🌹 Pyari ju ka Pyara Barsana🌹
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राधा_नाम_पुकार!_Shri_Hit_Premanand_Govind_Sharan_Ji_Maharaj_48k.m4a21.00 MB
*राधा राधा राधा राधा राधा*
*४३१. प्रश्न- कर्मयोगका साधक कर्म कैसे करता है ?*
_उत्तर - कर्मयोगी पहले भगवत्भावकी प्राप्तिके लिये और भगवत् भावकी प्राप्ति होने पर केवल भगवान् की प्रेरणा वश यन्त्रकी भाँति कर्म करता है। उस समय वह कर्मके बाह्य स्वरुपको न देखकर अर्जुनकी भाँति गुरुवध, स्वजनवध, भीषण हिंसा आदिकी बात न सोचकर केवल भगवान् की प्रेरणाको देखता है। भगवान् ही उसकी गति, नीति, उद्देश्य, जीवन और धेर्य होते हैं। भगवान् के साथ युक्त होकर भगवदीय कार्य करना ही उसका स्वभाव होता है।_
*४३२. प्रश्न- फिर तो स्वभावतः वशीभूत मनुष्य भोग प्रवृतिकी प्रेरणाको भी ईश्वरकी प्रेरणा माननेकी भूल कर सकता है ?*
_उत्तर- श्रद्धापूर्वक भगवान् का नित्य-निरंतर चिन्तन करते हुए मनुष्यके अन्त:करणमें जो कुछ स्फूरणा हो और जिसमें इन्द्रिय भोग-लालसा और कामनाका क्रमशः दमन होता हो, जो शास्त्रोक्त कर्म हो-पहले-पहल ऐसी शुभ कर्मोंकी प्रेरणाको भगवत्प्रेरणा समझे। साधना करते-करते भगवत्प्रेरणाकी स्पष्ट अनुभूति होने लगेगी। इसीलिये गीताकी शिक्षा वस्तुतः अर्जुन जैसे योग्य अधिकारीके लिये है। परन्तु वह अधिकार भी गीताकी शरण, गीताका अध्ययन और मनन एवं गीताके उपदेशानुसार जीवन बनानेकी चेष्टा करनेसे ही प्राप्त होगा। इसलिये गीताकी शिक्षा वस्तुत: इन्द्रिय-संयमी, तपस्वी, भक्त, अधिकारीके लिये होते हुए भी साधारणत: सभीके लिये है। अनधिकारके कारण ही गीताका दुरुपयोग होता है।_
*४३३. प्रश्न- क्या कर्म करनेमें स्वतंत्रता है ?*
_उत्तर- मनुष्यको कर्म करनेकी जो शक्ति मिली है, इसमें तो परतंत्रता है और शक्ति पाकर कर्म कैसा करे, इसमें उसकी स्वतंत्रता है।_
*४३४. प्रश्न- जब कर्मका फल मनुष्यके हाथमें नहीं है, तब कर्म क्यों किये जायँ ?*
_उत्तर- इसीलिये भगवान् ने पहलेसे सावधान कर दिया कि कर्म-त्यागकी ओर तेरा मन नहीं लगना चाहिये। क्योंकि कर्म करनेमें तेरा अधिकार है। अतएव मनुष्यको अपने अधिकारके अनुसार कर्म करना चाहिये। परन्तु फलकी आशासे नहीं। कर्म बिना उद्देश्यके नहीं होता, इसलिये मनुष्यके कर्ममें भी कोई उद्देश्य या लक्ष्य रहेगा।_
पुस्तक
*क्या क्यों और कैसे*
गीतावाटिका प्रकाशन(गोरखपुर)
_*🌹 बरसाना धाम से, श्रीराधा रानी के आज के सुंदर श्रृंगार दर्शन।🌹 जय जय श्रीराधे 🌹🙏🌹*_
