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राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान National Institute of Pharmaceutical Education and Research हाल ही में देशभर के विभिन्न ‘राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान’ (National Institute of Pharmaceutical Education and Research- NIPER) ने COVID-19 से संबंधित विभिन्न शोधकार्य संपन्न किये हैं। प्रमुख बिंदु: ‘राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान’ (National Institute of Pharmaceutical Education and Research- NIPER) द्वारा COVID-19 से संबंधित बड़ी संख्या में बहुआयामी शोध प्रस्ताव अनुमोदन के लिये संबंधित एजेंसियों को प्रस्तुत किये गए हैं। इन प्रस्तावों के प्रमुख विषयों में निम्नलिखित शामिल हैं- NIPER, मोहाली द्वारा एंटीवायरल एजेंट को लक्षित करने वाले प्रोटीज का डिज़ाइन। NIPER, (मोहाली एवं रायबरेली) द्वारा ‘खाद्य एवं औषधि प्रशासन’ (Food and Drug Administration- FDA) से अनुमोदित दवा-डेटाबेस का उपयोग करके कम्प्यूटेशनल रूप से निर्देशित दवा-पुनर्प्रयोजन। NIPER, मोहाली द्वारा रेमेड्सविर के ड्रग रुपांतरण के लिये प्रो-ड्रग का विश्लेषण। NIPER, हैदराबाद द्वारा बीमार रोगियों के लिये सहायक चिकित्सा आधारित नाक स्प्रे (Nasal Spray)। NIPER, हैदराबाद द्वारा COVID-19 के मरीज़ों के लिये क्वांटम-डॉट एवं चालकता आधारित बायो-सेंसर विकसित करना। COVID-19 के कारण पड़ने वाले दिल के दौरे को नियंत्रित करने के लिये एक विशेष अध्ययन। इसके साथ ही NIPER, रायबरेली ने पारंपरिक रूप से उपयोग में लाई जाने वाली जड़ी बूटियों का उपयोग करके ‘नए इम्युनो-बूस्टर फॉर्मुलेशन’ के विकास में आईआईटी एवं अन्य औद्योगिक साझेदार के साथ एक मेगा परियोजना शुरू की है। NIPER, कोलकाता CSIR-CECRI एवं एक निजी निर्माता के सहयोग से कम लागत वाला एक स्वदेशी एवं प्रभावी आईसीयू वेंटीलेटर तैयार करने पर काम कर रहा है। राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (National Institute of Pharmaceutical Education and Research- NIPER): NIPER, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय (Ministry of Chemicals and Fertilizers) के फार्मास्यूटिकल्स विभाग के अधीन राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान है। ऐसे सात संस्थान (अहमदाबाद, हैदराबाद, हाजीपुर, कोलकाता, गुवाहाटी, मोहाली एवं रायबरेली) में कार्य कर रहे हैं। NIPER, फार्मास्युटिकल साइंसेज़ में पहला राष्ट्रीय स्तर का संस्थान है, जिसका उद्देश्य फार्मास्युटिकल साइंस में उन्नत अध्ययन एवं अनुसंधान के लिये उत्कृष्टता का केंद्र बनना है। इन संस्थानों में न केवल देश के भीतर बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया, दक्षिण एशिया एवं अफ्रीकी देशों में भी औषधि विज्ञान एवं संबंधित क्षेत्रों में नेतृत्त्व प्रदान करने की क्षमता है। NIPER, ‘एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज़’ एवं ‘एसोसिएशन ऑफ कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटीज़’ का सदस्य है।

सीओबीएएस 6800 परीक्षण मशीन COBAS 6800 Testing Machine केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री (Union Minister of Health & Family Welfare) ने 14 मई, 2020 को National Centre for Disease Control ) का दौरा किया और ‘सीओबीएएस 6800 परीक्षण मशीन’ (COBAS 6800 Testing Machine) राष्ट्र को समर्पित की। प्रमुख बिंदु: यह पहली ऐसी परीक्षण मशीन है जिसे केंद्र सरकार द्वारा COVID-19 मामलों के परीक्षण के लिये खरीदा गया है और इसे राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र में स्थापित किया गया है। ‘सीओबीएएस 6800 परीक्षण मशीन’ 24 घंटों में लगभग 1200 नमूनों का सटीक परीक्षण कर सकेगी। यह परीक्षण प्रक्रिया में कमी लाने के साथ जाँच क्षमता में व्यापक वृद्धि करेगी। ‘सीओबीएएस 6800’ में रोबोटिक्स तकनीकी का प्रयोग किया गया है जो संदूषण की संभावना को कम करता है तथा स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं में संक्रमण के जोखिम को न्यूनतम करता है क्योंकि इसे सीमित मानव हस्तक्षेपों के साथ दूर से संचालित किया जा सकता है।चूँकि मशीन को परीक्षण के लिये न्यूनतम ‘बायोसेफ्टी लेवल टू प्लस’ (BSL2+) नियंत्रण स्तर की आवश्यकता होती है इसलिये इसे किसी भी विशेष सुरक्षा के साथ ही प्रतिस्थापित किया जा सकता है। ‘COBAS 6800’ अन्य रोगजनकों जैसे- वायरल हेपेटाइटिस B&C, HIV, MTB (रिफैम्पिसिन एवं आइसोनियाज़ाइड रेसिस्टेंस), पैपिलोमा, CMV, क्लैमाइडिया, नैसेरेईया आदि का पता भी लगा सकती है।

#होमटीमहीरो आनलाइन चैलेंज खेल पोशाक बनाने वाली दिग्गज कंपनी एडिडास ने गुरुवार को #होमटीमहीरो चैलेंज शुरू किया जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के कोविड-19 कोष में मदद और एकजुट होने के इरादे से खिलाड़ियों के लिए एक आभासी खेल प्रतियोगिता है।यह प्रतियोगिता दुनिया भर में 29 मई से सात जून तक चलेगी और एडिडास प्रत्येक एक घंटे की ट्रैक की गई गतिविधि के लिए डब्ल्यूएचओ के कोविड-19 कोष में एक डॉलर देगा। कंपनी को 10 लाख घंटे का लक्ष्य हासिल करने की उम्मीद है। इस चैलेंज में ग्रेमिन, ज्विफ्ट, पोलर और सुंटो जैसी गतिविधि ट्रैक करने वाली कई ऐप सहयोग कर रही हैं। क्रिकेटर रोहित शर्मा, धाविका हिमा दास, मुक्केबाज निकहत जरीन और सिमरनजीत कौर जैसे भारत के शीर्ष खिलाड़ियों ने भी इस चैलेंज के लिए वर्कआउट चुने हैं।

