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स्पिरुलिना ग्राउंडनट चिक्की
Spirulina Groundnut Chikki
हाल ही में मैसूर स्थित Central Food Technological Research Institute- (CFTRI) ने ‘स्पिरुलिना ग्राउंडनट चिक्की’ (Spirulina Groundnut Chikki) विकसित की है जो COVID-19 महामारी के समय लोगों को सूक्ष्म पोषक तत्त्व प्रदान कर सकती है और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकती है।
प्रमुख बिंदु:
यह एक स्नैक है जो अच्छे सूक्ष्म पोषक तत्त्व प्रदान करता है।
चिक्की को तैयार करने के लिये स्पिरुलिना के साथ-साथ स्वादिष्ट एवं पौष्टिक मूंगफली का उपयोग किया गया है जो विटामिन ए, β-कैरोटीन एवं आसानी से पचने वाले एल्गल प्रोटीन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्त्वों से भरपूर है।
CFTRI के अन्य पौष्टिक स्नैक्स जैसे- ‘न्यूट्री मैंगो फ्रूट बार’ और ‘इलायची फ्लेवर पेयजल’ भी प्रवासी मज़दूरों को खाद्य पदार्थों के रूप में दिये जाने के लिये तैयार किया है।‘न्यूट्री मैंगो फ्रूट बार’ मनुष्य शरीर की प्रतिरक्षा को बेहतर बनाने के लिये कार्बोहाइड्रेट, कैरोटीन, विटामिन C एवं जस्ते जैसे खनिज-पदार्थों से समृद्ध है।
‘इलायची फ्लेवर पेयजल’ में पारंपरिक जड़ी बूटियों के साथ प्रतिरक्षा बढ़ाने वाले गुण सम्मिलित हैं।
स्पिरुलिना (Spirulina):
स्पिरुलिना एक ऐसा जीव है जो ताजे एवं खारे जल दोनों में बढ़ता है।
यह एक प्रकार का साइनोबैक्टीरिया है जो एकल-कोशिका वाले रोगाणुओं का एक परिवार है जिसे अक्सर ‘नीले-हरे शैवाल’ के रूप में जाना जाता है।
इसका उपयोग आहार पूरक या भोजन के रूप में किया जाता है। इसे जलीय कृषि, मछलीघर और मुर्गीपालन उद्योगों में एक भोजन के पूरक के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।
सामान्य पौधों की तरह साइनोबैक्टीरिया सूर्य के प्रकाश की उपलब्धता में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम से ऊर्जा का उत्पादन कर सकता है।
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नमूना पंजीकरण प्रणाली
Sample Registration System
10 मई, 2020 को भारत के रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General of India) द्वारा Sample Registration System बुलेटिन जारी किया गया है। यह वर्ष 2018 के लिये राष्ट्रीय जन्म दर, मृत्यु दर एवं शिशु मृत्यु दर के एकत्रित आँकड़ों पर आधारित है।
राष्ट्रीय जन्म दर (National Birth Rate):
वर्ष 2018 में राष्ट्रीय जन्म दर (National Birth Rate) 20 थी जबकि वर्ष 1971 में यह 36.9 थी।गौरतलब है कि जन्म दर को प्रति वर्ष प्रति हजार जनसंख्या पर जीवित जन्मे बच्चों की कुल संख्या से दर्शाया जाता है।
जन्म दर के संदर्भ में बिहार (26.2) पहले पायदान पर बना हुआ है जबकि अंडमान एवं निकोबार (11.2) सबसे निचले पायदान पर है।
ध्यातव्य है कि राष्ट्रीय जन्म दर के संदर्भ में ग्रामीण-शहरी अंतर भी कम हुआ है। हालाँकि पिछले चार दशकों में शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में जन्म दर लगातार बढ़ी है।
पिछले दशक में जन्म दर में लगभग 11 फीसदी की गिरावट (जो वर्ष 2009 में 22.5 से वर्ष 2018 में 20.0 थी) आई है।
मृत्यु दर (Death Rate):
वर्ष 1971 में मृत्यु दर 14.9 थी जबकि वर्ष 2018 में यह 6.2 थी।गौरतलब है कि मृत्यु दर को प्रति वर्ष प्रति हजार जनसंख्या पर मृत्यु की कुल संख्या से दर्शाया जाता है।
भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में मृत्यु दर सबसे अधिक है जबकि दिल्ली में सबसे कम है।
ग्रामीण क्षेत्रों में मृत्यु दर में कमी आई है।
पिछले एक दशक में अखिल भारतीय स्तर पर मृत्यु दर 7.3 से घटकर 6.2 रह गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह गिरावट 7.8 से 6.7 और शहरी क्षेत्रों में 5.8 से 5.1 हुई है।
शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate):
