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वस्त्र समिति, मुंबई भी अब स्वास्थ्य कर्मियों और अन्य COVID-19 योद्धाओं के लिये आवश्यक व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (Personal Protective Equipment-PPE) के परीक्षण और प्रमाणन का कार्य करेगी।
प्रमुख बिंदु
हाल ही में वस्त्र मंत्रालय द्वारा वस्त्र समिति (Textiles Committee) को व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) का परीक्षण करने और उसे प्रमाणित करने के लिये 9वीं अनुमोदित प्रयोगशाला के रूप में शामिल किया है।
वस्त्र समिति, मुंबई के अतिरिक्त अन्य आठ प्रयोगशालाएँ निम्न प्रकार हैं: (1) दक्षिण भारत वस्त्र अनुसंधान संघ (The South India Textile Research Association- SITRA), कोयंबटूर, तमिलनाडु (2) DRDO- परमाणु चिकित्सा और संबद्ध विज्ञान संस्थान, (DRDO-Institute of Nuclear Medicine & Allied Sciences) नई दिल्ली (3) हैवी व्हीकल फैक्ट्री, (Heavy Vehicle Factory) अवार्डी, चेन्नई (4) स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री, (Small Arms Factory) कानपुर, उत्तर प्रदेश, (5) आयुध कारखाना, (Ordnance Factory) कानपुर, उत्तर प्रदेश (6) आयुध कारखाना (Ordnance Factory), मुरादनगर, उत्तर प्रदेश (7) आयुध कारखाना, (Ordnance Factory) अंबरनाथ, महाराष्ट्र और (8) मेटल एंड स्टील फैक्टरी, (Metal & Steel Factory) ईशापोर, पश्चिम बंगाल।
उक्त सभी प्रयोगशालाओं को ‘नेशनल एक्रीडिएशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज़’ (National Accreditation Board for Testing & Calibration Laboratories- NABL) द्वारा मान्यता प्रदान की गई है।
महत्त्व
ध्यातव्य है मौजूदा समय में विभिन्न चुनौतियों के अतिरिक्त भारत को प्रतिष्ठित घरेलू विनिर्माताओं की अनुपलब्धता और चीन से उपकरणों का आयात करने में होने वाली लगातार देरी जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है।
इसके अतिरिक्त दुनिया भर में ऐसे उपकरणों की तेज़ी से बढ़ती मांग के कारण चीन की अवसरवादी कंपनियों द्वारा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी की जा रही है, जिसके कारण सरकार को इन उपकरणों के लिये अधिक मूल्य चुकाना पड़ता है।
ऐसे में इन चुनौतियों का घरेलू समाधान करना आवश्यक है। वस्त्र समिति के अधीन मुंबई में मान्यता प्राप्त PPE जाँच सुविधा शुरू करने से सरकारों और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) निर्माताओं को अपने उत्पाद की गुणवत्ता की समयबद्ध जाँच का आश्वासन मिलेगा।
वस्त्र समिति (Textiles Committee)
वस्त्र समिति (Textiles Committee) की स्थापना वर्ष 1963 में संसद के एक अधिनियम के माध्यम से वैधानिक निकाय के रूप में की गई थी, जो कि भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में आती है।
वस्त्र समिति का मुख्य कार्य वस्त्रों तथा वस्त्र मशीनरी की गुणवत्ता सुनिश्चित करना है, किंतु वस्त्र समिति अधिनियम, 1963 की धारा 4 के वस्त्र समिति को निम्नलिखित कार्य भी सौंपे गए हैं-
वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकीय और आर्थिक अनुसंधान करना और इस कार्य हेतु अन्य लोगों को प्रोत्साहित करना;
वस्त्रों, वस्त्र मशीनरी तथा पैकिंग सामग्री के लिये मानक विनिर्देश स्थापित करना;
वस्त्रों तथा वस्त्र मशीनरी के परीक्षण हेतु प्रयोगशालाऍं स्थापित करना;
वस्त्रों के निर्यात को बढ़ावा देना;
विषय से संबंधित आँकड़े जुटाना;
केंद्र सरकार को वस्त्रों तथा वस्त्र मशीनरी आदि से संबंधित विषयों पर परामर्श देना।
वस्त्र समिति का मुख्यालय मुंबई में है। प्रमुख वस्त्र विनिर्माता/निर्यात केंद्रों पर इसके 29 अन्य कार्यालय हैं।
व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) और भारत
व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) एक प्रकार का चिकित्सीय उपकरण होता है, जिसे आमतौर पर मेडिकल पेशेवरों द्वारा प्रयोग किया जाता है।
यह न केवल डॉक्टरों, नर्सों जैसे चिकित्सा पेशेवरों की सुरक्षा करता है, बल्कि घातक बीमारी के प्रसार को रोकने में भी मदद करता है।
अब तक हुए अनुसंधानों के अनुसार, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में कोरोना वायरस (COVID-19) के संक्रमण के प्रसार को कम करने में काफी मददगार साबित हुआ है।
ध्यातव्य है कि भारत थोड़े ही समय में व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता बन गया है।
COVID-19 संक्रमण से बचाव के लिये आवश्यक PPE के उत्पादन में चीन विश्व का अग्रणी देश बना हुआ है।
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प्रमुख बिंदु:
‘विदेश मंत्रालय’ (Ministry of External Affairs- MEA) ने नेपाल के नवीन राजनीतिक मानचित्र को पूरी तरह से 'कृत्रिम' तथा भारत के लिये अस्वीकार्य बताया है।
2 नवंबर, 2019 को भारत ने एक नवीन मानचित्र प्रकाशित किया था यह जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में दर्शाता है। इसी मानचित्र में कालापानी को भी भारतीय क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया है।
सुस्ता क्षेत्र (Susta Territorial):
उत्तर प्रदेश तथा बिहार राज्यों की सीमा पर पश्चिमी चंपारण ज़िलों के पास अवस्थित ‘सुस्ता क्षेत्र’ को भी नेपाल द्वारा अपने नवीन मानचित्र में शामिल किया गया है।
नेपाल का दावा है कि भारत ने इस क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है तथा भारत को इस क्षेत्र को तुरंत खाली करना देना चाहिये।
