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नासा ने WFIRST हबल टेलीस्कोप का नाम बदलकर खगोल विज्ञानी नैन्सी ग्रेस रोमन के नाम पर रखा नासा ने अंतरिक्ष एजेंसी की पहली प्रमुख खगोल विज्ञानी नैन्सी ग्रेस रोमन के नाम पर अपनी अगली पीढ़ी के स्पेस टेलीस्कोप - वाइड-फील्ड इन्फ्रारेड सर्वे टेलीस्कोप (WFIRST) का नाम बदल दिया है। नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप या रोमन स्पेस टेलीस्कोप वर्ष 2025 में लॉन्च किया जा सकता है। नासा की पहली प्रमुख खगोल विज्ञानी नैन्सी ग्रेस रोमन ने व्यापक ब्रह्मांड में खोज करने के लिए अंतरिक्ष दूरबीनों का मार्ग प्रशस्त किया था। उन्हें हबल स्पेस टेलीस्कोप की माता अर्थात जननी के तौर पर भी जाना जाता है, जिसे 30 साल पहले लॉन्च किया गया था। नासा के प्रशासक जिम ब्रिडेनस्टाइन ने कहा कि यह नैन्सी ग्रेस रोमन के नेतृत्व और दृष्टि के कारण ही संभव हो सका कि नासा एस्ट्रोफिजिक्स (खगोल भौतिकी) में अग्रणी बन गया और दुनिया की सबसे शक्तिशाली अंतरिक्ष दूरबीन हबल को लॉन्च किया।उन्होंने कहा कि वह WFIRST के लिए किसी अन्य बेहतर नाम के बारे में नहीं सोच सकते हैं, जोकि हबल और वेब स्पेस टेलीस्कोप का स्थान लेगा। रोमन स्पेस टेलीस्कोप: उद्देश्य रोमन स्पेस टेलीस्कोप से ऐसी उम्मीद की जाती है कि नासा द्वारा अंतरिक्ष की बेहतर समझ हासिल करने और लंबे समय से कायम खगोलीय रहस्यों जैसेकि - जैसेकि ब्रह्मांड के विस्तार के पीछे काम करने वाले बल को उजागर करने और हमारे सौर मंडल से परे के दूरस्थ ग्रहों की खोज को बढ़ावा देने में अंतरिक्ष एजेंसी की मदद करेगा। कौन थी नैन्सी ग्रेस रोमन? • नैन्सी ग्रेस रोमन का जन्म 16 मई, 1925 को नैशविले, टेनेसी में हुआ था। रोमन तब से खगोल विज्ञानी बनना चाहती थीं जब वे सातवीं कक्षा में थीं। • हालांकि, उन्हें ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जो उनकी पीढ़ी की कई महिलाओं को वैज्ञानिक अनुसंधान में आगे बढ़ने में दिलचस्पी दिखाने पर झेलनी पड़ती थीं। विज्ञान की दिशा में आगे बढ़ने से हतोत्साहित होने के बावजूद, रोमन ने 1946 में खगोल विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और 1949 में शिकागो विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। • रोमन ने जल्दी ही अमेरिकी नौसेना अनुसंधान प्रयोगशाला में एक पद ग्रहण किया और रेडियो तरंगों के माध्यम से ब्रह्मांडीय प्रश्नों पर शोध करने के लिए अथक प्रयास किया। • एजेंसी की स्थापना के छह महीने बाद 1959 में रोमन नासा में शामिल हो गईं। उन्होंने नासा के अंतरिक्ष विज्ञान कार्यालय में खगोल विज्ञान और सापेक्षता के प्रमुख के रूप में कार्य किया। वे खगोल विज्ञान से संबंधित कार्यक्रमों और अनुदान के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार थीं। • अपनी तेज पेशेवर प्रगति के बावजूद, रोमन ने लैंगिक असमानता का सामना किया, क्योंकि यह उन महिलाओं के लिए एक कठिन युग था जो वैज्ञानिक अनुसंधान में आगे बढ़ना चाहती थीं। • उन्होंने ब्रह्मांड के रहस्यों की जांच करने के लिए नए तरीके स्थापित करने के लिए अपनी दृष्टिकोण के मुताबिक खोज जारी रखी। • रोमन के नेतृत्व में नासा ने वर्ष 1966 और वर्ष 1972 के बीच चार ऑर्बिटिंग एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्ज़र्वेटरीज़ लॉन्च की़। चार में से केवल दो ही सफल रहे और उन्होंने अंतरिक्ष-आधारित एस्ट्रोफिजिक्स के महत्त्व का खुलासा किया और हबल के लिए पूर्ववर्ती के तौर पर काम करने का प्रतिनिधित्व किया। • हबल स्पेस टेलीस्कोप को एक वास्तविकता बनाने का श्रेय नैन्सी ग्रेस रोमन को जाता है। टेलीस्कोप, जिसे गहन जांच के बाद लॉन्च किया गया था, अब तक की सबसे क्रांतिकारी अंतरिक्ष दूरबीनों में से एक बन गया। • रोमन को टेलिस्कोप की माता कहा गया है, क्योंकि उन्होंने नए उपकरणों के पक्ष में अथक रूप से अपनी बात रखी जिससे वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष से व्यापक ब्रह्मांड का अध्ययन करने की सुविधा मिली। • वर्ष 2018 में रोमन का निधन हो गया और उन्होंने एक जबरदस्त वैज्ञानिक विरासत अपने पीछे छोड़ी।वर्तमान में हबल स्पेस टेलीस्कोप दुनिया का सबसे शक्तिशाली और उत्पादक स्पेस टेलीस्कोप है।

