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प्रकाशन की अनिवार्यता ने खराब गुणवत्ता वाले शोध को बढ़ावा दिया
पीएचडी थीसिस जमा करने से पहले ‘पीयर-रिव्यूड जर्नल’ में शोधपत्र प्रकाशित करने की अनिवार्यता को खत्म करने के यूजीसी के फैसले की वजह से, शोधकर्ताओं द्वारा खराब और आखेटक जर्नल में पैसे देकर अपने पेपर प्रकाशित करने के चलन पर लगाम लगेगी। ये ऐसे जर्नल होते हैं जिनकी पर्याप्त समीक्षा नहीं होती और इस चलन की वजह से भारत में शोध कार्य की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। इस नजरिए से देखें, तो यूजीसी का कदम वाकई सही लगता है। अध्ययनों से पता चला है कि डॉक्टरेट के ज्यादातर छात्र-छात्रा, प्रतिष्ठित जर्नल को अपने ड्राफ्ट भेजने और समीक्षा व संशोधन के इंतजार में लगने वाले समय के बजाय, इसी तरह के जर्नल में अपने लेख प्रकाशित कराते हैं। अपर्याप्त छात्रवृत्ति और वजीफे की वजह से कई छात्र गुणवत्तापूर्ण शोध में लगने वाले जरूरी समय के बजाय, अपनी डॉक्टरेट डिग्री जल्द से जल्द पूरी करना चाहते हैं। प्रकाशन की अनिवार्यता को हटाना, वैश्विक नियामक मानकों के अनुरूप है। ज्यादातर देशों में पेपर प्रकाशित करना अनिवार्य नहीं है, लेकिन ऐसा करना किसी भी अच्छे शोधकर्ता के लिए जरूरी माना जाता है। कई थीसीस तो उनके प्रकाशित शोधपत्रों का समुच्चय होती हैं। यूजीसी ने जोर देते हुए यह कहा है कि शोधार्थी खुद के हितों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले जर्नल में पेपर प्रकाशित करें, क्योंकि पोस्ट-डॉक्टरल अवसरों के लिए ऐसी पीएचडी को बेहतर माना जाएगा। नियामक को उम्मीद है कि इस अनिवार्यता को हटाने के बाद, अब बेहतर शोध की फिक्र करने वाले छात्रों और विश्वविद्यालयों में शोध के अनुकूल माहौल बनेगा, जैसा कि आईआईटी में देखा जाता है, जहां ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है।
अनिवार्यता को हटाना अकादमिक विषयों की विविधता को भी स्वीकृति देना है। मानविकी की कुछ शाखाओं में मोनोग्राफ का प्रकाशन, जर्नल से ज्यादा अकादमिक जानकारों के साथ संवाद का एक स्वीकृत तरीका है, वहीं शीर्ष कंप्यूटर विज्ञान के शोधकर्ता, जर्नल प्रकाशनों के बजाय किसी सम्मेलन में पेश किए गए पेपर को ज्यादा अहमियत दे सकते हैं। कुछ विषयों में शोध की गुणवत्ता इससे तय हो सकती है कि शोधकर्ताओं ने कितने पेटेंट अपने नाम किए। इस तरह, प्रकाशन की अनिवार्यता को खत्म करने से ज्यादा उर्वर माहौल बनेगा। हालांकि, कुछ ऐसी चिंताएं भी पैदा हुई हैं कि इस अनिवार्यता को हटाने से गुणवत्ता में और कमी आएगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि किसी शोधकर्ता और विश्वविद्यालय की अहमियत प्रकाशित और उद्धृत किए गए पेपर के आधार पर टिकी होती है। साथ ही, फंडिंग भी इसी मानक के आधार पर की जाती है। इन
अनिवार्यता के बगैर, अब प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में शोधार्थियों को पेपर प्रकाशित करने के लिए प्रोत्साहित करने की जिम्मेदारी अब विश्वविद्यालय के शोध सलाहकार परिषदों और डॉक्टरेट के पर्यवेक्षकों के कंधों पर आ गई है। आर्थिक सीमाओं की वजह से छात्र-छात्रा अपनी पीएचडी पूरी करने के लिए जरूरी प्रकाशन के लिए दौड़ते रहते हैं। इसे देखते हुए उच्च स्तर पर तत्काल फंडिंग की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि यूजीसी के फैसले का उल्टा असर न पड़ जाए।
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This week, there will be 10 MCQs for UP TGT/PGT Commerce.
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