ar
Feedback

لا تقع ضحية للمخادعين! تيليمتريو يكتشف ويُميّز هذه القنوات 👉 إذا كنت تريد رؤية العلامة، اشترك 👈

I.A.S.(हिंदी माध्यम)

I.A.S.(हिंदी माध्यम)

الذهاب إلى القناة على Telegram

🚩 Channel was restricted by Telegram

إظهار المزيد
الهند187 457الفئة غير محددة
2 554
المشتركون
لا توجد بيانات24 ساعات
لا توجد بيانات7 أيام
لا توجد بيانات30 أيام
أرشيف المشاركات
अंतरर्राष्ट्रीय योग दिवस 2020 की प्रमुख थीम क्या है ?
Anonymous voting

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2020: जानिए आखिर कैसे भारत बना योग का विश्वगुरु कोरोना वायरस की महामारी ने कई चीजों को प्रभावित किया है. इस बार अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के जगह-जगह होने वाले आयोजन भी फीके रहेंगे. हर साल 21 जून के दिन बड़े-बड़े आयोजन होते थे. इस बार कोरोना वायरस के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए किसी भी प्रकार का आयोजन नहीं किया जा रहा है. दुनियाभर में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है. योग के अभ्यास से ना सिर्फ शरीर रोगमुक्त रहता है बल्कि मन को भी शांति मिलती है. हमारी भारतीय संस्कृति का योग अभिन्न हिस्सा रहा है. योग से होने वाले फायदों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए दुनियाभर में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है. कोरोना वायरस की महामारी ने कई चीजों को प्रभावित किया है. इस बार अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के जगह-जगह होने वाले आयोजन भी फीके रहेंगे. हर साल 21 जून के दिन बड़े-बड़े आयोजन होते थे. इस बार कोरोना वायरस के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए किसी भी प्रकार का आयोजन नहीं किया जा रहा है. प्रधानमंत्री मोदी ने योग पर क्या कहा? प्रधानमंत्री मोदी ने छठे अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय योगदिवस का ये दिन एकजुटता का दिन है. ये विश्व बंधुत्व के संदेश का दिन है. पीएम मोदी ने कहा कि बच्चे, बड़े, युवा, परिवार के बुजुर्ग, सभी जब एक साथ योग के माध्यम से जुडते हैं, तो पूरे घर में एक ऊर्जा का संचार होता है.इसलिए, इस बार का योग दिवस, भावनात्मक योग का भी दिन है, हमारी पारिवारिक बॉन्ड को भी बढ़ाने का दिन है. अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2020 की थीम संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा कोरोना वायरस की महामारी के चलते इस बार अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम को भी काफी विचार-विमर्श के बाद रखा गया है. कोरोना वायरस से बचे रहने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग बहुत महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा International Yoga Day 2020 की थीम - "Yoga For Health - Yoga From Home". रखी गई है. इसका मतलब 'सेहत के लिए योग - घर से योग" है. योग दिवस कैसे मनाया जाता है? योग प्रशिक्षण कार्यक्रम, शिविर, रिट्रीट, सेमिनार, कार्यशालाएं समूह और जन स्तर पर आयोजित की जाती हैं. लोग समूहों में इकट्ठे होते हैं और विभिन्न आसन और प्राणायाम करते हैं. उन्हें अभ्यास के महत्व और यह इलाज और उपचार में कैसे मदद करता है, इसके बारे में भी जागरूक किया जाता है. 18 हजार फीट की ऊंचाई पर योग आईटीबीपी के जवानों ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर लद्दाख में 18 हजार फीट की ऊंचाई पर योग और प्राणायाम किया. लद्दाख में बर्फ से ढकी सफेद जमीन पर आईटीबीपी जवानों के एक दल ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर योग अभ्यास किया. इन जवानों ने लद्दाख में जिस जगह पर योग किया वहां तापमान जीरो डिग्री से नीचे है. योग का पहला अंतरराष्ट्रीय दिवस कब मनाया गया था? योग दिवस दुनियाभर में पहली बार 21 जून 2015 को मनाया गया और तबसे हर साल उस दिन को योग दिवस के तौर पर मनाय जाता है लेकिन यह पहला मौका होगा जब इसे डिजिटल तरीके से मनाया जा रहा है. 21 जून 2015 को पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस दुनिया के करीब 190 देशों ने मनाया था. फिलहाल भारत आज पूरी दुनिया का विश्व गुरु बन चुका है. 21 जून ही क्यों योग उत्सव का दिन चुना गया? दरअसल उत्तरी गोलाद्र्ध में 21 जून सबसे लंबा दिन होता है. लिहाजा दुनिया के अधिकांश देशों में इस दिन का खासा महत्व है. आध्यात्मिक कार्यों के लिए भी यह दिन अत्यंत लाभकारी है. भारतीय मान्यता के अनुसार आदि योगी शिव ने इसी दिन मनुष्य जाति को योग विज्ञान की शिक्षा देनी शुरू की थी. इसके बाद वे आदि गुरु बने. इसीलिए 21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में चुना गया है. योग दिवस के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाये जाने की सिफारिश की गयी थी. इसके उपरांत 11 दिसम्बर 2014 संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इस प्रस्ताव को पारित करके प्रत्येक वर्ष इस दिन यह दिवस मनाये जाने की घोषणा की गयी. यह प्रस्ताव महासभा द्वारा विश्व स्वास्थ्य और विदेश नीति के तहत पारित किया गया ताकि विश्व भर में लोगों को बेहतर स्वास्थ्य वातावरण प्राप्त हो सके. अमेरिका, कनाडा, चीन एवं मिस्र सहित 177 देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया.

International Day of Yoga • The theme for Yoga Day, 2020 is: "Yoga for Health - Yoga at Home" • Yoga is an ancient physical,
International Day of Yoga • The theme for Yoga Day, 2020 is: "Yoga for Health - Yoga at Home" • Yoga is an ancient physical, mental and spiritual practice that originated in India. The word ‘yoga’ derives from Sanskrit and means to join or to unite, symbolizing the union of body and consciousness. • Today it is practiced in various forms around the world and continues to grow in popularity. • Recognizing its universal appeal, on 11 December 2014, the United Nations proclaimed 21 June as the International Day of Yoga by resolution 69/131. • The International Day of Yoga aims to raise awareness worldwide of the many benefits of practicing yoga.

