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जहाँ तक भारत का प्रश्न है, तो आयातित तेल पर हमारी निर्भरता में पिछले दशक से काफी वृद्धि हुई है और अब घरेलू खपत का लगभग 90% से अधिक कच्चा तेल भारत आयात करता है।
ऐसे में तेल और गैस की आपूर्ति करने वाले विश्व के सबसे बड़े क्षेत्र को अस्थिर कर अमेरिका एशियाई आर्थिक विकास की राह में हर तरह की बाधा उत्पन्न कर रहा है ताकि ‘राइजिंग एशिया’ को असंतुलित कर सके।
क्या है खाड़ी सहयोग परिषद?
खाड़ी सहयोग परिषद अरब प्रायद्वीप में छह देशों का एक राजनीतिक और आर्थिक गठबंधन है जिसमें बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।
वर्ष 1981 में स्थापित, GCC छह देशों के बीच आर्थिक, सुरक्षा, सांस्कृतिक और सामाजिक सहयोग को बढ़ावा देता है और सहयोग तथा क्षेत्रीय मामलों पर चर्चा करने के लिये प्रत्येक वर्ष एक शिखर सम्मेलन आयोजित करता है।
खाड़ी सहयोग परिषद का मुख्यालय रियाद, सऊदी अरब में स्थित है।
खाड़ी सहयोग परिषद के कार्य संचालन की भाषा ‘अरबी’ है।
वर्ष 2019 में खाड़ी सहयोग परिषद का 40वाँ शिखर सम्मेलन संयुक्त अरब अमीरात में आयोजित किया गया था।
खाड़ी देशों की चुनौतियाँ
वैश्विक लॉकडाउन के कारण हाइड्रोकार्बन की खपत में कमी आ गई है।
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार, लॉकडाउन के बाद कच्चे तेल के उपभोग में प्रतिदिन 28 मिलियन बैरल की गिरावट दर्ज़ की गई है।
कच्चे तेल की मांग में अत्यधिक गिरावट के कारण उत्पादन कम करने को लेकर तेल उत्पादक देशों के संगठन और रूस के मध्य हो रही वार्ता विफल हो गई, परिणामस्वरूप मांग में कमी व उत्पादन जस का तस बना रहने के कारण कच्चे तेल के मूल्य में अप्रत्याशित गिरावट हुई।
तेल उत्पादक देशों के संगठन और अंतर्राष्ट्रीय उर्जा एजेंसी के आकलन के अनुसार, वर्ष 2020 में दूरगामी आर्थिक और सामाजिक परिणामों के साथ विकासशील देशों के तेल और गैस राजस्व में 50 प्रतिशत से 85 प्रतिशत की गिरावट आएगी।
वर्ष 2020 में सऊदी अरब का राजकोषीय घाटा 8 प्रतिशत से अधिक हो जाने की संभावना है।
वैश्विक महामारी COVID-19 से ईरान व्यापक तौर पर प्रभावित हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण ईरान अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से सहायता भी नहीं प्राप्त कर पा रहा है।
सामूहिक सुरक्षा नीति में GCC की भूमिका
GCC सदस्य देशों के बीच आर्थिक, सुरक्षा, सांस्कृतिक और सामाजिक सहयोग को बढ़ावा देता है, यदि यह संगठन ईरान के साथ वार्ता करने की पहल करता है तो निश्चित रूप से सकारात्मक परिणामों की उम्मीद की जा सकती है।
वैश्विक महामारी COVID-19 के परिणामस्वरूप सभी खाड़ी देशों में पेट्रोलियम का उत्पादन नकारात्मक रूप से प्रभावित हुआ है। चूँकि OPEC में GCC के सदस्यों के अतिरिक्त ईरान भी शामिल है अतः सामूहिक लाभ को प्राप्त करने हेतु सभी खाड़ी देशों को एक मंच पर लाया जा सकता है। उन्हें इस बात पर सहमत किया जा सकता है कि सामूहिक लाभ को प्राप्त करने के लिये फारस की खाड़ी को स्पर्श करने वाले सभे देशों को सामूहिक सुरक्षा नीति पर मिलकर कार्य करना होगा।
भारत के लिये खाड़ी देशों का महत्त्व
वित्तीय वर्ष 2018-19 में भारत और खाड़ी देशों के बीच लगभग 162 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार हुआ है। यह एक वर्ष में भारत के द्वारा पूरे विश्व के साथ किये जाने वाले व्यापार का 20 प्रतिशत है।
लगभग 75 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य का पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस खाड़ी देशों से आयात की जाती है।
खाड़ी देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय लगभग 40 बिलियन डॉलर की धनराशि भी प्रेषण के माध्यम से भारत भेजते हैं।
सऊदी अरब भारत को हाइड्रोकार्बन आपूर्ति करने वाला इस क्षेत्र का सबसे प्रमुख देश है।
