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भारत में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अपराधों में वृद्धि एक जटिल सामाजिक मुद्दा है। पारंपरिक रूप से अपराध को पुरुष-प्रधान माना जाता रहा है, लेकिन हाल के दशकों में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है। इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और पारिवारिक कारण जिम्मेदार हैं।
यहाँ इसके मुख्य कारण दिए गए हैं:
1. सोशल मीडिया और झूठी महत्वाकांक्षाएं (Social Media & False Aspirations)
यह हाल के वर्षों में उभरा सबसे प्रमुख कारण है:
दिखावे की होड़ (FOMO): इंस्टाग्राम, फेसबुक और इन्फ्लुएंसर कल्चर ने रातों-रात मशहूर होने और लग्जरी लाइफस्टाइल जीने की एक अवास्तविक चाहत (unrealistic expectations) पैदा कर दी है।
शॉर्टकट की तलाश: महंगे गैजेट्स, ब्रांडेड कपड़े और हाई-प्रोफाइल जीवनशैली पाने की यह महत्वाकांक्षा जब सीमित संसाधनों या वैध आय से पूरी नहीं होती, तो कई बार युवा महिलाएं आसानी से पैसा कमाने के लिए शॉर्टकट अपना लेती हैं।
अपराध का नया स्वरूप: इस अंधी महत्वाकांक्षा के कारण हनीट्रैप (Honey-trapping), ब्लैकमेलिंग, डेटिंग ऐप्स के जरिए ठगी, और हाई-प्रोफाइल चोरी जैसे मामलों में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।
2. आर्थिक कारण (Economic Factors)
गरीबी और बेरोजगारी: वित्तीय संकट और परिवार का भरण-पोषण करने की मजबूरी कई बार महिलाओं को चोरी या ड्रग्स की तस्करी जैसे छोटे या संगठित अपराधों की ओर धकेल देती है।
उपभोक्तावाद (Consumerism): समाज में बढ़ती भौतिकवादी सोच भी महिलाओं को आर्थिक अपराधों (जैसे गबन या धोखाधड़ी) की ओर ले जाती है, जो सोशल मीडिया के प्रभाव से और भी गहरी हो गई है।
3. घरेलू हिंसा और आत्मरक्षा (Domestic Violence)
कई गंभीर अपराधों (जैसे हत्या या हमला) में, महिलाएं अक्सर लंबे समय तक पीड़ित रही होती हैं।
वर्षों तक शारीरिक, मानसिक या यौन शोषण का शिकार होने के बाद, कई बार हताशा में महिलाएं आत्मरक्षा (self-defense) या प्रतिशोध में आकर अपने अत्याचारी के खिलाफ हिंसक कदम उठा लेती हैं।
4. पुरुष अपराधियों द्वारा इस्तेमाल (Coercion and Manipulation)
ढाल के रूप में इस्तेमाल: कई संगठित अपराधों में पुरुष अपराधी महिलाओं का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस को आमतौर पर महिलाओं पर कम शक होता है।
भावनात्मक दबाव: कई मामलों में महिलाएं अपने पति, प्रेमी या परिवार के सदस्यों के दबाव या उनके प्रति अपनी वफादारी साबित करने के लिए अपराध का हिस्सा बन जाती हैं।
5. तकनीक और साइबर अपराध (Technology and Cybercrime)
साइबर धोखाधड़ी, पहचान की चोरी (identity theft) या ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग जैसे अपराधों में शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं होती। स्क्रीन के पीछे छिपकर अपराध करने की सुविधा ने भी इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई है।
6. सामाजिक और पारिवारिक संरचना में बदलाव, समर्थन प्रणाली का अभाव: एकल परिवारों (nuclear families) के बढ़ने और तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण सामाजिक समर्थन कमजोर हुआ है। गुमनामी (anonymity) के कारण "अपराध करके बच निकलने" की मानसिकता को भी बल मिला है।
7. मनोवैज्ञानिक कारण और मानसिक स्वास्थ्य
अवसाद (depression), अत्यधिक तनाव, ईर्ष्या या लालच जैसे मनोवैज्ञानिक कारण भी आपराधिक व्यवहार को जन्म देते हैं। बदला लेने की भावना भी महिलाओं को अपराध करने के लिए प्रेरित कर सकती है।
निष्कर्ष: सोशल मीडिया ने हमारी इच्छाओं को असीमित कर दिया है, लेकिन उन्हें पूरा करने के साधन सीमित हैं। जब यह महत्वाकांक्षा यथार्थ से टकराती है, तो कई बार अपराध का रास्ता जन्म लेता है। यह स्थिति सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दबावों का एक जटिल मिश्रण है।