मैलवेयर “इवन बॉट” भारतीय कंप्यूटर प्रतिक्रिया आपदा दल (सीईआरटी-आईएन) ने ताजा परामर्श जारी कर बताया है कि व्यक्तिगत सूचनाएं चुराने वाले “इवेंटबॉट” नामक मैलवेयर से भारत में एंड्रायड फोन का प्रयोग करने वाले प्रभावित हो सकते हैं। सीईआरटी-आईएन ने चेतावनी जारी करते हुए कहा कि यह ट्रोजन वायरस अवैध रूप से सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने वाली वेबसाइट के माध्यम से माइक्रोसॉफ्ट वर्ड, अडोब फ्लैश और अन्य वैध सॉफ्टवेयर का रूप धर कर फोन में घुस सकता है। क्या होता है ट्रोजन? ट्रोजन एक प्रकार का वायरस या मैलवेयर होता है जो चुपके से कंप्यूटर या मोबाइल के ऑपरेटिंग सिस्टम पर हमला करता है और पीड़ित जान भी नहीं पाता। कैसे कार्य करता है “इवेंटबॉट? सीईआरटी-आईएन की ओर से जारी परामर्श में कहा गया, “इवेंटबॉट नामक एक नया एंड्रायड मोबाइल मैलवेयर फैल रहा है। यह मोबाइल बैंकिंग ट्रोजन है जो सूचनाएं चुराता है। यह एंड्रायड फोन के वित्तीय एप्प से उपभोक्ता की जानकारी चुरा लेता है, एसएमएस संदेश पढ़ लेता है।” क्या है बचाव के तरीके? परामर्श में कहा गया कि “इवेंटबॉट” दो सौ वित्तीय एप्प को निशाना बना सकता है जिनमें बैंकिंग एप्प, पैसा भेजने वाली सेवाएं इत्यादि शामिल हैं। सीईआरटीआईएन ने कहा कि यह वायरस पेपाल बिजनेस, रेवोलुत, बार्कलेज, युनिक्रेडिट, कैपिटल वन यूके, एचएसबीसी यूके, ट्रांसफरवाइज, कॉइनबेस, पेसेफकार्ड इत्यादि को निशाना बना सकता है। इवेंटबॉट अभी गूगल प्लेस्टोर पर नहीं आया है लेकिन यह किसी वास्तविक सॉफ्टवेयर का रूप धर कर मोबाइल फोन में घुस सकता है। साइबर सुरक्षा एजेंसी ने वायरस से बचने के उपाय भी बताए हैं। परामर्श के अनुसार अज्ञात और अविश्वसनीय स्रोत से मोबाइल के एप्प डाउनलोड न करें, एंटी वायरस का प्रयोग करें और गूगल प्लेस्टोर से डाउनलोड करने के पहले भी सॉफ्टवेयर की जानकारी अच्छी तरह पढ़ लें। क्या है संघीय साइबर एजेंसी सीईआरटी-इन CERT-In साइबर सुरक्षा के लिए एक नोडल एजेंसी है, यह इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन सूचना व प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत कार्य करती है। इसकी स्थापना वर्ष 2004 में की गयी थी। इसका कार्य हैकिंग से भारतीय साइबरस्पेस व सॉफ्टवेर इन्फ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा करना है। यह साइबर हमलों के मामले में त्वरित कारवाई करता है। यह देश में सूचना व प्रौद्योगिकी क्षेत्र में सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए

रेहड़ी, ठेले वालों को की स्पेशल क्रेडिट फैसिलिटी कोरोना लॉकडाउन के कारण रेहड़ी, पटरी और ठेला लगाने वालों की आजीविका पूरी तरह ठप हो गई है। ऐसे लोगों को राहत देने के लिए सरकार ने 5,000 करोड़ रुपए की स्पेशल क्रेडिट फैसिलिटी दी है। इससे इन लोगों को फिर से अपना कामकाज शुरू करने के लिए 10 हजार रुपए तक का लोन मिलेगा। सरकार का दावा है कि इससे 50 लाख रेहड़ी, पटरी और ठेला लगाने वालों को फायदा होगा। पृष्ठभूमि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था को कोरोना की मार से उबारने के लिए 20 लाख करोड़ रुपए के महापैकेज की घोषणा की थी। इसी के तहत वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज रेहड़ी, पटरी और ठेला लगाने वालों के लिए 5,000 करोड़ रुपए की स्पेशल क्रेडिट फैसिलिटी की घोषणा की। क्या होगी विशेषता? सीतारमण ने कहा कि रेहड़ी, पटरी और ठेला लगाने वालों को आसान ऋण देने के लिए सरकार एक महीने के भीतर एक विशेष योजना शुरू करेगी। इसके तहत 10,000 रुपए तक की शुरुआती वर्किंग कैपिटल दी जाएगी। डिजिटल पेमेंट करने वालों को प्रोत्साहन दिया जाएगा और समय पर ऋण का भुगतान करने वालों के लिए वर्किंग कैपिटल क्रेडिट की सीमा बढ़ाई जाएगी। उन्होंने दावा किया कि इस योजना के तहत 5,000 करोड़ रुपए की नकदी मुहैया कराई जाएगी और इससे करीब 50 लाख रेहड़ी, पटरी और ठेले वालों को फायदा होगा। कोरोना के प्रकोप को रोकने के लिए सरकार ने 25 मार्च को देशव्यापी लॉकडाउन शुरू किया था। इसके तहत मार्केट को पूरी तरह बंद कर दिया गया था। इससे रेहड़ी, पटरी और ठेले वालों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। लॉकडाउन को दो बार बढ़ाया जा चुका है और लॉकडाउन 3 की मियाद 17 मई को खत्म हो रही है।

लॉकडाउन के कारण डेयरी क्षेत्र के लिए कार्यशील पूंजी ऋण पर ब्याज में छूट डेयरी क्षेत्र पर कोविड-19 के आर्थिक प्रभावों की भरपाई करने के लिए मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने एक नई योजना "डेयरी क्षेत्र के लिए कार्यशील पूंजी ऋण पर ब्याज में छूट" की शुरुआत की है। योजना के तहत 2020-21 के दौरान डेयरी सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों (एसडीसी और एफपीओ) को सहायता प्रदान की जायेगी। योजना के मुख्य बिंदु इस योजना में 2 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज में छूट देने का प्रावधान किया गया है। यदि शीघ्र और समय पर पुनर्भुगतान / ब्याज की अदायगी की जाती है तो ऐसे मामले में ब्याज में 2 प्रतिशत प्रति वर्ष के अतिरिक्त छूट का भी प्रावधान है। इससे अधिशेष दूध के उपयोग के लिए कार्यशील पूंजी संकट को कम करने और किसानों को समय पर भुगतान करने में मदद मिलेगी। इस योजना को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी), आनंद के माध्यम से इस विभाग द्वारा लागू किया जाएगा। संशोधित योजना में 2020-21 के दौरान "डेयरी क्षेत्र के लिए कार्यशील पूंजी ऋण पर ब्याज में छूट" घटक के लिए 100 करोड़ रुपये के बजटीय प्रावधान की परिकल्पना की गयी है। इस योजना के निम्नलिखित लाभ हैं: इससे दूध उत्पादकों को स्थिर बाजार की सुविधा प्राप्त करने में मदद मिलेगी। उत्पादन स्वामित्व वाले संस्थान समय पर दूध उत्पादकों को बिल का भुगतान करने में सक्षम होंगे। इससे उचित मूल्य पर उपभोक्ताओं को गुणवत्ता वाले दूध और दूध उत्पादों की आपूर्ति करने में उत्पादक स्वामित्व वाले संस्थानों को मदद मिलेगी। यह संरक्षित डेयरी वस्तुओं और अन्य दूध उत्पादों के घरेलू बाजार के मूल्य को स्थिर करने में भी मदद करेगा। दुग्ध उत्पादकों के लिए डेयरी संचालन को लाभकारी बनाने के साथ-साथ फ्लश सीजन के दौरान भी किसानों की आय में निरंतर वृद्धि। इससे आयातित वस्तुओं पर निर्भरता में कमी आयेगी, जिससे दूध और दूध उत्पादों की घरेलू कीमतों को स्थिर करने में मदद मिलेगी। राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड, की स्थापना 1965 में भारतीय संसद के एक अधिनियम द्वारा की गयी थी एवं यह एक राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है। इसका मुख्यालय गुजरात के आनन्द शहर में है तथा क्षेत्रीय कार्यालय देश के विभिन्न नगरों में फैले हुए हैं।

