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★Aam Aadmi Party's unofficial channel for dedicated AAP volunteers ★Made to provide content to be shared on WhatsApp and other social media "CRUSADE AGAINST PAID/BIASED MEDIA" t.me/AAPPulse

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तंत्र की मदद से जिन 10 बूथों पर सबसे ज़्यादा वोट काटे गये वो थे….काली बाडी मार्ग (53 प्रतिशत), सरोजनी नगर (38 प्रतिशत), सुनहरी बाग़ (25 प्रतिशत), रेस कोर्स ( 9 प्रतिशत), बाबू मार्केट सरोजनी नगर (8 प्रतिशत), रेसकोर्स (7 प्रतिशत), मंदिर मार्ग (7 प्रतिशत), सरोजनी नगर बी एवेन्यू (7 प्रतिशत), साउथ एवेन्यू (7 प्रतिशत), सरोजनी नगर ब्लाक-१ (6 प्रतिशत) तंत्र की मदद से जिन 10 बूथों पर सबसे ज्यदा वोट जोड़े गए वो हैं…..लक्ष्मी बाई नगर (17 प्रतिशत), मंदिर मार्ग (16 प्रतिशत), आर के आश्रम मार्ग (16 प्रतिशत), किदवई नगर ईस्ट (16 प्रतिशत), गोल मार्केट (16 प्रतिशत), काली बाडी मार्ग (16 प्रतिशत), नवयुग स्कूल लक्ष्मी बाई नगर (14 प्रतिशत), सर्वोदय विद्यालय ईस्ट किदवई नगर (14 प्रतिशत), बांग्ला साहिब रोड़ (14 प्रतिशत) और पेशवा रोड़ (14 प्रतिशत) अंत में बस इतना सा सवाल आपके लिए छोड़ जाता हूँ कि पिछले चुनाव में केजरीवाल बीजेपी के उम्मीदवार से क़रीब 22 हज़ार वोट आगे थे। अगर सही में बीजेपी ये चुनाव लोकतांत्रिक तरीक़े से जीतती तो बीजेपी के वोट में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा होना चाहिये था, लेकिन वो तो हुआ ही नहीं। बीजेपी के वोट पिछली बार से क़रीब 5 हज़ार बढ़े, चुनाव केजरीवाल इसलिए हार गए क्योंकि केजरीवाल के वोट 20 हज़ार कम हो गए। केजरीवाल के वोट कम करने के लिए पैसा भी बाँटा गया, पुलिस का भी इस्तेमाल हुआ, गुंडों का भी सहारा लिया गया और चुनाव आयोग की भी मदद ली गई। ये सारा सिस्टम लोकतंत्र पर भारी पड़ा। अंतत: तंत्र जीत गया और लोकतंत्र हार गया। किन्तु ये इस परंपरा का अंत नहीं बल्कि शुरुआत है। केजरीवाल तो ज़मीन से उठा था, फिर उठ जाएगा। लेकिन लोकतंत्र गिरा तो क्या उठ पाएगा?