तीस्ता क्षेत्र बिहार में 'वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व' की उत्तरी सीमा पर अवस्थित एक गाँव है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत अर्द्ध-सैनिक पुलिस बल, सशस्त्र सीमा बल की एक इकाई इस क्षेत्र में तैनात है।
सुस्ता क्षेत्र में 265 से अधिक परिवार निवास करते हैं तथा खुद को नेपाल से संबंधित मानते हैं।
विवाद का कारण:
विवाद का मूल कारण गंडक नदी के बदलते मार्ग को माना जाता है। गंडक नदी नेपाल और बिहार (भारत) के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनाती है। गंडक नदी को नेपाल में नारायणी नदी के रूप में जाना जाता है।
नेपाल का मानना है कि पूर्व में सुस्ता क्षेत्र गंडक नदी के दाएँ किनारे अवस्थित था, जो नेपाल का हिस्सा था। लेकिन समय के साथ नदी के मार्ग में परिवर्तन के कारण यह क्षेत्र वर्तमान में गंडक के बाएँ किनारे पर अवस्थित है। वर्तमान में इस क्षेत्र को भारत द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
उत्तराखंड (भारत)-नेपाल सीमा पर विवाद:
नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार, सुगौली संधि (वर्ष 1816) के तहत काली (महाकाली) नदी के पूर्व के सभी क्षेत्र, जिनमें लिम्पियाधुरा (Limpiyadhura), कालापानी (Kalapani) और लिपुलेख (Lipulekh) शामिल हैं, नेपाल का अभिन्न अंग हैं। भारत के अनुसार, यह क्षेत्र उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले का हिस्सा है जबकि नेपाल इस क्षेत्र को धारचूला ज़िले का हिस्सा मानता है।
मुद्दे पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण:
अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार, किसी नदी के मार्ग में परिवर्तन होता है तो अंतर्राष्ट्रीय सीमा का निर्धारण नदी के मार्ग में बदलाव के स्वरूप के आधार पर किया जाता है अर्थात नदी मार्ग में आकस्मिक बदलाव (Avulsion) हो तो अंतर्राष्ट्रीय सीमा अपरिवर्तित रहती है, यदि नदी मार्ग में बदलाव धीरे-धीरे हो (Accretion) तो सीमा उसके अनुसार परिवर्तित होती है।
आगे की राह:
दोनों देशों को मौजूदा संधियों के दायरे में एक वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र के माध्यम से विवाद समाधान की दिशा में विचार-विमर्श किया जाना चाहिये।
भारत को नेपाल के साथ सीमा विवादों को कूटनीतिक संवाद के माध्यम से विवादों का अंतर्राष्ट्रीयकरण किये बिना सुलझाने का प्रयास करना चाहिये।
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नेपाल द्वारा आधिकारिक रूप से नेपाल का नवीन मानचित्र जारी किया गया, जो उत्तराखंड के कालापानी (Kalapani) लिंपियाधुरा (Limpiyadhura) और लिपुलेख (Lipulekh) को अपने संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है।
प्रमुख बिंदु:
‘विदेश मंत्रालय’ (Ministry of External Affairs- MEA) ने नेपाल के नवीन राजनीतिक मानचित्र को पूरी तरह से 'कृत्रिम' तथा भारत के लिये अस्वीकार्य बताया है।
2 नवंबर, 2019 को भारत ने एक नवीन मानचित्र प्रकाशित किया था यह जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में दर्शाता है। इसी मानचित्र में कालापानी को भी भारतीय क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया है।
सुस्ता क्षेत्र (Susta Territorial):
उत्तर प्रदेश तथा बिहार राज्यों की सीमा पर पश्चिमी चंपारण ज़िलों के पास अवस्थित ‘सुस्ता क्षेत्र’ को भी नेपाल द्वारा अपने नवीन मानचित्र में शामिल किया गया है।
नेपाल का दावा है कि भारत ने इस क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है तथा भारत को इस क्षेत्र को तुरंत खाली करना देना चाहिये।
तीस्ता क्षेत्र बिहार में 'वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व' की उत्तरी सीमा पर अवस्थित एक गाँव है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत अर्द्ध-सैनिक पुलिस बल, सशस्त्र सीमा बल की एक इकाई इस क्षेत्र में तैनात है।
सुस्ता क्षेत्र में 265 से अधिक परिवार निवास करते हैं तथा खुद को नेपाल से संबंधित मानते हैं।
विवाद का कारण:
विवाद का मूल कारण गंडक नदी के बदलते मार्ग को माना जाता है। गंडक नदी नेपाल और बिहार (भारत) के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनाती है। गंडक नदी को नेपाल में नारायणी नदी के रूप में जाना जाता है।
नेपाल का मानना है कि पूर्व में सुस्ता क्षेत्र गंडक नदी के दाएँ किनारे अवस्थित था, जो नेपाल का हिस्सा था। लेकिन समय के साथ नदी के मार्ग में परिवर्तन के कारण यह क्षेत्र वर्तमान में गंडक के बाएँ किनारे पर अवस्थित है। वर्तमान में इस क्षेत्र को भारत द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
उत्तराखंड (भारत)-नेपाल सीमा पर विवाद:
नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार, सुगौली संधि (वर्ष 1816) के तहत काली (महाकाली) नदी के पूर्व के सभी क्षेत्र, जिनमें लिम्पियाधुरा (Limpiyadhura), कालापानी (Kalapani) और लिपुलेख (Lipulekh) शामिल हैं, नेपाल का अभिन्न अंग हैं। भारत के अनुसार, यह क्षेत्र उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले का हिस्सा है जबकि नेपाल इस क्षेत्र को धारचूला ज़िले का हिस्सा मानता है।
मुद्दे पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण:
अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार, किसी नदी के मार्ग में परिवर्तन होता है तो अंतर्राष्ट्रीय सीमा का निर्धारण नदी के मार्ग में बदलाव के स्वरूप के आधार पर किया जाता है अर्थात नदी मार्ग में आकस्मिक बदलाव (Avulsion) हो तो अंतर्राष्ट्रीय सीमा अपरिवर्तित रहती है, यदि नदी मार्ग में बदलाव धीरे-धीरे हो (Accretion) तो सीमा उसके अनुसार परिवर्तित होती है।
आगे की राह:
दोनों देशों को मौजूदा संधियों के दायरे में एक वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र के माध्यम से विवाद समाधान की दिशा में विचार-विमर्श किया जाना चाहिये।
भारत को नेपाल के साथ सीमा विवादों को कूटनीतिक संवाद के माध्यम से विवादों का अंतर्राष्ट्रीयकरण किये बिना सुलझाने का प्रयास करना चाहिये। नेपाल द्वारा आधिकारिक रूप से नेपाल का नवीन मानचित्र जारी किया गया, जो उत्तराखंड के कालापानी (Kalapani) लिंपियाधुरा (Limpiyadhura) और लिपुलेख (Lipulekh) को अपने संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है।
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अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस
International Day for Biological Diversity
प्रत्येक वर्ष 22 मई को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (International Day for Biological Diversity) मनाया जाता है।
थीम:
इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस की थीम ‘हमारे समाधान प्रकृति में हैं’ (Our Solutions are in Nature) है।
उद्देश्य:
इसका उद्देश्य लोगों में जैव-विविधता के महत्त्व के बारे में जागरूक उत्पन्न करना है।
प्रमुख बिंदु:
अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस को मनाने की शुरुआत 20 दिसंबर, 2000 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव द्वारा की गई थी।
22 मई, 1992 को नैरोबी में जैव-विविधता पर अभिसमय (Convention on Biological Diversity- CBD) के पाठ को स्वीकार किया गया था। इसलिये 22 मई को प्रतिवर्ष अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस मनाया जाता है।
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पाइपलाइन परियोजनाओं में भारत को आत्मनिर्भर बनाना महत्वपूर्ण; श्री धर्मेंद्र प्रधान
लगभग 8000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की समीक्षा की
केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस और इस्पात मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान ने लगभग 8000 करोड़ रुपये की पाइपलाइन परियोजनाओं की समीक्षा की। तेल और गैस कंपनियों की उपरोक्त परियोजनाएं कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। आत्मनिर्भर भारत पर जोर देते हुए मंत्री श्री प्रधान ने इन परियोजनाओं के पूर्ण स्वदेशीकरण का आह्वान किया।
गेल (जीएआईएल), सितंबर 2020 तक घरेलू बोलीदाताओं से 1 लाख लाख टन स्टील की खरीद के लिए 1000 करोड़ रुपये से अधिक की लाइनपाइप निविदाओं को संसाधित (प्रोसेस) करेगी। इसके अंतर्गत 800 किलोमीटर लाइन पाइप के निर्माण के लिए स्टील की आपूर्ति की जायेगी। वर्तमान वित्तीय वर्ष के अंत तक यह मात्रा दोगुनी होने की उम्मीद है। इससे मेक इन इंडिया की पहल को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में प्रोत्साहन मिलेगा।
प्रधानमंत्री ऊर्जा गंगा, जेएचबीडीपीएल पाइपलाइन का परियोजना कार्य लॉकडाउन के बाद तेजी से चल रहा है। यह पाइप लाइन पूर्वी भारत को सेंट्रल नेचुरल गैस पाइपलाइन कॉरिडोर के माध्यम से पश्चिम के साथ जोड़ेगी। इससे देश में गैस आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।
इंडियन ऑयल, दक्षिण भारत में 6025 करोड़ रुपये की परियोजना लागत के साथ 1450 किलोमीटर लंबी प्राकृतिक गैस पाइपलाइन परियोजना को लागू कर रही है। इस परियोजना में लगभग 1.65 लाख एमटी स्टील पाइप के उपयोग की क्षमता है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 2060 करोड़ रुपये है। यह परियोजना भी आत्मनिर्भर अभियान के अनुरूप है।
इन्द्रधनुष गैस ग्रिड लिमिटेड, पूर्वोत्तर में प्राकृतिक गैस पाइपलाइन ग्रिड विकसित कर रहा है। इस पाइपलाइन ग्रिड से सभी 8 पूर्वोत्तर राज्यों को प्राकृतिक गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित होगी, उनकी आर्थिक वृद्धि में तेजी आयेगी और भारत में गैस आधारित अर्थव्यवस्था को आगे बढाने में मदद मिलेगी। आईजीजीएल जुलाई 2020 तक लगभग 73000 मीट्रिक टन स्टील की खरीद के लिए लगभग 950 करोड़ से अधिक की निविदाओं को संसाधित (प्रोसेस) कर रही है। यह प्रक्रिया घरेलू बोलीदाताओं से 550 किलोमीटर लाइन पाइप की स्टील आपूर्ति के लिए है। चालू वित्त वर्ष के अंत तक यह मात्रा दोगुनी होने की उम्मीद है।
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पाइपलाइन परियोजनाओं में भारत को आत्मनिर्भर बनाना महत्वपूर्ण; श्री धर्मेंद्र प्रधान
लगभग 8000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की समीक्षा की
केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस और इस्पात मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान ने लगभग 8000 करोड़ रुपये की पाइपलाइन परियोजनाओं की समीक्षा की। तेल और गैस कंपनियों की उपरोक्त परियोजनाएं कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। आत्मनिर्भर भारत पर जोर देते हुए मंत्री श्री प्रधान ने इन परियोजनाओं के पूर्ण स्वदेशीकरण का आह्वान किया।