साउथ चाइना सी में चीन और ताइवान तनाव कोरोना वायरस संकट के बीच चीन और ताइवान के विवाद बढ़ता नजर आ रहा है। चीन के दक्षिण चीन सागर में ताइवान के नियंत्रण वाले दोंगशा द्वीप समूह पर कब्‍जा करने का युद्धाभ्‍यास करने का ऐलान करने के बाद तनाव और बढ़ गया है। अब ताइवान ने घोषणा की है कि वह जून महीने में फायरिंग का अभ्‍यास करेगा। ताइवान ने कहा है कि इस अभ्‍यास के दौरान दोंगशा द्वीप समूह पर मोर्टार और मशीनगन पोजिशन की परख की जाएगी। दोंगशा द्वीप समूह में एक द्वीप और दो कोरल रीफ हैं। इसके दो किनारे हैं। ताइवान ने इसे नैशनल पार्क घोषित कर रखा है। इससे पहले सोमवार को आई खबरों में कहा गया था कि चीन की पीपुल्‍स लिबरेशन आर्मी अगस्‍त महीने में साउथ चाइना सी में व्‍यापक पैमाने पर लैंडिंग का अभ्‍यास करेगी। यह एक तरीके से दोंगशा द्वीप पर कब्‍जा करने का 'छद्म अभ्‍यास' होगा। ताइवान ने मजबूत की अपने द्वीप की सुरक्षा जापान की क्‍योदो न्‍यूज एजेंसी के मुताबिक पीएलए के लैंडिंग एक्‍सरसाइज को दक्षिण थिएटर कमांड की ओर से आयोजित किया जाएगा और इसमें बड़े पैमाने पर जंगी जहाज, पानी और जमीन दोनों पर चलने में सक्षम होवरक्राफ्ट, हेल‍िकॉप्‍टर और मरीन शामिल होंगे। इस बीच ताइवान ने चीन के किसी भी दुस्‍साहस का जवाब देने के लिए दोंगशा द्वीप समूह पर कोस्‍ट गार्ड की दो स्‍क्‍वाड्रन तैनात कर दी है। इसके अलावा 20, 40, 81 और 120 एमएम के मोर्टार भी द्वीप समूह पर तैनात किए गए हैं। साथ ही पैदल सेना के लिए जरूरी उपकरण भी कोस्‍ट गार्ड को दिए गए हैं। यही नहीं द्वीप समूह पर सैन्‍य प्रतिष्‍ठानों को उन्‍नत किया गया है। ताइवान सरकार ने कहा कि चीन के कब्‍जे के किसी भी प्रयास का जवाब देने के लिए निगरानी और खुफिया गतिविधियों पर विशेष ध्‍यान दिया जा रहा है। साउथ चाइना सी में क्‍या है चीन की चाल? दरअसल, चीन ने कोरोना वायरस के खिलाफ जंग पर बढ़त हासिल कर ली है और अब अपना ध्यान साउथ चाइना सी की तरफ लगा रहा है। चीन वहां अपना सैन्य जाल बिछा रहा है। चीन की हरकतों को देखते हुए अमेरिका ने भी इलाके में अपने तीन युद्ध पोत भेजे हैं। इसके बाद से ही इलाके में तनाव की स्थिति पैदा हो गई है। माना जा रहा है कि चीन साउथ चाइना सी से पेट्रोकेमिकल्स व अन्य मिनरल निकालना चाहता है और इलाके में एक न्यूक्लियर रिएक्टर भी बना सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि साउथ चाइना सी पर युद्ध के हालात पैदा हो सकते हैं जिस युद्ध में चीन, अमेरिका और रूस शामिल हो सकते हैं। उधर, चीन के रक्षा मंत्री जनरल वेइ फंगे ने कहा कि अगर अमेरिका की तरफ से युद्ध के हालत पैदा किए गए तो पेइचिंग हर कीमत पर लड़ने को तैयार है। दक्षिण चीन सागर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए काफी महत्वपूर्ण है। यहां दुनिया का सबसे महंगा शिपिंग लेन है। हर साल इस रास्ते से 3.4 ट्रिलियन पाउंड का व्यापार होता है। ब्रिटेन का 12 प्रतिशत समुद्री व्यापार यानी 97 अरब डॉलर का निर्यात-आयात इसी क्षेत्र से होता है।

उद्यम संसाधन योजना (ईआरपी) “समर्थ” मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग का सभी विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षिक संस्थानों (एचईआई) में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का मिशन है। इसके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सूचना और संचार प्रौद्योगिकी योजना (एनएमईआईसीटी) में राष्ट्रीय शिक्षा मिशन के के तहत एक ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म “समर्थ” (एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग-ईआरपी) विकसित किया है। ईआरपी, समर्थ सभी विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षिक संस्थानों के लिए एक खुला मानक खुला स्रोत संरचना, सुरक्षित, आरोह्य और विकासवादी प्रक्रिया स्वचालन यन्त्र है। यह विश्वविद्यालय / उच्च शैक्षिक संस्थानों में संकाय, छात्रों और कर्मचारियों की आवश्यकताओं को पूरा करता है। अब, ईआरपी, समर्थ को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कुरुक्षेत्र में कार्यान्वित किया गया है, जो विश्व बैंक द्वारा समर्थित तकनीकी शिक्षा गुणवत्ता सुधार कार्यक्रम (टीईक्यूआईपी) के तहत भाग लेने वाली इकाई है। इस पहल का उद्देश्य संस्थान की प्रक्रियाओं को स्वचालित करना है। “समर्थ” टीम द्वारा एनआईटी, कुरुक्षेत्र को यह सॉफ्टवेयर निशुल्क प्रदान किया गया था; मानव संसाधन विकास मंत्रालय में एनएमईआईसीटी और टीईक्यूआईपी टीमों के बीच सहयोग के माध्यम से बिना किसी अतिरिक्त लागत के इन-हाउस टीम द्वारा कार्यान्वित किया गया।उद्यम संसाधन योजना (ईआरपी) “समर्थ” मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग का सभी विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षिक संस्थानों (एचईआई) में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का मिशन है। इसके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सूचना और संचार प्रौद्योगिकी योजना (एनएमईआईसीटी) में राष्ट्रीय शिक्षा मिशन के के तहत एक ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म “समर्थ” (एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग-ईआरपी) विकसित किया है। ईआरपी, समर्थ सभी विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षिक संस्थानों के लिए एक खुला मानक खुला स्रोत संरचना, सुरक्षित, आरोह्य और विकासवादी प्रक्रिया स्वचालन यन्त्र है। यह विश्वविद्यालय / उच्च शैक्षिक संस्थानों में संकाय, छात्रों और कर्मचारियों की आवश्यकताओं को पूरा करता है। अब, ईआरपी, समर्थ को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कुरुक्षेत्र में कार्यान्वित किया गया है, जो विश्व बैंक द्वारा समर्थित तकनीकी शिक्षा गुणवत्ता सुधार कार्यक्रम (टीईक्यूआईपी) के तहत भाग लेने वाली इकाई है। इस पहल का उद्देश्य संस्थान की प्रक्रियाओं को स्वचालित करना है। “समर्थ” टीम द्वारा एनआईटी, कुरुक्षेत्र को यह सॉफ्टवेयर निशुल्क प्रदान किया गया था; मानव संसाधन विकास मंत्रालय में एनएमईआईसीटी और टीईक्यूआईपी टीमों के बीच सहयोग के माध्यम से बिना किसी अतिरिक्त लागत के इन-हाउस टीम द्वारा कार्यान्वित किया गया।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग(MSME) की नयी परिभाषा सरकार ने बुधवार को आर्थिक पैकेज की घोषणा करते हुए सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) की परिभाषा में बदलाव कर उन्हें बड़ी राहत दी। परिभाषा में जहां एक तरफ इनमें स्थायी पूंजी निवेश की सीमा बढ़ायी गयी है वहीं सालाना कारोबार का नया मानदंड भी पेश किया गया है। एमएसएमई लंबे समय से परिभाषा में बदलाव की मांग कर रहा था। परिभाषा में निवेश की न्यूनतम सीमा से लघु उद्योगों में यह आशंका थी कि उन्हें जो लाभ मिल रहा है, वह धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। क्या होते है सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग(MSME)? MSME छोटे पैमाने की औद्योगिक इकाइयाँ होती है जो मध्यम स्तर के विनियोग की सहायता से उत्पादन प्रारम्भ करती हैं। इन इकाइयों मे सीमित श्रम शक्ति से सापेक्षिक रूप में वस्तुओं एवं सेवाओं का कम मात्रा में उत्पादन किया जाता है। MSME को आर्थिक विकास का इंजन माना जाता है क्योकि ये रोजगार, मध्यमवर्ती अन्य समेत वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में महती भूमिका निभाती है। देश में रोजगार उपलब्ध करवाने के संदर्भ में MSME का स्थान सर्वोपरि है। हाल ही में सरकार ने MSME का विनिर्माण और सेवाओं के आधार वर्गीकरण को समाप्त करते हुए सूक्ष्म उद्यम,लघु उद्यम और मध्यम उद्यम की परिभाषा में परिवर्तन किया है एवं इसके लिए सम्बंधित काननों में संशोधन भी जल्द किये जायेंगे। 13 मई 2020 के नई परिभाषा के अनुसार MSME का वर्गीकरण विनिर्माण और सेवाओं के आधार पर न होकर केवल सूक्ष्म उद्यम, लघु उद्यम और मध्यम उद्यम में होगा जो निम्न है- सूक्ष्म उद्योग ( Micro Industries) – इसमें ऐसे उद्योगों को शामिल किया जाएगा जिनका सम्मिलित निवेश 1 करोड़ से कम तथा टर्नओवर 5 करोड़ से कम है। लघु उद्योग ( Small Industries) – इसमें ऐसे उद्योगों को शामिल किया जाएगा जिनका सम्मिलित निवेश 10 करोड़ से कम तथा टर्नओवर 50 करोड़ से कम होगा। मध्यम उद्योग ( Medium Industries) – इसमें ऐसे उद्योगों को शामिल किया जाएगा जिनका सम्मिलित निवेश 20 करोड़ से कम तथा टर्नओवर 100 करोड़ से कम होगा।सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग(MSME) की नयी परिभाषा सरकार ने बुधवार को आर्थिक पैकेज की घोषणा करते हुए सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) की परिभाषा में बदलाव कर उन्हें बड़ी राहत दी। परिभाषा में जहां एक तरफ इनमें स्थायी पूंजी निवेश की सीमा बढ़ायी गयी है वहीं सालाना कारोबार का नया मानदंड भी पेश किया गया है। एमएसएमई लंबे समय से परिभाषा में बदलाव की मांग कर रहा था। परिभाषा में निवेश की न्यूनतम सीमा से लघु उद्योगों में यह आशंका थी कि उन्हें जो लाभ मिल रहा है, वह धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। क्या होते है सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग(MSME)? MSME छोटे पैमाने की औद्योगिक इकाइयाँ होती है जो मध्यम स्तर के विनियोग की सहायता से उत्पादन प्रारम्भ करती हैं। इन इकाइयों मे सीमित श्रम शक्ति से सापेक्षिक रूप में वस्तुओं एवं सेवाओं का कम मात्रा में उत्पादन किया जाता है। MSME को आर्थिक विकास का इंजन माना जाता है क्योकि ये रोजगार, मध्यमवर्ती अन्य समेत वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में महती भूमिका निभाती है। देश में रोजगार उपलब्ध करवाने के संदर्भ में MSME का स्थान सर्वोपरि है। हाल ही में सरकार ने MSME का विनिर्माण और सेवाओं के आधार वर्गीकरण को समाप्त करते हुए सूक्ष्म उद्यम,लघु उद्यम और मध्यम उद्यम की परिभाषा में परिवर्तन किया है एवं इसके लिए सम्बंधित काननों में संशोधन भी जल्द किये जायेंगे। 13 मई 2020 के नई परिभाषा के अनुसार MSME का वर्गीकरण विनिर्माण और सेवाओं के आधार पर न होकर केवल सूक्ष्म उद्यम, लघु उद्यम और मध्यम उद्यम में होगा जो निम्न है- सूक्ष्म उद्योग ( Micro Industries) – इसमें ऐसे उद्योगों को शामिल किया जाएगा जिनका सम्मिलित निवेश 1 करोड़ से कम तथा टर्नओवर 5 करोड़ से कम है। लघु उद्योग ( Small Industries) – इसमें ऐसे उद्योगों को शामिल किया जाएगा जिनका सम्मिलित निवेश 10 करोड़ से कम तथा टर्नओवर 50 करोड़ से कम होगा। मध्यम उद्योग ( Medium Industries) – इसमें ऐसे उद्योगों को शामिल किया जाएगा जिनका सम्मिलित निवेश 20 करोड़ से कम तथा टर्नओवर 100 करोड़ से कम होगा।