बैंक बोर्ड ब्यूरो (Banks Board Bureau- BBB) द्वारा न्यू इंडिया एश्योरेंस (New India Assurance- NIA) के महाप्रबंधक एस. एस. राजेश्वरी को दिल्ली स्थित ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी (Oriental Insurance Company- OIC) के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक पद के लिये चयनित किया गया है। प्रमुख बिंदु: OIC के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक पद के लिये BBB द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र की 5 बीमा कंपनियों के वरिष्ठ महाप्रबंधकों के साक्षात्कार लिये गए थे। यह पहली बार है कि OIC के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक (Chairman and Managing Director- CMD) पद के लिये वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से साक्षात्कार लिया गया है। गौरतलब है कि OIC के वर्तमान CMD 60 वर्ष की आयु पूरी होने के कारण इस माह के अंत में सेवानिवृत्त हो जाएंगे। ऐसा दूसरी बार हुआ है कि BBB द्वारा किसी साक्षात्कार के दिन ही उसके परिणाम घोषित कर दिये गए हैं। इससे पूर्व जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (General Insurance Corporation) और एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड (Agriculture Insurance Company of India Limited- AIC) के CMD पदों के परिणाम साक्षात्कार के दिन ही घोषित कर दिये गए थे। नियुक्ति की प्रक्रिया: साक्षात्कार के परिणामों के जारी होने के बाद अब केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा OIC के CMD की नियुक्ति की प्रक्रिया प्रारंभ की जाएगी। केंद्रीय वित्तमंत्री की अनुमति के बाद आधिकारिक नियुक्ति पत्र को केंद्रीय मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति के पास भेजा जाएगा, जहाँ से इसे प्रधानमंत्री की सहमति हेतु प्रधानमंत्री कार्यालय भेजा जाएगा। नियुक्ति के प्रभाव: विशेषज्ञों के अनुसार, OIC के CMD की नियुक्ति इस बात का संकेत है कि केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की तीन सामान्य बीमा कंपनियों {नेशनल इंश्योरेंस कंपनी (National Insurance Company- NIC) और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस और OIC) के विलय की योजना में कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहती है। साथ ही केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने संकेत दिये हैं कि जल्द ही सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य सामान्य बीमा कंपनियों के निदेशकों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। ध्यातव्य है कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने लगभग दो वर्षों से सार्वजनिक क्षेत्र की चार बीमा कंपनियों के निदेशकों की नियुक्ति रोक दी थी। इसके कारण इन चार सार्वजनिक कंपनियों में अधिकांश निदेशकों के पद खाली हैं। बैंक बोर्ड ब्यूरो (Banks Board Bureau- BBB): देश के बैंकिग क्षेत्र की चुनौतियों को दूर करने के लिये वर्ष 2014 में भारतीय रिज़र्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन द्वारा एक्सिस बैंक के पूर्व अध्यक्ष ‘पी. जे. नायक’ की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। पी. जे. नायक समिति की सिफारिशों के आधार पर 8 फरवरी’ 2016 को भारत सरकार ने ब्यूरो के गठन और इसकी संरचना की घोषणा की। भारतीय बैंकिग क्षेत्र ने आधिकारिक रूप से 1, अप्रैल 2016 से कार्य करना प्रारंभ किया था। बैंक बोर्ड ब्यूरो का मुख्यालय मुंबई में स्थित है। बैंक बोर्ड ब्यूरो के कार्य: BBB एक एक स्वायत्त संस्तुतिकर्ता संस्था के रूप में कार्य करती है। बैंक बोर्ड ब्यूरो के प्रमुख कार्यों में से कुछ निम्नलिखित हैं- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (Public Sector Banks- PSBs) और वित्तीय संस्थाओं (Financial Institution- FI) के निदेशक मंडल (पूर्णकालिक निदेशक और गैर- कार्यकारी अध्यक्ष) की नियुक्ति हेतु सरकार को सुझाव देना। PSBs/Fi और इनके अधिकारियों तथा निदेशक मंडल के कार्यनिष्पादन संबंधी डेटा का डेटा बैंक बनाना एवं इसे सरकार के साथ साझा करना। PSBs और Fi के प्रबंधकीय कर्मियों हेतु नीति और आचार संहिता बनाने तथा इसे लागू करने के संबंध में सरकार को परामर्श देना। बैंकों को व्यापार/कारोबार की रणनीति बनाने और पूँजी जुटाने की योजना में सहायता प्रदान करना, आदि।