खाड़ी क्षेत्र हमारी विकास की अहम जरूरतों जैसे ऊर्जा संसाधन, कॉर्पोरेट क्षेत्र के लिये निवेश के मौके और लाखों लोगों को नौकरी के भरपूर अवसर देता है।
जहाँ ईरान हमें अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप तक पहुँचने का रास्ता उपलब्ध कराता है, तो वहीँ ओमान हमें पश्चिम हिंद महासागर तक पहुँचने की राह दिखाता है।
आगे की राह
भारत को खाड़ी देशों की सामूहिक सुरक्षा नीति का समर्थन करना चाहिये क्योंकि खाड़ी देशों में शांति व स्थायित्व निश्चित रूप से भारत के लिये लाभकारी साबित होगा।
भारत को खाड़ी देशों के साथ तालमेल के लिये नए चालकों को खोजने की आवश्यकता है। यह खोज स्वास्थ्य सेवा में सहयोग के साथ शुरू हो सकती है और धीरे-धीरे दवा अनुसंधान और उत्पादन, पेट्रोकेमिकल, भारत में बुनियादी ढाँचे के निर्माण और तीसरे देशों में कृषि, शिक्षा और कौशल के साथ-साथ अरब सागर में निर्मित द्विपक्षीय मुक्त क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों की ओर बढ़ सकती है।
खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के हस्तक्षेप को रोकने के लिये आवश्यक है कि खाड़ी देशों को सामूहिक सुरक्षा की नीति पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिये।
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फारस की खाड़ी, पश्चिम एशिया में हिंद महासागर का एक विस्तार है, जो ईरान और अरब प्रायद्वीप के बीच फैला हुआ है। संयुक्त राष्ट्र इस जल स्रोत को फारस की खाड़ी (Persian Gulf) के रूप में परिभाषित करता है। इस जल स्रोत के चारों ओर की भूमि को आठ खाड़ी देशों यथा- बहरीन, ईरान, इराक, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के द्वारा संयुक्त रूप से साझा किया जाता है। इन खाड़ी देशों का कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के प्रमुख उत्पादक होने के कारण उनके बीच आर्थिक हितों की समानता भी है, और इस तरह खाड़ी देश वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। फारस की खाड़ी के कारण इस क्षेत्र का भू-राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है।
इस क्षेत्र में शक्ति के दो केंद्र हैं। जहाँ एक ओर शिया मुस्लिम बाहुल्य ईरान है तो वहीं दूसरी ओर सुन्नी मुस्लिम बाहुल्य सऊदी अरब है। पश्चिम एशिया में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिये दोनों शक्तियाँ कई बार एक-दूसरे के आमने-सामने आ चुकी हैं। इतना ही नहीं फारस की खाड़ी में तैनात युद्धपोतों और मालवाहक पोतों पर संयुक्त राज्य अमेरिका व ईरान द्वारा एक-दूसरे पर हमला करने की धमकी से इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। ऐसी स्थिति में शांति बहाल करने हेतु इस क्षेत्र में सामूहिक सुरक्षा की नीति को अपनाने पर बल दिया जा रहा है, जिसमें खाड़ी सहयोग परिषद की प्रमुख भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है।
पृठभूमि
वर्ष 1970 से आठ दशक पूर्व तक इस जल स्रोत का नियंत्रण और पर्यवेक्षण ब्रिटिश शासन के द्वारा किया जाता था। उस दौरान इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की आपसी प्रतिस्पर्धा कम ही देखने को मिलती थी।
1970 के दशक के अंतिम दौर में इस क्षेत्र में तेल के भंडार पाए जाने के बाद कई क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरने लगी और यह क्षेत्र आपसी प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बन गया।
इस क्षेत्र में सऊदी अरब व ईरान के बीच चल रहे तनाव के कारण वर्ष 1975 में निक्सन और कार्टर डॉक्ट्रिन (The Nixon and the Carter Doctrines) के द्वारा एक सामूहिक सुरक्षा नीति का प्रस्ताव रखा गया, परंतु इस प्रस्ताव को इराक की बाथ पार्टी (Baath Party) के द्वारा निरस्त कर दिया गया।
ईरान-इराक युद्ध के बाद शांति स्थापित करने के लिये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nation Security Council) ने वर्ष 1987 में प्रस्ताव 598 के द्वारा इस क्षेत्र में शांति और स्थायित्व स्थापित करने का प्रयास किया।