केंद्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने हाल ही में सरकार द्वारा खरीदी गयी COBAS 6800 नामक पहली परीक्षण मशीन समर्पित की है। इसे नेशनल सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल (NCDC) में स्थापित किया गया है। यह भारतीय स्वास्थ्य महानिदेशालय, स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन एक संस्थान है। COBAS 6800 एक पूरी तरह से स्वचालित मशीन है जो COVID-19 के लिए वास्तविक समय में पीसीआर परीक्षण करती है। यह 24 घंटों में लगभग 1200 नमूनों को प्रोसेस कर सकती है। इससे देश में परीक्षण क्षमता बढ़ने की उम्मीद है। यह मशीन रोगजनकों जैसे हेपेटाइटिस, क्लैमाइडिया, एचआईवी, पैपिलोमा, एमटीबी, क्लैमाइडिया, सीएमवी, निसेरिया आदि का भी पता लगा सकती है। यह संदूषण को कम करने में मदद करेगी क्योंकि इसमें बहुत कम मानवीय हस्तक्षेप शामिल है। यह भारत की पहली मशीन है जो पूरी तरह से स्वचालित है। इसे एनसीडीसी में क्यों रखा गया है? मशीन को एनसीडीसी में रखा गया है क्योंकि इसमें बेसिक सेफ्टी लेवल 2 परीक्षण सुविधाओं की आवश्यकता है। देश में 4 जैव-सुरक्षा स्तर का पालन किया जाता है। बायोसेफ्टी स्तर 2 उन प्रयोगशालाओं में लागू किया जाता है जो उन एजेंटों के साथ काम करते हैं जो मानव रोग से जुड़े हैं। इन प्रयोगशालाओं में उपयुक्त पीपीई (व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण), दस्ताने, सिंक, आई वॉश होना चाहिए। पृष्ठभूमि इस मशीन को रोश डायग्नोस्टिक्स द्वारा विकसित किया गया है। इस मशीन को विकसित करने का मुख्य उद्देश्य भारत की परीक्षण क्षमता को बढ़ाना है। अभी तक भारत केवल निगरानी के लिए तेजी से एंटीबॉडी परीक्षण किट का उपयोग कर रहा है। COVID-19 संक्रमण की पुष्टि के लिए RT-PCR परीक्षणों का उपयोग किया जा रहा है क्योंकि यह अधिक सटीक है। हालांकि, परिणाम के लिए RT-PCR को न्यूनतम 5 से 6 घंटे लगते हैं। इसलिए, भारत की परीक्षण क्षमता बढ़ाने के लिए देश में ऐसी और मशीनें लाना महत्वपूर्ण हो गया है।