फसलों को बुरी तरह प्रभावित करने वाली टिड्डियों का पिछले कुछ दिनों से राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र (विदर्भ क्षेत्र) के शहरी क्षेत्रों में देखा जाना चिंता का विषय है। प्रमुख बिंदु: शहरी क्षेत्रों में टिड्डियों का आगमन: दरअसल 11 अप्रैल को भारत-पाकिस्तान सीमा के आस-पास के क्षेत्रों में टिड्डियों को पहली बार देखा गया था। मई के शुरूआती दिनों में ही पाकिस्तान से होते हुए टिड्डियों का आगमन राजस्थान की तरफ होने लगा था मानसून से पहले आगमन होने की वज़ह से इनके मार्गों में सूखाग्रस्त क्षेत्र जहाँ भोजन व आश्रय न मिलने के कारण ये टिड्डियाँ हरी वनस्पति की तलाश में राजस्थान की तरफ बढ़ती गई। Food and Agriculture Organisation-(FAO) के अनुसार, टिड्डियाँ भोजन की तलाश हेतु शहरी क्षेत्रों में प्रवेश कर रहीं हैं। टिड्डी (Locusts): मुख्यतः टिड्डी एक प्रकार के उष्णकटिबंधीय कीड़े होते हैं जिनके पास उड़ने की अतुलनीय क्षमता होती है जो विभिन्न प्रकार की फसलों को नुकसान पहुँचाती हैं। टिड्डियों की प्रजाति में रेगिस्तानी टिड्डियाँ सबसे खतरनाक और विनाशकारी मानी जाती हैं। सामान्य तौर पर ये प्रतिदिन 150 किलोमीटर तक उड़ सकती हैं। साथ ही 40-80 मिलियन टिड्डियाँ 1 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में समायोजित हो सकती हैं। टिड्डियों के पूर्वागमन के कारण: टिड्डियों के पूर्वागमन का प्रमुख कारण मई और अक्तूबर 2018 में आए मेकुनु और लुबान नामक चक्रवाती तूफान हैं, जिनके कारण दक्षिणी अरब प्रायद्वीप के बड़े रेगिस्तानी इलाके झीलों में तब्दील हो गए थे। अतः इस घटना के कारण भारी मात्रा में टिड्डियों का प्रजनन हुआ था। नवंबर 2019 में पूर्वी अफ्रीका में टिड्डियों ने भारी मात्रा में फसलों को नुकसान पहुँचाया था साथ ही पूर्वी अफ्रीका में भारी वर्षा होने कारण इनकी जनसंख्या में वृद्धि हुई तत्पश्चात ये दक्षिणी ईरान और पाकिस्तान की तरफ चलती गई। टिड्डियों का भारत में प्रभाव: वर्तमान में फसल के नुकसान होने की संभावना कम है क्योंकि किसानों ने अपनी रबी की फसल की कटाई पहले ही कर ली है। लेकिन महाराष्ट्र में टिड्डियों की बढ़ती जनसंख्या को लेकर नारंगी उत्पादक काफी चिंतित हैं। टिड्डी चेतावनी संगठन (Locust Warning Organization-LWO) के अनुसार, भारत में बड़ी समस्या तब होगी जब टिड्डियों की प्रजनन संख्या में वृद्धि होगी। दरअसल एक मादा टिड्डी 3 महीने के जीवन चक्र के दौरान 80-90 अंडे देती है। साथ ही इनके प्रजनन में बाधा उत्पन्न न होने की स्थिति में एक समूह प्रति वर्ग किलोमीटर में 40-80 मिलियन टिड्डियों की संख्या हो सकती हैं। टिड्डियों से बचाव हेतु किये गए प्रयास: टिड्डियों से बचाव हेतु वृक्षों पर कीटनाशक दवाओं का छिडकाव किया जा रहा है। राजस्थान में 21,675 हेक्टेयर में कीटनाशक दवाओं का छिडकाव किया गया है। भारत द्वारा ब्रिटेन को 60 विशेष कीटनाशक स्प्रेयर (मशीन) का ऑर्डर दिया गया है। ड्रोन से भी कीटनाशक दवाओं का छिडकाव किया जा रहा है। भारत में टिड्डियाँ: भारत में टिड्डियों की निम्निखित चार प्रजातियाँ पाई जाती हैं:- रेगिस्तानी टिड्डी, प्रवासी टिड्डी, बॉम्बे टिड्डी, ट्री टिड्डी। आमतौर पर जुलाई-अक्तूबर के महीनों में इन्हें आसानी से देखा जा सकता है क्योंकि ये गर्मी और बारिश के मौसम में ही सक्रिय होती हैं। वर्ष 1993 में राजस्थान में टिड्डियों ने सबसे ज्यादा फसलों को नुकसान पहुँचाया था। टिड्डी चेतावनी संगठन (Locust Warning Organization-LWO): कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय (Ministry of Agriculture & Farmers Welfare) के वनस्पति संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय (Directorate of Plant Protection, Quarantine & Storage) के अधीन आने वाला टिड्डी चेतावनी संगठन मुख्य रूप से रेगिस्तानी क्षेत्रों राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में टिड्डियों की निगरानी, ​​सर्वेक्षण और नियंत्रण के लिये ज़िम्मेदार है। इसका मुख्यालय फरीदाबाद में स्थित है।

COVID-19 महामारी के मद्देनज़र, सोमालिया तथा केन्या के बीच समुद्री सीमा विवाद पर 8 जून को ' International Court of Justice- (ICJ) में होने वाली सुनवाई स्थगित किये जाने की संभावना है। प्रमुख बिंदु: COVID-19 महामारी के कारण सोमालिया के दो बड़े मामलों, प्रथम केन्या के साथ समुद्री सीमा विवाद तथा द्वितीय वहाँ होने वाले सामान्य चुनावों को अनिश्चित काल के लिये स्थगित किया जा सकता है। विवादित समुद्री क्षेत्र में ऊर्जा की व्यापक संभावना होने के कारण अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी मामले में रूचि ले रहे हैं। यूनाइटेड किंगडम और नॉर्वे ने सोमालिया के दावे का समर्थन किया है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका और फ्राँस ने केन्या के दावे का समर्थन किया है। समुद्री विवाद का कारण: सोमालिया और केन्या के बीच हिंद महासागर में समुद्री सीमा के परिसीमन को लेकर विवाद है। विवाद का मूल कारण दोनों देशों द्वारा महाद्वीपीय शेल्फ के आधार पर सामुद्रिक सीमा का निर्धारण है। दोनों देशों के मध्य लगभग 1,00,000 वर्ग किमी. क्षेत्र को लेकर विवाद है। इस क्षेत्र में तेल और गैस के विशाल भंडार मौजूद है। विवाद समाधान के प्रयास: वर्ष 2009 में दोनों देशों द्वारा एक 'समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding) पर हस्ताक्षर किया गया। जिसके तहत दोनों देश 'महाद्वीपीय शेल्फ सीमा पर आयोग’ (Commission on the Limits of the Continental Shelf- CLCS) को अलग-अलग दावों की प्रस्तुतियाँ पेश करने पर सहमत हुए। दोनों देशों ने इस बात पर भी सहमति जताई कि दोनों देश एक-दूसरे के दावों का विरोध नहीं करेंगे। दोनों देशों ने CLCS की सिफारिशों के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार समझौता खोजने के प्रति भी प्रतिबद्धता जाहिर की है। लेकिन वर्ष 2014 में सोमालिया विवाद समाधान के लिये मामले को 'अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय' (ICJ) में ले गया जहाँ अक्तूबर 2019 में ICJ द्वारा मामले में सुनवाई 8 जून, 2020 तक के लिये स्थगित कर दी गई। महाद्वीपीय शेल्फ की सीमा पर आयोग (CLCS): ‘महाद्वीपीय शेल्फ सीमा पर आयोग’ (CLCS), का कार्य United Nations Convention on the Law of the Sea- (UNCLOS) के कार्यान्वयन में मदद करना है। यह समुद्री आधार रेखा से 200 नॉटिकल मील से आगे के महाद्वीपीय शेल्फ के आधार पर महाद्वीपीय सीमाओं को निर्धारित करने हेतु सिफारिश करता है। आयोग में भू विज्ञान, भू भौतिकी, जल विज्ञान आदि क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले 21 सदस्य होते हैं। आयोग के सदस्यों का चुनाव कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने वाले देशों द्वारा किया जाता है। सदस्यों का चुनाव इस प्रकार किया जाता है कि वे विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। महाद्वीपीय शेल्फ और ‘अनन्य आर्थिक क्षेत्र’: ‘अनन्य आर्थिक क्षेत्र’ (Exclusive Economic Zone-EEZ) का निर्धारण आधार रेखा से 200 नॉटिकल समुद्री मील तक किया जाता है परंतु महाद्वीपीय शेल्फ की लंबाई इससे अधिक हो तो समुद्री सीमा का निर्धारण महाद्वीपीय शेल्फ के अनुसार किया जाता है।EEZ बेसलाइन से 200 नॉटिकल मील की दूरी तक फैला होता है। इसमें तटीय देशों को सभी प्राकृतिक संसाधनों की खोज, दोहन, संरक्षण और प्रबंधन का संप्रभु अधिकार प्राप्त होता है। निष्कर्ष: CLCS का कार्य उन तटीय राज्यों द्वारा प्रस्तुत वैज्ञानिक और तकनीकी आँकड़ों पर विचार करना है, जहाँ महाद्वीपीय शेल्फ की लंबाई 200 नॉटिकल मील से अधिक होने पर देशों के मध्य समुद्री सीमा को लेकर विवाद है। CLCS को समुद्री सीमाओं के परिसीमन करते समय बिना किसी पूर्वाग्रह के कार्य करना चाहिये तथा समुद्री सीमा विवादों में शामिल सभी पक्षों की दलीलों पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिये।

