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तेज़ी से बदलते अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के दौर में भारत के लिये यह अनिवार्य हो जाता है कि वह अफगानिस्तान के साथ अपने संबंधों को मज़बूत करे। भारत को अपनी सुरक्षा ज़रूरतों की समीक्षा कर भारतीय उपमहाद्वीप की सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए एक निर्णायक भूमिका में आना होगा। तालिबान के साथ बातचीत करने के लिये भारत को संवाद का प्रत्यक्ष तंत्र विकसित करना चाहिये।

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और उनके प्रतिद्वंदी अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच घोषित शक्ति-साझाकरण समझौते (Power-Sharing Deal) का भारत ने स्वागत किया है। जो कि पिछले वर्ष हुए विवादित राष्ट्रपति पद के चुनाव से उत्पन्न राजनीतिक कलह का अंत माना जा रहा है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत को उम्मीद है कि सुलह के माध्यम से राजनीतिक समझौते और परिषद के गठन से स्थायी शांति और स्थिरता स्थापित करने के लिये नए सिरे से प्रयास किये जाएँगे और अफगानिस्तान में गैर राज्य अभिकर्त्ताओं द्वारा प्रायोजित आतंकवाद और हिंसा पर लगाम लगेगी। दो दशक से युद्ध और हिंसा से जूझ रहे अफगानिस्तान में शांति की उम्मीद जगी है। शक्ति-साझाकरण समझौते से लोग खुश हैं और उन्हें देश में अमन लौटने की आशा है। यदि बात भारत और अफगानिस्तान संबंधों की करें तो समय के साथ यह बेहद मज़बूत और मधुर होते जा रहे हैं। अफगानिस्तान जितना अपने तात्कालिक पड़ोसी पाकिस्तान के निकट नहीं है, उससे कहीं अधिक निकटता उसकी भारत के साथ है। भारत अफगानिस्तान में अरबों डॉलर लागत वाली कई बड़ी परियोजनाओं को पूरा कर चुका है और कुछ पर अभी भी काम चल रहा है। इस आलेख में शक्ति-साझाकरण समझौते, शक्ति-साझाकरण समझौते का अमेरिका-तालिबान समझौते पर प्रभाव, तालिबान को लेकर भारत की स्थिति, भारत की अफगान नीति में बदलाव की आवश्यकता पर विमर्श किया जाएगा। अफगानिस्तान में संघर्ष की पृष्ठभूमि अमेरिका के आक्रमण से पूर्व ही अफगानिस्तान लगभग 20 वर्षों तक निरंतर युद्ध की स्थिति में रहा था। अफगानिस्तान संघर्ष की शुरुआत अफगानिस्तान में तख्तापलट के एक वर्ष पश्चात् 1979 में हुई जब सोवियत सेना ने अफगानिस्तान पर अपनी साम्यवादी सरकार का समर्थन करने के लिये आक्रमण कर दिया। सोवियत सेना अफगानिस्तान सरकार की ओर से अफगान मुजाहिदीनों के विरुद्ध जंग लड़ रही थी, उस समय इन अफगान मुजाहिदीनों को अमेरिका, पाकिस्तान, चीन और सऊदी अरब जैसे देशों का समर्थन प्राप्त था। युद्ध की शुरुआत के कुछ ही वर्षों में सोवियत सेना ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्ज़ा कर लिया। हालाँकि इस युद्ध में सोवियत सेना के 15000 से भी अधिक सैनिक मारे गए। वर्ष 1988 में सोवियत संघ ने कुछ आंतरिक कारणों के परिणामस्वरूप अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाने का निर्णय लिया और फरवरी 1989 को सोवियत सेना की अंतिम टुकड़ी भी अफगानिस्तान से वापस चली गई। हालाँकि अफगानिस्तान में अभी भी गृहयुद्ध की स्थिति बनी हुई थी। 1980 के दशक के अंत में सोवियत संघ के अफगानिस्तान से जाने के बाद वहाँ कई गुटों में आपसी संघर्ष शुरू हो गया और वहाँ के आम लोग भी मुजाहिदीनों से काफी परेशान थे। ऐसे हालात में जब तालिबान का उदय हुआ था तो अफगान लोगों ने उसका स्वागत किया। अफगानिस्तान से सोवियत सेना की वापसी के पश्चात् ही वहाँ तालिबान के उदय की शुरुआत होती है। तालिबान पश्तो भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘छात्र’। दरअसल तालिबान का उदय 1990 के दशक में उत्तरी पाकिस्तान में हुआ, जब सोवियत सेना अफगानिस्तान से वापस जा चुकी थी। पश्तूनों के नेतृत्व में उभरा तालिबान, अफगानिस्तान के पटल पर पूर्णरूप से वर्ष 1994 में सामने आया। इससे पहले तालिबान धार्मिक आयोजनों या मदरसों तक सीमित था, जिसे ज़्यादातर धन सऊदी अरब से मिलता था। प्रारंभ में तालिबान को इसलिये लोकप्रियता मिली क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई, अव्यवस्था पर अंकुश लगाकर अपने नियंत्रण में आने वाले इलाकों को सुरक्षित बनाया ताकि लोग व्यवसाय कर सकें। धीरे-धीरे तालिबान ने अफगानिस्तान में अपना दबदबा बढ़ाना शुरू किया और वर्ष 1996 में बुरहानुद्दीन रब्बानी को सत्ता से हटाकर अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्ज़ा कर लिया। वर्ष 1998 तक लगभग 90 प्रतिशत अफगानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण हो गया था। अफगानिस्तान में अमेरिका का प्रवेश वर्ष 2001 में न्यूयॉर्क में आतंकी हमले के बाद तालिबान दुनिया की नज़रों में आया। इसी दौरान 7 अक्तूबर 2001 को अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया। अमेरिकी सेना ने तालिबान को सत्ता से बेदखल कर दिया। हालाँकि, इस हमले के बावजूद तालिबान नेता मुल्ला उमर और अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को पकड़ा नहीं जा सका। मई 2011 में पाकिस्तान के एबटाबाद में 9/11 हमलों के मास्टरमाइंड ओसामा-बिन-लादेन को अमेरिकी सेनाओं द्वारा मार गिराया गया। ओसामा-बिन-लादेन को मार गिराने के बाद अमेरिकी सुरक्षा बलों का प्राथमिक उद्देश्य पूरा हो चुका था, अतः 2011 में राष्ट्रपति ओबामा ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की सीमित संख्या में वापसी का रोडमैप प्रस्तुत किया।