दरअसल बीज़ेपी ने केजरीवाल को हराने की योजना पहले ही बना ली थी। शायद नई दिल्ली विधानसभा के चुनाव का नतीजा पहले लिख दिया गया था और वोटिंग बाद में करवाई गयी। साल 2022 में पंजाब की जीत के बाद गुजरात विधानसभा का चुनाव जब आम आदमी पार्टी ने लड़ा और जिस ताक़त के साथ लड़ा, बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को लगना शुरु हो गया था कि अगर केजरीवाल को नहीं रोका गया तो जितना सोचा जा सकता है उससे भी कम समय में राज्य दर राज्य वो बीजेपी के लिए चुनौती बन जाएँगे। बीजेपी के थिंक टैंक को पता था कि मौजूदा परिस्थितियों में नई दिल्ली विधानसभा से केजरीवाल से ज़्यादा वोट लेना बीजेपी के किसी उम्मीदवार के लिए संभव नहीं है। नई दिल्ली सीट से बीजेपी के किसी उम्मीदवार को कभी 25 हज़ार से ज़्यादा वोट नहीं मिल पाए और इतने वोटों से केजरीवाल को नहीं हराया जा सकता था। इसलिए एक साज़िश तैयार करके केजरीवाल को मिलने वाले वोटों को ही ख़त्म करने का सिलसिला शुरु किया गया। उदाहरण के तौर पर 9 अगस्त 2024 को काली बाड़ी मार्ग से 104 झुग्गियों के निवासियों को नरेला शिफ्ट कर दिया गया। इस बात का भी ख़्याल नहीं रखा गया कि “जहां झुग्गी, वहाँ मकान” का नारा तो मोदी जी ने ही दिया था। नतीजा ये कि 2020 में यहां (बूथ 14) से आम आदमी पार्टी को 342 और बीजेपी को 184 वोट मिले थे। 2025 में यहां (जो अभी बूथ 18 है) से आम आदमी पार्टी को 140 और बीजेपी को 104 वोट मिले। यानि इस एक बूथ पर ही 158 वोट की लीड घट कर 36 वोट रह गयी। सुनहरी बाग़ के बूथ 50 से झुग्गियाँ तोड़कर 268 नाम वोटर लिस्ट से काट दिये गये। साल 2020 में इस बूथ (जो उस समय बूथ 69 था) से आम आदमी पार्टी को 362 वोट मिले थे और बीजेपी को 159 वोट मिले थे। जबकि 2025 में इस बूथ (जो अब बूथ 50 है) से आम आदमी पार्टी को 183 और बीजेपी को 157 वोट मिले। यानि बीजेपी का वोट तो इस बूथ पर कुछ नहीं बढ़ा लेकिन आम आदमी पार्टी की 203 वोटों की लीड घटकर 26 वोट की रह गयी। इसी तरह सरोजनी नगर बूथ 63 पर 451 वोट काटे गये और पूरा समीकरण ही बदल गया। साल 2020 में बूथ 63 पर आम आदमी पार्टी को 277 वोट मिले थे जबकि बीजेपी को 99 वोट मिले थे। लेकिन इस बार की मतगणना में बूथ 63 पर आम आदमी पार्टी को केवल 86 वोट मिले हैं जबकि बीजेपी को 111 वोट मिले हैं। मतलब बूथ 63 पर 451 वोट कटे और आम आदमी पार्टी की 178 वोटों की लीड 25 वोट की हार में बदल गयी। पूरी नई दिल्ली विधानसभा में लगभग हर बूथ की यही कहानी है। यहाँ लोकतंत्र को हराने के लिए तंत्र का नंगा खेल खेला गया है। वोट काटने और जोड़ने की कहानी में एक महत्वपूर्ण पड़ाव लोकसभा चुनाव भी था। लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने जो मतदाता सूची जारी की उसमें नई दिल्ली के मतदाता 1 लाख 382 बताए गए, यानि लोकसभा चुनाव तक बीजेपी और चुनाव आयोग की मिलीभगत से 45 हज़ार 740 वोट काट दिए गए थे। यानि लगभग एक तिहाई विधानसभा के ही वोट काट दिए गए थे। लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों से बीजेपी को समझ आ गया कि इतने वोट काटने पर भी केजरीवाल की नई दिल्ली विधानसभा में लोकप्रियता बीजेपी पर भारी पड़ रही थी। आम आदमी पार्टी की लोकसभा चुनावों में नई दिल्ली विधानसभा से 2200 वोटों से जीत हुई थी। बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के बाद इस फ़ासले को पाटने के लिए विधानसभा में वोट बनवाने शुरु किए। बीजेपी के सांसदों के घरों के पतों पर ही कम से कम 2000 वोट बनवाए गए। बीजेपी अपने वोट बढ़ाने के लिए लोकल मतदाता के भरोसे नहीं रही। बीजेपी ने अपने सभी सांसदों को निर्देश दिए कि वो अपने सरकारी आवास पर 15 से 30 वोट बनवाएँ जिसका नतीजा ये हुआ कि चुनाव के ठीक पहले क़रीब 2000 वोट इस विधानसभा में नये जोड़े गये। सांसदों के सरकारी आवासों पर इस तरह थोक में वोट बनवाने का गोरखधंधा पहले शायद कभी नहीं हुआ और चुनाव आयोग ने इस खेल में बीजेपी का पूरा साथ दिया। ध्यान रहे कि जो नये वोट बनवाए गए उनमें से किसी ने भी कुछ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में इस इलाक़े में वोट नहीं डाले थे। लोकसभा चुनाव से विधानसभा चुनाव के बीच 8000 नये वोट जोड़े गए। इस गोरखधंधे का नतीजा ये हुआ कि जनपथ रोड जहां सांसदों के बंगले और स्टाफ़ क्वाटर हैं वहाँ बूथ 61 पर साल 2020 के चुनाव में आम आदमी पार्टी को 210 वोट और बीजेपी को 64 वोट मिले थे। लेकिन इस बार चुनाव आयोग की थोक में वोट बनाने की मेहरबानी के चलते इस बूथ पर (जो अब बूथ 42 है) आम आदमी पार्टी को 157 और बीजेपी को 176 वोट मिले। यानि 146 वोट की लोकतांत्रिक लीड तंत्र की मदद से 19 वोट की हार में बदल दी गई।