केंद्रीय मंत्री श्री पीयूष गोयल ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दूसरी जी-20 वर्चुअल व्यापार व निवेश मंत्रियों की बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। मुख्य बिंदु इस वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को G20 समूह के वर्तमान अध्यक्ष सऊदी अरब द्वारा आयोजित किया गया था। अप्रैल 2020 से सऊदी अरब ने COVID-19 खतरों, नियंत्रण उपायों और वायरस द्वारा उत्पन्न आर्थिक चुनौती पर चर्चा करने के लिए इस तरह के आभासी शिखर सम्मेलन की एक श्रृंखला की मेजबानी की है। इस बैठक में मंत्री महत्वपूर्ण चिकित्सा आपूर्ति और सीमाओं के पार अन्य आवश्यक वस्तुओं के प्रवाह को सुनिश्चित करने पर काम करने के लिए सहमत हुए। वे मुक्त, गैर-भेदभावपूर्ण, निष्पक्ष और पारदर्शी व्यापार और निवेश वातावरण उपलब्ध करवाने के लिए भी सहमत हुए। वे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को कार्यशील रखने पर भी सहमत हुए। COVID-19 संकट के कारण आज जो हर देश खाद्य कीमतों में अत्यधिक अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है। इससे खाद्य सुरक्षा को भी खतरा है। G-20 मंत्रियों ने बैठक में इस मुद्दे पर काम करने पर सहमति व्यक्त की। पृष्ठभूमि 30 मार्च को G-20 नेताओं ने एक “समन्वित वैश्विक प्रतिक्रिया” की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की थी। समन्वित वैश्विक प्रतिक्रिया के तहत किए गए कार्यों को लागू करने के लिए ऊर्जा, श्रम, रोजगार, कृषि, पर्यटन और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर बैठकें आयोजित की गईं।केंद्रीय मंत्री श्री पीयूष गोयल ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दूसरी जी-20 वर्चुअल व्यापार व निवेश मंत्रियों की बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। मुख्य बिंदु इस वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को G20 समूह के वर्तमान अध्यक्ष सऊदी अरब द्वारा आयोजित किया गया था। अप्रैल 2020 से सऊदी अरब ने COVID-19 खतरों, नियंत्रण उपायों और वायरस द्वारा उत्पन्न आर्थिक चुनौती पर चर्चा करने के लिए इस तरह के आभासी शिखर सम्मेलन की एक श्रृंखला की मेजबानी की है। इस बैठक में मंत्री महत्वपूर्ण चिकित्सा आपूर्ति और सीमाओं के पार अन्य आवश्यक वस्तुओं के प्रवाह को सुनिश्चित करने पर काम करने के लिए सहमत हुए। वे मुक्त, गैर-भेदभावपूर्ण, निष्पक्ष और पारदर्शी व्यापार और निवेश वातावरण उपलब्ध करवाने के लिए भी सहमत हुए। वे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को कार्यशील रखने पर भी सहमत हुए। COVID-19 संकट के कारण आज जो हर देश खाद्य कीमतों में अत्यधिक अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है। इससे खाद्य सुरक्षा को भी खतरा है। G-20 मंत्रियों ने बैठक में इस मुद्दे पर काम करने पर सहमति व्यक्त की। पृष्ठभूमि 30 मार्च को G-20 नेताओं ने एक “समन्वित वैश्विक प्रतिक्रिया” की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की थी। समन्वित वैश्विक प्रतिक्रिया के तहत किए गए कार्यों को लागू करने के लिए ऊर्जा, श्रम, रोजगार, कृषि, पर्यटन और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर बैठकें आयोजित की गईं।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री के नेतृत्व में गठित मंत्री समूह की समिति ने हाल ही में रोजगार और कौशल विकास पर अपने मसौदा प्रस्ताव प्रस्तुत किया। प्रस्ताव ड्राफ्ट में निम्नलिखित प्रस्ताव शामिल हैं : मसौदे में “लैंड पूलिंग मॉडल” का प्रस्ताव दिया गया है। इस मॉडल का उपयोग ग्रीनफील्ड हवाई अड्डों में किया जा रहा है। इस प्रस्ताव में कॉर्पोरेटाईजेशन को सक्षम करने के लिए कृषि में इस मॉडल का उपयोग करने का सुझाव दिया गया है। इससे कुशल मजदूरों की मांग बढ़ेगी। इसके अलावा, इस मसौदे में कौशल विकास कार्यक्रमों के साथ मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का विलय करने का सुझाव दिया गया है। इससे उद्योगों और एमएसएमई तक मनरेगा का विस्तार होगा। इसमें भारतीय रिजर्व बैंक को रिवर्स रेपो दर में 0% की कटौती करने का सुझाव दिया गया है। जब कुछ महीनों के लिए यह किया जाता है तो बैंकों को इससे प्रोत्साहन मिलेगा। इसमें एक राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक रोजगार एक्सचेंज प्रस्तावित किया गया है। इससे विस्थापित श्रमिकों को बड़े स्तर पर मदद मिलेगी। यह प्रवासी श्रमिक कल्याण कोष की स्थापना का भी सुझाव देता है। यह देश भर में फैले खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को कुटीर उद्योग का दर्जा देने का सुझाव देता है। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना इस ड्राफ्ट ने प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत प्रत्येक प्रवासी श्रमिक को नामांकित करने का सुझाव दिया है। इससे उन्हें कैशलेस मेडिकल सुविधाओं का लाभ लेने में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना COVID-19 लड़ाई में शामिल रही है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना इस प्रस्ताव में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना की संभावनाओं का लाभ उठाने का सुझाव दिया गया है। इससे खेती और गैर-कृषि गतिविधियों के बीच संतुलन बनाने में मदद मिलेगी।

14 मई, 2020 को भारत सरकार ने डेयरी क्षेत्र के लिए एक नई योजना शुरू की। इस योजना ने डेयरी सहकारी समितियों और एफपीओ (किसान निर्माता संगठन) का समर्थन करने के लिए कार्यशील पूंजी पर ब्याज सबवेंशन की शुरुआत की है। मुख्य बिंदु इस योजना का उद्देश्य मौजूदा दूध प्रसंस्करण इकाइयों को आधुनिक बनाना है। इसके द्वारा देश की दुग्ध प्रसंस्करण क्षमता को बढ़ाकर प्रति दिन 126 लाख लीटर किया जाएगा। यह योजना बैंकों द्वारा सहकारी समितियों और किसान स्वामित्व वाले दुग्ध संगठनों और कंपनियों को दिए गए ऋणों पर ब्याज सब्सिडी प्रदान करेगी। इस योजना में उन ऋणों को शामिल किया जाएगा जिन्हें 1 अप्रैल, 2020 और 31 मार्च, 2021 के बीच स्वीकृत किया जायेगा। इस योजना में 2% प्रति वर्ष का ब्याज उपदान भी दिया गया है। यदि किसान समय पर ऋण चुकाते हैं, तो ब्याज उ उपदान का 2% अतिरिक्त प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा। संशोधित योजना से किसानों के हाथों में 100 करोड़ रुपये उपलब्ध होने की उम्मीद है। इस योजना को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) द्वारा लागू किया जाना है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की स्थापना भारत की संसद के एक अधिनियम के माध्यम से की गई थी। यह 1965 में स्थापित किया गया था। इस बोर्ड का मुख्य उद्देश्य ‘अमूल कोआपरेटिव’ के समान अन्य सफल कोआपरेटिव की स्थापना करना था। विश्व बैंक ने इस मिशन की सहायता की। इसे “ऑपरेशन फ्लड” नाम दिया गया था और 26 साल तक चला।

भारत सरकार ने हाल ही में तेलंगाना के तेलिया रुमाल और झारखंड की सोहराई खोवर पेंटिंग को जीआई टैग प्रदान किया। मुख्य बिंदु झारखंड की सोहराई खोवर पेंटिंग के लिए आवेदन सोहराई कला महिला विकास सहयोग समिति द्वारा किया गया था। तेलंगाना के तेलिया रुमाल के लिए आवेदन पुट्टपका हैंडलूम क्लस्टर के कंसोर्टियम द्वारा किया गया था। सोहराई खोवर पेंटिंग यह पेंटिंग झारखंड में स्थानीय आदिवासी महिलाओं द्वारा बनाई जाती है। यह एक पारंपरिक और अनुष्ठानिक भित्ति कला है। यह चित्रकला केवल हजारीबाग के जिलों में प्रचलित है। यह केवल शादी और फसल के मौसम के दौरान बनायी जाती है। इसके लिए आदिवासी महिलाएं विभिन्न रंगों की प्राकृतिक रूप से उपलब्ध मिट्टी का उपयोग करती हैं। तेलिया रूमाल तेलिया रुमाल कपास के कपड़े पर जटिल हस्तनिर्मित काम से बनाया जाता है। यह पारंपरिक हथकरघा प्रक्रिया का उपयोग करके बनाया जाताहै। यह प्रक्रिया जटिल है और केवल पारंपरिक हथकरघा प्रक्रियाओं के माध्यम से बनाई जा सकती है। यह डिजाइन तीन विशेष रंगों में बनाए जाते हैं। इसमें लाल, सफेद और काले रंग शामिल हैं।