चंबा सुरंग Chamba Tunnel केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री ने 26 मई, 2020 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से चारधाम परियोजना (Chardham Pariyojana) के तहत ‘चंबा सुरंग’ (Chamba Tunnel) से वाहन रवानगी आयोजन का उद्घाटन किया। प्रमुख बिंदु: Border Roads Organisation- (BRO) ने ऋषिकेश-धरासू राजमार्ग (NH-94) पर व्यस्त चंबा शहर के नीचे 440 मीटर लंबी सुरंग का निर्माण किया है। BRO प्रतिष्ठित चारधाम परियोजना में एक महत्त्वपूर्ण हितधारक है और ‘टीम शिवालिक’ ने इस सुरंग के निर्माण में सफलता हासिल की है। इसके निर्माण में नवीनतम ऑस्ट्रियाई प्रौद्योगिकी का उपयोग किया गया है। यह सुरंग पूर्ण होने की निर्धारित तिथि से लगभग तीन महीने पहले ही इस वर्ष अक्तूबर तक यातायात के लिये खोल दी जाएगी। चारधाम परियोजना: चारधाम परियोजना में केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को जाने वाले 889 किलोमीटर के राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण एवं मरम्मत कार्य शामिल है। लगभग 12,000 करोड़ रुपए की लागत एवं तकरीबन 889 किमी. की अनुमानित लंबाई वाली प्रतिष्ठित ‘चारधाम परियोजना’ के तहत BRO, 250 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण कर रहा है जो पवित्र तीर्थस्थल गंगोत्री और बद्रीनाथ की ओर जाएगा। BRO को लगभग 3000 करोड़ रुपए की लागत वाले 251 किलोमीटर लंबे खंड सौंपे गए हैं जिनमें 28 किमी. से 99 किलोमीटर तक की लंबाई वाले ऋषिकेश-धरासू राजमार्ग (NH-94), 110 किलोमीटर की लंबाई वाले धरासू-गंगोत्री राजमार्ग (NH-108) और 42 किलोमीटर की लंबाई वाले जोशीमठ से ‘माना राजमार्ग’ (NH-58) पर 17 परियोजनाएँ शामिल हैं।

सिकाडा Cicadas सिकाडा (Cicadas) एक प्रकार के कीड़े हैं जो अपने जीवन का अधिकांश समय भूमिगत रूप से बिताते हैं और 13-17 वर्षों के बाद ये कीट मिट्टी से बाहर निकलते हैं। एक बार मिट्टी से बाहर निकलने के बाद इनका जीवनकाल अत्यंत छोटा (दो-चार हफ्तों के बीच) होता है। प्रमुख बिंदु: 17 वर्ष के सिकाडा की तीन प्रजातियाँ और 13 वर्ष के सिकाडा की तीन प्रजातियाँ पाई जाती हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में वर्ष 2020-21 का समय आवधिक सिकाडों के प्रकोप का समय बताया जा रहा है। गौरतलब है कि पिछली बार वर्ष 2003-04 में उत्तरी अमेरिका के जंगलों में इनकी उपस्थिति दर्ज की गई थी। ज़मीन से अरबों की संख्या में बाहर निकलने के बाद, सिकाडों अपने पंखों को विकसित करने के लिये ये अपने एक्सोस्कलटन या बाहरी खाल को बाहर निकालते हैं। ये कीट अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा पेड़ों की जड़ों या ज़मीन के नीचे बिताते हैं जहाँ ये ज़ाइलम पर निर्भर होते हैं, जब ये बड़े होते हैं तो एक साथ लाखों की संख्या में प्रजनन के लिये बाहर आते हैं। नर सिकाडा, मादाओं को आकर्षित करने के लिये ‘एक तीव्र ध्वनि’ निकालते हैं, इन नर सिकाडों का सामूहिक कोरस बहुत तीव्र होता है और यह 100 डेसिबल तक पहुँच सकता है जो कि एक लानमौवेर (लॉन की घास काटने वाली मशीन) की ध्वनि से भी ज्यादा होता है। एक मादा सिकाडो 40-50 अलग-अलग स्थानों में 400 से अधिक अंडे देने में सक्षम होती है। ये अपने अंडे टहनियों पर रखती हैं जिनका व्यास 1/2 से 1/4 होता है। अंडे टहनियों पर 6-10 सप्ताह तक बने रहते हैं, इनसे कीट के बाहर निकल कर ज़मीन पर गिर जाते हैं और अपने भोजन के लिये जमीन के अंदर 6-18 इंच तक नीचे चले जाते हैं और 13 या 17 वर्ष बाद ज़मीन से बाहर निकलते हैं। लाभ: वैज्ञानिक बताते हैं कि जमीन से बाहर आने के बाद इन कीटों के मर कर मिट्टी में मिलने से मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है। नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ने से आसपास के पेड़ों को तेज़ी से बढ़ने में मदद मिलती है। चिंताएँ: सिकाडों द्वारा अंडे देने से छोटी टहनियों को काफी नुकसान होता है। ये कई सजावटी एवं कठोर लकड़ी वाले पेड़ों विशेष रूप से नए लगाए गए फल वाले पेड़ एवं सजावटी पेड़ जैसे- सेब, डॉगवुड, आड़ू, चेरी एवं नाशपाती को नुकसान पहुँचाते हैं।