सऊदी अरब और ईरान की स्थिति
ऐसा ही एक क्षेत्रीय संघर्ष सऊदी अरब और ईरान के बीच चल रहा है। वर्ष 1979 की ईरानी क्रांति के समय से ही शिया प्रभुत्व वाले ईरान तथा सुन्नी प्रभुत्व वाले सऊदी अरब में एक दूसरे के प्रति शत्रुता की स्थिति बनी हुई है।
पिछले चार दशकों में इन दोनों देशों के बीच तनाव में लगातार वृद्धि ही हुई है। इन दोनों देशों के सहयोगी राष्ट्रों का विशिष्ट समूह है और इन राष्ट्रों के एक दूसरे के साथ प्रतिकूल संबंध भी हैं। इसके कारण पश्चिम एशिया की भू-राजनीति काफी अस्थिर है।
भारत के लिये अच्छी बात यह है कि वह इस क्षेत्र में एक ‘निष्क्रिय खिलाड़ी’ बनकर दोनों देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने में सक्षम रहा है। ऐसा इसलिये है क्योंकि खुले तौर पर किसी एक देश का पक्ष लेना इसके राष्ट्रीय हित के लिये बेहद हानिकारक होगा।
तेल पर केंद्रित पश्चिम एशिया का भूगोल
अकूत तेल के भंडार मिलने के बाद पिछली एक सदी से पश्चिम एशिया का भूगोल, राजनीति, सुरक्षा और स्थिरता तेल पर ही केंद्रित रही है। तेल के मुद्दे पर ही राष्ट्रों का निर्माण हुआ, सत्ता परिवर्तन हुए और युद्ध लड़े गए।
प्रथम विश्व युद्ध से लेकर द्वितीय खाड़ी युद्ध तक का इतिहास पश्चिमी शक्तियों द्वारा पश्चिम एशिया क्षेत्र में तेल तक पहुँच को सुरक्षित रखने पर ही केंद्रित रहा है।
पिछले एक दशक में जब से ऊर्जा के मामले में अमेरिका की आत्मनिर्भरता बढ़ी है, तब से अमेरिकी नीति केवल तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के बजाय आपूर्ति के स्रोत पर नियंत्रण की दिशा में काम करने लगी है।
पश्चिम एशिया क्षेत्र में फिर से उत्पन्न तनाव ईरान-प्रायोजित आतंकवाद पर केंद्रित नहीं है, बल्कि इसका मंतव्य ईरान द्वारा उत्पादित तेल पर नियंत्रण करना है।
तेल के मामले में अमेरिका की आत्मनिर्भरता
ऊर्जा बाज़ार में संरचनात्मक परिवर्तन ने विशेष रूप से आयातित तेल पर अमेरिकी निर्भरता और सामान्य रूप से हाइड्रोकार्बन पर पश्चिमी निर्भरता में कमी की है।
ट्रांस-अटलांटिक देश (विशेष रूप से अमेरिका) अब खाड़ी के तेल पर निर्भर नहीं रह गए हैं।
दूसरी तरफ, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत सहित अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाएँ अब भी खाड़ी के तेल उत्पादन पर ही निर्भर हैं।
खाड़ी देशों में अशांति व अस्थिरता अमेरिका की तेल कंपनियों के लाभदायक स्थिति प्रदान करता है।
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राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की स्थापना वर्ष 2006 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों में संशोधन करके की गई। प्राधिकरण की पहली बैठक नवंबर 2006 में हुई थी।
यह राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के प्रयासों का ही परिणाम है कि देश में विलुप्त होते बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
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वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी स्पष्टीकरण (Clarification) के अनुसार, बीते कुछ वर्षों में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority-NTCA) के प्रयासों के फलस्वरूप देश में बाघ संरक्षण की दिशा में वांछित कार्य किया गया है।
प्रमुख बिंदु
मंत्रालय के अनुसार, यह सरकार के प्रयासों का ही परिणाम है कि देश में बीते कुछ वर्षों में बाघों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, जो वर्ष 2006, वर्ष 2010, वर्ष 2014 और वर्ष 2018 में किये गए अखिल भारतीय बाघ अनुमान (All India Tiger Estimation) के निष्कर्षों से स्पष्ट है।
यह सभी परिणाम बाघों की 6 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर (Growth Rate) दर्शाते हैं, जो कि भारतीय संदर्भ में विभिन्न कारणों से होने वाले बाघों के नुकसान की कमी को पूर्ण करने के लिये पर्याप्त है।