जेएनसीएएसआर के वैज्ञानिकों ने मधुमेह रोगियों में इंसुलिन के निरंतर वितरण के लिए इंजेक्शन देने लायक सिल्क फाइब्रोइन-आधारित हाइड्रोजेल विकसित किया विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (जेएनसीएएसआर) के वैज्ञानिकों ने हाल ही में मधुमेह रोगियों में इंसुलिन वितरण के लिए इंजेक्शन देने लायक सिल्क फ़ाइब्रोइन-आधारित हाइड्रोजेल विकसित किया है। इस आविष्कार के लिए एक पेटेंट आवेदन भी दाखिल किया गया है। प्रो टी गोविंदराजू और जेएनसीएएसआर की उनके अनुसंधान टीम ने जैव फ़ाइबोमोटोपेबल एडिटिव्स का उपयोग करके सिल्क फाइब्रोइन (एसएफ) सूत्र विकसित किया है और एक ऐसा इंजेक्शन एसएफ हाइड्रोजेल (आईएसएफएच) तैयार किया है जो मधुमेह के रोगियों में इंसुलिन वितरण को आसान बना सकता है। आईएसएफएच ने चूहों में सक्रिय इंसुलिन के वितरण का सफल प्रदर्शन किया है, और प्रदर्शन के परिणाम एसीएस एप्लाइड बायो मटेरियल पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। जेएनसीएएसआर वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि मधुमेह वाले चूहों में त्वचा के नीचे आईएसएफएच युक्त इंसुलिन के इंजेक्शन ने त्वचा के नीचे सक्रिय डिपो का गठन किया, जिसमें से इंसुलिन धीरे-धीरे बाहर निकलता है और 4 दिनों की लम्बी अवधि के लिए शारीरिक ग्लूकोज होमियोस्टेसिस को बहाल रखता है। इसमें रक्त में इंसुलिन की उच्च एकाग्रता के बढ़ने से रक्त शर्करा के अचानक कम होने का कोई जोखिम नहीं होता है। टीम द्वारा उपयोग किए जाने वाले चिपचिपे एडिटिव्स ने एसएफ प्रोटीन की गतिशीलता को सीमित कर दिया और तेजी से जेल में परिणत हुआ। माइक्रोस्ट्रक्चर यांत्रिक शक्ति प्रदान करते हैं। (इंजेक्शन को मदद करने के लिए) आईएसएफएच की रंध्र युक्त आकृति ने डायबेटिक चूहों में अपने सक्रिय रूप में मानव पुनःसंयोजक इंसुलिन के एनकैप्सुलेशन (कैप्सूल बनना) में मदद की। भारत में मधुमेह से 70 मिलियन से अधिक लोग प्रभावित हैं, जो दुनिया में दूसरे स्थान पर है। यह शरीर के भीतर बीटा कोशिकाओं के नुकसान या इंसुलिन प्रतिरोध के कारण इंसुलिन के अपर्याप्त उत्पादन के परिणामस्वरूप होता है, जो ग्लूकोज होमियोस्टेसिस में असंतुलन पैदा करता है और रक्त शर्करा के स्तर में अचानक वृद्धि का कारण बनता है। उपचार के पारंपरिक और अंतिम उपाय के तहत शारीरिक ग्लूकोज होमियोस्टेसिस को बनाए रखने के लिए बार-बार त्वचा के नीचे इंसुलिन इंजेक्शन देना शामिल है। त्वचा के नीचे इंसुलिन इंजेक्शन दर्द, स्थानीय ऊतक क्षय, संक्रमण, तंत्रिका क्षति और स्थानीय रूप से केंद्रित इंसुलिन; शारीरिक रूप से ग्लूकोज होमियोस्टेसिस को प्राप्त करने में असमर्थता के लिए जिम्मेदार होते हैं। नियंत्रित और निरंतर इंसुलिन वितरण से इस समस्या को दूर किया जा सकता है। अपने सक्रिय रूप (गतिविधि की हानि के बिना) में इंसुलिन का एनकैप्सुलेशन और निरंतर वितरण सबसे महत्वपूर्ण है। आईएसएफएच ने यह सिद्ध किया है कि यह एक प्रभावी इंसुलिन वितरण उपकरण है। इसने मधुमेह जानवरों में यांत्रिक शक्ति, जैव अनुकूलता , एनकैप्सुलेशन, भंडारण और सक्रिय इंसुलिन के अपने निरंतर वितरण का प्रदर्शन किया है। आईएसएफएच द्वारा इंसुलिन के सक्रिय इनकैप्सुलेशन और डिलीवरी से भविष्य में मुंह से दिए जाने वाले इंसुलिन का भी विकास किया जा सकता है। जेएनसीएएसआर टीम को उम्मीद है कि दवा कंपनियां आगे आएंगी और इसे मानव उपयोग के लिए विकसित करेंगी।

भोपाल की डीएसटी इंस्पायर फैकल्टी ने हल्का कार्बन फोम बनाया है जो लेड बैटरी की जगह ले सकता है यह कार्बन फोम दूषित जल से आर्सेनिक, तेल और अन्य धातु को अलग करने में किफायती भी होगा यह कार्बन फोम गैर-विषाक्त, बनाने में आसान, सस्ता और जल में अघुलनशील है भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा गठित इंस्पायरफैकल्टी अवार्ड प्राप्त सीएसआईआर- एडवांस्ड मटीरियल्स एंड प्रोसेसेसरिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. राजीव कुमार छिद्रयुक्त कार्बन सामग्री बना रहेहैं जो लेड एसिड बैटरी में लेड-ग्रिड की जगह ले सकता है। यह ऊर्जाइलेक्ट्रॉनिक्स में हीट सिंक्स, एयरोस्पेस में इलेक्ट्रोमैग्नेटिकइंटरफेरेंस शिल्डिंग, हाइड्रोजन भंडारण और लेड एसिड बैटरी एवं जल शुद्धिकरणप्रणाली के लिए इलेक्ट्रोड के रुप में भी उपयोगी हो सकता है। कार्बन फोम फेब्रिकेशन यूनिट में डॉ. राजीव कुमार हाल ही मेंडॉ. राजीव कुमार और उनके अनुसंधान समूह ने हल्का कार्बन फोम विकसित कियाहै जो 0.3जी / सीसी से कम घनत्व, 85% से अधिक काफी छिद्रिल और अच्छी मशीनीशक्ति वाला है। उनके समूह ने कार्बन फोम पर वर्ष 2016 (इंस्पायर फैकल्टी सेजुड़ने के बाद) से काफी प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाओं में लगभग 16 शोध-पत्र प्रकाशित करवा चुका है। यह फोम विनाशन अवरोधक है। इसमें काफी सतहीक्षेत्रके साथ बेहतरीन विद्युतीय और तापीय संवाहकता है। इस फोम ने विभिन्नक्षेत्रों में अपनी संभावित उपयोग क्षमता की वजह से हाल ही में सबका ध्यानआकर्षित किया है। डॉ. राजीव कुमार ने कार्बन फोमके बारे में विस्तार से बताते हुए कहा, "इस फेलोशिप के जरिए हमने संशोधितगुणों के साथ कार्बन फोम को विकसित किया है। हम ऊर्जा भंडारण प्रणाली परकाफी निर्भर है जैसे कि लेड एसिड बैटरी ऑटोमोबाइल्स और घरों में इस्तेमालहोते हैं। हल्का कार्बन फोम लेड एसिड बैटरी की जगह ले सकता है। लेड एसिडबैटरी काफी वजनी, विनाशन क्षमता और कम तापीय स्थायित्व वाला होता है। इंस्पायर फैलोशिप के तहत विकसित कार्बन फोम दूषित जल से आर्सेनिक, तेल औरअन्य धातुओं को अलग करने में काफी किफायती भी होगा। यह कार्बन फोमगैर-विषाक्त, बनाने में आसान, किफायती और जल में अघुलनशील होगा। कार्बन फोमबनाने में लगने वाला कच्चा माल आसानी से सभी जगह उपलब्ध है और इसे बनानेके लिए किसी महंगे उपकरण की भी जरूरत नहीं है। ऐसी सामग्री का वैसे दूरस्थइलाकों में बिना किसी खतरे की आशंका के उपयोग किया जा सकता है जहां बिजलीआपूर्ति कम होती है।