प्रधानमंत्री ई-विद्या Pradhan Mantri e-Vidya भारत सरकार COVID-19 के कारण प्रभावित हो रहे शैक्षिक वर्ष को सुचारु रूप से चलाने के लिये प्रधानमंत्री ई-विद्या (Pradhan Mantri e-Vidya) कार्यक्रम शुरु करने की घोषणा की। प्रमुख बिंदु: इसके अंतर्गत 12 डायरेक्ट-टू-होम (DTH) चैनल (12वीं तक प्रत्येक वर्ग के लिये एक चैनल) छात्रों को घरों में ही पाठ्यक्रम वीडियो उपलब्ध कराएंगे जबकि देश के शीर्ष 100 उच्च शिक्षा संस्थान नए ऑनलाइन पाठ्यक्रम शुरू करेंगे। जबकि अन्य क्षेत्रों में भारत सरकार छात्रों के भावनात्मक सुधार के लिये एक प्लेटफॉर्म ‘मनोदर्पण’ (Manodarpan) शुरू करने की तैयारी कर रही है जबकि ‘नेशनल फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरेसी मिशन’ (National Foundational Literacy and Numeracy Mission) भी शुरू किया जाएगा। 12 नए DTH चैनलों में से प्रत्येक में प्रतिदिन 6 घंटे की पाठ्यक्रम सामग्री होगी। हालाँकि तीन रिपीट टेलीकास्ट के साथ वे सप्ताह के सभी दिनों में 24 x7 घंटे चलेंगे। लॉकडाउन अवधि के दौरान इन चैनलों पर ‘लाइव इंटरेक्टिव सेशन’ के प्रसारण के लिये भी प्रावधान किये गए हैं जिनमें स्काइप के माध्यम से विषय एवं परामर्श विशेषज्ञ शामिल किये जाएंगे। इन चैनलों की छात्रों तक पहुँच बढ़ाने के लिये भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय (Union HRD ministry) ने निजी डीटीएच ऑपरेटरों जैसे- टाटा स्काई एवं एयरटेल के साथ भी समझौता किया है। इसके तहत राज्य अपनी आवश्यकताओं के अनुसार पाठ्यक्रम सामग्री भी विकसित करेंगे जो इन चैनलों पर प्रसारित की जाएगी। ‘डिजिटली ऐक्सेसिबल इन्फॉर्मेशन सिस्टम’ (DAISY) पर दृष्टि एवं श्रवण बाधित छात्रों के लिये विशेष ई-सामग्री प्रदान की जाएगी। शीर्ष 100 उच्च शिक्षा संस्थानों द्वारा नए ऑनलाइन पाठ्यक्रम: वे सभी विश्वविद्यालय जिनके पास A+ अर्थात 3.26 या उससे अधिक का स्कोर है या वे सभी विश्वविद्यालय जो ‘राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क’ (National Institutional Ranking Framework-NIRF) में शीर्ष 100 में शामिल हैं, स्वचालित रूप से इस शैक्षणिक वर्ष 2020-21 के दौरान UGC की पूर्व स्वीकृति के बिना पूर्ण ऑनलाइन डिग्री पाठ्यक्रम प्रदान कर सकते हैं। शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में 30 मई, 2020 से स्वचालित रूप से ऑनलाइन पाठ्यक्रम शुरू करने की घोषणा इस वर्ष के केंद्रीय बजट में की गई थी।

