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काम संहिता🙏
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सेक्स से जुड़ी हुई प्रेम से जुड़ी हुई सभी जानकारी के लिए सन्देश भेजे जय कामदेव कामसूत्र यौन स्थानों का सच्चा गुरु ग्रंथ है। अपने यौन जीवन में विविधता लाने के तरीके खोज रहे हैं? तब आप सही जगह पर आए हैं .. !!
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आजकल कपड़े इतने छोटे होते जा रहे हैं कई बार लगता है की स्तन खूंटी है उसपर छोटा सा कपड़ा टंगा हुआ है।
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अगर तस्वीर भर्मित कर रही है तो आप खुश हो जाइए,क्यों कि आप के अंदर संवेदना अब तक जिंदा है,बौद्धिक-विचार आप कर पा रहे है,फिर इतना परेशान क्यों हो रहे हैं......क्यों एक माँ का दर्द और प्यार सिर्फ माँ ही समझ सकती है,दुनिया की कोई दूसरी भाव नही बची है जो माँ के मामत्व को परिभाषीत कर सके...कोशिश कीजिये कम से कम महीने में एक दफा माँ के लिए रोने का क्यों कि हम सब शायद ही माँ के लिए कभी रोते है,हँसते तो अपनी खुशियां अनुसार बार बार है पर रोते ही शायद ही कभी...
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स्त्री तब तक #बूढ़ी नहीं होती!!!
जब तक उसका #सुहाग जीवित रहता है !
#पुरुष तब तक बूढ़ा नहीं होता_____
जब तक #पत्नी जीवित रहती है !!
#एक के बिछड़ते ही #दूसरे का बूढ़ा होना
शुरू हो जाता है !!!
यही इस सम्बंध की सबसे बड़ी #सच्चाई है!
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उफ़!है कितने गुलाब आँखों------
है कैसा इज्त़िराब आंखों में
आब है या शराब आँखों में।
पढ़ रहा हर कुई तुझे ऐसे
मानो कोई किताब आंखों में।
इत्र से तर ये जिस्म ओ रूह तेरे
उफ़!है कितने गुलाब आँखों में।
- वंदना
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हमारा पवित्र हिंदू धर्म है जिसमे अगर सही से पालन किए जाय तो इंसान महान हो जाएगा । संभोग,गर्भधारण का भी शास्त्रीय तरीका है जिससे इंसान खुश जिंदगी जी सकता है,अन्य धर्म में ऐसी बाते नही।
बोलो जय श्री राम
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एक तरफा प्यार.....
अब हार रहा हे.......
खुश वही है........
जो दस जगह मुंह मार रहा हे....
सुन रही हो विष ?? 😢
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अब नजरें तो उठा लो रात वाली संभोग की गलती भुला दो।
तेरे लरजते होठ ने मुझे चूसने पर मजबूर किया
तेरे जिस्म ने आगोश में लेने को मदहोश किया
तेरी चिकनी यौवन ने चाट कर प्यार करने को
बेताब किया
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मित्रता ही शुध्चतम प्रेम है,,❤️
स्त्री और पुरुष के संबंध में भारतीय मन में एक ही धारणा रही है कि एक ही संबंध हो सकता है वह है कामवासना का। स्त्री और पुरुष के बीच मैत्री भी हो सकती है मित्रता भी हो सकती है यह भारतीय परंपरा का अंग नहीं रही। भारतीय परंपरा ने कभी साहस नहीं किया कि स्त्री और पुरुष के बीच मैत्री की धारणा को जन्म दे सके।
यौन तो स्त्री-पुरुष के बीच एक संबंध है। यही सब कुछ नहीं है। मैत्री भी हो सकती है। और मैत्री होनी चाहिए। एक सुंदर सुसंस्कृत व्यक्तित्व में इतनी क्षमता तो होनी चाहिए कि वह किसी स्त्री के साथ भी मैत्री बना सके किसी पुरुष के साथ मैत्री बना सके। मैत्री का अर्थ है कि कोई शारीरिक लेन-देन का सवाल नहीं है एक आत्मिक नाता है।
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यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारा बच्चा गौतम बुद्ध बने तो तुम्हें आनुवंशिक विश्लेषण के आधार पर देखना होगा कि किस शुक्राणु में रहस्यदर्शी होने की क्षमता है। उस शुक्राणु का इंजेक्शन देना होगा ताकि भीड़ में और सब लोगों के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता न हो।
और चूंकि संभोग से बच्चे का जन्म नहीं होना है, माता-पिता के लिए संभोग विशुद्ध क्रीड़ा हो जाती है। उसमें कोई जिम्मेवारी नहीं होती, कोई खतरा नहीं होता।
ओशो - मनुष्य का स्वर्णिम भविष्य: एक महान चुनौती
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(Random Collection of Osho's Thoughts)❤
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संभोग विशुद्ध क्रीड़ा हो .......