Current Affairs Quiz 21 Jun 2020 दैनिक सामान्य ज्ञान क्विज https://www.simplifiedshiksha.com/current-affairs-quiz-21-jun/
Current Affairs Quiz 21 Jun 2020 दैनिक सामान्य ज्ञान क्विज https://www.simplifiedshiksha.com/current-affairs-quiz-21-jun/

भारतीय रिजर्व बैंक के किस पूर्व गवर्नर को राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान (एनआईपीएफपी) का चेयरमैन नियुक्त किया गया है?
Anonymous voting

वर्ष 2014 को सरकार ने राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति की घोषणा की। उल्लेखनीय है कि इस नीति के अंतर्गत जिन बातों को शामिल किया गया उनमें मुख्य रूप से रोगी केंद्रित और प्रगतिशील दृष्टिकोण वाले प्रावधान थे। इसके साथ-साथ इसके अंतर्गत सेवा वितरण और प्रशासन में पारदर्शिता और व्यावसायिकता लाने संबंधी प्रावधानों को भी जगह दी गई। सरकार इस दिशा में आगे बढ़ते हुए वर्ष 2017 में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (Mental Healthcare Act), 2017 लेकर आयी ताकि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत किया जा सके। यह अधिनियम 7 अप्रैल, 2017 को पारित किया गया था तथा यह 7 जुलाई, 2018 से लागू हुआ था। अधिनियम ने 1987 में पारित मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम,1987 का स्थान लिया है। अन्य प्रयास सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य प्रोग्राम को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के गैर-संचारी रोगों (non-communicable diseases - NCDs) के फ्लेक्सी पूल (flexi pool) के अंतर्गत शामिल किया गया है। एन.सी.डी. के फ्लेक्सी पूल (flexi pool) हेतु आवंटित राशि को पिछले दो वर्षों में तकरीबन तीन गुना बढ़ाया गया है। यानी अब राज्यों द्वारा केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के कोष का उपयोग विशेषज्ञों एवं अन्य सुविधाओं के भुगतान में किया जा सकता है। मानसिक विकार से पीड़ित लोगों की पूर्व जाँच और उनके इलाज के लिये जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में विभिन्न निवारक गतिविधियों को शामिल किया गया है जिसमें स्कूल मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ, कॉलेज परामर्श सेवाएँ, कार्यस्थल पर तनाव कम करने और आत्महत्या रोकथाम सेवाएँ शामिल हैं। आगे की राह वैश्विक महामारी COVID-19 के दौर में देश में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्या लगातार वृद्धि देखी जा रही है। ऐसे में आवश्यक है कि इससे निपटने के लिये उपर्युक्त क्षमताओं का विकास किया जाए और संसाधनों में वृद्धि की जाए। यदि प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया ऐसे मानसिक रोगग्रस्त लोगों की समस्याओं को संवेदनशील ढंग से उठाएँ तो निश्चय ही समाज का उपेक्षावादी रवैया कमजोर होगा और संवेदनशीलता में वृद्धि होगी। स्वास्थ्य देखभाल राज्य सूची का विषय है और इसलिये इसकी चुनौतियों से निपटने के लिये राज्य और केंद्र के मध्य उचित समन्वय की आवश्यकता है। बजटीय आवंटन की चिंताजनक स्थिति भी मानसिक स्वास्थ्य सुधारों में एक बड़ी बाधा है, ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और स्नायु विज्ञान संस्थान तथा अन्य एजेंसियों द्वारा मानसिक समस्याओं से ग्रसित लोगों की पहचान करते हुए, मानसिक रोगों के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील तबके के लिये एक निश्चित आय की व्यवस्था कर दिया जाए।

मनोवैज्ञानिक कारणों को आज के समय में इसकी मुख्य वजह मानी जा रही है। उदाहरण के लिये आपसी संबंधों में टकराहट, किसी निकटतम व्यक्ति की मृत्यु, सम्मान को ठेस, आर्थिक हानि, तलाक, परीक्षा या प्रेम में असफलता इत्यादि। सहनशीलता का अभाव, बाल्यावस्था के अनुभव, खतरनाक किस्म के विडियोगेम, तनावपूर्ण परिस्थितियाँ और इनका सामना करने की असमर्थता मानसिक विकार के लिये जिम्मेदार मानी जा रही हैं। समाज में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अवधारणा वस्तुतः जिस समाज में हम रहते हैं वहाँ सार्वजनिक और निजी दोनों स्तरों पर मानसिक बीमारी (Mental illness) हमेशा से एक उपेक्षित मुद्दा रही है। इसके विषय में न केवल समाज का रवैया बेरूखा है बल्कि सरकार की दृष्टि में भी यह एक उपेक्षित विषय ही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि किसी भी मानसिक विकार से पीड़ित व्यक्ति को पागल समझा जाता है और उस व्यक्ति को समाज में उपेक्षा भरी नज़रों से देखा जाने लगता है। मानसिक विकार से पीड़ित व्यक्ति समाज व परिवार के उपेक्षा पूर्ण बर्ताव के कारण अकेलेपन का भी शिकार हो जाता है। अकेलेपन के कारण वह अपने विचारों को दूसरे के साथ साझा नहीं कर पाता है, ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति या तो स्वयं को हानि पँहुचाता है या अन्य लोगों को। यदि कोई व्यक्ति एक बार किसी मानसिक रोग से ग्रसित हो जाता है तो जीवन भर उसे इसी तमगे के साथ जीना पड़ता है, चाहे वह उस रोग से मुक्ति पा ले। आज भी भारत में इस प्रकार के लोगों के लिये समाज की मुख्य धारा से जुड़ना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ आँकड़े दर्शाते हैं कि भारत में महिलाओं की आत्महत्या दर पुरुषों से काफी अधिक है। जिसका मूल घरेलू हिंसा, छोटी उम्र में शादी, युवा मातृत्व और अन्य लोगों पर आर्थिक निर्भरता आदि को माना जाता है। महिलाएँ मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से पुरुषों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होती हैं। परंतु हमारे समाज में यह मुद्दा इतना सामान्य हो गया है कि लोगों द्वारा इस पर ध्यान ही नहीं दिया जाता। भारत में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियाँ भी एक बड़ी चुनौती है। उदाहरण के लिये भारत में वर्ष 2017 तक आत्महत्या को एक अपराध माना जाता था और भारतीय दंड संहिता के तहत इसके लिये अधिकतम 1 वर्ष के कारावास का प्रावधान किया गया था। जबकि कई मनोवैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि अवसाद, तनाव और चिंता आत्महत्या के पीछे कुछ प्रमुख कारण हो सकते हैं। ध्यातव्य है कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को संबोधित करने के लिये भी भारत के पास आवश्यक क्षमताओं की कमी है। आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2018 में भारत की विशाल जनसंख्या के लिये मात्र 5,147 मनोचिकित्सक और 2,035 से भी कम ​​मनोवैज्ञानिक मौजूद थे। मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को ठीक ढंग से संबोधित न किये जाने के कारण अर्थव्यवस्था को भी काफी नुकसान का सामना करना पड़ता है। इससे न केवल देश की मानव पूंजी को नुकसान होता है बल्कि प्रभावित व्यक्ति की आर्थिक स्थिति भी खराब हो जाती है, क्योंकि इस रोग के इलाज की जो भी सुविधाएँ उपलब्ध हैं वे अपेक्षाकृत काफी महँगी हैं। WHO के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य विकारों का सर्वाधिक प्रभाव युवाओं पर पड़ता है और चूँकि भारत की अधिकांश जनसंख्या युवा है इसलिये यह एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आता है। बजटीय व्यय का अभाव गौरतलब है कि राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Mental Health Survey - NMHS) 2015-16 के अनुसार, भारत के अधिकांश राज्यों में मानसिक स्वास्थ्य का कुल बजट 1प्रतिशत से भी कम है। इनमें से कुछ राज्य तो ऐसे हैं जिनमें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देशों में स्पष्टता और संपूर्णता की कमी होने के कारण सही दिशा में धन का उपयोग नहीं किया जा रहा है। वर्तमान में केवल गुजरात और केरल दो ही राज्य ऐसे हैं जहाँ मानसिक स्वास्थ्य के लिये अलग बजट की व्यवस्था की गई है। वस्तुतः राज्यों को मानसिक स्वास्थ्य के लिये पृथक बजट की व्यवस्था करने के संबंध में बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जिनमें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं का सटीक कार्यान्वयन, पर्याप्त मात्रा में बजट की उपलब्धता, समय-सीमा, ज़िम्मेदार एजेंसियों और परिणामों की निगरानी के लिये बेहतर प्रबंधन आदि बहुत से ऐसे कारक शामिल हैं। सरकार के द्वारा किये गए प्रयास वर्ष 1982 में मानसिक रोग से निपटने के लिये देश में मानसिक देखभाल के आधारभूत ढाँचे के विकास को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (National Mental Health Prograam-NMHP) की शुरूआत की गई। कार्यक्रम की कार्यनीति में वर्ष 2003 में दो योजनाओं राज्य मानसिक अस्पतालों का आधुनिकीकरण और सरकारी मेडिकल कॉलेजों/जनरल अस्पतालों में मनोचिकित्सा विंग को शामिल किया गया।