गेल (जीएआईएल), सितंबर 2020 तक घरेलू बोलीदाताओं से 1 लाख लाख टन स्टील की खरीद के लिए 1000 करोड़ रुपये से अधिक की लाइनपाइप निविदाओं को संसाधित (प्रोसेस) करेगी। इसके अंतर्गत 800 किलोमीटर लाइन पाइप के निर्माण के लिए स्टील की आपूर्ति की जायेगी। वर्तमान वित्तीय वर्ष के अंत तक यह मात्रा दोगुनी होने की उम्मीद है। इससे मेक इन इंडिया की पहल को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में प्रोत्साहन मिलेगा।
प्रधानमंत्री ऊर्जा गंगा, जेएचबीडीपीएल पाइपलाइन का परियोजना कार्य लॉकडाउन के बाद तेजी से चल रहा है। यह पाइप लाइन पूर्वी भारत को सेंट्रल नेचुरल गैस पाइपलाइन कॉरिडोर के माध्यम से पश्चिम के साथ जोड़ेगी। इससे देश में गैस आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।
इंडियन ऑयल, दक्षिण भारत में 6025 करोड़ रुपये की परियोजना लागत के साथ 1450 किलोमीटर लंबी प्राकृतिक गैस पाइपलाइन परियोजना को लागू कर रही है। इस परियोजना में लगभग 1.65 लाख एमटी स्टील पाइप के उपयोग की क्षमता है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 2060 करोड़ रुपये है। यह परियोजना भी आत्मनिर्भर अभियान के अनुरूप है।
इन्द्रधनुष गैस ग्रिड लिमिटेड, पूर्वोत्तर में प्राकृतिक गैस पाइपलाइन ग्रिड विकसित कर रहा है। इस पाइपलाइन ग्रिड से सभी 8 पूर्वोत्तर राज्यों को प्राकृतिक गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित होगी, उनकी आर्थिक वृद्धि में तेजी आयेगी और भारत में गैस आधारित अर्थव्यवस्था को आगे बढाने में मदद मिलेगी। आईजीजीएल जुलाई 2020 तक लगभग 73000 मीट्रिक टन स्टील की खरीद के लिए लगभग 950 करोड़ से अधिक की निविदाओं को संसाधित (प्रोसेस) कर रही है। यह प्रक्रिया घरेलू बोलीदाताओं से 550 किलोमीटर लाइन पाइप की स्टील आपूर्ति के लिए है। चालू वित्त वर्ष के अंत तक यह मात्रा दोगुनी होने की उम्मीद है।
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आईएएसएसटी ने खाद्य वस्तुओं में कार्सियोजेनिक एवं म्युटैजेनिक यौगिकों का पता लगाने के लिए इलेक्ट्रोकैमिकल सेंसिंग प्लेटफार्म का विकास किया
गुवाहाटी स्थित विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी उन्नत अध्ययन संस्थान (आईएएसएसटी) ने कभी कभी क्योर्ड मीट, बैकोन कुछ पनीर एवं कम वसा वाले दूध जैसी खाद्य वस्तुओं में कार्सियोजेनिक एवं म्युटैजेनिक यौगिकों एन-नाइट्रोसोडिमेथिलामाइन (एनडीएमए) और एन-नाइट्रोसोडिथैनोलामाइन (एनडीईए) का पता लगाने के लिए इलेक्ट्रोकैमिकलसेंसिंग प्लेटफार्म का विकास किया है। इसे डीएनए में कार्बन नैनोमैटेरियल्स (कार्बन डौट्स) को स्थिर कर देने के जरिये एक मोडिफायड इलेक्ट्रोड विकसित करने के द्वारा अर्जित किया गया।
वैज्ञानिकों ने बताया कि शहरों में रहने वाले भारतीयों की बदलती भोजन शैली के कारण उन पर क्योर्ड मीट, बैकोन कुछ पनीर एवं कम वसा वाले सूखे दूध और मछली जैसी खाद्य वस्तुओं में नाइट्रोसैमीन परिवार से संबंधित हानिकारक रसायनों का खतरा मंडराने लगता है। ऐसे रसायनों में एनडीएमए एवं एनडीईए जैसे कार्सियोजेनिक शामिल होते हैं जो हमारे डीएनए की रसायनिक संरचना को भी बदल सकते हैं। इसलिए, उनका पता लगाने के लिए अनुसंधान तकनीकों का विकास किया जाना महत्वपूर्ण है।
नाइट्रोसैमीन का पता लगाने के लिए प्रयुक्त अधिकांश तकनीकों में μM अनुसंधान सीमाएं होती हैं। जर्नल एसीएस एैपल बायो मेटर में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एन- नाइट्रोसैमीन के संवेदनशील और चयनात्मक अनुसंधान के लिए कार्बन डौट्स के सतह पर स्थिर किए गए डीएनए का उपयोग करने के जरिये एक इलेक्टोकैमिकल सेंसिंग प्लेटफार्म का निर्माण किया है। एनडीएमए एवं एनडीईए के लिए क्रमशः 9.9×10−9 M और 9.6×10−9 M अन्वेषण सीमा निर्धारित की गई।
इलेक्टोकैमिकल बायोसेंसर प्लेटफार्म का विकास डीएनए को बदलने के लिए एनडीएमए एवं एनडीईए की क्षमता का उपयोग करने के द्वारा किया गया। एक कार्बन आधारित नैनोमैटेरियल, कार्बन डौट्स (सीडीएस) का उपयोग किया गया जो एक जैवसंगत तथा पर्यावरण के लिए हितैषी मैटेरियल के रूप में पहले से ही स्थापित है। प्राकृतिक रूप से व्युत्पन्न चितोसन ( श्रृम्प, लोबस्टर एवं क्रैब के शेल से प्राप्त प्राकृतिक बायोपोलीमर) एक पर्यावरण के लिए अनुकूल टिकाऊ मैटेरियल है जिसका उपयोग सीडी को संश्लेषित करने के लिए किया गया।
चूंकि यह एक इलेक्टोकैमिकल सेंसर है, इलेक्ट्रोड का विकास कार्बन डौट्स (कार्बन नैनोपार्टिकल्स) को डिपोजिट करने के द्वारा और फिर उन पर बैक्टेरियल डीएनए को स्थिर करने के जरिये किया गया। इस इलेक्ट्रोड प्रणाली का उपयोग वर्तमान पीक के मापन के लिए किया गया। एनडीएमए एवं एनडीईए दोनों ही इलेक्ट्रोड में उपस्थित डीएनए की रसायनिक संरचना को बदल देते हैं जिससे यह अधिक संवाही हो जाता है जिसका परिणाम अंततोगत्वा सवंर्द्धित वर्तमान पीक के रूप में आता है।
संरचनागत रूप से समान कुछ ऐसे ही रसायनिक यौगिकों को यह जांच करने के लिए जोड़ा गया कि क्या वे प्रणाली में हस्तक्षेप कर सकते हैं। लेकिन ये रसायन डीएन क्रम को नहीं बदल सकते, इसलिए वे प्रणाली को प्रभावित नहीं करते।
