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प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हर दूसरे छात्र की कहानी आज कुछ ऐसी ही दिखती है—मेहनत की शुरुआत तो बड़े जोश से होती है, लेकिन अंतिम परिणाम तक पहुंचते-पहुंचते कदम डगमगा जाते हैं। जब परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आता, तो अक्सर हम अपनी असफलताओं का ठीकरा माता-पिता, नौकरी की व्यस्तता, समाज, शिक्षकों या कोचिंग संस्थानों पर फोड़ देते हैं।
लेकिन अगर हम पूरी ईमानदारी से आत्म-निरीक्षण (Self-analysis) करें, तो इस असफलता के पीछे की असली वजह कोई बाहरी परिस्थिति नहीं, बल्कि हमारा अपना कम्फर्ट ज़ोन (Comfort Zone) होता है।
बिस्तर की गरमाहट प्यारी, नींदें अभी अधूरी हैं,
"आज नहीं कल पढ़ लेंगे", यह कैसी मजबूरी है?
रील्स की दुनिया, दोस्तों का साथ, बड़ा सुख देता है,
यही कम्फर्ट ज़ोन धीरे से, सारा समय चुरा लेता है।
जब आता है परिणाम और नाम नहीं होता सूची में,
तब अचानक दोष दिखने लगते हैं हर एक दूजी में!
"कोचिंग ने अच्छा नहीं पढ़ाया, नोट्स में कमी रह गई थी,
माता-पिता ने टोका बहुत, समाज की बातें सहनी पड़ी थीं।"
"नौकरी की व्यस्तता थी, समय ही कहाँ मिल पाया था,
किस्मत ही खराब थी मेरी, ईश्वर ने जाल बिछाया था।"
सोचो ज़रा तुम बैठ अकेले, क्या सच में यही कहानी है?
या फिर तुमने ही अपनी, हिम्मत और लगन गंवानी है?
शिक्षक रास्ता दिखाता है, चलना तुम्हें ही पड़ता है,
जो रातों की नींदें खोता है, वही इतिहास बदलता है।
कठिन सवालों से डरकर, तुमने ही पन्ने पलटे थे,
जब मेहनत की बारी आई, तब तुम्हारे ही कदम हटे थे।
तोड़ दो इस कम्फर्ट ज़ोन के छलावे को, यह एक मीठा ज़हर है,
इसके पार ही सफलता की, एक नई और उजली सहर है।
दोषारोपण की आदत छोड़ो, जिम्मेदारी खुद पर लो,
मंज़िल पाना है अगर, तो पहले खुद से लड़ना सीखो
आखिरी बात इस क्लास में हर एक स्टूडेंट जानता है के शक्कर स्वास्थ्य के लिए कितनी नुकसानदायक होती है, लेकिन फिर भी हम उसे खाते हैं और तब तक खाते हैं जब तक कि डायबिटीज ना हो जाए कहीं ऐसा न हो कि यह डायबिटीज हमारे अंगों को खराब कर दे और हम किसी कार्य के लायक ना बचें, इसलिए अभी भी समय है।ऊपर कही गई बातों पर ध्यान से सोचिए और अपने कंफर्ट जोन से निकलकर सर्वश्रेष्ठ प्रयास कीजिये
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता
इसे श्लोक का अर्थ है की
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन के द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न होने दे। क्योंकि यह मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र है और यही मन उसका सबसे बड़ा शत्रु भी है।
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भारतीय संविधान: शपथ और प्रतिज्ञान की अनकही कहानियाँ
क्या आपने कभी सोचा है कि संविधान की तीसरी अनुसूची (3rd Schedule) में 'शपथ' (Oath) और 'प्रतिज्ञान' (Affirmation) जैसे दो अलग-अलग शब्दों का प्रयोग क्यों किया गया है? क्या यह केवल पर्यायवाची हैं या इनके पीछे कोई गहरा संवैधानिक तर्क है?
इस वीडियो में हम संविधान के उन महत्वपूर्ण पहलुओं को डिकोड करेंगे जो अक्सर परीक्षाओं और सामान्य चर्चाओं में छूट जाते हैं।
प्रमुख बिंदु जो आप इस वीडियो में समझेंगे:
शपथ vs प्रतिज्ञान: आस्तिक और नास्तिक व्यक्तियों के लिए संविधान में क्या अलग व्यवस्था है? जानिए ईश्वर के नाम पर 'शपथ' और सत्यनिष्ठा से 'प्रतिज्ञान' के बीच का सूक्ष्म अंतर।
अनुसूची 3 की सीमाएं: क्या आप जानते हैं कि राष्ट्रपति (Art. 60), उपराष्ट्रपति (Art. 69) और राज्यपाल (Art. 159) की शपथ तीसरी अनुसूची का हिस्सा नहीं है? इनके लिए अलग अनुच्छेद क्यों बनाए गए?
शब्दावली का महत्व: राष्ट्रपति और राज्यपाल की शपथ में प्रयोग होने वाले तीन विशिष्ट शब्द— परिरक्षण (Preserve), संरक्षण (Protect) और प्रतिरक्षण (Defend)—का क्या अर्थ है? यह शब्द उन्हें 'संविधान का संरक्षक' कैसे बनाते हैं?
विभिन्न पदों की शपथ का सफर: हम विस्तार से समझेंगे कि निम्नलिखित अनुच्छेदों के तहत कौन-कौन से पद शपथ लेते हैं:
अनुच्छेद 75(4) व 164(3): संघीय और राज्य मंत्री
अनुच्छेद 99 व 188: संसद और विधानमंडल के सदस्य
अनुच्छेद 124(6) व 219: उच्चतम और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश
अनुच्छेद 148(2): भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (CAG)
संविधान की इन बारीकियों को गहराई से समझने के लिए इस वीडियो क्लिप को अंत तक अवश्य देखें!
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