केंद्रीय जनजातीय मंत्रालय (Ministry of Tribal Affairs) द्वारा डिजिटल प्रणाली के माध्यम से आदिवासी युवाओं को मेंटरशिप प्रदान करने के लिये फेसबुक के साथ मिलकर ‘गोइंग ऑनलाइन एस लीडर्स’ (Going Online As Leaders-GOAL) कार्यक्रम के द्वितीय चरण की शुरुआत की गई है। प्रमुख बिंदु: GOAL कार्यक्रम के द्वारा आदिवासी युवाओं को डिजिटल मोड के माध्यम से मेंटरशिप प्रदान की जाएगी। डिजिटल रूप से सक्षम यह कार्यक्रम आदिवासी युवाओं की छिपी प्रतिभाओं का पता लगाने के लिये एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करने की परिकल्पना पर आधारित है, जो उनके व्यक्तिगत विकास में मदद करने के साथ-साथ उनके समाज के सर्वांगीण उत्थान में भी योगदान देगा। डिजिटल कौशल (Digital Skilling) और प्रौद्योगिकी (Technology), जनजातीय समुदाय को समाज की मुख्यधारा के साथ जोड़ने में मददगार साबित होगी। जनजातीय उद्यमिता का विकास होगा और डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए आदिवासी युवाओं को घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों से जोड़ा जाएगा। इस कार्यक्रम को इस प्रकार से डिज़ाइन किया गया है जिससे आदिवासी युवााओं और महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में यथा- बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण, मधुमक्खी पालन, आदिवासी कला एवं संस्कृति आदि में डिजिटल कौशल और प्रौद्योगिकी के माध्यम से दीर्घकालिक स्तर पर ज्ञान प्राप्त हो सके। यह कार्यक्रम आदिवासी महिलाओं को डिजिटल दुनिया से जोड़कर उनके सशक्तीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। जनजातीय युवाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने में सक्षम बनाने की दिशा में GOAL कार्यक्रम मददगार साबित होगा। गोल कार्यक्रम के मुख्य बिंदु: कार्यक्रम के तहत चयनित 5,000 युवा जनजातीय उद्यमियों, पेशेवरों, कारीगरों और कलाकारों को डिजिटल-कौशल का प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले युवाओं को ‘मेंटिस’ (Mentees) कहा जाएगा तथा इन्हें विभिन्न विषयों और क्षेत्रों के विशेषज्ञों द्वारा जिन्हे ‘मेंटर्स’(Mentors) कहा जाएगा। इसमें 2 ‘मेंटिस’ पर 1 ‘मेंटर्स’ को नियुक्त किया जाएगा। कार्यक्रम का उद्देश्य दूरस्थ क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के युवाओं को अपने गुरुओं/शिक्षकों के साथ अपनी आकांक्षाओं, सपनों और प्रतिभा को साकार करने के लिये डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करने में सक्षम बनाना है। चयनित 5,000 ‘मेंटिस’ नौ महीने या 36 सप्ताह तक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे, जिसमें 28 सप्ताह के मेंटरशिप कार्यक्रम के बाद आठ सप्ताह की इंटर्नशिप भी शामिल होगी। इस कार्यक्रम का मुख्य फोकस तीन मुख्य क्षेत्रों पर होगा, जिसमें शामिल है - डिजिटल साक्षरता जीवन कौशल, नेतृत्त्व, उद्यमशीलता, और कृषि कला और संस्कृति, हस्तशिल्प वस्त्र, स्वास्थ्य, पोषण इस कार्यक्रम को अन्य सरकारी योजनाओं जैसे- मुद्रा योजना, कौशल विकास योजना, जन धन योजना, कौशल भारत, स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, अन्य के साथ एकीकृत करने का प्रयास किया जाएगा। आवेदन की प्रक्रिया: इच्छुक अभ्यर्थी ऑनलाइन पोर्टल “goal.tribal.gov.in” पर जाकर आवेदन कर सकते है। ‘गोल’ कार्यक्रम के लिये आवेदन प्रक्रिया 4 मई, 2020 से 3 जुलाई, 2020 की मध्यरात्रि तक जारी रहेगी। ‘मेंटर’ के तौर पर पंजीकरण के लिये, उद्योग और शिक्षा-जगत के अग्रणी विषय-विशेषज्ञों को goal.tribal.gov.in पोर्टल पर आमंत्रित किया गया है। GOLE प्रथम चरण: गोल का प्रथम चरण फेसबुक द्वारा वर्ष 2019 में फरवरी से अक्तूबर, 2019 तक 5 राज्यों में 100 ‘मेंटिस’ और 25 मेंटर्स के साथ पायलट प्रोजेक्ट के आधार पर संचालित किया गया था।

