पादन की अनिश्चितता और बाजार अनिश्चितता इसकी कुछ कमजोरियां हैं। इसके चलते कृषि जोखिम भरी है और इनपुट तथा आउटपुट प्रबंधन के मामले में अप्रभावी है।
लाभ
अध्यादेश किसानों को शोषण के भय के बिना समानता के आधार पर प्रसंस्करणकर्ताओं (प्रोसेसर्स), एग्रीगेटर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों आदि के साथ जुड़ने में सक्षम बनाएगा। इससे बाजार की अनिश्चितता का जोखिम प्रायोजक पर हस्तांतिरत हो जाएगा और साथ ही किसानों की आधुनिक तकनीक और बेहतर इनपुट्स तक पहुंच भी सुनिश्चित होगी। इससे विपणन की लागत में कमी आएगी और किसानों की आय में सुधार होगा।
यह अध्यादेश किसानों की उपज की वैश्विक बाजारों में आपूर्ति के लिए जरूरी आपूर्ति चेन तैयार करने को निजी क्षेत्र से निवेश आकर्षित करने में एक उत्प्रेरक के रूप में काम करेगा। किसानों की ऊंचे मूल्य वाली कृषि के लिए तकनीक और परामर्श तक पहुंच सुनिश्चित होगी, साथ ही उन्हें ऐसी फसलों के लिए तैयार बाजार भी मिलेगा।
किसान प्रत्यक्ष रूप से विपणन से जुड़ सकेंगे, जिससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी और उन्हें अपनी फसल का बेहतर मूल्य मिलेगा। किसानों को पर्याप्त सुरक्षा दी गई है और समाधान की स्पष्ट समयसीमा के साथ प्रभावी विवाद समाधान तंत्र भी उपलब्ध कराया गया है।
सरकार किसानों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है
कृषि और संबद्ध गतिविधियों में लगे लोगों को बढ़ावा देने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान के हिस्से के तौर पर कई कदमों की घोषणा की गई। इनमें किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए रिआयती ऋण देना, कृषि-ढांचा परियोजनाओं के लिए वित्तीय सुविधा, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और मछलीपालन को मजबूत करने के लिए अन्य उपाय, पैर व मुंह की बीमारी और ब्रूसीलोसिस के खिलाफ टीकाकरण, हर्बल खेती को प्रोत्साहन, मधुमक्खी पालन को बढ़ावा और ऑपरेशन ग्रीन जैसे प्रावधान शामिल हैं।
पीएम किसान के माध्यम से 9.25 करोड़ से ज्यादा किसान परिवारों को लाभ मिला है और लॉकडाउन की अवधि में 18,517 करोड़ रुपये की राशि अब-तक वितरित की जा चुकी है। पीएम फसल बीमा योजना के अंतर्गत किए गए कुल 6003.6 करोड़ रुपये के बराबर दावों को लॉकडाउन की अवधि में अदा किया जा चुका है।
सरकार द्वारा जो उपाय किए गए हैं ये उस श्रृंखला में सिर्फ कुछ ताजा कदम हैं, जो भारत के मेहनतकश किसानों के कल्याण के कार्य को लेकर आगे रहने के प्रति सरकार की निरंतर प्रतिबद्धता को दिखाता है।
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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ग्रामीण भारत को ऐतिहासिक प्रोत्साहन देने के लिए कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता की
किसानों को लाभान्वित करने और कृषि क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव के लिए ऐतिहासिक निर्णय लिए गए
आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के जरिए किसानों के लिए नियामकीय व्यवस्था को उदार बनाया गया
कृषि उपज के बाधा मुक्त अंतर-राज्य व्यापार के साथ-साथ राज्य के भीतर भी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए अध्यादेश लाने को मंजूरी
प्रोसेसरों, समूहकों, थोक विक्रेताओं, बड़े रिटेलरों और निर्यातकों के साथ सौदे करने के लिए किसानों को सशक्त बनाया गया
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में 3 जून, 2020 को केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हुई। बैठक में कई महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक निर्णय लिए गए जो देश के किसानों की मदद करने के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव लाने में भी काफी मददगार साबित होंगे।
आवश्यक वस्तु अधिनियम में ऐतिहासिक संशोधन
केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने आज आवश्यक वस्तु अधिनियम में ऐतिहासिक संशोधन को मंजूरी दी। यह कृषि क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव लाने और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक दूरदर्शी कदम है।