परिवार नियोजन पूर्णतः अनिवार्य हो; और मेडिकल बोर्ड (चिकित्सा समिति)यह तय करे कि प्रतिवर्ष हमें कितने नये लोग चाहिए। तो सिर्फ थोड़े से लोग बच्चे पैदा करें, और वह भी कृत्रिम बीजारोपण से, ताकि सर्वश्रेष्ठ शुक्राणु का सर्वश्रेष्ठ अंडाणु के साथ मेल हो।
अब तक स्त्रियां जो गोली लेती रही हैं वह शत प्रतिशत सुरक्षित नहीं है। उसे वह हर रोज लेनी पड़ती है। अगर वह एक दिन भी चूकती है तो संभावना यही है कि उसका असर नहीं होगा। फिर अचानक पति आ जाता है या पति चला जाता है - यह दोनों तरह से काम करता है। प्रेम का अवसर प्रकट होता है और मन जोखिम उठाना चाहता है। मन सोचता है, “एक बार संभोग करने से तो गर्भ नहीं रहता।”
मनुष्य उसके साधारण यौन जीवन में कम से कम चार हजार बार संभोग करता है - यह सामान्य है। मैं काम उन्मत्त लोगों की बात नहीं कर रहा हूं, यह बहुत सामान्य दुकानदार की बात है। चार हजार बार का मतलब हुआ, करोड़ों लोगों की संभावना। अस्तित्व सचमुच विपुल है। इन करोड़ों में से, एक आदमी सिर्फ दो या तीन बच्चे पैदा करेगा। वे करोड़ पूरी पृथ्वी को भर सकते हैं।
अब उन्होंने और दो गोलियां विकसित की हैं। पहली गोली जो विकसित हुई थी वह एक क्रांति थी क्योंकि उसने स्त्रियों को गर्भवती होने से बचा लिया।
अतीत में स्त्री का जीवन बच्चे पैदा करने के कारखाने के अलावा कुछ नहीं था। वह सतत गर्भवती रहती थी। उसका जीवन एक गाय से अधिक कुछ न था।
तो पहली गोली ने उसे गर्भवती होने से बचा लिया लेकिन वह शत प्रतिशत सुरक्षित नहीं थी।
दूसरी गोली उससे बड़ी क्रांति है क्योंकि उसे तुम संभोग के बाद ले सकते हो। पहली रोज-रोज लेनी पड़ती थी, दूसरी उससे बड़ी प्रगति है। क्योंकि अब तुम्हें चिंतित होने की जरूरत नहीं है। तुम किसी के भी साथ संभोग कर सकते हो, जब भी उसकी संभावना बनती है, और बाद में गोली ले सकते हो।
तीसरी गोली, जो विकसित की जा रही है वह उससे भी अधिक अर्थपूर्ण है। उसे स्त्री को लेने की जरूरत नहीं है, पुरुष उसे ले सकता है।
इन तीन गोलियों के उपयोग से सभी सांयोगिक जन्मों से बचा जा सकता है। सेक्स सिर्फ एक क्रीड़ा हो जाती है, और अतीत में उसके साथ जो गंभीरता जुड़ी रही है वह सब तिरोहित हो जाती है।
यदि मनुष्य को बचना है, उसकी गरिमा, सम्मान, उसका जीने का अधिकार प्राप्त करना है तो जनसंख्या घटनी ही चाहिए।
अब तक मानवता सांयोगिक रूप से बच्चे पैदा करती रही है। अब विज्ञान के कारण हम इससे हमारी रक्षा कर सकते हैं। और आनुवंशिक यांत्रिकी भविष्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण विज्ञान होगा।
जैसे रक्त के बैंक होते हैं वैसे ही प्रत्येक अस्पताल में शुक्राणु बैंक होने चाहिए। और शुक्राणु बैंक की तरह अंडाणु बैंक होने भी मुश्किल नहीं हैं।
जिनको भी बच्चे पैदा करने हों वे जाकर इस वैज्ञानिक प्रयोगशाला में अपने शुक्राणु का योगदान दे सकता है। और प्रयोगशाला तय करे कि तुम्हारे बच्चे की मां कौन होगी। जरूरी नहीं है कि वह तुम्हारी पत्नी हो। उससे कोई संबंध नहीं है।