ख़ुद से एक सवाल पूछिए कि क्या लोकतंत्र का अपहरण किया जा सकता है? क्या सिस्टम लोकतंत्र पर हावी हो सकता है? ये रिपोर्ट पढ़कर आप कहेंगे हाँ, लोकतंत्र का अपहरण हुआ है। क्योंकि लोकतंत्र का मतलब लोगों की राय में किसी का लोकप्रिय होकर बहुमत हासिल करना और किसी दूसरे का अलोकप्रिय होकर हार जाना है। लेकिन क्या ऐसा संभव है कि कोई बिना लोकप्रिय हुए जीत जाए और कोई अलोकप्रिय हुए बिना ही चुनावी गणित में हार जाए? नई दिल्ली विधानसभा सीट का चुनाव इस बात का उदाहरण है कि अगर कोई व्यक्ति सड़े गले सिस्टम के लिए चुनौती बना जाए तो ये संभव है कि पूरा तंत्र एक होकर लोकतंत्र की ही हत्या कर दे और सिस्टम को चुनौती देने वाले व्यक्ति को लोकप्रिय होते हुए भी चुनावी गणित में हरा दे। दिल्ली विधानसभा चुनावों पर पूरे देश की नज़र थी, लेकिन नई दिल्ली विधानसभा पर पूरी दुनिया की नज़र थी। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी जिसका देश में 10 साल से एकछत्र राज चल रहा है, बीस प्रदेशों में जिसकी सरकार है, उसे अगर किसी आधे राज्य का नेता पिछले एक दशक से लगातार चुनौती दे रहा हो तो सबकी नज़र तो उस पर होगी ही। मैं इस रिपोर्ट की शुरुआत कुछ आँकड़ों से कर रहा हूँ। साल 2020 में नई दिल्ली सीट पर 52.37 प्रतिशत वोट पड़े और कुल 76530 वोट पड़े। इस बार यानि साल 2025 में वोट प्रतिशत 4 फ़ीसदी बढकर 56.41 प्रतिशत हो गया लेकिन सिर्फ़ 61244 वोट ही पड़े। आप सोच रहे होंगे कि ये कैसी बात कर रहे हैं? शायद मुझे गणित नहीं आता? या ऐसा ही कुछ आपके मन में आया होगा। लेकिन ये सभी आँकड़े एकदम सही हैं और चुनाव आयोग के आधिकारिक आँकड़े हैं। फिर ये कैसे हो सकता है कि 4 फ़ीसदी पोलिंग बढ़ने के बाद भी पोल हुए वोट 76530 से घट कर सिर्फ़ 61244 रह गए? यही तो है लोकतंत्र पर तंत्र की पहली जीत। साल 2020 से 2025 के बीच विधानसभा सीटों का कोई डीलिमिटेशन नहीं हुआ। यानि बीजेपी और चुनाव आयोग ने ही तंत्र का इस्तेमाल कर लोकतंत्र के पहले स्तंभ यानि किसी “विधानसभा के कुल मतदाता” को ही मैनेज कर दिया। साल 2020 में नई दिल्ली विधानसभा में कुल 1 लाख 46 हज़ार 122 वोटर थे, लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव में क़रीब 38 हज़ार वोट कम कर दिए गए और कुल मतदाता बचे 1 लाख 8 हज़ार 574, अब पूरा तंत्र किसके हाथ में था और वोट किसके