वर्ष 2012 से वर्ष 2019 की अवधि के मध्य आँकड़ों पर गौर किया जाए तो ज्ञात होता है कि देश में प्रतिवर्ष बाघों की औसतन मृत्यु दर लगभग 94 रही है।
भारत में बाघों की स्थिति
अखिल भारतीय बाघ अनुमान, 2018 के अनुसार, वर्ष 2018 में भारत में बाघों की संख्या बढ़कर 2,967 हो गई थी। यह भारत के लिये एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, क्योंकि भारत ने बाघों की संख्या को दोगुना करने के लक्ष्य को चार वर्ष पूर्व ही प्राप्त कर लिया है।
सर्वेक्षण के अनुसार, देश में मध्य प्रदेश और कर्नाटक में बाघों की संख्या सबसे अधिक है। हालाँकि, बाघों की संख्या में हुई वृद्धि उन सभी 18 राज्यों में एक समान नहीं हुई है जहाँ बाघ पाए जाते हैं।
आँकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या सबसे अधिक 526 पाई गई, इसके बाद कर्नाटक में 524 और उत्तराखंड में इनकी संख्या 442 थी।
वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2019 में देश भर में बाघों की मृत्यु के 85 प्रत्यक्ष मामले सामने आए और 11 मामलों में मरने की पुष्टि उनके अंगों के मिलने के आधार पर की गई, जबकि इससे पहले वर्ष 2018 के दौरान बाघों की मृत्यु के 100 मामले, वर्ष 2017 में 115 मामले और वर्ष 2016 में बाघों की मृत्यु के 122 मामले सामने आए थे।
अखिल भारतीय बाघ अनुमान, 2018 के अनुसार, तीन टाइगर रिज़र्व बक्सा (पश्चिम बंगाल), डंपा (मिज़ोरम) और पलामू (झारखंड) में बाघों के अनुपस्थिति दर्ज की गई।
भारत में बाघ जनगणना
देश में प्रत्येक 4 वर्ष में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा पूरे भारत में बाघों की जनगणना की जाती है।
इस प्रकार का आयोजन सर्वप्रथम वर्ष 2006 में किया गया था।
बाघ संरक्षण के समक्ष चुनौतियाँ:
अवैध शिकार: उल्लेखनीय है कि अवैध बाज़ारों में बाघ के शरीर के प्रत्येक हिस्से का कारोबार होता है। बाघों का शिकार मुख्यतः दो कारणों से किया जाता है: सबसे पहला उनके कथित खतरे को देखते हुए और दूसरा मौद्रिक लाभ कमाने के उद्देश्य से। ज्ञातव्य है कि ऐतिहासिक रूप से राजा-महाराजा और धनी लोग अपना बाहुबल प्रकट करने के लिये भी शिकार करते थे। एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 1875 और वर्ष 1925 के मध्य भारत में कुल 80,000 बाघ मारे गए थे।
प्राकृतिक वास का नुकसान: मौजूदा दौर में बाघों की आबादी के लिये सबसे मुख्य खतरा उनके प्राकृतिक निवास स्थान का नुकसान है। एक अनुमान के अनुसार, विश्व भर के बाघों ने अपने प्राकृतिक निवास स्थान का तकरीबन 93 प्रतिशत हिस्सा खो दिया है। इन निवास स्थानों को अधिकांशतः मानव गतिविधियों द्वारा नष्ट किया गया है। वनों और घास के मैदानों को कृषि ज़रूरतों के लिये परिवर्तित किया जा रहा है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष: बाघों के प्राकृतिक निवास स्थान और शिकार स्थान छोटे होने के कारण अधिकांश बाघ पशुधन को मारने के लिये मज़बूर है और जब वे ऐसा करते हैं तो किसान अक्सर जवाबी कार्रवाई करते हैं और बाघों को मार देते हैं।
सरकार के प्रयास- प्रोजेक्ट टाइगर
शिकार और प्राकृतिक निवास स्थान के नुकसान के कारण 1970 के दशक में भारत में 2,000 से भी कम बाघ शेष बचे थे। वर्ष 1973 में भारत सरकार ने बाघ को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित किया और प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger) नाम से एक संरक्षण योजना शुरू की जिसके तहत बाघों के शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
'प्रोजेक्ट टाइगर' पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक सतत् केंद्र प्रायोजित योजना है जो बाघ संरक्षण के लिये केंद्रीय सहायता प्रदान करती है।
वर्तमान में 'प्रोजेक्ट टाइगर' के तहत संरक्षित टाइगर रिज़र्व की संख्या 50 हो गई है, हालाँकि ये टाइगर रिज़र्व आकार में अपेक्षाकृत काफी छोटे हैं।
राष्ट्रीय संरक्षण प्राधिकरण
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) है।