मानसिक स्वास्थ्य विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation-WHO) द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, तकरीबन 7.5 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी रूप में अवसाद से ग्रस्त हैं। इतना ही नहीं WHO के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2020 तक भारत की लगभग 20 प्रतिशत आबादी मानसिक रोगों से पीड़ित होगी। बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत द्वारा अवसाद से ग्रस्त होने के कारण आत्महत्या कर लेने की घटना ने मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं के विस्तृत अध्ययन और उसके समाधान को पुनः विमर्श के केंद्र में ला दिया है। मानसिक रोगियों की इतनी बड़ी संख्या के बावजूद भी अब तक भारत में इसे एक रोग के रूप में पहचान नहीं मिल पाई है, आज भी यहाँ मानसिक स्वास्थ्य की पूर्णतः उपेक्षा की जाती है और इसे काल्पनिक माना जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि जिस प्रकार शारीरिक रोग हमारे लिये हानिकारक हो सकते हैं उसी प्रकार मानसिक रोग भी हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। इस आलेख में मानसिक स्वास्थ्य, भारत में मानसिक स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ, समाज में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अवधारणा तथा सरकार के प्रयासों का विश्लेषण किया जाएगा। मानसिक स्वास्थ्य से तात्पर्य मानसिक स्वास्थ्य में हमारा भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कल्याण शामिल होता है। यह हमारे सोचने, समझने, महसूस करने और कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करता है। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी स्वास्थ्य संबंधी परिभाषा में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी शामिल करता है। मानसिक विकार में अवसाद (Depression) दुनिया भर में सबसे बड़ी समस्या है। कई शोधों में यह सिद्ध किया जा चुका है कि अवसाद, ह्रदय संबंधी रोगों का मुख्य कारण है। मानसिक विकार कई सामाजिक समस्याओं जैसे- बेरोज़गारी, गरीबी और नशाखोरी आदि को जन्म देती है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति हाल ही में इंडिया स्टेट लेवल डिज़ीज़ बर्डन इनिशिएटिव (India State-Level Disease Burden Initiative) द्वारा भारत में मानसिक विकारों के संबंध में एक अध्ययन किया गया जिसे लांसेट साइकाइट्री (Lancet Psychiatry) में प्रकाशित किया गया। इसके अनुसार, अवसाद तथा चिंता भारत में मानसिक विकारों के प्रमुख कारण हैं तथा इनका प्रभाव दक्षिणी राज्यों और महिलाओं में अधिक है। इसके अलावा इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। लगभग प्रत्येक 7 में से 1 भारतीय या कुल 19 करोड़ 70 लाख लोग विभिन्न प्रकार के मानसिक विकारों से ग्रसित हैं। वर्ष 2017 में देश में लगभग 76 लाख लोग बाइपोलर डिसऑर्डर (Bipolar Disorder) से ग्रसित थे। इसका सर्वाधिक प्रभाव गोवा, केरल, सिक्किम तथा हिमाचल प्रदेश में देखा गया। वर्ष 2018 में लगभग 35 लाख लोग सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) से ग्रसित थे। इसका प्रभाव गोवा, केरल, तमिलनाडु तथा दिल्ली में सर्वाधिक था। भारत में कुल बीमारियों में मानसिक विकारों की हिस्सेदारी विकलांगता समायोजित जीवन वर्ष (Disability Adjusted Life Years- DALY) के अनुसार, वर्ष 1990 में 2.5 प्रतिशत थी तथा वर्ष 2017 में यह बढ़कर 4.7 प्रतिशत हो गई। यहाँ 1 DALY का आशय स्वस्थ जीवन में एक वर्ष की कमी से है। वर्ष 2018 में भारत में मानसिक विकार DALY के सभी मामलों में 33.8% लोग अवसाद (Depression), 19% लोग एंग्जायटी डिसऑर्डर (Anxiety Disorder), 10.8% लोग इडियोपथिक डेवलपमेंटल इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी (Idiopathic Developmental Intellectual Disability) तथा 9.8% लोग सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) से ग्रसित थे। इस अध्ययन में राज्यों को सामाजिक-जनांकिकीय इंडेक्स (Socio-Demographic Index- SDI) के आधार पर तीन वर्गों- निम्न, मध्यम, तथा उच्च में विभाजित किया गया। SDI के मापन में राज्य की प्रतिव्यक्ति आय, औसत शिक्षा, 25 वर्ष से कम आयु की महिलाओं में प्रजनन दर जैसे पैमानों को अपनाया गया। उच्च SDI वाले राज्यों जैसे- तमिलनाडु, केरल, गोवा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र तथा तेलंगाना में अवसाद एवं एंग्जायटी की समस्या से सर्वाधिक ग्रसित लोग थे। मानसिक विकार के कारण मानसिक विकार का एक महत्त्वपूर्ण कारक आनुवंशिक होता है। मनोविक्षिप्त या साइकोसिस, सिज़ोफ्रेनिया इत्यादि रोग उन लोगों में अधिक पाए जाते हैं, जिनके परिवार का कोई सदस्य इनसे पीड़ित होता है। ऐसे व्यक्ति के बच्चों में यह खतरा लगभग दोगुना हो जाता है। मानसिक विकार की एक वजह शारीरिक परिवर्तन भी माना जाता है। दरअसल किशोरावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था, गर्भ-धारण जैसे शारीरिक परिवर्तन के कारण मानसिक विकार की संभावना बढ़ जाती है।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) एक संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी और एक वैश्विक संगठन है जो शरणार्थियों के जीवन बचाने, उसके अधिकारों की रक्षा करने और उनके लिये बेहतर भविष्य के निर्माण के प्रति समर्पित है। संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी की स्थापना वर्ष 1950 में की गई थी और इसका मुख्यालय जिनेवा (Geneva) में स्थित है।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (United Nations High Commissioner for Refugees-UNHCR) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 के अंत तक लगभग 79.5 मिलियन लोग विभिन्न कारणों से विस्थापित हुए, जो कि वैश्विक आबादी का लगभग 1 प्रतिशत हैं, इसमें से अधिकांश बच्चे थे। प्रमुख बिंदु रिपोर्ट के अनुसार, 79.5 मिलियन में से, 26 मिलियन क्रॉस-बॉर्डर शरणार्थी थे, 45.7 मिलियन लोग आंतरिक रूप से विस्थापित थे, 4.2 मिलियन शरण (Asylum) चाहने वाले थे और 3.6 मिलियन वेनेज़ुएला से अन्य देशों में जाने वाले विस्थापित थे। इतनी बड़ी मात्रा में विस्थापन के मुख्य कारणों में उत्पीड़न, संघर्ष, हिंसा और मानवाधिकारों के उल्लंघन आदि को शामिल किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 में प्रत्येक 97 लोगों में 1 व्यक्ति जबरन विस्थापन से प्रभावित हुआ, जबकि वर्ष 2010 में प्रत्येक 159 में से 1 व्यक्ति जबरन विस्थापन से प्रभावित था और वर्ष 2005 में प्रत्येक 174 में से 1 व्यक्ति इससे प्रभावित था। UNHCR द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ के अनुसार, सर्वाधिक चिंताजनक यह है कि विस्थापित लोगों में से काफी कम लोग ही वापस अपने घर लौटने में सक्षम थे। आँकड़ों के अनुसार, 1990 के दशक में प्रत्येक वर्ष औसतन 1.5 मिलियन शरणार्थी घर लौटने में सक्षम थे, जबकि पिछले एक दशक (2010-2019) में यह संख्या घटकर 385,000 रह गई है। वर्ष 2019 के अंत में सीमा पार विस्थापित होने वाले 10 में से 8 लोग केवल 10 देशों से ही थे और इन 10 देशों में से 4 अफ्रीकी देश हैं। अफगानिस्तान, सोमालिया, कांगो, सूडान और इरीट्रिया बीते एक दशक भर (2010-2019) में सीमा पार विस्थापन के लिये स्रोत देशों की शीर्ष 10 सूची में बने रहे। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014 से सीरिया शरणार्थियों की उत्पत्ति के लिये एक प्रमुख देश रहा है। वर्ष 2019 के अंत में दुनिया भर के 126 देशों में कुल 6.6 मिलियन सीरियाई शरणार्थी थे। कौन हैं शरणार्थी? एक शरणार्थी का अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से होता है जिसे उत्पीड़न, युद्ध या हिंसा के कारण उसके देश से भागने के लिये मज़बूर किया गया है। अधिकांश शरणार्थियों में नस्ल, धर्म, राष्ट्रीयता, राजनीतिक राय या किसी विशिष्ट समूह की सदस्यता के कारण उत्पीड़न का भय होता है, इसी भय के कारण कई शरणार्थी वापस अपने घर नहीं लौट पाते हैं। वैश्विक शरणार्थी संकट जानकारों का मानना है कि तथाकथित ‘वैश्विक शरणार्थी संकट’ की उत्पत्ति सर्वप्रथम द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) के दौरान हुई थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 20वीं शताब्दी में संकट उत्पन्न हुआ और लाखों लोगों को अपना घर छोड़कर एक सुरक्षित स्थान पर जाना पड़ा। एक अनुमान के अनुसार, इस दौरान यूरोप में लगभग 40 मिलियन लोगों को विस्थापित होना पड़ा था। वर्ष 1945 में भले ही द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया, किंतु संघर्ष इसके बाद भी जारी रहा और इसके परिणामस्वरूप विश्व युद्ध के बाद भी लोगों का विस्थापन जारी रहा। अगस्त 1947 में भारत आज़ाद हो गया, इसी के साथ भारत का दो हिस्सों में विभाजन भी हो गया, लाखों लोगों को इस दौरान अपना सब कुछ छोड़ कर एक नए स्थान पर जाना पड़ा। आँकड़ों के अनुसार, इस दौरान तकरीबन 14 मिलियन लोगों ने पलायन किया था। फिलिस्तीन में युद्ध के बाद यहूदी राज्य के गठन के कारण वेस्ट बैंक, गाजा पट्टी, जॉर्डन, सीरिया और लेबनान में तकरीबन 750,000 लोगों का पलायन हुआ। 20 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध की शुरुआत एशिया और अफ्रीका में स्वतंत्रता आंदोलनों के साथ हुई। इस दौरान स्वतंत्रता संबंधी युद्धों और उसके बाद हुए नागरिक संघर्षों ने अल्जीरिया, कांगो, अंगोला, नाइजीरिया और अन्य देशों के लाखों लोगों को पलायन के संकट में ढकेल दिया। वर्ष 1981 से वर्ष 1989 के बीच मध्य अमेरिका में गृहयुद्ध का दौर था, जिसमें लगभग 2 मिलियन लोगों को विस्थापित होना पड़ा। वर्ष 1971 में बांग्लादेश आज़ाद हो गया, इस दौरान तत्कालीन पूर्वी बंगाल से तकरीबन 10 मिलियन लोगों ने पलायन किया था। भारत में शरणार्थी संबंध कानून भारत में अधिकारियों द्वारा विभिन्न कानूनों, जैसे–पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920; विदेशी कानून, 1946 इत्यादि को ध्यान में रखकर शरणार्थियों और आश्रय याचकों के प्रवेश के संबंध में विचार किया जाता है। ये कानून शरणार्थियों को अन्य विदेशियों के समतुल्य मानते हैं और इस बात का विचार नहीं करते कि मानवीय आधार पर उन्हें विशेष दर्जा मिलना चाहिये। भारत में दक्षिण एशियाई क्षेत्र में सबसे अधिक शरणार्थी आबादी है लेकिन यहाँ अभी तक आश्रय याचकों के लिये एक समान कानून नहीं बनाया जा सका है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (United Nations High Commissioner for Refugees-UNHCR)