वर्ष 2018 में शिशु मृत्यु दर 32 है जबकि वर्ष 1971 में यह 129 थी।गौरतलब है कि शिशु मृत्यु दर 1 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु है। जिसे प्रति 1000 जन्म पर एक वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु की कुल संख्या से दर्शाया जाता है।
देश में शिशु मृत्यु दर के संदर्भ में सबसे खराब स्थिति मध्य प्रदेश (48) की है जबकि सबसे अच्छी स्थिति नागालैंड (4) की है।
पिछले 10 वर्षों में शिशु मृत्यु दर के संदर्भ में ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 35% और शहरी क्षेत्रों में लगभग 32% की गिरावट दर्ज की गई है।
अखिल भारतीय स्तर पर शिशु मृत्यु दर पिछले एक दशक में 50 से घटकर 32 हो गई है।
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चार दशक में सबसे न्यून कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन
कोरोना वायरस (Covid-19) का आक्रमण शुरू होने से पहले से ही देश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती का आलम चल रहा है। यह चिंता का विषय है, लेकिन साथ ही इसकी वजह से वातावरण शुद्ध हुआ है क्योंकि कई किस्म के जहरीले तत्वों के उत्सर्जन में कमी दर्ज की गई है। इनमें से सबसे प्रमुख है कार्बन डाई ऑक्साइड।
कई कारक हैं जिम्मेदार
अर्थव्यवस्था में सुस्ती के अलावा कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) के स्तर में कमी की मुख्य वजहें हैं कोरोना वायरस के संक्रमण के मद्देनजर लागू देशव्यापी लॉकडाउन। इसके अलावा हाल के वर्षों में क्लीन एनर्जी के उपयोग में आई बढ़ोतरी ने भी पर्यावरणीय प्रदूषण की बढ़ती रफ्तार को थामने का काम किया है।
चार दशक में पहली बार
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1982 के बाद पहली बार वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार इस साल मार्च के महीने में CO2 के उत्सर्जन में 15 फीसदी की कमी आई है, जबकि अप्रैल में इसके स्तर में 30 फीसद की गिरावट का अनुमान है।
परंपरागत ऊर्जा स्रोतों में कमी
कोयला, पेट्रोलियम ऑयल और गैस के इस्तेमाल के ताजा आंकड़ों के आधार पर सीआरईए के विश्लेषक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि वित्त वर्ष 2018-19 के मुकाबले 2019-20 के दौरान CO2 के उत्सर्जन में तीन करोड़ टन की कमी आई है।
कितना है CO2 का उत्सर्जन
बता दें कि देश में कार्बन डाई ऑक्साइड से होने वाले प्रदूषण के लिए ऊर्जा और परिवहन (Power and Transportation) के क्षेत्र सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। हर साल कोयले से चलने वाले ताप बिजली घरों से 92 करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन होता है। सीआरईए की रिपोर्ट के अनुसार इस साल मार्च में कोयला आधारित ऊर्जा उत्पादन में 15 फीसद जबकि अप्रैल के पहले तीन हफ्तों में 31 फीसद की गिरावट आई है। इसके विपरीत इस साल मार्च में सूर्य और हवा जैसे अक्षय ऊर्जा (renewable energy) के स्रोतों से बिजली उत्पादन में 6.4 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
कार्बन डाई ऑक्साइड क्यों है नुकसानदेह?
पर्यावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) के स्तर में बढ़ोतरी का पहला असर यह होता है कि इससे ऑक्सीन की मात्रा घटने लगती है। इससे सांस लेने में तकलीफ, दिल की धड़कन तेज होने और यहां तक कि मानसिक असंतुलन जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। खासकर अस्थमा एवं श्वसन संबंधी अन्य रोगों से पीड़ित लोगों के लिए CO2 का बढ़ता स्तर जानलेवा साबित हो सकता है।
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Y2K बग संकट
चर्चा में क्यों?
हाल ही में प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम दिए गए संबोधन में Y2K वैश्विक संकट का जिक्र करते हुए इससे बाहर निकलने के लिए भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों के योगदान पर प्रकाश डाला। इसके साथ ही भारत के सामर्थ्य, बेहतरीन टैलेंट, के जरिए एक आत्मनिर्भर और आधुनिक भारत बनाने की परिकल्पना देश के समक्ष रखी।
क्या है Y2K बग संकट?