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जनजातीय क्षेत्रों सहित कहीं भी शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को अपने परिवेश और समाज की समझ प्रदान करना होना चाहिये, ताकि उनमें योग्यता का विकास किया जाए, ताकि वे अपने स्थानीय समाज में अथवा जिनके पास इच्छा व क्षमता हो, राष्ट्रीय रोज़गार बाज़ार में आजीविका अर्जित कर सकें।
पाठ्यक्रम में स्थानीय संस्कृति, लोक कथाओं और इतिहास को शामिल करने से जनजातीय बच्चों के आत्मविश्वास का निर्माण करने और उनके जीवन में शिक्षा की प्रासंगिकता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से जनजातीय समुदाय के शैक्षणिक संस्थानों में समावेश को संस्थागत रूप देने की आवश्यकता है।
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ओडिशा सरकार जनजातीय जिलों में ‘मेगा शैक्षणिक परिसरों’ (Mega Educational Complexes) का निर्माण करने की योजना बना रही है, जहाँ छात्रों को शैक्षणिक (Academi) तथा खेल कौशल (Sporting Skills) दोनों से संबंधित शिक्षा प्रदान की जाएगी।
प्रमुख बिंदु:
‘मेगा शैक्षणिक परिसरों’ की स्थापना उड़ीसा के जनजातीय बहुल ज़िलों जैसे- क्योंझर, सुंदरगढ़ और मयूरभंज में की जाएगी। इन ज़िलों में संथाल और भुइया प्रमुख जनजातीय समूह हैं।
एक निजी शैक्षिक समूह द्वारा पहले से ही उड़ीसा के विभिन्न ज़िलों में इस प्रकार के शैक्षणिक परिसर स्थापित किये जा चुके हैं।
मेगा शैक्षणिक परिसर (Mega Educational Complex):
प्रत्येक शैक्षणिक परिसर में 3,000 जनजातीय छात्रों की शिक्षा की व्यवस्था होगी। परिसर में कक्षा 1 से 12 तक के आदिवासी छात्रों के लिये शैक्षणिक के साथ-साथ खेल-कूदों में कौशल सुधार के लिये भी अत्याधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध होंगी।
इन परिसरों में 'कौशल विकास केंद्रों' को भी आवश्यक रूप से स्थापित किया जाएगा।
इन मेगा शैक्षणिक परिसरों की स्थापना के लिये निधि 'ओडिशा खनिज असर क्षेत्र विकास निगम (Odisha Mineral Bearing Areas Development Corporation OMBADC) प्रदान करेगा।
OMBADC की स्थापना उड़ीसा के खनिज समृद्ध ज़िलों के विकास के लिये की गई। यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि अधिकांश खनिज समृद्ध ज़िले, आदिवासी बहुल भी हैं।
उड़ीसा में जनजातीय समुदायों की स्थिति:
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की कुल जनजातीय आबादी का लगभग 9.17% उड़ीसा में है। उड़ीसा की कुल जनसंख्या में जनजातीय आबादी का प्रतिशत लगभग 22.8 है।
उड़ीसा में 62 जनजातीय समुदाय पाए जाते हैं अर्थात भारत में सबसे अधिक जनजातीय विविधता उड़ीसा में है। भारत में जनजातियों की सर्वाधिक जनसंख्या के अनुसार राज्यों का विश्लेषण किया जाए तो मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र के बाद उड़ीसा तीसरे स्थान पर है।
भारत के 75 ‘विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों’ (Particularly Vulnerable Tribal Groups) में से 13 उड़ीसा में निवास करती हैं।
ओडिशा राज्य के घोषित समस्त पी.वी.टी.जी. की सूची में 1. चुकटिया भुंजिया 2. बिरहोर 3. बोंडो 4. दिदायी 5. डोंगरिया कोंध 6. जुआंग 7. खरिया 8. कुटिया कंधा 9. लांजिया सौरा 10. लोढ़ा 11. मनकीडिया 12. पौड़ी भुइया 13. सुरा शामिल हैं।
उड़ीसा के क्योंझर ज़िले में व्यापक लौह खनन का कार्य किया जाता है। क्योंझर ज़िले में, ओडिशा के कुल लौह अयस्क भंडार का 70% से अधिक पाया जाता है। इसके अलावा कोरापुट और मयूरभंज ज़िलों में भी व्यापक खनन कार्य किया जाता हैं।
जनजातीय साक्षरता की स्थिति व कारण:
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में कुल आबादी में जनजातीय समुदाय की आबादी 8.6% हैं तथा जनजातीय समुदाय की साक्षरता दर 58.96% है।
शिक्षा का माध्यम:
जनजातीय समुदायों को शिक्षा प्रदान करने में भाषा सबसे बड़ी बाधा रही है। अधिकतर स्कूली पाठ्यक्रम राज्य या केंद्र की आधिकारिक भाषाओं में डिज़ाइन किये गए हैं जो जनजातीय समुदाय के अनुकूल नहीं हैं।