दक्षिण एशिया में आर्थिक कूटनीतिक संबंधों के चलते चीन द्वारा बांग्लादेश से चीन में निर्यात होने वाले सामान पर 97% टैरिफ छूट देने की घोषणा की गई है। मुख्य बिंदु: बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय द्वारा इस बात की जानकारी दी गई है कि मत्स्य और चमड़े के उत्पादों को कवर करने वाली 97% वस्तुओं को चीनी टैरिफ से छूट दी जाएगी। चीन का यह कदम ‘ढाका-बीजिंग संबंधों’ के लिये महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है। एक महीने पहले बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना तथा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा COVID-19 महामारी के चलते व्यापार में आई आर्थिक कठिनाई पर चर्चा करने के लिये इस संदर्भ में बात की गई थी। जिसे ध्यान में रखते हुए चीन द्वारा यह कदम उठाया गया है। बांग्लादेश पहले ही Asia-Pacific Trade Agreement -(APTA) के तहत 3095 वस्तुओं के लिये टैरिफ-छूट प्राप्त करता है। चीन द्वारा की गई नवीनतम घोषणा के परिणामस्वरूप, बांग्लादेश के अब कुल 8256 सामानों को चीनी टैरिफ से छूट दी जाएगी। बांग्लादेश के लिये इस छूट का महत्त्व: बांग्लादेश चीन से लगभग 15 बिलियन डॉलर का आयात करता है। जबकि चीन में बांग्लादेश से निर्यात की जाने वाले वस्तुओं की कीमत आयात के मुकाबले काफी कम है। इस छूट के माध्यम से बांग्लादेश के चीन के साथ व्यापार घाटे में कुछ कमी होने की आशा है साथ ही बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिलेगी। चीन की रणनीति: भारत चीन के मध्य ‘लाइन ऑफ ऐक्चुअल कंट्रोल’ पर जारी तनाव के बीच चीन अपनी आर्थिक कूटनीति (Economic Diplomacy of China) के तहत भारत के पड़ोसी देशों को अपने पक्ष में करने का कार्य कर रहा है। इससे पहले चीन द्वारा श्रीलंका, नेपाल तथा पाकिस्तान के साथ भी यही रणनीति अपनाई जा चुकी है। अब चीन का रुख बांग्लादेश की तरफ है। इसी कड़ी में चीन ने बांग्लादेश से निर्यात की जाने वाली 97 फीसदी वस्तुओं को टैक्स से छूट देने की घोषणा की है। भारत की रणनीति: एक तरफ जहाँ चीन द्वारा भारत को सामरिक एवं आर्थिक मोर्चे पर घेरने की रणनीति बनाई जा रही है तो भारत भी इसका जबाव दे रहा है। भारत द्वारा अब चीन से आयातित वस्तुओं पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से जल्द ही ‘ई-कॉमर्स नीति’ घोषित करने की तैयारी कर ली गई है। इस नीति के तहत कंपनियों के लिये यह स्पष्ट करना अनिवार्य होगा कि उनके द्वारा बेची जा रही वस्तुओं को भारत में उत्पादित किया गया है या नहीं। दूसरी तरफ भारत द्वारा चीन समेत भारत की सीमा से लगे किसी भी देश से ‘पेंशन कोष’ में विदेशी निवेश पर प्रतिबंध लगाने का भी प्रस्ताव पेश किया है। ‘पेंशन कोष नियामक एवं विकास प्राधिकरण’ (Pension Fund Regulatory and Development Authority) PFRDA के नियमन के तहत पेंशन कोष में स्वत: मार्ग से 49 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति है। इस प्रस्ताव के तहत चीन समेत भारत की सीमा से लगने वाले किसी भी देश की किसी भी निवेश इकाई या व्यक्ति को निवेश के लिये सरकार की मंज़ूरी की जरूरत होगी। आगे की राह: भारत की विदेश नीति पंचशील सिद्धांत पर आधारित है इस सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए ही वर्ष 1954 में नेहरू और झोउ एनलाई (Zhou Enlai) द्वारा ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे के साथ पंचशील सिद्धांत पर हस्ताक्षर किये गए थे, ताकि क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिये कार्ययोजना तैयार की जा सके। वर्ष 2019 में भारत तथा चीन के बीच होने वाले व्यापार की मात्रा 92.68 बिलियन डॉलर रही। भारत में औद्योगिक पार्कों, ई-कॉमर्स तथा अन्य क्षेत्रों में 1,000 से अधिक चीनी कंपनियों द्वारा निवेश किया हुआ है। भारतीय की भी लगभग दो-तिहाई से अधिक कंपनियाँ चीन के बाज़ार में सक्रिय हैं। 2.7 बिलियन से अधिक लोगों के संयुक्त बाज़ार तथा दुनिया के 20% के सकल घरेलू उत्पाद के साथ, भारत और चीन के लिये आर्थिक एवं व्यापारिक सहयोग के क्षेत्र में व्यापक संभावनाएँ विद्यमान हैं।अतः वर्तमान समय में उत्पन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक बार फिर दोनों ही देशों को एक-दूसरे देश की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करते हुए पंचशील के सिद्धांतों की महत्ता को स्वीकार करने की आवश्यकता है।