अंतर्राष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (International Centre for Integrated Mountain Development-ICIMOD) द्वारा हिंदू-कुश हिमालय (Hindu Kush Himalaya-HKH) क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से संबंधित अध्ययन के अनुसार, इस क्षेत्र में ग्लेशियरों की संख्या में वृद्धि हुई है। प्रमुख बिंदु हालाँकि यही अध्ययन दर्शाता है कि हिंदू-कुश हिमालय क्षेत्र वर्ष 2060 तक अपने वर्तमान ग्लेशियर क्षेत्र का आधा हिस्सा खो देगा, जिसकी अवधि पहले वर्ष 2070 आंकी गई थी। विश्लेषकों के अनुसार, ग्लेशियरों की संख्या में वृद्धि का मुख्य कारण ग्लेशियरों का विखंडन (Fragmentation) है, सामान्य शब्दों में कहें तो बड़े ग्लेशियर छोटे-छोटे ग्लेशियरों में बँट रहे हैं। अध्ययन में वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि को ग्लेशियरों के विखंडन (Fragmentation) का मुख्य कारण बताया गया है। आकलन के अनुसार, पूर्वी हिमालय के ग्लेशियर मध्य तथा पश्चिमी हिमालय के ग्लेशियरों की तुलना में तेज़ी से सिकुड़ गए हैं, हालाँकि यह एक स्वाभाविक क्रिया है क्योंकि जब सतह क्षेत्र अथवा सूर्य के संपर्क में आने वाली सतह में वृद्धि होती है, तो खंडित और छोटे ग्लेशियर बड़े ग्लेशियरों की तुलना में तेज़ी से सिकुड़ते हैं। ICIMOD ने इस स्थिति को काफी खतरनाक स्थिति के रूप में परिभाषित किया है। हिंदू-कुश हिमालय क्षेत्र और इसका महत्त्व हिंदू-कुश हिमालय क्षेत्र को विश्व का तीसरा ध्रुव (Third Pole) माना जाता है तथा यह जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से अत्यंत सुभेद्य है। पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण यहाँ डेटा एकत्र करना कठिन है। हिंदू-कुश हिमालय क्षेत्र अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, किर्गिज़स्तान, मंगोलिया, म्याँमार, नेपाल, पाकिस्तान, ताज़िकिस्तान और उज़्बेकिस्तान तक फैला है। विभिन्न देशों में लगभग 3,500 वर्ग किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र को एशिया का ‘वाटर टॉवर’ (Water Tower) भी कहा जाता है। एक अनुमान के अनुसार, हिंदू-कुश हिमालय (Hindu Kush Himalaya-HKH) क्षेत्र में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों (North and South Poles) के पश्चात् बर्फ का सबसे अधिक भंडार है। उल्लेखनीय है कि नदियों के लिये जल का एक बड़ा स्रोत होने के नाते ये ग्लेशियर दुनिया भर में एक तिहाई आबादी के लिये जीवन रेखा हैं। इस अध्ययन में हिंदू-कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र को एशिया तथा विश्व के लिये एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण संपत्ति की संज्ञा दी गई है। यह जल, ऊर्जा, कार्बन भंडार और साथ ही समृद्ध जैव विविधता का प्रमुख स्रोत है। उदाहरण के लिये विश्व के 200 करोड़ से अधिक लोगों अपनी जल संबंध आवश्यकता के लिये हिंदू-कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र से शुरू होने वाली नदियों पर निर्भर हैं और इन नदियों में 500 गीगावाट की जल विद्युत क्षमता है।