तुम तुम्हारी पत्नी से प्रेम करते हो, तुम्हारी पत्नी तुमसे प्रेम करती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस धरती पर अपाहिज, अंधे बच्चे का बोझ डाला जाए। अस्तित्व वैसी अनुमति नहीं देगा।
तुम स्वयं पर और मानवता पर एक गैर-जिम्मेवार बोझ क्यों डाल रहे हो?
यदि तुम किसी अपाहिज, मंदमति, पागल या विक्षिप्त बच्चे को जन्म देते हो तो वह फिर अन्य बच्चों को जन्म देगा। इसी भांति संसार में मूढ़ों की संख्या हमेशा ज्यादा होती है।
सभी धर्म मेरा विरोध करेंगे, कोई हर्ज नहीं। जिंदगी भर मेरा विरोध ही होता रहा है। लेकिन मेरा सुझाव यह है कि हर पुरुष, जो बच्चा पैदा करना चाहता है, अपने शुक्राणु किसी अस्पताल को दे, और एक चिकित्सा विज्ञान समिति इस पर विचार-विमर्श करे कि इन शुक्राणुओं और फलां स्त्री के अंडाणुओं की संभावना क्या है।
हो सकता है उन एक लाख शुक्राणुओं में अलबर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक हों, यहूदी मेनुहिन जैसे महान संगीतज्ञ हों, निजिंस्की जैसे महान नर्तक हों, फ्रेडरिक नीत्शे जैसे महान दार्शनिक हों, फ्यादोर दोस्तोवस्की जैसे महान उपन्यासकार हों। उनको चुना जा सकता है। और पिता और माता मनपसंद चुनाव कर सकते हैं। जब तुम बहुमूल्य हीरे चुन सकते हो तो रंगीन पत्थरों से क्यों संतुष्ट होते हो? और जब तुम चुनाव कर सकते हो तो संयोग के भरोसे क्यों रहना?
अगर उनका मन हो तो वे हेनरी फोर्ड को चुन सकते हैं जो बेशुमार धन पैदा कर सकता है। धन कमाना एक कला है - जैसी कि और सब कलाएं हैं। उसकी अपनी मेधा होती है। हर कोई तो हेनरी फोर्ड नहीं हो सकता।
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स्त्री के मासिक होने के दिन से सम संख्या के दिन में सहवास करने से पुत्र और विषम दिन सहवास करने से पुत्री की प्राप्ति होती है । शुरू के 4 दिन संभोग नही करना चाहिए । - गरुड़ पुराण
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❤️❤️मैथुन - कर्म और वाजपेय यज्ञ ❤️❤️
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सृष्टि कर्ता प्रजापति ने सम्पूर्ण भूतों के सारतत्व रेतस (वीर्य) की स्थापना के लिए स्त्री की सृष्टि की। तत्पश्चात उन्होंने उसके अधोभाग की उपासना (मैथुन कर्म) का विधान किया।
❤️ इस मैथुन कर्म में वाजपेय यज्ञ की समानता की कल्पना करते हैं - उन प्रजापति ने इस प्रकृष्ट गति युक्त लोढ़े को सोमरस निकालने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले प्रस्तर खंड के समान अपने शिश्न - जननेंद्रिय को, जो मैथुन काल में कठोर हो जाता है, उत्प्रेरित किया। स्त्री योनि की ओर प्रेरित किया, उस जननेंद्रिय से स्त्री का संसर्ग किया।