इस क्षेत्र के एक गहन बहुआयामी विश्लेषण से पता चला कि इसने चावल की घरेलू किस्में तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, क्योंकि यह धान की अधिकांश जंगली किस्मों में मौजूद नहीं था। आधुनिक खेती से जुड़ी धान की अधिकांश किस्में जैपोनिका और इंडिका जीनोटाइप से संबंधित हैं। उनमें यह विशेषता प्रमुखता से पाई गई है। इसके विपरीत पारंपरिक किस्म के धान में यह विशेषता अपेक्षाकृत कम मात्रा में पाई गई। धान की यह किस्म जंगली किस्म से काफी मिलती जुलती है। अध्ययन से आगे और यह भी पता चला कि एलडीआर क्षेत्र में एक क्यूटीएल (क्वांटिटेटिव ट्रिट लोकस) क्षेत्र होता है जो अनाज के आकार और उसकी वजन की विशेषता के साथ महत्वपूर्ण रूप से जुड़ा होता है। नया अध्ययन इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसने जीनोम-वाइड एक्सप्लोरेशन के अलावा, इसने एक महत्वपूर्ण और एक लंबे समय तक बने रहे धान के ऐसे जीनोमिक क्षेत्र को उजागर किया है, जो मोलिक्यूलर मार्कर और क्वांटिटेटिव ट्रेड के लिए क्रमिक रूप से तैयार किया गया था। डीबीटी-एनआईपीजीआर के टीम मुखिया जितेंद्र कुमार ठाकुर ने कहा, "हमारा मानना ​​है कि भविष्य में, इस एलडीआर क्षेत्र का उपयोग बीज के आकार के क्यूटीएल सहित विभिन्न लक्षणों को लक्षित करके धान की पैदावार बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।" शोध करने वाली टीम में स्वरूप के. परिदा, अंगद कुमार, अनुराग डावरे, अरविंद कुमार, विनय कुमार और डीबीटी-एनआईपीजीआर के सुभाशीष मोंडल, दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के अखिलेश के. त्यागी, आईसीएआर-आईएआरआई के गोपाला कृष्णन एस. और अशोक के. सिंह, तथा आईसीएआर-एनआरआरआई के भास्कर चंद्र पात्रा शामिल थे। उन्होंने द प्लांट जर्नल को अपने अध्ययन की एक रिपोर्ट सौंपी है, जिसे जर्नल की ओर से प्रकाशन के लिए स्वीकार कर लिया है।

धान की पैदावार बढ़ाने के लिए शोध के जरिए नई संभावनाओं का पता लगाया गया चावल दुनिया भर में मुख्य खाद्य पदार्थों में से एक है, क्योंकि इसमें बहुत अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है, जो तत्काल ऊर्जा प्रदान करता है। दक्षिण पूर्व एशिया में, जहां दुनिया के दूसरे हिस्सों की तुलना में इसका अधिक सेवन किया जाता है, कुल कैलोरी के 75% हिस्से की पूर्ति इसी से होती है। भारत में धान की खेती बहुत बड़े क्षेत्र में की जाती है। लगभग सभी राज्यों में धान उगायी जाती है हालांकि इसके बावजूद कम उत्पादकता इसकी समस्या है। भारत और दुनिया की बढ़ती आबादी की मांग को पूरा करने के लिए, धान की उत्पादकता में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि की आवश्यकता है। प्रति पौधे अनाज के दानों की संख्या और उनके वजन जैसे लक्षण मुख्य रूप से धान की उपज को निर्धारित करते हैं। ऐसे में शोधकर्ताओं और उत्पादकों का मुख्य उद्देश्य अनाज के पुष्ट दानों वाले धान की बेहतर किस्में विकसित करना रहा है, जो ज्यादा उपज और बेहतर पोषण दे सकें। एक नए अध्ययन में, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट जीनोम रिसर्च (डीबीटी एनआईपीजीआर), के बायोटेक्नोलॉजी विभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-आईएआरआई), कटक के राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-एनआरआरआई), और दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस (यूडीएससी) के शोधकर्ताओं ने धान के जीनोम में एक ऐसे हिस्से की पहचान की है, जिसके माध्यम से पैदावार बढ़ाने की संभावना है। वैज्ञानिकों ने धान की चार भारतीय किस्मों (एलजीआर, पीबी 1121, सोनसाल और बिंदली) जो बीज आकार/वजन में विपरीत फेनोटाइप दिखाते हैं कि आनुवांशिक संरचना-जीनोटाइप के जीन को क्रमबद्ध करके उनका अध्ययन किया। इस दौरान उनके जीनोमिक रूपांतरों का विश्लेषण करने के बाद उन्होंने पाया कि भारतीय धान के जर्मप्लाज्मों में अनुमान से कहीं अधिक विविधता है। वैज्ञानिकों ने इसके बाद अनुक्रम किए गए चार भारतीय जीनोटाइप के साथ दुनिया भर में पाई जाने वाली धान की 3,000 किस्मों के डीएनए का अध्ययन किया। इस अध्ययन में उन्होंने एक लंबे (~ 6 एमबी) जीनोमिक क्षेत्र की पहचान की, जिसमें क्रोमोजोम 5 के केंद्र में एक असामान्य रूप से दबा हुआ न्यूक्लियोटाइड विविधता क्षेत्र था। उन्होंने इसे 'कम विविधता वाला क्षेत्र' या संक्षेप में एलडीआर का नाम दिया।