माता-पिता का दृष्टिकोण:
जनजातीय समुदायों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण लोग अपने बच्चों को श्रमिक कार्यों तथा खनन कार्यों में लगाने को वरीयता देते हैं। चूंकि शिक्षा से कोई तात्कालिक आर्थिक लाभ नहीं मिलता है, अत: लोग अपने बच्चों को पारिश्रमिक रोज़गार में संलग्न करना पसंद करते हैं।
अवसंरचना की कमी:
जनजातीय क्षेत्रों में स्थित अधिकांश विद्यालयों में न्यूनतम आवश्यक अवसंरचनाओं की भी कमी है। विशेषकर छात्राओं के लिये 'सैनिटरी सुविधाओं' की कमी है।
सरकार द्वारा किये गए प्रयास:
एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय (Eklavya Model Residential Schools- EMRSs):
वर्ष 2018 में 50 प्रतिशत से ज़्यादा जनजातीय आबादी एवं 20,000 जनजातीय जनसंख्या वाले प्रत्येक प्रखंड (block) में ‘एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय’ अथवा एकलव्य मॉडल रेज़िडेंशियल स्कूल खोलने को सैद्धांतिक मंज़ूरी प्रदान की थी।
163 जनजातीय बहुल ज़िलों में प्रति 5 करोड़ रुपए लागत वाली खेल सुविधाएँ (Sports Facilities) स्थापित की जाएंगी, इसमें से प्रत्येक का निर्माण वर्ष 2022 तक पूरा कर लिया जाएगा।
राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप योजना (Rajiv Gandhi National Fellowship Scheme -RGNF):
RNGF को वर्ष 2005-2006 में जनजातीय समुदाय से संबंधित छात्रों को उच्च शिक्षा के लिये प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया था।
जनजातीय क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र (Vocational Training Center in Tribal Areas):
जनजातीय क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र को जनजातीय समुदाय के छात्रों के कौशल को उनकी योग्यता तथा वर्तमान बाज़ार के रुझान के आधार पर विकसित करने के उद्देश्य के आधार पर प्रारंभ किया गया था।
आगे की राह:
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ऑनलाइन नैमिषा-2020
ONLINE NAIMISHA-2020
हाल ही में राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय (National Gallery of Modern Art- NGMA) ने 8 जून से 3 जुलाई, 2020 तक ग्रीष्मकालीन कला कार्यक्रम ‘ऑनलाइन नैमिषा-2020’ (ONLINE NAIMISHA-2020) का आयोजन करने की घोषणा की।
प्रमुख बिंदु:
लगभग महीने भर चलने वाला यह ऑनलाइन कार्यक्रम नई दिल्ली स्थित NGMA की एक पहल है जिसके अंतर्गत प्रतिभागियों को कलाकारों के साथ अभ्यास करने एवं उनसे सीखने का अवसर प्राप्त होता है।
इस कार्यक्रम में 8 जून से 3 जुलाई, 2020 तक चार कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा। इन कार्यशालाओं के निम्नलिखित शीर्षक हैं:
चित्रकला कार्यशाला
मूर्तिकला कार्यशाला
प्रिंटमेकिंग
इंद्रजाल- द मैजिक ऑफ आर्ट (स्वतंत्रता को समझने के लिये अंतःविषय रचनात्मक कार्यशाला)
राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय
(National Gallery of Modern Art- NGMA):
राष्ट्रीय कला संग्रहालय बनाने का विचार सर्वप्रथम वर्ष 1949 में अंकुरित एवं प्रस्फुटित हुआ था, जिसके पश्चात् 29 मार्च, 1954 को प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गणमान्य कलाकारों एवं कला प्रेमियों की उपस्थिति में देश के उपराष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकष्ण ने औपचारिक रूप से NMGA की स्थापना की।
राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय के मुख्य लक्ष्य एवं उद्देश्यों में वर्ष 1850 से अब तक की आधुनिक कलाकृतियों (आधुनिक कलात्मक वस्तुओं) को प्राप्त करना एवं उनका संरक्षण करना, देश और विदेशों में विशिष्ट प्रदर्शनियों का आयोजन, कला से संबंधित विभिन्न क्षेत्रों में उच्च शिक्षा को प्रोत्साहन देना शामिल है।
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पैंगोलिन
चर्चा में क्यों?