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| 8 | शरीर का 95% भाग नहीं करता काम, C.G में किया ऐसा काम की राष्ट्रपति ने बुलाया Delhi | Manish Badbandha | The Lokras
नमस्ते दोस्तों,
आज हम आपके लिए लाए हैं छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के कुरुद निवासी प्रसिद्ध चित्रकार बसंत साहू की प्रेरणादायक कहानी, जिन्होंने शारीरिक दिव्यांगता को अपनी सफलता की राह में रुकावट नहीं बनने दिया।
95% शरीर निष्क्रिय होने के बावजूद, बसंत साहू को भारत सरकार के 'दिव्यांगजन सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार 2025' के अंतर्गत 'सर्वश्रेष्ठ दिव्यांगजन' श्रेणी में चुना गया है। व्हीलचेयर से कैनवास तक का उनका यह सफर लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है।
राष्ट्रपति के हाथों सम्मान:
52 वर्षीय बसंत साहू 3 दिसंबर को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करेंगे। यह कार्यक्रम “अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस” के अवसर पर आयोजित किया जाएगा।
जीवन की कठिनाई के बीच शुरू हुई चित्रकला:
15 सितंबर 1995 को एक सड़क दुर्घटना में उनकी रीढ़ की हड्डी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई, जिससे उनका 95% शरीर निष्क्रिय हो गया। डॉक्टरों के मना करने के बावजूद, उन्होंने बिस्तर पर लेटे-लेटे ही चित्रकला की यात्रा शुरू की।
बसंत का व्हीलचेयर से कैनवास तक का सफर:
बसंत साहू व्हीलचेयर पर बैठकर चित्र बनाते हैं। वह अपने दाएं हाथ में एक पट्टा बांधकर ब्रश फंसाते हैं और इसी तकनीक से रंगों को कैनवास पर उतारते हैं। उनकी हजारों कलाकृतियां आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित हैं।
बसंत का जीवन प्रेरणा का प्रतीक है। उन्होंने साबित किया है कि दिव्यांगता शरीर में हो सकती है, मन में नहीं! उनकी कहानी सिर्फ एक कलाकार की नहीं, बल्कि अदम्य साहस और आत्मविश्वास की मिसाल है।
बसंत साहू जी की इस कहानी को एक Like ज़रूर करें और Comment में बताएं कि आपको इस वीडियो से क्या प्रेरणा मिली?
ऐसे ही प्रेरणादायक वीडियोज़ देखने के लिए चैनल को Subscribe करें!
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| 13 | 📻 6 जुलाई 1944 का ऐतिहासिक संदर्भ हमें उस समय में ले जाता है जब भारत आज़ादी की लड़ाई के निर्णायक दौर से गुज़र रहा था।
इसी दौर में आज़ाद हिंद रेडियो (सिंगापुर से प्रसारण) के माध्यम से नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने महात्मा गांधी को सम्मानपूर्वक “Father of the Nation” कहकर संबोधित किया। एक ऐसा भावनात्मक क्षण जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर एक गहरा नैतिक संदेश दिया।
ये वो समय था जब अलग-अलग विचारधाराओं के ये दो नेता एक ही लक्ष्य—भारत की आज़ादी के लिए अपने-अपने तरीके से संघर्ष कर रहे थे।
उस समय जहाँ नेताजी आज़ाद हिंद फौज के माध्यम से सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व कर रहे थे, वहीं गांधीजी अहिंसा और जन-आंदोलन के प्रतीक बने हुए थे।
“राष्ट्रपिता” शब्द किसी औपचारिक उपाधि के रूप में नहीं, बल्कि एक सम्मान और भावनात्मक स्वीकार्यता के रूप में सामने आया, जो आगे चलकर गांधीजी की पहचान का हिस्सा बन गया।
आज जब हम इस दिन को याद करते हैं, तो यह हमें सिखाता है कि इतिहास केवल संघर्षों से नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और साझा उद्देश्य से भी बनता है... और यही भावना किसी भी राष्ट्र की असली ताकत होती है।
[History | On This Day | Inspiring | Indian History| Subhash Chandra Bose| Mahatma Gandhi] | 505 |
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| 15 | 🎯"मार्गदर्शन" कोई भी करें पर
चलना ख़ुद को ही पड़ता हैं।⛳️
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