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डॉ हर्ष वर्धन ने कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष का पदभार संभालते हुए विश्व के भावी स्वास्थ्य परिदृश्य पर अपने विचार भी साझा किए। ‘’मेरा विश्वास है कि आर्थिक कार्य प्रदर्शन और मानव क्षमता बढ़ाने में स्वास्थ्य की अहम भूमिका है। यद्यपि जनस्वास्थ्य नीति प्रकृति के समुचित सूझबूझ पर आधारित होनी चाहिए। यह समग्र स्वास्थ्य और आरोग्य पर आधारित भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का शीर्ष सिद्धांत है, जिसका मैंने अनुभव किया है और जिससे मैंने स्वास्थ्य लाभ लिया है।‘’ उन्होंने कहा। डॉ हर्ष वर्धन ने गतिशील और दूरदर्शी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्वास्थ्य और आरोग्य केंद्रों तथा प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के दो स्तंभों वाली आयुष्मान स्कीम जैसे राष्ट्रीय महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के माध्यम से सार्वभौम स्वास्थ्य की भारत की नीति को स्पष्ट किया।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ लंबे समय तक जुड़े रहने का स्मरण करते हुए डॉ हर्ष वर्धन ने भारत में पोलियो के खिलाफ लड़ाई में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सशक्त सहयोग और समर्थन के लिए अपना आभार व्यक्त किया। ‘’यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मित्रों से सहयोग और मनोबल बढ़ाने में सहयोग नहीं मिला होता तो मैंने यह उपलब्धि हासिल नहीं की होती, जो मुझे मिली है। यदि आज भारत पोलियो मुक्त है तो मुझे यह स्वीकार करना होगा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की दृढ़ता और उद्यम के बिना ऐसा कभी संभव नहीं हो सकता था’’ उन्होंने कहा।
डॉ हर्ष वर्धन विश्व स्वास्थ्य संगठन के पोलियो उन्मूलन पर महत्वपूर्ण विशेषज्ञ सलाहकार समूह और वैश्विक टेक्नीकल परामर्श समूह जैसी कई प्रतिष्ठित समितियों के सदस्य भी रहे हैं। उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन के सलाहकार के रूप में भी कार्य किया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड में तीन वर्ष के लिए निर्वाचित 34 तकनीकी योग्य सदस्य हैं इस बोर्ड के मुख्य कार्यों में स्वास्थ्य असेम्बली के निर्णयों और नीतियों का कार्यान्वयन और इसके काम में सलाह और सहायता देना है।
डॉ हर्ष वर्धन के उल्लेखनीय करियर में यह एक और महत्वपूर्ण सम्मान है। उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज कानपुर से 1979 में चिकित्सा में स्नातक और 1983 में चिकित्सा में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। वे 1993 से जनसेवा के कार्य से जुड़े हैं। 1993 में वह दिल्ली विधानसभा के पहली बार सदस्य चुने गए थे। वे लगातार पांच वर्ष के कार्यकाल के पांच बार विधानसभा के तब तक सदस्य रहे जब वे मई , 2014 में चांदनी चौक संसदीय क्षेत्र से 16वीं लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। 1993 से 1998 के बीच उन्होंने दिल्ली के स्वास्थ्य, शिक्षा, विधि और न्याय तथा विधायी कार्य के मंत्री के रूप में कार्य किया। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री के रूप में 1994 में पल्स पोलियो कार्यक्रम की पायलट परियोजना का सफल कार्यान्वयन किया जिसके तहत दिल्ली में तीन वर्ष तक की आयु के 12 लाख शिशुओं का टीकाकरण किया गया। इससे 2014 में भारत के पोलियो मुक्त बनने की बुनियाद रखी गई। उन्होंने धूम्रपान निषेध और गैर-धूम्रपान कर्ता स्वास्थ्य संरक्षण अधिनियम 1997 को पारित कराने और उसे लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस कानून का बाद में देश के विभिन्न राज्यों ने अनुसरण किया।
डॉ हर्ष वर्धन को 2014 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया । बाद में उन्हें केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान का मंत्री बनाया गया। वे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भी रहे। वे चांदनी चौक संसदीय क्षेत्र से 17वीं लोकसभा के दोबारा सदस्य निर्वाचित हुए। उन्हें 30 मई, 2019 को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान का मंत्री बनाया गया।
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डॉ हर्ष वर्धन विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष निर्वाचित
आर्थिक कार्य प्रदर्शन और मानव क्षमता बढ़ाने में स्वास्थ्य की अहम भूमिका
मैं जन स्वास्थ्य के कर्तव्यों के कुशल, प्रभावी और उत्तरदायी निर्वहन के प्रति वचनबद्ध- डॉ हर्ष वर्धन
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री डॉ हर्ष वर्धन आज विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड के वर्ष 2020-21 के लिए अध्यक्ष निर्वाचित किए गए। कार्यकारी बोर्ड के 147वें सत्र की एक वचुर्अल बैठक में उन्हें निर्वाचित किया गया। डॉ हर्ष वर्धन जापान के हीरोकि नाकातानी का स्थान लेंगे।
कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष का दायित्व स्वीकार करते हुए प्रारंभ में डॉ हर्ष वर्धन ने विश्व में कोविड-19 की महामारी से अपनी जान गंवाने वाले लाखों लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने इस अवसर पर उपस्थित सभी सम्मानित महानुभावों से अनुरोध किया कि वे अग्रिम पंक्ति के सभी स्वास्थ्य कर्मियों और अन्य कोविड योद्धाओ की गरिमा, संकल्प शक्ति और निष्ठा के लिए उन्हें करतल ध्वनि से सलाम करें।