चीन ने पैंगोलिन के संरक्षण के स्तर को बढ़ा दिया है। उसने इस प्राणी को प्रथम श्रेणी के संरक्षित जानवरों में शामिल कर दिया है। इस श्रेणी में पांडा जैसे उन जानवरों को रखा गया है, जो विलुप्त होने के कगार पर है। यह माना गया कि पैंगोलिन से ही कोरोना वायरस इंसानों में पहुंचा।
चीन ने इस सप्ताहांत पैंगोलिन की सभी प्रजातियों की द्वितीय श्रेणी को बढ़ाकर प्रथम कर दिया। प्रथम श्रेणी में संरक्षित जानवरों को रखा जाता है। इनके शिकार पर प्रतिबंध होता है।
पृष्ठभूमि
चीन में पैंगोलिन के मांस का भी सेवन किया जाता है। पारंपरिक चीनी दवाओं में भी आमतौर पर इस स्तनधारी प्राणी का इस्तेमाल होता है। इसके चलते बड़े पैमाने पर पैंगोलिन का शिकार किया जाता है।
कोरोना के शुरुआती दौर में संदेह जताया गया था कि सांप और चमगादड़ खाने से यह खतरनाक वायरस फैला। बाद में चीनी वैज्ञानिकों ने माना था कि पैंगोलिन भी कोरोना वायरस का वाहक हो सकता है। यह भी संदेह जताया जाता है कि चीन के वुहान शहर के सीफूड मार्केट से कोरोना वायरस का प्रसार हुआ था।
पैंगोलिन के बारे में
पैंगोलिन का जीवन चींटी खाकर गुजरता है। यह पृथ्वी पर स्तनधारी और सांप-छिपकली जैसे जानवरों के बीच की कड़ी है। ये एशिया और अफ्रीका के कई देशों में पाए जाते हैं। इनकी खाल के ऊपर ब्लेडनुमा प्लेट्स की एक परत होती है। ये इतनी मजबूत होती है कि इस पर शेर जैसे जानवर के दांतों का भी असर नहीं होता है।
क्यों खतरें मेंपैंगोलिन का अस्तित्व?
पैंगोलिन एक ऐसा जानवर है जिसकी दुनिया में सबसे अधिक तस्करी होती है। पैंगोलिन के मांस को चीन और वियतनाम समेत कुछ दूसरे देशों में बेहद चाव से खाया जाता है, इसका दूसरा उपयोग दवाओं के निर्माण में भी होता है। खासतौर पर चीन की पारंपरिक दवाओं के निर्माण में इसका ज्यादा इस्तेमाल होता है। बीते एक दशक के दौरान दस लाख से अधिक पैंगोलिन की तस्करी की जा चुकी है।
यही वजह है कि ये दुनिया का सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाला जानवर बन गया है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर के मुताबिक दुनियाभर के वन्य जीवों की अवैध तस्करी में अकेले 20 फीसद का योगदान पैंगोलिन का ही है। चीन और वियतनाम में इसका मांस खाना अमीर होने की निशानी है।
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8 जून, 2009 से प्रत्येक वर्ष विश्व महासागर दिवस मनाया जा रहा है, जिसका उदेश्य महासागरों के महत्त्व और इनकी वजह से आने वाली चुनौतियों के बारे में लोगों के बीच जागरूकता पैदा करना है और साथ ही महासागरों से जुड़े विशेष पहलुओं जेसे जैव-विविधता, खाद्य सुरक्षा, पारिस्थितिक संतुलन, जल संसाधनों का बेहिसाब उपयोग आदि को भी जन समुदायों के बीच उजागर करना है.