❤️ स्त्री की उपस्थेन्द्रिय वेदी है। वहां के रोंए (बाल) कुशा हैं। योनि का मध्य भाग प्रज्वलित अग्नि है। योनि के पार्श्व भाग में जो दो कठोर मांस खंड (भगोष्ठ) हैं उनको मुष्क कहते हैं। वे दोनों मुष्क ही अधिषवण नाम से चर्ममय सोमफलक हैं। वाजपेय यज्ञ द्वारा यजन करने वाले को जितना लोक (पुण्य) प्राप्त होता है उतना ही विद्वान के मैथुन कर्म का फल है। ऐसा कहकर यहां मैथुन कर्म की स्तुति की जाती है। अतः इससे घृणा नही करनी चाहिए।
💕💕बृहदारण्यकोपनिषद 💕💕(6।4।2-3)
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क्या हुआ अगर तुझसे थोड़ा लगाव हो गया,
क्या दोस्तो में लगाव नही होता
क्या हुआ अगर तुझसे थोड़ा प्यार हो गया,
क्या दोस्तो में प्यार नही होता
माना की तू लड़की है तो शायद ये सब गलत लगे,
अगर लड़का होती तो भी क्या सब गलत होता
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सेक्स करने से पहले इस चिकनी जिस्म को पुरुष को अपने गर्म जीभ से पहले चाटना चाहिए, जिससे स्त्री प्रेम में घुल जाती है ,धीरे धीरे पुरे कपडे उतरना चाहिए जब स्त्री सिसकियां लेने लगे और योनि द्वार गीली होने लगे तो योनि को भी चाटे फिर लिंग प्रवेश करे जो की संभोग है।
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उम्रके जो चालीस बसंत बीते तो जिंदगी पुरी नही हों गई,
चालीस पार के बाद क्या वक्त कोई नज़ाकत नही भरता!
दिन सुनहले नही रहते क्या,भले छा जाती सफेदी कैशो पे पंखों ने परवाज़ भी न भरी कैसे में सांझ की चौखटपे ढलू
क्याहुआ जो समझदार हो गई मुझे भी नाँदानियाँ करनेदो
मरहम लगा दे कोई, ऐसा ही आत्मीय रिश्ता बना लेती हु!
में इक वर्जित फल सी अपने किनारे में सिमटीसिमटी रही शब्दो के अरण्य में भटक अपने गमोको उठाये फिरतीरही
एक प्रेम की प्यासी सी चालिस पार अबला मे अकेली हु,
इतना दर्द समाया,अरमान हलचल मचा रहे मन मे मेरे भी
होती महसूस तेरी मौजूदगी तू हरवक्त मुझमें शुमार सा था
तूझे,तेरी फुरसतों को,खबर कहां मेरे मन की उदासियोकी
मेरे खुदा ने मुझको बख्शी हैं जो इसउम्र को जितनी सांसें,
उन हर सांसों की धड़कनों का तूझे भी हिस्सेदार होना था
एक इंसा जो मेरे होठों से झरे शब्दों को औक भर पी ले,
मुस्करा दे जो स्वतंत्र होके मगर आत्मीयता से वो मेरा हो!
मोहबत का समंदर हो पर हर किनारे पर उसके प्यास हो,
मुझे नही तेरा प्रेम शारारीक,अंतर्मन से आत्मिक चाहिए!
सुखी रेत पे कस्ती बह रही,हाथ में हाथ थामे तू बैठा हो, में गीत गजल प्रीत की बनी में तेरे लबों पे गुनगुनाती रहु!
मुझे साथी तेरे साथ की जरूरत है जब पुकारू साथ आए आवाज दू दौड़ा चला आये हर दर्द खुशी में शरीक होजाए
साथ बेशकीमती पल गुजारे मेरी तनहाई में मूझको संवारे,
मेरी रूह को रूह में सवारे जो मेरी खामोशी कोसमझसके
हर सै खिलखिलाई इन फिजांओ में कोई भौंरा गुनगुनाया
परिंदा बन उड़जाऊँ,चालीस पार ये नीला आसमां पाया हैं
किस्मत में तू न था फिर भी हाथों की लकिरों से चूराया हैं,
ख्वाब देखने की आदत न थी,सच तू फरिश्ते सा मिला है!