कंप्यूटर में त्रुटि या ‘एरर’ को बग कहते हैं। शब्द Y2K में Y ईयर को तो वही 2K वर्ष 2000 को इंगित करता है। आपने अक्सर डिजिटल घड़ी, लैपटॉप और कंप्यूटर में डेट/तारीख का फॉर्मेट देखा होगा। वर्तमान में इसमें 2 डिजिट तारीख के लिए, 2 डिजिट महीने के लिए, एवं 4 डिजिट वर्ष के लिए होते हैं। उदाहरण के लिए आज की तारीख को आप कुछ ऐसे देखते हैं 13/05/2020, 05/13/2020 इत्यादि। लेकिन 20 वीं सदी में निर्मित कंप्यूटरों के प्रोग्रामिंग में महीने, दिनांक और वर्ष के लिए केवल 2 डिजिट दिए थे उदाहरण के लिए आज की डेट पुराने कंप्यूटर कुछ इस प्रकार से बताते 13/05/20 जो कि उस समय के लिए एक गलत डेट होता। इसको साधारण शब्दों में समझें तो 1999 के बाद सन 2000 में 1 जनवरी को कंप्यूटर 01/01/01 बताते हुए 100 साल पीछे चला जाता और 1 जनवरी 1901 के हिसाब से गणना करता। इसी संकट को Y2K संकट या मिलेनियम बग कहा गया। यह एक वैश्विक संकट के रूप में आने वाला था क्योंकि कंप्यूटर से जुड़ी हुई सारी सेवाएं बैंकिंग, रेलवे, वायुयान, अस्पताल,संचार प्रणाली, ग्रीड प्रबंधन, औद्योगिक अनुप्रयोग इत्यादि ठप्प होने वाली थी।
विश्व को Y2K संकट से निकलने में भारत का योगदान?
उदारीकरण के बाद भारत में सूचना और प्रौद्योगिकी क्षेत्र का धीमे-धीमे विकास हो रहा था एवं 1999 तक कई आईटी कंपनियां स्थापित हो चुकी थी। Y2K संकट को दूर करने के लिए बड़ी संख्या में आईटी प्रोफेशनल के लोगों की आवश्यकता थी जो सभी विकसित देशों के Y2K संकट का समाधान कर सके। भारत में इस समय कुशल श्रम बल मौजूद था जिसने आउटसोर्सिंग के माध्यम से विश्व को अपनी सस्ती आईटी सेवाओं के द्वारा इस संकट में निकालने में महती भूमिका निभाई। वस्तुतः इसी के बाद भारतीय आईटी इंडस्ट्री को वैश्विक कंपनियों माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम इत्यादि से कॉन्ट्रैक्ट प्राप्त हुए एवं सेवाओं के निर्यात में भारत अग्रणी देशों में शुमार हो गया। संक्षेप में कहें तो अर्थव्यवस्था का बूस्टर सेक्टर कहे जाने वाले आईटी इंडस्ट्री का विकास Y2K संकट के बाद बड़ी तेजी से हुआ क्योंकि भारतीय आईटी कंपनियों के राजस्व का लगभग 40% Y2K संकट के समाधान से आता था। वस्तुतः y2k संकट में जहां भारतीय आईटी फर्म ने वैश्विक व्यवस्था को पटरी पर लाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया वहीं इस सेक्टर ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को पटरी पर लाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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भारत-चीन सीमा पर तनाव
कोरोना संकट के बीच तीन दिन पहले भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव की खबर आई। सिक्किम से सटी सीमा पर भारत और चीन के सैनिकों के बीच टकराव हुआ। हालांकि इसे स्थानीय दखल के बाद सुलझा लिया गया। बदले माहौल में चीन की सीमा से सटा लद्दाख का इलाका भी चर्चा में है। चीन के साथ भारत की विवादित सीमा का लद्दाख क्षेत्र अलर्ट पर है। रिपोर्ट्स में पता चला था कि चीन की पीएलए ने 1962 की जंग के एक पुराने पड़ाव गलवान नदी के पास टेंट लगाया है और देमचोक क्षेत्र में निर्माण शुरू कर दिया।
इसी तरह का सिक्किम के नाकू ला पास में भी शनिवार को दोनों पक्षों के बीच झड़प देखी गई थी। सूत्रों के मुताबिक इसमें दोनों पक्षों के तकरीबन एक दर्जन सैनिक घायल हुए। अतीत में डोकलाम संकट के अलावा 2017 में पैंगोंग त्सो झील के पास सैनिकों को लाठी और पत्थरों के साथ लड़ाई में उलझते हुए देखा गया था।