चक्रवाती तूफान एम्फन (Amphan) बंगाल की खाड़ी में उठ रहे तूफान अम्फान (Amphan) कई राज्यों के लिए खतरा बन सकता है। मौसम विभाग के अनुसार इस समय देश में वेस्‍टर्न डिस्‍टर्बेंस एक्टिव है। इसके कारण देश के पहाड़ी क्षेत्रों जैसे, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के साथ ही पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी मौसम बिगड़ सकता है। भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक बंगाल की दक्षिण-पूर्वी खाड़ी और पड़ोसी क्षेत्रों से उठा चक्रवाती तूफान अम्फान अगले 12 घंटे में खतरनाक रूप ले सकता है। दक्षिण पूर्वी बंगाल की खाड़ी में करीब 1000 किलोमीटर की दूरी पर अगले 12 घंटे में चक्रवाती तूफान में तेजी से वृद्धि हो सकती है। ओडिशा के तटीय इलाके और आसपास के क्षेत्र में तूफान की चेतावनी दी है। थाईलैंड ने दिया तूफान अम्फान का नाम अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में आने वाले समुद्री तूफानों के नाम रखने का सिलसिला 15 साल पहले यानी 2004 में शुरू हुआ। इसके लिए एक सूची बनाई गई। इस सूची में आठ देश शामिल हैं। आठ देशों को क्रमानुसार आठ नाम देने हैं। जब जिस देश का नंबर आता है तो उस देश की सूची में दिए गए नाम के आधार पर उस तूफान का नामकरण कर दिया जाता है। इनमें बांग्लादेश, भारत, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका और थाईलैंड शामिल हैं। हर देश ने आठ नाम दिए हैं। इस तरह कुल 64 नाम तय किए गए हैं। इस बार चक्रवाती तूफान के नामकरण की बारी थाईलैंड की थी। थाईलैंड ने इसका नाम अम्फान रखा है। क्या होते है चक्रवात? दरअसल चक्रवात निम्न वायुदाब वाली ऐसी मौसमी परिघटना होती है जिसमें हवाएं बाहर से अंदर की ओर तेज़ गति से घूमती है। पृथ्वी के दोनों उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्धों में चक्रवात के मामले देखे जा सकते हैं। दक्षिणी गोलार्द्धों में ये चक्रवात घड़ी की सुई की दिशा यानी Clockwise जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में ये चक्रवात घड़ी की सुई के विपरीत यानी Anti Clockwise घूमते हैं। भारत में आने वाले चक्रवात मुख्य रूप से दो मौसमों में आते हैं। जिनमें पहला मानसून के पहले यानी अप्रैल - मई के महीने के बीच और दूसरा मानसून के बाद यानी अक्टूबर - दिसम्बर महीने के बीच चक्रवात के प्रकारों की बात करें तो चक्रवात मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं। जिन्हें उष्णकटिबंधीय और शीतोष्ण चक्रवात के नाम से जाना जाता है। उष्णकटिबंधीय और शीतोष्ण चक्रवात उष्णकटिबंधीय चक्रवात का प्रभाव प्रमुख रूप से प्रशांत महासागर, हिंद महासागर और उत्तरी अटलांटिक महासागर के क्षेत्रों पर ज्यादा रहता है। इस क्षेत्र में आने वाले चक्रवातों को अपने स्थान और तीव्रता के आधार पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इस श्रेणी में हरिकेन, टाइफ़ून, ट्रोपिकल स्ट्रोमी, साइक्लोनिक स्टोर्म ट्रोपिकल डिप्रेशन और साइक्लोन यानी चक्रवात शामिल होते हैं। इन चक्रवातों की रफ़्तार क़रीब 50 से 300 km/h तक होती है क्योंकि इनमें वाष्पीकरण के कारण भारी मात्रा में Laten Heat रहती है। मौजूदा समय में आया फानी चक्रवात भी एक उष्ण-कटिबंधीय यानी ट्रॉपिकल चक्रवात है जोकि कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच उठते हैं। जबकि शीतोष्ण चक्रवातों का प्रभाव उत्तरी एटलांटिक महासागर और उत्तरी प्रशांत महासागर में रहता है। इन क्षेत्रों में चक्रवात की उत्पत्ति महासागरों के उन क्षेत्रों में होती है जहां उष्ण कटिबंधीय वायु शीत कटिबंधीय वायु से मिलती है। शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में आने वाले इन चक्रवातों की रफ्तार अलग-अलग होती है, जबकि इनके आगे की गति 30 से 50 किलोमीटर प्रति घण्टे तक होती है।

