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अमृत मंथन
हाल ही में हुए टी20 वर्ल्ड कप में भारत ने फिर से खिताब जीता। खिताब भले ही भारत ने जीता मगर संजू सेमसन ने खिताब के साथ-साथ पूरे भारत के क्रिकेट प्रेमियों के दिल में अपनी जगह भी बना ली। ये वही संजू सेमसन हैं जो एक समय पर भारत के टीम मे भी जगह नहीं बना पा रहे थे। और आज हर कोई उनके नाम, उनके बेटिंग की तारीफ कर रहा है। उन्होंने हाल ही दिए में इंटरव्यू में कहा,"न्यूज़ीलैंड से हुए मुकाबले में उनके खराब प्रदर्शन के कारण उन्हें लगा था कि अब उनका सपना टूट जाएगा.." मगर ये निराशा, ये दुख, ये पीड़ा उनके मनोबल को हरा नहीं पाई। और इस जीत का अमृत पाने के लिए उन्हे न जाने कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी, न जाने कितनी बार उन्हें हार का सामना करना होगा पर फिर भी वो अंत में जीते। क्यों? क्योंकि वो निरंतर मेहनत करते रहे, मंथन करते रहे।
मंथन? पुराणों में भी इसका जिक्र है। अमृत पाने के लिए देवताओं (अच्छी आदतें, अच्छे विचार) और राक्षसों (बुरी आदतों, बुरे विचारों) के बीच द्वन्द्व हुआ और जब अच्छी शक्तियों ने बुरी शक्तियों पर विजय पाई तब जाकर अमृत की प्राप्ति हुई। एक विद्यार्थी को भी ऐसे ही मंथन की जरूरत है। जिसमें वो अपनी अच्छी आदतों और अच्छे विचारों को इतना प्रबल, इतना ताकतवर बनाए कि उसकी बुरी आदतें, बुरे विचार उसके लक्ष्य के बीच में अवरोधक न बन पाए। ऐसा करने के बाद ही किसी के भी जीवन में सफलता का, जीत का अमृत मिलता है। जैसे संजू सेमसन को अमृत की प्राप्ति हुई वैसे ही आप सभी को भी एक दिन सफलता के अमृत की प्राप्ति होगी। बस याद रहे मंथन नहीं रुकना चाहिए।
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"""The world is full of people suffering from the effects of their own unlived life. They become bitter, critical, or rigid, not because the world is cruel to them, but because they have betrayed their own inner possibilities. The artist who never makes art becomes cynical about those who do. The lover who never risks loving mocks romance. The thinker who never commits to a philosophy sneers at belief itself. And yet, all of them suffer, because deep down they know: the life they mock is the life they were meant to live""
कांच की बरनी
जो लोग घर में रहते हैं या दस से ज्यादा बार किचन में गए होंगे, उन्होंने एक ना एक कांच की बरनी तो जरूर देखी होगी। अगर हम गलती से उसे खुला छोड़ दे, ढक्कन ठीक से ना लगाए, कोई गीला चम्मच डाल दे या कोई झूठा बर्तन डाल दे, हमें मां डांटती जरूर थी या है। मां यही बोलती थी कि सड़ जाएगा। ऐसे ही हमें अपने दिमाग को कांच की बरनी में रख देना चाहिए। इसका मतलब नहीं कि अब ऑपरेशन करवाने जाए। कांच की बरनी में दिमाग रखने का तात्पर्य है कि अपने दिमाग को बाहर के माहौल से बहुत दूर रखो।
ये जरूरी भी है। दिमाग एक बच्चे की तरह होता है। जैसे बच्चे खिलौने की दुकान देखकर रोने लगते हैं। वैसे ही दिमाग भी अपने खिलौने यानी डिस्ट्रैक्शन वाली सामग्री देखकर रोने लगता है। सामग्री जैसे - ईरान अमेरिका का युद्ध, नीतीश कुमार जी से जुड़ी खबरें, मौहल्ले में हो रही कोई लड़ाई, लाइब्रेरी में हो रही बातें, कोचिंग के दोस्तों की यारी, और तमाम वो चीजें जो आपको भटकने के लिए मजबूर करती हैं। दिमाग को सड़ने से रोको। इसे बाहर के माहौल से दूर रखो। और केवल एक ही काम में लगाओ, जो है पढ़ाई। पढ़ाई वो नाव है जो तुम्हें इस पार से उस पार ले जाएगी। अब ये निर्भर तुम पर करता है कि तुम इन किताबों की लकड़ियों से पढ़ाई की नाव बनाओगे या इन्हें जलाकर अपने सपने को भी जला दोगे।
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As colours embrace the skin and wash away the old,
may your heart be cleansed of grudges,
filled with forgiveness, and adorned with divine love.
Happy holi 🎆🎆🎆