1962 की जंग का गवाह बने क्षेत्र में तनाव
तीन हफ्ते हो गए हैं और यह क्षेत्र तनावपूर्ण बना हुआ है। हालांकि अधिकारियों का मानना है कि स्थापित संवाद चैनलों के जरिए हालात को धीरे-धीरे नियंत्रण में लाया जाएगा। सेना ने कहा है कि अस्थायी और छोटी अवधि के फेस ऑफ (आमना-सामना) होते हैं क्योंकि भारत-चीन का सीमा विवाद अब तक हल नहीं हुआ है।
1962 में चीनी आक्रमण के गवाह बने गलवान नदी के इलाके में हाल ही में भारत-चीन के सैनिक आमने-सामने हुए थे। इसके बाद यह इलाका चर्चा में आया। हालांकि सेना वहां नहीं है। दोनों पक्षों ने विवादित सीमा के पास अपने-अपने इलाके से सैनिकों को पीछे खींच लिया है।
पैंगोंग त्सो झील के पास निर्माण गतिविधियों में लगा है चीन
सब सेक्टर नॉर्थ में स्थित इस इलाके में लंबे समय से चीन की पीएलए गश्त करती रही है। दोनों पक्षों की ओर से यहां अकसर गश्त की जाती है। सूत्रों ने कहा कि मौजूदा दौर का टकराव पैट्रोल पॉइंट-14 पर हुआ, जिसके बाद उचित कदम उठाए गए। यह स्थान दौलत बेग ओल्डी हवाई क्षेत्र के करीब है जो एसएसएन में तैनात सैनिकों की लाइफलाइन है। लद्दाख सीमा पर तनाव बढ़ता जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पैंगोंग त्सो झील के पास दोनों पक्षों के सैनिकों की एक हल्की झड़प हुई थी। खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक निर्माण गतिविधियों के लिए संभवतः देमचोक में 1,000 से ज्यादा भारी वाहन लाए गए हैं।
नेपाल सीमा पर भी बढ़ाई गई चौकसी
इनपुट के बाद नेपाल सीमा पर भी कड़ी नजर रखी जा रही है। बॉर्डर पोस्ट को चाक-चौबंद किया जा रहा है। लिपुलेख दर्रे के पास एक सड़क के निर्माण में हुए बदलाव के बाद सशस्त्र पुलिस के हजारों जवानों को हाल ही में तैनात किया जा रहा है। गलवान टकराव पर सेना ने कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन कहा कि चीन के साथ सीमा विवाद का हल नहीं होना इसकी वजह है। रक्षा सूत्रों ने कहा कि एसएसएन में तनाव चीनी पक्ष की आक्रामक पैट्रोलिंग के बाद बढ़ रहा था।
देमचोक में चीन बना सकता है सैन्य हवाई अड्डा
देमचोक में सीमा के पार गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। ऐसा बताया जा रहा कि यहां चीन की तरफ से हवाई क्षेत्र का निर्माण किया जा सकता है। विवादित लाइन ऑफ ऐक्चुअल कंट्रोल (वास्तविक नियंत्रण रेखा) के पास भारी निर्माण को दोनों पक्षों के बीच समझौते के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है। इसमें दोनों पक्ष सीमा को अछूता छोड़ने की बात पर सहमत हुए थे। गलवान नदी क्षेत्र में चीन के साथ भारत का पुराना विवाद रहा है। जुलाई 1962 में यहां बनाई गई भारतीय सेना की एक पोस्ट को पीएलए के सैनिकों ने हाल ही में घेर लिया था।
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कोविड-19 इंड्यूस्ड लॉकडाउन-हाउ इज हिंटरलैंड कोपिंग’ सर्वेक्षण
देश के 12 राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में 5,000 घरों को लेकर किए गए एक सर्वेक्षण में खुलासा हुआ है कि कोरोना वायरस महामारी को रोकने के लिए लागू बंद के बीच इनमें से आधे परिवार कम खाना खा रहे हैं। इस सर्वेक्षण का नाम ‘कोविड-19 इंड्यूस्ड लॉकडाउन-हाउ इज हिंटरलैंड कोपिंग’ यानी कोविड-19 की वजह से लागू बंद में दूरदराज के इलाके कैसे जीवनयापन कर रहे हैं। यह सर्वेक्षण 47 जिलों में किया गया है। यह अध्ययन असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल में किया गया है। यह अध्ययन नागरिक संगठन प्रदान, ऐक्शन फॉर सोशल एडवांसमेंट, बीएआईएफ, ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन, ग्रामीण सहारा, साथी-उप्र और आगा खां रूरल सपोर्ट प्रोग्राम ने किया है।