छोटी सी जिंदगी है भुला के गम दिलके सारे हँसके जी लु
अपनो के लिऐ जी ली बहुत अब खुद लिये जरा सी जी लु
मोहब्बत की खुशबू में मुझे भी जरा सी बिखरने दो यारो,
प्यार में वह पागल हुईं उनके मुझको भी सवरने दो यारो.!
रंग फीका पड़गया सफेदी छा गई हैं जरा निखरने दो यारो
अल्हड़ सी थी में मुझे फिर से अब अल्हड़ सी ही रहने दो!
चालीस पार भी दिलमें किसी को बसाया है बसने दो यारो
याद न दिलाओ महफिल में उसकी दर्द_ए_दिल लिखनेदो
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प्रेम प्रेम तो सब करे,
पर प्रेम ना जाने कोय ।
प्रेम तत्व समझी परे,
प्रेम रमण सुख होय ।।
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उम्र में 40+ को पार कर चुकीं महिलाएं बस एक अच्छा दोस्त चाहती हैं...
वो बांटना चाहती है अपने रत-जगे जो अक्सर किसी अस्पताल की बेंच पर या किसी दूर जाने वाली गाड़ी के इंतजार में काटे होते हैं!
वो बांटना चाहती है अपने आंसू जो अक्सर रति-क्रीड़ा के बाद,पति के मुंह फेरकर सोने के बाद बहाए होते हैं!
वो बांटना चाहती है वो फस्ट्रेशन जो अक्सर बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करते वक़्त उनके गाल पर जमा देती है!
वो बांटना चाहती है वो जलन जो अक्सर तवे पर रोटी सेंकते वक़्त उसकी अंगुलियों के पोरों पर महसूस होती है!
वो बांटना चाहती है वो बातें जो अक्सर वो किसी को कह नही पाती!
वो बांटना चाहती है वो स्वेद जो अक्सर गृह-कार्यो की थकान के कारण उसकी कमर पर उभर आता है!
वो बांटना चाहती है वो पहाड़ जैसे भारी धूप के टुकड़े जो अक्सर पति व बच्चों के चले जाने के बाद,उससे काटे नही कटते!
वो बांटना चाहती है अपने सफेद होते बालों की सफेदी व अपनी हिना की खुश्बू,जिसके लिए पतिदेव को अवकाश नही है!
वो बांटना चाहती है अपनी सोने के पिंजरे वाली कैद..
वो चाहती हैं एक ऐसा दोस्त जिससे खुलकर सब-कुछ बोल सके,जिसे कुछ भी बोलने से पहले एक पल को भी सोचना न पड़े!
पर भूल जाती हैं ये चालीस पार औरतें कि- - - - -
मर्द सैक्स के लालच के बिना प्रेम कर ही नही पाता..
यहां हर सहानुभूति अक्सर चिरायंध से ही भरी होती है..
वो जब प्रश्न करती है प्रेम के,भावनाओं के,गजलों के तो प्रतिप्रश्न में उनसे पूछे जाते हैं ब्रा के साइज व पैंटी के रंग के प्रश्न...
वो जब भेजती अपने विचार तो बदले में भेजी जाती है डिक की फोटोज़..
वो चाहती है हिरण सोने का और अक्सर बिछड़ जाते हैं उनसे उनके राम..
काश ... उन के पास भी कोई हो... जो बिना judge किए उन की बात सुने ..... काश 40 पार के बाद भी या बाद ही वो अपने लिए जिए .... काश , कभी उसे भी कोई भरोसेमंद दोस्त मिले ....
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प्रेम में भावना का समर्पण है फिर जिस्म का दिल से पुरुष स्त्री का संतुष्ट संभोग हैं ।वासना में सिर्फ शरीर का परोसना है ।संतुष्टि सिर्फ स्खलन से पुरुष को है ,स्त्री प्रेम की पिपासा में तड़पती रहती है।
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