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भारतीय न्याय संहिता द्वारा आईपीसी के रद्द किये गये अपराध
1. अप्राकृतिक यौन अपराध: भारतीय न्याय संहिता ने अप्राकृतिक यौन अपराध से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को किसी ऐसे प्रावधान के उपलब्ध कराए बिना ही हटा दिया है जो की पुरुषों के साथ होने वाले यौन अपराधों से निपटने में सक्षम हो
2. व्यभिचार: आईपीसी की धारा 497 को लैंगिक असमानता के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में रद्द कर दिया था और भारतीय न्याय संहिता द्वारा इसे हटा दिया गया है।
3. ठग: भारतीय न्याय संहिता से आईपीसी की धारा 310 को हटा दिया गया है, जिसमें ठग की परिभाषा दी गई है।
भारतीय न्याय संहिता के तहत नए अपराध
1. शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाना: भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाने पर अब दस साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है।
2. भीड़ द्वारा हत्या: जाति, पंथ, धर्म और समुदाय के आधार पर भीड़ द्वारा हत्या जैसे अपराध के लिए अब आजीवन कारावास या मृत्युदंड का प्रावधान है।
3. संगठित अपराध: भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 उपधारा (1) में अपहरण, डकैती, लूट, जबरन वसूली आदि जैसे संगठित अपराधों को परिभाषित किया गया है, जिनके लिए 5 वर्ष से आजीवन कारावास की सजा के साथ पांच लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।
4. छोटे-मोटे संगठित अपराध: भारतीय न्याय संहिता की धारा 112 के तहत छोटे संगठित अपराधों को परिभाषित किया गया है, जैसे चोरी, छीनाझपटी, ब्लैक में टिकट बेचना, परीक्षा के प्रश्नपत्र बेचना, जुआ खेलना आदि।
5. आतंकवादी कृत्य: धारा 113 "आतंकवादी कृत्य" को परिभाषित करती है जिसके अनुसार किसी व्यक्ति द्वारा भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता, सुरक्षा या आर्थिक सुरक्षा को खतरा पहुंचाने के इरादे से आतंक फैलाने के लिए किया गया कार्य है, जो मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय है, यदि इसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और किसी अन्य मामले में 5 वर्ष से आजीवन कारावास की सजा के साथ जुर्माने का प्रावधान है।
6. आत्महत्या का प्रयास करना: धारा 226 के तहत किसी लोक सेवक को उसके क़ानूनी कर्तव्य का पालन करने से रोकने के लिए आत्महत्या का प्रयास करने पर एक वर्ष तक का कारावास, जुर्माना या दोनों या सामुदायिक सेवा का प्रावधान है।