सर्वेक्षण के मुख्य बिंदु
बंद लागू होने के बाद ग्रामीण इलाकों में 50 फीसदी ऐसे परिवार हैं जो पहले जितनी बार भोजन करते थे उसमें कटौती कर दी है ताकि जितनी भी चीजें उपलब्ध हैं, उसी में किसी तरह से काम चलाया जा सके।
वहीं 68 फीसदी परिवार ऐसे हैं जिनके खाने की विविधता में कमी आई है यानी उनकी थाली में पहले के मुकाबले कम प्रकार के भोजन होते हैं।
अध्ययन के अनुसार इनमें से 84 फीसदी ऐसे परिवार हैं जिन्होंने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए खाद्य पदार्थ हासिल किया और 37 फीसदी ऐसे परिवार हैं जिन्हें राशन मिला।
वहीं, 24 फीसदी ऐसे हैं जिन्होंने गांवों में अनाज उधार लिया और 12 फीसदी लोगों को मुफ्त में खाद्य पदार्थ मिला।
अध्ययन में यह खुलासा हुआ कि ये परिवार रबी की तुलना में खरीफ भंडार पर ज्यादा निर्भर हैं, लेकिन यह भंडार भी अब तेजी से समाप्त हो रहा है।
अध्ययन में कहा गया कि ये परिवार अब कम खाना खा रहे हैं और पहले की तुलना में कम बार खाना खा रहे हैं तथा इनकी निर्भरता पीडीएस के जरिए हासिल किए गए अनाज पर बढ़ गई है।
सर्वेक्षण में यह निकलकर सामने आया है कि खरीफ फसल 2020 के लिए तैयारी अच्छी नहीं है और बीज तथा नकदी राशि के लिए मदद की जरूरत है। अध्ययन में कहा गया है कि बंद और अफवाह की वजह से डेयरी और पॉल्ट्री क्षेत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। लोग अपने खाने की आदतों में बदलाव कर रहे हैं और खर्चे कम कर रहे हैं।
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‘आत्मनिर्भर भारत’ बनाने का आह्वान
प्रधानमंत्री ने एक विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की और आत्मनिर्भर भारत बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कोविड संकट के दौरान सरकार द्वारा इससे पहले की गई घोषणाओं और आरबीआई द्वारा लिए गए निर्णयों से जुड़ी राशि को मिला देने पर यह पैकेज 20 लाख करोड़ रुपये का है, जो भारत की जीडीपी के लगभग 10% के बराबर है। उन्होंने कहा कि यह पैकेज ‘आत्मनिर्भर भारत’ बनाने के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में काफी सहायक साबित होगा।
आत्मनिर्भर भारत के पांच स्तंभ:
अर्थव्यवस्था, जो वृद्धिशील परिवर्तन नहीं, बल्कि लंबी छलांग सुनिश्चित करती है; बुनियादी ढांचा, जिसे भारत की पहचान बन जाना चाहिए; प्रणाली (सिस्टम), जो 21वीं सदी की प्रौद्योगिकी संचालित व्यवस्थाओं पर आधारित हो; उत्साहशील आबादी, जो आत्मनिर्भर भारत के लिए हमारी ऊर्जा का स्रोत है; और मांग, जिसके तहत हमारी मांग एवं आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) की ताकत का उपयोग पूरी क्षमता से किया जाना चाहिए। उन्होंने मांग बढ़ाने के साथ-साथ इसे पूरा करने के लिए भी आपूर्ति श्रृंखला के सभी हितधारकों को मजबूत करने के महत्व को रेखांकित किया।
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प्रारंभ में एक परिकल्पना थी कि पुरुष महिलाओं की तुलना में COVID-19 वायरस के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। यह परिकल्पना अब यूरोपीय हार्ट जर्नल में प्रकाशित एक शोध से साबित हुई है।
मुख्य बिंदु
मानव शरीर में ACE2 एंजाइम प्रमुख कारक है जो मानव कोशिकाओं को संक्रमित करने के लिए COVID-19 को सक्षम बनाता है। अध्ययन में पता चला है कि ACE2 एंजाइम का स्तर महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक है।
ACE2 एंजाइम क्या है?