पृष्ठभूमि
वैसे तो भारत में ज्यादातर कृषि जिंसों या वस्तुओं के उत्पादन में अधिशेष (सरप्लस) की स्थिति है, लेकिन इसके बावजूद कोल्ड स्टोरेज, प्रसंस्करण और निर्यात में निवेश के अभाव में किसान अपनी उपज के उचित मूल्य पाने में असमर्थ रहे हैं, क्योंकि आवश्यक वस्तु अधिनियम की लटकती तलवार के कारण उनकी उद्यमशीलता हतोत्साहित हो जाती है। ऐसे में जब भी शीघ्र नष्ट हो जाने वाली कृषि उपज की बंपर पैदावार होती है, तो किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। यदि पर्याप्त प्रसंस्करण सुविधाएं उपलब्ध हों तो बड़े पैमाने पर इस तरह की बर्बादी को रोका जा सकता है।
लाभ
आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के जरिए अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेलों, प्याज और आलू जैसी वस्तुओं को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटा दिया जाएगा। इस व्यवस्था से निजी निवेशक अत्यधिक नियामकीय हस्तक्षेप के भय से मुक्त हो जाएंगे।
उत्पादन, भंडारण, ढुलाई, वितरण और आपूर्ति करने की आजादी से व्यापक स्तर पर उत्पादन करना संभव हो जाएगा और इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में निजी/प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित किया जा सकेगा। इससे कोल्ड स्टोरेज में निवेश बढ़ाने और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) के आधुनिकीकरण में मदद मिलेगी।
उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना
सरकार ने नियामकीय व्यवस्था को उदार बनाने के साथ ही उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा भी सुनिश्चित की है। संशोधन के तहत यह व्यवस्था की गई है कि अकाल, युद्ध, कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि और प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में इन कृषि उपजों की कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है। हालांकि, मूल्य श्रृंखला (वैल्यू चेन) के किसी भी प्रतिभागी की स्थापित क्षमता और किसी भी निर्यातक की निर्यात मांग इस तरह की स्टॉक सीमा लगाए जाने से मुक्त रहेगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कृषि क्षेत्र में निवेश हतोत्साहित न हो।
घोषित संशोधन मूल्यों में लाने के साथ-साथ किसानों और उपभोक्ताओं दोनों ही के लिए मददगार साबित होगा। इसके साथ ही भंडारण सुविधाओं के अभाव के कारण होने वाली कृषि उपज की बर्बादी को भी रोका जा सकेगा।
कृषि उपज का बाधा मुक्त व्यापार
कैबिनेट ने कृषि उपज वाणिज्य एवं व्यापार (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश 2020 को मंजूदी दी।
पृष्ठभूमि
कई तरह के नियामक प्रतिबंधों के कारण देश के किसानों को अपने उत्पाद बेचने में काफी दिक्कत आती है। अधिसूचित कृषि उत्पाद विपणन समिति वाले बाजार क्षेत्र के बाहर किसानों पर उत्पाद बेचने पर कई तरह के प्रतिबंध हैं। उन्हें अपने उत्पाद सरकार द्वारा लाइसेंस प्राप्त खरीदारों को ही बेचने की बाध्यता है। इसके अतिरिक्त एक राज्य से दूसरे राज्य को ऐसे उत्पादों के सुगम व्यापार के रास्ते में भी कई तरह की बाधाएं हैं।
लाभ
अध्यादेश के लागू हो जाने से किसानों के लिए एक सुगम और मुक्त माहौल तैयार हो सकेगा जिसमें उन्हें अपनी सुविधा के हिसाब से कृषि उत्पाद खरीदने और बेचने की आजादी होगी। अध्यादेश से राज्य के भीतर और बाहर दोनों ही जगह ऐसे बाजारों के बाहर भी कृषि उत्पादों का उन्मुक्त व्यापार सुगम हो जाएगा जो राज्यों के कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम के तहत अधिसूचित हैं।
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अरब सागर में उत्पन्न चक्रवात निसर्ग का नाम किस देश द्वारा दिया गया है?
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विदेश मंत्रालय के पूर्व प्रवक्ता रवीश कुमार किस देश के राजदूत नियुक्त किये गए है ?