कटे होंगे इसको समझना तो कोई रॉकेट साइंस नहीं है। आपके मन में भी सवाल होगा कि जब पूरे देश की, हर प्रदेश की और हर शहर की आबादी बढ़ रही है तो नई दिल्ली विधानसभा सीट के 38 हज़ार लोग कहां चले गए? इसका जवाब भी इसी रिपोर्ट में आगे चल कर मिल जाएगा लेकिन फ़िलहाल कुछ और आँकड़े आपके सामने हैं। साल 2020 में नई दिल्ली विधानसभा से 46758 वोट हासिल कर केजरीवाल चुनाव जीते थे और दूसरे नंबर पर बीजेपी को 25061 वोट मिले। यानि अरविंद केजरीवाल क़रीब 21700 वोट के बड़े अंतर से चुनाव जीते थे। तो लोकतंत्र में केजरीवाल के चुनाव हार जाने के ये कुछ तरीक़े हो सकते हैं। 1. केजरीवाल को मिले बढ़त के 21700 वोटों में से आधे से ज़्यादा बीजेपी को चले जाएँ तो उसका उम्मीदवार जीत सकता है। यानि बीजेपी के वोटों में 10800 या इससे ज़्यादा वोट जुड़ जाएँ। ऐसी स्थिति में बीजेपी को 36000 या उससे अधिक वोट मिलने चाहिये। लेकिन 2025 विधानसभा चुनाव में नई दिल्ली सीट पर बीजेपी को केवल 30000 वोट ही मिले हैं। लेकिन फिर भी बीजेपी उम्मीदवार जीत गया, कैसे? 2. केजरीवाल के बढ़त वाले 21700 वोट किसी तीसरे दल को चले जाएँ और बीजेपी के वोट केजरीवाल से ज्यादा हो जाएँ। लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ, कांग्रेस को पिछली बार से सिर्फ़ 1 हज़ार वोट ज़्यादा मिले हैं। फिर भी बीजेपी उम्मीदवार के वोट केजरीवाल से ज़्यादा हो गए, कैसे? नई दिल्ली विधानसभा 2025 के चुनाव में ऊपर दिए गए दोनों तरीक़ों में से कुछ भी नहीं हुआ। फिर भी केजरीवाल चुनाव हार गए और बीजेपी चुनाव जीत गयी। ये कैसे हो सकता है? यही तो तंत्र का कमाल है जिससे लोकतंत्र हार गया। कुछ और आँकड़े हैं जिससे समझना और आसान हो जाएगा। 2020 में केजरीवाल को 61 फ़ीसदी वोट मिले और 2025 में 42 फ़ीसदी वोट मिले यानि उनके वोट प्रतिशत में क़रीब 19 फ़ीसदी की गिरावट आयी। और इन पाँच सालों में इस विधानसभा के 26 प्रतिशत मतदाता वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। आँकड़े ख़ुद बयान कर रहे हैं कि बिना बीजेपी के वोटों में बड़ा बदलाव हुए कैसे केजरीवाल के वोट कम हो गए? सब स्पष्ट है कि ये मतदाता किसके हटाए गए, किसने हटाए और क्यों हटाए? ध्यान रहे कि अभी तक हमने पुलिस पैसा और पावर के इस्तेमाल का कोई ज़िक्र तक नहीं किया है। वो सब मैं आपके विवेक पर छोड़ता हूँ।