‘’मेरे प्रति आप सभी के विश्वास और भरोसे के लिए मैं सम्मानित महसूस कर रहा हूं, भारत और मेरे सभी देशवासी भी गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं कि यह सम्मान हम सबको मिला है’’ उन्होंने कहा । कोविड-19 को एक बड़ी माननीय त्रासदी मानते हुए उन्होंने कहा कि अगले दो दशकों में कई चुनौतियां आ सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा ‘’इन सभी चुनौतियों से निपटने के लिए साझी कार्रवाई की आवश्यकता होगी क्योंकि इनके पीछे साझा खतरा है जिसके लिए कार्रवाई हेतु साझा जिम्मेदारी की आवश्यकता है’’। उन्होंने यह भी कहा ‘’ विश्व स्वास्थ्य संगठन में शामिल सदस्य देशों के गठबंधन की मूल भावना का यह प्रमुख अंग है हालांकि इसके लिए राष्ट्रों के अधिक साझे आदर्शवाद की आवश्यकता है।‘’ डॉ हर्ष वर्धन ने कहा कि महामारी ने स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था की मजबूती और तैयारियों की अनदेखी से होने वाले परिणामों से पूरी तरह अवगत करा दिया है। वैश्विक संकट के ऐसे समय में जोखिम प्रबंधन और जोखिम में कमी लाने दोनों स्थितियों के लिए जनस्वास्थ्य के हितों को पुन: ऊर्जावान बनाने और निवेश करने के लिए वैश्विक भागीदारी को और मजबूत बनाने की आवश्यकता होगी।‘’
डॉ हर्ष वर्धन ने कोविड-19 पर काबू पाने के भारत के अनुभवों को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि भारत की मृत्यु दर केवल 3 प्रतिशत है। 135 करोड़ के देश में केवल 0.1 मिलियन कोविड-19 के मामले हैं। हमारे रोगियों की स्वस्थ होने की दर 40 प्रतिशत से अधिक है और मामले दोगुना होने की दर 13 दिन है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड के नए अध्यक्ष होने के नाते डॉ हर्ष वर्धन ने शताब्दियों से मानवता को नुकसान पहुंचा रहे रोगों के बारे में अधिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा कि वैश्विक संसाधनों का पूल बनाकर एक दूसरे का पूरक बनने के लिए मिलकर सहयोग करने, रोगों के कारण होने वाली मौतों में कमी लाने का एक अधिक प्रभावशाली और आक्रामक खाका तैयार करने से इन रोगों का उन्मूलन किया जा सकता है, दवाओं और वैक्सीन की वैश्विक कमी के समाधान और सुधारों की आवश्यकता पूरी करने के लिए एक नया खाका बनाने की आवश्यकता है। ‘’मैं आश्वस्त हूं कि सदस्यों देशों और अन्य पक्षों के साथ निरंतर सहयोग सुधारों को अधिक प्रभावी बनाएगा और टिकाऊ विकास लक्ष्यों तथा संसाधनों के अधिक परिणामजनक, कुशल और लक्षित उपयोग से सार्वभौम स्वास्थ्य कवरेज हासिल की जा सकेगी। मैं अपने इस संगठन के सामूहिक विजन को साकार करने के लिए जुटकर काम करूंगा ताकि सभी सदस्य देशों में सामूहिक क्षमता का निर्माण और सामूहिक साहसी नेतृत्व बनाया जाए’’, उन्होंने कहा ।
डॉ हर्ष वर्धन ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन इस सिद्धान्त में विश्वास करता है कि बिना किसी जाति, धर्म, राजनीतिक विश्वास, आर्थिक और सामाजिक स्थिति के भेदभाव के प्रत्येक मानव के मूल अधिकारों में से एक स्वास्थ्य के सर्वोत्तम मानक प्राप्त करना है। ‘’मैं इसलिए जनस्वास्थ्य के दायित्वों के कुशल, प्रभावी और संवेदनशील निर्वहन के लिए सदस्य देशों; संगठन और साझेदारों के वैश्विक समुदाय के साथ काम करने की प्रतिबद्धता व्यक्त करता हूं’’ , उन्होंने कहा।
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केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा, किसानों की आय दुगनी करने के अपने लक्ष्य के तहत मधुमक्खी पालन को बढ़ावा दे रही है सरकार
आत्मनिर्भर अभियान के तहत सरकार ने मधुमक्खी पालन के लिए 500 करोड़ रुपये का आवंटन किया: श्री नरेन्द्र सिंह तोमर
भारत विश्व के पांच शीर्ष शहद उत्पादकों में शुमार
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि किसानों की आय दुगनी करने के अपने लक्ष्य के तहत सरकार मधुमक्खी पालन को बढ़ावा दे रही है। राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) द्वारा आयोजित वेबिनार को सम्बोधित करते हुए श्री तोमर ने कहा कि सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत मधुमक्खी पालन के लिए 500 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। उन्होंने कहा कि भारत विश्व में शहद के 5 सबसे बड़े उत्पादकों में शुमार है। भारत में वर्ष 2005-06 की तुलना में अब शहद उत्पादन 242 प्रतिशत बढ़ गया है, वहीं इसके निर्यात में 265 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
श्री तोमर ने कहा कि बढ़ता शहद निर्यात इस बात का प्रमाण है कि मधुमक्खी पालन 2024 तक किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कारक रहेगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड ने राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं मधु मिशन (एनबीएचएम) के लिए मधुमक्खी पालन के प्रशिक्षण के लिए चार माड्यूल बनाए गए हैं, जिनके माध्यम से देश में 30 लाख किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है। इन्हें सरकार द्वारा वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है।
श्री तोमर ने बताया कि सरकार मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए गठित की गई समिति की सिफारिशों का कार्यान्वयन कर रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में सरकार ने मीठी क्रांति के तहत हनी मिशन की भी घोषणा की है, जिसके चार भाग है, इसका भी काफी लाभ मिलेगा। मधुमक्खी पालन का काम गरीब व्यक्ति भी कम पूंजी में अधिक मुनाफा प्राप्त करने के लिए कर सकता है। इसीलिए, इसे बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री जी द्वारा 500 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की गई है। इससे मधुमक्खी पालकों के साथ ही किसानों की भी दशा और दिशा सुधारने में मदद मिलेगी।