नेर्विलिया सिंगापोरेंसिस Nervilia Singaporensis सिंगापुर में आर्किड (Orchid) मूल की एक नई प्रजाति नेर्विलिया सिंगापोरेंसिस (Nervilia Singaporensis) को बुकिट तिमाह नेचर रिज़र्व (Bukit Timah Nature Reserve) में खोजा गया। प्रमुख बिंदु: नेर्विलिया वर्ग की प्रजातियों को सिंगापुर में स्थानीय रूप से विलुप्त मान लिया गया था। इस वर्ग की प्रजाति को अंतिम बार वर्ष 1889 में देखा गया था। नेर्विलिया सिंगापोरेंसिस (Nervilia Singaporensis) एक अद्वितीय फूल के आकार का होता है जो एक नुकीले सिरे एवं फूलों की तरह तिरछा होता है जो कभी खुलता नहीं हैं। इसका मतलब यह है कि इसे पुनुरुत्पादन करने के लिये आत्म-परागण (Self-Pollinate) करना पड़ता है। यह प्रजाति 9 सेमी. तक बढ़ती है। यह प्रजाति राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बहुत कम दिखाई देती है क्योंकि यह कम मात्रा में बीज उत्पन्न करता है जिससे इसका प्रसारित होना मुश्किल हो जाता है। नेर्विलिया सिंगापोरेंसिस (Nervilia Singaporensis) की खोज से पहले सिंगापुर में ज़िन्गिबेर सिंगापुरेंसे (Zingiber Singapurense), हेंगुआना रूबिनेआ (Hanguana Rubinea), हेंगुआना त्रिंगुलता (Hanguana Triangulata) और स्प्लेशनोब्रयुम टेमासेकेंसिस (Splachnobryum Temasekensis) सहित चार स्थानिक पौधे थे। बुकिट तिमाह नेचर रिज़र्व (Bukit Timah Nature Reserve): बुकिट तिमाह नेचर रिज़र्व सिंगापुर में 1.64 वर्ग किलोमीटर में फैला एक प्रकृति रिज़र्व है जो सिंगापुर की सबसे ऊंची पहाड़ी ‘बुकिट तिमाह हिल’ (Bukit Timah Hill) की ढलान पर स्थित है।

उर्जित पटेल Urjit Patel RBI के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल (Urjit Patel) को 19 जून, 2020 को ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी’ (National Institute of Public Finance and Policy- NIPFP) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। प्रमुख बिंदु: उर्जित पटेल पूर्व नौकरशाह विजय केलकर की जगह लेंगे जिन्होंने लगभग 6 वर्ष तक NIPFP की अध्यक्षता की है। उर्जित पटेल 22 जून, 2020 को NIPFP की अध्यक्षता ग्रहण करेंगे और इनका कार्यकाल चार वर्ष का होगा। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (National Institute of Public Finance and Policy- NIPFP): नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (NIPFP) भारत का एक प्रमुख आर्थिक थिंक टैंक है। NIPFP वित्त मंत्रालय (भारत सरकार), पूर्ववर्ती योजना आयोग एवं कई राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से वर्ष 1976 में स्थापित एक स्वायत्त निकाय है। यह एक स्वतंत्र गैर-सरकारी संस्था है और यह सरकारों की सार्वजनिक नीति में अनुसंधान को बढ़ावा देता है तथा केंद्र एवं राज्यों सरकार को सलाह देता है। NIPFP की गवर्निंग काउंसिल में राजस्व सचिव, आर्थिक मामलों के सचिव और केंद्रीय वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार के अलावा नीति आयोग, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और तीन राज्य सरकारों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। उल्लेखनीय है कि उर्जित पटेल ने 5 सितंबर, 2016 को RBI के 24वें गवर्नर के रूप में पदभार ग्रहण किया था और कार्यकाल पूरा होने के लगभग 10 महीने पहले ही 10 दिसंबर, 2018 को अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था।