पावर फाइनेंस कार्पोरेशन कोविड-19 के मरीजों के इलाज में लगे डॉक्‍टरों और अन्‍य चिकित्‍सा कर्मचारियों को लंच प्रदान करेगा कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए एक और कदम बढ़ाते हुए, बिजली मंत्रालय के अंतर्गत एक केन्‍द्रीय पीएसयू और भारत के अग्रणी एनबीएफसी, पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (पीएफसी)ने एशिया की सबसे बड़ी खाद्य कंपनियों में से एक,ताजस्‍टेट्स के साथ करार किया है, ताकि अग्रिम पंक्ति के कोविड योद्धाओं को स्‍वच्‍छ और पौष्टिक भोजन प्रदान किया जा सके। इस प्रयास के तहत, पीएफसी डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल, नई दिल्ली में कोविड-19 रोगियों के उपचार में लगे डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य चिकित्सा कर्मचारियों को पैक किए हुए लंच बॉक्स प्रदान करेगा। इस पहल के अंतर्गत, डॉ. आरएमएल अस्पताल के डॉक्टरों और चिकित्‍सा कर्मचारियों को दैनिक आधार पर 25 मई 2020 से 60 दिन की अवधि के लिए उच्च गुणवत्ता वाले,स्‍वच्‍छ और स्वास्थ्यकर भोजन (पैक्ड लंच बॉक्स) की आपूर्ति करने के उद्देश्‍य से, कंपनी ने ताजस्‍टेट्स को 64 लाख रुपये (लगभग) की वित्तीय सहायता प्रदान की है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने नई दिल्ली में डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल को कोविड-19 के उपचार के लिए समर्पित अस्पतालों में से एक के रूप में चुना है, जहाँ डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारी कोविड-19 के रोगियों को दिन-रात चिकित्सा और अन्य स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। इससे पहले, पीएफसी कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में सहायता करने के लिए पीएम-केयर्स फंड में 200 करोड़ रुपये का योगदान दे चुका है। पीएफसीकर्मचारी भी इस अभियान में आगे आए हैं और उन्होंने अपना एक दिन का वेतन पीएम केयर्सफंड को दान कर दिया है। इसके अलावा, पीएफसी ने कोटा, राजस्थान में चिकित्‍सा उपकरण प्रदान करने के लिए भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी को ₹50,00,000 (पचास लाख रुपये) देने के साथ-साथ उत्‍तर प्रदेश में सिद्धार्थ नगर और बुलंदशहर के जिला कलेक्टरों को 50-50 लाख रुपये का योगदान दिया है।

श्रीमती निर्मला सीतारमण ने वीडियो-कॉन्फ्रेंस के जरिए न्यू डेवलपमेंट बैंक के संचालक मंडल की विशेष बैठक में भाग लिया वित्त मंत्री ने बुनियादी ढांचे के विकास के वित्तपोषण में एनडीबी के अहम योगदान की सराहना की केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज नई दिल्‍ली में वीडियो-कॉन्फ्रेंस के माध्यम से न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) के संचालक मंडल की विशेष बैठक में भाग लिया। इस बैठक के एजेंडे में एनडीबी के अगले अध्यक्ष का चुनाव, उपाध्‍यक्ष एवं मुख्य जोखिम अधिकारी की नियुक्ति और सदस्यता का विस्तार करना जैसे कार्य शामिल थे। वित्त मंत्री ने अपने प्रारंभिक संबोधन में बुनियादी ढांचे के विकास के वित्तपोषण में एनडीबी के अहम योगदान की सराहना की, जिसका भारत सहित सदस्य देशों के विकास एजेंडे पर सकारात्मक असर रहा है। एनडीबी ने छोटी सी अवधि में ही सदस्य देशों की 55 परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है जिसमें 16.6 अरब डॉलर की राशि निहित है और यह निश्चित तौर पर एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। श्रीमती सीतारमण ने यह भी उल्लेख किया कि बैंक ने सफलतापूर्वक अपनी एक विशिष्‍ट पहचान बना ली है और यह गर्व से कंधे से कंधा मिलाकर समकक्ष एमडीबी के साथ खड़ा है। वित्त मंत्री ने वर्ष 2014 में ब्रिक्स के नेताओं द्वारा निर्दिष्‍ट किए गए विजन को बहुत जल्दी मूर्त रूप देने में उत्‍कृष्‍ट नेतृत्व प्रदान करने के लिए एनडीबी के निवर्तमान अध्‍यक्ष श्री के.वी. कामथ की सराहना की। ‘कोविड-19 आपातकालीन कार्यक्रम ऋण’ उत्पाद को लॉन्च कर कोविड-19 से निपटने के लिए बड़ी तेजी से उठाए गए कदम को उनके एक अहम योगदान के रूप में याद किया जाएगा। वित्त मंत्री ने नव-निर्वाचित अध्‍यक्ष ब्राजील के श्री मार्कोस ट्रॉयजो और नवनियुक्त उपाध्यक्ष एवं सीआरओ भारत के श्री अनिल किशोरा को बधाई दी। इसके साथ ही श्रीमती सीतारमण ने कहा कि उन्हें इस उत्‍कृष्‍ट गति को आगे बढ़ाने के साथ-साथ सदस्य देशों को ऋण देने, पारदर्शिता, अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता और एनडीबी के अधिदेश को प्रभावकारी ढंग से हासिल करने के मामले में एनडीबी को अगले स्तर पर ले जाने में नए नेतृत्व से बहुत उम्मीदें हैं। उन्‍होंने सुझाव दिया कि इसके साथ ही ब्रिक्स के मूल्यों के संरक्षण और एनडीबी को एक वैश्विक विकास संस्थान के रूप में विकसित करने के दोहरे उद्देश्य को प्राप्त करने पर भी फोकस किया जाना चाहिए।