वेबिनार में उत्तराखंड के सहकारिता मंत्री डॉ. धनसिंह रावत ने उत्तराखंड को जैविक शहद उत्पादन की मुख्यधारा में लाने के राज्य सरकार के संकल्प पर प्रकाश डाला। उन्होंने हनी मिशन में संशोधन लाने की आवश्यकता का उल्लेख किया। एनसीडीसी के प्रबंध निदेशक श्री सुदीप कुमार नायक ने महिला समूहों को बढ़ावा देने और एपिकल्चर सहकारी समितियों के विकास में एनसीडीसी की भूमिका पर प्रकाश डाला।
शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वाइस चांसलर प्रो. नजीर अहमद ने कश्मीर में शहद की अनूठी विशेषताओं के बारे में जानकारी दी। यूएनएफएओ के प्रतिनिधि श्री तोमियो शिचिरी ने शहद के निर्यात में गुणवत्ता आश्वासन के महत्व पर चर्चा की। पश्चिम बंगाल के अपर मुख्य सचिव डॉ. एम.वी. राव ने महिला समूहों द्वारा जैविक शहद व जंगली शहद के उत्पादन, ब्रांडिंग और विपणन को बढ़ावा देने के लिए अपनी सरकार के कदमों के बारे में बताया। बागवानी आयुक्त डॉ. बी.एन.एस. मूर्ति ने नए मिशन में नवाचारों पर प्रकाश डाला।
मध्य प्रदेश, कश्मीर, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, बिहार, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश व झारखंड के सफल मधुमक्खी पालकों और उद्यमियों ने अपने अनुभवों को साझा किया और मीठी क्रांति लाने के लिए आगे के तरीके सुझाए।
‘’मीठी क्रांति और आत्मनिर्भर भारत’’ विषय पर राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) ने यह वेबिनार राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड, पश्चिम बंगाल सरकार, उत्तराखंड सरकार और शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर के साथ मिलकर कल आयोजित किया था। इस आयोजन का उद्देश्य कृषि आय और कृषि उत्पादन बढ़ाने के साधन के रूप में भूमिहीन ग्रामीण गरीब, छोटे और सीमांत लोगों के लिए आजीविका के स्रोत के रूप में वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन को लोकप्रिय बनाना है। इस वेबिनार में मधुमक्खी पालकों के साथ ही शहद प्रोसेसर, विपणन और ब्रांडिंग पेशेवरों, अनुसंधान विद्वानों, शिक्षाविदों, प्रमुख शहद उत्पादक राज्यों के सहयोगियों, राज्य और केंद्र सरकारों के प्रतिनिधियों, एफएओ और एनईडीएसी, बैंकॉक जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भाग लिया।
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प्रधान मंत्री ने ओडिशा के अम्फान तूफान से प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण किया; 500 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता घोषित की
प्रधान मंत्री ने तूफान में मारे गए लोगों के परिजनों को 2-2 लाख रुपये अनुग्रह राशि देने की घोषणा की; घायलों के लिए 50,000 रुपये की घोषणा
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने चक्रवात अम्फान से उत्पन्न स्थिति का जायजा लेने के लिए आज ओडिशा का दौरा किया। उनके साथ केन्द्रीय मंत्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान, केन्द्रीय राज्य मंत्री श्री बाबुल सुप्रियो, श्री प्रताप चन्द्र सारंगी और सुश्री देबाश्री चौधरी भी थी। प्रधान मंत्री ने चक्रवात के प्रभाव का आकलन करने के लिए ओडिशा के राज्यपाल, श्री गणेशी लाल, और मुख्यमंत्री श्री नवीन पटनायक के साथ भद्रक और बालासोर का हवाई सर्वेक्षण किया।
हवाई सर्वेक्षण के बाद, प्रधानमंत्री ने स्थिति की समीक्षा करने के लिए राज्य और केन्द्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भुवनेश्वर में एक बैठक की अध्यक्षता की। उन्होंने ओडिशा राज्य को 500 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की। एक अंतर-मंत्रालयी केन्द्रीय दल नुकसान का आकलन करेगा।
प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया कि इस कठिन समय पर केन्द्र सरकार राज्य सरकारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेगी और तूफान प्रभावित इलाकों में पुनरूद्धार और बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए हर संभव सहायता देगी।
प्रधानमंत्री ने ओडिशा के लोगों के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए तूफान में लोगों के मारे जाने पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख रुपये और तूफान में गंभीर रूप से घायलों को 50,000 रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की।
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जैव विविधता के मुद्दों पर समझ और जागरूकता बढ़ाने हेतु हर साल 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2000 में संकल्प 55/201 के माध्यम से इस दिवस को मानाने की घोषणा की गई ।
जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रयास
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 2010 को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष के रूप में मनाया गया था। जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रयास तेज हो गए है। देश में जैव विविधता संरक्षण की दिशा में सार्थक कदम उठाए जा रहे हैं। देश में 61 विभिन्न लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण के लिए भारतीय प्राणी उद्यानों में संभावित संरक्षित प्रजनन पहचान कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई जा रही है। जिसके अंतर्गत गिद्धों, पेंटिड रूफ कछुए, ब्लिथंस टैगोपन, हसूम्स फीजेंट तथा पंगोलिन जीवों के लिए संरक्षित प्रजनन केंद्रों की आरंभिक चरण में स्थापना की गई है। कुछ विशेष जीवों के लिए इसके अलावा व्यापक रूप से कार्ययोजना चल रही है जैसे कि सन् 1973 से बाघ परियोजना आरंभ की गई है जो कि बाघों के संरक्षण से संबंधित है और अब इसके उत्साहवर्धक परिणाम मिलने लगे हैं।