मुंबई स्थित भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) 19 जून, 2020 को 150 अरब डॉलर के मूल्य को छूने वाली पहली भारतीय कंपनी बन गयी है। रिलायंस यह उपलब्धि हासिल करने आली पहली बार भारतीय कंपनी बन गयी है। मुख्य बिंदु कंपनी मार्च 2021 के अपने लक्ष्य से आगे शुद्ध ऋण-मुक्त हो गई है, इस घोषणा के बाद रिलायंस के शेयर में काफी तेज़ी देखी गयी। 31 मार्च, 2020 को रिलायंस का ऋण 161,035 करोड़ रुपए था। लॉकडाउन के बावजूद, 58 दिनों की अवधि में, रिलायंस इंडस्ट्रीज 168,818 करोड़ रुपये से अधिक जुटाने में कामयाब रही। कंपनी के मौजूदा शेयरधारकों को 53,124.20 करोड़ रुपये के शेयर की पेशकश की गई थी। शेष 115,693.95 करोड़ रुपये आरआईएल की सहायक कंपनी जिओ प्लेटफॉर्म में हिस्सेदारी बिक्री के 11 सौदों के माध्यम से जुटाए गए। जिओप्लेटफार्मों में लगभग 24.70% हिस्सेदारी अब निम्नलिखित कंपनियों के स्वामित्व में है: अमेरिका की कंपनी फेसबुक ने 43,574 करोड़ रुपये में 9.99% हिस्सेदारी खरीदी, यह सौदा भारत में किसी भी क्षेत्र में सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) है। अन्य कंपनियां अबू धाबी आधारित निवेश कंपनियां हैं- मुबाडाला और अबू धाबी निवेश प्राधिकरण। अमेरिका की कंपनियां- जनरल अटलांटिक, सिल्वर लेक, विस्टा इक्विटी पार्टनर्स, केकेआर एंड कंपनी, टीपीजी कैपिटल और कैटरटन पार्टनर्स।

विश्व भर में शरणार्थियों की स्थिति के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उदेश्य शरणार्थियों की दुर्दशा पर ध्यान आकर्षित करना है। मुख्य तथ्य इस दिन, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNRA) को शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्च आयुक्त (UNHCR) के रूप में भी जाना जाता है, जो विभिन्न कार्यक्रमों की मेजबानी करता है और अपने अभियान के लिए विषय की घोषणा भी करता है। UNHCR-The UN Refugee Agency की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में संपूर्ण विश्व में 68.5 मिलियन लोग अपने घरों से बलपूर्वक विस्थापित हुए थे। इसके साथ ही, यूएनआरए दुनिया भर में लाखों शरणार्थियों और आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों पर जनता का ध्यान आकर्षित करना चाहता है, जिन्हें युद्ध, संघर्ष और उत्पीड़न के कारण अपने घरों से विस्थापित होना पड़ा। पृष्ठभूमि विश्व शरणार्थी दिवस 4 दिसंबर 2000 को संकल्प 55/76 पारित करके संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) द्वारा घोषित किया गया था। संकल्प संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन, 1951 की 50 वीं वर्षगांठ को चिह्नित करने के लिए पारित किया गया था तभी से यह विभिन्न विषयों के साथ प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। वर्ष 2000 में इस संकल्प को पारित करने से पहले 20 जून को कई देशों में अफ्रीकी शरणार्थी दिवस औपचारिक रूप से मनाया गया था। वर्ष 2017 का विषय “Embracing Refugees to Celebrate our Common Humanity” था।

केंद्रीय खदान और कोयला मंत्री प्रहलाद जोशी ने खनन उन्नति में ‘सत्यभामा’ (SATYABHAMA – Science and Technology Yojana for AtmaNirbhar Bharat in Mining Advancement) नामक एक पोर्टल लॉन्च किया। पोर्टल के बारे में पोर्टल को देश के खनिज और खनन क्षेत्र में डिजिटल प्रौद्योगिकी की भूमिका को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर देकर डिजाइन और विकसित किया गया है। नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर (एनआईसी) की माइन्स इंफॉर्मेटिक्स डिवीजन इस पोर्टल की कार्यान्वयन एजेंसी है। SATYABHAMA को नीति आयोग के पोर्टल- NGO Darpan के साथ भी एकीकृत किया जा रहा है। इस पोर्टल को research.mines.gov.in पर एक्सेस किया जा सकता है पोर्टल का उद्देश्य इस पोर्टल के माध्यम से, केंद्र सरकार का उद्देश्य खनन और खनिज क्षेत्र में गुणात्मक और नवीन अनुसंधान और विकास कार्य करने के लिए शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना है। यह पोर्टल इस क्षेत्र में सरकार की विभिन्न योजनाओं की प्रभावशीलता और दक्षता बढ़ाने में मदद करेगा, इस क्षेत्र में संस्थानों को विभिन्न अनुसंधान और विकास आधारित परियोजनाओं के लिए आवंटित धन का उचित उपयोग, खनिज संसाधनों के उचित उपयोग और संरक्षण को सुनिश्चित करने में मदद करेगा। पोर्टल के लाभ SATYABHAMA पोर्टल शोधकर्ताओं को अपनी रिपोर्ट (प्रगति और अंतिम) इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में प्रस्तुत करने की अनुमति देगा, इससे पहले यह प्रगति या अंतिम तकनीकी रिपोर्ट केवल भौतिक रूप से शोधकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत की जा सकती थी। परियोजना के प्रस्ताव भी पोर्टल के माध्यम से प्रस्तुत किए जा सकते हैं। नियमित निगरानी के माध्यम से, पोर्टल का उपयोग अधिकारियों, शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों के लिए विभिन्न परियोजनाओं के लिए अनुदान / धन के प्रबंधन के लिए भी किया जाएगा। रिपोर्ट और परियोजनाओं के प्रस्तावों का डिजिटल प्रस्तुतीकरण और परियोजनाओं के लिए धन का प्रबंधन भी अधिक शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों को देश की खदानों और खनिजों के क्षेत्र में काम करने के लिए प्रोत्साहित करेगा। यह आगे चलकर आत्मनिर्भर भारत बनाने में मदद करेगा।