हम हारे नहीं उसूलों से … Beautiful Song ! 👏👏👏👏👏 🎵 🎸 🎶

आज तक किसी भी बड़े नेता या पार्टी ने मिडिल क्लास की बात ही नहीं करी ! सिर्फ अरविंद केजरीवाल ही ऐसे नेता है जो मिडिल क्लास के लिए बजट में क्या आना चाहिए यह सोचकर केंद्र सरकार के सामने रख रहे हैं ! लेकिन क्या केंद्र सरकार उनकी बात मानेगी ??

केजरीवाल ने आज तो तहलका ही मचा दिया 🔥 जिस Middle Class को टैक्स के नीचे दबाया जा रहा था, जिसके बारे में कोई बात तक नहीं करता है, केजरीवाल ने आज उस मिडल क्लास के उद्धार के लिए पूरा प्लान दे दिया ‼️ 👉केजरीवाल ने कहा Middle Class को समर्पित हो देश का अगला बजट साथ ही केजरीवाल ने की केंद्र से 7 सूत्रीय मांग 1⃣शिक्षा का बजट 10% किया जाए, प्राइवेट स्कूलों की फीस पर लगे लगाम 2⃣उच्च शिक्षा के लिए Subsidy और Scholarship दी जाएं 3⃣स्वास्थ्य बजट 10% किया जाए, हेल्थ इंश्योरेंस से Tax हटाया जाए 4⃣Income Tax की छूट की सीमा 10 Lakh की जाए 5⃣आवश्यक चीजों के ऊपर से GST खत्म किया जाए 6⃣बुजुर्गों के लिए रिटायरमेंट प्लान और मजबूत पेंशन की योजना बनाई जाए 7⃣बुजुर्गों को रेलवे में 50% कंसेशन फिर से शुरू किया जाए Middle क्लास का खून चूसने वाली केंद्र सरकार ने इसमें से दो-चार माँग भी मान ले तो ज़िंदगी बड़ी बेहतर हो जाएगी 👍💯 आप भी केजरीवाल की मांगों का समर्थन करते हैं तो इस Website पर जाकर अपनी आवाज बुलंद करें👇🔥 https://middleclassmanifesto.com/

अरविंद केजरीवाल ने जारी किया भाजपा का मेनिफेस्टो : आप भी सुने 🎯

जो लोग फ्री हेल्थ केयर को मुफ्त की रेवड़ी कह रहे है उन्हे ये दिखाये : दुनिया के उन देशों की सूची जो अपनी जनता को मुफ़्त हेल्थके
जो लोग फ्री हेल्थ केयर को मुफ्त की रेवड़ी कह रहे है उन्हे ये दिखाये : दुनिया के उन देशों की सूची जो अपनी जनता को मुफ़्त हेल्थकेयर देते हैं!

अमित शाह जी कह रहे हैं की केंद्र सरकार ने पिछले 6 महीने में आंध्र प्रदेश को तीन लाख करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता दी है!!! ओडिशा, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की जनता ने भी बदलाव के झाँसे में बीजेपी की सरकार बनवाई थी। पर इन राज्यों को कुछ भी नहीं मिला। दरअसल बीजेपी के लिए वो राज्य “घर की मुर्गी, दाल बराबर” हैं जहाँ इनकी सरकार है। उन सभी राज्यों के हक का पैसा भी ये अब आंध्र प्रदेश को दे रहे हैं। और आंध्र प्रदेश को ये पैसे इसलिए दिए जा रहे हैं ताकि चंद्रबाबू नायडू जी की तेलुगू देशम पार्टी के 16 लोकसभा सांसद बीजेपी का समर्थन करते रहें। यानि केंद्र में बीजेपी की सरकार बचाए रखने की क़ीमत है ये तीन लाख करोड़ रुपये!! तो एनडीए के सबसे बड़े घटक दल को मोदी जी ने अपनी विचारधारा और काम की ताक़त से नहीं, पैसों के बल पर अपने साथ जोड़ा है। ये वही मोदी जी हैं जो एक समय केजरीवाल सरकार द्वारा जनता को दी जा रही सहूलियतों को “मुफ्त की रेवड़ी” कहते थे!!! -अब ये कौन सी रेवड़ी है जो आंध्र प्रदेश को अलग से दी जा रही है? -क्या ये करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा नहीं है? -क्या ये बाक़ी राज्यों के साथ नाइंसाफी नहीं है? ये सवाल उन राज्यों की जनता को भी पूछना चाहिए की आख़िर बीजेपी को वोट देकर उन्होंने क्या गुनाह किया है जो उनका हक़ छीन कर आंध्र प्रदेश को दिया जा रहा है... https://x.com/shail2018/status/1881348151359275161?s=19