जैविक विविधता (या जैव विविधता) शब्द को पहली बार 1968 में वन्यजीव वैज्ञानिक और संरक्षणवादी रेमंड एफ दस्मान द्वारा प्रयोग में लाया गया था। यह शब्द 1980 के दशक के दौरान व्यापक रूप से उपयोग में आया। जैव विविधता एक क्षेत्र के कुल जीन, प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्र को संदर्भित करती है।
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खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) विदेशों में रेशम और कपास के फेस-मास्क के निर्यात के संभावित विकल्प का पता लगा रहा है। यह कार्य “वोकल फॉर लोकल” को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है, जिसे आत्म निर्भर भारत अभियान के तहत शुरू किया गया था।
मुख्य बिंदु
अब तक KVIC को मास्क के 8 लाख ऑर्डर मिले हैं और लॉक डाउन अवधि के दौरान 6 लाख की आपूर्ति की चुकी है। भारत में अच्छी मांग के बाद KVIC विश्व स्तर पर खादी मास्क का विस्तार करने जा रहा है। योजना के तहत खादी मास्क की आपूर्ति अमेरिका, दुबई, मॉरीशस, मध्य पूर्व और कई अन्य यूरोपीय देशों में की जा रही है।
महत्व
खादी मास्क का निर्यात उत्पादन बढ़ाने में मदद करेगा और अंततः रोजगार को बढ़ावा देने में मदद करेगा। चूंकि मास्क सस्ते, पुन: प्रयोज्य, धोने योग्य और बायो-डिग्रेडेबल होते हैं, इसलिए वैश्विक स्तर पर उनकी मांग बढ़ रही है। इसके अलावा उनकी दक्षता अधिक है क्योंकि वे डबल ट्विस्टेड खादी के कपड़े से बने हैं।
डबल ट्विस्टेड कपडा नमी बनाए रखने में मदद करता है और हवा के लिए आसान मार्ग बनाता है। इससे सूती कपड़े पहनने में अधिक आरामदायक होते हैं। दूसरी ओर, सिंथेटिक मास्क हवा के पारित होने नही देता। यह पसीने को भी सोखता नहीं है। इसलिए, सिंथेटिक मास्क पहनने से पसीना बढ़ जाता है और उपयोगकर्ताओं को असुविधा होती है।
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केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बातचीत की। इस बैठक में पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने से संबंधित चर्चा हुई।
मुख्य बिंदु
वीडियो सम्मेलन में भाग लेने वाले राज्यों में कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, गोवा, तमिलनाडु और गुजरात शामिल हैं। भारत सरकार ने डॉ. कस्तूरीरंगन के तहत एक उच्च स्तरीय कार्य समूह का गठन किया। इस समिति ने राज्यों में भौगोलिक क्षेत्रों की पहचान की जिन्हें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की आवश्यकता है। समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के आधार पर, केंद्र सरकार ने 2018 में क्षेत्रों को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ईएसए) के रूप में अधिसूचित करने के लिए एक ड्राफ्ट नोटिस जारी किया।
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र राज्य ने अधिक से अधिक गांवों को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव दिया। अपने प्रस्ताव के तहत, महाराष्ट्र ने ईएसए के तहत 2,092 गांवों को शामिल करने का अनुरोध किया है। केंद्र ने 2,133 गांवों को शामिल करने का प्रस्ताव दिया था। ये गाँव पश्चिमी घाट के 37% हिस्से को कवर करते हैं।
ईएसए क्या है? (Ecologically Sensitive Area)
जब किसी क्षेत्र को ईएसए घोषित किया जाता है, तो इसका मतलब है कि वहां खनन, थर्मल प्लांट, उत्खनन, निर्माण और उद्योगों की स्थापना पर प्रतिबंध लगाए गए हैं।
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प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत ग्रामीण सड़क विकास में कॉयर जियो टेक्सटाइल्स का उपयोग किया जायेगा। यह कार्य राष्ट्रीय ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास एजेंसी द्वारा किया जायेगा।
कॉयर जियोटेक्सटाइल्स
यह कॉयर से बने होती हैं और 3 से 5 साल तक चलते हैं। कॉयर जियोटेक्सटाइल ह्यूमस में घट जाती है। इससे मिट्टी समृद्ध होती है।
जियोटेक्सटाइल
जियो टेक्सटाइल पारगम्य कपड़े हैं जो फ़िल्टर, अलग करने, सुदृढ़, और रक्षा करने की क्षमता रखते हैं। वे पॉलीप्रोपाइलीन से बने होते हैं।
जियो टेक्सटाइल का उपयोग जीवाश्म फुटप्रिंट की रक्षा के लिए किया जाता है। यह कम लागत पर मिट्टी को मजबूत करने में मदद करता है। जियो टेक्सटाइल का उपयोग ढलानों को सुरक्षित करने के लिए किया जाता है।
इसका मुख्य अनुप्रयोग सिविल इंजीनियरिंग उद्योग में हैं। इसका उपयोग एयरफील्ड्स, तटबंधों, जलाशयों, नहरों, बांधों, गाद बाड़ आदि में किया जाता है। इसका उपयोग क्षरण नियंत्रण में व्यापक रूप से होता है, खासकर पहाड़ी ढलानों में।
कृत्रिम रीफ बनाने में जियो टेक्सटाइल सैंड बैग का भी इस्तेमाल किया जाता है।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना III
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का चरण III दिसंबर, 2019 में शुरू किया गया था। यह 1,25,000 किलोमीटर मार्गों के समेकन पर केंद्रित है। इसमें मुख्य रूप से प्रमुख ग्रामीण लिंक शामिल हैं। इसका उद्देश्य ग्रामीण कृषि बाजारों, अस्पतालों और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों को जोड़ना है