मुख्य बिन्दु
वर्ष 1992 में रियो डी जनेरियो में हुए ‘पृथ्वी ग्रह’ नामक सम्मेलन में इस दिवस को मनाने का प्रस्ताव रखा गया था और दिसंबर, 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा द्वारा इस दिवस को मनाये जाने की आधिकारिक घोषणा के बाद भारत में 8 जून 2009 से यह दिवस प्रत्येक वर्ष मनाया जाने लगा. ‘विश्व महासागर दिवस’ पर हर साल वैश्विक स्तर पर कई कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते है, जिनसें महासागरों के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी मिलती है. भोजन के लिए कच्ची सामग्रियों और दवाओं के निर्माण में समुद्रों की विशेष भूमिका है. महासागरों में आने वाले अपशिष्ट पदार्थों जैसे मुख्य रूप से प्लास्टिक प्रदूषण के कारण महासागर धीरे-धीरे गंदे होते जा रहे हैं. जिस कारण समुद्र में रहने वाले जीवों के स्वास्थ्य पर भी गलत असर पड़ता है, समुद्री जीव अपशिष्ट पदार्थों को गलती से अपना भोजन समझकर उनका भक्षण कर लेते है, और इसके परिणाम स्वरूप उन्हें इससे होने वाली भयानक बीमारियों का सामना करना पड़ जाता है.
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येल विश्वविद्यालय ने हाल ही में द्विवार्षिक पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक जारी किया। भारत ने 180 देशों में से 168वीं रैंक हासिल की । 2018 में, भारत ने 100 में से 27.6 स्कोर किया और 177 वीं रैंक हासिल की थी।
मुख्य बिंदु
रैंकिंग बनाने के लिए लगभग 32 संकेतकों पर विचार किया गया है। साथ ही, सूचकांक ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरणीय प्रदर्शन पर 10 साल का अवलोकन दिया है।
रिपोर्ट की मुख्य बातें
इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत को अपने स्थिरता प्रयासों को दोगुना करने की आवश्यकता है। साथ ही, भारत को वायु और जल की गुणवत्ता, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के लिए अत्यंत प्राथमिकता के साथ स्थिरता के मुद्दों पर व्यापक रूप से ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। अफगानिस्तान को छोड़कर सभी दक्षिण एशियाई देश भारत से आगे है। साथ ही, सतत विकास लक्ष्यों के मामले में भारत की रैंक भी कम है।
जलवायु परिवर्तन
भारत जलवायु परिवर्तन के मामले में 106वें स्थान पर और दक्षिण एशियाई क्षेत्र में दूसरे स्थान पर है। जलवायु परिवर्तन में एक देश के प्रदर्शन का मूल्यांकन प्रति व्यक्ति ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन, ग्रीन हाउस गैस तीव्रता विकास दर, कार्बन डाइऑक्साइड में वृद्धि दर, उत्सर्जन वृद्धि दर, 4 ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि दर पर मूल्यांकन किया गया है।
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आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने पहला ऑनलाइन कचरा विनिमय कार्यक्रम शुरू किया। यह कार्यक्रम जहरीले कचरे के सुरक्षित निपटान और जहरीले कचरे के पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया है।
मुख्य बिंदु
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ऑनलाइन कचरा विनिमय कार्यक्रम शुरू किया गया। यह प्लेटफॉर्म ट्रैकिंग, ऑडिट, कचरे की जांच करना और कचरे के उचित उपयोग को प्रोत्साहित करेगा। यह प्लेटफॉर्म 6R के सिद्धांतों जैसे कि री-यूज़, रीसायकल, रिड्यूस, रिडिजाइन, रीफर्बिश और रीमेनूफेक्चर का पालन करेगा।
इस कार्यक्रम के शुभारंभ के दौरान, यह घोषणा की गई कि आंध्र प्रदेश पर्यावरण सुधार अधिनियम, 2020 जल्द ही अधिनियमित किया जाएगा।
APEMC
आंध्र प्रदेश पर्यावरण प्रबंधन निगम या APEMC की स्थापना औद्योगिक कचरे को संभालने के लिए की गई थी। यह निगम ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी लेगा।