पीएम-जीकेवाई’ के तहत राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 13.4 करोड़ लाभार्थियों को 1.78 लाख एमटी दालें वितरित की गईं ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना’के तहत लॉकडाउन अवधि के दौरान 9.67 करोड़ किसानों के लिए 19,350.84 करोड़ रुपये जारी किए गए पीएम-जीकेवाई के तहत दलहन का वितरण ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (पीएम-जीकेवाई)’ के तहत लगभग 4.57 लाख मीट्रिक टन दालें राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में भेजी गई हैं। इसमें से 1.78 लाख मीट्रिक टन दालें राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 1340.61 लाख लाभार्थियों के बीच वितरित की गई हैं। लॉकडाउन अवधि के दौरान नेफेड द्वारा दालों और तिलहन की खरीद की स्थिति : 7.33 लाख एमटी ग्राम (चना) की खरीद 9 राज्यों यथा आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा से की गई है। 5.91 लाख एमटी सरसों की खरीद 5 राज्यों यथा राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात और हरियाणा से की गई है। 2.41 लाख एमटी तूर की खरीद 8 राज्यों यथा तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गुजरात और ओडिशा से की गई है। रबी विपणन सीजन में गेहूं की खरीद रबी विपणन सीजन (आरएमएस) 2020-21 में कुल मिलाकर 359.10 लाख एमटी गेहूं एफसीआई में आया, जिसमें से 347.54 लाख एमटी की खरीद हुई है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना 24 मार्च 2020 से लेकर अब तक की लॉकडाउन अवधि के दौरान प्रधानमंत्री किसान सम्‍मान निधि (पीएम-कि‍सान) योजना के तहत 9.67 करोड़ किसान लाभान्वित हुए हैं और 19,350.84 करोड़ रुपये की राशि अब तक जारी की गई है।

लद्दाख बॉर्डर पर चीन का शक्ति-प्रदर्शन भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में शुरू हुआ तनाव बढ़ता ही जा रहा है। अब दोनों देशों ने अपने-अपने सैनिकों को भारी संख्‍या में वहां तैनात कर दिया है। गल्वान घाटी में चीन ने पिछले दो सप्‍ताह के भीतर करीब 100 टेंट गाड़ दिए हैं। वह मशीनरी भी यहां ला रहा है जो शायद बंकर्स बनाने में इस्‍तेमाल हो। भारत भी पैगोंग झील और गल्वान घाटी में सैनिकों की तैनाती लगातार बढ़ा रहा है। कई इलाकों में भारत की पोजिशन चीन से बेहतर है। बॉर्डर पर शक्ति-प्रदर्शन कर रहा चीन? चीन ने भारी संख्‍या में बॉर्डर डिफेंस रेजिमेंट (BDR) के जवानों को तैनात किया है। भारत ने भी 'मिरर डिप्‍लॉयमेंट' की रणनीति अपनाई है। इसका मतलब ये है कि चीन जितनी मैनपावर और रिसोर्सेज लगाएगा, भारत भी उसी टोन में जवाब देगा। चीन ने सिर्फ सैनिक ही नहीं बुलाए, झील में नावों की संख्‍या बढ़ा दी है। हवाई निगरानी के लिए गल्वान घाटी में हेलिकॉप्‍टर्स उड़ रहे हैं। द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने करीब 1300 सैनिक यहां पर तैनात किए हैं। भारत भी उसी हिसाब से सैनिकों की तैनाती कर रहा है। हमारे सहयोगी टीओआई के मुताबिक, भारत ने लेह की इन्‍फैट्री डिजिवन की कुछ यूनिट्स को आगे भेजा है। कई और बटालियंस भी लद्दाख में मूव कराई गई हैं। कैसे बिगड़ते गए हालात? 5 मई को पूर्वी लद्दाख में करीब 250 चीनी सैनिक और भारतीय जवान आपस में भिड़ गए। इसमें दोनों ओर से करीब 100 सैनिक घायल हुए। कुछ दिन बाद, उत्‍तरी सिक्किम में फिर दोनों देशों के सैनिक भिड़े। इसके बाद से ही, पूर्वी लद्दाख तनाव का केंद्र बना हुआ है। यहां के दो पॉइंट्स पर फोकस है। पैंगोंग लेक और गल्वान घाटी। झील का उत्‍तरी किनारा हथेली जैसा है जिसके 8 भाग हैं जिसे आर्मी 'फिंगर्स' कहती है। भारत कहता है कि LAC 8वीं फिंगर से शुरू होती है जबकि चीन कहना है कि दूसरी से। चीन ने इस पॉइंट पर ब्‍लॉकिंग पॉइंट्स भी बना लिए हैं। भारत चौथी फिंगर तक के हिस्‍से को कंट्रोल करता है। चीन ने छह साल पहले, चौथे हिस्‍से पर परमानेंट कंस्‍ट्रक्‍शन की कोशिश की थी मगर भारत के कड़े विरोध के बाद उसे ढहा दिया गया। चीन का लगातार आक्रामक रुख पिछले साल नवंबर में केंद्रीय रक्षा राज्‍य मंत्री श्रीपद नाइक ने संसद में बताया था कि साल 2016 में चीन की सेना ने 273 बार बॉर्डर पर आक्रामक रुख दिखाया। 2017 में यह आंकड़ा बढ़कर 426 हो गया, इसी साल डोकलाम विवाद हुआ था। 2018 में चीन ने 326 बार झड़प की। 2019 का डेटा अभी तक सरकार ने जारी नहीं किया है। जरूरत है 'ऑपरेशन मेघदूत' जैसे मिशन की सीमा पर चीन ने हमेशा सैनिकों की तैनाती रखी है। भारत जरूरत पड़ने पर सैनिक भेजता है। मगर इन दिनों चीन जैसी हरकतें कर रहा है, उसे देखते हुए भारत को 'ऑपरेशन मेघदूत' जैसे एक मिशन की सख्‍त जरूरत है। 13 अप्रैल, 1984 को भारत ने इसी मिशन के जरिए कश्‍मीर में सियाचिन ग्‍लेशियर पर नियंत्रण कर लिया था। तब से आजतक पूरे सियाचिन ग्‍लेश‍ियर पर भारत का कंट्रोल बना है। सियाचिन दुनिया की सबसे ऊंची बैटलफील्‍ड है। क्‍या है LAC का विवाद? लाइन ऑफ एक्‍चुअल कंट्रोल (LAC) की सीमाएं विवादित हैं। भारत कहता है कि LAC 3,488 किलोमीटर लंबी है जबकि चीन इसे 2,000 किलोमीटर लंबी ही मानता है। चीन अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्‍सा नहीं मानता। लद्दाख और सिक्किम में LAC से लगे कई इलाकों पर चीन अपना अधिकार जताता है। दोनों सेनाएं LAC पर रेगुलर पैट्रोल करती हैं और कई बार सैनिकों में झड़प होती रहती है। हालांकि 1962 के बाद से हालात इतने तनावपूर्ण नहीं हुए थे कि बात युद्ध तक पहुंचे। 2017 में सिक्किम का डोकलाम विवाद जरूर भारत-चीन के बीच तल्‍खी की वजह बना था मगर करीब ढाई महीने में वो मसला सुलझा लिया गया था। 1962 की जंग से है पैंगोंग झील का कनेक्‍शन पूर्वी लद्दाख की पैंगोंग लेक एक लंबी, गहरी और चारों तरफ जमीन से घिरी झील है। करीब 14 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह झील लेह के दक्षिण-पूर्व में 54 किलोमीटर दूर स्थित है। 135 किलेामीटर लंबी यह झील करीब 604 वर्ग किेलोमीटर में किसी बूमरैंग की तरह फैली है। सर्दियों में यह झील जम जाती है। यह झील चुशूल अप्रोच के रास्‍ते में पड़ती है। यह वो रास्‍ता है जिसे चीन हमला करने के लिए इस्‍तेमाल कर सकता है। 1962 की जंग में भी चीन ने यही से बड़ा हमला किया था।