एंजियोटेंसिन कन्वर्टिंग एंजाइम 2 फेफड़े, हृदय, गुर्दे की कोशिकाओं की बाहरी सतह पर होता है। इस एंजाइम का प्राथमिक कार्य अमीनो एसिड के परिवहन को विनियमित करना है (अमीनो एसिड प्रोटीन के पाचन से बनता है)।ACE2 एंजाइम COVID-19 वायरस के लिए मुख्य प्रवेश बिंदु के रूप में कार्य करता है। ऐसे कई अध्ययन हैं जो कहते हैं कि ACE2 एंजाइम का स्तर कम करना COVID-19 के लिए एक सफल उपचार हो सकता है।
हृदय रोगों को ठीक करने के लिए ACE अवरोधक दवाओं का उपयोग किया जाता है। वे रक्तचाप को कम करने में भी मदद करती है।
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13 मई, 2020 को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने ग्लोबल एनर्जी ट्रांजिशन इंडेक्स (GET इंडेक्स) जारी किया। भारत ने ऊर्जा सुरक्षा, विकास और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे प्रमुख मापदंडों में सुधार करते हुए 74वां स्थान हासिल किया है।
सूचकांक के बारे में
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने अपनी रिपोर्ट “WEF फोस्टरिंग इफेक्टिव एनर्जी ट्रांजिशन 2020 रिपोर्ट” में GET इंडेक्स के आधार पर 115 देशों को स्थान दिया है। इस सूचकांक को देशों की ऊर्जा प्रणालियों के मौजूदा प्रदर्शन, पर्यावरणीय स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और टिकाऊ, सुरक्षित, सस्ती और समावेशी ऊर्जा प्रणालियों में परिवर्तन के लिए तत्परता जैसे संकेतकों के आधार पर तैयार किया गया है।
इस रिपोर्ट के अनुसार 75% देशों ने अपनी पर्यावरणीय स्थिरता में सुधार किया है।
स्वीडन ने लगातार तीसरे वर्ष रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल किया है। इसके बाद स्विट्जरलैंड और फिनलैंड का स्थान है। केवल फ्रांस (8वें स्थान पर) और यू. के. (7वें स्थान पर) शीर्ष 10 में शामिल जी- 20 देश है। रैंकिंग के अनुसार, भारत और चीन दुनिया में मांग के उभरते केंद्र है। इस सूचकांक में संयुक्त राज्य अमेरिका 32वें स्थान पर, कनाडा 28वें स्थान पर, ब्राजील 47वें स्थान पर और ऑस्ट्रेलिया 36वें स्थान पर रहा।
मुख्य विशेषताएं: भारत
इस रिपोर्ट रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने अपने ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार करके महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। यह एलईडी बल्ब और स्मार्ट मीटर की थोक खरीद और उपकरणों की लेबलिंग के लिए कार्यक्रम शुरू करके हासिल किया गया है। इसके अलावा, भारत उन गिने-चुने देशों में से एक है जिसने रिपोर्ट के अनुसार 2015 से लगातार प्रगति की है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2015 से केवल 11 देशों ने महत्वपूर्ण प्रगति की है।
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PM CARES फंड ट्रस्ट 27 मार्च, 2020 को बनाया गया था। इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं। अन्य सदस्यों में गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री शामिल हैं।
वेंटीलेटर
आवंटित धनराशि का उपयोग 50,000 वेंटिलेटर खरीदने के लिए किया जाएगा। वेंटिलेटर 2,000 करोड़ रुपये की लागत से खरीदे जाएंगे। इन वेंटिलेटरों को सरकार द्वारा संचालित COVID-19 अस्पतालों में भेजा जाएगा।
प्रवासी
राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को लगभग 1000 करोड़ रुपये प्रदान किए जाएंगे। यह राशि नगर निगम आयुक्तों और जिला कलेक्टरों को दी जाएगी। इसका उपयोग भोजन की व्यवस्था, परिवहन व्यवस्था और प्रवासियों को चिकित्सा उपचार प्रदान करने के लिए किया जाएगा।
यह 1000 करोड़ 2011 की जनगणना और COVID-19 से प्रभावित व्यक्तियों की संख्या के आधार पर राज्यों में विभाजित किया जाएगा।
टीके
COVID-19 के खिलाफ टीका वर्तमान की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत है। वैक्सीन डेवलपर्स का समर्थन करने के लिए 100 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
PM CARES फंड अलग कैसे है?