एक महीने के भीतर, उपयोगकर्ता के लिए अनुकूल व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) किट जिसे ‘नवरक्षक’ के नाम से जाना जाता है, भारतीय बाजार में उपलब्ध होने की उम्मीद है क्योंकि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए इस सप्ताह के शुरू में इसे मंजूरी दे दी है। पीपीई प्रोटोटाइप नमूना परीक्षण के लिए नौ अधिकृत एनएबीएल मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में से एक, इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज (एक डीआरडीओ प्रयोगशाला) ने भी परीक्षण के बाद पीपीई किट को प्रमाणित किया है। नवरक्षक इस पीपीई किट को मुंबई महाराष्ट्र में INHS अश्विनी में स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ नेवल मेडिसिन के इनोवेशन सेल में एक नौसैनिक डॉक्टर द्वारा विकसित किया गया था। यह किट दो संस्करणों में उपलब्ध होगी: सिंगल और डबल प्लाई। पूरी किट में फेस मास्क, हेडगियर और एक मिड-थाई लेवल शो कवर शामिल होगा। किट की खासियत बाजार में उपलब्ध अन्य पीपीई की तुलना में इसका संवर्धित श्वासयंत्र है, इससे स्वास्थ्य कर्मियों को लंबे समय तक काम करने के दौरान महामारी के खिलाफ फ्रंटलाइन में काम करने की सुविधा मिलेगी। नवरक्षक पीपीई का उत्पादन 5 सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगों (MSME) को इस पीपीई किट के उत्पादन का लाइसेंस मिला है। राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम (NRDC) ने यह लाइसेंस जारी किए हैं। एक वर्ष में एक साथ 5 एमएसएमई द्वारा 10 मिलियन से अधिक नवआरक्षक पीपीई का उत्पादन किए जाने की उम्मीद है।एक महीने के भीतर, उपयोगकर्ता के लिए अनुकूल व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) किट जिसे ‘नवरक्षक’ के नाम से जाना जाता है, भारतीय बाजार में उपलब्ध होने की उम्मीद है क्योंकि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए इस सप्ताह के शुरू में इसे मंजूरी दे दी है। पीपीई प्रोटोटाइप नमूना परीक्षण के लिए नौ अधिकृत एनएबीएल मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में से एक, इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज (एक डीआरडीओ प्रयोगशाला) ने भी परीक्षण के बाद पीपीई किट को प्रमाणित किया है। नवरक्षक इस पीपीई किट को मुंबई महाराष्ट्र में INHS अश्विनी में स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ नेवल मेडिसिन के इनोवेशन सेल में एक नौसैनिक डॉक्टर द्वारा विकसित किया गया था। यह किट दो संस्करणों में उपलब्ध होगी: सिंगल और डबल प्लाई। पूरी किट में फेस मास्क, हेडगियर और एक मिड-थाई लेवल शो कवर शामिल होगा। किट की खासियत बाजार में उपलब्ध अन्य पीपीई की तुलना में इसका संवर्धित श्वासयंत्र है, इससे स्वास्थ्य कर्मियों को लंबे समय तक काम करने के दौरान महामारी के खिलाफ फ्रंटलाइन में काम करने की सुविधा मिलेगी। नवरक्षक पीपीई का उत्पादन 5 सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगों (MSME) को इस पीपीई किट के उत्पादन का लाइसेंस मिला है। राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम (NRDC) ने यह लाइसेंस जारी किए हैं। एक वर्ष में एक साथ 5 एमएसएमई द्वारा 10 मिलियन से अधिक नवआरक्षक पीपीई का उत्पादन किए जाने की उम्मीद है।

अटल नवाचार मिशन ने अपने नवाचार और उद्यमिता पहल को बढ़ावा देने के लिए कोल इंडिया लिमिटेड को साझेदार बनाया कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल)ने अटल इनोवेशन मिशन (एआईएम),नीति आयोग के साथ देश भर में इसके प्रमुख नवाचार और उद्यमिता पहलों का सक्रिय रुप से मदद करने के लिए मिशन के साथ साझेदारी करने पर सहमति जताई है। अटल इनोवेशन मिशन और कोल इंडिया लिमिटेड के बीच एक रणनीतिक साझेदारी के आशय-पत्र (एसओआई)पर शुक्रवार, 19 जून, 2020 को आयोजित एक वर्चुअल ई-सम्मेलन में हस्ताक्षर किए गए और आशय-पत्रों का आदान-प्रदान किया गया। एआईएम के पास स्कूल स्तर पर अटल टिंकरिंग लैब्स (एटीएल), संस्थागत स्तरों पर अटल इन्क्यूबेशन सेंटर (एआईसी), टीयर-2, टीयर-3 शहरों और ग्रामीण भारत के लिए अटल सामुदायिक नवाचार केंद्र (एसीआईसी), उद्योग स्तर पर अटल न्यू इंडिया चुनौतियां (एएनआईसी) और एमएसएमई उद्योग में नवाचारों को प्रोत्साहित करने के लिए एप्लाइड रिसर्च एंड इनोवेशन (एआरआईएसई) जैसेविभिन्न नवाचार कार्यक्रम और उद्यमशीलता पारिस्थितिकी तंत्र निर्माण पहल हैं। कोल इंडिया लिमिटेड और अटल नवाचार मिशन के बीच हुए इस सहयोग समझौते का मकसद मिशन (एआईएम) के उपरोक्त कार्यक्रमों और नई पहलों के माध्यम से नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को लेकर अधिक से अधिक जागरूकता फैलाने और उसेबढ़ावा देने के लिए विभिन्न गतिविधियों / कार्यक्रमों का संचालन करना है। कोल इंडिया के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक श्री प्रमोद अग्रवाल की उपस्थिति में अटल नवाचार मिशन, नीति आयोग के मिशन निदेशक श्री आर.रामनान और कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) के निदेशक (तकनीकी) श्री बिनय दयाल ने एक वर्चुअल आशय-पत्र(एसओआई) पर हस्ताक्षर किए। एआईएम, नीति आयोग के मिशन निदेशक श्री आर. रामनान ने कहा कि सीआईएल के साथ इस आश्य-पत्र (एसओआई) पर हस्ताक्षर करना एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने कहा कि हमें इसेबात का बहुत गर्व है कि सीआईएल हमारे देश के प्रतिभाशाली युवाओं को महान नवाचारों को विकसित करने में मदद करने के लिए एआईएम के साथ साझेदारी कर रहा है और इस तरह उन्हें आत्मनिर्भर भारत के लिए सक्षम बनाया जा सकता है। श्री रामनान ने कहा कि यह साझेदारी हमारे देश केउन क्षेत्रों को नवाचार और उद्यमिता से लाभान्वित करने में मदद करने के लिए एक उत्कृष्ट मंच प्रदान करेगी जिनका विकास नहीं हुआ या फिर कम हुआ। इससे आने वाले वर्षों में स्थानीय स्तर पर रोजगार का सृजन भी होगा। कोल इंडिया लिमिटेड के अध्यक्ष श्री प्रमोद अग्रवाल ने आशय-पत्र (एसओआई) पर हस्ताक्षर होने के अवसर पर कहा कि सीआईएल को एआईएम, नीति आयोग के साथ साझेदारी की घोषणा करने पर गर्व है और हम इस मिशन के लिए सबसे महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए उत्साहित हैं जो भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को और मजबूत करेगा। हस्ताक्षर किए गए आशय-पत्र (एसओआई) के अनुसार, साझेदारी को कार्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है जिसमें अटल टिंकरिंग लैब्स (एटीएल) के तहत सीआईएल ने चुनिंदा एटीएल स्कूलों को गोद लेने, शिक्षक प्रशिक्षण सत्रों का संचालन करने में मदद और एटीएल छात्रों को सलाह प्रदान करने में सहायता प्रदान पर सहमति जताई है। इसी तरह,अटल सामुदायिक नवाचार केंद्रों (एसीआईसी) के तहत सीआईएल ने अपने संचालन क्षेत्रों के आसपास के अटल सामुदायिक नवाचार केंद्रों (एसीआईसी) को गोद लेने और उनकी मदद करने, सामाजिक नवाचार के क्षेत्र में काम कर रहे युवाओं को सहायता पहुंचाने और देश के अल्प-विकसित क्षेत्रों में नवाचार पारिस्थितिकी निर्माण के प्रभाव का प्रचार-प्रसार करने के लिए सामुदायिक नवाचार चुनौतियों और अन्य नवाचार आधारित कार्यक्रमों का आयोजन करने पर सहमति जताई है।