Full Documentary Unbreakable

देश भर में मूलभूत सुविधाओं के मामले में सरकारी स्कूल अभी भी प्राइवेट स्कूलों के बराबर पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं। पर दिल्ली देश का इकलौता राज्य है जहाँ सौ प्रतिशत सरकारी स्कूलों में: -इस्तेमाल योग्य शौचालय है -बिजली की सुविधा है -इस्तेमाल योग्य कंप्यूटर है -रैंप्स की सुविधा है ये भारत सरकार की UDISE+ रिपोर्ट कहती है। लिस्ट में मौज़ूद 19 प्रमुख राज्यों में से 11 राज्यों में बीजेपी की डबल इंजन सरकार है फिर भी ये अपने सभी सरकारी स्कूलों में आज तक मूलभूत सुविधा भी नहीं दे पाए हैं। यहाँ तक की, गुजरात के सभी सरकारी स्कूलों में इन चार में से तीन मूलभूत सुविधाएँ अभी भी नहीं है। और प्रधानमंत्री मोदी जी दिल्ली की जनता को कहते हैं कि केंद्र सरकार जो पैसा दिल्ली सरकार को भेजती है वो खर्च नहीं करते!! यानि केजरीवाल ने सिर्फ़ राज्य सरकार के बजट से ही ये सारी मूलभूत सुविधाएं दिल्ली के सभी सरकारी स्कूलों में दी, वो भी अव्वल दर्जे की क्वालिटी और रखरखाव के साथ। अब सोचने की बात ये भी है कि जो पैसा मोदी जी अपनी ही पार्टी की सरकारों को भेज रहे हैं, क्या वो बच्चों के हित में खर्च हो रहा है? वैसे असल मुद्दा पैसों का नहीं, नियत का है। चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस, ये दिल से नहीं चाहते की सरकारी स्कूलों में अच्छी सुविधा हो क्योंकि ये इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को ग़रीब ही रखना चाहते हैं... https://x.com/shail2018/status/1879912546561614014?s=19

*केजरीवाल-सिसोदिया के दिल्ली शिक्षा मॉडल को बदनाम करने के लिए अक्सर दो झूठ प्रचारित किए जाते हैं।* *पहला झूठ:* दिल्ली सरकार के स्कूलों में बच्चों को 9वीं में जानबूझ कर फेल किया जाता है ताकि छँट कर बच्चे आगे जायें जिससे 12वीं का रिजल्ट अच्छा दिखे। *असलियत*: केजरीवाल सरकार से पहले 9th में लगभग 50% बच्चे ही पास होते थे, जबकि पिछले सात सालों से 60% से ज़्यादा बच्चे पास हो रहे हैं। यही नहीं, जहाँ 2014-15 में दसवीं से बारहवीं तक के क्लास में कुल 4.32 लाख बच्चे थे, वहीं 2023-24 में इन क्लासेज में 5.37 लाख बच्चे थे। इसके साथ ही सीनियर सेकेंडरी स्कूलों की संख्या भी 865 से बढ़कर 914 हो गई। अगर केजरीवाल सरकार को बच्चे छाँट कर नवीं से आगे भेजने होते तो सीनियर सेकेंडरी स्कूलों की संख्या क्यों बढ़ाई जाती? यही नहीं, अगर नवीं में ही फेल करके बच्चों को स्कूल से निकाल दिया जाता तो दसवीं से बाहरवीं में बच्चों की संख्या घटनी चाहिए थे, जबकि इन क्लासेज में एक लाख से ज़्यादा बच्चे बढ़ गए हैं !! *दूसरा झूठ*: दिल्ली सरकार के स्कूलों में साइंस स्ट्रीम बहुत कम स्कूलों में है। *असलियत*: 2014-15 में सिर्फ़ 271 स्कूलों में साइंस स्ट्रीम थी, जिसमे केवल 17326 बच्चे पढ़ते थे। आज 455 स्कूलों में साइंस स्ट्रीम है और 47284 बच्चे साइंस स्ट्रीम से पढ़ाई करते हैं। _दिल्ली के बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा मिल सके, इस नियत के साथ पिछले दस सालों में दिल्ली सरकार ने काम किया है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये है देश में एक भरोसा जगा है कि सरकारी स्कूल भी अच्छे हो सकते हैं।_ बहुत कुछ अच्छा हुआ है, और भी ज़्यादा अच्छा होना बाकी है। इसलिए आलोचना अगर सही वजह से हो तो सुधार बेहतर हो सकेंगे… *लेकिन सच्ची आलोचना होनी चाहिए! प्रोपेगेंडा नहीं!* 🤛🤛🤛

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