नेपाल-भारत सीमा विवाद चर्चा में क्यों? नेपाल में राजनीतिक विश्लेषकों ने भारत के साथ लिपुलेख और कालापानी सीमा विवाद के कूटनीतिक समाधान का समर्थन किया है और इस मुद्दे पर भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की हालिया टिप्पणी पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। लिपुलेख दर्रा कालापानी के निकट सबसे पश्चिमी क्षेत्र है, जो नेपाल और भारत के बीच एक विवादित सीमा है। भारत और नेपाल दोनों ही कालापानी के अपना अभिन्न हिस्सा होने का दावा करते हैं। भारत इसे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा मानता है, जबकि नेपाल इसे धारचुला जिले का हिस्सा बताता है। पृष्ठभूमि जनरल नरवणे ने कहा था कि यह विश्वास करने के कारण हैं कि भारत द्वारा लिपुलेख दर्रे को उत्तराखंड में धारचुला से जोड़ने वाली भारत की नई सड़क पर नेपाल ने 'किसी और के' इशारे पर आपत्ति जताई। उनका इशारा इस मामले में चीन की संदिग्ध भूमिका को लेकर था। लिपुलेख दर्रे से धारचुला को जोड़ने वाली सड़क भारतीय चौकियों तक पहुंचना अब बेहद आसाना हो जाएगा। 17000 फुट की ऊंचाई पर लिपुलेख दर्रा आसानी उत्तराखंड के धारचूला से जुड़ जाएगा। इस सड़क की लंबाई 80 किलोमीटर है। मानसरोवर लिपुलेख दर्रे से करीब 90 किलोमीटर दूर है। पहले वहां पहुंचने में तीन हफ्ते का समय लगता था। अब कैलाश-मानसरोवर जाने में सिर्फ सात दिन लगेंगे। बूंदी से आगे तक का 51 किलोमीटर लंबा और तवाघाट से लेकर लखनपुर तक का 23 किलोमीटर का हिस्सा बहुत पहले ही निर्मित हो चुका था लेकिन लखनपुर और बूंदी के बीच का हिस्सा बहुत कठिन था और उस चुनौती को पूरा करने में काफी समय लग गया। इस रोड के चालू होने के बाद भारतीय थल सेना के लिए रसद और युद्ध सामग्री चीन की सीमा तक पहुंचाना आसान हो गया है। लद्दाख के पास अक्साई चीन से सटी सीमा पर अक्सर चीनी सैनिक घुसपैठ करते आए हैं। अगर तुलना की जाए तो लिंक रोड के बनने से लिपुलेख और कालापानी के इलाके में भारत सामरिक तौर पर भारी पड़ सकता है। दो साल पहले चीनी सेना ने पिथौरागढ़ के बाराहोती में घुसपैठ की कोशिश की थी। इस लिंक रोड के बनने के बाद चीनी सेना ऐसी गुस्ताखी नहीं कर पाएगी। नेपाल का दृष्टिकोण नेपाल का मानना है कि सुगौली समझौते (1816) के तहत काली नदी के पूर्व का इलाका, लिंपियादुरा, कालापानी और लिपुलेख नेपाल का है। उसका कहना है, 'नेपाल सरकार ने कई बार पहले और हाल में भी कूटनीतिक तरीके से भारत सरकार को उसके नया राजनीतिक नक्शा जारी करने पर बताया था। सुगौली संधि के तहत ही नेपाल कालापानी को अपना इलाका मानता है। पिछले साल जब जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून के तहत इसे दो अलग-अलग भागों में बांट दिया गया तब आधिकारिक तौर पर नया नक्शा जारी किया गया था। उस समय भी नेपाल ने आपत्ति जताई और कालापानी को अपना हिस्सा बताया। कालापानी 372 वर्ग किलोमीटर में फैला इलाका है। इसे भारत-चीन और नेपाल का ट्राई जंक्शन भी कहा जाता है। क्या है सुगौली संधि? नेपाल और ब्रिटिश इंडिया के बीच 1816 में सुगौली संधि हुई थी। सुगौली बिहार के बेतिया यानी पश्चिम चंपारण में नेपाल सीमा के पास एक छोटा सा शहर है। इस संधि में तय हुआ कि काली या महाकाली नदी के पूरब का इलाका नेपाल का होगा। बाद में अंग्रेज सर्वेक्षकों ने काली नदी का उदगम स्थान अलग-अलग बताना शुरू कर दिया। दरअसल महाकाली नदी कई छोटी धाराओं के मिलने से बनी है और इन धाराओं का उदगम अलग-अलग है। नेपाल का कहना है कि कालापानी के पश्चिम में जो उदगम स्थान है वही सही है और इस लिहाज से पूरा इलाका उसका है। दूसरी ओर भारत दस्तावजों के सहारे साबित कर चुका है कि काली नदी का मूल उदगम कालापानी के पूरब में है। क्यों महत्वपूर्ण है कालापानी भारतीय सेना के लिए चीन के पैंतरे पर निगाह रखना जरूरी है। इस लिहाज से कालापानी सामरिक तौर पर बहुत ही अहम है। 1962 की लड़ाई के बाद से ही यहां इंडो तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP) पेट्रोलिंग करती है। चीन बहुत पहले ही अपनी सीम तक सड़क बना चुका है। हिमालय को काट कर सीमा तक बुनियादी संरचना विकसित करने पर चीन ने काफी पैसा बहाया है। इसे देखते हुए भारत के लिए भी जरूरी है कि वो सीमा पर सैन्य संतुलन कायम करने के जरूरी उपाय करे। भारत के साथ दोस्ती के बावजूद हाल के दिनों में नेपाल और चीन करीब आए हैं। ऐसी स्थिति में कालापानी पर मजबूत पकड़ भारत के लिए और जरूरी है। हिमालय की गोद से निकलने वाली नदियां धारा बदल लेती है। ये भी अंतरराष्ट्रीय विवाद का कारण बनता है। कालापानी के अलावा सुस्ता इसका एक और उदाहरण है। सुगौली संधि के तहत ही गंडक नदी को को भारत-नेपाल के बीच की सीमा मान लिया गया। उसी समय गंडक ने धारा बदली और सुस्ता नदी के उत्तर में आ गया। इस लिहाज से यह भारत का हिस्सा है लेकिन नेपाल इस पर भी दावा करता रहा है। हालांकि दोनों देशों में सीमा विवाद खत्म करने पर सहमति बनी हुई है। इसे आपसी बातचीत से हल करना है।

सरकार एक नई नीति की घोषणा करेगी जिसके द्वारा- सार्वजनिक हित में पीएसई की अपेक्षा रखने वाले रणनीतिक क्षेत्रों की सूची अधिसूचित की जाएगी। सामरिक क्षेत्रों में, कम से कम एक उद्यम सार्वजनिक क्षेत्र में रहेगा लेकिन निजी क्षेत्र को भी इजाजत दी जाएगी। अन्‍य क्षेत्रों में, पीएसई का निजीकरण किया जाएगा (समय का निर्धारण व्‍यवहार्यता पर आधारित होगा।) अनावश्‍यक प्रशा‍सनिक खर्च को कम करने के लिए, सामरिक क्षेत्रों में उद्यमों की संख्‍या आमतौर पर केवल एक से चार होगी; अन्‍य का निजीकरण/विलय कर दिया जाएगा/ होल्डिंग कम्‍पनियों के अंतर्गत लाया जाएगा।

‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत सरकारी सुधारों और सहायक उपायों की घोषणा सरकारी सुधारों और समर्थन की दिशा में उठाए गए उपायों के 5वें और आखिरी हिस्से की घोषणा करते हुए श्रीमती सीतारमण ने रोजगार प्रदान करने, कारोबारों को सहायता देने, ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस (व्यापार करने में आसानी) और राज्य सरकारों के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के लिए सात उपायों के बारे में ब्यौरा दिया। घोषणा के प्रमुख बिंदु 1. रोजगार को बढ़ावा देने के लिए मनरेगा के आवंटन में 40,000 करोड़ रुपये की वृद्धि सरकार अब मनरेगा के तहत अतिरिक्त 40,000 करोड़ रुपये का आवंटन करेगी। मानसून के मौसम में वापस लौट रहे प्रवासियों समेत ज्यादा काम की जरूरत को संबोधित करते हुए इससे कुल 300 करोड़ मानव दिवस का रोजगार पैदा करने में सहायता मिलेगी। बड़ी संख्या में टिकाऊ और जल संरक्षण संपदाओं सहित आजीविका संपदाएं निर्मित करने से उच्च उत्पादन के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। 2. स्वास्थ्य सुधार और पहलें ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों की संख्या में बढ़ोतरी करके और जमीनी स्वास्थ्य संस्थानों में निवेश करके स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाया जाएगा। सभी जिलों में संक्रामक रोगों के अस्पताल ब्लॉक स्थापित किए जाएंगे और महामारियों के प्रबंधन के लिए सभी जिलों और ब्लॉक स्तर के लैब और जन स्वास्थ्य इकाई में एकीकृत जन स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं द्वारा लैब नेटवर्क और निगरानी को मजबूत किया जाएगा। इसके अलावा, आईएमसीआर द्वारा स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय संस्थागत प्लेटफॉर्म, अनुसंधान को प्रोत्साहित करेगा। और राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन के तहत राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य खाका (एनडीएचबी) का कार्यान्वयन। 3. कोविड के बाद समानता के साथ प्रौद्योगिकी आधारित शिक्षा 'पीएम ई-विद्या', डिजिटल / ऑनलाइन शिक्षा तक बहु-माध्यम पहुंच के लिए एक कार्यक्रम है जिसे जल्द ही शुरू किया जाएगा। 'मनोदर्पण', मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक कल्याण के सिलसिले में छात्रों, शिक्षकों और परिवारों का मनोवैज्ञानिक-सामाजिक समर्थन करने के लिए एक पहल है जो तुरंत शुरू की जाएगी। स्कूल, शुरुआती बचपन और शिक्षकों के लिए नया राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और शैक्षणिक ढांचा भी शुरू किया जाएगा। साल 2025 तक प्रत्येक बच्चा कक्षा 5 में सीखने का स्तर और परिणाम प्राप्त सके यह सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय बुनियादी साक्षरता और गणना मिशन को दिसंबर 2020 तक शुरू किया जाएगा। 4.आईबीसी से संबंधित उपायों के माध्यम से कारोबार में सुगमता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) और बेहतर होगी दिवाला कार्यवाही शुरू करने के लिए न्यूनतम सीमा को बढ़ाकर 1 करोड़ रु किया गया (पहले यह सीमा 1 लाख रु थी, इससे एमएसएमई को लाभ मिलेगा)। संहिता की धरा 240 ए के तहत एमएसएमई के लिए विशेष दिवाला संकल्प ढांचा जल्द ही अधिसूचित किया जाएगा। महामारी की स्थिति के आधार पर, एक वर्ष तक नई दिवाला कारवाई की शुरुआत नहीं की जायेगी। दिवाला कारवाई को शुरू करने के उद्देश्य से संहिता के तहत कोविड 19 से संबंधित ऋण को "डिफ़ॉल्ट" की परिभाषा से बाहर करने के लिए केंद्र सरकार को सशक्त बनाना। 5. कंपनी अधिनियम के तहत की गयी गलती (चूक) को अपराध की श्रेणी से बाहर करना कंपनी कानून की मामूली तकनीकी और प्रक्रियात्मक चूक को अपराधीकरण की श्रेणी से बाहर किया जाएगा। (सीएसआर रिपोर्टिंग में गलतियाँ, बोर्ड रिपोर्ट में कमियां, एजीएम आयोजित करने में विलम्‍ब आदि ) संशोधन से आपराधिक अदालतों और एनसेएलटी में मामलों के संख्या में कमी आएगी। 7 समझौता योग्य (कंपाउंडेबल) अपराधों को पूरी तरह से हटा दिया गया है और 5 अपराधों को वैकल्पिक व्यवस्था के तहत निपटाया जायेगा। 6. कंपनियों के लिए कारोबार करने में सुगमता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) मुख्य सुधारों में शामिल हैं: स्वीकृत विदेशी बाजारों में भारतीय सार्वजनिक कंपनियों द्वारा प्रतिभूतियों का प्रत्यक्ष सूचीबद्ध होना। निजी कंपनियां जो स्टॉक एक्सचेंजों पर एनसीडी को सूचीबद्ध करती हैं, उन्हें सूचीबद्ध कंपनियों के रूप में नहीं माना जाएगा। कंपनी अधिनियम, 1956 के भाग 9 ए (निर्माता कंपनियों) के प्रावधानों को कंपनी अधिनियम, 2013 में शामिल करना। एनसीएलएटी के लिए अतिरिक्त / विशिष्ट बेंच गठित करने की शक्ति छोटी कंपनियों, एक-व्यक्ति के स्वामित्व वाली कंपनियों, निर्माता कंपनियों और स्टार्ट अप के द्वारा की गयी गलतियों के लिए आर्थिक दंड में कमी। 7. नए, आत्‍मनिर्भर भारत के लिए सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति

समाज के विकास में संग्रहालय कितने महत्वपूर्ण हैं इस पर जागरूकता बढ़ाने हेतु 18 मई को अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस मनाया जाता है। 2020 का विषय ‘Museums for Equality: Diversity and Inclusion’ था। पृष्ठभूमि 1977 में अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय परिषद (आईसीओएम) द्वारा स्थापित किया गया था। इस दिन का उद्देश्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान, संस्कृतियों का संवर्धन और पारस्परिक समझ के विकास, लोगों के बीच सहयोग और शांति के महत्वपूर्ण साधनों के रूप में जागरूकता बढ़ाना है। अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय परिषद (आईसीओएम) यह विश्व के संग्रहालयों और संग्रहालय पेशेवरों का एकमात्र संगठन है, जो वर्तमान और भविष्य, मूर्त और अमूर्त, प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने तथा संरक्षण हेतु प्रतिबद्ध है। यह 1946 में बनाया गया था और इसका मुख्यालय पेरिस, फ्रांस में है।

न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने “सुपर अर्थ” की खोज की है। इस ग्रह पर मानव जीवन के लिए आवश्यक परिस्थितियां मौजूद हैं। मुख्य बिंदु सुपर अर्थ उन चुनिन्दा ग्रहों में से एक है जो पृथ्वी के आकार और परिक्रमा दूरी के सामान हैं। इस ग्रह का मेजबान तारा सूर्य का द्रव्यमान 10% है। ग्रह के बारे में यह ग्रह पृथ्वी से बड़ा है और इसलिए इसका नाम “सुपर अर्थ” है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह ग्रह ठंडा हो सकता है। इस कारण से, पानी अपने तरल अवस्था में मौजूद नहीं हो सकता है, लेकिन बर्फ के रूप में हो सकता है। इस ग्रह द्रव्यमान में भारी है, इसे तारे के चारों ओर घूमने में 617 दिन लग सकते हैं। वैज्ञानिक के अनुसार ‘सुपर अर्थ’ भविष्य में “गोल्डीलॉक ज़ोन” हो सकती है गोल्डीलॉक ज़ोन क्या हैं? गोल्डीलॉक ज़ोन एक तारे के चारों ओर का स्थान है जहाँ का तापमान तरल अवस्था में पानी को सुरक्षित रखता है। यह ग्रह पृथ्वी से 111 प्रकाश वर्ष दूर है और इसलिए मनुष्य के लिए ग्रह तक पहुंचना काफी मुश्किल है।

Current Affairs Quiz 18 May 2020 दैनिक सामान्य ज्ञान क्विज https://www.simplifiedshiksha.com/current-affairs-quiz-18-may/
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👆👆👆👆👆 Aaj ke notes me agar ishe add kar de. To aaj ke liye notes ishse bahar ka kuch nhi..

भारतीय मूल के भाई जो 'द संडे टाइम्स रिच लिस्ट 2020' में रूबेन बंधुओं के साथ दूसरे स्थान पर हैं - श्रीचंद और गोपीचंद हिंदुजा 'द संडे टाइम्स रिच लिस्ट 2020' में प्रथम स्थान - जेम्स डायसन (ब्रिटिश आविष्कारक-उद्यमी)

Today's notes..

CamScanner 05-18-2020 07.38.34
CamScanner 05-18-2020 07.38.34

" सामयिकी :- कोरोना वायरस सक्रमंण पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ मधुर यादव से आकाशवाणी सवांददाता आनंद श्रीवास्तव की बातचीत"

📺 Khas Mulakat with Jai Pratap Singh, Medical and Health Minister, Uttar Pradesh

Photo from Anand Pratap Singh
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