सरकार की‘मेक इन इंडिया’ नीति का लाभ उठाने के लिए दुनिया भर के जहाज मालिकों को भारत में अपने जहाजों को फ्लैग(सरकारी कार्गो के परिवहन)करने के लिए आमंत्रित किया गया भारत सरकार ने हाल ही में सभी सेवाओं में सरकारी खरीद व अन्य के लिए अपनी ‘मेक इन इंडिया’ नीति मेंसंशोधन किया है। संशोधित नीति के तहत, 200 करोड़रुपये से कम की खरीद के अनुमानित मूल्य के लिए, सभी सेवाओं की खरीद के लिए सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के अलावा कोई वैश्विक निविदा जारी नहीं की जाएगी। केंद्रीय पोत परिवहन राज्य मंत्री(स्वतंत्र प्रभार) श्री मनसुख मंडावियाने सरकार की कार्गो परिवहन नीति के कार्यान्वयन के लिए भारतीय शिपिंग की तैयारी की समीक्षा की। यह अनुमान है कि मेक इन इंडिया नीति, तात्कालिक तौर पर भारतीय फ्लैग जहाज़ों की संख्या को कम से कम दोगुनी (3 साल की अवधि में वर्तमान के लगभग 450 से बढ़कर900जहाज) करने का अवसर प्रदान करेगी। इसके अलावा भविष्य में भारतीय फ्लैग टन भार में अतिरिक्त निवेश होने की भी सम्भावना रहेगी। आधुनिक समुद्री प्रशासन के साथ, प्रशिक्षित नाविकों की निरंतर आपूर्ति व पहले से ही उपलब्ध जहाज प्रबंधन कौशलके साथ दुनिया भर के जहाज मालिकों कोसरकारी कार्गो के परिवहन के सन्दर्भ में सरकार की मेक इन इंडिया नीति का लाभ उठाने हेतुभारत में अपने जहाजों को फ्लैग करने के लिए आमंत्रित किया गया है।सरकार की‘मेक इन इंडिया’ नीति का लाभ उठाने के लिए दुनिया भर के जहाज मालिकों को भारत में अपने जहाजों को फ्लैग(सरकारी कार्गो के परिवहन)करने के लिए आमंत्रित किया गया भारत सरकार ने हाल ही में सभी सेवाओं में सरकारी खरीद व अन्य के लिए अपनी ‘मेक इन इंडिया’ नीति मेंसंशोधन किया है। संशोधित नीति के तहत, 200 करोड़रुपये से कम की खरीद के अनुमानित मूल्य के लिए, सभी सेवाओं की खरीद के लिए सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के अलावा कोई वैश्विक निविदा जारी नहीं की जाएगी। केंद्रीय पोत परिवहन राज्य मंत्री(स्वतंत्र प्रभार) श्री मनसुख मंडावियाने सरकार की कार्गो परिवहन नीति के कार्यान्वयन के लिए भारतीय शिपिंग की तैयारी की समीक्षा की। यह अनुमान है कि मेक इन इंडिया नीति, तात्कालिक तौर पर भारतीय फ्लैग जहाज़ों की संख्या को कम से कम दोगुनी (3 साल की अवधि में वर्तमान के लगभग 450 से बढ़कर900जहाज) करने का अवसर प्रदान करेगी। इसके अलावा भविष्य में भारतीय फ्लैग टन भार में अतिरिक्त निवेश होने की भी सम्भावना रहेगी। आधुनिक समुद्री प्रशासन के साथ, प्रशिक्षित नाविकों की निरंतर आपूर्ति व पहले से ही उपलब्ध जहाज प्रबंधन कौशलके साथ दुनिया भर के जहाज मालिकों कोसरकारी कार्गो के परिवहन के सन्दर्भ में सरकार की मेक इन इंडिया नीति का लाभ उठाने हेतुभारत में अपने जहाजों को फ्लैग करने के लिए आमंत्रित किया गया है।

रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह मास्को में द्वितीय विश्व युद्ध के 75वें विजय दिवस परेड में भाग लेंगे प्रविष्टि तिथि: 20 JUN 2020 2:33PM by PIB Delhi रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह द्वितीय विश्व युद्ध में विजय की 75वीं वर्षगांठ मनाने के लिए विजय दिवस परेड में भाग लेने हेतु 24 जून, 2020 को मास्को का दौरा करेंगे। इस परेड का आयोजन रूसी एवं अन्य मित्रवत लोगों की बहादुरी तथा किए गए बलिदान को सम्मानित करने के लिए किया जाता है। रूसी फेडेरेशन के रक्षा मंत्री श्री सर्गई शोइगु ने रक्षा मंत्री को विजय दिवस परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया है जिसे मूल रूप से 9 मई, 2020 को आयोजित किया जाना था लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था। इससे पृथक, तीनों सेनाओं की एक 75 सदस्यीय भारतीय सैन्य टुकड़ी पहले ही रूसी टुकड़ी एवं अन्य आमंत्रित टुकड़ियों के साथ विजय दिवस परेड में भाग लेने के लिए मास्को पहुंच चुकी है। विजय दिवस परेड में भाग लेने के लिए मार्चिंग टुकड़ी का नेतृत्व वीर सिख लाइट इंफैंट्री रेजीमेंट के एक मेजर रैंक के अधिकारी कर रहे हैं। इस रेजीमेंट ने द्वितीय विश्व युद्ध में बहादुरी से लड़ाई की थी तथा इसे अन्य वीरता पुरस्कारों के अतिरिक्त चार बटालियन सम्मान तथा दो मिलिट्री क्रास अर्जित करने का गौरव हासिल हो चुका है। विजय दिवस परेड में भारतीय सहभागिता द्वितीय विश्व युद्ध में रूस एवं अन्य राष्ट्रों द्वारा किए गए महान बलिदानों को श्रद्धांजलि अर्पित किए जाने के एक प्रतीक के रूप में होगी जिसमें भारतीय सैनिकों ने भी भाग लिया था और सर्वोच्च बलिदान दिया था। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने विजय दिवस की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर रूसी फेडेरेशन के राष्ट्रपति श्री व्लादीमीर पुतिन को बधाई दी थी और रक्षा मंत्री ने रूस के रक्षा मंत्री को विशेष संदेशों के जरिये बधाई दी थी। रक्षा मंत्री का दौरा भारत और रूस के बीच लंबे समय से चली आ रही विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझीदारी को सुदृढ़ बनायेगा।