PM CARES फंड COVID-19 स्थिति के लिए समर्पित था। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (पीएमएनआरएफ) सभी प्राकृतिक आपदाओं के लिए है।
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प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में “आत्म निर्भर भारत अभियान” की घोषणा की। इस योजना के तहत, लगभग 20 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इस योजना के साथ, प्रधानमंत्री ने “वोकल फॉर लोकल” की भी घोषणा की।
KVIC (खादी और ग्रामोद्योग आयोग) “वोकल फॉर लोकल” बनने के लिए आगे आया है।
वोकल फॉर लोकल
वोकल फॉर लोकल का उद्देश्य स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लॉक डाउन और COVID-19 के खतरों के साथ, यह स्थानीय उत्पादन था जिसने लोगों को अपनी दिनचर्या चलाने में मदद की। इसमें मुख्य रूप से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति शामिल थी।
KVIC
“वोकल फॉर लोकल” के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, KVIC ने PMEGP (प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम) के तहत प्रमुख परियोजनाओं को लागू करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं।
दिशा-निर्देश
पीएमईजीपी के तहत आवेदनों की जल्द से जल्द जांच की जानी चाहिए और बैंकों को भेज दी जानी चाहिए। बैंक 15 दिनों के भीतर फंड्स की संवितरण करेंगे। इससे पहले, इन दिनों की संख्या 26 थी। आवेदन प्रक्रिया एक निगरानी सेल द्वारा लागू की जाएगी। यह कम समय के भीतर रोजगार सृजन को बढ़ाने में मदद करेगा।
पीएमईजीपी
इस योजना को 2008 में प्रधान मंत्री रोजगार योजना और ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम में दो योजनाओं को मिलाकर शुरू किया गया था। कार्यक्रम केवीआईसी द्वारा कार्यान्वित किया जाता है।
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भारतीय रेलवे ने 15 दिन से भी कम समय में "श्रमिक स्पेशल" ट्रेनों के जरिये 10 लाख से अधिक यात्रियों को उनके गृह राज्यों में पहुंचाकर महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की
भारतीय रेलवे ने 14 मई, 2020 तक देशभर में 800 “श्रमिक स्पेशल” ट्रेनें चलाई
यात्रियों को मुफ्त भोजन और पानी दिया जा रहा है
यात्रियों को भेजने वाले और उन्हें अपने यहां लेने वाले राज्य की सहमति के बाद ही रेलवे द्वारा ट्रेनें चलाई जा रही हैं
विभिन्न स्थानों पर पलायन करके गए फंसे श्रमिकों, तीर्थ यात्रियों, पर्यटकों, छात्रों और अन्य व्यक्तियों की आवाजाही के संबंध में गृह मंत्रालय के आदेश के बाद,भारतीय रेलवे ने “श्रमिक स्पेशल” ट्रेनों के संचालन का निर्णय लिया।
14 मई 2020 तक, देश भर के विभिन्न राज्यों से कुल 800 “श्रमिक स्पेशल” ट्रेनेंचलाई गई। 10 लाखसे अधिक यात्री अपने गृह राज्य पहुंच चुके हैं। यात्रियों को भेजने वाले और उन्हें अपने यहां लेने वाले राज्य की सहमति के बाद ही रेलवे द्वारा ट्रेनें चलाई जा रही हैं।
इन 800 ट्रेनों को विभिन्न राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मिजोरम, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में समाप्त कर दिया गया था।
ट्रेन में चढ़ने से पहले यात्रियों की उचित जांच सुनिश्चित की जाती है। यात्रा के दौरान यात्रियों को मुफ्त भोजन और पानी दिया जाता है।
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सीआईसी कल से संघ शासित प्रदेशजम्मू-कश्मीर और लद्दाख के आरटीआई मामलों की सुनवाई शुरू करेगा
मामलों की ऑनलाइन सुनवाई से "घर पर न्याय" की अवधारणा को बढ़ावा मिलेगा: डॉ. जितेंद्र सिंह
केंद्रीय पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार),प्रधाममंत्री कार्यालय,कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) कल (15.05.2020) से संघ शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के आवेदकों के सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत आवेदनों की सुनवाई शुरू करेगा।यह जानकारी डॉ. सिंह ने मुख्य सूचना आयुक्त श्री बिमल जुल्का से मुलाकात के बाद दी।श्री जुल्का ने केंद्रीय मंत्री से भेंट की थी। मंत्री ने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के आवेदक घर से आरटीआई आवेदन दाखिल कर सकते हैं और किसी को सीआईसी की अपील के लिए भी बाहर की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, इससे "घर पर न्याय" की एक नई संस्कृति की शुरूआत होगी।