भारतीय सेना की अधिकारी मेजर सुमन गवानी को प्रतिष्ठित संयुक्त राष्ट्र सैन्य जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर अवार्ड (2019) के लिए चुना गया है। यह इतिहास में पहली बार है जब किसी भारतीय को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। मेजर सुमन गवानी ने दक्षिण सूडान (UNMISS) में संयुक्त राष्ट्र मिशन के साथ काम किया है। उन्हें UNMISS में शांति प्रयासों के लिए उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए चुना गया है। दक्षिण सूडान में संयुक्त राष्ट्र मिशन (UNMISS – United Nations Mission in South Sudan) इसकी शुरुआत जुलाई, 2011 में उस समय की गयी थी जब दक्षिण सूडान ने सूडान से स्वतंत्रता प्राप्त की थी। अब तक इस मिशन के दौरान 67 संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों की मृत्यु हो चुकी है। मार्च, 2019 में UNMISS में लगभग 19,400 कर्मचारी कार्यरत्त थे। भारत UNMISS के लिए सैनिक प्रदान करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है, इसमें भारत के 2,337 सैनिक कार्यरत्त हैं। UNMISS में सर्वाधिक सैनिक रवांडा से हैं, इसमें रवांडा के 2,750 सैनिक कार्यरत्त हैं।

26 मई, 2020 को केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से चारधाम परियोजन के तहत चंबा टनल के ब्रेकथ्रू इवेंट का उद्घाटन किया। चारधाम परियोजना चार धाम महामर्ग विकास योजना (चार धाम राजमार्ग विकास परियोजना) की आधारशिला 27 दिसंबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रखी गई थी। वर्तमान में उत्तराखंड में लगभग 12,000 करोड़ रुपये के कुल निवेश के साथ इस दो लेन वाली राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना का निर्माण किया जा रहा है। चार धाम मार्ग ऋषिकेश से उत्पन्न, चार धाम राजमार्ग नेटवर्क में उत्तराखंड में चार पवित्र स्थानों बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को जोड़ने वाले चार अलग-अलग मार्ग होंगे। इस परियोजना में दो सुरंगें, 116 बड़े और छोटे फ्लाईओवर, कई पुलिया और बाईपास सड़कें शामिल हैं। चंबा सुरंग चंबा सुरंग को राष्ट्रीय राजमार्ग 94 पर सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में चंबा शहर / हिल स्टेशन के नीचे ऋषिकेश-धरासू मार्ग पर खोदा गया है। यह सुरंग चंबा शहर में भीड़भाड़ से भी बचाएगी और क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक विकास के रास्ते भी खोल देगी।

26 मई, 2020 को ब्रिटिश लेखिका जे.के. राउलिंग ने अपनी नई बाल पुस्तक “द इकाबॉग” के पहले दो अध्याय जारी किए। यह कहानी नवंबर 2020 में अपने आधिकारिक प्रकाशन से पहले मुफ्त में द इकाबॉग वेबसाइट पर किस्तों में प्रकाशित की जाएगी। 2007 में हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोज़ के बाद से यह पुस्तक उनकी पहली बच्चों की किताब है। जे.के. रोलिंग जे.के. रोलिंग (मूल नाम जोआन रोलिंग) एक ब्रिटिश लेखिका, फिल्म और टीवी निर्माता, पटकथा लेखक और परोपकारी हैं, जिन्हें हैरी पॉटर श्रृंखला लिखने के लिए जाना जाता है। हैरी पॉटर श्रृंखला में उनकी पहली पुस्तक हैरी पॉटर और द फिलोस्फर स्टोन 1997 में प्रकाशित हुई थी। हैरी पॉटर पुस्तक श्रृंखला इतिहास में बेस्टसेलिंग पुस्तक श्रृंखला है और यह हैरी पॉटर फिल्म श्रृंखला का आधार है। उन्होंने 2012 में वयस्कों के लिए अपनी पहली पुस्तक ‘द कैजुअल वेकेंसी’ प्रकाशित की। 2013 में उन्होंने “रॉबर्ट गैलब्रेथ” पेन नाम से एक अपराध उपन्यास भी जारी किया था।

भारतीय बहु-उद्योग कंपनी आईटीसी ने हाल ही में घोषणा की है कि कंपनी अपना सबसे बड़ा अधिग्रहण करने जा रही है। मुख्य बिंदु आईटीसी ने मसाला निर्माण कंपनी सनराइज फूड्स में 100 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करने के लिए एक समझौता किया है। यह सौदा लगभग 2,000 करोड़ रुपये का होगा। कोलकाता स्थित सनराइज फूड्स ने पिछले साल लगभग 600 करोड़ रुपये का कारोबार किया और पूर्वी भारत के बाज़ार में इसकी व्यापक उपस्थिति है। ITC ITC एक भारतीय बहु-राष्ट्रीय कंपनी है, इसका मुख्यालय पश्चिम बंगाल के कलकत्ता में स्थित है। इसकी स्थापना 1910 में हुई थी। 2018 में ITC का राजस्व 47,262 करोड़ रुपये था। ITC में 30,000 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। इसका मार्केट कैपिटलाइजेशन 50 अरब डॉलर का है।