भारत सरकार और एआईआईबी ने पश्चिम बंगाल में सिंचाई सेवाओं और बाढ़ प्रबंधन में सुधार के लिए 145 मिलियन अमरीकी डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए भारत सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) ने पश्चिम बंगाल के दामोदर घाटी कमान क्षेत्र (डीवीसीए)में सिंचाई सेवाओं और बाढ़ प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए आज 145 मिलियन अमरीकी डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए। पश्चिम बंगाल की प्रमुख सिंचाई और बाढ़ प्रबंधन परियोजना से पश्चिम बंगाल के 393,964 हेक्टेयर क्षेत्र के पांच जिलों में लगभग 2.7 मिलियन किसानों को बेहतर सिंचाई सेवाओं का लाभ मिलेगा और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए हर साल आने वाली बाढ़ से बेहतर सुरक्षा मिल सकेगी। समझौते पर भारत सरकार की ओर से वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग में अपर सचिव श्री समीर कुमार खरे ने; पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से प्रिंसिपल रेजीडेंट कमीश्‍नर श्री कृष्ण गुप्ता और एआईआईबी की ओर से महानिदेशक (कार्यवाहक) श्री रजत मिश्रा ने हस्ताक्षर किए। वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग में अपर सचिव श्री समीर कुमार खरे ने कहा, “भारत एक रणनीतिक विकास पथ को अपना रहा है जो अपने जल संसाधनों का अधिक निपुणता से उपयोग और प्रबंधन करता है। “यह परियोजना दामोदर घाटी कमान क्षेत्र में सतह और भूजल का अनुकूलतम उपयोग करके और बाढ़ प्रबंधन को मजबूत बनाकर सिंचाई और कृषि को बेहतर बनाने में सहायता करेगी, करेगी,जिससे कृषि उत्पादकता को बढ़ावा देने और ग्रामीण क्षेत्रों में आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।” डीवीसीए60 साल से अधिक पुराना हैऔर इसके आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। मुख्य चुनौतियों में सेवा वितरण की खराब गुणवत्ता,अक्षम सिंचाई और सतह के पानी के साथ नहर नेटवर्क के मध्य और अंतिम भागों में सिंचाई की पर्याप्‍त व्‍यवस्‍था नहीं होने सहित बुनियादी ढांचे में गिरावट और अपर्याप्त सिंचाई प्रबंधन शामिल है। अंतिम छोर में रहने वाले किसान भूजल निकालने के लिए मजबूर होते हैं, जिससे खेती की लागत बढ़ती है और योजना की स्थिरता को कमजोर करता है। 2005 और 2017 के बीच, अर्ध-महत्वपूर्ण ब्लॉकों की संख्या पांच से बढ़कर 19 हो गई (कुल 41 ब्लॉकों में से)। ऐतिहासिक दृष्टि से निचले दामोदर बेसिन क्षेत्र में बाढ़ आने का खतरा रहता है। हर वर्ष औसतन33,500 हेक्टेयर फसल वाला क्षेत्र और 461,000 लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं। परियोजना के नदी के बहाव वाले क्षेत्र में र्ती बाढ़ से बचाव के लिए बुनियादी ढांचे का अभाव है। परियोजना बाढ़ को कम करने के उपायों में निवेश करेगी, जिसमें तटबंधों को मजबूत करना और डिसिल्टिंग शामिल है। एआईआईबी के उपाध्यक्ष, निवेश संचालन श्री डी.जे. पांडियन ने कहा,“यह निवेश किसानों की आजीविका में सुधार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। इस परियोजना सेबुनियादी ढांचे में सुधार और आधुनिकीकरण के जरिये सिंचाई क्षमता में सुधार करके हजारों किसानों को पर्याप्त पानी प्राप्त करने में मदद मिलेगी।इसके अलावा, निवेश में बाढ़ सुरक्षा के उपाय भी शामिल हैं जो किसानों द्वारा झेले गए नुकसान को काफी कम कर देंगे।" इन चुनौतियों से निपटने के लिए, परियोजना के तहत कई संस्थागत सुधारों की योजना बनाई गई है। इनमें एक आधुनिक प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईएस), न्‍यूनतम मानदंड और साक्ष्य आधारित निर्णय लेने, सतह और भूजल के संयुक्त उपयोग को बढ़ावा देने, तर्कसंगत परिसंपत्ति प्रबंधन की शुरूआत और नागरिकों को शामिल करके पारदर्शिता में सुधार शामिल हैं। सिंचाई सेवा प्रदाताओं को सिंचाई सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार के लिए उनकेकार्य के आधार पर भर्ती किया जाएगा। परियोजना का कुल मूल्य 413.8 मिलियन डॉलर है, यह एआईआईबी (145 मिलियन डॉलर), आईबीआरडी (145 मिलियन डॉलर) और पश्चिम बंगाल सरकार (123.8 मिलियन डॉलर) के बीच सह-वित्तपोषित है। एआईआईबी से मिले 145 मिलियन डॉलर के ऋण में 6 वर्ष की छूट अवधि और 24 साल की परिपक्‍वता अवधि शामिल है।

सचेत का अर्थ सतर्कता है, जो राष्ट्र के समुद्री हित की ‘पूर्ति और संरक्षण के लिए सदैव सतर्क रहने’ की आईसीजी की इच्छा और प्रतिबद्धता को दर्शाता है। ‘आईसीजीएस सचेत’ की कमान उप महानिरीक्षक राजेश मित्तल द्वारा संभाली जा रही है और 11 अधिकारी एवं 110 कर्मी यहां तैनात हैं। भारतीय समुद्री इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि कोविड-19 महामारी के मद्देनजर सामाजिक दूरी बनाए रखने के सख्त प्रोटोकॉल का पालन करते हुए एक पोत का जलावतरण डिजिटल माध्यम से किया गया है। आईबी ‘सी-450’ और ‘सी-451’ लार्सन एंड टुब्रो शिपयार्ड हजीरा द्वारा द्वारा देश में ही डिजाइन एवं निर्मित की गई हैं और ये नवीनतम नौवहन तथा संचार उपकरणों से लैस हैं। 30 मीटर लंबी दो नौकाएं 45 समुद्री मील (नॉट) से भी अधिक गति प्राप्त करने में सक्षम हैं। इन्हें उच्च गति से अवरोधन, तट के निकट गश्ती एवं कम तीव्रता के समुद्री अभियानों के लिए तैयार किया गया है। आईबी की त्वरित जवाबी कार्रवाई क्षमता किसी भी उभरती समुद्री परिस्थिति से निपटने और उसे विफल करने की दृष्टि से इसे एक आदर्श प्‍लेटफॉर्म बनाती है। इन नौकाओं की कमान सहायक कमांडेंट गौरव कुमार गोला और सहायक कमांडेंट अकिन जुत्शी संभाल रहे हैं। तटरक्षक बल स्वदेशी परिसंपत्तियों को शामिल करने में अग्रणी रहा है जिसने इसे पूरे वर्ष परिचालन की दृष्टि से उपलब्ध रहने में सक्षम बनाया है। आईबी में स्वदेशी सामग्री के उपयोग को अधिकतम करने के निरंतर प्रयासों की बदौलत इसमें लगभग 70 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री है। इस प्रकार यह भारतीय जहाज निर्माण उद्योग को आवश्यक प्रोत्‍साहन दे रहा है। तटरक्षक बल के बेड़े में शामिल होने पर इन पोतों को राष्ट्र के समुद्री हितों की रक्षा के लिए विशेष रूप से विशिष्‍ट आर्थिक जोन (ईईजेड) की निगरानी, तटीय सुरक्षा और उन अन्य कार्यों को पूरा करने में लगाया जाएगा, जिनका उल्‍लेख तट के कार्य चार्टर में किया गया है। इन पोतों के जलावतरण के साथ ही आईसीजी के पास अब 150 पोत एवं नौकाएं और 62 विमान हो गए हैं जो एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इसके अलावा, 40 पोत विभिन्न भारतीय शिपयार्डों में निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं और 16 उन्नत हल्के हेलीकॉप्टरों का निर्माण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, बेंगलुरू में किया जा रहा है, जो निरंतर उत्‍पन्‍न होने वाली समुद्री चुनौतियों से निपटने में आईसीजी की निगरानी क्षमताओं को और भी अधिक मजबूती प्रदान करेंगे। आईसीजी को समुद्र में लगभग 400 लोगों की जान बचाने, सिविल अधिकारियों को दी गई सहायता के हिस्से के रूप में 4,500 लोगों की जिंदगी बचाने और अकेले वर्ष 2019 में 32 चिकित्सा निकासी कार्यों को पूरा करने का श्रेय है। आईसीजी की उत्‍कृष्‍ट दक्षता केवल भारतीय जल सीमा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि द्विपक्षीय सहयोग समझौतों के प्रावधानों के अनुसार मित्र तटीय देशों के साथ सहयोग करने के परिणामस्‍वरूप हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) में दवाओं की सफल जब्ती संभव हो पाई। आईसीजी एवं अन्य अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के बीच वास्तविक समय पर सूचनाओं को साझा करने, समुचित समन्वय और गहरी समझ से ही इन कार्यों में सफलता मिली है। भारतीय ईईजेड पर पैनी नजर रखने के परिणामस्‍वरूप 2,000 करोड़ रुपये मूल्‍य की निषिद्ध वस्‍तुओं की जब्ती सुनिश्चित करने के साथ-साथ इसी अवधि के दौरान भारतीय जल सीमा में अवैध रूप से मछली पकड़ने के कारण 119 उपद्रवियों के साथ मछली पकड़ने वाली 30 विदेशी नौकाओं (जहाज) को पकड़ना संभव हुआ है। रक्षा सचिव डॉ. अजय कुमार, सचिव (रक्षा उत्पादन) श्री राज कुमार, सचिव (रक्षा वित्त) श्रीमती गार्गी कौल और रक्षा मंत्रालय के अन्य वरिष्ठ अधिकारी दिल्ली में मौजूद थे, जबकि रक्षा राज्य मंत्री श्री श्रीपद येसो नाइक और गोवा शिपयार्ड के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक भारत भूषण नागपाल (सेवानिवृत्त) इस अवसर पर गोवा में उपस्थित थे।

रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने भारतीय तटरक्षक बल के पोत ‘सचेत’ और दो अवरोधक नौकाओं का जलावतरण किया देश में ही निर्मित जहाज आत्मनिर्भरता का प्रतीक हैं और समुद्री सुरक्षा को निरंतर बढ़ाते हैं: राजनाथ सिंह रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने आज नई दिल्‍ली से वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से गोवा में भारतीय तटरक्षक बल के पोत (आईसीजीएस)‘सचेत’ और दो अवरोधक नौकाओं (आईबी) सी-450 और सी-451 का जलावतरण किया।‘आईसीजीएस सचेत’ पांच अपतटीय गश्ती पोतों (ओपीवी) की श्रृंखला में पहला है और इसे गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (जीएसएल) द्वारा देश में ही डिजाइन एवं निर्मित किया गया है तथा इसे अत्याधुनिक नौवहन एवं संचार उपकरणों से सुसज्जित किया गया है। श्री राजनाथ सिंह ने डिजिटल माध्यम से जलावतरण की इस पहल के लिए आईसीजी और जीएसएल की सराहना करते हुए कहा, ‘‘इन पोतों का जलावतरण भारत की तटीय क्षमता निर्माण प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसके अलावा, कोविड-19 जैसी चुनौतियों के बावजूद यह देश की सुरक्षा एवं हिफाजत के लिए हमारी प्रतिबद्धता और दृढ़ संकल्प का एक उत्‍कृष्‍ट उदाहरण भी है। ‘हमारे समुद्री रक्षक’, आईसीजी और भारतीय जहाज निर्माण उद्योग की बढ़ती ताकत देश के लिए गर्व की बात है।’’ प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के विजन ‘सागर’ (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) का उल्‍लेख करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा, ‘महासागर न केवल हमारे देश, बल्कि वैश्विक समृद्धि की भी जीवन रेखा हैं।’ उन्‍होंने कहा, ‘सुरक्षित, संरक्षित और स्‍वच्‍छ समुद्र हमारे राष्ट्र निर्माण के लिए आर्थिक अवसर प्रदान करते हैं। भारत एक उभरती समुद्री ताकत है, और हमारी समृद्धि भी काफी हद तक समुद्र पर निर्भर है। एक जिम्मेदार समुद्री ताकत होने के नाते महासागर सरकार की प्राथमिकता हैं।’ समुद्र तट की रक्षा में आईसीजी की भूमिका की सराहना करते हुए श्री राजनाथ सिंह ने कहा, ‘दुनिया में चौथे सबसे बड़े तटरक्षक के रूप में इसने स्‍वयं को एक विश्वसनीय बल के रूप में स्थापित किया है। यह न केवल हमारे समुद्र तट और तटीय समुदाय की रक्षा करता है, बल्कि आर्थिक गतिविधियों एवं विशिष्‍ट आर्थिक जोन (ईईजेड) में समुद्री पर्यावरण की भी रक्षा करता है।’ रक्षा मंत्री ने यह माना कि समुद्र राष्ट्र विरोधी तत्वों द्वारा प्रायोजित किसी भी प्रकार के खतरों का एक माध्यम बन सकता है, इसलिए सभी हितधारकों के बीच एक सहयोगात्मक और सहकारी दृष्टिकोण विकसित करना अत्‍यंत आवश्‍यक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आज से बेड़े में शामिल किए जा रहे तटरक्षक पोत उनकी ताकत को बढ़ाएंगे और समुद्री आतंकवाद, मादक पदार्थों की तस्करी, समुद्री कानून लागू करने, तस्करी और खतरे में पड़े समुद्री यात्रियों की खोज एवं बचाव से संबंधित चुनौतियों का सामना करने में काफी मददगार साबित होंगे। श्री राजनाथ सिंह ने गोवा शिपयार्ड और एलएंडटी शिपयार्ड, हजीरा के प्रयासों की प्रशंसा की जिन्होंने वर्तमान परिस्थितियों में भी जहाजों का निर्माण और रखरखाव जारी रखा है। उन्होंने कहा, ‘‘यह प्रोफेशनल नजरिए को भी दर्शाता है। उल्लेखनीय है कि भारतीय शिपयार्ड ‘ मेक इन इंडिया’ के विजन और ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, जिसका आह्वान हाल ही में हमारे प्रधानमंत्री ने किया है।’’ भारतीय तटरक्षक बल के महानिदेशक कृष्णस्वामी नटराजन ने कहा कि जलावतरण कार्यक्रम ने यह साबित कर दिया है कि कोविड-19 से उत्‍पन्‍न बाधाओं के बावजूद आईसीजी निरंतर अग्रसर है। उन्होंने कहा कि पोतों के आईसीजी बेड़े में शामिल नए पोत आईसीजी को समुद्र में सदैव सतर्क रहने में मदद करेंगे और इसके साथ ही कोविड-19 के खिलाफ देश की लड़ाई में भी अहम योगदान देंगे। 105 मीटर लंबे पोत ‘सचेत’ का वजन लगभग 2,350 टन है और यह 9,100 किलोवाट के दो डीजल इंजनों द्वारा संचालित होता है जिन्‍हें 6,000 नॉटिकल मील की सहनशक्ति के साथ 26 समुद्री मील (नॉट) की अधिकतम गति से चलने लायक डिजाइन किया गया है। इसके साथ ही नवीनतम उपकरण एवं प्रणालियां इसे एक कमांड प्लेटफॉर्म की भूमिका निभाने और आईसीजी के चार्टर को पूरा करने के लिए संबंधित कार्यों को पूरा करने की क्षमता प्रदान करती हैं। यह पोत तेजी से बोर्डिंग और तलाश एवं बचाव अभियानों के लिए दोहरे इंजन वाले एक हेलि‍कॉप्टर, उच्च गति वाली चार नौकाओं और हवा से भरी जाने वाली एक नौका को ले जाने में सक्षम है। यह समुद्र में तेल फैलने के कारण होने वाले प्रदूषण से निपटने के लिए सीमित प्रदूषण रोधी उपकरण ले जाने में भी सक्षम है।