दोनों संघ शासित प्रदेशों के आवेदक प्रदेश द्वारा नामित अधिकारियों के समक्ष पहली अपील दायर कर सकते हैं और सीआईसी के समक्ष दूसरी अपील के लिए घर से सुनवाई की सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। इसके अलावा, आवेदक ऑनलाइन तरीके से कभी भी आरटीआई दाखिल कर सकते हैं।
मंत्री ने यह भी बताया कि भारत का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से संबंधित मामलों के लिए आरटीआई दायर कर सकता है, जो पुनर्गठन अधिनियम, 2019 से पहले केवल जम्मू और कश्मीर के नागरिकों के लिए आरक्षित था।
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यहाँ यह उल्लेख करना उचित है किजम्मू-कश्मीरपुनर्गठन अधिनियम 2019 के पारित होने के परिणामस्वरूप, जम्मू-कश्मीरसूचना का अधिकार अधिनियम 2009 और इसके नियम निरस्त कर दिए गए थे तथा सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 और इसके अधीन नियम 31.10.2019 से लागू किए गए थे। डॉ. सिंह ने कहा कि जम्मू और कश्मीर आरटीआई अधिनियम 2009 से केंद्रीय आरटीआई अधिनियम के लिए सुचारू परिवर्तन के लिए गृह मंत्रालय, डीओपीटी और केंद्रीय सूचना आयोग के कार्यालयों द्वारा ठोस प्रयास किए गए थे। मंत्री ने बताया कि पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद से10 मई, 2020 तक, संघ शासित प्रदेशजम्मू-कश्मीर से सीआईसी में 111 दूसरी अपीलें / शिकायतें (नए मामले) दर्ज की गई हैं।
सीपीआईओ और एफएए के लिए प्रशिक्षण की योजना बनाई जा रही है और केंद्र शासित प्रदेशों जे एंड केऔर लद्दाख के सार्वजनिक प्राधिकरणों का डीओपीटी के आरटीआईऑनलाइन पोर्टल पर पंजीकरण / संरेखण भी डीओपीटीके द्वाराकिया जा रहा है।
वर्तमान में, सभी सूचना आयुक्त मामलों की सुनवाई कर रहे हैं और सीआईसी मुख्यालय 33 प्रतिशत आधिकारिक कर्मचारियों के साथ काम कर रहे हैं। वरिष्ठ सूचना आयुक्त कार्यालय से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मामलों की सुनवाई कर रहे हैं।
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भारतीय नौसेना द्वारा विकसित नवीन किफायती पीपीई का पेटेंट हो जाने से बड़ी संख्या में इसके त्वरित उत्पादन का रास्ता खुला
भारतीय नौसेना द्वारा विकसित मेडिकल व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) का बड़ी संख्या में त्वरित उत्पादन की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए रक्षा मंत्रालय के बौद्धिक संपदा सुविधा प्रकोष्ठ (आईपीएफसी) ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन उपक्रम राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम (एनआरडीसी) के सहयोग से सफलतापूर्वक एक पेटेंट फाइल कराया है।
इस किफायती पीपीई को हाल ही में नौसेना औषधि संस्थान (आईएनएम),मुंबई में गठित नवाचार प्रकोष्ठ में तैनात भारतीय नौसेना के एक डॉक्टर ने विकसित किया है। पीपीई के एक प्रायोगिक बैच को नेवल डॉकयार्ड, मुंबई में पहले ही प्रदर्शित किया जा चुका है।
नौसेना द्वारा विकसित यह पीपीई एक विशेष कपड़े से बनाया गया है जो बाज़ार में उपलब्ध अन्य पीपीई की तुलना में सांस लेने में उच्च सहूलियत के साथ उच्च स्तर की सुरक्षा प्रदान करता है और इस तरह भारत में प्रचलित गर्म और आर्द्र मौसम में इस्तेमाल करने के लिए यह काफी उपयुक्त है। इसकी प्रौद्योगिकी का परीक्षण भी किया जा चुका है और आईसीएमआर की स्वीकृत जांच प्रयोगशाला द्वारा इसे मान्यता भी मिल चुकी है।
इस किफायती पीपीई का बड़ी संख्या में उत्पादन शुरू करने के लिए अब नौसेना,आईपीएफसी और एनआरडीसी की एक कोर टीम द्वारा सम्मिलित प्रयास जारी हैं। इस पीपीई का लाइसेंस युक्त उत्पादन शुरू कराने के लिए एनआरडीसी सक्षम कंपनियों की पहचान करने में जुट गया है। कोरोना वायरस से निपटने की लड़ाई में अपने स्वास्थ्य देखभाल कर्मियों को ऐसे आरामदेह पीपीई उपलब्ध कराना एक अति महत्वपूर्ण और तत्काल जरूरत है जिनका अधिक पूंजी निवेश किए बिना किफायती दाम पर स्वदेशीय स्तर पर उत्पादन किया जा सके। जो कंपनियां / स्टार्ट अप्स इसका उत्पादन शुरू करने की इच्छुक हों वो cmdnrdc@nrdcindia.comपर संपर्क कर सकती हैं।
नौसेना में अन्वेषकों की टीम आईपीएफसी के साथ करीबी समन्वय में काम कर रही है। आईपीएफसी का गठन मिशन रक्षा ज्ञान शक्ति के तहत हुआ था। नवंबर,2018 में आईपीएफसी की स्थापना से लेकर अब तक मिशन रक्षा ज्ञान शक्ति के तहत लगभग 1500 आईपी संपदाओं का सृजन किया जा चुका है।
